श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 1211–1220
श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1211–1220
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तयेन्द्रः स्मासहत् तापं निर्वृतिर्नामुमाविशत् ।
ह्रीमन्तं वाच्यतां प्राप्तं सुखयन्त्यपि नो गुणाः ॥११
तां ददर्शानुधावन्तीं चाण्डालीमिव रूपिणीम् ।
जराया वेपमानाङ्गीं यक्ष्मग्रस्तामसृक्पटाम् ॥१२
विकीर्य पलितान् केशांस्तिष्ठ तिष्ठेति भाषिणीम् ।
मीनगन्ध्यसुगन्धेन कुर्वतीं मार्गदूषणम् ॥१३
नभो गतो दिशः सर्वाः सहस्राक्षो विशाम्पते ।
प्रागुदीचीं दिशं तूर्णं प्रविष्टो नृप मानसम् ॥१४
स आवसत्पुष्करनालतन्तू-नलब्धभोगो यदिहाग्निदूतः । वर्षाणि साहस्रमलक्षितोऽन्तः स चिन्तयन् ब्रह्मवधाद् विमोक्षम् ॥१५ तावत्त्रिणाकं नहुषः शशास विद्यातपोयोगबलानुभावः । हमलोग ‘ अश्वमेध ' नामक महायज्ञका अनुष्ठान करेंगे । उसके द्वारा श्रद्धापूर्वक भगवान्की आराधना करके तुम ब्रह्मापर्यन्त समस्त चराचर जगत्की हत्याके भी पापसे लिप्त नहीं होगे । फिर इस दुष्टको दण्ड देनेके पापसे छूटनेकी तो बात ही क्या है ॥९ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं— परीक्षित्! इस प्रकार ब्राह्मणोंसे प्रेरणा प्राप्त करके देवराज इन्द्रने वृत्रासुरका वध किया था । अब उसके मारे जानेपर ब्रह्महत्या इन्द्रके पास आयी ॥१० ॥ उसके कारण इन्द्रको बड़ा क्लेश, बड़ी जलन सहनी पड़ी । उन्हें एक क्षणके
लिये भी चैन नहीं पड़ता था । सच है, जब किसी संकोची सज्जनपर कलंक लग जाता है, तब उसके धैर्य आदि गुण भी उसे सुखी नहीं कर पाते || ११ || देवराज इन्द्रने देखा कि ब्रह्महत्या साक्षात् चाण्डालीके समान उनके पीछे - पीछे दौड़ी आ रही है । बुढ़ापेके कारण उसके सारे अंग काँप रहे हैं और क्षयरोग उसे सता रहा है । उसके सारे वस्त्र खूनसे लथपथ हो रहे हैं ॥१२ ॥ वह अपने सफेद - सफेद बालोंको बिखेरे ' ठहर जा! ठहर जा!! ' इस प्रकार
चिल्लाती आ रही है । उसके श्वासके साथ मछलीकी - सी दुर्गन्ध आ रही है, जिसके कारण मार्ग भी दूषित होता जा रहा है ॥१३ ॥ राजन्! देवराज इन्द्र उसके भयसे दिशाओं और
आकाशमें भागते फिरे । अन्तमें कहीं भी शरण न मिलनेके कारण उन्होंने पूर्व और उत्तरके कोनेमें स्थित मानसरोवरमें शीघ्रतासे प्रवेश किया ॥१४ ॥ देवराज इन्द्र मानसरोवरके
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कमलनालके तन्तुओंमें एक हजार वर्षोंतक छिपकर निवास करते रहे और सोचते रहे कि ब्रह्महत्यासे मेरा छुटकारा कैसे होगा । इतने दिनोंतक उन्हें भोजनके लिये किसी प्रकारकी सामग्री न मिल सकी । क्योंकि वे अग्निदेवताके मुखसे भोजन करते हैं और अग्निदेवता जलके भीतर कमलतन्तुओंमें जा नहीं सकते थे ॥१५ ॥
जबतक देवराज इन्द्र कमलतन्तुओंमें रहे, तबतक अपनी विद्या, तपस्या और योगबलके प्रभावसे राजा नहुष स्वर्गका शासन करते रहे । परन्तु जब उन्होंने सम्पत्ति और ऐश्वर्यके मदसे अंधे होकर इन्द्रपत्नी शचीके साथ अनाचार करना चाहा, तब शचीने उनसे ऋषियोंका अपराध करवाकर उन्हें शाप दिला दिया - जिससे वे साँप हो गये ॥१६ ॥ तदनन्तर जब
सत्यके परम पोषक भगवान्का ध्यान करनेसे इन्द्रके पाप नष्टप्राय हो गये, तब ब्राह्मणोंके बुलवानेपर वे पुनः स्वर्गलोकमें गये । कमलवनविहारिणी विष्णुपत्नी लक्ष्मीजी इन्द्रकी रक्षा कर रही थीं और पूर्वोत्तर दिशाके अधिपति रुद्रने पापको पहले ही निस्तेज कर दिया था, जिससे वह इन्द्रपर आक्रमण नहीं कर सका ॥१७ ॥
स सम्पदैश्वर्यमदान्धबुद्धि-र्नीतस्तिरश्चां गतिमिन्द्रपत्न्या ॥१६ ततो गतो ब्रह्मगिरोपहूत
ऋतम्भरध्याननिवारिताघः ।
पापस्तु दिग्देवतया हतौजा-स्तं नाभ्यभूदवितं विष्णुपत्न्या ॥१७
तं च ब्रह्मर्षयोऽभ्येत्य हयमेधेन भारत ।
यथावद्दीक्षयाञ्चक्रुः पुरुषाराधनेन ह॥१८
अथेज्यमाने पुरुषे सर्वदेवमयात्मनि ।
अश्वमेधे महेन्द्रेण वितते ब्रह्मवादिभिः ॥१९
स वै त्वाष्ट्रवधो भूयानपि पापचयो नृप नीतस्तेनैव शून्याय नीहार इव भानुना ॥२० स वाजिमेधेन यथोदितेन
वितायमानेन मरीचिमिश्रैः ।
इष्ट्वाधियज्ञं पुरुषं पुराण-मिन्द्रो महानास विधूतपापः ॥२१
इदं महाख्यानमशेषपाप्मनां प्रक्षालनं तीर्थपदानुकीर्तनम् । भक्त्युच्छ्रयं भक्तजनानुवर्णनं महेन्द्रमोक्षं विजयं मरुत्वतः ॥२२ पठेयुराख्यानमिदं सदा बुधाः ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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शृण्वन्त्यथो पर्वणि पर्वणीन्द्रियम् । धन्यं यशस्यं निखिलाघमोचनं रिपुञ्जयं स्वस्त्ययनं तथाऽऽयुषम् ॥२३ परीक्षित्! इन्द्रके स्वर्गमें आ जानेपर ब्रह्मर्षियोंने वहाँ आकर भगवान्की आराधनाके लिये इन्द्रको अश्वमेध यज्ञकी दीक्षा दी, उनसे अश्वमेध यज्ञ कराया || १८ || जब वेदवादी ऋषियोंने उनसे अश्वमेध यज्ञ कराया तथा देवराज इन्द्रने उस यज्ञके द्वारा सर्वदेवस्वरूप पुरुषोत्तम भगवान्की आराधना की, तब भगवान्की आराधनाके प्रभावसे वृत्रासुरके वधकी वह बहुत बड़ी पापराशि इस प्रकार भस्म हो गयी, जैसे सूर्योदयसे कुहरेका नाश हो जाता है ॥१९ -२० ॥ जब मरीचि आदि मुनीश्वरोंने उनसे विधिपूर्वक अश्वमेध यज्ञ कराया, तब उसके द्वारा सनातन पुरुष यज्ञपति भगवान्की आराधना करके इन्द्र सब पापोंसे छूट गये और पूर्ववत् फिर पूजनीय हो गये ॥२१ ॥
परीक्षित्! इस श्रेष्ठ आख्यानमें इन्द्रकी विजय, उनकी पापोंसे मुक्ति और भगवान्के प्यारे भक्त वृत्रासुरका वर्णन हुआ है । इसमें तीर्थोंको भी तीर्थ बनानेवाले भगवान्के अनुग्रह
आदि गुणोंका संकीर्तन है । यह सारे पापोंको धो बहाता है और भक्तिको बढ़ाता है ॥२२ ॥
बुद्धिमान् पुरुषोंको चाहिये कि वे इस इन्द्रसम्बन्धी आख्यानको सदा - सर्वदा पढ़ें और सुनें । विशेषतः पर्वोंके अवसरपर तो अवश्य ही इसका सेवन करें । यह धन और यशको बढ़ाता है, सारे पापोंसे छुड़ाता है, शत्रुपर विजय प्राप्त कराता है, तथा आयु और मंगलकी अभिवृद्धि करता है ॥२३ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे इन्द्रविजयो नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥१३ ॥
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अथ चतुर्दशोऽध्यायः वृत्रासुरका पूर्वचरित्र परीक्षिदुवाच
रजस्तमःस्वभावस्य ब्रह्मन् वृत्रस्य पाप्मनः ।
नारायणे भगवति कथमासीद् दृढा मतिः ॥ १
देवानां शुद्धसत्त्वानामृषीणां चामलात्मनाम् ।
भक्तिर्मुकुन्दचरणे न प्रायेणोपजायते ॥२
रजोभिः समसंख्याताः पार्थिवैरिह जन्तवः ।
तेषां ये केचनेहन्ते श्रेयो वै मनुजादयः ॥३
प्रायो मुमुक्षवस्तेषां केचनैव द्विजोत्तम ।
मुमुक्षूणां सहस्रेषु कश्चिन्मुच्येत सिध्यति ॥४
मुक्तानामपि सिद्धानां नारायणपरायणः ।
सुदुर्लभः प्रशान्तात्मा कोटिष्वपि महामुने ॥ ५
वृत्रस्तु स कथं पापः सर्वलोकोपतापनः ।
इत्थं दृढमतिः कृष्ण आसीत् संग्राम उल्बणे ॥६
अत्र नः संशयो भूयाञ्छ्रोतुं कौतूहलं प्रभो ।
यः पौरुषेण समरे सहस्राक्षमतोषयत् ॥७
सूत उवाच
परीक्षितोऽथ संप्रश्नं भगवान् बादरायणिः ।
निशम्य श्रद्दधानस्य प्रतिनन्द्य वचोऽब्रवीत् ॥ ८
श्रीशुक उवाच शृणुष्वावहितो राजन्नितिहासमिमं यथा । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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श्रुतं द्वैपायनमुखान्नारदाद्देवलादपि ॥९ राजा परीक्षित्ने कहा — भगवन्! वृत्रासुरका स्वभाव तो बड़ा रजोगुणी - तमोगुणी था । वह देवताओंको कष्ट पहुँचाकर पाप भी करता ही था । ऐसी स्थितिमें भगवान् नारायणके चरणोंमें उसकी सुदृढ़ भक्ति कैसे हुई? ॥१ ॥ हम देखते हैं कि प्रायः शुद्ध सत्त्वमय देवता
और पवित्रहृदय ऋषि भी भगवान्की परम प्रेममयी अनन्य भक्तिसे वंचित ही रह जाते हैं । सचमुच भगवान्की भक्ति बड़ी दुर्लभ है || २ || भगवन्! इस जगत्के प्राणी पृथ्वीके धूलिकणोंके समान ही असंख्य हैं । उनमें से कुछ मनुष्य आदि श्रेष्ठ जीव ही अपने कल्याणकी चेष्टा करते हैं ॥३ ॥ ब्रह्मन्! उनमें भी संसारसे मुक्ति चाहनेवाले तो बिरले ही होते हैं और
मोक्ष चाहनेवाले हजारोंमें मुक्ति या सिद्धि लाभ तो कोई - सा ही कर पाता है || ४ || महामुने! करोड़ों सिद्ध एवं मुक्त पुरुषोंमें भी वैसे शान्तचित्त महापुरुषका मिलना तो बहुत ही कठिन है, जो एकमात्र भगवान्के ही परायण हो ॥५ ॥
ऐसी अवस्थामें वह वृत्रासुर, जो सब लोगोंको सताता था और बड़ा पापी था, उस भयंकर युद्धके अवसरपर भगवान् श्रीकृष्णमें अपनी वृत्तियोंको इस प्रकार दृढ़तासे लगा सका — इसका क्या कारण है? ॥६ ॥ प्रभो! इस विषयमें हमें बहुत अधिक सन्देह है और
सुननेका बड़ा कौतूहल भी है । अहो, वृत्रासुरका बल - पौरुष कितना महान् था कि उसने रणभूमिमें देवराज इन्द्रको भी सन्तुष्ट कर दिया ॥७ ॥
सूतजी कहते हैं— शौनकादि ऋषियो! भगवान् शुकदेवजीने परम श्रद्धालु राजर्षि परीक्षित्का यह श्रेष्ठ प्रश्न सुनकर उनका अभिनन्दन करते हुए यह बात कही ॥८ ॥
श्रीशुकदेवजीने कहा — परीक्षित्! तुम सावधान होकर यह इतिहास सुनो । मैंने इसे अपने पिता व्यासजी, देवर्षि नारद और महर्षि देवलके मुँहसे भी विधिपूर्वक सुना है ॥९ ॥
आसीद्राजा सार्वभौमः शूरसेनेषु वै नृप ।
चित्रकेतुरिति ख्यातो यस्यासीत् कामधुङ्मही ॥१०
तस्य भार्यासहस्राणां सहस्राणि दशाभवन् ।
सान्तानिकश्चापि नृपो न लेभे तासु सन्ततिम् ॥ ११
रूपौदार्यवयोजन्मविद्यैश्वर्यश्रियादिभिः ।
सम्पन्नस्य गुणैः सर्वैश्चिन्ता वन्ध्यापतेरभूत् ॥ १२
न तस्य संपदः सर्वा महिष्यो वामलोचनाः ।
सार्वभौमस्य भूश्चेयमभवन् प्रीतिहेतवः ॥१३
तस्यैकदा तु भवनमङ्गिरा भगवानृषिः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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लोकाननुचरन्नेतानुपागच्छद्यदृच्छया ॥१४
तं पूजयित्वा विधिवत्प्रत्युत्थानार्हणादिभिः ।
कृतातिथ्यमुपासीदत्सुखासीनं समाहितः ॥ १५
महर्षिस्तमुपासीनं प्रश्रयावनतं क्षितौ ।
प्रतिपूज्य महाराज समाभाष्येदमब्रवीत् ॥१६
अङ्गिरा उवाच
अपि तेऽनामयं स्वस्ति प्रकृतीनां तथाऽऽत्मनः ।
यथा प्रकृतिभिर्गुप्तः पुमान् राजापि सप्तभिः ॥१७
आत्मानं प्रकृतिष्वद्धा निधाय श्रेय आप्नुयात् ।
राज्ञा तथा प्रकृतयो नरदेवाहिताधयः ॥१८
प्राचीन कालकी बात है, शूरसेन देशमें चक्रवर्ती सम्राट् महाराज चित्रकेतु राज्य करते थे । उनके राज्यमें पृथ्वी स्वयं ही प्रजाकी इच्छाके अनुसार अन्न - रस दे दिया करती थी ॥१० ॥ उनके एक करोड़ रानियाँ थीं और ये स्वयं सन्तान उत्पन्न करनेमें समर्थ भी थे ।
परन्तु उन्हें उनमेंसे किसीके भी गर्भसे कोई सन्तान न हुई ॥११ ॥ यों महाराज चित्रकेतुको
किसी बातकी कमी न थी । सुन्दरता, उदारता, युवावस्था, कुलीनता, विद्या, ऐश्वर्य और सम्पत्ति आदि सभी गुणोंसे वे सम्पन्न थे । फिर भी उनकी पत्नियाँ बाँझ थीं, इसलिये उन्हें बड़ी चिन्ता रहती थी ॥१२ ॥ वे सारी पृथ्वीके एकछत्र सम्राट् थे, बहुत - सी सुन्दरी रानियाँ थीं तथा
सारी पृथ्वी उनके वशमें थी । सब प्रकारकी सम्पत्तियाँ उनकी सेवामें उपस्थित थीं, परन्तु वे सब वस्तुएँ उन्हें सुखी न कर सकीं ॥ १३ ॥ एक दिन शाप और वरदान देनेमें समर्थ अंगिरा
ऋषि स्वच्छन्दरूपसे विभिन्न लोकोंमें विचरते हुए राजा चित्रकेतुके महलमें पहुँच गये ॥१४ ॥
राजाने प्रत्युत्थान और अर्घ्य आदिसे उनकी विधिपूर्वक पूजा की । आतिथ्य - सत्कार हो जानेके बाद जब अंगिरा ऋषि सुखपूर्वक आसनपर विराज गये, तब राजा चित्रकेतु भी शान्तभावसे उनके पास ही बैठ गये || १५ || महाराज! महर्षि अंगिराने देखा कि यह राजा बहुत विनयी है और मेरे पास पृथ्वीपर बैठकर मेरी भक्ति कर रहा है । तब उन्होंने चित्रकेतुको सम्बोधित करके उसे आदर देते हुए यह बात कही ॥१६ ॥
अंगिरा ऋषिने कहा — राजन्! तुम अपनी प्रकृतियों – गुरु, मन्त्री, राष्ट्र, दुर्ग, कोष, सेना और मित्रके साथ सकुशल तो हो न? जैसे जीव महत्तत्त्वादि सात आवरणोंसे घिरा रहता है, वैसे ही राजा भी इन सात प्रकृतियोंसे घिरा रहता है । उनके कुशलसे ही राजाकी कुशल है ॥१७ ॥ नरेन्द्र! जिस प्रकार राजा अपनी उपर्युक्त प्रकृतियोंके अनुकूल रहनेपर ही
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राज्यसुख भोग सकता है, वैसे ही प्रकृतियाँ भी अपनी रक्षाका भार राजापर छोड़कर सुख और समृद्धि लाभ कर सकती हैं ॥१८ ॥
अपि दाराः प्रजामात्या भृत्याः श्रेण्योऽथ मन्त्रिणः ।
पौरा जानपदा भूपा आत्मजा वशवर्तिनः ॥ १ ९
यस्यात्मानुवशश्चेत्स्यात्सर्वे तद्वशगा इमे ।
लोकाः सपाला यच्छन्ति सर्वे बलिमतन्द्रिताः ॥२०
आत्मनः प्रीयते नात्मा परतः स्वत एव वा ।
लक्षयेऽलब्धकामं त्वां चिन्तया शबलं मुखम् ॥२१
एवं विकल्पितो राजन् विदुषा मुनिनापि सः ।
प्रश्रयावनतोऽभ्याह प्रजाकामस्ततो मुनिम् ॥२२
चित्रकेतुरुवाच
भगवन् किं न विदितं तपोज्ञानसमाधिभिः ।
योगिनां ध्वस्तपापानां बहिरन्तः शरीरिषु ॥२३
तथापि पृच्छतो ब्रूयां ब्रह्मन्नात्मनि चिन्तितम् ।
भवतो विदुषश्चापि चोदितस्त्वदनुज्ञया ॥ २४
लोकपालैरपि प्रार्थ्याः साम्राज्यैश्वर्यसम्पदः ।
न नन्दयन्त्यप्रजं मां क्षुत्तृट्काममिवापरे ॥२५
ततः पाहि महाभाग पूर्वैः सह गतं तमः ।
यथा तरेम दुस्तारं प्रजया तद् विधेहि नः ॥२६
राजन्! तुम्हारी रानियाँ, प्रजा, मन्त्री ( सलाहकार ), सेवक, व्यापारी, अमात्य ( दीवान ), नागरिक, देशवासी, मण्डलेश्वर राजा और पुत्र तुम्हारे वशमें तो हैं न? ॥१९ ॥ सच्ची बात तो
यह है कि जिसका मन अपने वशमें है, उसके ये सभी वशमें होते हैं । इतना ही नहीं, सभी लोक और लोकपाल भी बड़ी सावधानीसे उसे भेंट देकर उसकी प्रसन्नता चाहते हैं ॥ २० ॥
परन्तु मैं देख रहा हूँ कि तुम स्वयं सन्तुष्ट नहीं हो । तुम्हारी कोई कामना अपूर्ण है । तुम्हारे मुँहपर किसी आन्तरिक चिन्ताके चिह्न झलक रहे हैं । तुम्हारे इस असन्तोषका कारण कोई और है या स्वयं तुम्हीं हो? ॥२१ ॥
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परीक्षित्! महर्षि अंगिरा यह जानते थे कि राजाके मनमें किस बातकी चिन्ता है । फिर भी उन्होंने उनसे चिन्ताके सम्बन्धमें अनेकों प्रश्न पूछे । चित्रकेतुको सन्तानकी कामना थी । अतः महर्षिके पूछनेपर उन्होंने विनयसे झुककर निवेदन किया ॥२२ ॥
सम्राट् चित्रकेतुने कहा - भगवन्! जिन योगियोंके तपस्या, ज्ञान, धारणा, ध्यान और समाधिके द्वारा सारे पाप नष्ट हो चुके हैं - उनके लिये प्राणियोंके बाहर या भीतरकी ऐसी कौन - सी बात है, जिसे वे न जानते हों || २३ || ऐसा होनेपर भी जब आप सब कुछ जान-बूझकर मुझसे मेरे मनकी चिन्ता पूछ रहे हैं, तब मैं आपकी आज्ञा और प्रेरणासे अपनी चिन्ता आपके चरणोंमें निवेदन करता हूँ || २४ || मुझे पृथ्वीका साम्राज्य, ऐश्वर्य और सम्पत्तियाँ, जिनके लिये लोकपाल भी लालायित रहते हैं, प्राप्त हैं । परन्तु सन्तान न होनेके कारण मुझे इन सुखभोगोंसे उसी प्रकार तनिक भी शान्ति नहीं मिल रही है, जैसे भूखे - प्यासे प्राणीको अन्न - जलके सिवा दूसरे भोगोंसे ॥२५ ॥ महाभाग्यवान् महर्षे! मैं तो दुःखी हूँ ही, पिण्डदान न
मिलनेकी आशंकासे मेरे पितर भी दुःखी हो रहे हैं । अब आप हमें सन्तान - दान करके परलोकमें प्राप्त होनेवाले घोर नरकसे उबारिये और ऐसी व्यवस्था कीजिये कि मैं लोक-परलोकके सब दुःखोंसे छुटकारा पा लूँ ॥२६ ॥
श्रीशुक उवाच
इत्यर्थितः स भगवान् कृपालुर्ब्रह्मणः सुतः ।
श्रपयित्वा चरुं त्वाष्ट्रं त्वष्टारमयजद् विभुः ॥२७
ज्येष्ठा श्रेष्ठा च या राज्ञो महिषीणां च भारत ।
नाम्ना कृतद्युतिस्तस्यै यज्ञोच्छिष्टमदाद् द्विजः ॥२८
अथाह नृपतिं राजन् भवितैकस्तवात्मजः ।
हर्षशोकप्रदस्तुभ्यमिति ब्रह्मसुतो ययौ ॥ २ ९
सापि तत्प्राशनादेव चित्रकेतोरधारयत् ।
गर्भं कृतद्युतिर्देवी कृत्तिकाग्नेरिवात्मजम् ॥ ३०
तस्या अनुदिनं गर्भः शुक्लपक्ष इवोडुपः ।
ववृधे शूरसेनेशतेजसा शनकैर्नृप ॥ ३१
अथ काल उपावृत्ते कुमारः समजायत ।
जनयन् शूरसेनानां शृण्वतां परमां मुदम् ॥३२
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हृष्टो राजा कुमारस्य स्नातः शुचिरलङ्कृतः ।
वाचयित्वाऽऽशिषो विप्रैः कारयामास जातकम् ॥३३
तेभ्यो हिरण्यं रजतं वासांस्याभरणानि च ।
ग्रामान् हयान् गजान् प्रादाद् धेनूनामर्बुदानि षट् ॥३४
ववर्ष काममन्येषां पर्जन्य इव देहिनाम् ।
धन्यं यशस्यमायुष्यं कुमारस्य महामनाः ॥३५
कृच्छ्रलब्धेऽथ राजर्षेस्तनयेऽनुदिनं पितुः ।
यथा निःस्वस्य कृच्छ्राप्ते धने स्नेहोऽन्ववर्धत ॥ ३६
मातुस्त्वतितरां पुत्रे स्नेहो मोहसमुद्भवः ।
कृतद्युतेः सपत्नीनां प्रजाकामज्वरोऽभवत् ॥३७
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! जब राजा चित्रकेतुने इस प्रकार प्रार्थना की, तब सर्वसमर्थ एवं परम कृपालु ब्रह्मपुत्र भगवान् अंगिराने त्वष्टा देवताके योग्य चरु निर्माण करके उससे उनका यजन किया ॥ २७ ॥ परीक्षित्! राजा चित्रकेतुकी रानियोंमें सबसे बड़ी और
सद्गुणवती महारानी कृतद्युति थीं । महर्षि अंगिराने उन्हींको यज्ञका अवशेष प्रसाद् दिया ॥२८ ॥ और राजा चित्रकेतुसे कहा- ' राजन्! तुम्हारी पत्नीके गर्भसे एक पुत्र होगा, जो
तुम्हें हर्ष और शोक दोनों ही देगा । ' यों कहकर अंगिरा ऋषि चले गये ॥२९ ॥ उस यज्ञावशेष
प्रसादके खानेसे ही महारानी कृतद्युतिने महाराज चित्रकेतुके द्वारा गर्भ धारण किया, जैसे कृत्तिकाने अपने गर्भमें अग्निकुमारको धारण किया था ॥३० ॥ राजन्! शूरसेन देशके राजा
चित्रकेतुके तेजसे कृतद्युतिका गर्भ शुक्लपक्षके चन्द्रमाके समान दिनोंदिन क्रमशः बढ़ने लगा ॥३१ ॥
तदनन्तर समय आनेपर महारानी कृतद्युतिके गर्भसे एक सुन्दर पुत्रका जन्म हुआ । उसके जन्मका समाचार पाकर शूरसेन देशकी प्रजा बहुत ही आनन्दित हुई ॥३२ ॥ सम्राट्
चित्रकेतुके आनन्दका तो कहना ही क्या था । वे स्नान करके पवित्र हुए । फिर उन्होंने वस्त्राभूषणोंसे सुसज्जित हो, ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर और आशीर्वाद लेकर पुत्रका जातकर्म - संस्कार करवाया ॥ ३३ ॥ उन्होंने उन ब्राह्मणोंको सोना, चाँदी, वस्त्र, आभूषण,
गाँव, घोड़े, हाथी और छ: अर्बुद गौएँ दान कीं ॥ ३४ ॥ उदारशिरोमणि राजा चित्रकेतुने पुत्रके
धन, यश और आयुकी वृद्धिके लिये दूसरे लोगोंको भी मुँहमाँगी वस्तुएँ दीं — ठीक उसी प्रकार जैसे मेघ सभी जीवोंका मनोरथ पूर्ण करता है ॥ ३५ ॥ परीक्षित्! जैसे यदि किसी कंगालको
बड़ी कठिनाईसे कुछ धन मिल जाता है तो उसमें उसकी आसक्ति हो जाती है, वैसे ही बहुत कठिनाईसे प्राप्त हुए उस पुत्रमें राजर्षि चित्रकेतुका स्नेहबन्धन दिनोंदिन दृढ़ होने लगा ॥३६ ॥ माता कृतद्युतिको भी अपने पुत्रपर मोहके कारण बहुत ही स्नेह था । परन्तु
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उनकी सौत रानियोंके मनमें पुत्रकी कामनासे और भी जलन होने लगी ॥३७ ॥
चित्रकेतोरतिप्रीतिर्यथा दारे प्रजावति ।
न तथान्येषु सञ्जज्ञे बालं लालयतोऽन्वहम् ॥ ३८
ताः पर्यतप्यन्नात्मानं गर्हयन्त्योऽभ्यसूयया ।
आनपत्येन दुःखेन राज्ञोऽनादरणेन च ॥३९
धिगप्रजां स्त्रियं पापां पत्युश्चागृहसम्मताम् ।
सुप्रजाभिः सपत्नीभिर्दासीमिव तिरस्कृताम् ॥४०
दासीनां को नु सन्तापः स्वामिनः परिचर्यया । नु अभीक्ष्णं लब्धमानानां दास्या दासीव दुर्भगाः ॥४१
एवं सन्दह्यमानानां सपत्न्याः पुत्रसम्पदा ।
राज्ञोऽसम्मतवृत्तीनां विद्वेषो बलवानभूत् ॥४२
विद्वेषनष्टमतयः स्त्रियो दारुणचेतसः ।
गरं ददुः कुमाराय दुर्मर्षा नृपतिं प्रति ॥४३
कृतद्युतिरजानन्ती सपत्नीनामघं महत् ।
सुप्त एवेति सञ्चिन्त्य निरीक्ष्य व्यचरद् गृहे ॥४४
शयानं सुचिरं बालमुपधार्य मनीषिणी ।
पुत्रमानय मे भद्रे इति धात्रीमचोदयत् ॥४५
सा शयानमुपव्रज्य दृष्ट्वा चोत्तारलोचनम् ।
प्राणेन्द्रियात्मभिस्त्यक्तं हतास्मीत्यपतद्भुवि ॥ ४६
प्रतिदिन बालकका लाड़ - प्यार करते रहनेके कारण सम्राट् चित्रकेतुका जितना प्रेम बच्चेकी माँ कृतद्युतिमें था, उतना दूसरी रानियोंमें न रहा ॥ ३८ ॥ इस प्रकार एक तो वे रानियाँ
सन्तान न होनेके कारण ही दुःखी थीं, दूसरे राजा चित्रकेतुने उनकी उपेक्षा कर दी । अतः वे डाहसे अपनेको धिक्कारने और मन - ही - मन जलने लगीं ॥ ३ ९ ॥ -वे आपसमें कहने लगीं — ' अरी बहिनो! पुत्रहीन स्त्री बहुत ही अभागिनी होती है । पुत्रवाली सौतें तो दासीके समान उसका तिरस्कार करती हैं । और तो और, स्वयं पतिदेव ही ****** ebook converter DEMO Watermarks *******