श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 1351–1360

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1351–1360

पृष्ठ 1351

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भवता हरे स वृजिनोऽवसादितो नरसिंह नाथ विभवाय नो भव ॥५५ विष्णुपार्षदा ऊचुः अद्यैतद्धरिनररूपमद्भुतं ते

दृष्टं नः शरणद सर्वलोकशर्म ।

सोऽयं ते विधिकर ईश विप्रशप्त-स्तस्येदं निधनमनुग्रहाय विद्मः ॥५६

वैतालिकोंने कहा — भगवन्! बड़ी - बड़ी सभाओं और ज्ञानयज्ञोंमें आपके निर्मल यशका गान करके हम बड़ी प्रतिष्ठा - पूजा प्राप्त करते थे । इस दुष्टने हमारी वह आजीविका ही नष्ट कर दी थी । बड़े सौभाग्यकी बात है कि महारोगके समान इस दुष्टको आपने जड़मूलसे उखाड़ दिया ॥५४ ॥

किन्नरोंने कहा — हम किन्नरगण आपके सेवक हैं । यह दैत्य हमसे बेगारमें ही काम लेता था । भगवन्! आपने कृपा करके आज इस पापीको नष्ट कर दिया । प्रभो! आप इसी प्रकार हमारा अभ्युदय करते रहें ॥५५ ॥

भगवान्के पार्षदोंने कहा- शरणागतवत्सल! सम्पूर्ण लोकोंको शान्ति प्रदान करनेवाला आपका यह अलौकिक नृसिंहरूप हमने आज ही देखा है । भगवन् । यह दैत्य आपका वही आज्ञाकारी सेवक था, जिसे सनकादिने शाप दे दिया था । हम समझते हैं, आपने कृपा करके इसके उद्धारके लिये ही इसका वध किया है ॥५६ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे प्रह्रादानुचरिते दैत्यराजवधे नृसिंहस्तवो नामाष्टमोऽध्यायः ॥८ ॥

१. प्रा ० पा ० - सोऽतिक्रमन् । २. प्रा ० पा ० – सुस्तत्र । १. प्रा ० पा ० – वंश्चभ्य ० । १. प्रा ० पा ० — हामनाः । २. प्रा ० पा ० – खरकेसरोल्बणो । १. प्रा ० पा ० — पि तिलाम्बुमिश्रम् । २. प्रा ० पा ० — नुरुद्धां । १. प्रा ० पा ० — एव । २. प्रा ० पा ० - रिह च दिति ० । ३. प्रा ० पा ० - भिः सदा । १. प्रा ० पा ० – पारिषदा । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1352

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पृष्ठ 1353

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अथ नवमोऽध्यायः प्रह्लादजीके द्वारा नृसिंहभगवान्की स्तुति नारद उवाच

एवं सुरादयः सर्वे ब्रह्मरुद्रपुरःसराः ।

नोपैतुमशकन्मन्यूसंरम्भं सुदुरासदम् ॥१

साक्षाच्छ्रीः प्रेषिता देवैर्दृष्ट्वा तन्महदद्भुतम् ।

अदृष्टाश्रुतपूर्वत्वात् सा नोपेयाय शङ्किता ॥२

नारदजी कहते हैं — इस प्रकार ब्रह्मा, शंकर आदि सभी देवगण नृसिंहभगवान्के क्रोधावेशको शान्त न कर सके और न उनके पास जा सके । किसीको उसका ओर - छोर नहीं दीखता था ॥१ ॥

देवताओंने उन्हें शान्त करनेके लिये स्वयं लक्ष्मीजीको भेजा । उन्होंने जाकर जब नृसिंहभगवान्का वह महान् अद्भुत रूप देखा, तब भयवश वे भी उनके पासतक न जा सकीं । उन्होंने ऐसा अनूठा रूप न कभी देखा और न सुना ही था ॥२ ॥

प्रह्रादं प्रेषयामास ब्रह्मावस्थितमन्तिके ।

तात प्रशमयोपेहि स्वपित्रे कुपितं प्रभुम् ॥३

तथेति शनकै राजन्महाभागवतोऽर्भकः ।

उपेत्य भुवि कायेन ननाम विधृताञ्जलिः ॥

स्वपादमूले पतितं तमर्भकं विलोक्य देवः कृपया परिप्लुतः । उत्थाप्य तच्छीर्ण्यदधात् कराम्बुजं कालाहिवित्रस्तधियां े कृताभयम् ॥५ स तत्करस्पर्शधुताखिलाशुभः सपद्यभिव्यक्तपरात्मदर्शनः । तत्पादपद्मं हृदि निर्वृतो दधौ हृष्यत्तनुः क्लिन्नहृदश्रुलोचनः ॥ ६ ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1354

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अस्तौषीद्धरिमेकाग्रमनसा सुसमाहितः ।

प्रेमगद्गदया वाचा तन्न्यस्तहृदयेक्षणः ॥७

प्रह्राद उवाच ब्रह्मादयः सुरगणा मुनयोऽथ सिद्धाः सत्त्वैकतानमतयो वचसां प्रवाहैः । नाराधितुं पुरुगुणैरधुनापि पिप्रुः किं तोष्टुमर्हति स मे हरिरुग्रजातेः ॥ ८ मन्ये धनाभिजनरूपतपः श्रुतौज-स्तेजःप्रभावबलपौरुषबुद्धियोगाः ३ । नाराधनाय हि भवन्ति परस्य पुंसो भक्त्या तुतोष भगवान्गजयूथपाय ॥९ तब ब्रह्माजीने अपने पास ही खड़े प्रह्लादको यह कहकर भेजा कि ' बेटा! तुम्हारे पितापर ही तो भगवान् कुपित हुए थे । अब तुम्हीं उनके पास जाकर उन्हें शान्त करो ' || ३ || भगवान्के परम प्रेमी प्रह्लाद ' जो आज्ञा ' कहकर और धीरेसे भगवान्के पास जाकर हाथ जोड़ पृथ्वीपर साष्टांग लोट गये ॥४ ॥ नृसिंहभगवान् ने देखा कि नन्हा - सा बालक मेरे

चरणोंके पास पड़ा हुआ है । उनका हृदय दयासे भर गया । उन्होंने प्रह्लादको उठाकर उनके सिरपर अपना वह करकमल रख दिया, जो कालसर्पसे भयभीत पुरुषोंको अभयदान करनेवाला है ॥५ ॥

भगवान्के करकमलोंका स्पर्श होते ही उनके बचे - खुचे अशुभ संस्कार भी झड़ गये । तत्काल उन्हें परमात्मतत्त्वका साक्षात्कार हो गया । उन्होंने बड़े प्रेम और आनन्दमें मग्न होकर भगवान्के चरणकमलोंको अपने हृदयमें धारण किया । उस समय उनका सारा शरीर पुलकित हो गया, हृदयमें प्रेमकी धारा प्रवाहित होने लगी और नेत्रोंसे आनन्दाश्रु झरने लगे || ६ || प्रह्लादजी भावपूर्ण हृदय और निर्निमेष नयनोंसे भगवान्‌को देख रहे थे । भावसमाधिसे स्वयं एकाग्र हुए मनके द्वारा उन्होंने भगवान्‌के गुणोंका चिन्तन करते हुए प्रेमगद्गद वाणीसे स्तुति की ॥७ ॥

प्रह्लादजीने कहा — ब्रह्मा आदि देवता, ऋषि - मुनि और सिद्ध पुरुषोंकी बुद्धि निरन्तर सत्त्वगुणमें ही स्थित रहती है । फिर भी वे अपनी धारा - प्रवाह स्तुति और अपने विविध गुणोंसे आपको अबतक भी सन्तुष्ट नहीं कर सके । फिर मैं तो घोर असुर - जातिमें उत्पन्न हुआ हूँ! क्या आप मुझसे सन्तुष्ट हो सकते हैं? II II मैं समझता हूँ कि धन, कुलीनता, रूप, तप, विद्या, ओज, तेज, प्रभाव, बल, पौरुष, बुद्धि और योग - ये सभी गुण परमपुरुष भगवान्‌को सन्तुष्ट करनेमें समर्थ नहीं हैं— परन्तु भक्तिसे तो भगवान् गजेन्द्रपर भी सन्तुष्ट हो गये थे ॥९ ॥

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पृष्ठ 1355

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विप्राद् द्विषड्गुणयुतादरविन्दनाभ-पादारविन्दविमुखाच्छ्वपचं वरिष्ठम् ।

मन्ये तदर्पितमनोवचनेहितार्थ-प्राणं पुनाति स कुलं न तु भूरिमानः ॥ १०

नैवात्मनः प्रभुरयं निजलाभपूर्णो मानं जनादविदुषः करुणो वृणीते । यद् यज्जनो भगवते विदधीत मानं तच्चात्मने प्रतिमुखस्य यथा मुखश्रीः ॥११ तस्मादहं विगतविक्लव ईश्वरस्य सर्वात्मना महि गृणामि यथामनीषम् । नीचोऽजया गुणविसर्गमनुप्रविष्टः पूयेत येन हि पुमाननुवर्णितेन ॥ १२ सर्वे ह्यमी विधिकरास्तव सत्त्वधाम्नो ब्रह्मादयो वयमिवेश न चोद्विजन्तः । क्षेमाय भूतय उतात्मसुखाय चास्य विक्रीडितं भगवतो रुचिरावतारैः ॥१३ तद् यच्छ मन्यूमसुरश्च हतस्त्वयाद्य मोदेत साधुरपि वृश्चिकसर्पहत्या । लोकाश्च निर्वृतिमिताः प्रतियन्ति सर्वे रूपं नृसिंह विभयाय जनाः स्मरन्ति ॥१४ मेरी समझसे इन बारह गुणोंसे युक्त ब्राह्मण भी यदि भगवान् कमलनाभके चरणकमलोंसे विमुख हो तो उससे वह चाण्डाल श्रेष्ठ है, जिसने अपने मन, वचन, कर्म, धन और प्राण भगवान्के चरणोंमें समर्पित कर रखे हैं; क्योंकि वह चाण्डाल तो अपने कुलतकको पवित्र कर देता है और बड़प्पनका अभिमान रखनेवाला वह ब्राह्मण अपनेको भी पवित्र नहीं कर सकता ॥१० ॥ सर्वशक्तिमान् प्रभु अपने स्वरूपके साक्षात्कारसे ही परिपूर्ण हैं । उन्हें

अपने लिये क्षुद्र पुरुषोंसे पूजा ग्रहण करनेकी आवश्यकता नहीं है । वे करुणावश ही भोले भक्तोंके हितके लिये उनके द्वारा की हुई पूजा स्वीकार कर लेते हैं । जैसे अपने मुखका सौन्दर्य दर्पणमें दीखनेवाले प्रतिबिम्बको भी सुन्दर बना देता है, वैसे ही भक्त भगवान्‌के प्रति जो - जो सम्मान प्रकट करता है, वह उसे ही प्राप्त होता है ॥११ ॥ इसलिये सर्वथा अयोग्य और

अनधिकारी होनेपर भी मैं बिना किसी शंकाके अपनी बुद्धिके अनुसार सब प्रकारसे ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1356

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भगवान्की महिमाका वर्णन कर रहा हूँ । इस महिमाके गानका ही ऐसा प्रभाव है कि अविद्यावश संसारचक्रमें पड़ा हुआ जीव तत्काल पवित्र हो जाता है ॥१२ ॥

भगवन्! आप सत्त्वगुणके आश्रय हैं । ये ब्रह्मा आदि सभी देवता आपके आज्ञाकारी भक्त हैं । ये हम दैत्योंकी तरह आपसे द्वेष नहीं करते । प्रभो! आप बड़े - बड़े सुन्दर - सुन्दर अवतार ग्रहण करके इस जगत्के कल्याण एवं अभ्युदयके लिये तथा उसे आत्मानन्दकी प्राप्ति करानेके लिये अनेकों प्रकारकी लीलाएँ करते हैं ॥ १३ ॥ जिस असुरको मारनेके लिये

आपने क्रोध किया था, वह मारा जा चुका । अब आप अपना क्रोध शान्त कीजिये । जैसे बिच्छू और साँपकी मृत्युसे सज्जन भी सुखी ही होते हैं, वैसे ही इस दैत्यके संहारसे सभी लोगोंको बड़ा सुख मिला है । अब सब आपके शान्त स्वरूपके दर्शनकी बाट जोह रहे हैं । नृसिंहदेव! भयसे मुक्त होनेके लिये भक्तजन आपके इस रूपका स्मरण करेंगे ॥०४ ॥

नाहं बिभेम्यजित तेऽतिभयानकास्य-जिह्वार्कनेत्रभ्रुकुटीरभसोग्रदंष्ट्रात् ।

आन्त्रस्रजः क्षतजकेसरशङ्कुकर्णा-निर्ह्रादभीतदिगिभादरिभिन्नखाग्रात् ॥१५

त्रस्तोऽस्म्यहं ” कृपणवत्सल दुःसहोग्र-संसारचक्रकदनाद् ग्रसतां प्रणीतः । बद्धः स्वकर्मभिरुशत्तम तेऽङ्घ्रिमूलं प्रीतोऽपवर्गशरणं ह्वयसे कदा नु ॥१६ यस्मात् प्रियाप्रियवियोगसयोगजन्म-शोकाग्निना सकलयोनिषु दह्यमानः । दुःखौषधं तदपि दुःखमत॒द्धियाहं भूमन्भ्रमामि वद मे तव दास्ययोगम् ॥१७ सोऽहं प्रियस्य सुहृदः परदेवताया लीलाकथास्तव नृसिंह विरिञ्चगीताः । अञ्चस्तितर्म्यनुगृणन्गुणविप्रमुक्तो दुर्गाणि ते पदयुगालयहंससङ्गः ॥१८ बालस्य नेह शरणं पितरौ नृसिंह

नार्तस्य चागदमुदन्वति मञ्जतो नौः ।

तप्तस्य तत्प्रतिविधिर्य इहाज्जसेष्ट-स्तावद् विभो तनुभृतां त्वदुपेक्षितानाम् ॥१९

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पृष्ठ 1357

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परमात्मन्! आपका मुख बड़ा भयावना है । आपकी जीभ लपलपा रही है । आँखें सूर्यके समान हैं । भौंहें चढ़ी हुई हैं । बड़ी पैनी दाढ़ें हैं । आँतोंकी माला, खूनसे लथपथ गरदनके बाल, बर्छेकी तरह सीधे खड़े कान और दिग्गजोंको भी भयभीत कर देनेवाला सिंहनाद एवं शत्रुओंको फाड़ डालनेवाले आपके इन नखोंको देखकर मैं तनिक भी भयभीत नहीं हुआ हूँ ॥१५ ॥ दीनबन्धो! मैं भयभीत हूँ तो केवल इस असह्य और उग्र संसारचक्रमें पिसनेसे । मैं

अपने कर्मपाशोंसे बँधकर इन भयंकर जन्तुओंके बीचमें डाल दिया गया हूँ । मेरे स्वामी! आप प्रसन्न होकर मुझे कब अपने उन चरणकमलोंमें बुलायेंगे, जो समस्त जीवोंकी एकमात्र शरण और मोक्षस्वरूप हैं? ॥ १६ ॥ अनन्त! मैं जिन - जिन योनियोंमें गया, उन सभी योनियोंमें

प्रियके वियोग और अप्रियके संयोगसे होनेवाले शोककी आग में झुलसता रहा । उन दुःखोंको मिटानेकी जो दवा है, वह भी दुःखरूप ही है । मैं न जाने कबसे अपनेसे अतिरिक्त वस्तुओंको आत्मा समझकर इधर - उधर भटक रहा हूँ । अब आप ऐसा साधन बतलाइये जिससे कि आपकी सेवा - भक्ति प्राप्त कर सकूँ ॥१७ ॥ प्रभो! आप हमारे प्रिय हैं । अहेतुक हितैषी सुहृद

हैं । आप ही वास्तवमें सबके परमाराध्य हैं । मैं ब्रह्माजीके द्वारा गायी हुई आपकी लीला-कथाओंका गान करता हुआ बड़ी सुगमतासे रागादि प्राकृत गुणोंसे मुक्त होकर इस संसारकी कठिनाइयोंको पार कर जाऊँगा; क्योंकि आपके चरणयुगलोंमें रहनेवाले भक्त परमहंस महात्माओंका संग तो मुझे मिलता ही रहेगा ॥ १८ ॥ भगवान् नृसिंह! इस लोकमें दुःखी

जीवोंका दुःख मिटानेके लिये जो उपाय माना जाता है, वह आपके उपेक्षा करनेपर एक क्षणके लिये ही होता है । यहाँतक कि मा - बाप बालककी रक्षा नहीं कर सकते, ओषधि रोग नहीं मिटा सकती और समुद्रमें डूबते हुएको नौका नहीं बचा सकती ॥ १ ९ ॥ यस्मिन्यतो यर्ही येन च यस्य यस्माद् यस्मै यथा यदुत यस्त्वपरः परो वा । भावः करोति विकरोति पृथक्स्वभावः सञ्चोदितस्तदखिलं भवतः स्वरूपम् ॥२० माया मनः सृजति कर्ममयं बलीयः कालेन चोदितगुणानुमतेन पुंसः । छन्दोमयं यदजयार्पितषोडशारं संसारचक्रमज कोऽतितरेत् त्वदन्यः ॥२१ स त्वं हि नित्यविजितात्मगुणः स्वधाम्ना कालो वशीकृतविसृज्यविसर्गशक्तिः । चक्रे विसृष्टमजयेश्वर षोडशारे निष्पीड्यमानमुपकर्ष विभो प्रपन्नम् ॥२२ दृष्टा मया दिवि विभोऽखिलधिष्ण्यपाना-****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1358

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मायुः श्रियो विभव इच्छति याञ्जनोऽयम् ।

येऽस्मत्पितुः कुपितहासविजृम्भितभू-विस्फूर्जितेन लुलिताः स तु ते निरस्तः ॥२३

तस्मादमूस्तनुभृतामहमाशिषो ज्ञ आयुः श्रियं विभवमैन्द्रियमाविरिञ्चात् । नेच्छामि ते विलुलितानुरुविक्रमेण कालात्मनोपनय मां निजभृत्यपार्श्वम् ॥२४ सत्त्वादि गुणोंके कारण भिन्न - भिन्न स्वभावके जितने भी ब्रह्मादि श्रेष्ठ और कालादि कनिष्ठ कर्ता हैं, उनको प्रेरित करनेवाले आप ही हैं । वे आपकी प्रेरणासे जिस आधारमें स्थित होकर जिस निमित्तसे जिन मिट्टी आदि उपकरणोंसे जिस समय जिन साधनोंके द्वारा जिस अदृष्ट आदिकी सहायतासे जिस प्रयोजनके उद्देश्यसे जिस विधिसे जो कुछ उत्पन्न करते हैं या रूपान्तरित करते हैं, वे सब और वह सब आपका ही स्वरूप है ॥२० ॥

पुरुषकी अनुमतिसे कालके द्वारा गुणोंमें क्षोभ होनेपर माया मनः प्रधान लिंगशरीरका निर्माण करती है । यह लिंगशरीर बलवान्, कर्ममय एवं अनेक नाम - रूपोंमें आसक्त— छन्दोमय है । यही अविद्याके द्वारा कल्पित मन, दस इन्द्रिय और पाँच तन्मात्रा – इन सोलह विकाररूप अरोंसे युक्त संसार - चक्र है । जन्मरहित प्रभो! आपसे भिन्न रहकर ऐसा कौन पुरुष है, जो इस मनरूप संसारचक्रको पार कर जाय? ॥ २१ ॥ सर्वशक्तिमान् प्रभो! माया

इस सोलह अरोंवाले संसारचक्रमें डालकर ईखके समान मुझे पेर रही है । आप अपनी चैतन्यशक्तिसे बुद्धिके समस्त गुणोंको सर्वदा पराजित रखते हैं और कालरूपसे सम्पूर्ण साध्य और साधनोंको अपने अधीन रखते हैं । मैं आपकी शरणमें आया हूँ, आप मुझे इससे बचाकर अपनी सन्निधिमें खींच लीजिये || २२ || भगवन्! जिनके लिये संसारीलोग बड़े लालायित रहते हैं, स्वर्गमें मिलनेवाली समस्त लोकपालोंकी वह आयु लक्ष्मी और ऐश्वर्य मैंने खूब देख लिये । जिस समय मेरे पिता तनिक क्रोध करके हँसते थे और उससे उनकी भौंहें थोड़ी टेढ़ीं हो जाती थीं, तब उन स्वर्गकी सम्पत्तियोंके लिये कहीं ठिकाना नहीं रह जाता था, वे लुटती फिरती थीं । किन्तु आपने मेरे उन पिताको भी मार डाला ॥ २३ ॥ इसलिये मैं ब्रह्मलोकतककी

आयु, लक्ष्मी, ऐश्वर्य और वे इन्द्रियभोग, जिन्हें संसारके प्राणी चाहा करते हैं, नहीं चाहता; क्योंकि मैं जानता हूँ कि अत्यन्त शक्तिशाली कालका रूप धारण करके आपने उन्हें ग्रस रखा है । इसलिये मुझे आप अपने दासोंकी सन्निधिमें ले चलिये ॥२४ ॥

कुत्राशिषः श्रुतिसुखा मृगतृष्णिरूपाः क्वेदं कलेवरमशेषरुजां विरोहः । निर्विद्यते न तु जनो यदपीति विद्वान् कामानलं मधुलवैः शमयन्दुरापैः ॥२५ ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1359

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क्वाहं रजः प्रभव ईश तमोऽधिकेऽस्मिन् जातः सुरेतरकुले क्व तवानुकम्पा । न ब्रह्मणो न तु भवस्य न वै रमाया यन्मेऽर्पितः शिरसि पद्मकरः प्रसादः ॥२६ नैषा परावरमतिर्भवतो ननु स्या-ज्जन्तोर्यथाऽऽत्मसुहृदो जगतस्तथापि । संसेवया सुरतरोरिव ते प्रसादः सेवानुरूपमुदयो न परावरत्वम् ॥२७ एवं जनं निपतितं प्रभवाहिकूपे कामाभिकाममनु यः प्रपतन्प्रसङ्गात् । कृत्वाऽऽत्मसात् सुरर्षिणा भगवन् गृहीतः सोऽहं कथं नु विसृजे तव भृत्यसेवाम् ॥२८ मत्याणरक्षणमनन्त पितुर्वधश्च

मन्ये स्वभृत्यऋषिवाक्यमृतं विधातुम् ।

खड्गं प्रगृह्य यदवोचदसद्विधित्सुर-स्त्वामीश्वरो मदपरोऽवतु कं हरामि ॥२९

विषयभोगकी बातें सुननेमें ही अच्छी लगती हैं, वास्तवमें वे मृगतृष्णाके जलके समान नितान्त असत्य हैं और यह शरीर भी, जिससे वे भोग भोगे जाते हैं, अगणित रोगोंका उद्गमस्थान है । कहाँ वे मिथ्या विषयभोग और कहाँ यह रोगयुक्त शरीर! इन दोनोंकी क्षणभंगुरता और असारता जानकर भी मनुष्य इनसे विरक्त नहीं होता । वह कठिनाईसे प्राप्त होनेवाले भोगके नन्हें - नन्हें मधुविन्दुओंसे अपनी कामनाकी आग बुझानेकी चेष्टा करता है! ॥२५ ॥ प्रभो! कहाँ तो इस तमोगुणी असुरवंशमें रजोगुणसे उत्पन्न हुआ मैं, और कहाँ

आपकी अनन्त कृपा! धन्य है! आपने अपना परम प्रसादस्वरूप और सकलसन्तापहारी वह करकमल मेरे सिरपर रखा है, जिसे आपने ब्रह्मा, शंकर और लक्ष्मीजीके सिरपर भी कभी नहीं रखा ॥२६ ॥ दूसरे संसारी जीवोंके समान आपमें छोटे - बड़ेका भेदभाव नहीं है; क्योंकि

आप सबके आत्मा और अकारण प्रेमी हैं । फिर भी कल्पवृक्षके समान आपका कृपा प्रसाद भी सेवन - भजनसे ही प्राप्त होता है । सेवाके अनुसार ही जीवोंपर आपकी कृपाका उदय होता है, उसमें जातिगत उच्चता या नीचता कारण नहीं है ॥ २७ ॥ भगवन्! यह संसार एक ऐसा

अँधेरा कुआँ है, जिसमें कालरूप सर्प हँसनेके लिये सदा तैयार रहता है । विषय - भोगोंकी इच्छावाले पुरुष उसीमें गिरे हुए हैं । मैं भी संगवश उसके पीछे उसीमें गिरने जा रहा था । परन्तु भगवन्! देवर्षि नारदने मुझे अपनाकर बचा लिया । तब भला, मैं आपके भक्तजनोंकी ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1360

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सेवा कैसे छोड़ सकता हूँ ॥२८ ॥ अनन्त! जिस समय मेरे पिताने अन्याय करनेके लिये कमर

कसकर हाथमें खड़ग ले लिया और वह कहने लगा कि ' यदि मेरे सिवा कोई और ईश्वर है तो तुझे बचा ले, मैं तेरा सिर काटता हूँ, उस समय आपने मेरे प्राणोंकी रक्षा की और मेरे पिताका वध किया । मैं तो समझता हूँ कि आपने अपने प्रेमी भक्त सनकादि ऋषियोंका वचन सत्य करनेके लिये ही वैसा किया था ॥ २ ९ ॥ एकस्त्वमेव जगदेतदमुष्य यत् त्व-माद्यन्तयोः पृथगवस्यसि मध्यतश्च । सृष्ट्वा गुणव्यतिकरं निजमाययेदं नानेव तैरवसितस्तदनुप्रविष्टः ॥३० त्वां वा इदं सदसदीश भवांस्ततोऽन्यो माया यदात्मपरबुद्धिरियं ह्यपार्था । यद् यस्य जन्म निधनं स्थितिरीक्षणं च तद् वै तदेव वसुकालवदष्टितर्वोः ॥ ३१ न्यस्येदमात्मनि जगद् विलयाम्बुमध्ये

शेषेऽऽत्मना निजसुखानुभवो निरीहः ।

योगेन मीलितदृगात्मनिपीतनिद्र-स्तु स्थितो न तु तमोन गुणांश्च युङ्क्षे ॥३२

तस्यैव ते वपुरिदं निजकालशक्त्या

सञ्चोदितप्रकृतिधर्मण आत्मगूढम् ।

अम्भस्यनन्तशयनाद् विरमत्समाधे-र्नाभेरभूत् स्वकणिकावटवन्महाब्जम् ॥३३

तत्सम्भवः कविरतोऽन्यदपश्यमान-स्त्वां बीजमात्मनि ततं स्वबहिर्विचिन्त्य । नाविन्ददब्दशतमप्सु निमज्जमानो जातेऽङ्कुरे कथमु होपलभेत बीजम् ॥३४ भगवन्! यह सम्पूर्ण जगत् एकमात्र आप ही हैं । क्योंकि इसके आदिमें आप ही कारणरूपसे थे, अन्तमें आप ही अवधिके रूपमें रहेंगे और बीचमें इसकी प्रतीतिके रूपमें भी केवल आप ही हैं । आप अपनी मायासे गुणोंके परिणाम स्वरूप इस जगत्की सृष्टि करके इसमें पहलेसे विद्यमान रहनेपर भी प्रवेशकी लीला करते हैं और उन गुणोंसे युक्त होकर अनेक मालूम पड़ रहे हैं ॥ ३० ॥ भगवन्! यह जो कुछ कार्य - कारणके रूपमें प्रतीत हो रहा

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