श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 121–130
श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 121–130
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पेट बढ़ जायगा । फिर कुछ खाया - पीया जायगा नहीं, इससे मेरी शक्ति क्षीण हो जायगी; तब बता, घरका धंधा कैसे होगा? ॥४५ ॥ और — दैववश - यदि कहीं गाँवमें डाकुओंका
आक्रमण हो गया तो गर्भिणी स्त्री कैसे भागेगी । यदि शुकदेवजीकी तरह यह गर्भ भी पेटमें ही रह गया तो इसे बाहर कैसे निकाला जायगा || ४६ || और कहीं प्रसवकालके समय वह टेढ़ा हो गया तो फिर प्राणोंसे ही हाथ धोना पड़ेगा । यों भी प्रसवके समय बड़ी भयंकर पीड़ा होती है; मैं सुकुमारी भला, यह सब कैसे सह सकूँगी? ॥ ४७ ॥ मैं जब दुर्बल पड़ जाऊँगी, तब
ननदरानी आकर घरका सब माल - मता समेट ले जायँगी । और मुझसे तो सत्य - शौचादि नियमोंका पालन होना भी कठिन ही जान पड़ता है ॥४८ ॥ जो स्त्री बच्चा जनती है, उसे उस
बच्चेके लालन - पालनमें भी बड़ा कष्ट होता है । मेरे विचारसे तो वन्ध्या या विधवा स्त्रियाँ ही सुखी हैं ' ॥४९ ॥
मनमें ऐसे ही तरह - तरहके कुतर्क उठनेसे उसने वह फल नहीं खाया और जब उसके पतिने पूछा — ‘ फल खा लिया? ' तब उसने कह दिया- ' हाँ, खा लिया ' ॥५० ॥
एकदा भगिनी तस्यास्तद्गृहं स्वेच्छयाऽऽगता ।
तदग्रे कथितं सर्वं चिन्तेयं महती हि मे ॥५१
दुर्बला तेन दुःखेन ह्यनुजे करवाणि किम् ।
साब्रवीन्मम गर्भोऽस्ति तं दास्यामि प्रसूतितः ॥ ५२
तावत्कालं सगर्भेव गुप्ता तिष्ठ गृहे सुखम् ।
वित्तं त्वं मत्पतेर्यच्छ स ते दास्यति बालकम् ॥५३
षाण्मासिको मृतो बाल इति लोको वदिष्यति ।
तं बालं पोषयिष्यामि नित्यमागत्य ते गृहे ॥५४
फलमर्पय धेन्वै त्वं परीक्षार्थं तु साम्प्रतम् ।
तत्तदाचरितं सर्वं तथैव स्त्रीस्वभावतः ॥ ५५
अथ कालेन सा नारी प्रसूता बालकं तदा ।
आनीय जनको बालं रहस्ये धुन्धुलीं ददौ ॥ ५६
तया च कथितं भर्त्रे प्रसूतः सुखमर्भकः ।
लोकस्य सुखमुत्पन्नमात्मदेवप्रजोदयात् ॥५७
ददौ दानं द्विजातिभ्यो जातकर्म विधाय च ।
गीतवादित्रघोषोऽभूत्तद्द्वारे मङ्गलं बहु ॥५८
भर्तुरग्रेऽब्रवीद्वाक्यं स्तन्यं नास्ति कुचे मम ।
अन्यस्तन्येन निर्दुग्धा कथं पुष्णामि बालकम् ॥५९
मत्स्वसुश्च प्रसूताया मृतो बालस्तु वर्तते ।
तामाकार्य गृहे रक्ष सा तेऽर्भं पोषयिष्यति ॥६०
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पतिना तत्कृतं सर्वं पुत्ररक्षणहेतवे ।
पुत्रस्य धुन्धुकारीति नाम मात्रा प्रतिष्ठितम् ॥६१
त्रिमासे निर्गते चाथ सा धेनुः सुषुवेऽर्भकम् ।
सर्वाङ्गसुन्दरं दिव्यं निर्मलं कनकप्रभम् ॥६२
एक दिन उसकी बहिन अपने आप ही उसके घर आयी; तब उसने अपनी बहिनको सारा वृत्तान्त सुनाकर कहा कि ' मेरे मनमें इसकी बड़ी चिन्ता है ॥ ५१ ॥ मैं इस दुःखके
कारण दिनोंदिन दुबली हो रही हूँ । बहिन! मैं क्या करूँ? ' बहिनने कहा, ' मेरे पेटमें बच्चा है, प्रसव होनेपर वह बालक मैं तुझे दे दूँगी ॥ ५२ ॥ तबतक तू गर्भवतीके समान घरमें गुप्त-रूपसे सुखसे रह । तू मेरे पतिको कुछ धन दे देगी तो वे तुझे अपना बालक दे देंगे ॥५३ ॥
( हम ऐसी युक्ति करेंगी ) कि जिसमें सब लोग यही कहें कि ' इसका बालक छः महीनेका होकर मर गया ' और मैं नित्यप्रति तेरे घर आकर उस बालकका पालन - पोषण करती रहूँगी ॥५४ ॥ तू इस समय इसकी जाँच करनेके लिये यह फल गौको खिला दे । ' ब्राह्मणीने
स्त्रीस्वभाववश जो - जो उसकी बहिनने कहा था, वैसे ही सब किया ॥५५ ॥
इसके पश्चात् समयानुसार जब उस स्त्रीके पुत्र हुआ, तब उसके पिताने चुपचाप लाकर उसे धुन्धुलीको दे दिया || ५६ || और उसने आत्मदेवको सूचना दे दी कि मेरे सुखपूर्वक बालक हो गया है । इस प्रकार आत्मदेवके पुत्र हुआ सुनकर सब लोगोंको बड़ा आनन्द हुआ ॥ ५७ ॥ ब्राह्मणने उसका जातकर्म संस्कार करके ब्राह्मणोंको दान दिया और उसके
द्वारपर गाना - बजाना तथा अनेक प्रकारके मांगलिक कृत्य होने लगे ॥५८ ॥ धुन्धुलीने अपने
पतिसे कहा, ‘ मेरे स्तनोंमें तो दूध ही नहीं है; फिर गौ आदि किसी अन्य जीवके दूधसे मैं इस बालकका किस प्रकार पालन करूँगी? ॥ ५ ९ ॥ मेरी बहिनके अभी बालक हुआ था, वह मर गया है; उसे बुलाकर अपने यहाँ रख लें तो वह आपके इस बच्चेका पालन - पोषण कर लेगी ॥६० ॥ तब पुत्रकी रक्षाके लिये आत्मदेवने वैसा ही किया तथा माता धुन्धुलीने उस
बालकका नाम धुन्धुकारी रखा ॥ ६१ ॥
इसके बाद तीन महीने बीतनेपर उस गौके भी एक मनुष्याकार बच्चा हुआ । वह सर्वांगसुन्दर, दिव्य, निर्मल तथा सुवर्णकी - सी कान्तिवाला था ॥ ६२ ॥ उसे देखकर
ब्राह्मणदेवताको बड़ा आनन्द हुआ और उसने स्वयं ही उसके सब संस्कार किये । इस समाचारसे और सब लोगोंको भी बड़ा आश्चर्य हुआ और वे बालकको देखनेके लिये आये ॥६३ ॥ तथा आपसमें कहने लगे, ' देखो, भाई! अब आत्मदेवका कैसा भाग्य उदय
हुआ है! कैसे आश्चर्यकी बात है कि गौके भी ऐसा दिव्यरूप बालक उत्पन्न हुआ है ॥६४ ॥
दैवयोगसे इस गुप्त रहस्यका किसीको भी पता न लगा । आत्मदेवने उस बालकके गौके - से कान देखकर उसका नाम ' गोकर्ण ' रखा ॥६५ ॥
दृष्ट्वा प्रसन्नो विप्रस्तु संस्कारान् स्वयमादधे ।
मत्वाऽऽश्चर्यं जनाः सर्वे दिदृक्षार्थं समागताः ॥६३
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भाग्योदयोऽधुना जात आत्मदेवस्य पश्यत ।
धेन्वा बालः प्रसूतस्तु देवरूपीति कौतुकम् ॥६४
न ज्ञातं तद्रहस्यं तु केनापि विधियोगतः ।
गोकर्णं तं सुतं दृष्ट्वा गोकर्णं नाम चाकरोत् ॥ ६५
कियत्कालेन तौ जातौ तरुणौ तनयावुभौ ।
गोकर्णः पण्डितो ज्ञानी धुन्धुकारी महाखलः ॥ ६६
स्नानशौचक्रियाहीनो दुर्भक्षी क्रोधवर्धितः ।
दुष्परिग्रहकर्ता च शवहस्तेन भोजनम् ॥६७
चौरः सर्वजनद्वेषी परवेश्मप्रदीपकः ।
लालनायार्भकान्धृत्वा सद्यः कूपे न्यपातयत् ॥ ६८
हिंसकः शस्त्रधारी च दीनान्धानां प्रपीडकः ।
चाण्डालाभिरतो नित्यं पाशहस्तः श्वसंगतः ॥६९
तेन वेश्याकुसङ्गेन पित्र्यं वित्तं तु नाशितम् ।
एकदा पितरौ ताड्य पात्राणि स्वयमाहरत् ॥७०
तत्पिता कृपणः प्रोच्चैर्धनहीनो रुरोद ह ।
वन्ध्यत्वं तु समीचीनं कुपुत्रो दुःखदायकः ॥ ७१
कुछ काल बीतनेपर वे दोनों बालक जवान हो गये । उनमें गोकर्ण तो बड़ा पण्डित और ज्ञानी हुआ, किन्तु धुन्धुकारी बड़ा ही दुष्ट निकला ॥ ६६ ॥ स्नान - शौचादि ब्राह्मणोचित
आचारोंका उसमें नाम भी न था और न खान - पानका ही कोई परहेज था । क्रोध उसमें बहुत बढ़ा - चढ़ा था । वह बुरी - बुरी वस्तुओंका संग्रह किया करता था । मुर्देके हाथसे छुआया हुआ अन्न भी खा लेता था ॥६७ ॥ दूसरोंकी चोरी करना और सब लोगोंसे द्वेष बढ़ाना उसका
स्वभाव बन गया था । छिपे - छिपे वह दूसरोंके घरोंमें आग लगा देता था । दूसरोंके बालकोंको खेलानेके लिये गोदमें लेता और उन्हें चट कुएँ में डाल देता ॥ ६८ ॥ हिंसाका उसे व्यसन - सा
हो गया था । हर समय वह अस्त्र - शस्त्र धारण किये रहता और बेचारे अंधे और दीन-दुःखियोंको व्यर्थ तंग करता । चाण्डालोंसे उसका विशेष प्रेम था; बस, हाथमें फंदा लिये कुत्तोंकी टोलीके साथ शिकारकी टोहमें घूमता रहता ॥ ६ ९ ॥ वेश्याओंके जालमें फँसकर उसने अपने पिताकी सारी सम्पत्ति नष्ट कर दी । एक दिन माता - पिताको मार - पीटकर घरके ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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सब बर्तन - भाँड़े उठा ले गया ॥७० ॥
इस प्रकार जब सारी सम्पत्ति स्वाहा हो गयी, तब उसका कृपण पिता फूट - फूटकर रोने लगा और बोला — ' इससे तो इसकी माँका बाँझ रहना ही अच्छा था; कुपुत्र तो बड़ा ही दुःखदायी होता है ॥७१ ॥ अब मैं कहाँ रहूँ? कहाँ जाऊँ? मेरे इस संकटको कौन काटेगा?
हाय! मेरे ऊपर तो बड़ी विपत्ति आ पड़ी है, इस दुःखके कारण अवश्य मुझे एक दिन प्राण छोड़ने पड़ेंगे ॥ ७२ ॥ उसी समय परम ज्ञानी गोकर्णजी वहाँ आये और उन्होंने पिताको
वैराग्यका उपदेश करते हुए बहुत समझाया ॥ ७३ ॥ वे बोले, ' पिताजी! यह संसार असार है ।
यह अत्यन्त दुःखरूप और मोहमें डालनेवाला है । पुत्र किसका? धन किसका? स्नेहवान् पुरुष रात - दिन दीपकके समान जलता रहता है ॥ ७४ ॥ सुख न तो इन्द्रको है और न चक्रवर्ती
राजाको ही; सुख है तो केवल विरक्त, एकान्तजीवी मुनिको ॥ ७५ ॥ ' यह मेरा पुत्र है ' इस
अज्ञानको छोड़ दीजिये । मोहसे नरककी प्राप्ति होती है । यह शरीर तो नष्ट होगा ही । इसलिये सब कुछ छोड़कर वनमें चले जाइये ॥७६ ॥
क्व तिष्ठामि क्व गच्छामि को मे दुःखं व्यपोहयेत् ।
प्राणांस्त्यजामि दुःखेन हा कष्टं मम संस्थितम् ॥७२
तदानीं तु समागत्य गोकर्णो ज्ञानसंयुतः ।
बोधयामास जनकं वैराग्यं परिदर्शयन् ॥७३
असारः खलु संसारो दुःखरूपी विमोहकः ।
सुतः कस्य धनं कस्य स्नेहवाञ्ज्वलतेऽनिशम् ॥७४
न चेन्द्रस्य सुखं किञ्चिन्न सुखं चक्रवर्तिनः ।
सुखमस्ति विरक्तस्य मुनेरेकान्तजीविनः ॥७५
मुञ्चाज्ञानं प्रजारूपं मोहतो नरके गतिः ।
निपतिष्यति देहोऽयं सर्वं त्यक्त्वा वनं व्रज ॥७६
तद्वाक्यं तु समाकर्ण्य गन्तुकामः पिताब्रवीत् ।
किं कर्तव्यं वने तात तत्त्वं वद सविस्तरम् ॥७७
अन्धकूपे स्नेहपाशे बद्धः पङ्गुरहं शठः ।
कर्मणा पतितो नूनं मामुद्धर दयानिधे ॥७८
गोकर्ण उवाच देहेऽस्थिमांसरुधिरेऽभिमतिं त्यज त्वं जायासुतादिषु सदा ममतां विमुञ्च । पश्यानिशं जगदिदं क्षणभङ्गनिष्ठं वैराग्यरागरसिको भव भक्तिनिष्ठः ॥ ७ ९ ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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धर्मं भजस्व सततं त्यज लोकधर्मान् सेवस्व साधुपुरुषाञ्जहि कामतृष्णाम् । अन्यस्य दोषगुणचिन्तनमाशु मुक्त्वा सेवाकथारसमहो नितरां पिब त्वम् ॥८० गोकर्णके वचन सुनकर आत्मदेव वनमें जानेके लिये तैयार हो गया और उनसे कहने लगा, ‘ बेटा! वनमें रहकर मुझे क्या करना चाहिये, यह मुझसे विस्तारपूर्वक कहो ॥७७ ॥ मैं
बड़ा मूर्ख हूँ, अबतक कर्मवश स्नेहपाशमें बँधा हुआ अपंगकी भाँति इस घररूप अँधेरे कुएँमें ही पड़ा रहा हूँ । तुम बड़े दयालु हो, इससे मेरा उद्धार करो ' ॥७८ ॥
गोकर्णने कहा — पिताजी! यह शरीर हड्डी, मांस और रुधिरका पिण्ड है; इसे आप ‘ मैं ’ मानना छोड़ दें और स्त्री - पुत्रादिको ' अपना ' कभी न मानें । इस संसारको रात - दिन क्षणभंगुर देखें, इसकी किसी भी वस्तुको स्थायी समझकर उसमें राग न करें । बस, एकमात्र वैराग्यरसके रसिक होकर भगवान्की भक्तिमें लगे रहें ॥ ७ ९ ॥ भगवद्भजन ही सबसे बड़ा धर्म है, निरन्तर उसीका आश्रय लिये रहें । अन्य सब प्रकारके लौकिक धर्मोंसे मुख मोड़ लें । सदा साधुजनोंकी सेवा करें । भोगोंकी लालसाको पास न फटकने दें तथा जल्दी - से - जल्दी दूसरोंके गुण - दोषोंका विचार करना छोड़कर एकमात्र भगवत्सेवा और भगवान्की कथाओंके रसका ही पान करें || ८० || एवं सुतोक्तिवशतोऽपि गृहं विहाय यातो वनं स्थिरमतिर्गतषष्टिवर्षः । युक्तो हरेरनुदिनं परिचर्ययासौ श्रीकृष्णमाप नियतं दशमस्य पाठात् ॥८१ इस प्रकार पुत्रकी वाणी से प्रभावित होकर आत्मदेवने घर छोड़ दिया और वनकी यात्रा की । यद्यपि उसकी आयु उस समय साठ वर्षकी हो चुकी थी, फिर भी बुद्धिमें पूरी दृढ़ता थी । वहाँ रात - दिन भगवान्की सेवा - पूजा करनेसे और नियमपूर्वक भागवतके दशमस्कन्धका पाठ करनेसे उसने भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रको प्राप्त कर लिया ॥८१ ॥
इति श्रीपद्मपुराणे उत्तरखण्डे श्रीमद्भागवतमाहात्म्ये विप्रमोक्षो नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥४ ॥
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अथ पञ्चमोऽध्यायः धुन्धुकारीको प्रेतयोनिकी प्राप्ति और उससे उद्धार सूत उवाच
पितर्युपरते तेन जननी ताडिता भृशम् ।
क्व वित्तं तिष्ठति ब्रूहि हनिष्ये लत्तया न चेत् ॥१
इति तद्वाक्यसंत्रासाज्जनन्या पुत्रदुःखतः ।
कूपे पातः कृतो रात्रौ तेन सा निधनं गता ॥२
गोकर्णस्तीर्थयात्रार्थं निर्गतो योगसंस्थितः ।
न दुःखं न सुखं तस्य न वैरी नापि बान्धवः ॥३
धुन्धुकारी गृहेऽतिष्ठत्पञ्चपण्यवधूवृतः ।
अत्युग्रकर्मकर्ता च तत्पोषणविमूढधीः ॥४
एकदा कुलटास्तास्तु भूषणान्यभिलिप्सवः ।
तदर्थं निर्गतो गेहात्कामान्धो मृत्युमस्मरन् ॥५
यतस्ततश्च संहृत्य वित्तं वेश्म पुनर्गतः ।
ताभ्योऽयच्छत्सुवस्त्राणि भूषणानि कियन्ति च ॥६
बहुवित्तचयं दृष्ट्वा रात्रौ नार्यो व्यचारयन् ।
चौर्यं करोत्यसौ नित्यमतो राजा ग्रहीष्यति ॥७
सूतजी कहते हैं— शौनकजी! पिताके वन चले जानेपर एक दिन धुन्धुकारीने अपनी माताको बहुत पीटा और कहा – ' बता, धन कहाँ रखा है? नहीं तो अभी तेरी लुआठी ( जलती लकड़ी ) -से खबर लूँगा ॥१ ॥ उसकी इस धमकीसे डरकर और पुत्रके उपद्रवोंसे दुःखी होकर
वह रात्रिके समय कुएँमें जा गिरी और इसीसे उसकी मृत्यु हो गयी ॥२ ॥ योगनिष्ठ गोकर्णजी
तीर्थयात्राके लिये निकल गये । उन्हें इन घटनाओंसे कोई सुख या दुःख नहीं होता था; क्योंकि उनका न कोई मित्र था न शत्रु ॥३ ॥
धुन्धुकारी पाँच वेश्याओंके साथ घरमें रहने लगा । उनके लिये भोग - सामग्री जुटानेकी चिन्ताने उसकी बुद्धि नष्ट कर दी और वह नाना प्रकारके अत्यन्त क्रूर कर्म करने लगा ॥४ ॥
एक दिन उन कुलटाओंने उससे बहुत - से गहने माँगे । वह तो कामसे अंधा हो रहा था, मौतकी उसे कभी याद नहीं आती थी । बस, उन्हें जुटानेके लिये वह घरसे निकल पड़ा ॥५ ॥ वह
जहाँ - तहाँसे बहुत - सा धन चुराकर घर लौट आया तथा उन्हें कुछ सुन्दर वस्त्र और आभूषण लाकर दिये ॥६ ॥ चोरीका बहुत माल देखकर रात्रिके समय स्त्रियोंने विचार किया कि ‘ यह
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नित्य ही चोरी करता है, इसलिये इसे किसी दिन अवश्य राजा पकड़ लेगा || ७ || राजा यह सारा धन छीनकर इसे निश्चय ही प्राणदण्ड देगा । जब एक दिन इसे मरना ही है, तब हम ही धनकी रक्षाके लिये गुप्तरूपसे इसको क्यों न मार डालें || ८ || इसे मारकर हम इसका माल-मता लेकर जहाँ - कहीं चली जायँगी । ' ऐसा निश्चय कर उन्होंने सोये हुए धुन्धुकारीको रस्सियोंसे कस दिया और उसके गलेमें फाँसी लगाकर उसे मारनेका प्रयत्न किया । इससे जब वह जल्दी न मरा तो उन्हें बड़ी चिन्ता हुई ॥९ -१० ॥ तब उन्होंने उसके मुखपर बहुत - से दहकते अँगारे डाले; इससे वह अग्निकी लपटोंसे बहुत छटपटाकर मर गया ॥११ ॥ उन्होंने
उसके शरीरको एक गड्ढे में डालकर गाड़ दिया । सच है, स्त्रियाँ प्रायः बड़ी दुःसाहसी होती हैं । उनके इस कृत्यका किसीको भी पता न चला ॥१२ ॥ लोगोंके पूछनेपर कह देती थीं कि
‘ हमारे प्रियतम पैसेके लोभसे अबकी बार कहीं दूर चले गये हैं, इसी वर्षके अन्दर लौट आयेंगे ’ ॥१३ ॥ बुद्धिमान् पुरुषको दुष्टा स्त्रियोंका कभी विश्वास न करना चाहिये । जो मूर्ख
इनका विश्वास करता है, उसे दुःखी होना पड़ता है ॥ १४ ॥ इनकी वाणी तो अमृतके समान
कामियोंके हृदयमें रसका संचार करती है; किन्तु हृदय छूरेकी धारके समान तीक्ष्ण होता है । भला, इन स्त्रियोंका कौन प्यारा है? ॥१५ ॥
वित्तं हृत्वा पुनश्चैनं मारयिष्यति निश्चितम् ।
अतोऽर्थगुप्तये गूढमस्माभिः किं न हन्यते ॥ ८
निहत्यैनं गृहीत्वार्थं यास्यामो यत्र कुत्रचित् ।
इति ता निश्चयं कृत्वा सुप्तं सम्बद्ध्य रश्मिभिः ॥९
पाशं कण्ठे निधायास्य तन्मृत्युमुपचक्रमुः ।
त्वरितं न ममारासौ चिन्तायुक्तास्तदाभवन् ॥१०
तप्ताङ्गारसमूहांश्च तन्मुखे हि विचिक्षिपुः ।
अग्निज्वालातिदुःखेन व्याकुलो निधनं गतः ॥ ११
तं देहं मुमुचुर्गर्ते प्रायः साहसिकाः स्त्रियः ।
न ज्ञातं तद्रहस्यं तु केनापीदं तथैव च ॥१२
लोकैःपृष्टा वदन्ति स्म दूरं यातः प्रियो हि नः ।
आगमिष्यति वर्षेऽस्मिन् वित्तलोभविकर्षितः ॥ १३
स्त्रीणां नैव तु विश्वासं दुष्टानां कारयेद्बुधः ।
विश्वासे यः स्थितो मूढः स दुःखैः परिभूयते ॥१४
सुधामयं वचो यासां कामिनां रसवर्धनम् ।
हृदयं क्षुरधाराभं प्रियः को नाम योषिताम् ॥१५
संहृत्य वित्तं ता याताः कुलटा बहुभर्तृकाः ।
धुन्धुकारी बभूवाथ महान् प्रेतः कुकर्मतः ॥१६
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वात्यारूपधरो नित्यं धावन्दशदिशोऽन्तरम् ।
शीतातपपरिक्लिष्टो निराहारः पिपासितः ॥१७
न लेभे शरणं क्वापि हा दैवेति मुहुर्वदन् ।
कियत्कालेन गोकर्णो मृतं लोकादबुध्यत ॥१८
अनाथं तं विदित्वैव गयाश्राद्धमचीकरत् ।
यस्मिंस्तीर्थे तु संयाति तत्र श्राद्धमवर्तयत् ॥१९
वे कुलटाएँ धुन्धुकारीकी सारी सम्पत्ति समेटकर वहाँसे चंपत हो गयीं; उनके ऐसे न जाने कितने पति थे । और धुन्धुकारी अपने कुकर्मोंके कारण भयंकर प्रेत हुआ || १६ || वह बवंडरके रूपमें सर्वदा दसों दिशाओंमें भटकता रहता था तथा शीत - घामसे सन्तप्त और भूख - प्याससे व्याकुल होनेके कारण ' हा दैव! हा दैव! ' चिल्लाता रहता था । परन्तु उसे कहीं भी कोई आश्रय न मिला । कुछ काल बीतनेपर गोकर्णने भी लोगोंके मुखसे धुन्धुकारीकी मृत्युका समाचार सुना ॥१७-१८ ॥ तब उसे अनाथ समझकर उन्होंने उसका गयाजीमें श्राद्ध किया; और भी जहाँ - जहाँ वे जाते थे, उसका श्राद्ध अवश्य करते थे ॥१९ ॥
एवं भ्रमन् स गोकर्णः स्वपुरं समुपेयिवान् ।
रात्रौ गृहाङ्गणे स्वप्तुमागतोऽलक्षितः परैः ॥२०
तत्र सुप्तं स विज्ञाय धुन्धुकारी स्वबान्धवम् ।
निशीथे दर्शयामास महारौद्रतरं वपुः ॥२१
सकृन्मेषः सकृद्धस्ती सकृच्च महिषोऽभवत् ।
सकृदिन्द्रः सकृच्चाग्निः पुनश्च पुरुषोऽभवत् ॥२२
वैपरीत्यमिदं दृष्ट्वा गोकर्णो धैर्यसंयुतः ।
अयं दुर्गतिकः कोऽपि निश्चित्याथ तमब्रवीत् ॥२३
गोकर्ण उवाच
कस्त्वमुग्रतरो रात्रौ कुतो यातो दशामिमाम् ।
किं वा प्रेतः पिशाचो वा राक्षसोऽसीति शंस नः ॥२४
सूत उवाच एवं पृष्टस्तदा तेन रुरोदोच्चैः पुनः पुनः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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अशक्तो वचनोच्चारे संज्ञामात्रं चकार ह ॥२५
ततोऽञ्जलौ जलं कृत्वा गोकर्णस्तमुदैरयत् ।
तत्सेकहतपापोऽसौ प्रवक्तुमुपचक्रमे ॥२६
प्रेत उवाच
अहं भ्राता त्वदीयोऽस्मि धुन्धुकारीति नामतः ।
स्वकीयेनैव दोषेण ब्रह्मत्वं नाशितं मया ॥२७
कर्मणो नास्ति संख्या मे महाज्ञाने विवर्तिनः ।
लोकानां हिंसकः सोऽहं स्त्रीभिर्दुःखेन मारितः ॥२८
अतः प्रेतत्वमापन्नो दुर्दशां च वहाम्यहम् ।
वाताहारेण जीवामि दैवाधीनफलोदयात् ॥ २ ९
अहो बन्धो कृपासिन्धो भ्रातर्मामाशु मोचय ।
गोकर्णो वचनं श्रुत्वा तस्मै वाक्यमथाब्रवीत् ॥ ३०
इस प्रकार घूमते - घूमते गोकर्णजी अपने नगरमें आये और रात्रिके समय दूसरोंकी दृष्टिसे बचकर सीधे अपने घरके आँगनमें सोनेके लिये पहुँचे ॥२० ॥
वहाँ अपने भाईको सोया देख आधी रातके समय धुन्धुकारीने अपना बड़ा विकट रूप दिखाया ॥२१ ॥ वह कभी भेड़ा, कभी हाथी, कभी भैंसा, कभी इन्द्र और कभी अग्निका
रूप धारण करता । अन्तमें वह मनुष्यके आकारमें प्रकट हुआ ॥२२ ॥
ये विपरीत अवस्थाएँ देखकर गोकर्णने निश्चय किया कि यह कोई दुर्गतिको प्राप्त हुआ जीव है । तब उन्होंने उससे धैर्यपूर्वक पूछा ॥२३ ॥
गोकर्णने कहा — तू कौन है? रात्रिके समय ऐसे भयानक रूप क्यों दिखा रहा है? तेरी यह दशा कैसे हुई? हमें बता तो सही - तू प्रेत है, पिशाच है अथवा कोई राक्षस है? ॥२४ ॥
सूतजी कहते हैं - गोकर्णके इस प्रकार पूछनेपर वह बार - बार जोर - जोरसे रोने लगा ।
उसमें बोलनेकी शक्ति नहीं थी, इसलिये उसने केवल संकेतमात्र किया ॥२५ ॥
तब गोकर्णने अंजलिमें जल लेकर उसे अभिमन्त्रित करके उसपर छिड़का । इससे उसके पापोंका कुछ शमन हुआ और वह इस प्रकार कहने लगा ॥ २६ ॥
प्रेत बोला- ' मैं तुम्हारा भाई हूँ । मेरा नाम है धुन्धुकारी । मैंने अपने ही दोषसे अपना ब्राह्मणत्व नष्ट कर दिया || २७ || मेरे कुकर्मोंकी गिनती नहीं की जा सकती । मैं तो महान् ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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अज्ञानमें चक्कर काट रहा था । इसीसे मैंने लोगोंकी बड़ी हिंसा की । अन्तमें कुलटा स्त्रियोंने मुझे तड़पा - तड़पाकर मार डाला ॥२८ ॥ इसीसे अब प्रेतयोनिमें पड़कर यह दुर्दशा भोग रहा
हूँ । अब दैववश कर्मफलका उदय होनेसे मैं केवल वायुभक्षण करके जी रहा हूँ ॥२९ ॥
भाई! तुम दयाके समुद्र हो; अब किसी प्रकार जल्दी ही मुझे इस योनिसे छुड़ाओ । ’ गोकर्णने धुन्धुकारीकी सारी बातें सुनीं और तब उससे बोले ॥३० ॥
गोकर्ण उवाच
त्वदर्थं तु गयापिण्डो मया दत्तो विधानतः ।
तत्कथं नैव मुक्तोऽसि ममाश्चर्यमिदं महत् ॥३१
गयाश्राद्धान्न मुक्तिश्चेदुपायो नापरस्त्विह ।
किं विधेयं मया प्रेत तत्त्वं वद सविस्तरम् ॥३२
प्रेत उवाच
गयाश्राद्धशतेनापि मुक्तिर्मे न भविष्यति ।
उपायमपरं कञ्चित्त्वं विचारय साम्प्रतम् ॥३३
इति तद्वाक्यमाकर्ण्य गोकर्णो विस्मयं गतः ।
शतश्राद्धैर्न मुक्तिश्चेदसाध्यं मोचनं तव ॥३४
इदानीं तु निजं स्थानमातिष्ठ प्रेत निर्भयः ।
त्वन्मुक्तिसाधकं किञ्चिदाचरिष्ये विचार्य च ॥ ३५
धुन्धुकारी निजस्थानं तेनादिष्टस्ततो गतः ।
गोकर्णश्चिन्तयामास तां रात्रिं न तदध्यगात् ॥ ३६
प्रातस्तमागतं दृष्ट्वा लोकाः प्रीत्या समागताः ।
तत्सर्वं कथितं तेन यज्जातं च यथा निशि ॥३७
विद्वांसो योगनिष्ठाश्च ज्ञानिनो ब्रह्मवादिनः ।
तन्मुक्तिं नैव तेऽपश्यन् पश्यन्तः शास्त्रसंचयान् ॥३८
ततः सर्वैः सूर्यवाक्यं तन्मुक्तौ स्थापितं परम् ।
गोकर्णः स्तम्भनं चक्रे सूर्यवेगस्य वै तदा ॥३९
तुभ्यं नमो जगत्साक्षिन् ब्रूहि मे मुक्तिहेतुकम् ।
तच्छ्रुत्वा दूरतः सूर्यः स्फुटमित्यभ्यभाषत ॥४०
श्रीमद्भागवतान्मुक्तिः सप्ताहं वाचनं कुरु । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******