श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 1441–1450
श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1441–1450
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नमो गिरां विदूराय मनसश्चेतसामपि ॥१०
सत्त्वेन प्रतिलभ्याय नैष्कर्म्येण विपश्चिता ।
नमः कैवल्यनाथाय निर्वाणसुखसंविदे ॥११
नमः शान्ताय घोराय मूढाय गुणधर्मिणे ।
निर्विशेषाय साम्याय नमो ज्ञानघनाय च ॥१२
क्षेत्रज्ञाय नमस्तुभ्यं सर्वाध्यक्षाय साक्षिणे ।
पुरुषायात्ममूलाय मूलप्रकृतये नमः ॥ १३
सर्वेन्द्रियगुणद्रष्ट्रे सर्वप्रत्ययहेतवे ।
असताच्छाययोक्ताय सदाभासाय ते नमः ॥१४
न उनके जन्म - कर्म हैं और न नाम - रूप; फिर उनके सम्बन्धमें गुण और दोषकी तो कल्पना ही कैसे की जा सकती है? फिर भी विश्वकी सृष्टि और संहार करनेके लिये समय-समयपर वे उन्हें अपनी मायासे स्वीकार करते हैं ॥८ ॥
उन्हीं अनन्त शक्तिमान् सर्वैश्वर्यमय परब्रह्म परमात्माको मैं नमस्कार करता हूँ । वे अरूप होनेपर भी बहुरूप हैं । उनके कर्म अत्यन्त आश्चर्यमय हैं । मैं उनके चरणोंमें नमस्कार करता हूँ || ९ || स्वयंप्रकाश, सबके साक्षी परमात्माको मैं नमस्कार करता हूँ । जो मन, वाणी और चित्तसे अत्यन्त दूर हैं— उन परमात्माको मैं नमस्कार करता हूँ ॥१० ॥
विवेकी पुरुष कर्म - संन्यास अथवा कर्म - समर्पणके द्वारा अपना अन्तःकरण शुद्ध करके जिन्हें प्राप्त करते हैं तथा जो स्वयं तो नित्यमुक्त, परमानन्द एवं ज्ञानस्वरूप हैं ही, दूसरोंको कैवल्य - मुक्ति देनेकी सामर्थ्य भी केवल उन्हींमें है— उन प्रभुको मैं नमस्कार करता हूँ ॥११ ॥
जो सत्त्व, रज, तम – इन तीन गुणोंका धर्म स्वीकार करके क्रमशः शान्त, घोर और मूढ़ अवस्था भी धारण करते हैं, उन भेदरहित समभावसे स्थित एवं ज्ञानघन प्रभुको मैं बार - बार नमस्कार करता हूँ ॥१२ ॥
आप सबके स्वामी, समस्त क्षेत्रोंके एकमात्र ज्ञाता एवं सर्वसाक्षी हैं, आपको मैं नमस्कार करता हूँ । आप स्वयं ही अपने कारण हैं । पुरुष और मूल प्रकृतिके रूपमें भी आप ही हैं । आपको मेरा बार - बार नमस्कार ॥१३ ॥
आप समस्त इन्द्रिय और उनके विषयोंके द्रष्टा हैं, समस्त प्रतीतियोंके आधार हैं । अहंकार आदि छायारूप असत् वस्तुओंके द्वारा आपका ही अस्तित्व प्रकट होता है । समस्त वस्तुओंकी सत्ताके रूपमें भी केवल आप ही भास रहे हैं । मैं आपको नमस्कार करता ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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हूँ॥१४ ॥
नमो नमस्तेऽखिलकारणाय निष्कारणायाद्भुतकारणाय । सर्वागमाम्नायमहार्णवाय नमोऽपवर्गाय परायणाय ॥१५ गुणारणिच्छन्नचिदूष्मपाय
तत्क्षोभविस्फूर्जितमानसाय ।
नैष्कर्म्यभावेन विवर्जितागम-स्वयंप्रकाशाय नमस्करोमि ॥१६
मादृक्प्रपन्नपशुपाशविमोक्षणाय
मुक्ताय भूरिकरुणाय नमोऽलयाय ।
स्वांशेन सर्वतनुभृन्मनसि प्रतीत-प्रत्यग्दृशे भगवते बृहते नमस्ते ॥१७
आत्मात्मजाप्तगृहवित्तजनेषु सक्त-र्दुष्प्रापणाय गुणसङ्गविवर्जिताय । मुक्तात्मभिः स्वहृदये परिभाविताय ज्ञानात्मने भगवते नम ईश्वराय ॥१८ यं धर्मकामार्थविमुक्तिकामा भजन्त इष्टां गतिमाप्नुवन्ति । किं त्वाशिषो रात्यपि देहमव्ययं करोतु मेऽदभ्रदयो विमोक्षणम् ॥१९ आप सबके मूल कारण हैं, आपका कोई कारण नहीं है । तथा कारण होनेपर भी आपमें विकार या परिणाम नहीं होता, इसलिये आप अनोखे कारण हैं । आपको मेरा बार - बार नमस्कार! जैसे समस्त नदी - झरने आदिका परम आश्रय समुद्र है, वैसे ही आप समस्त वेद और शास्त्रोंके परम तात्पर्य हैं । आप मोक्षस्वरूप हैं और समस्त संत आपकी ही शरण ग्रहण करते हैं; अतः आपको मैं नमस्कार करता हूँ ॥१५ ॥ जैसे यज्ञके काष्ठ अरणिमें अग्नि गुप्त
रहती है, वैसे ही आपने अपने ज्ञानको गुणोंकी मायासे ढक रखा है । गुणोंमें क्षोभ होनेपर उनके द्वारा विविध प्रकारकी सृष्टिरचनाका आप संकल्प करते हैं । जो लोग कर्म - संन्यास अथवा कर्म - समर्पणके द्वारा आत्मतत्त्वकी भावना करके वेद - शास्त्रोंसे ऊपर उठ जाते हैं, ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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उनके आत्माके रूपमें आप स्वयं ही प्रकाशित हो जाते हैं । आपको मैं नमस्कार करता हूँ ॥१६ ॥
जैसे कोई दयालु पुरुष फंदेमें पड़े हुए पशुका बन्धन काट दे, वैसे ही आप मेरे - जैसे शरणागतोंकी फाँसी काट देते हैं । आप नित्यमुक्त हैं, परम करुणामय हैं और भक्तोंका कल्याण करनेमें आप कभी आलस्य नहीं करते । आपके चरणोंमें मेरा नमस्कार है । समस्त प्राणियोंके हृदयमें अपने अंशके द्वारा अन्तरात्माके रूपमें आप उपलब्ध होते रहते हैं । आप सर्वैश्वर्यपूर्ण एवं अनन्त हैं । आपको मैं नमस्कार करता हूँ ॥१७ ॥ जो लोग शरीर, पुत्र,
गुरुजन, गृह, सम्पत्ति और स्वजनोंमें आसक्त हैं - उन्हें आपकी प्राप्ति अत्यन्त कठिन है । क्योंकि आप स्वयं गुणोंकी आसक्तिसे रहित हैं । जीवन्मुक्त पुरुष अपने हृदयमें आपका निरन्तर चिन्तन करते रहते हैं । उन सर्वैश्वर्यपूर्ण ज्ञानस्वरूप भगवान्को मैं नमस्कार करता हूँ ॥१८ ॥ धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी कामनासे मनुष्य उन्हींका भजन करके अपनी
अभीष्ट वस्तु प्राप्त कर लेते हैं । इतना ही नहीं, वे उनको सभी प्रकारका सुख देते हैं और अपने ही जैसा अविनाशी पार्षद शरीर भी देते हैं । वे ही परम दयालु प्रभु मेरा उद्धार करें ॥१९ ॥
एकान्तिनो यस्य न कञ्चनार्थं वाञ्छन्ति ये वै भगवत्प्रपन्नाः । अत्यद्भुतं तच्चरितं सुमङ्गलं गायन्त आनन्दसमुद्रमग्नाः ॥२०
तमक्षरं ब्रह्म परं परेश-मव्यक्तमाध्यात्मिकयोगगम्यम् ।
अतीन्द्रियं सूक्ष्ममिवातिदूर-मनन्तमाद्यं परिपूर्णमीडे ॥२१
यस्य ब्रह्मादयो देवा वेदा लोकाश्चराचराः ।
नामरूपविभेदेन फल्ग्व्या च कलया कृताः ॥२२
यथार्चिषोऽग्नेः सवितुर्गभस्तयो निर्यान्ति संयान्त्यसकृत् स्वरोचिषः तथा यतोऽयं गुणसंप्रवाहो बुद्धिर्मनः खानि शरीरसर्गाः ॥२३ सवै न देवासुरमर्त्यतिर्यङ् न स्त्री न षण्ढो न पुमान् न जन्तुः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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नायं गुणः कर्म न सन्न चासन् निषेधशेषो जयतादशेषः ॥२४
जिजीविषे नाहमिहामुया कि-मन्तर्बहिश्चावृतयेभयोन्या ।
इच्छामि कालेन न यस्य विप्लव-स्तस्यात्मलोकावरणस्य मोक्षम् ॥२५
जिनके अनन्यप्रेमी भक्तजन उन्हींकी शरणमें रहते हुए उनसे किसी भी वस्तुकी -यहाँतक कि मोक्षकी भी अभिलाषा नहीं करते, केवल उनकी परम दिव्य मंगलमयी लीलाओंका गान करते हुए आनन्दके समुद्रमें निमग्न रहते हैं ॥२० ॥
जो अविनाशी, सर्वशक्तिमान्, अव्यक्त, इन्द्रियातीत और अत्यन्त सूक्ष्म हैं; जो अत्यन्त निकट रहनेपर भी बहुत दूर जान पड़ते हैं; जो आध्यात्मिक योग अर्थात् ज्ञानयोग या भक्तियोगके द्वारा प्राप्त होते हैं— उन्हीं आदिपुरुष, अनन्त एवं परिपूर्ण परब्रह्म परमात्माकी मैं स्तुति करता हूँ ॥२१ ॥
जिनकी अत्यन्त छोटी कलासे अनेकों नाम - रूपके भेद - भावसे युक्त ब्रह्मा आदि देवता, वेद और चराचर लोकोंकी सृष्टि हुई है, जैसे धधकती हुई आगसे लपटें और प्रकाशमान सूर्यसे उनकी किरणें बार - बार निकलती और लीन होती रहती हैं, वैसे ही जिन स्वयंप्रकाश परमात्मासे बुद्धि, मन, इन्द्रिय और शरीर – जो गुणोंके प्रवाहरूप हैं - बार - बार प्रकट होते तथा लीन हो जाते हैं, वे भगवान् न देवता हैं और न असुर । वे मनुष्य और पशु - पक्षी भी नहीं हैं । न वे स्त्री हैं, न पुरुष और न नपुंसक । वे कोई साधारण या असाधारण प्राणी भी नहीं हैं । न वे गुण हैं और न कर्म, न कार्य हैं और न तो कारण ही । सबका निषेध हो जानेपर जो कुछ बचा रहता है, वही उनका स्वरूप है तथा वे ही सब कुछ हैं । वे ही परमात्मा मेरे उद्धारके लिये प्रकट हों ॥२२-२४ ॥ मैं जीना नहीं चाहता । यह हाथीकी योनि बाहर और भीतर - सब ओरसे अज्ञानरूप आवरणके द्वारा ढकी हुई है, इसको रखकर करना ही क्या है? मैं तो आत्मप्रकाशको ढकनेवाले उस अज्ञानरूप आवरणसे छूटना चाहता हूँ, जो कालक्रमसे अपने - आप नहीं छूट सकता, जो केवल भगवत्कृपा अथवा तत्त्वज्ञानके द्वारा ही नष्ट होता है ॥२५ ॥
सोऽहं विश्वसृजं विश्वमविश्वं विश्ववेदसम् ।
विश्वात्मानमजं ब्रह्म प्रणतोऽस्मि परं पदम् ॥२६
योगरन्धितकर्माणो हृदि योगविभाविते ।
योगिनो यं प्रपश्यन्ति योगेशं तं नतोऽस्म्यहम् ॥२७
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नमो नमस्तुभ्यमसह्यवेग-शक्तित्रयायाखिलधीगुणाय । प्रपन्नपालाय दुरन्तशक्तये कदिन्द्रियाणामनवाप्यवर्त्मने ॥२८
नायं वेद स्वमात्मानं यच्छक्त्याहंधिया हतम् ।
तं दुरत्ययमाहात्म्यं भगवन्तमितोऽस्म्यहम् ॥२९
श्रीशुक उवाच एवं गजेन्द्रमुपवर्णितनिर्विशेषं ब्रह्मादयो विविधलिङ्गभिदाभिमानाः । नैते यदोपससुपुर्निखिलात्मकत्वात् तत्राखिलामरमयो हरिराविरासीत् ॥३० तं तद्वदार्त्तमुपलभ्य जगन्निवासः
स्तोत्रं निशम्य दिविजैः सह संस्तुवद्भिः ।
छन्दोमयेन गरुडेन समुह्यमान-श्चक्रायुधोऽभ्यगमदाशु यतो गजेन्द्रः ॥३१
इसलिये मैं उन परब्रह्म परमात्माकी शरणमें हूँ जो विश्वरहित होनेपर भी विश्वके रचयिता और विश्वस्वरूप हैं - साथ ही जो विश्वकी अन्तरात्माके रूपमें विश्वरूप सामग्रीसे क्रीड़ा भी करते रहते हैं, उन अजन्मा परमपदस्वरूप ब्रह्मको मैं नमस्कार करता हूँ ॥२६ ॥
योगीलोग योगके द्वारा कर्म, कर्मवासना और कर्मफलको भस्म करके अपने योगशुद्ध हृदयमें जिन योगेश्वरभगवान्का साक्षात्कार करते हैं - उन प्रभुको मैं नमस्कार करता ॥२७ ॥
प्रभो! आपकी तीन शक्तियों - सत्त्व, रज और तमके रागादि वेग असह्य हैं । समस्त इन्द्रियों और मनके विषयोंके रूपमें भी आप ही प्रतीत हो रहे हैं । इसलिये जिनकी इन्द्रियाँ वशमें नहीं हैं, वे तो आपकी प्राप्तिका मार्ग भी नहीं पा सकते । आपकी शक्ति अनन्त है । आप शरणागतवत्सल हैं । आपको मैं बार - बार नमस्कार करता हूँ ॥२८ ॥
आपकी माया अहंबुद्धिसे आत्माका स्वरूप ढक गया है, इसीसे यह जीव अपने स्वरूपको नहीं जान पाता । आपकी महिमा अपार है । उन सर्वशक्तिमान् एवं माधुर्यनिधि भगवान्की मैं शरणमें हूँ ॥ २ ९ ॥ श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! गजेन्द्रने बिना किसी भेदभावके निर्विशेषरूपसे ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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भगवान्की स्तुति की थी, इसलिये भिन्न - भिन्न नाम और रूपको अपना स्वरूप माननेवाले ब्रह्मा आदि देवता उसकी रक्षा करनेके लिये नहीं आये । उस समय सर्वात्मा होनेके कारण सर्वदेवस्वरूप स्वयं भगवान् श्रीहरि प्रकट हो गये ॥ ३० ॥
विश्वके एकमात्र आधार भगवान्ने देखा कि गजेन्द्र अत्यन्त पीड़ित हो रहा है । अतः उसकी स्तुति सुनकर वेदमय गरुड़पर सवार हो चक्रधारी भगवान् बड़ी शीघ्रतासे वहाँके लिये चल पड़े, जहाँ गजेन्द्र अत्यन्त संकटमें पड़ा हुआ था । उनके साथ स्तुति करते हुए देवता भी आये ॥३१ ॥
सोऽन्तःसरस्युरुबलेन गृहीत आर्तो
दृष्ट्वा गरुत्मति हरिं ख उपात्तचक्रम् ।
उत्क्षिप्य साम्बुजकरं गिरमाह कृच्छ्रा-नारायणाखिलगुरो भगवन् नमस्ते ॥ ३२
तं वीक्ष्य पीडितमजः सहसावतीर्य सग्राहमाशु सरसः कृपयोज्जहार । ग्राहाद् विपाटितमुखादरिणा गजेन्द्रं संपश्यतां हरिरमूमुचदुस्रियाणाम् ॥३३ सरोवरके भीतर बलवान् ग्राहने गजेन्द्रको पकड़ रखा था और वह अत्यन्त व्याकुल हो रहा था । जब उसने देखा कि आकाशमें गरुड़पर सवार होकर हाथमें चक्र लिये भगवान् श्रीहरि आ रहे हैं, तब अपनी सूँड़में कमलका एक सुन्दर पुष्प लेकर उसने ऊपरको उठाया और बड़े कष्टसे बोला- ' नारायण! जगद्गुरो! भगवन्! आपको नमस्कार है ' ॥३२ ॥ जब
भगवान्ने देखा कि गजेन्द्र अत्यन्त पीड़ित हो रहा है, तब वे एकबारगी गरुड़को छोड़कर कूद पड़े और कृपा करके गजेन्द्रके साथ ही ग्राहको भी बड़ी शीघ्रतासे सरोवरसे बाहर निकाल लाये । फिर सब देवताओंके सामने ही भगवान् श्रीहरिने चक्रसे ग्राहका मुँह फाड़ डाला और गजेन्द्रको छुड़ा लिया ॥३३ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामष्टमस्कन्धे गजेन्द्रमोक्षणे तृतीयोऽध्यायः ॥३ ॥
१. प्रा पा – वन्तं नतोऽस्म्यहम् । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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अथ चतुर्थोऽध्यायः गज और ग्राहका पूर्वचरित्र तथा उनका उद्धार श्रीशुक उवाच
तदा देवर्षिगन्धर्वा ब्रह्मेशानपुरोगमाः ।
मुमुचुः कुसुमासारं शंसन्तः कर्म तद्धरेः ॥ १
नेदुर्दुन्दुभयो दिव्या गन्धर्वा ननृतुर्जगुः ।
ऋषयश्चारणाः सिद्धास्तुष्टुवुः पुरुषोत्तमम् ॥२
योऽसौ ग्राहः स वै सद्यः परमाश्चर्यरूपधृक् ।
मुक्तो देवलशापेन हूहूर्गन्धर्वसत्तमः ॥३
प्रणम्य शिरसाधी शमुत्तमश्लोकमव्ययम् ।
अगायत यशोधाम कीर्तन्यगुणसत्कथम् ॥४
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! उस समय ब्रह्मा, शंकर आदि देवता, ऋषि और गन्धर्व श्रीहरि भगवान्के इस कर्मकी प्रशंसा करने लगे तथा उनके ऊपर फूलोंकी वर्षा करने लगे ॥१ ॥
स्वर्गमें दुन्दुभियाँ बजने लगीं, गन्धर्व नाचने - गाने लगे, ऋषि, चारण और सिद्धगण भगवान् पुरुषोत्तमकी स्तुति करने लगे ॥२ ॥
इधर वह ग्राह तुरंत ही परम आश्चर्यमय दिव्य शरीरसे सम्पन्न हो गया । यह ग्राह इसके पहले ' हूहू ' नामका एक श्रेष्ठ गन्धर्व था । देवलके शापसे उसे यह गति प्राप्त हुई थी । अब भगवान्की कृपासे वह मुक्त हो गया ॥३ ॥
उसने सर्वेश्वर भगवान्के चरणोंमें सिर रखकर प्रणाम किया, इसके बाद वह भगवान्के सुयशका गान करने लगा । वास्तवमें अविनाशी भगवान् ही सर्वश्रेष्ठ कीर्तिसे सम्पन्न उन्हींके गुण और मनोहर लीलाएँ गान करनेयोग्य हैं ॥४ ॥
सोऽनुकम्पित ईशेन परिक्रम्य प्रणम्य तम् ।
लोकस्य पश्यतो लोकं स्वमगान्मुक्तकिल्बिषः ॥५
गजेन्द्रो भगवत्स्पर्शाद् विमुक्तोऽज्ञानबन्धनात् । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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प्राप्तो भगवतो रूपं पीतवासाश्चतुर्भुजः ॥६
स वै पूर्वमभूद् राजा पाण्ड्यो द्रविडसत्तमः ।
इन्द्रद्युम्न इति ख्यातो विष्णुव्रतपरायणः ॥७
स एकदाऽऽराधनकाल आत्मवान् गृहीतमौनव्रत ईश्वरं हरिम् । जटाधरस्तापस आप्लुतोऽच्युतं समर्चयामास कुलाचलाश्रमः ॥८ यदृच्छया तत्र महायशा मुनिः समागमच्छिष्यगणैः परिश्रितः । तं वीक्ष्य तूष्णीमकृतार्हणादिकं रहस्युपासीनमृषिश्चुकोप ह ॥९ तस्मा इमं शापमदादसाधु-रयं दुरात्माकृतबुद्धिरद्य । विप्रावमन्ता विशतां तमोऽन्धं यथा गजः स्तब्धमतिः स एव ॥१० श्रीशुक उवाच
एवं शप्त्वा गतोऽगस्त्यो भगवान् नृप सानुगः ।
इन्द्रद्युम्नोऽपि राजर्षिर्दिष्टं तदुपधारयन् ॥११
आपन्नः कौञ्जरीं योनिमात्मस्मृतिविनाशिनीम् ।
हर्यर्चनानुभावेन यद्गजत्वेऽप्यनुस्मृतिः ॥१२
भगवान्के कृपापूर्ण स्पर्शसे उसके सारे पाप ताप नष्ट हो गये । उसने भगवान्की परिक्रमा करके उनके चरणोंमें प्रणाम किया और सबके देखते - देखते अपने लोककी यात्रा की ॥५ ॥
गजेन्द्र भी भगवान्का स्पर्श प्राप्त होते ही अज्ञानके बन्धनसे मुक्त हो गया । उसे
भगवान्का ही रूप प्राप्त हो गया । वह पीताम्बरधारी एवं चतुर्भुज बन गया ॥ ६ ॥
गजेन्द्र पूर्वजन्ममें द्रविडदेशका पाण्ड्यवंशी राजा था । उसका नाम था इन्द्रद्युम्न । वह भगवान्का एक श्रेष्ठ उपासक एवं अत्यन्त यशस्वी था ॥७ ॥
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एक बार राजा इन्द्रद्युम्न राजपाट छोड़कर मलयपर्वतपर रहने लगे थे । उन्होंने जटाएँ बढ़ा लीं, तपस्वीका वेष धारण कर लिया । एक दिन स्नानके बाद पूजाके समय मनको एकाग्र करके एवं मौनव्रती होकर वे सर्वशक्तिमान् भगवान्की आराधना कर रहे थे ॥८ ॥
उसी समय दैवयोगसे परम यशस्वी अगस्त्य मुनि अपनी शिष्यमण्डलीके साथ वहाँ आ पहुँचे । उन्होंने देखा कि यह प्रजापालन और गृहस्थोचित अतिथिसेवा आदि धर्मका परित्याग करके तपस्वियोंकी तरह एकान्तमें चुपचाप बैठकर उपासना कर रहा है, इसलिये वे राजा इन्द्रद्युम्नपर क्रुद्ध हो गये ॥९ ॥
उन्होंने राजाको यह शाप दिया - ' इस राजाने गुरुजनोंसे शिक्षा नहीं ग्रहण की है, अभिमानवश परोपकारसे निवृत्त होकर मनमानी कर रहा है । ब्राह्मणोंका अपमान करनेवाला यह हाथीके समान जडबुद्धि है, इसलिये इसे वही घोर अज्ञानमयी हाथीकी योनि प्राप्त हो ' ॥१० ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! शाप एवं वरदान देनेमें समर्थ अगस्त्य ऋषि इस प्रकार शाप देकर अपनी शिष्यमण्डलीके साथ वहाँसे चले गये । राजर्षि इन्द्रद्युम्नने यह समझकर सन्तोष किया कि यह मेरा प्रारब्ध ही था ॥ ११ ॥ इसके बाद आत्माकी विस्मृति
करा देनेवाली हाथीकी योनि उन्हें प्राप्त हुई । परन्तु भगवान्की आराधनाका ऐसा प्रभाव है कि हाथी होनेपर भी उन्हें भगवान्की स्मृति हो ही गयी ॥१२ ॥
एवं विमोक्ष्य गजयूथपमब्जनाभ-स्तेनापि पार्षदगतिं गमितेन युक्तः ।
गन्धर्वसिद्धविबुधैरुपगीयमान-कर्माद्भुतं स्वभवनं गरुडासनोऽगात् ॥१३
एतन्महाराज तवेरितो मया कृष्णानुभावो गजराजमोक्षणम् । स्वर्ग्यं यशस्यं कलिकल्मषापहं दुःस्वप्ननाशं कुरुवर्य शृण्वताम् ॥१४
यथानुकीर्तयन्त्येतच्छ्रेयस्कामा द्विजातयः ।
शुचयः प्रातरुत्थाय दुःस्वप्नाद्युपशान्तये ॥१५
इदमाह हरिः प्रीतो गजेन्द्रं कुरुसत्तम ।
शृण्वतां सर्वभूतानां सर्वभूतमयो विभुः ॥ १६
श्रीभगवानुवाच
ये मां त्वां च सरश्चेदं गिरिकन्दरकाननम् ।
वेत्रकीचकवेणूनां गुल्मानि सुरपादपान् ॥१७
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