श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 1321–1330
श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1321–1330
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पुरुषको अपने कल्याणके लिये प्रयत्न कर लेना चाहिये ॥५ ॥
पुंसो वर्षशतं ह्यायुस्तदर्धं चाजितात्मनः ।
निष्फलं यदसौ रात्र्यां शेतेऽन्धं प्रापितस्तमः ॥६
मुग्धस्य बाल्ये कौमारे क्रीडतो याति विंशतिः ।
जरया ग्रस्तदेहस्य यात्यकल्पस्य विंशतिः ॥७
दुरापूरेण कामेन मोहेन च बलीयसा ।
शेषं गृहेषु सक्तस्य प्रमत्तस्यापयाति हि ॥८
को गृहेषु पुमान्सक्तमात्मानमजितेन्द्रियः ।
स्नेहपाशैर्दृढैर्बद्धमुत्सहेत विमोचितुम् ॥ ९
कोन्वर्थतृष्णां विसृजेत् प्राणेभ्योऽपि य ईप्सितः ।
यं क्रीणात्यसुभिः प्रेष्ठैस्तस्करः सेवको वणिक् ॥१०
कथं प्रियाया अनुकम्पितायाः सङ्गं रहस्यं रुचिरांश्च मन्त्रान् । सुहृत्सु च स्नेहसितः शिशूनां कलाक्षराणामनुरक्तचित्तः ॥११ मनुष्यकी पूरी आयु सौ वर्षकी है । जिन्होंने अपनी इन्द्रियोंको वशमें नहीं कर लिया है, उनकी आयुका आधा हिस्सा तो यों ही बीत जाता है । क्योंकि वे रातमें घोर तमोगुण – अज्ञानसे ग्रस्त होकर सोते रहते हैं ॥ ६ ॥
बचपनमें उन्हें अपने हित - अहितका ज्ञान नहीं रहता, कुछ बड़े होनेपर कुमार अवस्थामें वे खेल - कूदमें लग जाते हैं । इस प्रकार बीस वर्षका तो पता ही नहीं चलता । जब बुढ़ापा शरीरको ग्रस लेता है, तब अन्तके बीस वर्षोंमें कुछ करने धरनेकी शक्ति ही नहीं रह जाती ॥७ ॥
रह गयी बीचकी कुछ थोड़ी - सी आयु । उसमें कभी न पूरी होनेवाली बड़ी - बड़ी कामनाएँ हैं, बलात् पकड़ रखनेवाला मोह है और घर- र- द्वारकी वह आसक्ति है, जिससे जीव इतना उलझ जाता है कि उसे कुछ कर्तव्य - अकर्तव्यका ज्ञान ही नहीं रहता । इस प्रकार बची - खुची आयु भी हाथसे निकल जाती है ॥ ८ ॥
दैत्यबालको! जिसकी इन्द्रियाँ वशमें नहीं हैं, ऐसा कौन - सा पुरुष होगा, जो घर-गृहस्थीमें आसक्त और माया - ममताकी मजबूत फाँसीमें फँसे हुए अपने - आपको उससे ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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छुड़ानेका साहस कर सके ॥९ ॥
जिसे चोर, सेवक एवं व्यापारी अपने अत्यन्त प्यारे प्राणोंकी भी बाजी लगाकर संग्रह करते हैं और इसलिये उन्हें जो प्राणोंसे भी अधिक वांछनीय है — उस धनकी तृष्णाको भला कौन त्याग सकता है ॥१० ॥
जो अपनी प्रियतमा पत्नीके एकान्त सहवास, उसकी प्रेमभरी बातों और मीठी-मीठी सलाहपर अपनेको निछावर कर चुका है, भाई - बन्धु और मित्रोंके स्नेह - पाशमें बँध चुका है और नन्हें - नन्हें शिशुओंकी तोतली बोलीपर लुभा चुका है - भला, वह उन्हें कैसे छोड़ सकता है ॥११ ॥
पुत्रान्स्मरंस्ता दुहितृर्हृदय्या ' भ्रातॄन् स्वसृर्वा पितरौ च दीनौ । गृहान् मनोज्ञोरुपरिच्छदांश्च वृत्तीश्च कुल्याः पशुभृत्यवर्गान् ॥१२ त्यजेत कोशस्कृदिवेहमानः कर्माणि लोभादवितृप्तकामः । औपस्थ्यजैह्वयं बहु मन्यमानः कथं विरज्येत दुरन्तमोहः ॥१३ कुटुम्बपोषाय वियन् निजायु-र्न बुध्यतेऽर्थं विहतं प्रमत्तः । सर्वत्र तापत्रयदुःखितात्मा निर्विद्यते न स्वकुटुम्बरामः ॥१४ वित्तेषु नित्याभिनिविष्टचेता
विद्वांश्च दोषं परवित्तहर्तुः ।
प्रेत्येह चाथाप्यजितेन्द्रियस्त-दशान्तकामो हरते कुटुम्बी ॥१५
विद्वानपीत्थं दनुजाः कुटुम्बं
पुष्णन्स्वलोकाय न कल्पते वै ।
यः स्वीयपारक्यविभिन्नभाव-स्तमः प्रपद्येत यथा विमूढः ॥१६
जो अपनी ससुराल गयी हुई प्रिय पुत्रियों, पुत्रों, भाई - बहिनों और दीन अवस्थाको ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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प्राप्त पिता - माता, बहुत - सी सुन्दर - सुन्दर बहुमूल्य सामग्रियोंसे सजे हुए घरों, कुलपरम्परागत जीविकाके साधनों तथा पशुओं और सेवकोंके निरन्तर स्मरणमें रम गया है, वह भला - उन्हें कैसे छोड़ सकता है ॥१२ ॥ जो जननेन्द्रिय और रसनेन्द्रियके
सुखोंको ही सर्वस्व मान बैठा है, जिसकी भोगवासनाएँ कभी तृप्त नहीं होतीं, जो लोभवश कर्म - पर - कर्म करता हुआ रेशमके कीड़ेकी तरह अपनेको और भी कड़े बन्धनमें जकड़ता जा रहा है और जिसके मोहकी कोई सीमा नहीं है — वह उनसे किस प्रकार विरक्त हो सकता है और कैसे उनका त्याग कर सकता है ॥१३ ॥ यह मेरा
कुटुम्ब है, इस भावसे उसमें वह इतना रम जाता है कि उसीके पालन - पोषणके लिये अपनी अमूल्य आयुको गवाँ देता है और उसे यह भी नहीं जान पड़ता कि मेरे जीवनका वास्तविक उद्देश्य नष्ट हो रहा है । भला, इस प्रमादकी भी कोई सीमा है । यदि इन कामोंमें कुछ सुख मिले तो भी एक बात है; परन्तु यहाँ तो जहाँ - जहाँ वह जाता है, वहीं - वहीं दैहिक, दैविक और भौतिक ताप उसके हृदयको जलाते ही रहते हैं । फिर भी वैराग्यका उदय नहीं होता । कितनी विडम्बना है । कुटुम्बकी ममताके फेरमें पड़कर वह इतना असावधान हो जाता है, उसका मन धनके चिन्तनमें सदा इतना लवलीन रहता है कि वह दूसरेका धन चुरानेके लौकिक - पारलौकिक दोषोंको जानता हुआ भी कामनाओंको वशमें न कर सकनेके कारण इन्द्रियोंके भोगकी लालसासे चोरी कर ही बैठता है ॥१४-१५ ॥ भाइयो! जो इस प्रकार अपने कुटुम्बियोंके पेट पालनेमें ही लगा रहता है— कभी भगवद्भजन नहीं करता - वह विद्वान् हो, तो भी उसे परमात्माकी प्राप्ति नहीं हो सकती । क्योंकि अपने - परायेका भेद - भाव रहनेके कारण उसे भी अज्ञानियोंके समान ही तमः प्रधान गति प्राप्त होती है ॥ १६ ॥
यतो न कश्चित् क्व च कुत्रचिद् वा
दीनः स्वमात्मानमलं समर्थः ।
विमोचितुं कामदृशां विहार-क्रीडामृगो यन्निगडो विसर्गः ॥१७
ततो विदूरात् परिहृत्य दैत्या दैत्येषु सङ्ग विषयात्मकेषु । उपेत नारायणमादिदेवं स ' मुक्तसङ्गैरिषितोऽपवर्गः ॥१८
नाच्युतं प्रीणयतो बह्वायासोऽसुरात्मजाः ।
आत्मत्वात् सर्वभूतानां सिद्धत्वादिह सर्वतः ॥ १ ९
परावरेषु भूतेषु ब्रह्मान्तस्थावरादिषु । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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भौतिकेषु विकारेषु भूतेष्वथ ' महत्सु च ॥२०
गुणेषु गुणसाम्ये च गुणव्यतिकरे तथा ।
एक एव परो ह्यात्मा भगवानीश्वरोऽव्ययः ॥२१
प्रत्यगात्मस्वरूपेण दृश्यरूपेण च स्वयम् ।
व्याप्यव्यापकनिर्देश्यो ह्यनिर्देश्योऽविकल्पितः ॥२२
केवलानुभवानन्दस्वरूपः परमेश्वरः ।
माययान्तर्हितैश्वर्य ईयते गुणसर्गया ॥२३
तस्मात् सर्वेषु भूतेषु दयां कुरुत सौहृदम् ।
आसुरं भावमुन्मुच्य यया तुष्यत्यधोक्षजः ॥२४
जो कामिनियोंके मनोरंजनका सामान — - उनका क्रीडामृग बन रहा है और जिसने अपने पैरोंमें सन्तानकी बेड़ी जकड़ ली है, वह बेचारा गरीब - चाहे कोई भी हो, कहीं भी हो - किसी भी प्रकारसे अपना उद्धार नहीं कर सकता ॥१७ ॥ इसलिये भाइयो!
तुमलोग विषयासक्त दैत्योंका संग दूरसे ही छोड़ दो और आदिदेव भगवान् नारायणकी शरण ग्रहण करो! क्योंकि जिन्होंने संसारकी आसक्ति छोड़ दी है, उन महात्माओंके वे ही परम प्रियतम और परम गति हैं ॥१८ ॥
मित्रो! भगवान्को प्रसन्न करनेके लिये कोई बहुत परिश्रम या प्रयत्न नहीं करना पड़ता । क्योंकि वे समस्त प्राणियोंके आत्मा हैं और सर्वत्र सबकी सत्ताके रूपमें स्वयंसिद्ध वस्तु हैं ॥१९ ॥
ब्रह्मासे लेकर तिनकेतक छोटे - बड़े समस्त प्राणियोंमें, पंचभूतोंसे बनी हुई वस्तुओंमें, पंचभूतोंमें, सूक्ष्म तन्मात्राओंमें, महत्तत्त्वमें तीनों गुणोंमें और गुणोंकी साम्यावस्था प्रकृतिमें एक ही अविनाशी परमात्मा विराजमान हैं । वे ही समस्त सौन्दर्य, माधुर्य और ऐश्वर्योंकी खान हैं ॥२०-२१ ॥ वे ही अन्तर्यामी द्रष्टाके रूपमें हैं और वे ही दृश्य जगत्के रूपमें भी हैं । सर्वथा अनिर्वचनीय तथा विकल्परहित होनेपर भी द्रष्टा और दृश्य, व्याप्य और व्यापकके
रूपमें उनका निर्वचन किया जाता है । वस्तुतः उनमें एक भी विकल्प नहीं है ॥२२ ॥
वे केवल अनुभवस्वरूप, आनन्दस्वरूप एकमात्र परमेश्वर ही हैं । गुणमयी सृष्टि करनेवाली मायाके द्वारा ही उनका ऐश्वर्य छिप रहा है । इसके निवृत्त होते ही उनके दर्शन हो जाते हैं ॥२३ ॥
इसलिये तुमलोग अपने दैत्यपनेका, आसुरी सम्पत्तिका त्याग करके समस्त ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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प्राणियोंपर दया करो । प्रेमसे उनकी भलाई करो । इसीसे भगवान् प्रसन्न होते हैं ॥२४ ॥
तुष्टे च तत्र किमलभ्यमनन्त आद्ये किं तैर्गुणव्यतिकरादिह ये स्वसिद्धाः । धर्मादयः किमगुणेन च काङ्क्षितेन सारंजुषां चरणयोरुपगायतां नः ॥२५ धर्मार्थकाम इति योऽभिहितस्त्रिवर्ग ईक्षा त्रयी नयदमौ विविधा च वार्ता । मन्ये तदेतदखिलं निगमस्य सत्यं स्वात्मार्पणं स्वसुहृदः परमस्य पुंसः ॥२६ ज्ञानं तदेतदमलं दुरवापमाह नारायणो नरसखः किल नारदाय । एकान्तिनां भगवतस्तदकिञ्चनानां पादारविन्दरजसाऽऽप्लुतदेहिनां स्यात् ॥२७
श्रुतमेतन्मया पूर्वं ज्ञानं विज्ञानसंयुतम् ।
धर्मं भागवतं शुद्धं नारदाद् देवदर्शनात् ॥२८
दैत्यपुत्रा ऊचुः
प्रह्लाद त्वं वयं चापि नर्तेऽन्यं विद्महे गुरुम् ।
एताभ्यां गुरुपुत्राभ्यां बालानामपि हीश्वरौ ॥२९
बालस्यान्तःपुरस्थस्य महत्सङ्गो दुरन्वयः ।
छिन्धि नः संशयं सौम्य स्याच्चेद्विश्रम्भकारणम् ॥३०
आदिनारायण अनन्तभगवान्के प्रसन्न हो जानेपर ऐसी कौन - सी वस्तु है, जो नहीं मिल जाती? लोक और परलोकके लिये जिन धर्म, अर्थ आदिकी आवश्यकता बतलायी जाती है — वे तो गुणोंके परिणामसे बिना प्रयासके स्वयं ही मिलनेवाले हैं । जब हम श्रीभगवान्के चरणामृतका सेवन करने और उनके नाम - गुणोंका कीर्तन करनेमें लगे हैं, तब हमें मोक्षकी भी क्या आवश्यकता है ॥२५ ॥ यों शास्त्रोंमें धर्म, अर्थ और काम—
इन तीनों पुरुषार्थोंका भी वर्णन है । आत्मविद्या, कर्मकाण्ड, न्याय ( तर्कशास्त्र ), दण्डनीति और जीविकाके विविध साधन- ये सभी वेदोंके प्रतिपाद्य विषय हैं; परन्तु यदि ये अपने परम हितैषी, परम पुरुष भगवान् श्रीहरिको आत्मसमर्पण करनेमें ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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सहायक हैं, तभी मैं इन्हें सत्य ( सार्थक ) मानता हूँ । अन्यथा ये सब - के - सब निरर्थक हैं ॥२६ ॥ यह निर्मल ज्ञान जो मैंने तुम लोगोंको बतलाया है, बड़ा ही दुर्लभ है । इसे
पहले नर - नारायणने नारदजीको उपदेश किया था और यह ज्ञान उन सब लोगोंको प्राप्त हो सकता है, जिन्होंने भगवान् के अनन्यप्रेमी एवं अकिंचन भक्तोंके चरणकमलोंकी धूलिसे अपने शरीरको नहला लिया है ॥ २७ ॥ यह विज्ञानसहित ज्ञान विशुद्ध
भागवतधर्म है । इसे मैंने भगवान्का दर्शन करानेवाले देवर्षि नारदजीके मुँहसे ही पहले-पहल सुना था ॥ २८ ॥
प्रह्लादजीके सहपाठियोंने पूछा - प्रह्लादजी! इन दोनों गुरुपुत्रोंको छोड़कर और किसी गुरुको तो न तुम जानते हो और न हम । ये ही हम सब बालकोंके शासक हैं ॥ २ ९ ॥ तुम एक तो अभी छोटी अवस्थाके हो और दूसरे जन्मसे ही महलमें अपनी माँके पास रहे हो । तुम्हारा महात्मा नारदजीसे मिलना कुछ असंगत - सा जान पड़ता है । प्रियवर! यदि इस विषयमें विश्वास दिलानेवाली कोई बात हो तो तुम उसे कहकर हमारी शंका मिटा दो || ३० || इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे प्रह्रादानुचरिते षष्ठोऽध्यायः ॥६ ॥
१. प्राचीन प्रतिमें प्रह्लादके वाक्यमें ' कौमार आचरेत्प्राज्ञो ' इस
श्लोकके पहले पाँच श्लोक और अधिक हैं । ये पाँच श्लोक भागवतके
विख्यात टीकाकार श्रीविजयध्वजजीने भी माने हैं और उन्होंने उनपर टीका भी लिखी है । प्राचीन प्रतिका लेख कहीं - कहीं अस्पष्ट और खण्डित होनेके कारण ये पाँच श्लोक शुद्ध रूपमें नहीं लिये जा सके, अतः उनको विजयध्वजकी टीकाके अनुसार शुद्ध करके यहाँ उद्धृत किया जा रहा है-हन्तार्भका मे शृणुत वचो वः सर्वतः शिवम् | वयस्यान् पश्यत मृतान् क्रीडान्धा मा प्रमाद्यथ ॥ न पुरा विवशं बाला आत्मनोऽर्थे प्रियैषिणः । गुरूक्तमपि न ग्राह्यं यदनर्थेऽर्थकल्पनम् ॥ यदुक्त्या न प्रबुद्धयेत सुप्तस्त्वज्ञाननिद्रया । न श्रद्दध्यान्मतं तस्य यथान्धो ह्यन्धनायकः ॥ कः शत्रुः क उदासीनः किं मित्रं चेह आत्मनः । भवत्स्वपि नयैः किं स्याद्दैवं सम्पद्विपत्पदम् ॥ यो न हिंस्याद्धर्मकाममात्मानं स्वजने वशः ****** ebook converter DEMO Watermarks ******* । पुनः
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श्रीलोकयोर्हेतुः स मुक्तान्ध्योऽतिदुर्लभः ॥ १. प्रा ० पा०— – दुहितृश्च स्वसृर्भातॄन् कलत्रान् पित ० । २. प्रा ० पा ० — यत्स्वी ० । १. प्रा ० पा ० — संमुक्त ० । २. प्रा ० पा ० – सूक्ष्मेषु च मह ० । ३. प्रा ० पा ० — यथा । ४. प्रा ० पा ० — कालरूपेण । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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अथ सप्तमोऽध्यायः प्रह्लादजीद्वारा माताके गर्भमें प्राप्त हुए नारदजीके उपदेशका वर्णन नारद उवाच
एवं दैत्यसुतैः पृष्टो महाभागवतोऽसुरः ।
उवाच स्मयमानस्तान्स्मरन् मदनुभाषितम् ॥१
प्रह्राद उवाच
पितरि प्रस्थितेऽस्माकं तपसे मन्दराचलम् ।
युद्धोद्यमं परं चक्रुर्विबुधा दानवान्प्रति ॥ २
पिपीलिकैरहिरिव दिष्ट्या लोकोपतापनः ।
पापेन पापोऽभक्षीति वादिनो वासवादयः ॥३
1 तेषामतिबलोद्योगं ” निशम्यासुरयूथपाः ।
वध्यमानाः सुरैर्भीता दुद्रुवुः सर्वतोदिशम् ॥४
कलत्रपुत्रमित्राप्तान्गृहान्पशुपरिच्छदान् ।
नावेक्षमाणास्त्वरिताः सर्वे प्राणपरीप्सवः ॥५
व्यलुम्पन् राजशिबिरममरा जयकाङ्क्षिणः २ इन्द्रस्तु राजमहिषीं मातरं मम चाग्रहीत् ॥ ६
नीयमानां भयोद्विग्नां रुदतीं कुररीमिव ।
यदृच्छयाऽऽगतस्तत्र देवर्षिर्ददृशे पथि ॥७
प्राह मैनां सुरपते नेतुमर्हस्यनागसम् ।
मुञ्च मुञ्च महाभाग सतीं परपरिग्रहम् ॥८
इन्द्र उवाच आस्तेऽस्या जठरे वीर्यमविषह्यं सुरद्विषः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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आस्यतां यावत्प्रसवं मोक्ष्येऽर्थपदवीं गतः ॥९ नारदजी कहते हैं — युधिष्ठिर! जब दैत्यबालकोंने इस प्रकार प्रश्न किया, तब भगवान्के परम प्रेमी भक्त प्रह्लादजीको मेरी बातका स्मरण हो आया । कुछ मुसकराते हुए उन्होंने उनसे कहा ॥१ ॥
प्रह्लादजीने कहा- जब हमारे पिताजी तपस्या करनेके लिये मन्दराचलपर चले गये, तब इन्द्रादि देवताओंने दानवोंसे युद्ध करनेका बहुत बड़ा उद्योग किया || २ || वे इस प्रकार कहने लगे कि जैसे चींटियाँ साँपको चाट जाती हैं, वैसे ही लोगोंको सतानेवाले पापी हिरण्यकशिपुको उसका पाप ही खा गया || ३ || जब दैत्य सेनापतियोंको देवताओंकी भारी तैयारीका पता चला, तब उनका साहस जाता रहा । वे उनका सामना नहीं कर सके । मार खाकर स्त्री, पुत्र, मित्र, गुरुजन, महल, पशु और साज - सामानकी कुछ भी चिन्ता न करके वे अपने प्राण बचानेके लिये बड़ी जल्दीमें सब - के - सब इधर - उधर भाग गये ॥४- ५ ॥ अपनी जीत चाहनेवाले देवताओंने राजमहलमें लूट - खसोट मचा दी | यहाँतक कि इन्द्रने राजरानी मेरी माता कयाधूको भी बन्दी बना लिया || ६ || मेरी मा भयसे घबराकर कुररी पक्षीकी भाँति रो रही थी और इन्द्र उसे बलात् लिये जा रहे थे । दैववश देवर्षि नारद उधर आ निकले और उन्होंने मार्गमें मेरी माको देख लिया ॥७ ॥ उन्होंने कहा – ' देवराज! यह निरपराध है । इसे ले
जाना उचित नहीं । महाभाग! इस सती - साध्वी परनारीका तिरस्कार मत करो । इसे छोड़ दो, तुरंत छोड़ दो! ' ॥८ ॥
इन्द्रने कहा — इसके पेटमें देवद्रोही हिरण्यकशिपुका अत्यन्त प्रभावशाली वीर्य है ।
प्रसवपर्यन्त यह मेरे पास रहे, बालक हो जानेपर उसे मारकर मैं इसे छोड़ दूँगा ॥९ ॥
नारद उवाच
अयं निष्किल्बिषः साक्षान्महाभागवतो महान् ।
त्वया न प्राप्स्यते संस्थामनन्तानुचरो बली ॥१०
इत्युक्तस्तां विहायेन्द्रो देवर्षेर्मानयन्वचः ।
अनन्तप्रियभक्त्यैनां परिक्रम्य दिवं ययौ ॥११
ततो नो मातरमृषिः समानीय निजाश्रमम् ।
आश्वास्येहोष्यतां वत्से यावत् ते भर्तुरागमः ॥ १२
तथेत्यवात्सीद् देवर्षेरन्ति साप्यकुतोभया ' ।
यावद् दैत्यपतिर्घोरात् तपसो न न्यवर्तत ॥१३
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ऋषिं पर्यचरत् तत्र भक्त्या परमया सती ।
अन्तर्वत्नी स्वगर्भस्य क्षेमायेच्छाप्रसूतये ॥ १४
ऋषिः कारुणिकस्तस्याः प्रादादुभयमीश्वरः ।
धर्मस्य तत्त्वं ज्ञानं च मामप्युद्दिश्य निर्मलम् ॥१५
तत्तु कालस्य दीर्घत्वात् स्त्रीत्वान्मातुस्तिरोदधे ।
ऋषिणानुगृहीतं मां नाधुनाप्यजहात् स्मृतिः ॥१६
भवतामपि भूयान्मे यदि श्रद्दधते वचः ।
वैशारदी धीः श्रद्धातः स्त्रीबालानां च मे यथा ॥१७
जन्माद्याः षडिमे भावा दृष्टा देहस्य नात्मनः ।
फलानामिव वृक्षस्य कालेनेश्वरमूर्तिना ॥१८
नारदजीने कहा — ‘ इसके गर्भमें भगवान्का साक्षात् परम प्रेमी भक्त और सेवक, अत्यन्त बली और निष्पाप महात्मा है । तुममें उसको मारनेकी शक्ति नहीं है ' ॥१० ॥ देवर्षि
नारदकी यह बात सुनकर उसका सम्मान करते हुए इन्द्रने मेरी माताको छोड़ दिया । और फिर इसके गर्भमें भगवद्भक्त है, इस भावसे उन्होंने मेरी माताकी प्रदक्षिणा की तथा अपने लोकमें चले गये ॥११ ॥
इसके बाद देवर्षि नारदजी मेरी माताको अपने आश्रमपर लिवा गये और उसे समझा-बुझाकर कहा कि — ' बेटी! जबतक तुम्हारा पति तपस्या करके लौटे, तबतक तुम यहीं रहो ’ ॥१२ ॥ ‘ जो आज्ञा ' कहकर वह निर्भयतासे देवर्षि नारदके आश्रमपर ही रहने लगी
और तबतक रही, जबतक मेरे पिता घोर तपस्यासे लौटकर नहीं आये || १३ || मेरी गर्भवती माता मुझ गर्भस्थ शिशुकी मंगलकामनासे और इच्छित समयपर ( अर्थात् मेरे पिताके लौटनेके बाद ) सन्तान उत्पन्न करनेकी कामनासे बड़े प्रेम तथा भक्तिके साथ नारदजीकी सेवा - श् -शुश्रूषा करती रही ॥१४ ॥
देवर्षि नारदजी बड़े दयालु और सर्वसमर्थ हैं । उन्होंने मेरी माँको भागवतधर्मका रहस्य और विशुद्ध ज्ञान — दोनोंका उपदेश किया । उपदेश करते समय उनकी दृष्टि मुझपर भी थी ॥१५ ॥ बहुत समय बीत जानेके कारण और स्त्री होनेके कारण भी मेरी माताको तो अब
उस ज्ञानकी स्मृति नहीं रही, परन्तु देवर्षिकी विशेष कृपा होनेके कारण मुझे उसकी विस्मृति नहीं हुई ॥ १६ ॥ यदि तुमलोग मेरी इस बातपर श्रद्धा करो तो तुम्हें भी वह ज्ञान हो सकता है ।
क्योंकि श्रद्धासे स्त्री और बालकोंकी बुद्धि भी मेरे ही समान शुद्ध हो सकती है ॥१७ ॥ जैसे
ईश्वरमूर्ति कालकी प्रेरणासे वृक्षोंके फल लगते, ठहरते, बढ़ते, पकते क्षीण होते और नष्ट हो जाते हैं — वैसे ही जन्म, अस्तित्वकी अनुभूति, वृद्धि, परिणाम, क्षय और विनाश — ये छः ****** ebook converter DEMO Watermarks *******