श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 1071–1080
श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1071–1080
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भानोर्मान्द्यशैघ्रयसमगतिभिः समामनन्ति ॥७ ॥
एवं चन्द्रमा अर्कगभस्तिभ्य उपरिष्टाल्लक्षयोजनत उपलभ्यमानोऽर्कस्य संवत्सरभुक्तिं पक्षाभ्यां मासभुक्तिं सपादर्क्षाभ्यां दिनेनैव पक्षभुक्तिमग्रचारी द्रुततरगमनो भुङ्क्ते || ८ || अथ चापूर्यमाणाभिश्च कलाभिरमराणां क्षीयमाणाभिश्च कलाभिः पितॄणामहोरात्राणि पूर्वपक्षापरपक्षाभ्यां वितन्वानः सर्वजीवनिवहप्राणो जीवश्चैकमेकं नक्षत्रं त्रिंशता मुहूर्तेर्भुङ्क्ते ॥ ९ ॥
वेद और विद्वान् लोग भी जिनकी गतिको जाननेके लिये उत्सुक रहते हैं, वे साक्षात् आदिपुरुष भगवान् नारायण ही लोकोंके कल्याण और कर्मोंकी शुद्धिके लिये अपने वेदमय विग्रह कालको बारह मासोंमें विभक्त कर वसन्तादि छः ऋतुओंमें उनके यथायोग्य गुणोंका विधान करते हैं ॥३ ॥ इस लोकमें वर्णाश्रमधर्मका अनुसरण करनेवाले पुरुष वेदत्रयीद्वारा
प्रतिपादित छोटे - बड़े कर्मोंसे इन्द्रादि देवताओंके रूपमें और योगके साधनोंसे अन्तर्यामीरूपमें उनकी श्रद्धापूर्वक आराधना करके सुगमतासे ही परम पद प्राप्त कर सकते हैं ॥४ ॥ भगवान्
सूर्य सम्पूर्ण लोकोंके आत्मा हैं । वे पृथ्वी और द्युलोकके मध्यमें स्थित आकाशमण्डलके भीतर कालचक्रमें स्थित होकर बारह मासोंको भोगते हैं, जो संवत्सरके अवयव हैं और मेष आदि राशियोंके नामसे प्रसिद्ध हैं । इनमेंसे प्रत्येक मास चन्द्रमानसे शुक्ल और कृष्ण दो पक्षका, पितृमानसे एक रात और एक दिनका तथा सौरमानसे सवा दो नक्षत्रका बताया जाता है । जितने कालमें सूर्यदेव इस संवत्सरका छठा भाग भोगते हैं, उसका वह अवयव ' ऋतु ' कहा जाता है ॥५ ॥ आकाशमें भगवान् सूर्यका जितना मार्ग है, उसका आधा वे जितने
समयमें पार कर लेते हैं, उसे एक ' अयन ' कहते हैं ॥६ ॥ तथा जितने समयमें वे अपनी मन्द,
तीव्र और समान गतिसे स्वर्ग और पृथ्वीमण्डलके सहित पूरे आकाशका चक्कर लगा जाते हैं, उसे अवान्तर भेदसे संवत्सर, परिवत्सर, इडावत्सर, अनुवत्सर अथवा वत्सर कहते हैं ॥७ ॥
इसी प्रकार सूर्यकी किरणोंसे एक लाख योजन ऊपर चन्द्रमा है । उसकी चाल बहुत है, इसलिये वह सब नक्षत्रोंसे आगे रहता है । यह सूर्यके एक वर्षके मार्गको एक मासमें, एक मासके मार्गको सवा दो दिनोंमें और एक पक्षके मार्गको एक ही दिनमें तै कर लेता है || ८ || यह कृष्णपक्षमें क्षीण होती हुई कलाओंसे पितृगणके और शुक्लपक्षमें बढ़ती हुई कलाओंसे देवताओंके दिन - रातका विभाग करता है तथा तीस - तीस मुहूर्तोंमें एक - एक नक्षत्रको पार करता है । अन्नमय और अमृतमय होनेके कारण यही समस्त जीवोंका प्राण और जीवन है ॥९ ॥
य एष षोडशकलः पुरुषो भगवान्मनोमयोऽन्नमयोऽमृतमयो देवपितृमनुष्य-भूतपशुपक्षिसरीसृपवीरुधां प्राणाप्यायन - शीलत्वात्सर्वमय इति वर्णयन्ति ॥१० ॥
तत उपरिष्टात्त्रिलक्षयोजनतो नक्षत्राणि मेरुं दक्षिणेनैव कालायन ईश्वरयोजितानि सहाभिजिताष्टाविंशतिः ॥ ११ ॥ तत उपरिष्टा- दुशना द्विलक्षयोजनत उपलभ्यते पुरतः
पश्चात्सहैव वार्कस्य शैत्र्यमान्द्यसाम्या- भिर्गतिभिरर्कवच्चरति लोकानां नित्यदानुकूल ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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एव प्रायेण वर्षयंश्चारेणानुमीयते स वृष्टिविष्टम्भग्रहोपशमनः ॥ १२ ॥
उशनसा बुधो व्याख्यातस्तत उपरिष्टाद् द्विलक्षयोजनतो बुधः सोमसुत उपलभ्यमानः प्रायेण शुभकृद्यदार्काद् व्यतिरिच्येत तदाति-वाताभ्रप्रायानावृष्ट्यादिभयमाशंसते || १३ || अत ऊर्ध्वमङ्गारकोऽपि योजनलक्षद्वितय उपलभ्यमानस्त्रिभिस्त्रिभिः पक्षैरेकैकशो राशीन्द्वादशानुभुङ्क्ते यदि न वक्रेणाभिवर्तते प्रायेणाशुभग्रहोऽघशंसः ॥१४ ॥
तत उपरिष्टाद् द्विलक्षयोजनान्तरगतो भगवान् बृहस्पतिरेकैकस्मिन् राशौ परिवत्सरं परिवत्सरं चरति यदि न वक्रः स्यात्प्रायेणानुकूलो ब्राह्मणकुलस्य ॥१५ ॥
तत उपरिष्टाद्योजनलक्षद्वयात्प्रतीयमानः शनैश्चर एकैकस्मिन् राशौ त्रिंशन्मासान् विलम्बमानः सर्वानेवानुपर्येति तावद्भिरनुवत्सरैः प्रायेण हि सर्वेषामशान्तिकरः ॥१६ ॥
ये जो सोलह कलाओंसे युक्त मनोमय, अन्नमय, अमृतमय पुरुषस्वरूप भगवान् चन्द्रमा हैं — ये ही देवता, पितर, मनुष्य, भूत, पशु, पक्षी, सरीसृप और वृक्षादि समस्त प्राणियोंके प्राणोंका पोषण करते हैं; इसलिये इन्हें ' सर्वमय ' कहते हैं ॥१० ॥
चन्द्रमासे तीन लाख योजन ऊपर अभिजितके सहित अट्ठाईस नक्षत्र हैं । भगवान्ने इन्हें कालचक्रमें नियुक्त कर रखा है, अतः ये मेरुको दायीं ओर रखकर घूमते रहते हैं ॥११ ॥
इनसे दो लाख योजन ऊपर शुक्र दिखायी देता है । यह सूर्यकी शीघ्र, मन्द और समान गतियोंके अनुसार उन्हींके समान कभी आगे, कभी पीछे और कभी साथ - साथ रहकर चलता है । यह वर्षा करनेवाला ग्रह है, इसलिये लोकोंको प्रायः सर्वदा ही अनुकूल रहता है । इसकी गतिसे ऐसा अनुमान होता है कि यह वर्षा रोकनेवाले ग्रहोंको शान्त कर देता है ॥१२ ॥
शुक्रकी गतिके साथ - साथ बुधकी भी व्याख्या हो गयी - शुक्र के अनुसार ही बुधकी गति भी समझ लेनी चाहिये । यह चन्द्रमाका पुत्र शुक्रसे दो लाख योजन ऊपर है । यह प्रायः मंगलकारी ही है; किन्तु जब सूर्यकी गतिका उल्लंघन करके चलता है, तब बहुत अधिक आँधी, बादल और सूखेके भयकी सूचना देता है ॥१३ ॥ इससे दो लाख योजन ऊपर मंगल
है । वह यदि वक्रगतिसे न चले तो, एक - एक राशिको तीन - तीन पक्षमें भोगता हुआ बारहों
राशियोंको पार करता है । यह अशुभ ग्रह है और प्रायः अमंगलका सूचक है ॥१४ ॥
इसके ऊपर दो लाख योजनकी दूरीपर भगवान् बृहस्पतिजी हैं । ये यदि वक्रगतिसे न चलें, तो एक - एक राशिको एक - एक वर्षमें भोगते हैं । ये प्रायः ब्राह्मणकुलके लिये अनुकूल रहते हैं ॥१५ ॥
बृहस्पतिसे दो लाख योजन ऊपर शनैश्चर दिखायी देते हैं । ये तीस - तीस महीनेतक एक-एक राशिमें रहते हैं । अतः इन्हें सब राशियोंको पार करनेमें तीस वर्ष लग जाते हैं । ये प्रायः सभीके लिये अशान्तिकारक हैं ॥१६ ॥
तत उत्तरस्मादृषय एकादशलक्षयो - जनान्तर उपलभ्यन्ते य एव लोकानां ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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शमनुभावयन्तो भगवतो विष्णोर्यत्परमं पदं प्रदक्षिणं प्रक्रमन्ति ॥१७ ॥
इनके ऊपर ग्यारह लाख योजनकी दूरीपर कश्यपादि सप्तर्षि दिखायी देते हैं । ये सब लोकोंकी मंगल - कामना करते हुए भगवान् विष्णुके परम पद ध्रुवलोककी प्रदक्षिणा किया करते हैं ॥१७ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे ज्योतिश्चक्रवर्णने द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥
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अथ त्रयोविंशोऽध्यायः शिशुमारचक्रका वर्णन श्रीशुक उवाच अथ तस्मात्परतस्त्रयोदशलक्षयोजनान्तरतो यत्तद्विष्णोः परमं पदमभिवदन्ति यत्र ह महाभागवतो ध्रुव औत्तानपादिरग्निनेन्द्रेण प्रजापतिना कश्यपेन धर्मेण च समकालयुग्भिः सबहुमानं दक्षिणतः क्रियमाण इदानीमपि कल्पजीविनामाजीव्य उपास्ते तस्येहानुभाव उपवर्णितः ॥१ ॥ स हि सर्वेषां ज्योतिर्गणानां
ग्रहनक्षत्रादीनामनिमिषेणाव्यक्तरंहसाभगवता कालेन भ्राम्यमाणानां स्थाणुरिवावष्टम्भ ईश्वरेण विहितः शश्वदवभासते ॥२ ॥
यथा मेढीस्तम्भ आक्रमणपशवः संयोजितास्त्रिभिस्त्रिभिः सवनैर्यथास्थानं मण्डलानि चरन्त्येवं भगणा ग्रहादय एतस्मिन्नन्तर्बहिर्योगेन कालचक्र आयोजिता ध्रुवमेवावलम्ब्य वायुनोदीर्यमाणा आकल्पान्तं परिचङ्क्रमन्ति नभसि यथा मेघाः श्येनादयो वायुवशाः कर्मसारथयः परिवर्तन्ते एवं ज्योतिर्गणाः प्रकृतिपुरुषसंयोगानुगृहीताः कर्मनिर्मितगतयो भुवि न पतन्ति ॥३ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं — राजन्! सप्तर्षियोंसे तेरह लाख योजन ऊपर ध्रुवलोक है । इसे भगवान् विष्णुका परम पद कहते हैं । यहाँ उत्तानपादके पुत्र परम भगवद्भक्त ध्रुवजी विराजमान हैं । अग्नि, इन्द्र, प्रजापति कश्यप और धर्म – ये सब एक साथ अत्यन्त आदरपूर्वक इनकी प्रदक्षिणा करते रहते हैं । अब भी कल्पपर्यन्त रहनेवाले लोक इन्हींके आधार स्थित हैं । इनका इस लोकका प्रभाव हम पहले ( चौथे स्कन्धमें ) वर्णन कर चुके हैं ॥१ ॥ सदा जागते रहनेवाले अव्यक्तगति भगवान् कालके द्वारा जो ग्रह - नक्षत्रादि
ज्योतिर्गण निरन्तर घुमाये जाते हैं, भगवान्ने ध्रुवलोकको ही उन सबके आधारस्तम्भरूपसे नियुक्त किया है । अतः यह एक ही स्थानमें रहकर सदा प्रकाशित होता है ॥२ ॥
जिस प्रकार दायँ चलानेके समय अनाजको खूँदनेवाले पशु छोटी, बड़ी और मध्याम रस्सीमें बँधकर क्रमशः निकट, दूर और मध्यमें रहकर खंभेके चारों ओर मण्डल बाँधकर घूमते रहते हैं, उसी प्रकार सारे नक्षत्र और ग्रहगण बाहर - भीतरके क्रमसे इस कालचक्रमें नियुक्त होकर ध्रुवलोकका ही आश्रय लेकर वायुकी प्रेरणासे कल्पके अन्ततक घूमते रहते हैं । जिस प्रकार मेघ और बाज आदि पक्षी अपने कर्मोंकी सहायतासे वायुके अधीन रहकर आकाशमें उड़ते रहते हैं, उसी प्रकार ये ज्योतिर्गण भी प्रकृति और पुरुषके संयोगवश अपने-अपने कर्मोंके अनुसार चक्कर काटते रहते हैं, पृथ्वीपर नहीं गिरते ॥३ ॥
केचनैतज्ज्योतिरनीकं शिशुमारसंस्थानेन भगवतो वासुदेवस्य योगधारणायामनु-****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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वर्णयन्ति ॥४ ॥ यस्य पुच्छाग्रेऽवाक्शिरसः कुण्डलीभूतदेहस्य ध्रुव उपकल्पितस्तस्य
लाङ्गूले प्रजापतिरग्निरिन्द्रो धर्म इति पुच्छमूले धाता विधाता च कट्यां सप्तर्षयः । तस्य दक्षिणावर्त - कुण्डलीभूतशरीरस्य यान्युदगयनानि दक्षिणपार्श्वे तु नक्षत्राण्युपकल्पयन्ति दक्षिणायनानि तु सव्ये | यथा शिशुमारस्य कुण्डलाभोगसन्निवेशस्य पार्श्वयोरुभयोरप्यवयवाः समसंख्या भवन्ति । पृष्ठे त्वजवीथी आकाशगङ्गा चोदरतः || ५ || पुनर्वसुपुष्यौ दक्षिणवामयोः २ श्रोण्योरार्द्राश्लेषे च दक्षिणवामयोः पश्चिमयोः पादयोरभि - जिदुत्तराषाढे दक्षिणवामयोर्नासिकयोर्यथासंख्यं श्रवणपूर्वाषाढे दक्षिणवामयोर्लोचनयोर्धनिष्ठा मूलं च दक्षिणवामयोः कर्णयोर्मघादीन्यष्ट नक्षत्राणि दक्षिणायनानि वामपार्श्ववक्रिषु युञ्जीत तथैव मृगशीर्षादीन्युदगयनानि * दक्षिणपार्श्ववक्रिषु ' प्रातिलोम्येन प्रयुञ्जीत शतभिषाज्येष्ठे स्कन्धयोर्दक्षिणवामयोर्न्यसेत् || ६ || उत्तराहनावगस्तिरधराहनौ ' यमो मुखेषु चाङ्गारकः शनैश्चर उपस्थे बृहस्पतिः ककुदि वक्षस्यादित्यो हृदये नारायणो मनसि चन्द्रो नाभ्यामुशना स्तनयोरश्विनौ बुधः प्राणापानयो राहुर्गले केतवः सर्वाङ्गेषु रोमसु सर्वे तारागणाः ॥७ ॥
कोई - कोई पुरुष भगवान्की योगमायाके आधारपर स्थित इस ज्योतिश्चक्रका शिशुमार ( सूँस ) -के रूपमें वर्णन करते हैं || ४ || यह शिशुमार कुण्डली मारे हुए है और इसका मुख नीचेकी ओर है । इसकी पूँछके सिरेपर ध्रुव स्थित है । पूँछके मध्यभागमें प्रजापति, अग्नि, इन्द्र और धर्म हैं । पूँछकी जड़में धाता और विधाता हैं । इसके कटिप्रदेशमें सप्तर्षि हैं । यह शिशुमार दाहिनी ओरको सिकुड़कर कुण्डली मारे हुए है । ऐसी स्थितिमें अभिजित्से लेकर पुनर्वसुपर्यन्त जो उत्तरायणके चौदह नक्षत्र हैं, वे इसके दाहिने भागमें हैं और पुष्यसे लेकर उत्तराषाढ़ापर्यन्त जो दक्षिणायनके चौदह नक्षत्र हैं, वे बायें भागमें हैं । लोकमें भी जब शिशुमार कुण्डलाकार होता है, तब उसके दोनों ओरके अंगोंकी संख्या समान रहती है, उसी प्रकार यहाँ नक्षत्र - संख्यामें भी समानता है । इसकी पीठमें अजवीथी ( मूल, पूर्वाषाढ़ा और उत्तराषाढ़ा नामके तीन नक्षत्रोंका समूह ) है और उदरमें आकाशगंगा है ॥५ ॥ राजन्! इसके
दाहिने और बायें कटितटोंमें पुनर्वसु और पुष्य नक्षत्र हैं, पीछेके दाहिने और बायें चरणोंमें आर्द्रा और आश्लेषा नक्षत्र हैं तथा दाहिने और बायें नथुनोंमें क्रमशः अभिजित् और उत्तराषाढ़ा हैं । इसी प्रकार दाहिने और बायें नेत्रोंमें श्रवण और पूर्वाषाढ़ा एवं दाहिने और बायें कानोंमें धनिष्ठा और मूल नक्षत्र हैं । मघा आदि दक्षिणायनके आठ नक्षत्र बायीं पसलियोंमें और विपरीत क्रमसे मृगशिरा आदि उत्तरायणके आठ नक्षत्र दाहिनी पसलियोंमें हैं । शतभिषा और ज्येष्ठा - ये दो नक्षत्र क्रमशः दाहिने और बायें कंधोंकी जगह हैं ॥ ६ ॥ इसकी ऊपरकी
थूथनीमें अगस्त्य, नीचेकी ठोडीमें नक्षत्ररूप यम, मुखोंमें मंगल, लिंगप्रदेशमें शनि, ककुमें बृहस्पति, छातीमें सूर्य, हृदयमें नारायण, मनमें चन्द्रमा, नाभिमें शुक्र, स्तनोंमें अश्विनीकुमार, प्राण और अपानमें बुध, गलेमें राहु, समस्त अंगोंमें केतु और रोमोंमें सम्पूर्ण तारागण स्थित हैं ॥७ ॥
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एतदु हैव भगवतो विष्णोः सर्वदेवतामयं रूपमहरहः सन्ध्यायां प्रयतो वाग्यतो निरीक्षमाण उपतिष्ठेत नमो ज्योतिर्लोकाय कालाय नायानिमिषां पतये महापुरुषायाभिधीमहीति ॥ ८ ॥
ग्रहर्क्षतारामयमाधिदैविकं पापापहं मन्त्रकृतां त्रिकालम् । नमस्यतः स्मरतो वा त्रिकालं नश्येत तत्कालजमाशु पापम् ॥९ राजन्! यह भगवान् विष्णुका सर्वदेवमय स्वरूप है । इसका नित्यप्रति सायंकालके समय पवित्र और मौन होकर दर्शन करते हुए चिन्तन करना चाहिये तथा इस मन्त्रका जप करते हुए भगवान्की स्तुति करनी चाहिये - ' सम्पूर्ण ज्योतिर्गणोंके आश्रय, कालचक्रस्वरूप, सर्वदेवाधिपति परमपुरुष परमात्माका हम नमस्कारपूर्वक ध्यान करते हैं ' || ८ || ग्रह, नक्षत्र और ताराओंके रूपमें भगवान्का आधिदैविकरूप प्रकाशित हो रहा है; वह तीनों समय उपर्युक्त मन्त्रका जप करनेवाले पुरुषोंके पाप नष्ट कर देता है । जो पुरुष प्रातः, मध्याह्न और सायं – तीनों काल उनके इस आधिदैविक स्वरूपका नित्यप्रति चिन्तन और वन्दन करता है, उसके उस समय किये हुए पाप तुरन्त नष्ट हो जाते हैं ॥९ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे शिशुमारसंस्थावर्णनं नाम त्रयोविंशोऽध्यायः ॥२३ ॥
१. प्रा ० पा ० — च्छ्राग्रेऽर्वाक्छिरसः । २. प्रा ० पा ० – योरार्द्राश्लेषे च । ३. प्रा ० पा०— पार्श्ववक्षःसु । ४. प्रा ० पा ० - मृगशीर्षर्क्षादीन्यु ० । ५. प्रा ० पा ० – क्षिणपार्श्वेषु प्राप्तिलोम्येन शतभिषाज्येष्ठे । ६. प्रा ० पा ० – उत्तरहनावगस्त्योऽधरहनौ यमो मुखे चा ० । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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अथ चतुर्विंशोऽध्यायः राहु आदिकी स्थिति, अतलादि नीचेके लोकोंका वर्णन श्रीशुक उवाच अधस्तात्सवितुर्योजनायुते स्वर्भानु - र्नक्षत्रवच्चरतीत्येके योऽसावमरत्वं ग्रहत्वं चालभत भगवदनुकम्पया स्वयमसुरापसदः सैंहिकेयो ह्यतदर्हस्तस्य तात जन्म कर्माणि चोपरिष्टाद्वक्ष्यामः ॥१ ॥
यददस्तरणेर्मण्डलं प्रतपतस्तद्विस्तरतो योजनायुतमाचक्षते द्वादशसहस्त्रं सोमस्य त्रयोदशसहस्रं राहोर्यः पर्वणि तद्व्यवधानकृद्वैरानुबन्धः सूर्याचन्द्रमसावभि-धावति ॥२ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं— परीक्षित्! कुछ लोगोंका कथन है कि सूर्यसे दस हजार योजन नीचे राहु नक्षत्रोंके समान घूमता है । इसने भगवान्की कृपासे ही देवत्व और ग्रहत्व प्राप्त किया है, स्वयं यह सिंहिकापुत्र असुराधम होनेके कारण किसी प्रकार इस पदके योग्य नहीं है । इसके जन्म और कर्मोंका हम आगे वर्णन करेंगे ॥ १ ॥
सूर्यका जो यह अत्यन्त तपता हुआ मण्डल है, उसका विस्तार दस हजार योजन बतलाया जाता है । इसी प्रकार चन्द्रमण्डलका विस्तार बारह हजार योजन है और राहुका तेरह हजार योजन । अमृतपानके समय राहु देवताके वेषमें सूर्य और चन्द्रमाके बीचमें आकर बैठ गया था, उस समय सूर्य और चन्द्रमाने इसका भेद खोल दिया था; उस वैरको याद करके यह अमावास्या और पूर्णिमाके दिन उनपर आक्रमण करता है ॥२ ॥
तन्निशम्योभयत्रापि भगवता रक्षणाय प्रयुक्तं सुदर्शनं नाम भागवतं दयितमस्त्रं तत्तेजसा दुर्विषहं मुहुः परिवर्तमानमभ्यवस्थितो मुहूर्तमुद्विजमानश्चकितहृदय आरादेव निवर्तते तदुपरागमिति वदन्ति लोकाः ॥३ ॥
ततोऽधस्तात्सिद्धचारणविद्याधराणां सदनानि तावन्मात्र एव ॥४ ॥
ततोऽधस्ताद्यक्षरक्षः - पिशाचप्रेतभूतगणानां विहाराजिरमन्तरिक्षं यावद्वायुः प्रवाति यावन्मेघा उपलभ्यन्ते ॥५ ॥ ततोऽधस्ताच्छतयोजनान्तर इयं पृथिवी
यावद्धंस भासश्येनसुपर्णादयः पतत्त्रिप्रवरा उत्पतन्तीति ॥६ ॥ उपवर्णितं
भूमेर्यथासंनिवेशाव - स्थानमवनेरप्यधस्तात् सप्त भूविवरा एकैकशो योजनायुतान्तरेणायामविस्तारेणोपक्लृप्ता अतलं वितलं सुतलं तलातलं महातलं रसातलं पातालमिति ॥७ ॥ एतेषु हि बिलस्वर्गेषु
स्वर्गादप्यधिककामभोगीश्वर्यानन्दभूतिविभूतिभिः सुसमृद्धभवनोद्यानाक्रीडविहारेषु दैत्यदानव - काद्रवेया नित्यप्रमुदितानुरक्तकलत्रापत्यबन्धु- सुहृदनुचरा गृहपतय ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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ईश्वरादप्यप्रतिहतकामा मायाविनोदा निवसन्ति ॥८ ॥ येषु महाराज मयेन मायाविना
विनिर्मिताः पुरो नानामणिप्रवर - प्रवेकविरचितविचित्रभवनप्राकारगोपुरसभाचैत्य-चत्वरायतनादिभिर्नागासुरमिथुनपारावतशुक-सारिकाकीर्णकृत्रिमभूमिभिर्विवरेश्वरगृहोत्तमैः समलङ्कृताश्चकासति ॥९ ॥
यह देखकर भगवान्ने सूर्य और चन्द्रमाकी रक्षाके लिये उन दोनोंके पास अपने प्रिय आयुध सुदर्शन चक्रको नियुक्त कर दिया है । वह निरन्तर घूमता रहता है, इसलिये राहु उसके असह्य तेजसे उद्विग्न और चकितचित्त होकर मुहूर्तमात्र उनके सामने टिककर फिर सहसा लौट आता है । उसके उतनी देर उनके सामने ठहरनेको ही लोग ' ग्रहण ' कहते हैं ॥३ ॥ राहुसे
दस हजार योजन नीचे सिद्ध, चारण और विद्याधर आदिके स्थान हैं || ४ || उनके नीचे जहाँतक वायुकी गति है और बादल दिखायी देते हैं, अन्तरिक्ष लोक है । यह यक्ष, राक्षस, पिशाच, प्रेत और भूतोंका विहारस्थल है ॥५ ॥ उससे नीचे सौ योजनकी दूरीपर यह पृथ्वी है ।
जहाँतक हंस, गिद्ध, बाज और गरुड़ आदि प्रधान प्रधान पक्षी उड़ सकते हैं, वहींतक इसकी सीमा है ॥६ ॥ पृथ्वीके विस्तार और स्थिति आदिका वर्णन तो हो ही चुका है । इसके भी नीचे
अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल और पाताल नामके सात भू - विवर ( भूगर्भस्थित बिल या लोक ) हैं । ये एकके नीचे एक दस - दस दजार योजनकी दूरीपर स्थित हैं और इनमेंसे प्रत्येककी लंबाई - चौड़ाई भी दस - दस हजार योजन ही है || ७ || ये भूमिके बिल भी एक प्रकारके स्वर्ग ही हैं । इनमें स्वर्गसे भी अधिक विषयभोग, ऐश्वर्य, आनन्द, सन्तान-सुख और धन - सम्पत्ति है । यहाँके वैभवपूर्ण भवन, उद्यान और क्रीडास्थलोंमें दैत्य, दानव और नाग तरह - तरहकी मायामयी क्रीडाएँ करते हुए निवास करते हैं । वे सब गार्हस्थ्यधर्मका पालन करनेवाले हैं । उनके स्त्री, पुत्र, बन्धु, बान्धव और सेवकलोग उनसे बड़ा प्रेम रखते हैं और सदा प्रसन्नचित्त रहते हैं । उनके भोगोंमें बाधा डालनेकी इन्द्रादिमें भी सामर्थ्य नहीं है || ८ || महाराज! इन बिलोंमें मायावी मयदानवकी बनायी हुई अनेकों पुरियाँ शोभासे जगमगा रही हैं, जो अनेक जातिकी सुन्दर - सुन्दर श्रेष्ठ मणियोंसे रचे हुए चित्र - विचित्र भवन, परकोटे, नगरद्वार, सभाभवन, मन्दिर, बड़े - बड़े आँगन और गृहोंसे सुशोभित हैं; तथा जिनकी कृत्रिम भूमियों ( फर्शो ) -पर नाग और असुरोंके जोड़े एवं कबूतर, तोता और मैना आदि पक्षी किलोल करते रहते हैं, ऐसे पातालाधिपतियोंके भव्य भवन उन पुरियोंकी शोभा बढ़ाते हैं || ९ || वहाँके बगीचे भी अपनी शोभासे देवलोकके उद्यानोंकी शोभाको मात करते हैं । उनमें अनेकों वृक्ष हैं, जिनकी सुन्दर डालियाँ फल - फूलोंके गुच्छों और कोमल कोंपलोंके भारसे झुकी रहती हैं तथा जिन्हें तरह - तरहकी लताओंने अपने अंगपाशसे बाँध रखा है । वहाँ जो निर्मल जलसे भरे हुए अनेकों जलाशय हैं, उनमें विविध विहंगोंके जोड़े विलास करते रहते हैं । इन वृक्षों और जलाशयोंकी सुषमासे वे उद्यान बड़ी शोभा पा रहे हैं । उन जलाशयोंमें रहनेवाली मछलियाँ जब खिलवाड़ करती हुई उछलती हैं, तब उनका जल हिल उठता है । साथ ही जलके ऊपर उगे हुए कमल, कुमुद, कुवलय, कह्लार, नीलकमल, लालकमल और शतपत्र कमल आदिके समुदाय भी हिलने लगते हैं । इन कमलोंके वनोंमें रहनेवाले पक्षी अविराम क्रीडा - कौतुक करते हुए भाँति - भाँतिकी बड़ी मीठी बोली बोलते रहते हैं, जिसे सुनकर मन ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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और इन्द्रियोंको बड़ा ही आह्लाद होता है । उस समय समस्त इन्द्रियोंमें उत्सव - सा छा जाता है ॥१० ॥ वहाँ सूर्यका प्रकाश नहीं जाता, इसलिये दिन - रात आदि कालविभागका भी कोई
खटका नहीं देखा जाता ॥११ ॥ वहाँके सम्पूर्ण अन्धकारको बड़े - बड़े नागोंके मस्तकोंकी
मणियाँ ही दूर करती हैं ॥ १२ ॥ इन लोकोंके निवासी जन औषधि, रस, रसायन, अन्न, पान
और स्नानादिका सेवन करते हैं, वे सभी पदार्थ दिव्य होते हैं; इन दिव्य वस्तुओंके सेवनसे उन्हें मानसिक या शारीरिक रोग नहीं होते तथा झुर्रियाँ पड़ जाना, बाल पक जाना, बुढ़ापा आ जाना, देहका कान्तिहीन हो जाना, शरीरमेंसे दुर्गन्ध आना, पसीना चूना, थकावट अथवा शिथिलता आना तथा आयुके साथ शरीरकी अवस्थाओंका बदलना - ये कोई विकार नहीं होते । वे सदा सुन्दर, स्वस्थ, जवान और शक्तिसम्पन्न रहते हैं ॥१३ ॥
उद्यानानि चातितरां मनइन्द्रियानन्दिभिः कुसुमफलस्तबकसुभगकिसलयावनतरुचिर - विटपविटपिनां लताङ्गालिङ्गितानां श्रीभिः समिथुनविविधविहङ्गमजलाशयानाममलजल - पूर्णानां झषकुलोल्लङ्घन क्षुभितनीरनीरजकुमुद-कुवलयकह्लारनीलोत्पललोहितशतपत्रादिवनेषु कृतनिकेतनानामेकविहाराकुलमधुरविविधस्वना-दिभिरिन्द्रियोत्सवैरमरलोकश्रियमतिशयितानि ॥१० ॥ यत्र ह वाव न
भयमहोरात्रादिभिः कालविभागैरुपलक्ष्यते ॥११ ॥
यत्र हि महाहिप्रवरशिरोमणयः सर्वं तमः प्रबाधन्ते ॥१२ ॥
न वा एतेषु वसतां दिव्यौषधिरसरसायनान्नपानस्नानादिभिराधयो व्याधयो वलीपलितजरादयश्च भवन्ति ॥१३ ॥
देहवैवर्ण्यदौर्गन्ध्यस्वेदक्लमग्लानिरिति वयोऽव - स्थाश्च न हि तेषां कल्याणानां प्रभवति कुतश्चन मृत्युर्विना भगवत्तेजसश्चक्रापदेशात् ॥१४ ॥ यस्मिन् प्रविष्टेऽसुरवधूनां प्रायः पुंसवनानि भयादेव
स्रवन्ति पतन्ति च ॥१५ ॥
अथातले मयपुत्रोऽसुरो बलो निवसति येन ह वा इह सृष्टाः षण्णवतिर्मायाः काश्चनाद्यापि मायाविनो धारयन्ति यस्य च जृम्भमाणस्य मुखतस्त्रयः स्त्रीगणा उदपद्यन्त स्वैरिण्यः कामिन्यः पुंश्चल्य इति या वै विलायनं प्रविष्टं पुरुषं रसेन हाटकाख्येन साधयित्वा स्वविलासावलोकनानुरागस्मितसंलापोपगूहनादिभिः स्वैर किल रमयन्ति पुरुष यस्मिन्नुपयुक्ते ईश्वरोऽहं सिद्धोऽहमित्ययुतमहागजबलमात्मानमभिमन्यमानः कत्थते मदान्ध इव ॥१६ ॥
ततोऽधस्ताद्वितले हरो भगवान् हाटकेश्वरः स्वपार्षदभूतगणावृतः १ ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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प्रजापतिसर्गोपबृंहणाय भवो भवान्या सह मिथुनीभूत ' आस्ते यतः प्रवृत्ता सरित्प्रवरा हाटकी नाम भवयोर्वीर्येण यत्र चित्रभानुर्मातरिश्वना समिध्यमान ओजसा पिबति तन्निष्ठ्यूतं हाटकाख्यं सुवर्णं भूषणेनासुरेन्द्रावरोधेषु पुरुषाः सह पुरुषीभिर्धारयन्ति ॥१७ ॥
उन पुण्यपुरुषोंकी भगवान् के तेजरूप सुदर्शन चक्रके सिवा और किसी साधनसे मृत्यु नहीं हो सकती ॥१४ ॥ सुदर्शन चक्रके तो आते ही भयके कारण असुररमणियोंका गर्भस्राव
और गर्भपात * हो जाता है ॥१५ ॥
अतल लोकमें मयदानवका पुत्र असुर बल रहता है । उसने छियानबे प्रकारकी माया रची है । उनमेंसे कोई - कोई आज भी मायावी पुरुषोंमें पायी जाती हैं । उसने एक बार जँभाई ली थी, उस समय उसके मुखसे स्वैरिणी ( केवल अपने वर्णके पुरुषोंसे रमण करनेवाली ), कामिनी ( अन्य वर्णोंके पुरुषोंसे भी समागम करनेवाली ) और पुंश्चली ( अत्यन्त चंचल स्वभाववाली ) —तीन प्रकारकी स्त्रियाँ उत्पन्न हुईं । ये उस लोकमें रहनेवाले पुरुषोंको हाटक नामका रस पिलाकर सम्भोग करनेमें समर्थ बना लेती हैं और फिर उनके साथ अपनी हाव-भावमयी चितवन, प्रेममयी मुसकान, प्रेमालाप और आलिंगनादिके द्वारा यथेष्ट रमण करती हैं । उस हाटक - रसको पीकर मनुष्य मदान्ध - सा हो जाता है और अपनेको दस हजार हाथियोंके समान बलवान् समझकर ' मैं ईश्वर हूँ, मैं सिद्ध हूँ, ' इस प्रकार बढ़ - बढ़कर बातें करने लगता है ॥१६ ॥
उसके नीचे वितल लोकमें भगवान् हाटकेश्वर नामक महादेवजी अपने पार्षद भूतगणोंके सहित रहते हैं । वे प्रजापतिकी सृष्टिकी वृद्धिके लिये भवानीके साथ विहार करते रहते हैं । उन दोनोंके तेजसे वहाँ हाटकी नामकी एक श्रेष्ठ नदी निकली है । उसके जलको वायुसे प्रज्वलित अग्नि बड़े उत्साहसे पीता है । वह जो हाटक नामका सोना थूकता है, उससे बने हुए आभूषणोंको दैत्यराजोंके अन्तःपुरोंमें स्त्री - पुरुष सभी धारण करते हैं ॥१७ ॥
ततोऽधस्तात्सुतले उदारश्रवाः पुण्यश्लोको विरोचनात्मजो बलिर्भगवता महेन्द्रस्य प्रियं चिकीर्षमाणेनादितेर्लब्धकायो भूत्वा वटुवामनरूपेण पराक्षिप्तलोकत्रयो ' भगवदनुकम्पयैव पुनः प्रवेशित इन्द्रादिष्वविद्यमानया सुसमृद्धया श्रियाभिजुष्टः स्वधर्मेणाराधयंस्तमेव भगवन्तमाराधनीयमपगत - साध्वस आस्तेऽधुनापि || १८ || नो एवैतत्साक्षात्कारो र भूमिदानस्य यत्तद्भगवत्यशेषजीवनिकायानां जीवभूतात्मभूते परमात्मनि वासुदेव तीर्थतमे पात्र उपपन्ने परया श्रद्धया परमादरसमाहितमनसा सम्प्रतिपादितस्य साक्षादपवर्गद्वारस्य यद्विलनिलयैश्वर्यम् || १ ९ || यस्य ह वाव क्षुत्पतनप्रस्खलनादिषु विवशः सकृन्नामाभिगृणन् पुरुषः कर्मबन्धनमञ्जसा विधुनोति यस्य हैव प्रतिबाधनं मुमुक्षवोऽन्यथैवोपलभन्ते ॥२० ॥ तद्भक्ता - नामात्मवतां
सर्वेषामात्मन्यात्मद आत्मतयैव || २१ || न वै भगवान्नूनममुष्या - नुजग्राह यदुत ****** ebook converter DEMO Watermarks *******