श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 1511–1520
श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1511–1520
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इन्द्र कुछ झेंप गये । तबतक वीरोंका मान मर्दन करनेवाले बलिने अपने धनुषको कानतक खींच - खींचकर बहुत - से बाण मारे || १० || सत्यवादी देवशत्रु बलिने इस प्रकार इन्द्रका अत्यन्त तिरस्कार किया । अब तो इन्द्र अंकुशसे मारे हुए हाथीकी तरह और भी चिढ़ गये । बलिका आक्षेप वे सहन न कर सके ॥ ११ ॥ शत्रुघाती इन्द्रने बलिपर अपने अमोघ वज्रका
प्रहार किया । उसकी चोटसे बलि पंख कटे हुए पर्वतके समान अपने विमानके साथ पृथ्वीपर गिर पड़े ॥१२ ॥
सखायं पतितं दृष्ट्वा जम्भो बलिसखः सुहृत् ।
अभ्ययात् सौहृदं सख्युर्हतस्यापि समाचरन् ॥ १३
स सिंहवाह आसाद्य गदामुद्यम्य रंहसा ।
जत्रावताडयच्छक्रं गजं च सुमहाबलः ॥१४
गदाप्रहारव्यथितो भृशं विह्वलितो गजः ।
जानुभ्यां धरणीं स्पृष्ट्वा कश्मलं परमं ययौ ॥१५
ततो रथो मातलिना हरिभिर्दशशतैर्वृतः ।
आनीतो द्विपमुत्सृज्य रथमारुरुहे विभुः ॥१६
तस्य तत् पूजयन् कर्म यन्तुर्दानवसत्तमः ।
शूलेन ज्वलता तं तु स्मयमानोऽहनन्मृधे ॥१७
सेहे रुजं सुदुर्मर्षां सत्त्वमालम्ब्य मातलिः ।
इन्द्रो जम्भस्य संक्रुद्धो वज्रेणापाहरच्छिरः ॥१८
जम्भं श्रुत्वा हतं तस्य ज्ञातयो नारदादृषेः ।
नमुचिश्च बलः पाकस्तत्रापेतुस्त्वरान्विताः ४ ॥१९
वचोभिः परुषैरिन्द्रमर्दयन्तोऽस्य मर्मसु ।
शरैरवाकिरन् मेघा धाराभिरिव पर्वतम् ॥२०
हरीन्दशशतान्याजौ हर्यश्वस्य बलः शरैः ।
तावद्भिरर्दयामास युगपल्लघुहस्तवान् ॥२१
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शताभ्यां मातलिं पाको रथं सावयवं पृथक् ।
सकृत्सन्धानमोक्षेण तदद्भुतमभूद् रणे ॥२२
नमुचिः पञ्चदशभिः स्वर्णपुङ्खैर्महेषुभिः ।
आहत्य व्यनदत्संख्ये सतोय इव तोयदः ॥ २३
बलिका एक बड़ा हितैषी और घनिष्ठ मित्र जम्भासुर था । अपने मित्रके गिर जानेपर भी उनको मारनेका बदला लेनेके लिये वह इन्द्रके सामने आ खड़ा हुआ ॥१३ ॥ सिंहपर चढ़कर
वह इन्द्रके पास पहुँच गया और बड़े वेगसे अपनी गदा उठाकर उनके जत्रुस्थान ( हँसली ) -पर प्रहार किया । साथ ही उस महाबलीने ऐरावतपर भी एक गदा जमायी ॥१४ ॥ गदाकी चोटसे
ऐरावतको बड़ी पीड़ा हुई, उसने व्याकुलतासे घुटने टेक दिये और फिर मूर्च्छित हो गया! ॥१५ ॥ उसी समय इन्द्रका सारथि मातलि हजार घोड़ोंसे जुता हुआ रथ ले आया और
शक्तिशाली इन्द्र ऐरावतको छोड़कर तुरंत रथपर सवार हो गये ॥१६ ॥ दानवश्रेष्ठ जम्भने
रणभूमिमें मातलिके इस कामकी बड़ी प्रशंसा की और मुसकराकर चमकता हुआ त्रिशूल उसके ऊपर चलाया ॥१७ ॥ मातलिने धैर्यके साथ इस असह्य पीड़ाको सह लिया । तब इन्द्रने
क्रोधित होकर अपने वज्रसे जम्भका सिर काट डाला ॥१८ ॥
देवर्षि नारदसे जम्भासुरकी मृत्युका समाचार जानकर उसके भाई - बन्धु नमुचि, बल और पाक झटपट रणभूमिमें आ पहुँचे ॥१९ ॥ अपने कठोर और मर्मस्पर्शी वाणीसे उन्होंने
इन्द्रको बहुत कुछ बुरा - भला कहा और जैसे बादल पहाड़पर मूसलधार पानी बरसाते हैं, वैसे ही उनके ऊपर बाणोंकी झड़ी लगा दी || २० || बलने बड़े हस्तलाघवसे एक साथ ही एक हजार बाण चलाकर इन्द्रके एक हजार घोड़ोंके घायल कर दिया ॥२१ ॥ पाकने सौ बाणोंसे
मातलिको और सौ बाणोंसे रथके एक - एक अंगको छेद डाला । युद्धभूमिमें यह बड़ी अद्भुत घटना हुई कि एक ही बार इतने बाण उसने चढ़ाये और चलाये ॥ २२ ॥ नमुचिने बड़े - बड़े
पंद्रह बाणोंसे, जिनमें सोनेके पंख लगे हुए थे, इन्द्रको मारा और युद्धभूमिमें वह जलसे भरे बादलके समान गरजने लगा ॥२३ ॥
सर्वतः शरकूटेन शक्रं सरथसारथिम् ।
छादयामासुरसुराः प्रावृट्सूर्यमिवाम्बुदाः ॥ २४
अलक्षयन्तस्तमतीव विह्वला विचुक्रुशुर्देवगणाः सहानुगाः । अनायकाः शत्रुबलेन निर्जिता वणिक्पथा भिन्ननवो यथार्णवे ॥२५ ततस्तुराषाडिषुबद्धपञ्जराद् ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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विनिर्गतः साश्वरथध्वजाग्रणीः । बभौ दिशः खं पृथिवीं च रोचयन् स्वतेजसा सूर्य इव क्षपात्यये ॥२६
निरीक्ष्य पृतनां देवः परैरभ्यर्दितां रणे ।
उदयच्छद् रिपुं हन्तुं वज्रं वज्रधरो रुषा ॥२७
स तेनैवाष्टधारेण शिरसी बलपाकयोः ।
ज्ञातीनां पश्यतां राजञ्जहार जनयन्भयम् ॥२८
नमुचिस्तद्वधं दृष्ट्वा ` शोकामर्षरुषान्वितः ।
जिघांसुरिन्द्रं नृपते चकार परमोद्यमम् ॥२९
अश्मसारमयं शूलं घण्टावद्धेमभूषणम् ।
प्रगृह्याभ्यद्रवत् क्रुद्धो हतोऽसीति वितर्जयन् ।
प्राहिणोद् देवराजाय निनदन् मृगराडिव ॥ ३०
तदापतद् गगनतले महाजवं विचिच्छिदे हरिरिषुभिः सहस्रधा । तमाहनन्नृप कुलिशेन कन्धरे रुषान्वितस्त्रिदशपतिः शिरो हरन् ॥३१ जैसे वर्षाकालके बादल सूर्यको ढक लेते हैं, वैसे ही असुरोंने बाणोंकी वर्षासे इन्द्र और उनके रथ तथा सारथिको भी चारों ओरसे ढक दिया ॥२४ ॥ इन्द्रको न देखकर देवता और
उनके अनुचर अत्यन्त विह्वल होकर रोने - चिल्लाने लगे । एक तो शत्रुओंने उन्हें हरा दिया था और दूसरे अब उनका कोई सेनापति भी न रह गया था । उस समय देवताओंकी ठीक वैसी ही अवस्था हो रही थी, जैसे बीच समुद्रमें नाव टूट जानेपर व्यापारियोंकी होती है ॥२५ ॥ परन्तु
थोड़ी ही देरमें शत्रुओंके बनाये हुए बाणोंके पिंजड़ेसे घोड़े, रथ, ध्वजा और सारथिके साथ इन्द्र निकल आये । जैसे प्रातःकाल सूर्य अपनी किरणोंसे दिशा, आकाश और पृथ्वीको चमका देते हैं, वैसे ही इन्द्रके तेजसे सब - के - सब जगमगा उठे ॥२६ ॥ वज्रधारी इन्द्रने देखा कि
शत्रुओंने रणभूमिमें हमारी सेनाको रौंद डाला है, तब उन्होंने बड़े क्रोधसे शत्रुको मार डालनेके लिये वज्रसे आक्रमण किया ॥२७ ॥ परीक्षित्! उस आठ धारवाले पैने वज्रसे उन दैत्योंके
भाई - बन्धुओंको भी भयभीत करते हुए उन्होंने बल और पाकके सिर काट लिये ॥२८ ॥
परीक्षित्! अपने भाइयोंको मरा हुआ देख नमुचिको बड़ा शोक हुआ । वह क्रोधके कारण आपेसे बाहर होकर इन्द्रको मार डालनेके लिये जी - जानसे प्रयास करने लगा ॥ २ ९ ॥ ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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‘ इन्द्र! अब तुम बच नहीं सकते ' – इस प्रकार ललकारते हुए एक त्रिशूल उठाकर वह इन्द्रपर टूट पड़ा । वह त्रिशूल फौलादका बना हुआ था, सोनेके आभूषणोंसे विभूषित था और उसमें घण्टे लगे हुए थे । नमुचिने क्रोधके मारे सिंहके समान गरजकर इन्द्रपर वह त्रिशूल चला दिया ॥३० ॥ परीक्षित्! इन्द्रने देखा कि त्रिशूल बड़े वेगसे मेरी ओर आ रहा है । उन्होंने अपने
बाणोंसे आकाशमें ही उसके हजारों टुकड़े कर दिये और इसके बाद देवराज इन्द्रने बड़े क्रोधसे उसका सिर काट लेनेके लिये उसकी गर्दनपर वज्र मारा ॥३१ ॥
न तस्य हि त्वचमपि वज्र ऊर्जितो बिभेद यः सुरपतिनौजसेरितः । तदद्भुतं परमतिवीर्यवृत्रभित् तिरस्कृतो नमुचिशिरोधरत्वचा ॥३२
तस्मादिन्द्रोऽबिभेच्छत्रोर्वज्रः प्रतिहतो यतः ।
किमिदं दैवयोगेन भूतं लोकविमोहनम् ॥३३
येन मे पूर्वमद्रीणां पक्षच्छेदः प्रजात्यये ' ।
कृतो निविशतां े भारैः पतत्त्रैः पततां भुवि ॥३४
तपःसारमयं त्वाष्ट्रं वृत्रो येन विपाटितः ।
अन्ये चापि ३ बलोपेताः सर्वास्त्रैरक्षतत्वचः ॥३५
सोऽयं प्रतिहतो वज्रो मया मुक्तोऽसुरेऽल्पके ।
नाहं तदाददे दण्डं ४ ब्रह्मतेजोऽप्यकारणम् ॥३६
इति शक्रं विषीदन्तमाह वागशरीरिणी नायं शुष्कैरथो नार्यैर्वधमर्हति दानवः ॥३७
मयास्मै यद् वरो दत्तो मृत्युर्नैवार्द्रशुष्कयोः ।
अतोऽन्यश्चिन्तनीयस्ते उपायो मघवन् रिपोः ॥३८
तां देवीं गिरमाकर्ण्य मघवान्सुसमाहितः ।
ध्यायन् फेनमथापश्यदुपायमुभयात्मकम् ॥३९
न शुष्केण न चार्द्रेण जहार नमुचेः शिरः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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तं तुष्टुवुर्मुनिगणा माल्यैश्चावाकिरन्विभुम् ॥४० यद्यपि इन्द्रने बड़े वेगसे वह वज्र चलाया था, परन्तु उस यशस्वी वज्रसे उसके चमड़ेपर खरोंचतक नहीं आयी । यह बड़ी आश्चर्यजनक घटना हुई की जिस वज्रने महाबली वृत्रासुरका शरीर टुकड़े - टुकड़े कर डाला था, नमुचिके गलेकी त्वचाने उसका तिरस्कार कर दिया ॥३२ ॥ जब वज्र नमुचिका कुछ न बिगाड़ सका, तब इन्द्र उससे डर गये । वे सोचने लगे
कि ‘ दैवयोगसे संसारभरको संशयमें डालनेवाली यह कैसी घटना हो गयी! || ३३ || पहले युगमें जब ये पर्वत पाँखोंसे उड़ते थे और घूमते - फिरते भारके कारण पृथ्वीपर गिर पड़ते थे, तब प्रजाका विनाश होते देखकर इसी वज्रसे मैंने उन पहाड़ोंकी पाँखें काट डाली थीं ॥ ३४ ॥
त्वष्टाकी तपस्याका सार ही वृत्रासुरके रूपमें प्रकट हुआ था! उसे भी मैंने इसी वज्रके द्वारा काट डाला था । और भी अनेकों दैत्य, जो बहुत बलवान् थे और किसी अस्त्र - शस्त्रसे जिनके चमड़ेको भी चोट नहीं पहुँचायी जा सकी थी, इसी वज्रसे मैंने मृत्युके घाट उतार दिये थे ॥३५ ॥ वही मेरा वज्र मेरे प्रहार करनेपर भी इस तुच्छ असुरको न मार सका, अतः अब मैं
इसे अंगीकार नहीं कर सकता । यह ब्रह्मतेजसे बना है तो क्या हुआ, अब तो निकम्मा हो चुका है ' ॥ ३६ ॥ इस प्रकार इन्द्र विषाद करने लगे । उसी समय यह आकाशवाणी हुई- " यह दानव
न तो सूखी वस्तुसे मर सकता है, न गीलीसे ॥ ३७ ॥ इसे मैं वर दे चुका हूँ कि ' सूखी या गीली
वस्तुसे तुम्हारी मृत्यु न होगी । ' इसलिये इन्द्र! इस शत्रुको मारनेके लिये अब तुम कोई दूसरा उपाय सोचो! " ॥ ३८ ॥
उस आकाशवाणीको सुनकर देवराज इन्द्र बड़ी एकाग्रतासे विचार करने लगे । सोचते-सोचते उन्हें सूझ गया कि समुद्रका फेन तो सूखा भी है, गीला भी; ॥३९ ॥ इसलिये न उसे
सूखा कह सकते हैं, न गीला । अतः इन्द्रने उस न सूखे और न गीले समुद्रफेनसे नमुचिका सिर काट डाला । उस समय बड़े - बड़े ऋषि - मुनि भगवान् इन्द्रपर पुष्पोंकी वर्षा और उनकी स्तुति करने लगे || ४० ||
गन्धर्वमुख्यौ जगतुर्विश्वावसुपरावसू ।
देवदुन्दुभयो नेदुर्नर्तक्यो ननृतुर्मुदा ॥४१
अन्येऽप्येवं प्रतिद्वन्द्वान्याय्वग्निवरुणादयः ।
सूदयामासुरस्त्रौघैर्मृगान्केसरिणो यथा ॥४२
ब्रह्मणा प्रेषितो देवान्देवर्षिर्नारदो नृप ।
वारयामास विबुधान्दृष्ट्वा दानवसंक्षयम् ॥४३
नारद उवाच ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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भवद्भिरमृतं प्राप्तं नारायणभुजाश्रयैः ।
श्रिया समेधिताः सर्व उपारमत विग्रहात् ॥४४
श्रीशुक उवाच
संयम्य मन्युसंरम्भं मानयन्तो मुनेर्वचः ।
उपगीयमानानुचरैर्ययुः सर्वे त्रिविष्टपम् ॥४५
येऽवशिष्टा रणे तस्मिन् नारदानुमतेन ते ।
बलिं विपन्नमादाय अस्तं गिरिमुपागमन् ॥४६
तत्राविनष्टावयवान् विद्यमानशिरोधरान् ।
उशना जीवयामास संजीविन्या स्वविद्यया ॥४७
बलिश्वोशनसा स्पृष्टः प्रत्यापन्नेन्द्रियस्मृतिः ।
पराजितोऽपि नाखिद्यल्लोकतत्त्वविचक्षणः ॥४८
गन्धर्वशिरोमणि विश्वावसु तथा परावसु गान करने लगे, देवताओंकी दुन्दुभियाँ बजने लगीं और नर्तकियाँ आनन्दसे नाचने लगीं ॥४१ ॥ इसी प्रकार वायु, अग्नि, वरुण आदि दूसरे
देवताओंने भी अपने अस्त्र - शस्त्रोंसे विपक्षियोंको वैसे ही मार गिराया जैसे सिंह हरिनोंको मार डालते हैं ॥४२ ॥ परीक्षित्! इधर ब्रह्माजीने देखा कि दानवोंका तो सर्वथा नाश हुआ जा रहा
है । तब उन्होंने देवर्षि नारदको देवताओंके पास भेजा और नारदजीने वहाँ जाकर देवताओंको लड़नेसे रोक दिया ॥४३ ॥
नारदजीने कहा – देवताओ! भगवान्की भुजाओंकी छत्रछायामें रहकर आपलोगोंने अमृत प्राप्त कर लिया है और लक्ष्मीजीने भी अपनी कृपा - कोरसे आपकी अभिवृद्धि की है, इसलिये आपलोग अब लड़ाई बंद कर दें ॥ ४४ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं— देवताओंने देवर्षि नारदकी बात मानकर अपने क्रोधके वेगको शान्त कर लिया और फिर वे सब - के - सब अपने लोक स्वर्गको चले गये । उस समय देवताओंके अनुचर उनके यशका गान कर रहे थे ॥४५ ॥
युद्धमें बचे हुए दैत्योंने देवर्षि नारदकी सम्मतिसे वज्रकी चोटसे मरे हुए बलिको लेकर अस्ताचलकी यात्रा की ॥४६ ॥
वहाँ शुक्राचार्यने अपनी संजीवनी विद्यासे उन असुरोंको जीवित कर दिया, जिनके गरदन आदि अंग कटे नहीं थे, बच रहे थे ॥४७ ॥
शुक्राचार्यके स्पर्श करते ही बलिकी इन्द्रियोंमें चेतना और मनमें स्मरणशक्ति आ गयी । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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बलि यह बात समझते थे कि संसारमें जीवन - मृत्यु, जय - पराजय आदि उलट - फेर होते ही रहते हैं । इसलिये पराजित होनेपर भी उन्हें किसी प्रकारका खेद नहीं हुआ ॥४८ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामष्टमस्कन्धे देवासुरसंग्रामे एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
१. प्रा ० पा ० — बलम् । २. प्रा ० पा ० - लं च परं ययौ । ३. प्रा ० पा ० — मुचिः सबलः । ४. प्रा ० पा ० — पेतुश्च रोषिताः । १. प्रा ० पा ० – विन ० । १. प्रा ० पा ० — जाक्षये । २. प्रा ० पा ० - वि ० । ३. प्रा ० पा ० – चातिबलो ० । ४. प्रा ० पा ० —वज्रं । | -****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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अथ द्वादशोऽध्यायः मोहिनीरूपको देखकर महादेवजीका मोहित होना श्रीबादरायणिरुवाच
वृषध्वजो निशम्येदं योषिद्रूपेण दानवान् ।
मोहयित्वा सुरगणान्हरिः सोममपाययत् ॥१
वृषमारुह्य गिरिशः सर्वभूतगणैर्वृतः ।
सह देव्या ययौ द्रष्टुं यत्रास्ते मधुसूदनः ॥२
सभाजितो भगवता सादरं सोमया भवः ।
सूपविष्ट उवाचेदं प्रतिपूज्य ' स्मयन्हरिम् ॥३
श्रीमहादेव उवाच
देवदेव जगद्व्यापिञ्जगदीश जगन्मय ।
सर्वेषामपि भावानां त्वमात्मा हेतुरीश्वरः ॥४
आद्यन्तावस्य यन्मध्यमिदमन्यदहं बहिः ।
यतोऽव्ययस्य नैतानि तत् सत्यं ब्रह्म चिद् भवान् ॥५
तवैव चरणाम्भोजं श्रेयस्कामा निराशिषः ।
विसृज्योभयतः सङ्गं मुनयः समुपासते ॥६
त्वं ब्रह्म पूर्णममृतं विगुणं विशोक-मानन्दमात्रमविकारमनन्यदन्यत् ।
विश्वस्य हेतुरुदयस्थितिसंयमाना-मात्मेश्वरश्च तदपेक्षतयानपेक्षः ॥७
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! जब भगवान् शंकरने यह सुना कि श्रीहरिने स्त्रीका रूप धारण करके असुरोंको मोहित कर लिया और देवताओंको अमृत पिला दिया, तब वे सतीदेवीके साथ बैलपर सवार हो समस्त भूतगणोंको लेकर वहाँ गये, जहाँ भगवान् मधुसूदन ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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निवास करते हैं ॥१-२ ॥ भगवान् श्रीहरिने बड़े प्रेमसे गौरी - शंकरभगवान्का स्वागत - सत्कार किया । वे भी सुखसे बैठकर भगवान्का सम्मान करके मुसकराते हुए बोले ॥ ३ ॥
श्रीमहादेवजीने कहा – समस्त देवोंके आराध्यदेव! आप विश्वव्यापी, जगदीश्वर एवं जगत्स्वरूप हैं । समस्त चराचर पदार्थोंके मूल कारण, ईश्वर और आत्मा भी आप ही हैं ॥४ ॥
इस जगत्के आदि, अन्त और मध्य आपसे ही होते हैं; परन्तु आप आदि, मध्य और अन्तसे रहित हैं । आपके अविनाशी स्वरूपमें द्रष्टा, दृश्य, भोक्ता और भोग्यका भेदभाव नहीं है । वास्तवमें आप सत्य, चिन्मात्र ब्रह्म ही हैं ॥ ५ ॥
कल्याणकामी महात्मालोग इस लोक और परलोक दोनोंकी आसक्ति एवं समस्त कामनाओंका परित्याग करके आपके चरणकमलोंकी ही आराधना करते हैं ॥६ ॥
आप अमृतस्वरूप, समस्त प्राकृत गुणोंसे रहित, शोककी छायासे भी दूर, स्वयं परिपूर्ण ब्रह्म हैं । आप केवल आनन्दस्वरूप हैं । आप निर्विकार हैं । आपसे भिन्न कुछ नहीं है, परन्तु आप सबसे भिन्न हैं । आप विश्वकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयके परम कारण हैं । आप समस्त जीवोंके शुभाशुभ कर्मका फल देनेवाले स्वामी हैं । परन्तु यह बात भी जीवोंकी अपेक्षासे ही कही जाती है; वास्तवमें आप सबकी अपेक्षासे रहित, अनपेक्ष हैं ॥ ७ ॥
एकस्त्वमेव सदसद् द्वयमद्वयं च स्वर्णं कृताकृतमिवेह न वस्तुभेदः । अज्ञानतस्त्वयि जनैर्विहितो विकल्पो यस्माद् गुणैर्व्यतिकरो निरुपाधिकस्य ॥८ त्वां ब्रह्म केचिदवयन्त्युत धर्ममेके एके परं सदसतोः पुरुषं परेशम् । अन्येऽवयन्ति नवशक्तियुतं परं त्वां केचिन्महापुरुषमव्ययमात्मतन्त्रम् ॥९ नाहं परायुर्ऋषयो न मरीचिमुख्या
जानन्ति यद्विरचितं खलु सत्त्वसर्गाः ।
यन्मायया मुषितचेतस ईश दैत्य-मर्त्यादयः किमुत शश्वदभद्रवृत्ताः ॥१०
न त्वं समीहितमदः स्थितिजन्मनाशं भूतेहितं च जगतो भवबन्धमोक्षौ । वायुर्यथा विशति खं च चराचराख्यं सर्वं तदात्मकतयावगमोऽवरुन्त्से ॥११ ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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अवतारा मया दृष्टा रममाणस्य ते गुणैः ।
सोऽहं तद् द्रुष्टुमिच्छामि यत् ते योषिद्वपुर्धृतम् ॥१२
येन सम्मोहिता दैत्याः पायिताश्चामृतं सुराः ।
तद् दिदृक्षव आयाताः परं कौतूहलं हि नः ॥ १३
स्वामिन्! कार्य और कारण, द्वैत और अद्वैत - जो कुछ है, वह सब एकमात्र आप ही हैं; ठीक वैसे ही जैसे आभूषणोंके रूपमें स्थित सुवर्ण और मूल सुवर्णमें कोई अन्तर नहीं है, -दोनों एक ही वस्तु हैं । लोगोंने आपके वास्तविक स्वरूपको न जाननेके कारण आपमें नाना प्रकारके भेदभाव और विकल्पोंकी कल्पना कर रखी है । यही कारण है कि आपमें किसी प्रकारकी उपाधि न होनेपर भी गुणोंको लेकर भेदकी प्रतीति होती है ॥ ८ ॥
प्रभो! कोई - कोई आपको ब्रह्म समझते हैं, तो दूसरे आपको धर्म कहकर वर्णन करते हैं । इसी प्रकार कोई आपको प्रकृति और पुरुषसे परे परमेश्वर मानते हैं तो कोई विमला, उत्कर्षिणी, ज्ञाना, क्रिया, योगा, प्रह्वी, सत्या, ईशाना और अनुग्रहा – इन नौ शक्तियोंसे युक्त परम पुरुष तथा दूसरे क्लेश - कर्म आदिके बन्धनसे रहित, पूर्वजोंके भी पूर्वज, अविनाशी पुरुषविशेषके रूपमें मानते हैं ॥९ ॥ प्रभो! मैं, ब्रह्मा और मरीचि आदि ऋषि — जो
सत्त्वगुणकी सृष्टिके अन्तर्गत हैं— जब आपकी बनायी हुई सृष्टिका भी रहस्य नहीं जान पाते, तब आपको तो जान ही कैसे सकते हैं । फिर जिनका चित्त मायाने अपने वशमें कर रखा है और जो सर्वदा रजोगुणी और तमोगुणी कर्मोंमें लगे रहते हैं, वे असुर और मनुष्य आदि तो भला जानेंगे ही क्या ॥ १० ॥ प्रभो! आप सर्वात्मक एवं ज्ञानस्वरूप हैं । इसीलिये वायुके
समान आकाशमें अदृश्य रहकर भी आप सम्पूर्ण चराचर जगत्में सदा - सर्वदा विद्यमान रहते हैं तथा इसकी चेष्टा, स्थिति, जन्म, नाश, प्राणियोंके कर्म एवं संसारके बन्धन, मोक्ष— सभीको जानते हैं ॥११ ॥ प्रभो! आप जब गुणोंको स्वीकार करके लीला करनेके लिये बहुत-से अवतार ग्रहण करते हैं, तब मैं उनका दर्शन करता ही हूँ । अब मैं आपके उस अवतारका
भी दर्शन करना चाहता हूँ, जो आपने स्त्रीरूपमें ग्रहण किया था ॥१२ ॥ जिससे दैत्योंको
मोहित करके आपने देवताओंको अमृत पिलाया, स्वामिन्! उसीको देखनेके लिये हम सब आये हैं । हमारे मनमें उसके दर्शनका बड़ा कौतूहल है ॥१३ ॥
श्रीशुक उवाच
एवमभ्यर्थितो विष्णुर्भगवान् शूलपाणिना ।
प्रहस्य भावगम्भीरं गिरिशं प्रत्यभाषत ॥१४
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