श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 1431–1440
श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1431–1440
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मुनियोंकी भरी सभामें कहने लगे ॥३३ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां अष्टमस्कन्धे मन्वन्तरानुचरिते प्रथमोऽध्यायः ॥१ ॥
१. प्रा ० पा ० — वस्य च गुरो । २. प्राचीन प्रतिमें ' यत्र विश्वसृजां सर्गो... ' इस उत्तरार्धके स्थानपर ‘ अत्र धर्माश्च विविधाश्चातुर्वर्ण्याश्रिताः शुभाः ' ऐसा पाठ है । ३. प्रा ० पा ० — मन्वन्तरे हरे ० । ४. प्रा ० पा०— प्रा ० पा ० - चान्यमतीते । ६. प्रा ० पा०- ० I ये । ७. प्रा ० ० – सर्वमन्वन्तरे । ५. पा ० — आद्यः स । ८. प्रा ० पा ० – नु । ९. प्राचीन प्रतिमें ' धर्मज्ञानोपदेशार्थं... ' से लेकर.... कपिलस्यानुवर्णितम् ' यहाँतकका पाठ इस प्रकार है— ' उत्पत्तिः सर्वजन्तूनां वर्णिता पुरुषर्षभ । चरितं पुण्यकीर्तेश्च कपिलस्यानुवर्णितम् ॥ ’ १. प्रा ० पा ० — माह स । २. प्राचीन प्रतिमें ' येन चेतयते विश्वं.. ' इस पूर्वार्धके स्थानपर ‘ वासुदेवो वसत्येष सर्वदेहेष्वनन्यदृक् ' ऐसा पाठ है । ३. प्रा ० पा ० – मेधसा । ४. प्राचीन प्रतिमें ‘ न यस्याद्यन्तौ …. ' से लेकर '... तदृतं महत् ' यहाँतकका पाठ इस प्रकार है — ' न यस्यादिस्तथा मध्यं देवदेवस्य चात्मनः । सर्वस्य मूलभूतोऽसौ भूता येऽनन्तरं यतः ॥ ' १. प्रा ० पा ० — सर्वस्य गोप्ता त्वजरः पुराणः । २. प्रा ० पा ० – तं वै विदित्वा तु । ३. प्रा ० पा ० — अथ यत्रर्षयः । ४. प्रा ० पा ० – आनन्दमेकं परमं सनातनं । १. प्रा ० पा ० - शिक्षन्सुतं । २. प्रा ० पा ० - नृपाः । ३. प्रा ० पा ० – वृषः । १. प्रा ० पा०- - धर्म्यं । २. प्रा ० पा ० — शिवम् । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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अथ द्वितीयोऽध्यायः ग्राहके द्वारा गजेन्द्रका पकड़ा जाना श्रीशुक उवाच
आसीद् गिरिवरो राजंस्त्रिकूट इति विश्रुतः ।
क्षीरोदेनावृतः श्रीमान्योजनायुतमुच्छ्रितः ॥१
तावता विस्तृतः पर्यक् त्रिभिः शृङ्गैः पयोनिधिम् ।
दिशः खं रोचयन्नास्ते रौप्यायसहिरण्मयैः ॥२
अन्यैश्च ककुभः सर्वा रत्नधातुविचित्रितैः ।
नानाद्रुमलतागुल्मैर्निर्घोषैर्निर्झराम्भसाम् ॥ ३
स चावनिज्यमानाङ्घ्रिः समन्तात् पयऊर्मिभिः ।
करोति श्यामलां भूमिं हरिन्मरकताश्मभिः ॥४
श्रीशुकदेवजीने कहा- परीक्षित्! क्षीरसागरमें त्रिकूट नामका एक प्रसिद्ध सुन्दर एवं श्रेष्ठ पर्वत था । वह दस हजार योजन ऊँचा था ॥१ ॥ उसकी लंबाई - चौड़ाई भी चारों ओर
इतनी ही थी । उसके चाँदी, लोहे और सोनेके तीन शिखरोंकी छटासे समुद्र, दिशाएँ और आकाश जगमगाते रहते थे ॥२ ॥ और भी उसके कितने ही शिखर ऐसे थे जो रत्नों और
धातुओंकी रंग - बिरंगी छटा दिखाते हुए सब दिशाओंको प्रकाशित कर रहे थे । उनमें विविध जातिके वृक्ष, लताएँ और झाड़ियाँ थीं । झरनोंकी झर - झरसे वह गुंजायमान होता रहता था ॥३ ॥ सब ओरसे समुद्रकी लहरें आ - आकर उस पर्वतके निचले भागसे टकरातीं, उस
समय ऐसा जान पड़ता मानो वे पर्वतराजके पाँव पखार रही हों । उस पर्वतके हरे पन्नेके पत्थरोंसे वहाँकी भूमि ऐसी साँवली हो गयी थी, जैसे उसपर हरी - भरी दूब लग रही हो ॥४ ॥
सिद्धचारणगन्धर्वविद्याधरमहोरगैः ।
किन्नरैरप्सरोभिश्च क्रीडद्भिर्जुष्टकन्दरः ॥५
यत्र संगीतसन्नादैर्नदद्गुहममर्षया ।
अभिगर्जन्ति हरयः श्लाघिनः परशङ्कया ॥६
नानारण्यपशुव्रातसङ्कुलद्रोण्यलङ्कृतः ।
चित्रद्रुमसुरोद्यानकलकण्ठविहङ्गमः ॥७
सरित्सरोभिरच्छोदैः पुलिनैर्मणिवालुकैः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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देवस्त्रीमज्जनामोदसौरभाम्ब्वनिलैर्युतः ॥८
तस्य द्रोण्यां भगवतो वरुणस्य महात्मनः ।
उद्यानमृतमन्नाम आक्रीडं सुरयोषिताम् ॥९
सर्वतोऽलङ्कृतं दिव्यैर्नित्यं पुष्पफलद्रुमैः ।
मन्दारैःपारिजातैश्च पाटलाशोकचम्पकैः ॥ १०
चूतैः प्रियालैः पनसैराम्रैराम्रातकैरपि ।
क्रमुकैर्नालिकेरैश्च खर्जूरैर्बीजपूरकैः ॥११
मधुकैः सालतालैश्च तमालैरसनार्जुनैः ।
अरिष्टोदुम्बरप्लक्षैर्वटैः किंशुकचन्दनैः ॥१२
पिचुमन्दैः कोविदारैः सरलैः सुरदारुभिः ।
द्राक्षैक्षुरम्भाजम्बूभिर्बदर्यक्षाभयामलैः ॥ १३
बिल्वैः कपित्थैर्जम्बीरैर्वृतो भल्लातकादिभिः ।
तस्मिन्सरः सुविपुलं लसत्काञ्चनपङ्कजम् ॥१४
कुमुदोत्पलकह्लारशतपत्रश्रियोर्जितम् ।
मत्तषट्पदनिर्घुष्टं शकुन्तैश्च कलस्वनैः ॥१५
हंसकारण्डवाकीर्णं चक्राह्वैः सारसैरपि ।
जलकुक्कुटकोयष्टिदात्यूहकुलकूजितम् ॥१६
उसकी कन्दराओंमें सिद्ध, चारण, गन्धर्व, विद्याधर, नाग, किन्नर और अप्सराएँ आदि विहार करनेके लिये प्रायः बने ही रहते थे || ५ || जब उसके संगीतकी ध्वनि चट्टानोंसे टकराकर गुफाओंमें प्रतिध्वनित होने लगती थी, तब बड़े - बड़े गर्वीले सिंह उसे दूसरे सिंहकी ध्वनि समझकर सह न पाते और अपनी गर्जनासे उसे दबा देनेके लिये और जोरसे गरजने लगते थे ॥६ ॥
उस पर्वतकी तलहटी तरह - तरहके जंहली जानवरोंके झुंडोंसे सुशोभित रहती थी । अनेकों प्रकारके वृक्षोंसे भरे हुए देवताओंके उद्यानमें सुन्दर - सुन्दर पक्षी मधुर कण्ठसे चहकते रहते थे ॥७ ॥ उसपर बहुत - सी नदियाँ और सरोवर भी थे । उनका जल बड़ा निर्मल था ।
उनके पुलिनपर मणियोंकी बालू चमकती रहती थी । उनमें देवांगनाएँ स्नान करती थीं जिससे उनका जल अत्यन्त सुगन्धित हो जाता था । उसकी सुरभि लेकर भीनी - भीनी वायु चलती रहती थी ॥८ ॥
पर्वतराज त्रिकूटकी तराईमें भगवत्प्रेमी महात्मा भगवान् वरुणका एक उद्यान था ।
उसका नाम था ऋतुमान् । उसमें देवांगनाएँ क्रीडा करती रहती थीं ॥९ ॥
उसमें सब ओर ऐसे दिव्य वृक्ष शोभायमान थे, जो फलों और फूलोंसे सर्वदा लदे ही ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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रहते थे । उस उद्यानमें मन्दार, पारिजात, गुलाब, अशोक, चम्पा, तरह - तरहके आम, प्रियाल, कटहल, आमड़ा, सुपारी, नारियल, खजूर, बिजौरा, महुआ, साखू, ताड़, तमाल, असन, अर्जुन, रीठा, गूलर, पाकर, बरगद, पलास, चन्दन, नीम, कचनार, साल, देवदारु, दाख, ईख, केला, जामुन, बेर, रुद्राक्ष, हर्रे, आँवला, बेल, कैथ, नीबू और भिलावे आदिके वृक्ष लहराते रहते थे । उस उद्यानमें एक बड़ा भारी सरोवर था । उसमें सुनहले कमल खिल रहे थे ॥१०-१४ ॥ और भी विविध जातिके कुमुद, उत्पल, कह्लार, शतदल आदि कमलोंकी अनूठी छटा छिटक रही थी । मतवाले भौरे गूँज रहे थे । मनोहर पक्षी कलरव कर रहे थे । हंस, कारण्डव, चक्रवाक और सारस दल - के - दल भरे हुए थे । पनडुब्बी, बतख और पपीहे कूज रहे थे । मछली और कछुओंके चलनेसे कमलके फूल हिल जाते थे, जिससे उनका पराग झड़कर जलको सुन्दर और सुगन्धित बना देता था । कदम्ब, बेंत, नरकुल, कदम्बलता, बेन आदि वृक्षोंसे वह घिरा था ॥१५-१७ ॥
मत्स्यकच्छपसञ्चारचलत्पद्मरजःपयः १ ।
कदम्बवेतसनलनीपवञ्जुलकैर्वृतम् ” ॥१७
कुन्दैः कुरबकाशोकैः शिरीषैः कुटजेङ्गुदैः ३ ।
कुब्जकैः स्वर्णयूथीभिर्नागपुन्नागजातिभिः ॥१८
मल्लिकाशतपत्रैश्च माधवीजालकादिभिः ।
शोभितं तीरजैश्चान्यैर्नित्यर्तुभिरलं द्रुमैः ॥१९
तत्रैकदा तद्गिरिकाननाश्रयः करेणुभिर्वारणयूथपश्चरन् । सकण्टकान् कीचकवेणुवेत्रवद् विशालगुल्मं प्ररुजन्वनस्पतीन् ॥२० यद्गन्धमात्राद्धरयो गजेन्द्रा व्याघ्रादयो व्यालमृगाः सखड्गाः । महोरगाश्चापि भयाद् द्रवन्ति सगौरकृष्णाः शरभाश्चमर्यः ॥२१ वृका वराहा महिषर्क्षशल्या
गोपुच्छसालावृकमर्कटाश्च ।
अन्यत्र क्षुद्रा हरिणाः शशादय-श्चरन्त्यभीता यदनुग्रहेण ॥ २२
स घर्मतप्तः करिभिः करेणुभि-वृतो मदच्युत्कल भैरनुद्रुतः । गिरिं गरिम्णा परितः प्रकम्पयन् ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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निषेव्यमाणोऽलिकुलैर्मदाशनैः ॥ २३ सरोऽनिलं पङ्कजरेणुरूषितं जिघ्रन्विदूरान्मदविह्वलेक्षणः । वृतः स्वयूथेन तृषार्दितेन तत् सरोवराभ्याशमथागमद् द्रुतम् ॥२४ कुन्द, कुरबक ( कटसरैया ), अशोक, सिरस, वनमल्लिका, लिसौड़ा, हरसिंगार, सोनजूही, नाग, पुन्नाग, जाती, मल्लिका, शतपत्र, माधवी और मोगरा आदि सुन्दर - सुन्दर पुष्पवृक्ष एवं तटके दूसरे वृक्षोंसे भी - जो प्रत्येक ऋतुमें हरे - भरे रहते थे- वह सरोवर शोभायमान रहता था ॥१८-१९ ॥ उस पर्वतके घोर जंगलमें बहुत - सी हथिनियोंके साथ एक गजेन्द्र निवास करता था । वह बड़े - बड़े शक्तिशाली हाथियोंका सरदार था । एक दिन वह उसी पर्वतपर अपनी हथिनियोंके साथ काँटेवाले कीचक, बाँस, बेंत, बड़ी - बड़ी झाड़ियों और पेड़ोंको रौंदता हुआ घूम रहा था ॥२० ॥ उसकी गन्धमात्रसे सिंह, हाथी, बाघ, गैंडे आदि हिंस्र जन्तु, नाग तथा काले - गोरे
शरभ और चमरी गाय आदि डरकर भाग जाया करते थे || २१ || और उसकी कृपासे भेड़िये, सूअर, भैंसे, रीछ, शल्य, लंगूर तथा कुत्ते, बंदर, हरिन और खरगोश आदि क्षुद्र जीव सब कहीं निर्भय विचरते रहते थे ॥२२ ॥ उसके पीछे - पीछे हाथियोंके छोटे - छोटे बच्चे दौड़ रहे थे । बड़े-बड़े हाथी और हथिनियाँ भी उसे घेरे हुए चल रही थीं । उसकी धमकसे पहाड़ एकबारगी काँप
उठता था । उसके गण्डस्थलसे टपकते हुए मदका पान करनेके लिये साथ - साथ भौंरे उड़ते जा रहे थे । मदके कारण उसके नेत्र विह्वल हो रहे थे । बड़े जोरकी धूप थी, इसलिये वह व्याकुल हो गया और उसे तथा उसके साथियोंको प्यास भी सताने लगी । उस समय दूरसे ही कमलके परागसे सुवासित वायुकी गन्ध सुँघकर वह उसी सरोवरकी ओर चल पड़ा, जिसकी शीतलता और सुगन्ध लेकर वायु आ रही थी । थोड़ी ही देरमें वेगसे चलकर वह सरोवरके तटपर जा पहुँचा ॥२३-२४ ॥ विगाह्य तस्मिन्नमृताम्बु निर्मलं
हेमारविन्दोत्पलरेणुवासितम् ।
पपौ निकामं निजपुष्करोद्धृत-मात्मानमद्भिः स्नपयन्गतक्लमः ॥२५
स्वपुष्करेणोद्धृतशीकराम्बुभि-र्निपाययन्संस्नपयन्यथा गृही । घृणी करेणूः कलभांश्च दुर्मदो नाचष्ट कृच्छ्रं कृपणोऽजमायया ॥२६ तं तत्र कश्चिन्नृप दैवचोदितो ग्राहो बलीयांश्चरणे रुषाग्रहीत् । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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यदृच्छयैवं व्यसनं गतो गजो यथाबलं सोऽतिबलो विचक्रमे ॥२७ तथाऽऽतुरं यूथपतिं करेणवो विकृष्यमाणं तरसा बलीयसा । विचुक्रुशुर्दीनधियोऽपरे गजाः पार्ष्णिग्रहास्तारयितुं न चाशकन् ॥२८ नियुध्यतोरेवमिभेन्द्रनक्रयो-र्विकर्षतोरन्तरतो बहिर्मिथः । समाः सहस्रं व्यगमन् महीपते सप्राणयोश्चित्रममंसतामराः ॥२९ ततो गजेन्द्रस्य मनोबलौजसां कालेन दीर्घेण महानभूद् व्ययः । विकृष्यमाणस्य जलेऽवसीदतो विपर्ययोऽभूत् सकलं जलौकसः ॥३० उस सरोवरका जल अत्यन्त निर्मल एवं अमृतके समान मधुर था । सुनहले और अरुण कमलोंकी केसरसे वह महक रहा था । गजेन्द्रने पहले तो उसमें घुसकर अपनी सूँड़से उठा-उठा जी भरकर जल पिया, फिर उस जलमें स्नान करके अपनी थकान मिटायी || २५ ॥ गजेन्द्र गृहस्थ पुरुषोंकी भाँति मोहग्रस्त होकर अपनी सूँड़से जलकी फुहारें छोड़-छोड़कर साथकी हथिनियों और बच्चोंको नहलाने लगा तथा उनके मुँहमें सूँड़ डालकर जल पिलाने लगा । भगवान्की मायासे मोहित हुआ गजेन्द्र उन्मत्त हो रहा था । उस बेचारेको इस बातका पता ही न था कि मेरे सिरपर बहुत बड़ी विपत्ति मँडरा रही है ॥२६ ॥
परीक्षित्! गजेन्द्र जिस समय इतना उन्मत्त हो रहा था, उसी समय प्रारब्धकी प्रेरणासे एक बलवान् ग्राहने क्रोधमें भरकर उसका पैर पकड़ लिया । इस प्रकार अकस्मात् विपत्तिमें पड़कर उस बलवान् गजेन्द्रने अपनी शक्तिके अनुसार अपनेको छुड़ानेकी बड़ी चेष्टा की, परन्तु छुड़ा न सका ॥२७ ॥
दूसरे हाथी, हथिनियों और उनके बच्चोंने देखा कि उनके स्वामीको बलवान् ग्राह बड़े वेगसे खींच रहा है और वे बहुत घबरा रहे हैं । उन्हें बड़ा दुःख हुआ । वे बड़ी विकलतासे चिग्घाड़ने लगे । बहुतोंने उसे सहायता पहुँचाकर जलसे बाहर निकाल लेना चाहा, परन्तु इसमें भी वे असमर्थ ही रहे ॥२८ ॥
गजेन्द्र और ग्राह अपनी - अपनी पूरी शक्ति लगाकर भिड़े हुए थे । कभी गजेन्द्र ग्राहको बाहर खींच लाता तो कभी ग्राह गजेन्द्रको भीतर खींच ले जाता । परीक्षित्! इस प्रकार उनको लड़ते - लड़ते एक हजार वर्ष बीत गये और दोनों ही जीते रहे । यह घटना देखकर देवता भी आश्चर्यचकित हो गये ॥२९ ॥
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अन्तमें हु दिनोंतक बार - बार जलमें खींचे जानेसे गजेन्द्रका शरीर शिथिल पड़ गया । न तो उसके शरीरमें बल रह गया और न मनमें उत्साह । शक्ति भी क्षीण हो गयी । इधर ग्राह तो जलचर ही ठहरा । इसलिये उसकी शक्ति क्षीण होनेके स्थानपर बढ़ गयी, वह बड़े उत्साहसे और भी बल लगाकर गजेन्द्रको खींचने लगा ॥ ३० ॥
इत्थं गजेन्द्रः स यदाऽऽप संकटं प्राणस्य देही विवशो अपारयन्नात्मविमोक्षणे चिरं यदृच्छया दध्याविमां ' बुद्धिमथाभ्यपद्यत ॥३१ न मामिमे ज्ञातय आतुरं गजाः
कुतः करिण्यः प्रभवन्ति मोचितुम् ।
ग्राहेण पाशेन विधातुरावृतो-ऽप्यहं च तं यामि परं परायणम् ॥३२
यः कश्चनेशी बलिनोऽन्तकोरगात्
प्रचण्डवेगादभिधावतो भृशम् ।
भीतं प्रपन्नं परिपाति यद्भया-न्मृत्युः प्रधावत्यरणं तमीमहि ॥३३
इस प्रकार देहाभिमानी गजेन्द्र अकस्मात् प्राणसंकटमें पड़ गया और अपनेको छुड़ानेमें सर्वथा असमर्थ हो गया । बहुत देरतक उसने अपने छुटकारेके उपायपर विचार किया, अन्तमें वह इस निश्चयपर पहुँचा ॥३१ ॥
‘ यह ग्राह विधाताकी फाँसी ही है । इसमें फँसकर मैं आतुर हो रहा हूँ । जब मुझे मेरे बराबरके हाथी भी इस विपत्तिसे न उबार सके तब ये बेचारी हथिनियाँ तो छुड़ा ही कैसे सकती हैं । इसलिये अब मैं सम्पूर्ण विश्वके एकमात्र आश्रय भगवान्की ही शरण लेता हूँ ॥३२ ॥
काल बड़ा बली है । यह साँपके समान बड़े प्रचण्ड वेगसे सबको निगल जानेके लिये दौड़ता ही रहता है । इससे अत्यन्त भयभीत होकर जो कोई भगवान्की शरणमें चला जाता है, उसे वे प्रभु अवश्य - अवश्य बचा लेते हैं । उनके भयसे भीत होकर मृत्यु भी अपना काम ठीक-ठीक पूरा करता है । वही प्रभु सबके आश्रय हैं । मैं उन्हींकी शरण ग्रहण करता हूँ ' ॥३३ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामष्टमस्कन्धें मन्वन्तरानुवर्णने गजेन्द्रोपाख्याने द्वितीयोऽध्यायः ॥२ ॥
३. प्रा ० पा ० — तावान् सुविस्तृतो ह्यासीत् । –लसद्विविधैः पुलिनैर्वृतम् । ३. प्रा ० पा०— १. प्रा ० पा ० — त्पङ्करजः । २. प्रा ० पा०— कुटजद्रुमैः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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१. प्रा ० पा ० – दैवादिमां । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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अथ तृतीयोऽध्यायः गजेन्द्रके द्वारा भगवान्की स्तुति और उसका संकटसे मुक्त होना श्रीशुक उवाच
एवं व्यवसितो बुद्धया समाधाय मनो हृदि ।
जजाप परमं जाप्यं प्राग्जन्मन्यनुशिक्षितम् ॥१
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! अपनी बुद्धिसे ऐसा निश्चय करके गजेन्द्रने अपने मनको हृदयमें एकाग्र किया और फिर पूर्वजन्ममें सीखे हुए श्रेष्ठ स्तोत्रके जपद्वारा भगवान्की स्तुति करने लगा ॥१ ॥
गजेन्द्र उवाच
ॐ नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम् ।
पुरुषायादिबीजाय परेशायाभिधीमहि ॥२
यस्मिन्निदं यतश्चेदं येनेदं य इदं स्वयम् ।
योऽस्मात् परस्माच्च परस्तं प्रपद्ये स्वयम्भुवम् ॥३
यः स्वात्मनीदं निजमाययार्पितं क्वचिद् विभातं क्व च तत् तिरोहितम् । अविद्धदृक् साक्ष्युभयं तदीक्षते स आत्ममूलोऽवतु मां परात्परः ॥४ कालेन पञ्चत्वमितेषु कृत्स्नशो लोकेषु पालेषु च सर्वहेतुषु । तमस्तदाऽऽसीद् गहनं गभीरं यस्तस्य पारेऽभिविराजते विभुः ॥५ न यस्य देवा ऋषयः पदं विदु-जन्तुः पुनः कोऽर्हति गन्तुमीरितुम् । यथा नटस्याकृतिभिर्विचेष्टतो दुरत्ययानुक्रमणः स मावतु ॥६ ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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दिदृक्षवो यस्य पदं सुमङ्गलं विमुक्तसङ्गा मुनयः सुसाधवः । चरन्त्यलोकव्रतमव्रणं वने भूतात्मभूताः सुहृदः स मे गतिः ॥७ गजेन्द्रने कहा — जो जगत्के मूल कारण हैं और सबके हृदयमें पुरुषके रूपमें विराजमान हैं एवं समस्त जगत्के एकमात्र स्वामी हैं, जिनके कारण इस संसारमें चेतनताका विस्तार होता है — उन भगवान्को मैं नमस्कार करता हूँ, प्रेमसे उनका ध्यान करता हूँ ॥२ ॥
यह संसार उन्हींमें स्थित है, उन्हींकी सत्तासे प्रतीत हो रहा है, वे ही इसमें व्याप्त हो रहे हैं और स्वयं वे ही इसके रूपमें प्रकट हो रहे हैं । यह सब होनेपर भी वे इस संसार और इसके कारण —प्रकृतिसे सर्वथा परे हैं । उन स्वयंप्रकाश, स्वयंसिद्ध सत्तात्मक भगवान्की मैं शरण ग्रहण करता हूँ ॥३ ॥ यह विश्वप्रपंच उन्हींकी मायासे उनमें अध्यस्त है । यह कभी प्रतीत होता है, तो
कभी नहीं । परन्तु उनकी दृष्टि ज्यों - की - त्यों - एक - सी रहती है । वे इसके साक्षी हैं और उन दोनोंको ही देखते रहते हैं । वे सबके मूल हैं और अपने मूल भी वही हैं । कोई दूसरा उनका कारण नहीं है । वे ही समस्त कार्य और कारणोंसे अतीत प्रभु मेरी रक्षा करें ॥४ ॥ प्रलयके
समय लोक, लोकपाल और इन सबके कारण सम्पूर्णरूपसे नष्ट हो जाते हैं । उस समय केवल अत्यन्त घना और गहरा अन्धकार - ही- अन्धकार रहता है । परन्तु अनन्त परमात्मा उससे सर्वथा परे विराजमान रहते हैं । वे ही प्रभु मेरी रक्षा करें || ५ || उनकी लीलाओंका रहस्य जानना बहुत ही कठिन है । वे नटकी भाँति अनेकों वेष धारण करते हैं । उनके वास्तविक स्वरूपको न तो देवता जानते हैं और न ऋषि ही; फिर दूसरा ऐसा कौन प्राणी है जो वहाँतक जा सके और उसका वर्णन कर सके? वे प्रभु मेरी रक्षा करें || ६ || जिनके परम मंगलमय स्वरूपका दर्शन करनेके लिये महात्मागण संसारकी समस्त आसक्तियोंका परित्याग कर देते हैं और वनमें जाकर अखण्डभावसे ब्रह्मचर्य आदि अलौकिक व्रतोंका पालन करते हैं तथा अपने आत्मातो सबके हृदयमें विराजमान देखकर स्वाभाविक ही सबकी भलाई करते हैं — वे ही मुनियोंके सर्वस्व भगवान् मेरे सहायक हैं; वे ही मेरी गति हैं ॥७ ॥
न विद्यते यस्य च जन्म कर्म वा न नामरूपे गुणदोष एव वा । तथापि लोकाप्ययसंभवाय यः स्वमायया तान्यनुकालमृच्छति ॥८
तस्मै नमः परेशाय ब्रह्मणेऽनन्तशक्तये ।
अरूपायोरुरूपाय नम आश्चर्यकर्मणे ॥ ९
नम आत्मप्रदीपाय साक्षिणे परमात्मने । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******