श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 1421–1430
श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1421–1430
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यद् यस्य वानिषिद्धं स्याद् येन यत्र यतो नृप ।
स तेनेहेत कर्माणि नरो नान्यैरनापदि ॥६६
एतैरन्यैश्च वेदोक्तैर्वर्तमानः स्वकर्मभिः ।
गृहेऽप्यस्य गतिं यायाद् राजंस्तद्भक्तिभाङ्नरः ॥ ६७
यथा हि यूयं नृपदेव दुस्त्यजा-दापद्गणादुत्तरतात्मनः प्रभोः ।
यत्पादपङ्केरुहसेवया भवा-नहार्षीन्निर्जितदिग्गजः क्रतून् ॥६८
अहं पुराभवं कश्चिद् गन्धर्व उपबर्हणः ।
नाम्नातीते महाकल्पे गन्धर्वाणां सुसम्मतः ॥६९
रूपपेशलमाधुर्यसौगन्ध्यप्रियदर्शनः ।
स्त्रीणां प्रियतमो नित्यं मत्तस्तु पुरुलम्पटः ॥७०
जो विचारशील पुरुष स्वानुभूतिसे आत्माके त्रिविध अद्वैतका साक्षात्कार करते हैं — वे जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति और द्रष्टा, दर्शन तथा दृश्यके भेदरूप स्वप्नको मिटा देते हैं । ये अद्वैत तीन प्रकारके हैं — भावाद्वैत, क्रियाद्वैत और द्रव्याद्वैत ॥ ६२ ॥ जैसे वस्त्र सूतरूप ही होता है,
वैसे ही कार्य भी कारणमात्र ही है । क्योंकि भेद तो वास्तवमें है नहीं । इस प्रकार सबकी एकताका विचार ‘ भावाद्वैत ' है ॥ ६३ ॥ युधिष्ठिर! मन, वाणी और शरीरसे होनेवाले सब कर्म
स्वयं परब्रह्म परमात्मामें ही हो रहे हैं, उसीमें अध्यस्त हैं — इस भावसे समस्त कर्मोंको समर्पित कर देना ‘ क्रियाद्वैत ' है ॥६४ ॥ स्त्री - पुत्रादि सगे - सम्बन्धी एवं संसारके अन्य समस्त
प्राणियोंके तथा अपने स्वार्थ और भोग एक ही हैं, उनमें अपने और परायेका भेद नहीं है— इस प्रकारका विचार ' द्रव्याद्वैत ' है ॥६५ ॥
युधिष्ठिर! जिस पुरुषके लिये जिस द्रव्यको जिस समय जिस उपायसे जिससे ग्रहण करना शास्त्राज्ञाके विरुद्ध न हो, उसे उसीसे अपने सब कार्य सम्पन्न करने चाहिये; आपत्तिकालको छोड़कर इससे अन्यथा नहीं करना चाहिये ॥ ६६ ॥ महाराज! भगवद्भक्त
मनुष्य वेदमें कहे हुए इन कर्मोंके तथा अन्यान्य स्वकर्मोंके अनुष्ठानसे घरमें रहते हुए भी श्रीकृष्णकी गतिको प्राप्त करता है ॥ ६७ ॥ युधिष्ठिर! जैसे तुम अपने स्वामी भगवान्
श्रीकृष्णकी कृपा और सहायतासे बड़ी - बड़ी कठिन विपत्तियोंसे पार हो गये हो और उन्हींके चरणकमलोंकी सेवासे समस्त भूमण्डलको जीतकर तुमने बड़े - बड़े राजसूय आदि यज्ञ किये हैं ॥६८ ॥
पूर्वजन्ममें इसके पहलेके महाकल्पमें मैं एक गन्धर्व था । मेरा नाम था उपबर्हण और ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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गन्धर्वोंमें मेरा बड़ा सम्मान था ॥६९ ॥ मेरी सुन्दरता, सुकुमारता और मधुरता अपूर्व थी । मेरे
शरीरमेंसे सुगन्धिं निकला करती और देखने में मैं बहुत अच्छा लगता । स्त्रियाँ मुझसे बहुत प्रेम
करतीं और मैं सदा प्रमादमें ही रहता । मैं अत्यन्त विलासी था ॥७० ॥
एकदा देवसत्रे तु गन्धर्वाप्सरसां गणाः ।
उपहूता विश्वसृग्भिर्हरिगाथोपगायने ॥७१
अहंच गायंस्तद्विद्वान् स्त्रीभिः परिवृतो गतः ।
ज्ञात्वा विश्वसृजस्तन्मे हेलनं शेपुरोजसा ।
याहि त्वं शूद्रतामाशु नष्टश्रीः कृतहेलनः ॥७२
तावद्दास्यामहं जज्ञे तत्रापि ब्रह्मवादिनाम् ।
शुश्रूषयानुषङ्गेण प्राप्तोऽहं ब्रह्मपुत्रताम् ॥७३
धर्मस्ते गृहमेधीयो वर्णितः पापनाशनः ।
गृहस्थो येन पदवीमञ्जसा न्यासिनामियात् ॥७४
यूयं नृलोके बत भूरिभागा लोकं पुनाना मुनयोऽभियन्ति । येषां गृहानावसतीति साक्षाद् गूढं परं ब्रह्म मनुष्यलिङ्गम् ॥७५ स वा अयं ब्रह्म महद्विमृग्यं कैवल्यनिर्वाणसुखानुभूतिः । प्रियः सुहृद् वः खलु मातुलेय आत्मार्हणीयो विधिकृद् गुरुश्च ॥७६ न यस्य साक्षाद्भवपद्मजादिभी रूपं धिया वस्तुतयोपवर्णितम् । मौनेन भक्त्योपशमेन पूजितः प्रसीदतामेष स सात्वतां पतिः ॥७७ एक बार देवताओंके यहाँ ज्ञानसत्र हुआ । उसमें बड़े - बड़े प्रजापति आये थे । भगवान्की लीलाका गान करनेके लिये उन लोगोंने गन्धर्व और अप्सराओंको बुलाया ॥ ७१ ॥ मैं जानता
था कि वह संतोंका समाज है और वहाँ भगवान्की लीलाका ही गान होता है । फिर भी मैं ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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स्त्रियोंके साथ लौकिक गीतोंका गान करता हुआ उन्मत्तकी तरह वहाँ जा पहुँचा । देवताओंने देखा कि यह तो हम लोगोंका अनादर कर रहा है । उन्होंने अपनी शक्तिसे मुझे शाप दे दिया कि ' तुमने हमलोगोंकी अवहेलना की है, इसलिये तुम्हारी सारी सौन्दर्य - सम्पत्ति नष्ट हो जाय और तुम शीघ्र ही शूद्र हो जाओ ' ॥ ७२ ॥ उनके शापसे मैं दासीका पुत्र हुआ । किन्तु उस शूद्र-जीवनमें किये हुए महात्माओंके सत्संग और सेवा - शुश्रूषाके प्रभावसे मैं दूसरे जन्ममें
ब्रह्माजीका पुत्र हुआ ॥ ७३ ॥ संतोंकी अवहेलना और सेवाका यह मेरा प्रत्यक्ष अनुभव है ।
संत - सेवासे ही भगवान् प्रसन्न होते हैं । मैंने तुम्हें गृहस्थोंका पापनाशक धर्म बतला दिया । इस धर्मके आचरणसे गृहस्थ भी अनायास ही संन्यासियोंको मिलनेवाला परमपद प्राप्त कर लेता है ॥७४ ॥
युधिष्ठिर! इस मनुष्यलोकमें तुमलोगोंके भाग्य अत्यन्त प्रशंसनीय हैं; क्योंकि तुम्हारे घरमें साक्षात् परब्रह्म परमात्मा मनुष्यका रूप धारण करके गुप्तरूपसे निवास करते हैं । इसीसे सारे संसारको पवित्र कर देनेवाले ऋषि - मुनि बार - बार उनका दर्शन करनेके लिये चारों ओरसे तुम्हारे पास आया करते हैं ॥ ७५ ॥ बड़े - बड़े महापुरुष निरन्तर जिनको ढूँढते रहते हैं,
जो मायाके लेशसे रहित परम शान्त परमानन्दानुभव - स्वरूप परब्रह्म परमात्मा हैं — वे ही तुम्हारे प्रिय, हितैषी, ममेरे भाई, पूज्य, आज्ञाकारी, गुरु और स्वयं आत्मा श्रीकृष्ण हैं ॥ ७६ ॥
शंकर, ब्रह्मा आदि भी अपनी सारी बुद्धि लगाकर ' वे यह हैं ' – इस रूपमें उनका वर्णन नहीं कर सके । फिर हम तो कर ही कैसे सकते हैं । हम मौन, भक्ति और संयमके द्वारा ही उनकी पूजा करते हैं । कृपया हमारी यह पूजा स्वीकार करके भक्तवत्सल भगवान् हमपर प्रसन्न हों ॥७७ ॥
श्रीशुक उवाच
इति देवर्षिणा प्रोक्तं निशम्य भरतर्षभः ।
पूजयामास सुप्रीतः कृष्णं च प्रेमविह्वलः ॥७८
कृष्णपार्थावुपामन्त्र्य पूजितः प्रययौ मुनिः ।
श्रुत्वा कृष्णं परं ब्रह्म पार्थः परमविस्मितः ॥७९
इति दाक्षायणीनां ते पृथग्वंशाः प्रकीर्तिताः ।
देवासुरमनुष्याद्या लोका यत्र चराचराः ॥८०
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित! देवर्षि नारदका यह प्रवचन सुनकर राजा युधिष्ठिरको अत्यन्त आनन्द हुआ । उन्होंने प्रेम - विह्वल होकर देवर्षि नारद और भगवान् श्रीकृष्णकी पूजा की ॥७८ ॥
देवर्षि नारद भगवान् श्रीकृष्ण और राजा युधिष्ठिरसे विदा लेकर और उनके द्वारा ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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सत्कार पाकर चले गये । भगवान् श्रीकृष्ण ही परब्रह्म हैं, यह सुनकर युधिष्ठिरके आश्चर्यकी सीमा न रही ॥ ७ ९ ॥ परीक्षित्! इस प्रकार मैंने तुम्हें दक्षपुत्रियोंके वंशोंका अलग - अलग वर्णन सुनाया । उन्हींके वंशमें देवता, असुर, मनुष्य आदि और सम्पूर्ण चराचरकी सृष्टि हुई है ॥८० ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे वैयासिक्यामष्टादशसाहस्यां पारमहंस्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे प्रह्रादानुचरिते युधिष्ठिरनारदसंवादे सदाचारनिर्णयो नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥१५ ॥
॥ इति सप्तमः स्कन्धः समाप्तः ॥ ॥ हरिः ॐ तत्सत् ॥ १. प्रा ० पा ० — भूतानि । २. प्रा ० पा ० — मुच्यते दैवसङ्गतम् । ३. प्रा ० पा०-क्कायकर्मभिः । १. प्रा ० पा ० — शिवमया । २. प्रा ० पा ० – हि । | — १. प्रा ० पा ० — उपशान्तमतिर्विजह्यात् । २. प्रा ० पा ० - आवर्तते । ३. प्रा ० पा०-पशुस्ततः । १. प्रा ० पा ० – विश्वोऽथ । २. प्रा ० पा ० – तत्रस्थोऽपि । -****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराणम् अष्टमः स्कन्धः अथ प्रथमोऽध्यायः मन्वन्तरोंका वर्णन राजोवाच
स्वायम्भुवस्येह गुरो वंशोऽयं विस्तराच्छ्रुतः ।
यत्र े विश्वसृजां सर्गो मनूनन्यान्वदस्व नः ॥१
यत्र े यत्र हरेर्जन्म कर्माणि च महीयसः ।
गृणन्ति कवयो ब्रह्मंस्तानि नो वद शृण्वताम् ॥२
यद्यस्मिन्नन्तरे ४ ब्रह्मन्भगवान्विश्वभावनः ।
कृतवान्कुरुते कर्ता ' ह्यतीतेऽनागतेऽद्य वा ॥ ३
ऋषिरुवाच मनवोऽस्मिन्व्यतीताः षट् कल्पे स्वायम्भुवादयः । ७ आद्यस्ते कथितो यत्र देवादीनां च सम्भवः ॥४
आकूत्यां देवहूत्यां त “ दुहित्रोस्तस्य वै मनोः ।
धर्मज्ञानोपदेशार्थं भगवान्पुत्रतां गतः ॥५
राजा परीक्षितने पूछा— गुरुदेव! स्वायम्भुव मनुका वंश - विस्तार मैंने सुन लिया । इसी
वंशमें उनकी कन्याओंके द्वारा मरीचि आदि प्रजापतियोंने अपनी वंशपरम्परा चलायी थी ।
अब आप हमसे दूसरे मनुओं का वर्णन कीजिये ॥ १ ॥
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ब्रह्मन्! ज्ञानी महात्मा जिस - जिस मन्वन्तरमें महामहिम भगवान्के जिन - जिन अवतारों और लीलाओंका वर्णन करते हैं, उन्हें आप अवश्य सुनाइये । हम बड़ी श्रद्धासे उनका श्रवण करना चाहते हैं ॥२ ॥
भगवन्! विश्वभावनभगवान् बीते हुए मन्वन्तरोंमें जो - जो लीलाएँ कर चुके हैं, वर्तमान मन्वन्तरमें जो कर रहे हैं और आगामी मन्वन्तरोंमें जो कुछ करेंगे, वह सब हमें सुनाइये || ३ || श्रीशुकदेवजीने कहा – इस कल्पमें स्वायम्भुव आदि छः मन्वन्तर बीत चुके हैं । उनमेंसे पहले मन्वन्तरका मैंने वर्णन कर दिया, उसीमें देवता आदिकी उत्पत्ति हुई थी ॥४ ॥
स्वायम्भुव मनुकी पुत्री आकूतिसे यज्ञपुरुषके रूपमें धर्मका उपदेश करनेके लिये तथा देवहूतिसे कपिलके रूपमें ज्ञानका उपदेश करनेके लिये भगवान्ने उनके पुत्ररूपसे अवतार ग्रहण किया था || ५ ||
कृतं पुरा भगवतः कपिलस्यानुवर्णितम् ।
आख्यास्ये भगवान्यज्ञो यच्चकार कुरूद्वह ॥६
विरक्तः कामभोगेषु शतरूपापतिः प्रभुः ।
विसृज्य राज्यं तपसे सभार्यो वनमाविशत् ॥७
सुनन्दायां वर्षशतं पदैकेन भुवं स्पृशन् ।
तप्यमानस्तपो घोरमिदमन्वाह’भारत ॥८
मनुरुवाच
येन े चेतयते विश्वं विश्वं चेतयते न यम् ।
यो जागर्ति शयानेऽस्मिन्नायं तं वेद वेदर सः ॥९
आत्मावास्यमिदं विश्वं यत् किञ्चिज्जगत्यां जगत् ।
तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम् ॥१०
यं न पश्यति पश्यन्तं चक्षुर्यस्य न रिष्यति ।
तं भूतनिलयं देवं सुपर्णमुपधावत ॥११
न ४ यस्याद्यन्तौ मध्यं च स्वः परो नान्तरं बहिः ।
विश्वस्यामूनि यद् यस्माद् विश्वं च तदृतं महत् ॥१२
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परीक्षित्! भगवान् कपिलका वर्णन मैं पहले ही ( तीसरे स्कन्धमें ) कर चुका हूँ । अब भगवान् यज्ञपुरुषने आकूतिके गर्भसे अवतार लेकर जो कुछ किया, उसका वर्णन करता हूँ ॥६ ॥ परीक्षित्! भगवान् स्वायम्भुव मनुने समस्त कामनाओं और भोगोंसे विरक्त होकर
राज्य छोड़ दिया । वे अपनी पत्नी शतरूपाके साथ तपस्या करनेके लिये वनमें चले गये ॥७ ॥ परीक्षित्! उन्होंने सुनन्दा नदीके किनारे पृथ्वीपर एक पैरसे खड़े रहकर सौ
वर्षतक घोर तपस्या की । तपस्या करते समय वे प्रतिदिन इस प्रकार भगवान्की स्तुति करते 2711211 मनुजी कहा करते थे- जिनकी चेतनाके स्पर्शमात्रसे यह विश्व चेतन हो जाता है, किन्तु यह विश्व जिन्हें चेतनाका दान नहीं कर सकता; जो इसके सो जानेपर प्रलयमें भी जागते रहते हैं, जिनको यह नहीं जान सकता, परन्तु जो इसे जानते हैं - वही परमात्मा हैं ॥९ ॥ यह
सम्पूर्ण विश्व और इस विश्वमें रहनेवाले समस्त चर - अचर प्राणी - सब उन परमात्मासे ही ओतप्रोत हैं । इसलिये संसारके किसी भी पदार्थमें मोह न करके उसका त्याग करते हुए ही जीवन - निर्वाहमात्रके लिये उपभोग करना चाहिये । तृष्णाका सर्वथा त्याग कर देना चाहिये । भला, ये संसारकी सम्पत्तियाँ किसकी हैं? ॥१० ॥ भगवान् सबके साक्षी हैं । उन्हें बुद्धि-वृत्तियाँ या नेत्र आदि इन्द्रियाँ नहीं देख सकतीं । परन्तु उनकी ज्ञानशक्ति अखण्ड है । समस्त
प्राणियोंके हृदयमें रहनेवाले उन्हीं स्वयंप्रकाश असंग परमात्माकी शरण ग्रहण करो || ११ ॥ जिनका न आदि है न अन्त, फिर मध्य तो होगा ही कहाँसे? जिनका न कोई अपना है और न पराया और न बाहर है न भीतर, वे विश्वके आदि, अन्त, मध्य, अपने - पराये, बाहर और भीतर – सब कुछ हैं । उन्हींकी सत्तासे विश्वकी सत्ता है । वही अनन्त वास्तविक सत्य परब्रह्म हैं ॥१२ ॥
स विश्वकायः पुरुहूत ईशः सत्यः १ स्वयंज्योतिरजः पुराणः । धत्तेऽस्य जन्माद्यजयाऽऽत्मशक्त्या तां विद्ययोदस्य निरीह आस्ते ॥१३
अथाग्रे ३ ऋषयः कर्माणीहन्तेऽकर्महेतवे ।
ईहमानो हि पुरुषः प्रायोऽनीहां प्रपद्यते ॥१४
ईहते भगवानीशो न हि तत्र विषज्जते ।
आत्मलाभेन पूर्णार्थो नावसीदन्ति येऽनु तम् ॥१५
तमीहमानं निरहङ्कृतं बुधं निराशिषं पूर्णमनन्यचोदितम् । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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नॄन् शिक्षयन्तं निजवर्त्मसंस्थितं प्रभुं प्रपद्येऽखिलधर्मभावनम् ॥१६ श्रीशुक उवाच
इति मन्त्रोपनिषदं व्याहरन्तं समाहितम् ।
दृष्ट्वासुरा यातुधाना जग्धुमभ्यद्रवन् क्षुधा ॥१७
तांस्तथावसितान् वीक्ष्य यज्ञः सर्वगतो हरिः ।
यामैः परिवृतो देवैर्हत्वाशासत् त्रिविष्टपम् ॥१८
वही परमात्मा विश्वरूप हैं । उनके अनन्त नाम हैं । वे सर्वशक्तिमान् सत्य, स्वयंप्रकाश, अजन्मा और पुराणपुरुष हैं । वे अपनी मायाशक्तिके द्वारा ही विश्वसृष्टिके जन्म आदिको स्वीकार कर लेते हैं और अपनी विद्याशक्तिके द्वारा उसका त्याग करके निष्क्रिय, सत्स्वरूपमात्र रहते हैं ॥१३ ॥
इसीसे ऋषि - मुनि नैष्कर्म्यस्थिति अर्थात् ब्रह्मसे एकत्व प्राप्त करनेके लिये पहले कर्मयोगका अनुष्ठान करते हैं । प्रायः कर्म करनेवाला पुरुष ही अन्तमें निष्क्रिय होकर कर्मोंसे छुट्टी पा लेता है ॥१४ ॥
यों तो सर्वशक्तिमान् भगवान् भी कर्म करते हैं, परन्तु वे आत्मलाभसे पूर्णकाम होनेके कारण उन कर्मोंमें आसक्त नहीं होते । अतः उन्हींका अनुसरण करके अनासक्त रहकर कर्म करनेवाले भी कर्मबन्धनसे मुक्त ही रहते हैं ॥१५ ॥
भगवान् ज्ञानस्वरूप हैं, इसलिये उनमें अहंकारका लेश भी नहीं है । वे सर्वतः परिपूर्ण हैं, इसलिये उन्हें किसी वस्तुकी कामना नहीं है । वे बिना किसीकी प्रेरणाके स्वच्छन्दरूपसे ही कर्म करते हैं । वे अपनी ही बनायी हुई मर्यादामें स्थित रहकर अपने कर्मोंके द्वारा मनुष्योंको शिक्षा देते हैं । वे ही समस्त धर्मोंके प्रवर्तक और उनके जीवनदाता हैं । मैं उन्हीं प्रभुकी शरणमें ॥१६ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं— परीक्षित्! एक बार स्वायम्भुव मनु एकाग्रचित्तसे इस मन्त्रमय उपनिषत् - स्वरूप श्रुतिका पाठ कर रहे थे । उन्हें नींदमें अचेत होकर बड़बड़ाते जान भूखे असुर और राक्षस खा डालनेके लिये उनपर टूट पड़े ॥१७ ॥
यह देखकर अन्तर्यामी भगवान् यज्ञपुरुष अपने पुत्र याम नामक देवताओंके साथ वहाँ आये । उन्होंने उन खा डालनेके निश्चयसे आये हुए असुरोंका संहार कर डाला और फिर वे इन्द्रके पदपर प्रतिष्ठित होकर स्वर्गका शासन करने लगे ॥१८ ॥
स्वारोचिषो द्वितीयस्तु मनुरग्नेः सुतोऽभवत् ।
द्युमत्सुषेणरोचिष्मत्प्रमुखास्तस्य चात्मजाः ॥१९
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तत्रेन्द्रो रोचनस्त्वासीद् देवाश्च तुषितादयः ।
ऊर्जस्तम्भादयः सप्त ऋषयो ब्रह्मवादिनः ॥२०
ऋषेस्तु वेदशिरसस्तुषिता नाम पत्न्यभूत् ।
तस्यां जज्ञे ततो देवो विभुरित्यभिविश्रुतः ॥२१
अष्टाशीतिसहस्राणि मुनयो ये धृतव्रताः ।
अन्वशिक्षन्व्रतं ' तस्य कौमारब्रह्मचारिणः ॥२२
तृतीय उत्तमो नाम प्रियव्रतसुतो मनुः ।
पवनः सृञ्जयो यज्ञहोत्राद्यास्तत्सुता नृप े ॥ २३
वसिष्ठतनयाः सप्त ऋषयः प्रमदादयः ।
सत्या वेदश्रुता भद्रा देवा इन्द्रस्तु सत्यजित् ॥२४
धर्मस्य सूनृतायां तु भगवान्पुरुषोत्तमः ।
सत्यसेन इति ख्यातो जातः सत्यव्रतैः सह ॥२५
सोऽनृतव्रतदुःशीलानसतो यक्षराक्षसान् ।
भूतद्रुहो भूतगणांस्त्ववधीत् सत्यजित्सखः ॥ २६
चतुर्थ उत्तमभ्राता मनुर्नाम्ना च तामसः ।
पृथुः ३ ख्यातिर्नरः केतुरित्याद्या दश तत्सुताः ॥२७
सत्यका हरयो वीरा देवास्त्रिशिख ईश्वरः ।
ज्योतिर्धामादयः सप्त ऋषयस्तामसेऽन्तरे ॥२८
देवा वैधृतयो नाम विधृतेस्तनया नृप ।
नष्टाः कालेन यैर्वेदा विधृताः स्वेन तेजसा ॥२९
तत्रापि जज्ञे भगवान्हरिण्यां हरिमेधसः ।
हरिरित्याहृतो येन गजेन्द्रो मोचितो ग्रहात् ॥३०
परीक्षित्! दूसरे मनु हुए स्वारोचिष । वे अग्निके पुत्र थे । उनके पुत्रोंके नाम थे — द्युमान्, सुषेण और रोचिष्मान् आदि ॥१९ ॥ उस मन्वन्तरमें इन्द्रका नाम था रोचन, प्रधान देवगण थे
तुषित आदि । ऊर्जस्तम्भ आदि वेदवादीगण सप्तर्षि थे ॥२० ॥ उस मन्वन्तरमें वेदशिरा
नामके ऋषिकी पत्नी तुषिता थीं । उनके गर्भसे भगवान्ने अवतार ग्रहण किया और विभु नामसे प्रसिद्ध हुए ॥२१ ॥ वे आजीवन नैष्ठिक ब्रह्मचारी रहे । उन्हींके आचरणसे शिक्षा ग्रहण
करके अठासी हजार व्रतनिष्ठ ऋषियोंने भी ब्रह्मचर्यव्रतका पालन किया ॥२२ ॥
तीसरे मनु थे उत्तम । वे प्रियव्रतके पुत्र थे । उनके पुत्रोंके नाम थे - पवन, संजय, यज्ञहोत्र आदि ॥२३ ॥ उस मन्वन्तरमें वसिष्ठजीके प्रमद आदि सात पुत्र सप्तर्षि थे । सत्य, वेदश्रुत
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और भद्र नामक देवताओंके प्रधान गण थे और इन्द्रका नाम था सत्यजित् ॥२४ ॥ उस समय
धर्मकी पत्नी सूनृताके गर्भसे पुरुषोत्तमभगवान्ने सत्यसेनके नामसे अवतार ग्रहण किया था । उनके साथ सत्यव्रत नामके देवगण भी थे ॥२५ ॥ उस समय इन्द्र सत्यजित्के सखा
बनकर भगवान्ने असत्यपरायण, दुःशील और दुष्ट यक्षों, राक्षसों एवं जीवद्रोही भूतगणोंका संहार किया ॥२६ ॥
चौथे मनुका नाम था तामस । वे तीसरे मनु उत्तमके सगे भाई थे । उनके पृथु, ख्याति, नर, केतु इत्यादि दस पुत्र थे || २७ || सत्यक, हरि और वीर नामक देवताओंके प्रधान गण थे । इन्द्रका नाम था त्रिशिख । उस मन्वन्तरमें ज्योतिर्धाम आदि सप्तर्षि थे ॥२८ ॥ परीक्षित्! उस
तामस नामके मन्वन्तरमें विधृतिके पुत्र वैधृति नामके और भी देवता हुए । उन्होंने समयके फेरसे नष्टप्राय वेदोंको अपनी शक्तिसे बचाया था, इसीलिये ये ' वैधृति ' कहलाये || २ ९ || इस मन्वन्तरमें हरिमेधा ऋषिकी पत्नी हरिणीके गर्भसे हरिके रूपमें भगवान्ने अवतार ग्रहण किया । इसी अवतारमें उन्होंने ग्राहसे गजेन्द्रकी रक्षा की थी ॥ ३० ॥
राजोवाच
बादरायण एतत् ते श्रोतुमिच्छामहे वयम् ।
हरिर्यथा गजपतिं ग्राहग्रस्तममूमुचत् ॥३१
तत्कथा सुमहत् पुण्यं धन्यं ' स्वस्त्ययनं शुभम् ।
यत्र यत्रोत्तमश्लोको भगवान्गीयते हरिः ॥३२
सूत उवाच परीक्षितैवं स तु बादरायणिः तु प्रायोपविष्टेन कथासु चोदितः । उवाच विप्राः प्रतिनन्द्य पार्थिवं मुदा मुनीनां सदसि स्म शृण्वताम् ॥३३ राजा परीक्षित्ने पूछा – मुनिवर! हम आपसे यह सुनना चाहते हैं कि भगवान्ने गजेन्द्रको ग्राहके फंदेसे कैसे छुड़ाया था ॥ ३१ ॥
सब कथाओंमें वही कथा परम पुण्यमय, प्रशंसनीय, मंगलकारी और शुभ है, जिसमें महात्माओंके द्वारा गान किये हुए भगवान् श्रीहरिके पवित्र यशका वर्णन रहता है ॥३२ ॥
सूतजी कहते हैं - शौनकादि ऋषियो! राजा परीक्षित् आमरण अनशन करके कथा सुननेके लिये ही बैठे हुए थे । उन्होंने जब श्रीशुकदेवजी महाराजको इस प्रकार कथा कहनेके लिये प्रेरित किया, तब वे बड़े आनन्दित हुए और प्रेमसे परीक्षित्का अभिनन्दन करके ****** ebook converter DEMO Watermarks *******