श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 1271–1280

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1271–1280

पृष्ठ 1271

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चिरायु पुत्र प्राप्त करती है । धनवती किन्तु अभागिनी स्त्रीको सौभाग्य प्राप्त होता है और कुरूपाको श्रेष्ठ रूप मिल जाता है । रोगी इस व्रतके प्रभावसे रोगमुक्त होकर बलिष्ठ शरीर और श्रेष्ठ इन्द्रियशक्ति प्राप्त कर लेता है । जो मनुष्य मांगलिक श्राद्धकर्मोंमें इसका पाठ करता है, उसके पितर और देवता अनन्त तृप्ति लाभ करते हैं ॥२६-२७ ॥ वे सन्तुष्ट होकर हवनके समाप्त होनेपर व्रतीकी समस्त इच्छाएँ पूर्ण कर देते हैं । ये सब तो सन्तुष्ट होते ही हैं, समस्त यज्ञोंके एकमात्र भोक्ता भगवान् लक्ष्मीनारायण भी सन्तुष्ट हो जाते हैं और व्रतीकी समस्त अभिलाषाएँ पूर्ण कर देते हैं । परीक्षित्! मैंने तुम्हें मरुद्गणकी आदरणीय और पुण्यप्रद जन्म-कथा सुनायी और साथ ही दितिके श्रेष्ठ पुंसवन - व्रतका वर्णन भी सुना दिया ॥ २८ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे वैयासिक्यामष्टादशसाहस्रयां पारमहंस्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे पुंसवनव्रतकथनं नामैकोनविंशोऽध्यायः ॥ १ ९ ॥

इति षष्ठः स्कन्धः समाप्तः ॥। हरिः ॐ तत्सत् ॥

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पृष्ठ 1272

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॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराणम् सप्तमः स्कन्धः अथ प्रथमोऽध्यायः नारद - युधिष्ठिर - संवाद और जय - विजयकी कथा राजोवाच

समः प्रियः सुहृद्ब्रह्मन् भूतानां भगवान् स्वयम् ।

इन्द्रस्यार्थे कथं दैत्यानवधीद्विषमो यथा ॥ १

न ह्यस्यार्थः सुरगणैः साक्षान्निःश्रेयसात्मनः ।

नैवासुरेभ्यो विद्वेषो नोद्वेगश्चागुणस्य हि ॥२

इति नः सुमहाभाग नारायणगुणान् प्रति ।

संशयः सुमहाञ्जातस्तद्भवांश्छेत्तुमर्हति ॥३

श्रीशुक उवाच

साधु पृष्टं महाराज हरेश्चरितमद्भुतम् ।

यद् भागवतमाहात्म्यं भगवद्भक्तिवर्धनम् ॥४

गीयते परमं पुण्यमृषिभिर्नारदादिभिः ।

नत्वा कृष्णाय मुनये कथयिष्ये हरेः कथाम् ॥५

निर्गुणोऽपि ह्यजोऽव्यक्तो भगवान् प्रकृतेः परः ।

स्वमायागुणमाविश्य बाध्यबाधकतां गतः ॥६

राजा परीक्षित्ने पूछा— भगवन्! भगवान् तो स्वभावसे ही भेदभावसे रहित हैं — सम हैं, समस्त प्राणियोंके प्रिय और सुहृद् हैं; फिर उन्होंने, जैसे कोई साधारण मनुष्य भेदभावसे ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1273

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अपने मित्रका पक्ष ले और शत्रुओंका अनिष्ट करे, उसी प्रकार इन्द्रके लिये दैत्योंका वध क्यों किया? ॥१ ॥ वे स्वयं परिपूर्ण कल्याणस्वरूप हैं, इसीलिये उन्हें देवताओंसे कुछ लेना - देना

नहीं है । तथा निर्गुण होनेके कारण दैत्योंसे कुछ वैर - विरोध और उद्वेग भी नहीं है || २ || भगवत्प्रेमके सौभाग्यसे सम्पन्न महात्मन्! हमारे चित्तमें भगवान् के समत्व आदि गुणोंके

सम्बन्धमें बड़ा भारी सन्देह हो रहा है । आप कृपा करके उसे मिटाइये ॥३ ॥

श्रीशुकदेवजीने कहा – महाराज! भगवान्के अद्भुत चरित्रके सम्बन्धमें तुमने बड़ा सुन्दर प्रश्न किया; क्योंकि ऐसे प्रसंग प्रह्लाद आदि भक्तोंकी महिमासे परिपूर्ण होते हैं, जिसके श्रवणसे भगवान्की भक्ति बढ़ती है ॥४ ॥ इस परम पुण्यमय प्रसंगको नारदादि महात्मागण

बड़े प्रेमसे गाते रहते हैं । अब मैं अपने पिता श्रीकृष्ण द्वैपायन मुनिको नमस्कार करके भगवान्की लीला - कथाका वर्णन करता हूँ ॥५ ॥ वास्तवमें भगवान् निर्गुण, अजन्मा, अव्यक्त

और प्रकृतिसे परे हैं । ऐसा होनेपर भी अपनी मायाके गुणोंको स्वीकार करके वे बाध्य-बाधकभावको अर्थात् मरने और मारनेवाले दोनोंके परस्पर - विरोधी रूपोंको ग्रहण करते हैं ॥६ ॥

सत्त्वं रजस्तम इति प्रकृतेर्नात्मनो गुणाः ।

न तेषां युगपद्राजन् ह्रास उल्लास एव वा ॥७

जयकाले तु सत्त्वस्य देवर्षीन् रजसोऽसुरान् ।

तमसो यक्षरक्षांसि तत्कालानुगुणोऽभजत् ॥८

ज्योतिरादिरिवाभाति सङ्घातान्न विविच्यते ।

विदन्त्यात्मानमात्मस्थं मथित्वा कवयोऽन्ततः ॥९

यदा सिसृक्षुः पुर ' आत्मनः परो रजः सृजत्येष पृथक् स्वमायया । सत्त्वं विचित्रासु रिरंसुरीश्वरः शयिष्यमाणस्तम ईरयत्यसौ ॥१० कालं चरन्तं सृजतीश आश्रयं प्रधानपुम्भ्यां नरदेव सत्यकृत् । य एष राजन्नपि काल ईशिता सत्त्वं सुरानीकमिवैधयत्यतः । तत्प्रत्यनीकानसुरान् सुरप्रियो रजस्तमस्कान् प्रमिणोत्युरुश्रवाः ॥ ११ ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1274

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अत्रैवोदाहृतः पूर्वमितिहासः सुरर्षिणा ।

प्रीत्या महाक्रतौ राजन् पृच्छतेऽजातशत्रवे ॥१२

दृष्ट्वा महाद्भुतं राजा राजसूये महाक्रतौ । २ वासुदेवे भगवति सायुज्यं चेदिभूभुजः ॥१३ सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण - ये प्रकृतिके गुण हैं, परमात्मा नहीं । परीक्षित्! इन तीनों गुणोंकी भी एक साथ ही घटती - बढ़ती नहीं होती ॥७ ॥ भगवान् समय - समयके

अनुसार गुणोंको स्वीकार करते हैं । सत्त्वगुणकी वृद्धिके समय देवता और ऋषियोंका, रजोगुणकी वृद्धिके समय दैत्योंका और तमोगुणकी वृद्धिके समय वे यक्ष एवं राक्षसोंको अपनाते और उनका अभ्युदय करते हैं || ८ || जैसे व्यापक अग्नि काष्ठ आदि भिन्न - भिन्न आश्रयोंमें रहनेपर भी उनसे अलग नहीं जान पड़ती, परन्तु मन्थन करनेपर वह प्रकट हो जाती है — वैसे ही परमात्मा सभी शरीरोंमें रहते हैं, अलग नहीं जान पड़ते । परन्तु विचारशील पुरुष हृदयमन्थन करके – उनके अतिरिक्त सभी वस्तुओंका बाध करके अन्ततः अपने हृदयमें ही अन्तर्यामीरूपसे उन्हें प्राप्त कर लेते हैं || ९ || जब परमेश्वर अपने लिये शरीरोंका निर्माण करना चाहते हैं, तब अपनी मायासे रजोगुणकी अलग सृष्टि करते हैं । जब वे विचित्र योनियोंमें रमण करना चाहते हैं, तब सत्त्वगुणकी सृष्टि करते हैं और जब वे शयन करना चाहते हैं, तब तमोगुणको बढ़ा देते हैं || १० || परीक्षित्! भगवान् सत्यसंकल्प हैं । वे ही जगत्की उत्पत्तिके निमित्तभूत प्रकृति और पुरुषके सहकारी एवं आश्रयकालकी सृष्टि करते हैं । इसलिये वे कालके अधीन नहीं, काल ही उनके अधीन है । राजन्! ये कालस्वरूप ईश्वर जब सत्त्वगुणकी वृद्धि करते हैं, तब सत्त्वमय देवताओंका बल बढ़ाते हैं और तभी वे परमयशस्वी देवप्रिय परमात्मा देवविरोधी रजोगुणी एवं तमोगुणी दैत्योंका संहार करते हैं । वस्तुतः वे सम ही हैं ॥११ ॥

राजन्! इसी विषयमें देवर्षि नारदने बड़े प्रेमसे एक इतिहास कहा था । यह उस समयकी बात है, जब राजसूय यज्ञमें तुम्हारे दादा युधिष्ठिरने उनसे इस सम्बन्धमें एक प्रश्न किया था ॥१२ ॥ उस महान् राजसूय यज्ञमें राजा युधिष्ठिरने अपनी आँखोंके सामने बड़ी आश्चर्य-जनक घटना देखी कि चेदिराज शिशुपाल सबके देखते - देखते भगवान् श्रीकृष्णमें समा

गया ॥१३ ॥

तत्रासीनं सुरऋषिं राजा पाण्डुसुतः क्रतौ ।

पप्रच्छ विस्मितमना मुनीनां शृण्वतामिदम् ॥१४

युधिष्ठिर उवाच

अहो अत्यद्भुतं ह्येतद्दुर्लभैकान्तिनामपि ।

वासुदेवे परे तत्त्वे प्राप्तिश्चैद्यस्य विद्विषः ॥१५

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पृष्ठ 1275

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एतद्वेदितुमिच्छामः सर्व एव वयं मुने ।

भगवन्निन्दया वेनो द्विजैस्तमसि पातितः ॥ १६

दमघोषसुतः पाप आरम्भ कलभाषणात् ।

सम्प्रत्यमर्षी गोविन्दे दन्तवक्त्रश्च दुर्मतिः ॥१७

शपतोरसकृद्विष्णुं यद्ब्रह्म परमव्ययम् ।

श्वित्रो न जातो जिह्वायां नान्धं विविशतुस्तमः ॥ १८

कथं तस्मिन् भगवति दुरवग्राहधामनि ।

पश्यतां सर्वलोकानां लयमीयतुरञ्जसा ॥१९

एतद् भ्राम्यति मे बुद्धिर्दीपार्चिरिव वायुना ।

ब्रूह्येतदद्भुततमं भगवांस्तत्र कारणम् ॥२०

श्रीशुक उवाच

राज्ञस्तद्वच आकर्ण्य नारदो भगवानृषिः ।

तुष्टः प्राह तमाभाष्य शृण्वत्यास्तत्सदः कथाः ॥२१

नारद उवाच

निन्दनस्तवसत्कारन्यक्कारार्थं कलेवरम् ।

प्रधानपरयो राजन्नविवेकेन कल्पितम् ॥२२

हिंसा तदभिमानेन दण्डपारुष्ययोर्यथा ।

वैषम्यमिह भूतानां ममाहमिति पार्थिव ॥२३

वहीं देवर्षि नारद भी बैठे हुए थे । इस घटनासे आश्चर्यचकित होकर राजा युधिष्ठिरने बड़े - बड़े मुनियोंसे भरी हुई सभामें; उस यज्ञमण्डपमें ही देवर्षि नारदसे यह प्रश्न किया ॥१४ ॥

युधिष्ठिरने पूछा — अहो! यह तो बड़ी विचित्र बात है । परमतत्त्व भगवान् श्रीकृष्णमें समा जाना तो बड़े - बड़े अनन्य भक्तोंके लिये भी दुर्लभ है; फिर भगवान्से द्वेष करनेवाले शिशुपालको यह गति कैसे मिली? ॥ १५ ॥ नारदजी! इसका रहस्य हम सभी जानना चाहते

हैं । पूर्वकालमें भगवान्की निन्दा करनेके कारण ऋषियोंने राजा वेनको नरकमें डाल दिया था ॥१६ ॥ यह दमघोषका लड़का पापात्मा शिशुपाल और दुर्बुद्धि दन्तवक्त्र —दोनों ही

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पृष्ठ 1276

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जबसे तुतलाकर बोलने लगे थे, तबसे अबतक भगवान्से द्वेष ही करते रहे हैं ॥१७ ॥

अविनाशी परब्रह्म भगवान् श्रीकृष्णको ये पानी पी - पीकर गाली देते रहे हैं । परन्तु इसके फलस्वरूप न तो इनकी जीभमें कोढ़ ही हुआ और न इन्हें घोर अन्धकारमय नरककी ही प्राप्ति हुई ॥१८ ॥ प्रत्युत जिन भगवान्की प्राप्ति अत्यन्त कठिन है, उन्हींमें ये दोनों सबके

देखते - देखते अनायास ही लीन हो गये - इसका क्या कारण है? ॥१९ ॥ हवाके झोंकेसे

लड़खड़ाती हुई दीपककी लौके समान मेरी बुद्धि इस विषय में बहुत आगा - पीछा कर रही है । आप सर्वज्ञ हैं, अतः इस अद्भुत घटनाका रहस्य समझाइये ॥ २० ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं— सर्वसमर्थ देवर्षि नारद राजाके ये प्रश्न सुनकर बहुत प्रसन्न हुए । उन्होंने युधिष्ठिरको सम्बोधित करके भरी सभामें सबके सुनते हुए यह कथा कही ॥२१ ॥

नारदजीने कहा — युधिष्ठिर! निन्दा, स्तुति, सत्कार और तिरस्कार - इस शरीरके ही तो होते हैं । इस शरीरकी कल्पना प्रकृति और पुरुषका ठीक - ठीक विवेक न होनेके कारण ही हुई है ॥२२ ॥ जब इस शरीरको ही अपना आत्मा मान लिया जाता है, तब ' यह मैं हूँ और यह

मेरा है ' ऐसा भाव बन जाता है । यही सारे भेदभावका मूल है । इसीके कारण ताड़ना और दुर्वचनोंसे पीड़ा होती है ॥२३ ॥

यन्निबद्धोऽभिमानोऽयं तद्वधात्प्राणिनां वधः ।

तथा न यस्य कैवल्यादभिमानोऽखिलात्मनः ।

परस्य दमकर्तुर्हि हिंसा केनास्य कल्प्यते ॥२४

तस्माद्वैरानुबन्धेन निर्वैरेण भयेन वा ।

स्नेहात्कामेन वा युञ्ज्यात् कथञ्चिन्नेक्षते पृथक् ॥२५

यथा वैरानुबन्धेन मर्त्यस्तन्मयतामियात् ।

न तथा भक्तियोगेन इति मे निश्चिता मतिः ॥२६

कीटः पेशस्कृता रुद्धः कुड्यायां तमनुस्मरन् ।

संरम्भभययोगेन विन्दते तत्सरूपताम् ॥२७

एवं कृष्णे भगवति मायामनुज ईश्वरे ।

वैरेण पूतपाप्मानस्तमापुरनुचिन्तया ॥ २८

कामाद् द्वेषाद्भयात्स्नेहाद्यथा भक्त्येश्वरे मनः ।

आवेश्य तदघं हित्वा बहवस्तद्गतिं गताः ॥ २ ९

गोप्यः कामाद्भयात्कंसो द्वेषाच्चैद्यादयो नृपाः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1277

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सम्बन्धाद् वृष्णयः स्नेहाद्यूयं भक्त्या वयं विभो ॥ ३०

कतमोऽपि न वेनः स्यात्पञ्चानां पुरुषं प्रति ।

तस्मात् केनाप्युपायेन मनः कृष्णे निवेशयेत् ॥ ३१

जिस शरीरमें अभिमान हो जाता है कि ' यह मैं हूँ ', उस शरीरके वधसे प्राणियोंको अपना वध जान पड़ता है । किन्तु भगवान्‌में तो जीवोंके समान ऐसा अभिमान है नहीं; क्योंकि वे सर्वात्मा हैं, अद्वितीय हैं । वे जो दूसरोंको दण्ड देते हैं - वह भी उनके कल्याणके लिये ही, क्रोधवश अथवा द्वेषवश नहीं । तब भगवान्‌ के सम्बन्धमें हिंसाकी कल्पना तो की ही कैसे जा सकती है ॥२४ ॥ इसलिये चाहे सुदृढ़ वैरभावसे या वैरहीन भक्तिभावसे, भयसे,

स्नेहसे अथवा कामनासे - कैसे भी हो, भगवान्‌में अपना मन पूर्णरूपसे लगा देना चाहिये । भगवान्की दृष्टिसे इन भावोंमें कोई भेद नहीं है ॥२५ ॥

युधिष्ठिर! मेरा तो ऐसा दृढ़ निश्चय है कि मनुष्य वैरभावसे भगवान्‌में जितना तन्मय हो जाता है, उतना भक्तियोगसे नहीं होता || २६ || भृंगी कीड़ेको लाकर भीतपर अपने छिद्रमें बंद कर देता है और वह भय तथा उद्वेगसे भृंगीका चिन्तन करते - करते उसके - जैसा ही हो जाता है ॥२७ ॥ यही बात भगवान् श्रीकृष्णके सम्बन्धमें भी है । लीलाके द्वारा मनुष्य मालूम

पड़ते हुए ये सर्वशक्तिमान् भगवान् ही तो हैं । इनसे वैर करनेवाले भी इनका चिन्तन करते-करते पापरहित होकर इन्हींको प्राप्त हो गये || २८ || एक नहीं, अनेकों मनुष्य कामसे, द्वेषसे, भयसे और स्नेहसे अपने मनको भगवान्‌में लगाकर एवं अपने सारे पाप धोकर उसी प्रकार भगवान्को प्राप्त हुए हैं, जैसे भक्त भक्तिसे ॥ २ ९ ॥ महाराज! गोपियोंने भगवान्से मिलनके तीव्र काम अर्थात् प्रेमसे, कंसने भयसे, शिशुपाल - दन्तवक्त्र आदि राजाओंने द्वेषसे, यदुवंशियोंने परिवारके सम्बन्धसे, तुमलोगोंने स्नेहसे और हमलोगोंने भक्तिसे अपने मनको भगवान्में लगाया है ॥३० ॥ भक्तोंके अतिरिक्त जो पाँच प्रकारके भगवान्‌का चिन्तन

करनेवाले हैं, उनमेंसे राजा वेनकी तो किसीमें भी गणना नहीं होती ( क्योंकि उसने किसी भी प्रकारसे भगवान्में मन नहीं लगाया था ) । सारांश यह कि चाहे जैसे हो, अपना मन भगवान् श्रीकृष्णमें तन्मय कर देना चाहिये ॥३१ ॥

मातृष्वसेयो वश्चैद्यो दन्तवक्त्रश्च पाण्डव ।

पार्षदप्रवरौ विष्णोर्विप्रशापात्पदाच्च्युतौ ॥३२

युधिष्ठिर उवाच

कीदृशः कस्य वा शापो हरिदासाभिमर्शनः ।

अश्रद्धेय इवाभाति हरेरेकान्तिनां भवः ॥ ३३

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पृष्ठ 1278

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देहेन्द्रियासुहीनानां वैकुण्ठपुरवासिनाम् ।

देहसम्बन्धसम्बद्धमेतदाख्यातुमर्हसि ॥३४

नारद उवाच

एकदा ब्रह्मणः पुत्रा विष्णोर्लोकं यदृच्छया ।

सनन्दनादयो जग्मुश्चरन्तो भुवनत्रयम् ॥३५

पञ्चषड्ढायनार्भाभाः पूर्वेषामपि पूर्वजाः ।

दिग्वाससःशिशून् मत्वा द्वाःस्थौ तान् प्रत्यषेधताम् ॥३६

अशपन् कुपिता एवं युवां वासं न चार्हथः ।

रजस्तमोभ्यां रहिते पादमूले मधुद्विषः ।

पापिष्ठामासुरीं योनिं बालिशौ यातमाश्वतः ॥३७

एवं शप्तौ स्वभवनात् पतन्तौ तैः कृपालुभिः ।

प्रोक्तौ पुनर्जन्मभिर्वं त्रिभिर्लोकाय कल्पताम् ॥३८

जज्ञाते तौ दितेः पुत्रौ दैत्यदानववन्दितौ ।

हिरण्यकशिपुर्ज्येष्ठो हिरण्याक्षोऽनुजस्ततः ॥ ३ ९

हतो हिरण्यकशिपुर्हरिणा सिंहरूपिणा ।

हिरण्याक्षो धरोद्धारे बिभ्रता सौकरं वपुः ॥४०

महाराज! फिर तुम्हारे मौसेरे भाई शिशुपाल और दन्तवक्त्र दोनों ही विष्णुभगवान्के मुख्य पार्षद थे । ब्राह्मणोंके शापसे इन दोनोंको अपने पदसे च्युत होना पड़ा था ॥३२ ॥

राजा युधिष्ठिरने पूछा- नारदजी! भगवान्‌के पार्षदोंको भी प्रभावित करनेवाला वह शाप किसने दिया था तथा वह कैसा था? भगवान्‌ के अनन्य प्रेमी फिर जन्म - मृत्युमय संसारमें आयें, यह बात तो कुछ अविश्वसनीय - सी मालूम पड़ती है ॥ ३३ ॥ वैकुण्ठके रहनेवाले लोग

प्राकृत शरीर, इन्द्रिय और प्राणोंसे रहित होते हैं । उनका प्राकृत शरीरसे सम्बन्ध किस प्रकार हुआ, यह बात आप अवश्य सुनाइये ॥३४ ॥

नारदजीने कहा — एक दिन ब्रह्माके मानसपुत्र सनकादि ऋषि तीनों लोकोंमें स्वच्छन्द विचरण करते हुए वैकुण्ठमें जा पहुँचे ॥३५ ॥

यों तो वे सबसे प्राचीन हैं, परन्तु जान पड़ते हैं ऐसे मानो पाँच - छः बरसके बच्चे हों । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1279

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वस्त्र भी नहीं पहनते । उन्हें साधारण बालक समझकर द्वारपालोंने उनको भीतर जानेसे रोक दिया ॥३६ ॥ इसपर वे क्रोधित - से हो गये और उन्होंने द्वारपालोंको यह शाप दिया कि

' मूर्खो! भगवान् विष्णुके चरण तो रजोगुण और तमोगुणसे रहित हैं । तुम दोनों इनके समीप निवास करनेयोग्य नहीं हो । इसलिये शीघ्र ही तुम यहाँसे पापमयी असुरयोनिमें जाओ ' ॥३७ ॥ उनके इस प्रकार शाप देते ही जब वे वैकुण्ठसे नीचे गिरने लगे, तब उन

कृपालु महात्माओंने कहा – ' अच्छा, तीन जन्मोंमें इस शापको भोगकर तुमलोग फिर इसी वैकुण्ठमें आ जाना ' ॥३८ ॥

युधिष्ठिर! वे ही दोनों दितिके पुत्र हुए । उनमें बड़ेका नाम हिरण्यकशिपु था और उससे छोटेका हिरण्याक्ष । दैत्य और दानवोंके समाजमें यही दोनों सर्वश्रेष्ठ थे ॥३९ ॥

विष्णुभगवान्ने नृसिंहका रूप धारण करके हिरण्यकशिपुको और पृथ्वीका उद्धार करनेके समय वराहावतार ग्रहण करके हिरण्याक्षको मारा ॥ ४० ॥

हिरण्यकशिपुः पुत्रं प्रह्लादं केशवप्रियम् ।

जिघांसुरकरोन्नाना यातना मृत्युहेतवे ॥४१

सर्वभूतात्मभूतं तं प्रशान्तं समदर्शनम् ।

भगवत्तेजसा स्पृष्टं नाशक्नोद्धन्तुमुद्यमैः ॥४२

ततस्तौ राक्षसौ जातौ केशिन्यां विश्रवःसुतौ ।

रावणः कुम्भकर्णश्च सर्वलोकोपतापनौ २ ॥४३

तत्रापि राघवो भूत्वा न्यहनच्छापमुक्तये ।

रामवीर्यं श्रोष्यसि त्वं मार्कण्डेयमुखात् प्रभो ॥४४

तावेव क्षत्रियौ जातौ मातृष्वस्रात्मजौ तव ।

अधुना शापनिर्मुक्तौ कृष्णचक्रहतांहसौ ॥ ४५

वैरानुबन्धतीव्रेण ध्यानेनाच्युतसात्मताम् ।

नीतौ पुनहरेः पार्श्वं जग्मतुर्विष्णुपार्षदौ ॥ ४६

युधिष्ठिर उवाच

विद्वेषो दयिते पुत्रे कथमासीन्महात्मनि ।

ब्रूहि मे भगवन्येन प्रह्रादस्याच्युतात्मता ॥४७

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पृष्ठ 1280

श्रीमद्भागवत महापुराण - १, पृष्ठ 1280 का मूल पृष्ठ
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हिरण्यकशिपुने अपने पुत्र प्रह्लादको भगवत्प्रेमी होनेके कारण मार डालना चाहा और इसके लिये उन्हें बहुत - सी यातनाएँ दीं ॥४१ ॥

परन्तु प्रह्लाद सर्वात्मा भगवान्‌के परम प्रिय हो चुके थे, समदर्शी हो चुके थे । उनके हृदयमें अटल शान्ति थी । भगवान्‌के प्रभावसे वे सुरक्षित थे । इसलिये तरह - तरहसे चेष्टा करनेपर भी हिरण्यकशिपु उनको मार डालनेमें समर्थ न हुआ ॥४२ ॥

युधिष्ठिर! वे ही दोनों विश्रवा मुनिके द्वारा केशिनी ( कैकसी ) - के गर्भसे राक्षसोंके रूपमें पैदा हुए । उनका नाम था रावण और कुम्भकर्ण । उनके उत्पातोंसे सब लोकोंमें आग - सी लग गयी थी ॥४३ ॥ उस समय भी भगवान्ने उन्हें शापसे छुड़ानेके लिये रामरूपसे उनका वध

किया । युधिष्ठिर! मार्कण्डेय मुनिके मुखसे तुम भगवान् श्रीरामका चरित्र सुनोगे ॥४४ ॥

वे ही दोनों जय - विजय इस जन्ममें तुम्हारी मौसीके लड़के शिशुपाल और दन्तवक्त्रके रूपमें क्षत्रियकुलमें उत्पन्न हुए थे । भगवान् श्रीकृष्णके चक्रका स्पर्श प्राप्त हो जानेसे उनके सारे पाप नष्ट हो गये और वे सनकादिके शापसे मुक्त हो गये ॥४५ ॥

वैरभावके कारण निरन्तर ही वे भगवान् श्रीकृष्णका चिन्तन किया करते थे । उसी तीव्र तन्मयताके फलस्वरूप वे भगवान्‌को प्राप्त हो गये और पुनः उनके पार्षद होकर उन्हींके समीप चले गये ॥४६ || युधिष्ठिरजीने पूछा— भगवन्! हिरण्यकशिपुने अपने स्नेहभाजन पुत्र प्रह्लादसे इतना द्वेष क्यों किया? फिर प्रह्लाद तो महात्मा थे । साथ ही यह भी बतलाइये कि किस साधनसे प्रह्लाद भगवन्मय हो गये ॥४७ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे प्रह्लादचरितोपक्रमे प्रथमोऽध्यायः ॥१ ॥

१. प्रा ० पा ० — पुनरात्मनः । २. प्रा ० पा ० — भूभृतः । १. प्रा ० पा ० — तं सर्वभूतसुहृदं प्रशा ० । २. प्रा ० पा ० — तापकौ । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******