श्रीगणेशाय नमः।

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 131–140

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 131–140

पृष्ठ 131

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इति सूर्यवचः सर्वैर्धर्मरूपं तु विश्रुतम् ॥४१ गोकर्णने कहा — भाई! मुझे इस बातका बड़ा आश्चर्य है - मैंने तुम्हारे लिये विधिपूर्वक गयाजीमें पिण्डदान किया, फिर भी तुम प्रेतयोनिसे मुक्त कैसे नहीं हुए? ॥ ३१ ॥ यदि गया-श्राद्धसे भी तुम्हारी मुक्ति नहीं हुई, तब इसका और कोई उपाय ही नहीं है । अच्छा, तुम सब

बात खोलकर कहो – मुझे अब क्या करना चाहिये? ॥३२ ॥

प्रेतने कहा- मेरी मुक्ति सैकड़ों गया श्राद्ध करनेसे भी नहीं हो सकती । अब तो तुम इसका कोई और उपाय सोचो ॥ ३३ ॥

प्रेतकी यह बात सुनकर गोकर्णको बड़ा आश्चर्य हुआ । वे कहने लगे — ' यदि सैकड़ों गया - श्राद्धोंसे भी तुम्हारी मुक्ति नहीं हो सकती, तब तो तुम्हारी मुक्ति असम्भव ही है ॥३४ ॥

अच्छा, अभी तो तुम निर्भय होकर अपने स्थानपर रहो; मैं विचार करके तुम्हारी मुक्तिके लिये कोई दूसरा उपाय करूँगा ' ॥३५ ॥

गोकर्णकी आज्ञा पाकर धुन्धुकारी वहाँसे अपने स्थानपर चला आया । इधर गोकर्णने रातभर विचार किया, तब भी उन्हें कोई उपाय नहीं सूझा ॥३६ ॥ प्रातःकाल उनको आया

देख लोग प्रेमसे उनसे मिलने आये । तब गोकर्णने रातमें जो कुछ जिस प्रकार हुआ था, वह सब उन्हें सुना दिया ॥३७ ॥ उनमें जो लोग विद्वान, योगनिष्ठ, ज्ञानी और वेदज्ञ थे, उन्होंने भी

अनेकों शास्त्रोंको उलट - पलटकर देखा; तो भी उसकी मुक्तिका कोई उपाय न मिला ॥३८ ॥

तब सबने यही निश्चय किया कि इस विषयमें सूर्यनारायण जो आज्ञा करें, वही करना चाहिये । अतः गोकर्णने अपने तपोबलसे सूर्यकी गतिको रोक दिया ॥ ३ ९ ॥ उन्होंने स्तुति की —‘भगवन्! आप सारे संसारके साक्षी हैं, मैं आपको नमस्कार करता हूँ । आप मुझे कृपा करके धुन्धुकारीकी मुक्तिका साधन बताइये । ' गोकर्णकी यह प्रार्थना सुनकर सूर्यदेवने दूरसे ही स्पष्ट शब्दोंमें कहा— ' श्रीमद्भागवतसे मुक्ति हो सकती है, इसलिये तुम उसका सप्ताह पारायण करो । ' सूर्यका यह धर्ममय वचन वहाँ सभीने सुना ॥४०-४१ ॥ तब सबने यही कहा कि ' प्रयत्नपूर्वक यही करो, है भी यह साधन बहुत सरल । ' अतः गोकर्णजी भी तदनुसार निश्चय करके कथा सुनानेके लिये तैयार हो गये ॥४२ ॥

सर्वेऽब्रुवन् प्रयत्नेन कर्तव्यं सुकरं त्विदम् ।

गोकर्णो निश्चयं कृत्वा वाचनार्थं प्रवर्तितः ॥ ४२

तत्र संश्रवणार्थाय देशग्रामाज्जना ' ययुः ।

पङ्ग्वन्धवृद्धमन्दाश्च तेऽपि पापक्षयाय वै ॥४३

समाजस्तु महाञ्जातो देवविस्मयकारकः ।

यदैवासनमास्थाय गोकर्णोऽकथयत्कथाम् ॥४४

स प्रेतोऽपि तदाऽऽयातः स्थानं पश्यन्नितस्ततः ।

सप्तग्रन्थियुतं तत्रापश्यत्कीचकमुच्छ्रितम् ॥ ४५

तन्मूलच्छिद्रमाविश्य श्रवणार्थं स्थितो ह्यसौ ।

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वातरूपी स्थितिं कर्तुमशक्तो वंशमाविशत् ॥ ४६

वैष्णवं ब्राह्मणं मुख्यं श्रोतारं परिकल्प्य सः ।

प्रथमस्कन्धतः स्पष्टमाख्यानं धेनुजोऽकरोत् ॥४७

दिनान्ते रक्षिता गाथा तदा चित्रं बभूव ह ।

वंशैकग्रन्थिभेदोऽभूत्सशब्दं पश्यतां सताम् ॥४८

द्वितीयेऽह्नि तथा सायं द्वितीयग्रन्थिभेदनम् ।

तृतीयेऽह्नि तथा सायं तृतीयग्रन्थिभेदनम् ॥४९

एवं सप्तदिनैश्चैव सप्तग्रन्थिविभेदनम् ।

कृत्वा स द्वादशस्कन्धश्रवणात्प्रेततां जहौ ॥५०

दिव्यरूपधरो जातस्तुलसीदाममण्डितः ।

पीतवासा घनश्यामो मुकुटी कुण्डलान्वितः ॥ ५१

ननाम भ्रातरं सद्यो गोकर्णमिति चाब्रवीत् ।

त्वयाहं मोचितो बन्धो कृपया प्रेतकश्मलात् ॥५२

देश और गाँवोंसे अनेकों लोग कथा सुननेके लिये आये । बहुत - से लँगड़े - लूले, अंधे, बूढ़े और मन्दबुद्धि पुरुष भी अपने पापोंकी निवृत्तिके उद्देश्यसे वहाँ आ पहुँचे || ४३ || इस प्रकार वहाँ इतनी भीड़ हो गयी कि उसे देखकर देवताओंको भी आश्चर्य होता था । जब गोकर्णजी व्यासगद्दीपर बैठकर कथा कहने लगे, तब वह प्रेत भी वहाँ आ पहुँचा और इधर - उधर बैठनेके लिये स्थान ढूँढ़ने लगा । इतनेमें ही उसकी दृष्टि एक सीधे रखे हुए सात गाँठके बाँसपर पड़ी ॥४४-४५ ॥ उसीके नीचेके छिद्रमें घुसकर वह कथा सुननेके लिये बैठ गया । वायुरूप होनेके कारण वह बाहर कहीं बैठ नहीं सकता था, इसलिये बाँसमें घुस गया ॥ ४६ ॥

गोकर्णजीने एक वैष्णव ब्राह्मणको मुख्य श्रोता बनाया और प्रथमस्कन्धसे ही स्पष्ट स्वरमें कथा सुनानी आरम्भ कर दी ॥४७ ॥

सायंकालमें जब कथाको विश्राम दिया गया, तब एक बड़ी विचित्र बात हुई । वहाँ सभासदोंके देखते - देखते उस बाँसकी एक गाँठ तड़ - तड़ शब्द करती फट गयी ॥४८ ॥ इसी

प्रकार दूसरे दिन सायंकालमें दूसरी गाँठ फटी और तीसरे दिन उसी समय तीसरी ॥४९ ॥ इस

प्रकार सात दिनोंमें सातों गाँठोंको फोड़कर धुन्धुकारी बारहों स्कन्धोंके सुननेसे पवित्र होकर प्रेतयोनिसे मुक्त हो गया और दिव्यरूप धारण करके सबके सामने प्रकट हुआ । उसका मेघके समान श्याम शरीर पीताम्बर और तुलसीकी मालाओंसे सुशोभित था तथा सिरपर मनोहर मुकुट और कानोंमें कमनीय कुण्डल झिलमिला रहे थे ॥५०-५१ ॥ उसने तुरन्त अपने भाई गोकर्णको प्रणाम करके कहा- ' भाई! तुमने कृपा करके मुझे प्रेतयोनिकी यातनाओंसे मुक्त कर दिया ॥५२ ॥

धन्या भागवती वार्ता प्रेतपीडाविनाशिनी ।

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सप्ताहोऽपि तथा धन्यः कृष्णलोकफलप्रदः ॥ ॥५३ ५३

कम्पन्ते सर्वपापानि सप्ताहश्रवणे स्थिते ।

अस्माकं प्रलयं सद्यः कथा चेयं करिष्यति ॥५४

आर्द्रं शुष्कं लघु स्थूलं वाङ्मनः कर्मभिः कृतम् ।

श्रवणं विदहेत्पापं पावकः समिधो यथा ॥५५

अस्मिन् वै भारते वर्षे सूरिभिर्देवसंसदि ।

अकथाश्राविणां पुंसां निष्फलं जन्म कीर्तितम् ॥५६

किं मोहतो रक्षितेन सुपुष्टेन बलीयसा ।

अध्रुवेण शरीरेण शुकशास्त्रकथां विना ॥५७

अस्थिस्तम्भं स्नायुबद्धं मांसशोणितलेपितम् चर्मावनद्धं दुर्गन्धं पात्रं मूत्रपुरीषयोः ॥ ५८

जराशोकविपाकार्तं रोगमन्दिरमातुरम् ।

दुष्पूरं दुर्धरं दुष्टं सदोषं क्षणभङ्गुरम् ॥५९

कृमिविड्भस्मसंज्ञान्तं शरीरमिति वर्णितम् ।

अस्थिरेण स्थिरं कर्म कुतोऽयं साधयेन्न हि ॥६०

यत्प्रातः संस्कृतं चान्नं सायं तच्च विनश्यति ।

तदीयरससम्पुष्टे काये का नाम नित्यता ॥ ६१

यह प्रेतपीड़ाका नाश करनेवाली श्रीमद्भागवतकी कथा धन्य है तथा श्रीकृष्णचन्द्रके धामकी प्राप्ति करानेवाला इसका सप्ताह - पारायण भी धन्य है! ॥५३ ॥ जब सप्ताहश्रवणका

योग लगता है, तब सब पाप थर्रा उठते हैं कि अब यह भागवतकी कथा जल्दी ही हमारा अन्त कर देगी ॥५४ ॥ जिस प्रकार आग गीली - सूखी, छोटी - बड़ी- - सब तरहकी लकड़ियोंको

जला डालती है, उसी प्रकार यह सप्ताहश्रवण मन, वचन और कर्मद्वारा किये हुए नये - पुराने, छोटे - बड़े — सभी प्रकारके पापोंको भस्म कर देता है ॥५५ ॥

विद्वानोंने देवताओंकी सभामें कहा है कि जो लोग इस भारतवर्षमें श्रीमद्भागवतकी कथा नहीं सुनते, उनका जन्म वृथा ही है ॥ ५६ ॥ भला, मोहपूर्वक लालन - पालन करके यदि

इस अनित्य शरीरको हृष्ट - पुष्ट और बलवान् भी बना लिया तो भी श्रीमद्भागवतकी कथा सुने

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बिना इससे क्या लाभ हुआ? ॥५७ ॥ अस्थियाँ ही इस शरीरके आधारस्तम्भ हैं, नस-नाडीरूप रस्सियोंसे यह बँधा हुआ है, ऊपरसे इसपर मांस और रक्त थोपकर इसे चर्मसे मँढ़

दिया गया है । इसके प्रत्येक अंगमें दुर्गन्ध आती है; क्योंकि है तो यह मल - मूत्रका भाण्ड ही ॥५८ ॥ वृद्धावस्था और शोकके कारण यह परिणाममें दुःखमय ही है, रोगोंका तो घर ही

ठहरा । यह निरन्तर किसी - न - किसी कामनासे पीड़ित रहता है, कभी इसकी तृप्ति नहीं होती । इसे धारण किये रहना भी एक भार ही है; इसके रोम - रोममें दोष भरे हुए हैं और नष्ट होनेमें इसे एक क्षण भी नहीं लगता ॥ ५ ९ ॥ अन्तमें यदि इसे गाड़ दिया जाता है तो इसके कीड़े बन जाते हैं; कोई पशु खा जाता है तो यह विष्ठा हो जाता है और अग्निमें जला दिया जाता है तो भस्मकी ढेरी हो जाता है । ये तीन ही इसकी गतियाँ बतायी गयी हैं । ऐसे अस्थिर शरीरसे मनुष्य अविनाशी फल देनेवाला काम क्यों नहीं बना लेता? ॥ ६० ॥ जो अन्न प्रातःकाल

पकाया जाता है, वह सायंकालतक बिगड़ जाता है; फिर उसीके रससे पुष्ट हुए शरीरकी नित्यता कैसी ॥६१ ॥

सप्ताहश्रवणाल्लोके प्राप्यते निकटे हरिः ।

अतो दोषनिवृत्त्यर्थमेतदेव हि साधनम् ॥६२

बुदबुदा इव तोयेषु मशका इव जन्तुषु ।

जायन्ते मरणायैव कथाश्रवणवर्जिताः ॥ ६३

जडस्य शुष्कवंशस्य यत्र ग्रन्थिविभेदनम् ।

चित्रं किमु तदा चित्तग्रन्थिभेदः कथाश्रवात् ॥६४

भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः ।

क्षीयन्ते चास्य कर्माणि सप्ताहश्रवणे कृते ॥६५

संसारकर्दमालेपप्रक्षालनपटीयसि ।

कथातीर्थे स्थिते चित्ते मुक्तिरेव बुधैः स्मृता ॥६६

एवं ब्रुवति वै तस्मिन् विमानमागमत्तदा ।

वैकुण्ठवासिभिर्युक्तं प्रस्फुरद्दीप्तिमण्डलम् ॥ ६७

सर्वेषां पश्यतां भेजे विमानं धुन्धुलीसुतः ।

विमाने वैष्णवान् वीक्ष्य गोकर्णो वाक्यमब्रवीत् ॥६८

गोकर्ण उवाच

अत्रैव बहवः सन्ति श्रोतारो मम निर्मलाः ।

आनीतानि विमानानि न तेषां युगपत्कुतः ॥६९

श्रवणं समभागेन सर्वेषामिह दृश्यते ।

फलभेदः कुतो जातः प्रब्रुवन्तु हरिप्रियाः ॥७०

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हरिदासा ऊचुः श्रवणस्य विभेदेन फलभेदोऽत्र संस्थितः ।

श्रवणं तु कृतं सर्वैर्न तथा मननं कृतम् ।

फलभेदस्ततो जातो भजनादपि मानद ॥७१

इस लोकमें सप्ताहश्रवण करनेसे भगवान्‌की शीघ्र ही प्राप्ति हो सकती है । अतः सब प्रकारके दोषोंकी निवृत्तिके लिये एकमात्र यही साधन है ॥ ६२ ॥ जो लोग भागवतकी कथासे

वंचित हैं, वे तो जलमें बुदबुदे और जीवोंमें मच्छरोंके समान केवल मरनेके लिये ही पैदा होते हैं ॥६३ ॥ भला, जिसके प्रभावसे जड़ और सूखे हुए बाँसकी गाँठें फट सकती हैं, उस

भागवतकथाका श्रवण करनेसे चित्तकी गाँठोंका खुल जाना कौन बड़ी बात है ॥६४ ॥

सप्ताहश्रवण करनेसे मनुष्यके हृदयकी गाँठ खुल जाती है, उसके समस्त संशय छिन्न-भिन्न हो जाते हैं और सारे कर्म क्षीण हो जाते हैं ॥६५ ॥

यह भागवतकथारूप तीर्थ संसारके कीचड़को धोनेमें बड़ा ही पटु है । विद्वानोंका कथन है कि जब यह हृदयमें स्थित हो जाता है, तब मनुष्यकी मुक्ति निश्चित ही समझनी चाहिये ॥६६ ॥

जिस समय धुन्धुकारी ये सब बातें कह रहा था, जिसके लिये वैकुण्ठवासी पार्षदोंके सहित एक विमान उतरा; उससे सब ओर मण्डलाकार प्रकाश फैल रहा था ॥६७ ॥

सब लोगोंके सामने ही धुन्धुकारी उस विमानपर चढ़ गया । तब उस विमानपर आये हुए पार्षदोंको देखकर उनसे गोकर्णने यह बात कही ॥ ६८ ॥

गोकर्णने पूछा — भगवान्‌के प्रिय पार्षदो! यहाँ हमारे अनेकों शुद्धहृदय श्रोतागण हैं, उन सबके लिये आपलोग एक साथ बहुत - से विमान क्यों नहीं लाये? हम देखते हैं कि यहाँ सभीने समानरूपसे कथा सुनी है, फिर फलमें इस प्रकारका भेद क्यों हुआ, यह बताइये ॥६९ -७० ॥ भगवान्के सेवकोंने कहा- हे मानद! इस फलभेदका कारण इनके श्रवणका भेद ही है । यह ठीक है कि श्रवण तो सबने समानरूपसे ही किया है, किन्तु इसके - जैसा मनन नहीं किया । इसीसे एक साथ भजन करनेपर भी उसके फलमें भेद रहा ॥७१ ॥ इस प्रेतने सात

दिनोंतक निराहार रहकर श्रवण किया था, तथा सुने हुए विषयका स्थिरचित्तसे यह खूब मनन - निदिध्यासन भी करता रहता था ॥ ७२ ॥ जो ज्ञान दृढ़ नहीं होता, वह व्यर्थ हो जाता है ।

इसी प्रकार ध्यान न देनेसे श्रवणका, संदेहसे मन्त्रका और चित्तके इधर - उधर भटकते रहनेसे जपका भी कोई फल नहीं होता ॥ ७३ ॥ वैष्णवहीन देश, अपात्रको कराया हुआ श्राद्धका

भोजन, अश्रोत्रियको दिया हुआ दान एवं आचारहीन कुल – इन सबका नाश हो जाता है ॥७४ ॥ गुरुवचनोंमें विश्वास, दीनताका भाव, मनके दोषोंपर विजय और कथामें चित्तकी

एकाग्रता इत्यादि नियमोंका यदि पालन किया जाय तो श्रवणका यथार्थ फल मिलता है । यदि ये श्रोता फिरसे श्रीमद्भागवतकी कथा सुनें तो निश्चय ही सबको वैकुण्ठकी प्राप्ति

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होगी ॥७५-७६ ॥ और गोकर्णजी! आपको तो भगवान् स्वयं आकर गोलोकधाममें ले जायँगे । यों कहकर वे सब पार्षद हरिकीर्तन करते वैकुण्ठलोकको चले गये ॥७७ ॥

सप्तरात्रमुपोष्यैव प्रेतेन श्रवणं कृतम् ।

मननादि तथा तेन स्थिरचित्ते कृतं भृशम् ॥७२

अदृढं च हतं ज्ञानं प्रमादेन हतं श्रुतम् ।

संदिग्धो हि हतो मन्त्रो व्यग्रचित्तो हतो जपः ॥७३

अवैष्णवो हतो देशो हतं श्राद्धमपात्रकम् ।

हतमश्रोत्रिये दानमनाचारं हतं कुलम् ॥७४

विश्वासो गुरुवाक्येषु स्वस्मिन्दीनत्वभावना ।

मनोदोषजयश्चैव कथायां निश्चला मतिः ॥ ७५

एवमादि कृतं चेत्स्यात्तदा वै श्रवणे फलम् ।

पुनः श्रवान्ते सर्वेषां वैकुण्ठे वसतिर्ध्रुवम् ॥७६

गोकर्ण तव गोविन्दो गोलोकं दास्यति स्वयम् ।

एवमुक्त्वा ययुः सर्वे वैकुण्ठं हरिकीर्तनाः ॥७७

श्रावणे मासि गोकर्णः कथामूचे तथा पुनः ।

सप्तरात्रवतीं भूयः श्रवणं तैः कृतं पुनः ॥७८

कथासमाप्तौ यज्जातं श्रूयतां तच्च नारद ॥ ७ ९

विमानैः सह भक्तैश्च हरिराविर्बभूव ह ।

जयशब्दा नमःशब्दास्तत्रासन् बहवस्तदा ॥८०

पाञ्चजन्यध्वनिं चक्रे हर्षात्तत्र स्वयं हरिः ।

गोकर्णं तु समालिङ्गयाकरोत्स्वसदृशं हरिः ॥८१

श्रोतॄनन्यान् घनश्यामान् पीतकौशेयवाससः ।

किरीटिनः कुण्डलिनस्तथा चक्रे हरिः क्षणात् ॥८२

तद्ग्रामे ये स्थिता जीवा आश्वचाण्डालजातयः ।

विमाने स्थापितास्तेऽपि गोकर्णकृपया तदा ॥ ८३

प्रेषिता हरिलोके ते यत्र गच्छन्ति योगिनः ।

गोकर्णेन स गोपालो गोलोकं गोपवल्लभम् ।

कथाश्रवणतः प्रीतो निर्ययौ भक्तवत्सलः ॥८४

श्रावण मासमें गोकर्णजीने फिर उसी प्रकार सप्ताहक्रमसे कथा कही और उन श्रोताओंने उसे फिर सुना ॥ ७८ ॥ नारदजी! इस कथाकी समाप्तिपर जो कुछ हुआ, वह

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सुनिये ॥७९ ॥ वहाँ भक्तोंसे भरे हुए विमानोंके साथ भगवान् प्रकट हुए । सब ओरसे खूब

जय - जयकार और नमस्कारकी ध्वनियाँ होने लगीं ॥ ८० ॥ भगवान् स्वयं हर्षित होकर अपने

पांचजन्य शंखकी ध्वनि करने लगे और उन्होंने गोकर्णको हृदयसे लगाकर अपने ही समान बना लिया ॥८१ ॥ उन्होंने क्षणभरमें ही अन्य सब श्रोताओंको भी मेघके समान श्यामवर्ण,

रेशमी पीताम्बरधारी तथा किरीट और कुण्डलादिसे विभूषित कर दिया ॥८२ ॥ उस गाँवमें

कुत्ते और चाण्डालपर्यन्त जितने भी जीव थे, वे सभी गोकर्णजीकी कृपासे विमानोंपर चढ़ा लिये गये ॥८३ ॥ तथा जहाँ योगिजन जाते हैं, उस भगवद्धाममें वे भेज दिये गये । इस प्रकार

भक्तवत्सल भगवान् श्रीकृष्ण कथाश्रवणसे प्रसन्न होकर गोकर्णजीको साथ ले अपने ग्वालबालोंके प्रिय गोलोकधाममें चले गये || ८४ ॥ पूर्वकालमें जैसे अयोध्यावासी भगवान् श्रीरामके साथ साकेतधाम सिधारे थे, उसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण उन सबको योगिदुर्लभ गोलोकधामको ले गये ॥ ८५ ॥ जिस लोकमें सूर्य, चन्द्रमा और सिद्धोंकी भी कभी गति नहीं

हो सकती, उसमें वे श्रीमद्भागवत श्रवण करनेसे चले गये ॥८६ ॥

अयोध्यावासिनः पूर्वं यथा रामेण संगताः ।

तथा कृष्णेन ते नीता गोलोकं योगिदुर्लभम् ॥८५

यत्र सूर्यस्य सोमस्य सिद्धानां न गतिः कदा ।

तं लोकं हि गतास्ते तु श्रीमद्भागवतश्रवात् ॥८६

ब्रूमोऽत्र ते किं फलवृन्दमुज्ज्वलं सप्ताहयज्ञेन कथासु सञ्चितम् । कर्णेन गोकर्णकथाक्षरो यैः पीतश्च ते गर्भगता न भूयः ॥८७ वाताम्बुपर्णाशनदेहशोषण-स्तपोभिरुग्रैश्चिरकालसञ्चितैः । योगैश्च संयान्ति न तां गतिं वै सप्ताहगाथाश्रवणेन यान्ति याम् ॥८८

इतिहासमिमं पुण्यं शाण्डिल्योऽपि मुनीश्वरः ।

पठते चित्रकूटस्थो ब्रह्मानन्दपरिप्लुतः ॥ ८ ९

आख्यानमेतत्परमं पवित्रं

श्रुतं सकृद्वै विददघौघम् ।

श्राद्धे प्रयुक्तं पितृतृप्तिमावहे-न्नित्यं सुपाठादपुनर्भवं च ॥९ ०

नारदजी! सप्ताहयज्ञके द्वारा कथाश्रवण करनेसे जैसा उज्ज्वल फल संचित होता है, उसके विषयमें हम आपसे क्या कहें? अजी! जिन्होंने अपने कर्णपुटसे गोकर्णजीकी कथाके एक अक्षरका भी पान किया था, वे फिर माताके गर्भमें नहीं आये ॥ ८७ ॥ जिस गतिको लोग

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वायु, जल या पत्ते खाकर शरीर सुखानेसे, बहुत कालतक घोर तपस्या करनेसे और योगाभ्याससे भी नहीं पा सकते, उसे वे सप्ताहश्रवणसे सहजमें ही प्राप्त कर लेते हैं || ८ || इस परम पवित्र इतिहासका पाठ चित्रकूटपर विराजमान मुनीश्वर शाण्डिल्य भी ब्रह्मानन्दमें मग्न होकर करते रहते हैं ॥८९ ॥ यह कथा बड़ी ही पवित्र है । एक बारके श्रवणसे ही समस्त

पापराशिको भस्म कर देती है । यदि इसका श्राद्धके समय पाठ किया जाय, तो इससे पितृगणको बड़ी तृप्ति होती है और नित्य पाठ करनेसे मोक्षकी प्राप्ति होती है ॥९ ० ॥ इति श्रीपद्मपुराणे उत्तरखण्डे श्रीमद्भागवतमाहात्म्ये गोकर्णमोक्षवर्णनं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥५ ॥

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अथ षष्ठोऽध्यायः सप्ताहयज्ञकी विधि कुमारा ऊचुः

अथ ते सम्प्रवक्ष्यामः सप्ताहश्रवणे विधिम् ।

सहायैर्वसुभिश्चैव प्रायः साध्यो विधिः स्मृतः ॥१

दैवज्ञं तु समाहूय मुहूर्तं पृच्छ्य यत्नतः ।

विवाहे यादृशं वित्तं तादृशं परिकल्पयेत् ॥२

श्रीसनकादि कहते हैं - नारदजी! अब हम आपको सप्ताह श्रवणकी विधि बताते हैं । यह विधि प्रायः लोगोंकी सहायता और धनसे साध्य कही गयी है ॥१ ॥

पहले तो यत्नपूर्वक ज्योतिषीको बुलाकर मुहूर्त पूछना चाहिये तथा विवाहके लिये जिस प्रकार धनका प्रबन्ध किया जाता है उस प्रकार ही धनकी व्यवस्था इसके लिये करनी चाहिये ॥२ ॥

नभस्य आश्विनोर्णौ च मार्गशीर्षः शुचिर्नभाः ।

एते मासाः कथारम्भे श्रोतॄणां मोक्षसूचकाः ॥ ३

मासानां विप्र हेयानि तानि त्याज्यानि सर्वथा ।

सहायाश्चेतरे तत्र कर्तव्याः सोद्यमाश्च ये ॥४

देशे देशे तथा सेयं वार्ता प्रेष्या प्रयत्नतः ।

भविष्यति कथा चात्र आगन्तव्यं कुटुम्बिभिः ॥५

दूरे हरिकथाः केचिद्दूरे चाच्युतकीर्तनाः ।

स्त्रियः शूद्रादयो ये च तेषां बोधो यतो भवेत् ॥६

देशे देशे विरक्ता ये वैष्णवाः कीर्तनोत्सुकाः ।

तेष्वेव पत्रं प्रेष्यं च तल्लेखनमितीरितम् ॥७

सतां समाजो भविता सप्तरात्रं सुदुर्लभः ।

अपूर्वरसरूपैव कथा चात्र भविष्यति ॥८

श्रीभागवतपीयूषपानाय रसलम्पटाः ।

भवन्तश्च तथा शीघ्रमायात प्रेमतत्पराः ॥ ९

नावकाशः कदाचिच्चेद् दिनमात्रं तथापि तु ।

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सर्वथाऽऽगमनं कार्यं क्षणोऽत्रैव सुदुर्लभः ॥१०

एवमाकारणं तेषां कर्तव्यं विनयेन च ।

आगन्तुकानां सर्वेषां वासस्थानानि कल्पयेत् ॥११

तीर्थे वापि वने वापि गृहे वा श्रवणं मतम् ।

विशाला वसुधा यत्र कर्तव्यं तत्कथास्थलम् ॥१२

शोधनं मार्जनं भूमेर्लेपनं धातुमण्डनम् ।

गृहोपस्करमुद्धृत्य गृहकोणे निवेशयेत् ॥ १३

अर्वाक्पञ्चाहतो यत्नादास्तीर्णानि प्रमेलयेत् ।

कर्तव्यो मण्डपः प्रोच्चैः कदलीखण्डमण्डितः ॥१४

फलपुष्पदलैर्विष्वग्वितानेन विराजितः ।

चतुर्दिक्षु ध्वजारोपो बहुसम्पद्विराजितः ॥ १५

कथा आरम्भ करनेमें भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, आषाढ़ और श्रावण – ये छः महीने श्रोताओंके लिये मोक्षकी प्राप्तिके कारण हैं ॥३ ॥ देवर्षे! इन महीनोंमें भी भद्रा-व्यतीपात आदि कुयोगोंको सर्वथा त्याग देना चाहिये तथा दूसरे लोग जो उत्साही हों, उन्हें

अपना सहायक बना लेना चाहिये || ४ || फिर प्रयत्न करके देश - देशान्तरोंमें यह संवाद भेजना चाहिये कि यहाँ कथा होगी, सब लोगोंको सपरिवार पधारना चाहिये || ५ || जो स्त्री और शूद्रादि भगवत्कथा एवं संकीर्तनसे दूर पड़ गये हैं । उनको भी सूचना हो जाय, ऐसा प्रबन्ध करना चाहिये ॥६ ॥ देश - देशमें जो विरक्त वैष्णव और हरिकीर्तनके प्रेमी हों, उनके

पास निमन्त्रणपत्र अवश्य भेजे । उसे लिखनेकी विधि इस प्रकार बतायी गयी है ॥७ ॥

‘ महानुभावो! यहाँ सात दिनतक सत्पुरुषोंका बड़ा दुर्लभ समागम रहेगा और अपूर्व रसमयी श्रीमद्भागवतकी कथा होगी || ८ || आपलोग भगवद्रसके रसिक हैं, अतः श्रीभागवतामृतका पान करनेके लिये प्रेमपूर्वक शीघ्र ही पधारनेकी कृपा करें ॥९ ॥ यदि आपको विशेष

अवकाश न हो, तो भी एक दिनके लिये तो अवश्य ही कृपा करनी चाहिये; क्योंकि यहाँका तो एक क्षण भी अत्यन्त दुर्लभ है ' ॥१० ॥ इस प्रकार विनयपूर्वक उन्हें निमन्त्रित करे और जो

लोग आयें, उनके लिये यथोचित निवास - स्थानका प्रबन्ध करे ॥११ ॥

कथाका श्रवण किसी तीर्थमें, वनमें अथवा अपने घरपर भी अच्छा माना गया है । जहाँ लम्बा - चौड़ा मैदान हो, वहीं कथास्थल रखना चाहिये ॥ १२ ॥ भूमिका शोधन, मार्जन और

लेपन करके रंग - बिरंगी धातुओंसे चौक पूरे । घरकी सारी सामग्री उठाकर एक कोनेमें रख दे ॥१३ ॥ पाँच दिन पहलेसे ही यत्नपूर्वक बहुत - से बिछानेके वस्त्र एकत्र कर ले तथा केलेके

खंभोंसे सुशोभित एक ऊँचा मण्डप तैयार कराये ॥१४ ॥ उसे सब ओर फल, पुष्प, पत्र और

चँदोवेसे अलंकृत करे तथा चारों ओर झंडियाँ लगाकर तरह- तरहके सामानोंसे सजा दे ॥१५ ॥ उस मण्डपमें कुछ ऊँचाईपर सात विशाल लोकोंकी कल्पना करे और उनमें विरक्त

ब्राह्मणोंको बुला - बुलाकर बैठाये || १६ || आगेकी ओर उनके लिये वहाँ यथोचित आसन