श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 1361–1370
श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1361–1370
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है, वह सब आप ही हैं और इससे भिन्न भी आप ही हैं । अपने - परायेका भेद - भाव तो अर्थहीन शब्दोंकी माया है; क्योंकि जिससे जिसका जन्म, स्थिति, लय और प्रकाश होता है, वह उसका स्वरूप ही होता है - जैसे बीज और वृक्ष कारण और कार्यकी दृष्टिसे भिन्न - भिन्न हैं, तो भी गन्ध - तन्मात्रकी दृष्टिसे दोनों एक ही हैं ॥ ३१ ॥
भगवन्! आप इस सम्पूर्ण विश्वको स्वयं अपनेमें समेटकर आत्मसुखका अनुभव करते निष्क्रिय होकर प्रलयकालीन जलमें शयन करते हैं । उस समय अपने स्वयं - सिद्ध योगके द्वारा बाह्य दृष्टिको बंद कर आप अपने स्वरूपके प्रकाशमें निद्राको विलीन कर लेते हैं और तुरीय ब्रह्मपदमें छ रहते हैं । उस समय आप न तो तमोगुणसे ही युक्त होते और न तो विषयोंको ही स्वीकार करते हैं ॥३२ ॥ आप अपनी कालशक्तिसे प्रकृतिके गुणोंको प्रेरित करते हैं, इसलिये
यह ब्रह्माण्ड आपका ही शरीर है । पहले यह आपमें ही लीन था । जब प्रलयकालीन जलके भीतर शेषशय्यापर शयन करनेवाले आपने योगनिद्राकी समाधि त्याग दी, तब वटके बीजसे विशाल वृक्षके समान आपकी नाभिसे ब्रह्माण्डकमल उत्पन्न हुआ ॥३३ ॥ उसपर सूक्ष्मदर्शी
ब्रह्माजी प्रकट हुए । जब उन्हें कमलके सिवा और कुछ भी दिखायी न पड़ा, तब अपनेमें बीजरूपसे व्याप्त आपको वे न जान सके और आपको अपनेसे बाहर समझकर जलके भीतर घुसकर सौ वर्षतक ढूँढ़ते रहे । परन्तु वहाँ उन्हें कुछ नहीं मिला । यह ठीक ही है, क्योंकि अंकुर उग आनेपर उसमें व्याप्त बीजको कोई बाहर अलग कैसे देख सकता है ॥३४ ॥
स त्वात्मयोनिरतिविस्मित आस्थितोऽब्जं कालेन तीव्रतपसा परिशुद्धभावः । त्वामात्मनीश भुवि गन्धमिवातिसूक्ष्मं भूतेन्द्रियाशयमये विततं ददर्श ॥३५ एवं सहस्रवदनाङ्घ्रिशिरः करोरु-नासास्यकर्णनयनाभरणायुधाढ्यम् । मायामयं सदुपलक्षितसंनिवेशं दृष्ट्वा महापुरुषमाप मुदं विरिञ्चः ॥ ३६ तस्मै भवान्हयशिरस्तनुवं च बिभ्रद् वेदद्रुहावतिबलौ मधुकैटभाख्यौ । हत्वाऽऽनयच्छ्रुतिगणांस्तु रजस्तमश्च सत्त्वं तव प्रियतमां तनुमामनन्ति ॥३७ इत्थं नृतिर्यगृषिदेवझषावतारै-कान् विभावयसि हंसि जगत्प्रतीपान् । धर्मं महापुरुष पासि युगानुवृत्तं छन्नः कलौ यदभवस्त्रियुगोऽथ स त्वम् ॥३८ ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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नैतन्मनस्तव कथासु विकुण्ठनाथ सम्प्रीयते दुरितदुष्टमसाधु तीव्रम् । कामातुरं हर्षशोकभयैषणार्तं तस्मिन्कथं तव गतिं विमृशामि दीनः ॥३९ जिह्वैकतोऽच्युत विकर्षति मावितृप्ता शिनोऽन्यतस्त्वगुदरं श्रवणं कुतश्चित् । ब्रह्माको बड़ा आश्चर्य हुआ । वे हारकर कमलपर बैठ गये । बहुत समय बीतनेपर तीव्र तपस्या करनेसे जब उनका हृदय शुद्ध हो गया, तब उन्हें भूत, इन्द्रिय और अन्तःकरणरूप अपने शरीरमें ही ओत - प्रोतरूपसे स्थित आपके सूक्ष्मरूपका साक्षात्कार हुआ— ठीक वैसे ही जैसे पृथ्वीमें व्याप्त उसकी अति सूक्ष्म तन्मात्रा गन्धका होता है ॥ ३५ ॥
विराट् पुरुष सहस्रों मुख, चरण, सिर, हाथ, जंघा, नासिका, मुख, कान, नेत्र, आभूषण और आयुधोंसे सम्पन्न था । चौदहों लोक उसके विभिन्न अंगोंके रूपमें शोभायमान थे । वह
भगवान्की एक लीलामयी मूर्ति थी । उसे देखकर ब्रह्माजीको बड़ा आनन्द हुआ ॥ ३६ ॥
रजोगुण और तमोगुणरूप मधु और कैटभ नामके दो बड़े बलवान् दैत्य थे । जब वे वेदोंको चुराकर ले गये, तब आपने हयग्रीव अवतार ग्रहण किया और उन दोनोंको मारकर सत्त्वगुणरूप श्रुतियाँ ब्रह्माजीको लोटा दीं । वह सत्त्वगुण ही आपका अत्यन्त प्रिय शरीर है— महात्मालोग इस प्रकार वर्णन करते हैं ॥ ३७ ॥ पुरुषोत्तम! इस प्रकार आप मनुष्य, पशु - पक्षी,
ऋषि, देवता और मत्स्य आदि अवतार लेकर लोकोंका पालन तथा विश्वके द्रोहियोंका संहार करते हैं । इन अवतारोंके द्वारा आप प्रत्येक युगमें उसके धर्मोंकी रक्षा करते हैं । कलियुगमें आप छिपकर गुप्तरूपसे ही रहते हैं, इसीलिये आपका एक नाम ' त्रियुग ' भी है ॥३८ ॥
वैकुण्ठनाथ! मेरे मनकी बड़ी दुर्दशा है । वह पाप - वासनाओंसे तो कलुषित है ही, स्वयं भी अत्यन्त दुष्ट है । वह प्रायः ही कामनाओंके कारण आतुर रहता है और हर्ष - शोक, भय एवं लोक - परलोक, धन, पत्नी, पुत्र आदिकी चिन्ताओंसे व्याकुल रहता है । इसे आपकी लीला-कथाओंमें तो रस ही नहीं मिलता । इसके मारे मैं दीन हो रहा हूँ । ऐसे मनसे मैं आपके स्वरूपका चिन्तन कैसे करूँ? || ३ ९ || अच्युत! यह कभी न अघानेवाली जीभ मुझे स्वादिष्ट रसोंकी ओर खींचती रहती है । जननेन्द्रिय सुन्दरी स्त्रीकी ओर, त्वचा सुकोमल स्पर्शकी ओर, पेट भोजनकी ओर, कान मधुर संगीतकी ओर, नासिका भीनी - भीनी सुगन्धकी ओर और ये चपल नेत्र सौन्दर्यकी ओर मुझे खींचते रहते हैं । इनके सिवा कर्मेन्द्रियाँ भी अपने - अपने विषयोंकी ओर ले जानेको जोर लगाती ही रहती हैं । मेरी तो वह दशा हो रही है, जैसे किसी पुरुषकी बहुत - सी पत्नियाँ उसे अपने - अपने शयनगृहमें ले जानेके लिये चारों ओरसे घसीट रही हों ॥४० ॥ इस प्रकार यह जीव अपने कर्मोंके बन्धनमें पड़कर इस संसाररूप वैतरणी
नदीमें गिरा हुआ है । जन्मसे मृत्यु, मृत्युसे जन्म और दोनोंके द्वारा कर्मभोग करते - करते यह भयभीत हो गया है । यह अपना है, यह पराया है - इस प्रकारके भेद - भावसे युक्त होकर ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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किसीसे मित्रता करता है तो किसीसे शत्रुता । आप इस मूढ़ जीव - जातिकी यह दुर्दशा देखकर करुणासे द्रवित हो जाइये । इस भव - नदीसे सर्वदा पार रहनेवाले भगवन्! इन प्राणियोंको भी अब पार लगा दीजिये ॥४१ ॥ जगद्गुरो! आप इस सृष्टिकी उत्पत्ति, स्थिति तथा पालन
करनेवाले हैं । ऐसी अवस्थामें इन जीवोंको इस भव - नदीके पार उतार देनेमें आपको क्या प्रयास है? दीनजनोंके परमहितैषी प्रभो! भूले - भटके मूढ़ ही महान् पुरुषोंके विशेष अनुग्रहपात्र होते हैं । हमें उसकी कोई आवश्यकता नहीं है । क्योंकि हम आपके प्रियजनोंकी सेवामें लगे रहते हैं, इसलिये पार जानेकी हमें कभी चिन्ता ही नहीं होती || ४२ || परमात्मन्! इस भव - वैतरणीसे पार उतरना दूसरे लोगोंके लिये अवश्य ही कठिन है, परन्तु मुझे तो इससे तनिक भी भय नहीं है । क्योंकि मेरा चित्त इस वैतरणीमें नहीं, आपकी उन लीलाओंके गानमें मग्न रहता है, जो स्वर्गीय अमृतको भी तिरस्कृत करनेवाली - परमामृतस्वरूप हैं । मैं उन मूढ़ प्राणियोंके लिये शोक कर रहा हूँ, जो आपके गुणगानसे विमुख रहकर इन्द्रियोंके विषयोंका मायामय झूठा सुख प्राप्त करनेके लिये अपने सिरपर सारे संसारका भार ढोते रहते हैं ॥४३ ॥ मेरे स्वामी! बड़े - बड़े ऋषि - मुनि तो प्रायः अपनी मुक्तिके लिये निर्जन वनमें जाकर
मौनव्रत धारण कर लेते हैं । वे दुसरोंकी भलाई के लिये कोई विशेष प्रयत्न नहीं करते । परन्तु मेरी दशा तो दूसरी ही हो रही है । मैं इन भूले हुए असहाय गरीबोंको छोड़कर अकेला मुक्त होना नहीं चाहता । और इन भटकते हुए प्राणियोंके लिये आपके सिवा और कोई सहारा भी नहीं दिखायी पड़ता ॥४४ ॥
घ्राणोऽन्यतश्चपलदृक् क्व च कर्मशक्ति-र्बह्व्यः सपत्नय इव गेहपतिं लुनन्ति ॥४० एवं स्वकर्मपतितं भववैतरण्या-मन्योन्यजन्ममरणाशनभीतभीतम् । पश्यञ्जनं स्वपरविग्रहवैरमैत्रं हन्तेति पारचर पीपृहि मूढमद्य ॥४१ को न्वत्र तेऽखिलगुरो भगवन्प्रयास उत्तारणेऽस्य भवसम्भवलोपहेतोः । मूढेषु वै महदनुग्रह आर्तबन्धो किं तेन ते प्रियजनाननुसेवतां नः ॥४२
नैवोद्विजे पर दुरत्ययवैतरण्या-स्त्वद्वीर्यगायनमहामृतमग्नचित्तः ।
शोचे ततो विमुखचेतस इन्द्रियार्थ-मायासुखाय भरमुद्वहतो विमूढान् ॥४३
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प्रायेण देव मुनयः स्वविमुक्तिकामा मौनं चरन्ति विजने न परार्थनिष्ठाः । नैतान्विहाय कृपणान्विमुमुक्ष एको नान्यं त्वदस्य शरणं भ्रमतोऽनुपश्ये ॥४४ यन्मैथुनादि गृहमेधिसुखं हि तुच्छं कण्डूयनेन करयोरिव दुःखदुःखम् । तृप्यन्ति नेह कृपणा बहुदुःखभाजः कण्डूतिवन्मनसिजं विषहेत धीरः ॥४५ मौनव्रतश्रुततपोऽध्ययनस्वधर्म-व्याख्यारहोजपसमाधय आपवर्ग्याः । प्रायः परं पुरुष ते त्वजितेन्द्रियाणां वार्ता भवन्त्युत न वात्र तु दाम्भिकानाम् ॥४६ रूपे इमे सदसती तव वेदसृष्टे बीजाङ्कुराविव न चान्यदरूपकस्य । युक्ताः समक्षमुभयत्र विचिन्वते त्वां योगेन वह्निमिव दारुषु नान्यतः स्यात् ॥४७ त्वं वायुरग्निरवनिर्वियदम्बुमात्राः प्राणेन्द्रियाणि हृदयं चिदनुग्रहश्च । सर्वं त्वमेव सगुणो विगुणश्च भूमन् नान्यत् त्वदस्त्यपि मनोवचसा निरुक्तम् ॥४८ नैते गुणा न गुणिनो महदादयो ये
सर्वे मनःप्रभृतयः सहदेवमर्त्याः ।
आद्यन्तवन्त उरुगाय विदन्ति हि त्वा-मेवं विमृश्य सुधियो विरमन्ति शब्दात् ॥४९
घरमें फँसे हुए लोगोंको जो मैथुन आदिका सुख मिलता है, वह अत्यन्त॒ तुच्छ एवं दुःखरूप ही है— जैसे कोई दोनों हाथोंसे खुजला रहा हो तो उस खुजलीमें पहले उसे कुछ थोड़ा - सा सुख मालुम पड़ता है, परन्तु पीछेसे दुःख ही दुःख होता है । किंतु ये भूले हुए अज्ञानी मनुष्य बहुत दुःख भोगनेपर भी इन विषयोंसे अघाते नहीं । इसके विपरीत धीर पुरुष जैसे खुजलाहटको सह लेते हैं, वैसे ही कामादि वेगोंको भी सह लेते हैं । सहनेसे ही उनका ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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नाश होता है ॥४५ ॥ पुरुषोत्तम! मोक्षके दस साधन प्रसिद्ध हैं - मौन, ब्रह्मचर्य, शास्त्र - श्रवण,
तपस्या, स्वाध्याय, स्वधर्मपालन, युक्तियोंसे शास्त्रोंकी व्याख्या, एकान्तसेवन, जप और समाधि । परन्तु जिनकी इन्द्रियाँ वशमें नहीं हैं उनके लिये ये सब जीविकाके साधन-व्यापारमात्र रह जाते हैं । और दम्भियोंके लिये तो जबतक उनकी पोल खुलती नहीं, तभीतक ये जीवननिर्वाहके साधन रहते हैं और भंडाफोड़ हो जानेपर वह भी नहीं ॥ ४६ ॥ वेदोंने बीज
और अंकुरके समान आपके दो रूप बताये हैं- कार्य और कारण । वास्तवमें आप प्राकृत रूपसे रहित हैं । परन्तु इन कार्य और कारणरूपोंको छोड़कर आपके ज्ञानका कोई और साधन भी नहीं है । काष्ठ - मन्थनके द्वारा जिस प्रकार अग्नि प्रकट की जाती है, उसी प्रकार योगीजन भक्तियोगकी साधनासे आपको कार्य और कारण दोनोंमें ही ढूँढ़ निकालते हैं । क्योंकि वास्तवमें ये दोनों आपसे पृथक् नहीं हैं, आपके स्वरूप ही हैं ॥४७ ॥ अनन्त प्रभो!
वायु, अग्नि, पृथ्वी, आकाश, जल, पंचतन्मात्राएँ, प्राण, इन्द्रिय, मन, चित्त, अहंकार, सम्पूर्ण जगत् एवं सगुण और निर्गुण - सब कुछ केवल आप ही हैं । और तो क्या, मन और वाणीके द्वारा जो कुछ निरूपण किया गया है, वह सब आपसे पृथक् नहीं है ॥४८ ॥ समग्र कीर्तिके
आश्रय भगवन्! ये सत्त्वादि गुण और इन गुणोंके परिणाम महत्तत्त्वादि, देवता, मनुष्य एवं मन आदि कोई भी आपका स्वरूप जाननेमें समर्थ नहीं है; क्योंकि ये सब आदि - अन्तवाले हैं और आप अनादि एवं अनन्त हैं । ऐसा विचार करके ज्ञानीजन शब्दोंकी मायासे उपरत हो जाते हैं ॥४९ ॥
तत् तेऽर्हत्तम नमः स्तुतिकर्मपूजाः कर्म स्मृतिश्चरणयोः श्रवणं कथायाम् । संसेवया त्वयि विनेति षडङ्गया किं भक्तिं जनः परमहंसगतौ लभेत ॥५० नारद उवाच
एतावद्वर्णितगुणो भक्त्या भक्तेन निर्गुणः ।
प्रह्रादं प्रणतं प्रीतो यतमन्यूरभाषत ॥५१
श्रीभगवानुवाच
प्रह्लाद भद्र भद्रं ते प्रीतोऽहं तेऽसुरोत्तम ।
वरं वृणीष्वाभिमतं कामपूरोऽस्म्यहं नृणाम् ॥५२
मामप्रीणत आयुष्मन्दर्शनं दुर्लभं हि मे ।
दृष्ट्वा मां न पुनर्जन्तुरात्मानं तप्तुमर्हति ॥ ५३
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प्रीणन्ति ह्यथ मां धीराः सर्वभावेन साधवः ।
श्रेयस्कामा महाभागाः सर्वासामाशिषां पतिम् ॥५४
एवं प्रलोभ्यमानोऽपि वरैर्लोकप्रलोभनैः ।
एकान्तित्वाद् भगवति नैच्छत् तानसुरोत्तमः ॥ ५५
परम पूज्य! आपकी सेवाके छः अंग हैं— नमस्कार, स्तुति, समस्त कर्मोंका समर्पण, सेवा - पूजा, चरणकमलोंका चिन्तन और लीला - कथाका श्रवण । इस षडंगसेवाके बिना आपके चरणकमलोंकी भक्ति कैसे प्राप्त हो सकती है? और भक्तिके बिना आपकी प्राप्ति कैसे होगी? प्रभो! आप तो अपने परम प्रिय भक्तजनोंके, परमहंसोंके ही सर्वस्व हैं ॥ ५० ॥
नारदजी कहते हैं – इस प्रकार भक्त प्रह्लादने बड़े प्रेमसे प्रकृति और प्राकृत गुणोंसे रहित भगवान्के स्वरूपभूत गुणोंका वर्णन किया । इसके बाद वे भगवान्के चरणोंमें सिर झुकाकर चुप हो गये । नृसिंहभगवान्का क्रोध शान्त हो गया और वे बड़े प्रेम तथा प्रसन्नतासे बोले ॥५१ ॥
श्रीनृसिंहभगवान्ने कहा— परम कल्याण स्वरूप प्रह्लाद! तुम्हारा कल्याण हो । दैत्यश्रेष्ठ! मैं तुमपर अत्यन्त प्रसन्न हूँ । तुम्हारी जो अभिलाषा हो, मुझसे माँग लो । मैं जीवोंकी इच्छाओंको पूर्ण करनेवाला हूँ ॥ ५२ ॥
आयुष्मन्! जो मुझे प्रसन्न नहीं कर लेता, उसे मेरा दर्शन मिलना बहुत ही कठिन है । परन्तु जब मेरे दर्शन हो जाते हैं, तब फिर प्राणीके हृदयमें किसी प्रकारकी जलन नहीं रह जाती ॥५३ ॥
मैं समस्त मनोरथोंको पूर्ण करनेवाला हूँ । इसलिये सभी कल्याणकामी परम भाग्यवान् साधुजन जितेन्द्रिय होकर अपनी समस्त वृत्तियोंसे मुझे प्रसन्न करनेका ही यत्न करते हैं ॥५४ ॥
असुरकुलभूषण प्रह्लादजी भगवान्के अनन्य प्रेमी थे । इसलिये बड़े - बड़े लोगोंको प्रलोभनमें डालनेवाले वरोंके द्वारा प्रलोभित किये जानेपर भी उन्होंने उनकी इच्छा नहीं की ॥५५ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे प्रह्रादचरिते भगवत्स्तवो नाम नवमोऽध्यायः ॥९ ॥
१. प्रा ० पा ० — उत्पत्य । २. प्रा ० पा ० – हिनिर्दष्टधि ० । ३. प्रा ० पा ० — प्रताप ० । -१. प्रा ० पा ० – स्म्यलं । २. प्रा ० पा ० – गहनाद् । १. प्रा ० पा०- —विमोहः । २. प्रा ० पा ० — दसून् बिभित्सु ० । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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अथ दशमोऽध्यायः प्रह्लादजीके राज्याभिषेक और त्रिपुरदहनकी कथा नारद उवाच
भक्तियोगस्य तत् सर्वमन्तरायतयार्भकः ।
मन्यमानो हृषीकेशं स्मयमान उवाच ह ॥१
प्रह्राद उवाच
मा मां प्रलोभयोत्पत्त्याऽऽसक्तं कामेषु ' तैर्वरैः ।
तत्सङ्गभीतो निर्विण्णो मुमुक्षुस्त्वामुपाश्रितः ॥२
भृत्यलक्षणजिज्ञासुर्भक्तं कामेष्वचोदयत् ।
भवान् संसारबीजेषु हृदयग्रन्थिषु प्रभो ॥ ३
नान्यथा तेऽखिलगुरो घटेत े करुणात्मनः ।
यस्त आशिष आशास्ते न स भृत्यः स वै वणिक् ॥४
आशासानो न वै भृत्यः स्वामिन्याशिष आत्मनः ।
न स्वामी भृत्यतः स्वाम्यमिच्छन् यो राति चाशिषः ॥५
अहं त्वकामस्त्वद्भक्तस्त्वं च स्वाम्यनपाश्रयः ।
नान्यथेहावयोरर्थो राजसेवकयोरिव ३ ॥६
यदि रासीश ४ मे कामान् वरांस्त्वं वरदर्षभ ।
कामानां हृद्यसंरोहं भवतस्तु वृणे वरम् ॥७
नारदजी कहते हैं — प्रह्लादजीने बालक होनेपर भी यही समझा कि वरदान माँगना प्रेम-भक्तिका विघ्न है; इसलिये कुछ मुसकराते हुए वे भगवान्से बोले || १ || प्रह्लादजीने कहा — प्रभो! मैं जन्मसे ही विषय - भोगोंमें आसक्त हूँ, अब मुझे इन वरोंके द्वारा आप लुभाइये नहीं । मैं उन भोगोंके संगसे डरकर, उनके द्वारा होनेवाली तीव्र वेदनाका अनुभव कर उनसे छूटनेकी अभिलाषासे ही आपकी शरणमें आया हूँ ॥२ ॥ भगवन्! मुझमें
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भक्तके लक्षण हैं या नहीं - यह जाननेके लिये आपने अपने भक्तको वरदान माँगनेकी ओर प्रेरित किया है । ये विषय भोग हृदयकी गाँठको और भी मजबूत करनेवाले तथा बार - बार जन्म - मृत्युके चक्करमें डालनेवाले हैं || ३ || जगद्गुरो! परीक्षाके सिवा ऐसा कहनेका और कोई कारण नहीं दीखता; क्योंकि आप परम दयालु हैं । ( अपने भक्तको भोगोंमें फँसानेवाला वर कैसे दे सकते हैं? ) आपसे जो सेवक अपनी कामनाएँ पूर्ण करना चाहता है? वह सेवक नहीं; वह तो लेन - देन करनेवाला निरा बनिया है ॥४ ॥ जो स्वामीसे अपनी कामनाओंकी
पूर्ति चाहता है, वह सेवक नहीं; और जो सेवकसे सेवा करानेके लिये, उसका स्वामी बननेके लिये उसकी कामनाएँ पूर्ण करता है, वह स्वामी नहीं ॥५ ॥ मैं आपका निष्काम सेवक हूँ और
आप मेरे निरपेक्ष स्वामी हैं । जैसे राजा और उसके सेवकोंका प्रयोजनवश स्वामी - सेवकका सम्बन्ध रहता है, वैसा तो मेरा और आपका सम्बन्ध है नहीं || ६ || मेरे वरदानिशिरोमणि स्वामी! यदि आप मुझे मुँहमाँगा वर देना ही चाहते हैं तो यह वर दीजिये कि मेरे हृदयमें कभी किसी कामनाका बीज अंकुरित ही न हो ॥ ७ ॥
इन्द्रियाणि मनः प्राण आत्मा धर्मो धृतिर्मतिः ।
ह्रीः श्रीस्तेजः स्मृतिः सत्यं यस्य नश्यन्ति जन्मना ॥८
विमुञ्चति यदा कामान्मानवो मनसि स्थितान् ।
तर्ह्येव पुण्डरीकाक्ष भगवत्त्वाय कल्पते ॥९
नमो भगवते तुभ्यं पुरुषाय महात्मने ।
हरयेऽद्भुतसिंहाय ब्रह्मणे परमात्मने ॥१०
नृसिंह उवाच नैकान्तिनो मे मयि जात्विहाशिष आशासतेऽमुत्र च ये भवद्विधाः । अथापि मन्वन्तरमेतदत्र दैत्येश्वराणामनुभुङ्क्ष्व भोगान् ॥ ११ कथा मदीया जुषमाणः प्रियास्त्व-मावेश्य मामात्मनि सन्तमेकम् । सर्वेषु भूतेष्वधियज्ञमीशं यजस्व योगेन च कर्म हिन्वन् ॥१२ भोगेन पुण्यं कुशलेन पापं कलेवरं कालजवेन हित्वा । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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कीर्ति विशुद्धां सुरलोकगीतां विताय मामेष्यसि मुक्तबन्धः ॥१३
य एतत् कीर्तयेन्मह्यं त्वया गीतमिदं नरः ।
त्वां च मां च स्मरन्काले कर्मबन्धात् प्रमुच्यते ॥१४
प्रह्राद उवाच
वरं वरय एतत् ते वरदेशान्महेश्वर ।
यदनिन्दत् पिता मे त्वामविद्वांस्तेज ऐश्वरम् ॥१५
विद्धामर्षाशयः साक्षात् सर्वलोकगुरुं प्रभुम् ।
भ्रातृहेति मृषादृष्टिस्त्वद्भक्ते मयि चाघवान् ॥१६
हृदयमें किसी भी कामनाके उदय होते ही इन्द्रिय, मन, प्राण, देह, धर्म, धैर्य, बुद्धि, लज्जा, श्री, तेज, स्मृति और सत्य – ये सब - के - सब नष्ट हो जाते हैं ॥८ ॥ कमलनयन! जिस
समय मनुष्य अपने मनमें रहनेवाली कामनाओंका परित्याग कर देता है, उसी समय वह भगवत्स्वरूपको प्राप्त कर लेता है ॥९ ॥ भगवन्! आपको नमस्कार है । आप सबके हृदयमें
विराजमान, उदारशिरोमणि स्वयं परब्रह्म परमात्मा हैं । अद्भुत नृसिंहरूपधारी श्रीहरिके चरणोंमें मैं बार - बार प्रणाम करता हूँ ॥१० ॥
श्रीनृसिंहभगवान्ने कहा – प्रह्लाद! तुम्हारे जैसे मेरे एकान्तप्रेमी इस लोक अथवा परलोककी किसी भी वस्तुके लिये कभी कोई कामना नहीं करते । फिर भी अधिक नहीं, केवल एक मन्वन्तरतक मेरी प्रसन्नताके लिये तुम इस लोकमें दैत्याधिपतियोंके समस्त भोग स्वीकार कर लो ॥११ ॥ समस्त प्राणियोंके हृदयमें यज्ञोंके भोक्ता ईश्वरके रूपमें मैं ही
विराजमान हूँ । तुम अपने हृदयमें मुझे देखते रहना और मेरी लीला - कथाएँ, जो तुम्हें अत्यन्त॒ प्रिय हैं, सुनते रहना । समस्त कर्मोंके द्वारा मेरी ही आराधना करना और इस प्रकार अपने प्रारब्ध - कर्मका क्षय कर देना || १२ || भोगके द्वारा पुण्यकर्मोंके फल और निष्काम पुण्यकर्मोंके द्वारा पापका नाश करते हुए समयपर शरीरका त्याग करके समस्त बन्धनोंसे मुक्त होकर तुम मेरे पास आ जाओगे । देवलोकमें भी लोग तुम्हारी विशुद्ध कीर्तिका गान करेंगे ॥१३ ॥ तुम्हारे द्वारा की हुई मेरी इस स्तुतिका जो मनुष्य कीर्तन करेगा और साथ ही
मेरा और तुम्हारा स्मरण भी करेगा, वह समयपर कर्मोंके बन्धनसे मुक्त हो जायगा ॥१४ ॥
प्रह्लादजीने कहा —– महेश्वर! आप वर देनेवालोंके स्वामी हैं । आपसे मैं एक वर और माँगता हूँ । मेरे पिताने आपके ईश्वरीय तेजको और सर्वशक्तिमान चराचरगुरु स्वयं आपको न जानकर आपकी बड़ी निन्दा की है । ' इस विष्णुने मेरे भाईको मार डाला है ' ऐसी मिथ्यादृष्टि रखनेके कारण पिताजी क्रोधके वेगको सहन करनेमें असमर्थ हो गये थे । इसीसे उन्होंने ****** ebook converter DEMO Watermarks *******