श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 1261–1270

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1261–1270

पृष्ठ 1261

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एक वर्षतक तुम इसे बिना किसी त्रुटिके पालन कर सकोगी तो तुम्हारी कोखसे इन्द्रघाती पुत्र उत्पन्न होगा ॥५४ ॥

वाढमित्यभिप्रेत्याथ ' दिती राजन् महामनाः ।

काश्यपं गर्भमाधत्त व्रतं चाञ्जो दधार सा ॥५५

मातृष्वसुरभिप्रायमिन्द्र आज्ञाय मानद ।

शुश्रूषणेनाश्रमस्थां दितिं पर्यचरत्कविः ४ ॥५६

नित्यं वनात्सुमनसः फलमूलसमित्कुशान् ।

पत्राङ्कुरमृदोऽपश्च काले काल उपाहरत् ॥५७

एवं तस्या व्रतस्थाया व्रतच्छिद्रं हरिर्नृप ।

प्रेप्सुः पर्यचरज्जिह्मो मृगहेव मृगाकृतिः ॥५८

नाध्यगच्छद्व्रतच्छिद्रं तत्परोऽथ महीपते ।

चिन्तां तीव्रां गतः शक्रः केन मे स्याच्छिवं त्विह ॥५९

एकदा सा तु सन्ध्यायामुच्छिष्टा व्रतकर्शिता ।

अस्पृष्टवार्यधौताङ्घ्रिः सुष्वाप विधिमोहिता ॥ ६०

लब्ध्वा तदन्तरं शक्रो निद्रापहृतचेतसः ।

दितेः प्रविष्ट उदरं योगेशो योगमायया ॥ ६१

चकर्त सप्तधा गर्भं वज्रेण कनकप्रभम् ।

रुदन्तं सप्तधैकैकं मा रोदीरिति तान् पुनः ॥६२

परीक्षित्! दिति बड़ी मनस्विनी और दृढ़ निश्चयवाली थी । उसने ' बहुत ठीक ' कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार कर ली । अब दिति अपनी कोखमें भगवान् कश्यपका वीर्य और जीवनमें उनका बतलाया हुआ व्रत धारण करके अनायास ही नियमोंका पालन करने लगी ॥५५ ॥ प्रिय परीक्षित्! देवराज इन्द्र अपनी मौसी दितिका अभिप्राय जान बड़ी

बुद्धिमानीसे अपना वेष बदलकर दितिके आश्रमपर आये और उसकी सेवा करने लगे ॥५६ ॥ वे दितिके लिये प्रतिदिन समय - समयपर वनसे फूल - फल, कन्द - मूल, समिधा,

कुश, पत्ते, दूब, मिट्टी और जल लाकर उसकी सेवामें समर्पित करते ॥५७ ॥

राजन्! जिस प्रकार बहेलिया हरिनको मारनेके लिये हरिनकी - सी सूरत बनाकर उसके ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1262

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पास जाता है, वैसे ही देवराज इन्द्र भी कपटवेष धारण करके व्रतपरायणा दिति व्रतपालनकी त्रुटि पकड़नेके लिये उसकी सेवा करने लगे ॥ ५८ ॥ सर्वदा पैनी दृष्टि रखनेपर

भी उन्हें उसके व्रतमें किसी प्रकारकी त्रुटि न मिली और वे पूर्ववत् उसकी सेवा - टहलमें लगे रहे । अब तो इन्द्रको बड़ी चिन्ता हुई । वे सोचने लगे- मैं ऐसा कौन - सा उपाय करूँ, जिससे मेरा कल्याण हो? ॥५९ ॥

दिति व्रतके नियमों का पालन करते - करते बहुत दुर्बल हो गयी थी । विधाताने भी उसे मोहमें डाल दिया । इसलिये एक दिन सन्ध्याके समय जूठे मुँह, बिना आचमन किये और बिना पैर धोये ही वह सो गयी ॥ ६० ॥ योगेश्वर इन्द्रने देखा कि यह अच्छा अवसर हाथ लगा । वे

योगबलसे झटपट सोयी हुई दितिके गर्भमें प्रवेश कर गये ॥ ६१ ॥ उन्होंने वहाँ जाकर सोनेके

समान चमकते हुए गर्भके वज्रके द्वारा सात टुकड़े कर दिये । जब वह गर्भ रोने लगा, तब उन्होंने ‘ मत रो, मत रो ' यह कहकर सातों टुकड़ोंमेंसे एक - एकके और भी सात टुकड़े कर दिये ॥६२ ॥

ते तमूचुः पाट्यमानाः सर्वे प्राञ्जलयो नृप ।

नो जिघांससि किमिन्द्र भ्रातरो मरुतस्तव ॥६३

मा भैष्ट भ्रातरो मह्यं यूयमित्याह कौशिकः ।

अनन्यभावान् पार्षदानात्मनो मरुतां गणान् ॥६४

न ममार दितेर्गर्भः श्रीनिवासानुकम्पया ।

बहुधा कुलिशक्षुण्णो द्रौण्यस्त्रेण यथा भवान् ॥६५

सकृदिष्ट्वाऽऽदिपुरुषं पुरुषो याति साम्यताम् ।

संवत्सरं किञ्चिदूनं दित्या यद्धरिरर्चितः ॥ ६६

सजूरिन्द्रेण पञ्चाशद्देवास्ते मरुतोऽभवन् ।

व्यपोह्य मातृदोषं ते हरिणा सोमपाः कृताः ॥ ६७

दितिरुत्थाय ददृशे कुमाराननलप्रभान् ।

इन्द्रेण सहितान् देवी पर्यतुष्यदनिन्दिता ॥ ६८

अथेन्द्रमाह ताताहमादित्यानां भयावहम् ।

अपत्यमिच्छन्त्यचरं व्रतमेतत्सुदुष्करम् ॥ ६ ९

एकः सङ्कल्पितः पुत्रः सप्त सप्ताभवन् कथम् ।

यदि ते विदितं पुत्र सत्यं कथय मा मृषा ॥७०

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पृष्ठ 1263

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इन्द्र उवाच

अम्ब तेऽहं व्यवसितमुपधार्यागतोऽन्तिकम् ।

लब्धान्तरोऽच्छिदं गर्भमर्थबुद्धिर्न धर्मवित् ॥७१

राजन्! जब इन्द्र उनके टुकड़े - टुकड़े करने लगे, तब उन सबोंने हाथ जोड़कर इन्द्रसे कहा — ‘ देवराज! तुम हमें क्यों मार रहे हो? हम तो तुम्हारे भाई मरुद्गण हैं ' ॥६३ ॥ तब

इन्द्रने अपने भावी अनन्यप्रेमी पार्षद मरुद्गणसे कहा - ' अच्छी बात है, तुमलोग मेरे भाई हो । अब मत डरो! ' ॥६४ ॥ परीक्षित्! जैसे अश्वत्थामाके ब्रह्मास्त्रसे तुम्हारा कुछ भी अनिष्ट

नहीं हुआ, वैसे ही भगवान् श्रीहरिकी कृपासे दितिका वह गर्भ वज्रके द्वारा टुकड़े - टुकड़े होनेपर भी मरा नहीं ॥ ६५ ॥ इसमें तनिक भी आश्चर्यकी बात नहीं है । क्योंकि जो मनुष्य एक

बार भी आदि पुरुष भगवान् नारायणकी आराधना कर लेता है, वह उनकी समानता प्राप्त कर लेता है; फिर दितिने तो कुछ ही दिन कम एक वर्षतक भगवान्की आराधना की थी ॥६६ ॥ अब वे उनचास मरुद्गण इन्द्रके साथ मिलकर पचास हो गये । इन्द्रने भी सौतेली

माताके पुत्रोंके साथ शत्रुभाव न रखकर उन्हें सोमपायी देवता बना लिया ॥६७ ॥ जब

दितिकी आँख खुली, तब उसने देखा कि उसके अग्निके समान तेजस्वी उनचास बालक इन्द्रके साथ हैं । इससे सुन्दर स्वभाववाली दितिको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ६८ ॥ उसने इन्द्रको

सम्बोधन करके कहा - ' बेटा! मैं इस इच्छासे इस अत्यन्त कठिन व्रतका पालन कर रही थी कि तुम अदितिके पुत्रोंको भयभीत करनेवाला पुत्र उत्पन्न हो ॥६९ ॥

मैंने केवल एक ही पुत्रके लिये संकल्प किया था, फिर ये उनचास पुत्र कैसे हो गये? बेटा इन्द्र! यदि तुम्हें इसका रहस्य मालूम हो, तो सच - सच मुझे बतला दो । झूठ न बोलना ' ॥७० ॥

इन्द्रने कहा – माता! मुझे इस बातका पता चल गया था कि तुम किस उद्देश्यसे व्रत कर रही हो । इसीलिये अपना स्वार्थ सिद्ध करनेके उद्देश्यसे मैं स्वर्ग छोड़कर तुम्हारे पास आया । मेरे मनमें तनिक भी धर्मभावना नहीं थी । इसीसे तुम्हारे व्रतमें त्रुटि होते ही मैंने उस गर्भके टुकड़े - टुकड़े कर दिये ॥७१ ॥

कृत्तो मे सप्तधा गर्भ आसन् सप्त कुमारकाः ।

तेऽपि चैकैकशो वृक्णाः सप्तधा नापि मम्रिरे ॥७२

ततस्तत्परमाश्चर्यं वीक्ष्याध्यवसितं मया ।

महापुरुषपूजायाः सिद्धिः काप्यनुषङ्गिणी ॥७३

आराधनं भगवत ईहमाना निराशिषः ।

ये तु नेच्छन्त्यपि परं ते स्वार्थकुशलाः स्मृताः ॥७४

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पृष्ठ 1264

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आराध्यात्मप्रदं देवं स्वात्मानं जगदीश्वरम् ।

को वृणीते गुणस्पर्शं बुधः स्यान्नरकेऽपि यत् ॥७५

तदिदं मम दौर्जन्यं बालिशस्य महीयसि ।

क्षन्तुमर्हसि मातस्त्वं दिष्ट्या गर्भो मृतोत्थितः ॥७६

श्रीशुक उवाच

इन्द्रस्तयाभ्यनुज्ञातः शुद्धभावेन तुष्टया ।

मरुद्भिः सह तां नत्वा जगाम त्रिदिवं प्रभुः ॥७७

एवं ते सर्वमाख्यातं यन्मां त्वं परिपृच्छसि ।

मङ्गलं मरुतां जन्म किं भूयः कथयामि ते ॥७८

पहले मैंने उसके सात टुकड़े किये थे । तब वे सातों टुकड़े सात बालक बन गये । इसके बाद मैंने फिर एक - एकके सात - सात टुकड़े कर दिये । तब भी वे न मरे, बल्कि उनचास हो गये ॥७२ ॥

यह परम आश्चर्यमयी घटना देखकर मैंने ऐसा निश्चय किया कि परमपुरुष भगवान्की उपासनाकी यह कोई स्वाभाविक सिद्धि है ॥७३ ॥ जो लोग निष्कामभावसे भगवान्‌की

आराधना करते हैं और दूसरी वस्तुओंकी तो बात ही क्या, मोक्षकी भी इच्छा नहीं करते, वे ही अपने स्वार्थ और परमार्थमें निपुण हैं ॥७४ ॥

भगवान् जगदीश्वर सबके आराध्यदेव और अपने आत्मा ही हैं । वे प्रसन्न होकर अपने-आपतकका दान कर देते हैं । भला ऐसा कौन बुद्धिमान् है, जो उनकी आराधना करके

विषयभोगोंका वरदान माँगे । माताजी! ये विषयभोग तो नरकमें भी मिल सकते हैं ॥७५ ॥

मेरी स्नेहमयी जननी! तुम सब प्रकार मेरी पूज्या हो । मैंने मूर्खतावश बड़ी दुष्टताका काम किया है । तुम मेरे अपराधको क्षमा कर दो । यह बड़े सौभाग्यकी बात है कि तुम्हारा गर्भ खण्ड - खण्ड हो जानेसे एक प्रकार मर जानेपर भी फिरसे जीवित हो गया ॥७६ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! दिति देवराज इन्द्रके शुद्धभावसे सन्तुष्ट हो गयी । उससे आज्ञा लेकर देवराज इन्द्रने मरुद्गणोंके साथ उसे नमस्कार किया और स्वर्गमें चले गये ॥७७ ॥

राजन्! यह मरुद्गणका जन्म बड़ा ही मंगलमय है । इसके विषयमें तुमने मुझसे जो प्रश्न किया था, उसका उत्तर समग्ररूपसे मैंने तुम्हें दे दिया । अब तुम और क्या सुनना चाहते हो? ॥७८ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे मरुदुत्पत्तिकथनं ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1265

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नामाष्टादशोऽध्यायः ॥१८ ॥

१. प्रा ० पा ० — प्रह्लादं ह्लादमेव च । २. प्रा ० पा ० - सती । ३. प्रा ० पा०—२- सूर्यायां । १. प्रा ० पा ० — मर्थदृक् । २. प्रा ० पा ० - जयंस्तं निभृतेन तेजसा । १. प्रा ० पा ० — दोऽसि यदि ब्रह्म ० । २. प्रा ० पा ० — हतपुत्रा । १. प्रा ० पा ० — नार्द्रपादा । २. प्रा ० पा ० – नापराह्णे वै नग्ना च न च । १. प्रा ० पा ० — त्यभ्युपेत्या ० । २. प्रा ० पा ० – श्यपाद्गर्भ ० । ३. प्रा ० पा ० — राजन् । ४. प्रा ० पा ० — चरद्धरिः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1266

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अथैकोनविंशोऽध्यायः पुंसवन - व्रतकी विधि राजोवाच

व्रतं पुंसवनं ब्रह्मन् भवता यदुदीरितम् ।

तस्य वेदितुमिच्छामि येन विष्णुः प्रसीदति ॥१

श्रीशुक उवाच

शुक्ले मार्गशिरे पक्षे योषिद्भर्तुरनुज्ञया ।

आरभेत व्रतमिदं सार्वकामिकमादितः ॥२

निशम्य मरुतां जन्म ब्राह्मणाननुमन्त्र्य च ।

स्नात्वा शुक्लदती शुक्ले वसीतालङ्कृताम्बरे ।

पूजयेत्प्रातराशात्प्राग्भगवन्तं श्रिया सह ॥३

अलं ते निरपेक्षाय पूर्णकाम नमोऽस्तु ते ।

महाविभूतिपतये नमः सकलसिद्धये ॥४

यथा त्वं कृपया भूत्या तेजसा महिनौजसा ।

जुष्ट ईश गुणैः सर्वैस्ततोऽसि भगवान् प्रभुः ॥५

विष्णुपत्नि महामाये महापुरुषलक्षणे ।

प्रीयेथा मे महाभागे लोकमातर्नमोऽस्तु ते ॥६

ॐ नमो भगवते महापुरुषाय महानुभावाय महाविभूतिपतये सह महाविभूतिभिर्बलिमुप - हराणीति अनेनाहरहर्मन्त्रेण विष्णोरावाहनार्घ्यपाद्योपस्पर्शनस्नानवासउपवीतविभूषणगन्धपुष्पधूपदीपोपहाराद्युपच समाहित उपाहरेत् ॥७ ॥

राजा परीक्षित्ने पूछा— भगवन्! आपने अभी - अभी पुंसवन - व्रतका वर्णन किया है और कहा है कि उससे भगवान् विष्णु प्रसन्न हो जाते हैं । सो अब मैं उसकी विधि जानना चाहता हूँ॥१ ॥

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पृष्ठ 1267

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श्रीशुकदेवजीने कहा — परीक्षित्! यह पुंसवनव्रत समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है । स्त्रीको चाहिये कि वह अपने पतिदेवकी आज्ञा लेकर मार्गशीर्ष शुक्ल प्रतिपदासे इसका आरम्भ करे ॥२ ॥ पहले मरुद्गणके जन्मकी कथा सुनकर ब्राह्मणोंसे आज्ञा ले । फिर

प्रतिदिन सबेरे दाँतुन आदिसे दाँत साफ करके स्नान करे, दो श्वेत वस्त्र धारण करे और आभूषण भी पहन ले । प्रातःकाल कुछ भी खानेसे पहले ही भगवान् लक्ष्मी - नारायणकी पूजा करे ॥३ ॥ ( इस प्रकार प्रार्थना करे – ) ' प्रभो! आप पूर्णकाम हैं । अतएव आपको किसीसे भी

कुछ लेना - देना नहीं है । आप समस्त विभूतियोंके स्वामी और सकल - सिद्धिस्वरूप हैं । मैं आपको बार - बार नमस्कार करती हूँ ॥४ ॥ मेरे आराध्यदेव! आप कृपा, विभूति, तेज, महिमा

और वीर्य आदि समस्त गुणोंसे नित्ययुक्त हैं । इन्हीं भगों - ऐश्वर्योंसे नित्ययुक्त रहनेके कारण आपको भगवान् कहते हैं । आप सर्वशक्तिमान् हैं ॥ ५ ॥ माता लक्ष्मीजी! आप भगवान्की

अर्द्धांगिनी और महामाया -स्वरूपिणी हैं । भगवान्‌के सारे गुण आपमें निवास करते हैं ।

महाभाग्यवती जगन्माता! आप मुझपर प्रसन्न हों । मैं आपको नमस्कार करती हूँ ' ॥६ ॥

परीक्षित्! इस प्रकार स्तुति करके एकाग्रचित्तसे ' ॐ नमो भगवते महापुरुषाय महानुभावाय महाविभूतिपतये सह महाविभूतिभिर्बलिमुपहराणि । ’ ‘ ओंकारस्वरूप, महानुभाव, समस्त महाविभूतियोंके स्वामी भगवान् पुरुषोत्तमको और उनकी महाविभूतियोंको मैं नमस्कार करती हूँ और उन्हें पूजोपहारकी सामग्री समर्पण करती हूँ '. -इस मन्त्रके द्वारा प्रतिदिन स्थिर चित्तसे विष्णुभगवान्‌का आवाहन, अर्घ्य, पाद्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, यज्ञोपवीत, आभूषण, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य आदि निवेदन करके पूजन करे ॥७ ॥

हविःशेषं तु जुहुयादनले द्वादशाहुतीः ।

ॐ नमो भगवते महापुरुषाय महाविभूतिपतये स्वाहेति ॥८

श्रियं विष्णुं च वरदावाशिषां प्रभवावुभौ ।

भक्त्या सम्पूजयेन्नित्यं यदीच्छेत्सर्वसम्पदः ॥९

प्रणमेद्दण्डवद्भूमौ भक्तिप्रह्वेण चेतसा ।

दशवारं जपेन्मन्त्रं ततः स्तोत्रमुदीरयेत् ॥१०

युवां तु विश्वस्य विभू जगतः कारणं परम् ।

इयं हि प्रकृतिः सूक्ष्मा मायाशक्तिर्दुरत्यया ॥११

तस्या अधीश्वरः साक्षात्त्वमेव पुरुषः परः ।

त्वं सर्वयज्ञ इज्येयं क्रियेयं फलभुग्भवान् ॥१२

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पृष्ठ 1268

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गुणव्यक्तिरियं देवी व्यञ्जको गुणभुग्भवान् ।

त्वं हि सर्वशरीर्यात्मा श्रीः शरीरेन्द्रियाशया ।

नामरूपे भगवती प्रत्ययस्त्वमपाश्रयः ॥१३

यथा युवां त्रिलोकस्य वरदौ परमेष्ठिनौ ।

तथा म उत्तमश्लोक सन्तु सत्या महाशिषः ॥ १४

जो नैवेद्य बच रहे, उससे ' ॐ नमो भगवते महापुरुषाय महाविभूतिपतये स्वाहा । ' ‘ महान् ऐश्वर्योंके अधिपति भगवान् पुरुषोत्तमको नमस्कार है । मैं उन्हींके लिये इस हविष्यका हवन कर रही हूँ । ' – यह मन्त्र बोलकर अग्निमें बारह आहुतियाँ दे ॥८ ॥

परीक्षित्! जो सब प्रकारकी सम्पत्तियोंको प्राप्त करना चाहता हो, उसे चाहिये कि प्रतिदिन भक्तिभावसे भगवान् लक्ष्मीनारायणकी पूजा करे; क्योंकि वे ही दोनों समस्त अभिलाषाओंके पूर्ण करनेवाले एवं श्रेष्ठ वरदानी हैं ॥९ ॥

इसके बाद भक्तिभावसे भरकर बड़ी नम्रतासे भगवान्‌को साष्टांग दण्डवत् करे । दस बार पूर्वोक्त मन्त्रका जप करे और फिर इस स्तोत्रका पाठ करे – ॥१० ॥

‘ हे लक्ष्मीनारायण! आप दोनों सर्वव्यापक और सम्पूर्ण चराचर जगत्के अन्तिम कारण -आपका और कोई कारण नहीं है । भगवन्! माता लक्ष्मीजी आपकी मायाशक्ति हैं । ये ही

स्वयं अव्यक्त प्रकृति भी हैं । इनका पार पाना अत्यन्त कठिन है ॥११ ॥

प्रभो! आप ही इन महामायाके अधीश्वर हैं और आप ही स्वयं परमपुरुष हैं । आप समस्त यज्ञ हैं और ये हैं यज्ञ - क्रिया । आप फलके भोक्ता हैं और ये हैं उसको उत्पन्न करनेवाली क्रिया ॥१२ ॥

माता लक्ष्मीजी तीनों गुणोंकी अभिव्यक्ति हैं और आप उन्हें व्यक्त करनेवाले और उनके भोक्ता हैं । आप समस्त प्राणियोंके आत्मा हैं और लक्ष्मीजी शरीर, इन्द्रिय और अन्तःकरण हैं । माता लक्ष्मीजी नाम एवं रूप हैं और आप नाम - रूप दोनोंके प्रकाशक तथा आधार हैं ॥१३ ॥

प्रभो! आपकी कीर्ति पवित्र है । आप दोनों ही त्रिलोकीके वरदानी परमेश्वर हैं । अतः मेरी बड़ी - बड़ी आशा - अभिलाषाएँ आपकी कृपासे पूर्ण हों ' ॥१४ ॥

इत्यभिष्ट्रय वरदं श्रीनिवासं श्रिया सह ।

तन्निःसार्योपहरणं दत्त्वाऽऽचमनमर्चयेत् ॥१५

ततः स्तुवीत स्तोत्रेण भक्तिप्रह्वेण चेतसा ।

यज्ञोच्छिष्टमवघ्राय पुनरभ्यर्चयेद्धरिम् ॥१६

पतिं च परया भक्त्या महापुरुषचेतसा ।

प्रियैस्तैस्तैरुपनमेत् प्रेमशीलः स्वयं पतिः ।

बिभृयात् सर्वकर्माणि पत्न्या उच्चावचानि च ॥१७

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पृष्ठ 1269

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कृतमेकतरेणापि दम्पत्योरुभयोरपि ।

पत्न्यां कुर्यादनर्हायां पतिरेतत् समाहितः ॥१८

विष्णोर्व्रतमिदं बिभ्रन्न विहन्यात् कथञ्चन ।

विप्रान् स्त्रियो वीरवतीः स्रग्गन्धबलिमण्डनैः ।

अर्चेदहरहर्भक्त्या देवं नियममास्थितः ॥१९

उद्वास्य देवं स्वे धाम्नि तन्निवेदितमग्रतः ।

अद्यादात्मविशुद्ध्यर्थं सर्वकामर्द्धये तथा ॥२०

एतेन पूजाविधिना मासान् द्वादश हायनम् ।

नीत्वाथोपचरेत्साध्वी कार्तिके चरमेऽहनि ॥२१

श्वोभूतेऽप उपस्पृश्य कृष्णमभ्यर्च्य पूर्ववत् ।

पयःशृतेन जुहुयाच्चरुणा सह सर्पिषा ।

पाकयज्ञविधानेन द्वादशैवाहुतीः पतिः ॥२२

आशिषः शिरसाऽऽदाय द्विजैः प्रीतैः समीरिताः ।

प्रणम्य शिरसा भक्त्या भुञ्जीत तदनुज्ञया ॥२३

परीक्षित्! इस प्रकार परम वरदानी भगवान् लक्ष्मी - नारायणकी स्तुति करके वहाँसे नैवेद्य हटा दे और आचमन कराके पूजा करे ॥ १५ ॥ तदनन्तर भक्तिभावभरित हृदयसे

भगवान्‌की स्तुति करे और यज्ञावशेषको सूँघकर फिर भगवान्‌की पूजा करे ॥१६ ॥

भगवान्की पूजाके बाद अपने पतिको साक्षात् भगवान् समझकर परम प्रेमसे उनकी प्रिय वस्तुएँ सेवामें उपस्थित करे । पतिका भी यह कर्तव्य है कि वह आन्तरिक प्रेमसे अपनी पत्नीके प्रिय पदार्थ ला- लाकर उसे दे और उसके छोटे - बड़े सब प्रकारके काम करता रहे ॥१७ ॥ परीक्षित्! पति - पत्नीमेंसे एक भी कोई काम करता है, तो उसका फल दोनोंको

होता है । इसलिये यदि पत्नी ( रजोधर्म आदिके समय ) यह व्रत करनेके अयोग्य हो जाय तो बड़ी एकाग्रता और सावधानीसे पतिको ही इसका अनुष्ठान करना चाहिये || १८ || यह भगवान् विष्णुका व्रत है । इसका नियम लेकर बीचमें कभी नहीं छोड़ना चाहिये । जो भी यह नियम ग्रहण करे, वह प्रतिदिन माला, चन्दन, नैवेद्य और आभूषण आदिसे भक्तिपूर्वक ब्राह्मण और सुहागिनी स्त्रियोंका पूजन करे तथा भगवान् विष्णुकी भी पूजा करे ॥१९ ॥

इसके बाद भगवान्को उनके धाममें पधरा दे, विसर्जन कर दे । तदनन्तर आत्म - शुद्धि और समस्त अभिलाषाओंकी पूर्तिके लिये पहलेसे ही उन्हें निवेदित किया हुआ प्रसाद ग्रहण करे ॥२० ॥

साध्वी स्त्री इस विधिसे बारह महीनोंतक - पूरे सालभर इस व्रतका आचरण करके मार्गशीर्षकी अमावास्याको उद्यापनसम्बन्धी उपवास और पूजन आदि करे ॥२१ ॥ उस दिन

प्रातःकाल ही स्नान करके पूर्ववत् विष्णुभगवान्‌का पूजन करे और उसका पति पाकयज्ञकी ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1270

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विधिसे घृतमिश्रित खीरकी अग्निमें बारह आहुति दे ॥२२ ॥

इसके बाद जब ब्राह्मण प्रसन्न होकर उसे आशीर्वाद दें, तो बड़े आदरसे सिर झुकाकर उन्हें स्वीकार करे । भक्तिभावसे माथा टेककर उनके चरणोंमें प्रणाम करे और उनकी आज्ञा लेकर भोजन करे ॥२३ ॥

आचार्यमग्रतः कृत्वा वाग्यतः सह बन्धुभिः ।

दद्यात्पत्न्यै चरोः शेषं सुप्रजस्त्वं सुसौभगम् ॥२४

एतच्चरित्वा विधिवदद्व्रतं विभो-रभीप्सितार्थं लभते पुमानिह । स्त्री त्वेतदास्थाय लभेत सौभगं श्रियं प्रजां जीवपतिं यशो गृहम् ॥२५ कन्या च विन्देत समग्रलक्षणं वरं त्ववीरा हतकिल्बिषा गतिम् । मृतप्रजा जीवसुता धनेश्वरी सुदुर्भगा सुभगा रूपमग्रयम् ॥२६ विन्देद् विरूपा विरुजा विमुच्यते

य आमयावीन्द्रियकल्पदेहम् ।

एतत्पठन्नभ्युदये च कर्म-ण्यनन्ततृप्तिः पितृदेवतानाम् ॥२७

तुष्टाः प्रयच्छन्ति समस्तकामान् होमावसाने हुतभुक् श्रीर्हरिश्च । राजन् महन्मरुतां जन्म पुण्यं दितेर्व्रतं चाभिहितं महत्ते ॥ २८ पहले आचार्यको भोजन कराये, फिर मौन होकर भाई - बन्धुओंके साथ स्वयं भोजन करे । इसके बाद हवनसे बची हुई घृतमिश्रित खीर अपनी पत्नीको दे । वह प्रसाद स्त्रीको सत्पुत्र और सौभाग्य दान करनेवाला होता है ॥२४ ॥

परीक्षित्! भगवान्के इस पुंसवन - व्रतका जो मनुष्य विधिपूर्वक अनुष्ठान करता है, उसे यहीं उसकी मनचाही वस्तु मिल जाती है । स्त्री इस व्रतका पालन करके सौभाग्य, सम्पत्ति, सन्तान, यश और गृह प्राप्त करती है तथा उसका पति चिरायु हो जाता है ॥२५ ॥ इस व्रतका

अनुष्ठान करनेवाली कन्या समस्त शुभ लक्षणोंसे युक्त पति प्राप्त करती है और विधवा इस व्रतसे निष्पाप होकर वैकुण्ठमें जाती है । जिसके बच्चे मर जाते हों, वह स्त्री इसके प्रभावसे ****** ebook converter DEMO Watermarks *******