श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 1381–1390
श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1381–1390
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अथैकादशोऽध्यायः मानवधर्म, वर्णधर्म और स्त्रीधर्मका निरूपण श्रीशुक उवाच श्रुत्वेहितं साधुसभासभाजितं महत्तमाग्रण्य उरुक्रमात्मनः । युधिष्ठिरो दैत्यपतेर्मुदा युतः पप्रच्छ भूयस्तनयं स्वयम्भुवः ॥१ युधिष्ठिर उवाच
भगवञ्छ्रोतुमिच्छामि नृणां धर्मं सनातनम् ।
वर्णाश्रमाचारयुतं यत् पुमान्विन्दते परम् ॥ २
भवान्प्रजापतेः साक्षादात्मजः परमेष्ठिनः ।
सुतानां सम्मतो ब्रह्मंस्तपोयोगसमाधिभिः ॥३
नारायणपरा विप्रा धर्मं गुह्यं परं विदुः ।
करुणाः साधवः शान्तास्त्वद्विधा न तथापरे ॥४
नारद उवाच
नत्वा भगवतेऽजाय लोकानां धर्महेतवे ।
वक्ष्ये सनातनं धर्मं नारायणमुखाच्छ्रुतम् ॥५
योऽवतीर्यात्मनोंऽशेन दाक्षायण्यां तु धर्मतः ।
लोकानां स्वस्तयेऽध्यास्ते तपो बदरिकाश्रमे ॥ ६
धर्ममूलं हि भगवान्सर्ववेदमयो हरिः ।
स्मृतं च तद्विदां राजन्येन चात्मा प्रसीदति ॥७
सत्यं दया तपः शौचं तितिक्षेक्षा शमो दमः ।
अहिंसा ब्रह्मचर्यं च त्यागः स्वाध्याय आर्जवम् ॥८
सन्तोषः समदृक् सेवा ग्राम्येहोपरमः शनैः ।
नृणां विपर्ययेहेक्षा मौनमात्मविमर्शनम् ॥९
अन्नाद्यादेः संविभागो भूतेभ्यश्च यथार्हतः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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तेष्वात्मदेवताबुद्धिः सुतरां नृषु पाण्डव ॥ १०
श्रवणं कीर्तनं चास्य स्मरणं महतां गतेः ।
सेवेज्यावनतिर्दास्यं सख्यमात्मसमर्पणम् ॥११
श्रीशुकदेवजी कहते हैं- भगवन्मय प्रह्लादजीके साधुसमाजमें सम्मानित पवित्र चरित्र
सुनकर संतशिरोमणि युधिष्ठिरको बड़ा आनन्द हुआ । उन्होंने नारदजीसे और भी पूछा ॥१ ॥
युधिष्ठिरजीने कहा – भगवन्! अब मैं वर्ण और आश्रमोंके सदाचारके साथ मनुष्योंके सनातनधर्मका श्रवण करना चाहता हूँ, क्योंकि धर्मसे ही मनुष्यको ज्ञान, भगवत्प्रेम और साक्षात् परम पुरुष भगवान्की प्राप्ति होती है || २ || आप स्वयं प्रजापति ब्रह्माजीके पुत्र हैं और नारदजी! आपकी तपस्या, योग एवं समाधिके कारण वे अपने दूसरे पुत्रोंकी अपेक्षा आपका अधिक सम्मान भी करते हैं || ३ || आपके समान नारायण - परायण, दयालु, सदाचारी और शान्त ब्राह्मण धर्मके गुप्त - से - गुप्त रहस्यको जैसा यथार्थरूपसे जानते हैं, दूसरे लोग वैसा नहीं जानते ॥४ ॥
नारदजीने कहा – युधिष्ठिर! अजन्मा भगवान् ही समस्त धर्मोंके मूल कारण हैं । वही प्रभु चराचर जगत्के कल्याणके लिये धर्म और दक्षपुत्री मूर्तिके द्वारा अपने अंशसे अवतीर्ण होकर बदरिकाश्रममें तपस्या कर रहे हैं । उन नारायणभगवान्को नमस्कार करके उन्हींके मुखसे सुने हुए सनातनधर्मका मैं वर्णन करता हूँ ॥ ५-६ ॥ युधिष्ठिर! सर्ववेदस्वरूप भगवान् श्रीहरि, उनका तत्त्व जाननेवाले महर्षियोंकी स्मृतियाँ और जिससे आत्मग्लानि न होकर आत्मप्रसादकी उपलब्धि हो, वह कर्म धर्मके मूल हैं हैं ॥ ७ ॥
युधिष्ठिर! धर्मके ये तीस लक्षण शास्त्रोंमें कहे गये हैं- सत्य, दया, तपस्या, शौच, तितिक्षा, उचित - अनुचितका विचार, मनका संयम, इन्द्रियोंका संयम, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, त्याग, स्वाध्याय, सरलता, सन्तोष, समदर्शी महात्माओंकी सेवा, धीरे - धीरे सांसारिक भोगोंकी चेष्टासे निवृत्ति, मनुष्यके अभिमानपूर्ण प्रयत्नोंका फल उलटा ही होता है — ऐसा विचार, मौन, आत्मचिन्तन, प्राणियोंको अन्न आदिका यथायोग्य विभाजन, उनमें और विशेष करके मनुष्योंमें अपने आत्मा तथा इष्टदेवका भाव, संतोंके परम आश्रय भगवान् श्रीकृष्णके नाम-गुण - लीला आदिका श्रवण, कीर्तन, स्मरण, उनकी सेवा, पूजा और नमस्कार; उनके प्रति
दास्य, सख्य और आत्मसमर्पण - यह तीस प्रकारका आचरण सभी मनुष्योंका परम धर्म है ।
इसके पालनसे सर्वात्मा भगवान् प्रसन्न होते हैं ॥८-१२ ॥
नृणामयं परो धर्मः सर्वेषां समुदाहृतः ।
त्रिंशल्लक्षणवान्राजन्सर्वात्मा येन तुष्यति ॥१२
संस्कारा यदविच्छिन्नाः स द्विजोऽजो जगाद यम् ।
इज्याध्ययनदानानि विहितानि द्विजन्मनाम् ।
जन्मकर्मावदातानां क्रियाश्चाश्रमचोदिताः ॥ १३
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विप्रस्याध्ययनादीनि षडन्यस्याप्रतिग्रहः ।
राज्ञो वृत्तिः प्रजागोप्तुरविप्राद् वा करादिभिः ॥ १४
वैश्यस्तु वार्तावृत्तिश्च नित्यं ब्रह्मकुलानुगः ।
शूद्रस्य द्विजशुश्रूषा वृत्तिश्च स्वामिनो भवेत् ॥१५
वार्ता विचित्रा शालीनयायावरशिलोञ्छनम् ' ।
विप्रवृत्तिश्चतुर्धेयं श्रेयसी चोत्तरोत्तरा ॥ १६
जघन्यो नोत्तमां वृत्तिमनापदि भजेन्नरः ।
ऋते राजन्यमापत्सु सर्वेषामपि सर्वशः ॥१७
धर्मराज! जिनके वंशमें अखण्डरूपसे संस्कार होते आये हैं और जिन्हें ब्रह्माजीने संस्कारके योग्य स्वीकार किया है, उन्हें द्विज कहते हैं । जन्म और कर्मसे शुद्ध द्विजोंके लिये यज्ञ, अध्ययन, दान और ब्रह्मचर्य आदि आश्रमोंके विशेष कर्मोंका विधान है ॥१३ ॥
अध्ययन, अध्यापन, दान लेना, दान देना और यज्ञ करना, यज्ञ कराना - ये छः कर्म ब्राह्मणके हैं । क्षत्रियको दान नहीं लेना चाहिये । प्रजाकी रक्षा करनेवाले क्षत्रियका जीवन-निर्वाह ब्राह्मणके सिवा और सबसे यथायोग्य कर तथा दण्ड ( जुर्माना ) आदिके द्वारा होता है ॥१४ ॥
वैश्यको सर्वदा ब्राह्मणवंशका अनुयायी रहकर गोरक्षा, कृषि एवं व्यापारके द्वारा अपनी जीविका चलानी चाहिये । शूद्रका धर्म है द्विजातियोंकी सेवा । उसकी जीविकाका निर्वाह उसका स्वामी करता है ॥१५ ॥ ब्राह्मणके जीवन - निर्वाहके साधन चार प्रकारके हैं — वार्ता ',
शालीन, २ यायावर ' और शिलोञ्छन । इनमेंसे पीछे - पीछेकी वृत्तियाँ अपेक्षाकृत श्रेष्ठ हैं ॥१६ ॥ निम्नवर्णका पुरुष बिना आपत्तिकालके उत्तम वर्णकी वृत्तियोंका अवलम्बन न
करे । क्षत्रिय दान लेना छोड़कर ब्राह्मणकी शेष पाँचों वृत्तियोंका अवलम्बन ले सकता है । आपत्तिकालमें सभी सब वृत्तियोंको स्वीकार कर सकते हैं ॥१७ ॥
ऋतामृताभ्यां जीवेत मृतेन प्रमृतेन वा ।
सत्यानृताभ्यां जीवेत न श्ववृत्त्या कथञ्चन ॥१८
ऋतमुञ्छशिलं प्रोक्तममृतं यदयाचितम् ।
मृतं तु नित्ययाच्ञा स्यात् प्रमृतं कर्षणं स्मृतम् ॥१९
सत्यानृतं तु वाणिज्यं श्ववृत्तिर्नीचसेवनम् । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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वर्जयेत् तां सदा विप्रो राजन्यश्च जुगुप्सिताम् ।
सर्ववेदमयो विप्रः सर्वदेवमयो नृपः ॥२०
शमो दमस्तपः शौचं संतोषः क्षान्तिरार्जवम् ।
ज्ञानं दयाच्युतात्मत्वं सत्यं च ब्रह्मलक्षणम् ॥२१
शौर्यं वीर्यं धृतिस्तेजस्त्याग आत्मजयः क्षमा ।
ब्रह्मण्यता प्रसादश्च रक्षा च क्षत्रलक्षणम् ॥२२
देवगुर्वच्युते भक्तिस्त्रिवर्गपरिपोषणम् ।
आस्तिक्यमुद्यमो नित्यं नैपुणं वैश्यलक्षणम् ॥२३
शूद्रस्य संनतिः शौचं सेवा स्वामिन्यमायया ।
अमन्त्रयज्ञो ह्यस्तेयं सत्यं गोविप्ररक्षणम् ॥२४
स्त्रीणां च पतिदेवानां तच्छुश्रूषानुकूलता ।
तद्बन्धुष्वनुवृत्तिश्च नित्यं तद्व्रतधारणम् ॥२५
संमार्जनोपलेपाभ्यां गृहमण्डलवर्तनैः ।
स्वयं च मण्डिता नित्यं परिमृष्टपरिच्छदा ॥२६
कामैरुच्चावचैः साध्वी प्रश्रयेण दमेन च ।
वाक्यैः सत्यैः प्रियैः प्रेम्णा काले काले भजेत् पतिम् ॥२७
ऋत, अमृत, मृत, प्रमृत और सत्यानृत – इनमें से किसी भी वृत्तिका आश्रय ले, परन्तु श्वानवृत्तिका अवलम्बन कभी न करे ॥ १८ ॥ बाजारमें पड़े हुए अन्न ( उञ्छ ) तथा खेतोंमें पड़े
हुए अन्न ( शिल ) -को बीनकर ' शिलोञ्छ ' वृत्तिसे जीविका - निर्वाह करना ' ऋत ' है । बिना माँगे जो मिल जाय, उसी अयाचित ( शालीन ) वृत्तिके द्वारा जीवन निर्वाह करना ' अमृत ' है । कुछ नित्य माँगकर लाना अर्थात् ' यायावर ' वृत्तिके द्वारा जीवन - यापन करना ' मृत ' है । कृषि आदिके द्वारा ‘ वार्ता ’ वृत्तिसे जीवन - निर्वाह करना ' प्रमृत ' है ॥१९ ॥ वाणिज्य ‘ सत्यानृत ' है
और निम्नवर्णकी सेवा करना ' श्वानवृत्ति ' है । ब्राह्मण और क्षत्रियको इस अन्तिम निन्दित वृत्तिका कभी आश्रय नहीं लेना चाहिये । क्योंकि ब्राह्मण सर्ववेदमय और क्षत्रिय ( राजा ) सर्वदेवमय है ॥२० ॥ शम, दम, तप, शौच, सन्तोष, क्षमा, सरलता, ज्ञान, दया,
भगवत्परायणता और सत्य — ये ब्राह्मणके लक्षण हैं ॥२१ ॥
युद्धमें उत्साह, वीरता, धीरता, तेजस्विता, त्याग, मनोजय, क्षमा, ब्राह्मणोंके प्रति भक्ति, ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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अनुग्रह और प्रजाकी रक्षा करना - ये क्षत्रियके लक्षण हैं ॥२२ ॥ देवता, गुरु और भगवान्के
प्रति भक्ति, अर्थ, धर्म और काम- इन तीनों पुरुषार्थोंकी रक्षा करना; आस्तिकता, उद्योगशीलता और व्यावहारिक निपुणता - ये वैश्यके लक्षण हैं ॥ २३ ॥ उच्च वर्णोंके सामने
विनम्र रहना, पवित्रता, स्वामीकी निष्कपट सेवा, वैदिक मन्त्रोंसे रहित यज्ञ, चोरी न करना, सत्य तथा गौ, ब्राह्मणोंकी रक्षा करना - ये शूद्रके लक्षण हैं ॥ २४ ॥
पतिकी सेवा करना, उसके अनुकूल रहना, पतिके सम्बन्धियोंको प्रसन्न रखना और सर्वदा पतिके नियमोंकी रक्षा करना - ये पतिको ही ईश्वर माननेवाली पतिव्रता स्त्रियोंके धर्म हैं ॥२५ ॥ साध्वी स्त्रीको चाहिये कि झाड़ने - बुहारने, लीपने तथा चौक पूरने आदिसे घरको
और मनोहर वस्त्राभूषणोंसे अपने शरीरको अलंकृत रखे । सामग्रियोंको साफ - सुथरी रखे ॥२६ ॥ अपने पतिदेवकी छोटी - बड़ी इच्छाओंको समयके अनुसार पूर्ण करे । विनय,
इन्द्रिय - संयम, सत्य एवं प्रिय वचनोंसे प्रेमपूर्वक पतिदेवकी सेवा करे ॥ २७ ॥
संतुष्टालोलुपा दक्षा धर्मज्ञा प्रियसत्यवाक् ।
अप्रमत्ता शुचिः स्निग्धा पतिं त्वपतितं भजेत् ॥२८
या पतिं हरिभावेन भजेच्छ्रीरिव तत्परा ।
हर्यात्मना हरेर्लोके पत्या श्रीरिव मोदते ॥ २ ९
वृत्तिः सङ्करजातीनां तत्तत्कुलकृता भवेत् ।
अचौराणामपापानामन्त्यजान्तेऽवसायिनाम् ॥ ३०
प्रायः स्वभावविहितो नृणां धर्मो युगे युगे ।
वेददृग्भिः स्मृतो राजन्प्रेत्य चेह च शर्मकृत् ॥३१
वृत्त्या स्वभावकृतया वर्तमानः स्वकर्मकृत् ।
हित्वा स्वभावजं कर्म शनैर्निर्गुणतामियात् ॥३२
उप्यमानं मुहुः क्षेत्रं स्वयं निर्वीर्यतामियात् ।
न कल्पते पुनः सूत्यै उप्तं बीजं च नश्यति ॥३३
एवं कामाशयं चित्तं कामानामतिसेवया ।
विरज्येत यथा राजन्नाग्निवत् कामबिन्दुभिः ॥३४
यस्य यल्लक्षणं प्रोक्तं पुंसो वर्णाभिव्यञ्जकम् ।
यदन्यत्रापि दृश्येत तत् तेनैव विनिर्दिशेत् ॥३५
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जो कुछ मिल जाय, उसीमें सन्तुष्ट रहे; किसी भी वस्तुके लिये ललचावे नहीं । सभी कार्योंमें चतुर एवं धर्मज्ञ हो । सत्य और प्रिय बोले । अपने कर्तव्यमें सावधान रहे । पवित्रता और प्रेमसे परिपूर्ण रहकर, यदि पति पतित न हो तो, उसका सहवास करे ॥२८ ॥ जो
लक्ष्मीजीके समान पतिपरायणा होकर अपने पतिकी उसे साक्षात् भगवान्का स्वरूप समझकर सेवा करती है, उसके पतिदेव वैकुण्ठलोकमें भगवत्सारूप्यको प्राप्त होते हैं और वह लक्ष्मीजीके समान उनके साथ आनन्दित होती है ॥२९ ॥
युधिष्ठिर! जो चोरी तथा अन्यान्य पाप कर्म नहीं करते -उन अन्त्यज तथा चाण्डाल आदि अन्तेवसायी वर्णसंकर जातियोंकी वृत्तियाँ वे ही हैं, जो कुल परम्परासे उनके यहाँ चली आयी हैं ॥३० ॥ वेददर्शी ऋषि - मुनियोंने युग - युगमें प्रायः मनुष्योंके स्वभावके अनुसार धर्म
व्यवस्था की है । वही धर्म उनके लिये इस लोक और परलोकमें कल्याणकारी है ॥ ३१ ॥ जो
स्वाभाविक वृत्तिका आश्रय लेकर अपने स्वधर्मका पालन करता है, वह धीरे - धीरे उन स्वाभाविक कर्मोंसे भी ऊपर उठ जाता है और गुणातीत हो जाता है ॥३२ ॥
महाराज! जिस प्रकार बार - बार बोनेसे खेत स्वयं ही शक्तिहीन हो जाता है और उसमें अंकुर उगना बंद हो जाता है, यहाँतक कि उसमें बोया हुआ बीज भी नष्ट हो जाता है — उसी प्रकार यह चित्त, जो वासनाओंका खजाना है, विषयोंका अत्यन्त सेवन करनेसे स्वयं ही ऊब जाता है । परन्तु स्वल्प भोगोंसे ऐसा नहीं होता । जैसे एक - एक बूँद घी डालनेसे आग नहीं बुझती, परन्तु एक ही साथ अधिक घी पड़ जाय तो वह बुझ जाती है ॥३३-३४ ॥ जिस पुरुषके वर्णको बतलानेवाला जो लक्षण कहा गया है, वह यदि दूसरे वर्णवालेमें भी मिले तो उसे भी उसी वर्णका समझना चाहिये ॥ ३५ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे युधिष्ठिरनारदसंवादे सदाचारनिर्णयो नामैकादशोऽध्यायः ॥११ ॥
१. प्रा ० पा ० — शालीना यावज्जीवं शिलोञ्छनम् । १. यज्ञाध्ययनादि कराकर धन लेना । २. बिना माँगे जो कुछ मिल जाय, उसीमें निर्वाह करना । ३. नित्यप्रति धान्यादि माँग लाना । ४. किसानके खेत काटकर अन्न घरको ले जानेपर पृथ्वीपर जो कण पड़े रह जाते हैं, उन्हें ' शिल ' तथा बाजारमें पड़े हुए अन्नके दानोंको ‘ उञ्छ ’ कहते हैं । उन शिल और उञ्छोंको बीनकर अपना निर्वाह करना ' शिलोञ्छन ' वृत्ति है । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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अथ द्वादशोऽध्यायः ब्रह्मचर्य और वानप्रस्थ आश्रमोंके नियम नारद उवाच
ब्रह्मचारी गुरुकुले वसन्दान्तो गुरोर्हितम् ।
आचरन्दासवन्नीचो गुरौ सुदृढसौहृदः ॥१
सायं प्रातरुपासीत गुर्वग्न्यर्कसुरोत्तमान् ।
उभे सन्ध्ये च यतवाग् जपन्ब्रह्म समाहितः ॥२
छन्दांस्यधीयीत गुरोराहूतश्चेत् सुयन्त्रितः ।
उपक्रमेऽवसाने च चरणौ शिरसा नमेत् ॥३
मेखलाजिनवासांसि जटादण्डकमण्डलून् ।
बिभृयादुपवीतं च दर्भपाणिर्यथोदितम् ॥४
सायं प्रातश्चरेभैक्षं गुरवे तन्निवेदयेत् ।
भुञ्जीत यद्यनुज्ञातो नो चेदुपवसेत् क्वचित् ॥५
सुशीलो मितभुग् दक्षः श्रद्दधानो जितेन्द्रियः ।
यावदर्थं व्यवहरेत् स्त्रीषु स्त्रीनिर्जितेषु च ॥६
वर्जयेत् प्रमदागाथामगृहस्थो बृहद्व्रतः ।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्त्यपि यतेर्मनः ॥७
केशप्रसाधनोन्मर्दस्नपनाभ्यञ्जनादिकम् ।
गुरुस्त्रीभिर्युवतिभिः कारयेन्नात्मनो युवा ॥८
नन्वग्निः प्रमदा नाम घृतकुम्भसमः पुमान् ।
सुतामपि रहो जह्यादन्यदा यावदर्थकृत् ॥९
नारदजी कहते हैं - धर्मराज! गुरुकुलमें निवास करनेवाला ब्रह्मचारी अपनी इन्द्रियोंको वशमें रखकर दासके समान अपनेको छोटा माने, गुरुदेवके चरणोंमें सुदृढ़ अनुराग रखे और ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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उनके हितके कार्य करता रहे ॥१ ॥ सायंकाल और प्रातःकाल गुरु, अग्नि, सूर्य और श्रेष्ठ
देवताओंकी उपासना करे और मौन होकर एकाग्रतासे गायत्रीका जप करता हुआ दोनों समयकी सन्ध्या करे ॥ २ ॥
गुरुजी जब बुलावें तभी पूर्णतया अनुशासनमें रहकर उनसे वेदोंका स्वाध्याय करे । पाठके प्रारम्भ और अन्तमें उनके चरणोंमें सिर टेककर प्रणाम करे ॥३ ॥ शास्त्रकी आज्ञाके
अनुसार मेखला, मृगचर्म, वस्त्र, जटा, दण्ड कमण्डलु, यज्ञोपवीत तथा हाथमें कुश धारण
करे ॥४ ॥ सायंकाल और प्रातःकाल भिक्षा माँगकर लावे और उसे गुरुजीको समर्पित कर दे ।
वे आज्ञा दें, तब भोजन करे और यदि कभी आज्ञा न दें तो उपवास कर ले ॥५ ॥
अपने शीलकी रक्षा करे । थोड़ा खाये । अपने कामोंको निपुणताके साथ करे । श्रद्धा रखे और इन्द्रियोंको अपने वशमें रखे । स्त्री और स्त्रियोंके वशमें रहनेवालोंके साथ जितनी आवश्यकता हो, उतना ही व्यवहार करे || ६ || जो गृहस्थ नहीं है और ब्रह्मचर्यका व्रत लिये हुए है, उसे स्त्रियोंकी चर्चासे ही अलग रहना चाहिये । इन्द्रियाँ बड़ी बलवान् हैं । ये प्रयत्नपूर्वक साधन करनेवालोंके मनको भी क्षुब्ध करके खींच लेती हैं ॥७ ॥ युवक ब्रह्मचारी युवती
गुरुपत्नियोंसे बाल सुलझवाना, शरीर मलवाना, स्नान करवाना, उबटन लगवाना इत्यादि कार्य न करावे ॥८ ॥ स्त्रियाँ आगके समान हैं और पुरुष घीके घड़ेके समान । एकान्तमें तो
अपनी कन्याके साथ भी न रहना चाहिये । जब वह एकान्तमें न हो, तब भी आवश्यकताके अनुसार ही उसके पास रहना चाहिये ॥ ९ ॥
कल्पयित्वाऽऽत्मना यावदाभासमिदमीश्वरः ।
द्वैतं तावन्न विरमेत् ततो ह्यस्य विपर्ययः ॥१०
एतत् सर्वं गृहस्थस्य समाम्नातं यतेरपि ।
गुरुवृत्तिर्विकल्पेन गृहस्थस्यर्तुगामिनः १ ॥११
अञ्जनाभ्यञ्जनोन्मर्दस्त्र्यवलेखामिषं मधु ।
स्रग्गन्धलेपालंकारांस्त्यजेयुर्ये धृतव्रताः ॥१२
उषित्वैवं गुरुकुले द्विजोऽधीत्यावबुध्य च ।
त्रयीं साङ्गोपनिषदं यावदर्थं यथाबलम् ॥१३
दत्त्वा वरमनुज्ञातो गुरोः कामं यदीश्वरः ।
गृहं वनं वा प्रविशेत् प्रव्रजेत् तत्र वा वसेत् ॥१४
अग्नौ गुरावात्मनि च सर्वभूतेष्वधोक्षजम् । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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भूतैः स्वधामभिः पश्येदप्रविष्टं प्रविष्टवत् ॥१५
एवंविधो ब्रह्मचारी वानप्रस्थो यतिर्गृही ।
चरन्विदितविज्ञानः परं ब्रह्माधिगच्छति ॥१६
-जबतक यह जीव आत्मसाक्षात्कारके द्वारा इन देह और इन्द्रियोंको प्रतीतिमात्र निश्चय करके स्वतन्त्र नहीं हो जाता, तबतक ' मैं पुरुष हूँ और यह स्त्री है ' – यह द्वैत नहीं मिटता और तबतक यह भी निश्चित है कि ऐसे पुरुष यदि स्त्रीके संसर्गमें रहेंगे, तो उनकी उनमें भोग्यबुद्धि हो ही जायगी ॥१० ॥
ये सब शील - रक्षादि गुण गृहस्थके लिये और संन्यासीके लिये भी विहित हैं । गृहस्थके लिये गुरुकुलमें रहकर गुरुकी सेवा - शुश्रूषा वैकल्पिक है, क्योंकि ऋतुगमनके कारण उसे वहाँसे अलग भी होना पड़ता है ॥११ ॥
जो ब्रह्मचर्यका व्रत धारण करें, उन्हें चाहिये कि वे सुरमा या तेल न लगावें । उबटन न मलें । स्त्रियोंके चित्र न बनावें । मांस और मद्यसे कोई सम्बन्ध न रखें । फूलोंके हार, इत्र- फुलेल, चन्दन और आभूषणोंका त्याग कर दें ॥ १२ ॥
इस प्रकार गुरुकुलमें निवास करके द्विजातिको अपनी शक्ति और आवश्यकताके अनुसार वेद, उनके अंग - शिक्षा, कल्प आदि और उपनिषदोंका अध्ययन तथा ज्ञान प्राप्त करना चाहिये ॥१३ ॥
फिर यदि सामर्थ्य हो तो गुरुको मुँहमाँगी दक्षिणा देनी चाहिये । इसके बाद उनकी आज्ञासे गृहस्थ, वानप्रस्थ अथवा संन्यास आश्रममें प्रवेश करे या आजीवन ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए उसी आश्रममें रहे ॥१४ ॥
यद्यपि भगवान् स्वरूपतः सर्वत्र एकरस स्थित हैं, अतएव उनका कहीं प्रवेश करना या निकलना नहीं हो सकता - फिर भी अग्नि, गुरु, आत्मा और समस्त प्राणियोंमें अपने आश्रित जीवोंके साथ वे विशेषरूपसे विराजमान हैं । इसलिये उनपर सदा दृष्टि जमी रहनी चाहिये ॥१५ ॥
इस प्रकार आचरण करनेवाला ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ, संन्यासी अथवा गृहस्थ विज्ञानसम्पन्न होकर परब्रह्मतत्त्वका अनुभव प्राप्त कर लेता है ॥१६ ॥
वानप्रस्थस्य वक्ष्यामि नियमान्मुनिसम्मतान् ” ।
यानातिष्ठन् मुनिर्गच्छेदृषिलोकमिहाञ्जसा ॥१७
न कृष्टपच्यमश्नीयादकृष्टं चाप्यकालतः ।
अग्निपक्वमथामं वा अर्कपक्वमुताहरेत् ॥१८
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वन्यैश्चरुपुरोडाशान् निर्वपेत् ” कालचोदितान् ।
लब्धे नवे नवेऽन्नाद्ये पुराणं तु परित्यजेत् ॥१९
अग्न्यर्थमेव शरणमुटजं वाद्रिकन्दराम् “ ।
श्रयेत हिमवाय्वग्निवर्षार्कातपषाट् स्वयम् ॥ २०
केशरोमनखश्मश्रुमलानि जटिलो दधत् ।
कमण्डल्वजिने दण्डवल्कलाग्निपरिच्छदान् ॥२१
चरेद् वने द्वादशाब्दानष्टौ वा चतुरो मुनिः ।
द्वावेकं वा यथा बुद्धिर्न विपद्येत कृच्छ्रतः ॥२२
यदाकल्पः स्वक्रियायां व्याधिभिर्जरयाथवा ७ ।
आन्वीक्षिक्यां वा विद्यायां कुर्यादनशनादिकम् ॥२३
अब मैं ऋषियोंके मतानुसार वानप्रस्थ आश्रमके नियम बतलाता हूँ । इनका आचरण करनेसे वानप्रस्थ - आश्रमीको अनायास ही ऋषियोंके लोक महर्लोककी प्राप्ति हो जाती है ॥१७ ॥
वानप्रस्थ - आश्रमीको जोती हुई भूमिमें उत्पन्न होनेवाले चावल, गेहूँ आदि अन्न नहीं खाने चाहिये । बिना जोते पैदा हुआ अन्न भी यदि असमयमें पका हो, तो उसे भी न खाना चाहिये । आगसे पकाया हुआ या कच्चा अन्न भी न खाय । केवल सूर्यके तापसे पके हुए कन्द, मूल, फल आदिका ही सेवन करे ॥१८ ॥
जंगलोंमें अपने - आप पैदा हुए धान्योंसे नित्य नैमित्तिक चरु और पुरोडाशका हवन करे । जब नये - नये अन्न, फल, फूल आदि मिलने लगें, तब पहलेके इकट्ठे किये हुए अन्नका परित्याग कर दे ॥१९ ॥
अग्निहोत्रके अग्निकी रक्षाके लिये ही घर, पर्णकुटी अथवा पहाड़की गुफाका आश्रय ले । स्वयं शीत, वायु, अग्नि, वर्षा और घामका सहन करे ॥२० ॥
सिरपर जटा धारण करे और केश, रोम, नख एवं दाढ़ी - मूँछ न कटवाये तथा मैलको भी शरीरसे अलग न करे । कमण्डलु, मृगचर्म, दण्ड, वल्कल - वस्त्र और अग्निहोत्रकी सामग्रियोंको अपने पास रखे ॥२१ ॥
विचारवान् पुरुषको चाहिये कि बारह, आठ, चार, दो या एक वर्षतक वानप्रस्थ-आश्रमके नियमोंका पालन करे । ध्यान रहे कि कहीं अधिक तपस्याका क्लेश सहन करनेसे बुद्धि बिगड़ न जाय ॥२२ ॥
वानप्रस्थी पुरुष जब रोग अथवा बुढ़ापेके कारण अपने कर्म पूरे न कर सके और ****** ebook converter DEMO Watermarks *******