श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 1521–1530

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1521–1530

पृष्ठ 1521

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कौतूहलाय दैत्यानां योषिद्वेषो मया कृतः ।

पश्यता सुरकार्याणि गते पीयूषभाजने ॥१५

तत्तेऽहं दर्शयिष्यामि दिदृक्षोः सुरसत्तम ।

कामिनां बहु मन्तव्यं सङ्कल्पप्रभवोदयम् ॥१६

श्रीशुक उवाच

इति ब्रुवाणो भगवांस्तत्रैवान्तरधीयत ।

सर्वतश्चारयंश्चक्षुर्भव आस्ते सहोमया ॥१७

ततो ददर्शोपवने वरस्त्रियं विचित्रपुष्पारुणपल्लवद्रुमे । विक्रीडतीं कन्दुकलीलया लसद् दुकूलपर्यस्तनितम्बमेखलाम् ॥ १८

आवर्तनोद्वर्तनकम्पितस्तन-प्रकृष्टहारोरुभरैः पदे पदे ।

प्रभज्यमानामिव मध्यतश्चलत्-पदप्रवालं नयतीं ततस्ततः ॥१९

दिक्षु भ्रमत्कन्दुकचापलैर्भृशं

प्रोद्विग्नतारायतलोललोचनाम् ।

स्वकर्णविभ्राजितकुण्डलोल्लसत्-कपोलनीलालकमण्डिताननाम् ॥२०

श्रीशुकदेवजी कहते हैं — जब भगवान् शंकरने विष्णुभगवान् से यह प्रार्थना की, तब वे गम्भीरभावसे हँसकर शंकरजीसे बोले ॥१४ ॥

श्रीविष्णुभगवान्ने कहा - शंकरजी! उस समय अमृतका कलश दैत्योंके हाथमें चला गया था । अतः देवताओंका काम बनानेके लिये और दैत्योंका मन एक नये कौतूहलकी ओर खींच लेनेके लिये ही मैंने वह स्त्रीरूप धारण किया था ॥ १५ ॥ देवशिरोमणे! आप उसे देखना

चाहते हैं, इसलिये मैं आपको वह रूप दिखाऊँगा । परन्तु वह रूप तो कामी पुरुषोंका ही आदरणीय है, क्योंकि वह कामभावको उत्तेजित करनेवाला है ॥ १६ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - इस तरह कहते - कहते विष्णुभगवान् वहीं अन्तर्धान हो गये ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1522

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और भगवान् शंकर सती देवीके साथ चारों ओर दृष्टि दौड़ाते हुए वहीं बैठे रहे ॥१७ ॥ इतनेमें

ही उन्होंने देखा कि सामने एक बड़ा सुन्दर उपवन है । उसमें भाँति - भाँतिके वृक्ष लग रहे हैं, जो रंग - बिरंगे फूल और लाल - लाल कोंपलोंसे भरे - पूरे हैं । उन्होंने यह भी देखा कि उस उपवनमें एक सुन्दरी स्त्री गेंद उछाल - उछालकर खेल रही है । वह बड़ी ही सुन्दर साड़ी पहने हुए है और उसकी कमर में करधनीकी लड़ियाँ लटक रही हैं ॥१८ ॥ गेंदके उछालने और

लपककर पकड़नेसे उसके स्तन और उनपर पड़े हुए हार हिल रहे हैं । ऐसा जान पड़ता था, मानो इनके भारसे उसकी पतली कमर पग - पगपर टूटते टूटते बच जाती है । वह अपने लाल-लाल पल्लवोंके समान सुकुमार चरणोंसे बड़ी कलाके साथ ठुमुक - ठुमुक चल रही थी ॥१९ ॥ उछलता हुआ गेंद जब इधर - उधर छलक जाता था, तब वह लपककर उसे रोक

लेती थी । इससे उसकी बड़ी - बड़ी चंचल आँखें कुछ उद्विग्न - सी हो रही थीं । उसके कपोलोंपर कानोंके कुण्डलोंकी आभा जगमगा रही थी और घुँघराली काली - काली अलकें उनपर लटक आती थीं, जिससे मुख और भी उल्लसित हो उठता था ॥२० ॥

श्लथद् दुकूलं कबरीं च विच्युतां सन्नह्यतीं वामकरेण गु विनिघ्नतीमन्यकरेण कन्दुकं विमोहयन्तीं जगदात्ममायया ॥२१ तां वीक्ष्य देव इति कन्दुकलीलयेषद्-व्रीडास्फुटस्मितविसृष्टकटाक्षमुष्टः । स्त्रीप्रेक्षणप्रतिसमीक्षणविह्वलात्मा नात्मानमन्तिक उमां स्वगणांश्च वेद ॥ २२ तस्याः कराग्रात् स तु कन्दुको यदा गतो विदुरं तमनुव्रजत्स्त्रियाः । वासः ससूत्रं लघु मारुतोऽहरद् भवस्य देवस्य किलानुपश्यतः ॥२३

एवं तां रुचिरापाङ्गीं दर्शनीयां मनोरमाम् ।

दृष्ट्वा तस्यां मनश्चक्रे विषज्जन्त्यां भवः किल ॥२४

तयापहृतविज्ञानस्तत्कृतस्मरविह्वलः १ ।

भवान्या अपि पश्यन्त्या गतह्रीस्तत्पदं ययौ ॥२५

सा तमायान्तमालोक्य विवस्त्रा व्रीडिता भृशम् । ****** ebook converter DEMO Watermarks ******* **

पृष्ठ 1523

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निलीयमाना वृक्षेषु हसन्ती नान्वतिष्ठत ॥२६

तामन्वगच्छद् भगवान् भवः प्रमुषितेन्द्रियः ।

कामस्य च वशं नीतः करेणुमिव यूथपः ॥२७

सोऽनुव्रज्यातिवेगेन गृहीत्वानिच्छतीं स्त्रियम् ।

केशबन्ध उपानीय बाहुभ्यां परिषस्वजे ॥२८

जब कभी साड़ी सरक जाती और केशोंकी वेणी खुलने लगती, तब अपने अत्यन्त सुकुमार बायें हाथसे वह उन्हें सम्हाल - सँवार लिया करती । उस समय भी वह दाहिने हाथसे गेंद उछाल - उछालकर सारे जगत्को अपनी मायासे मोहित कर रही थी ॥२१ ॥ गेंदसे खेलते-खेलते उसने तनिक सलज्जभावसे मुसकराकर तिरछी नजरसे शंकरजीकी ओर देखा । बस,

उनका मन हाथसे निकल गया । वे मोहिनीको निहारने और उसकी चितवनके रसमें डूबकर इतने विह्वल हो गये कि उन्हें अपने - आपकी भी सुधि न रही । फिर पास बैठी हुई सती और गणोंकी तो याद ही कैसे रहती ॥ २२ ॥ एक बार मोहिनीके हाथसे उछलकर गेंद थोड़ी दूर

चला गया । वह भी उसीके पीछे दौड़ी । उसी समय शंकरजीके देखते - देखते वायुने उसकी झीनी - सी साड़ी करधनीके साथ ही उड़ा ली ॥२३ ॥

मोहिनीका एक - एक अंग बड़ा ही रुचिकर और मनोरम था । जहाँ आँखें लग जातीं, लगी ही रहतीं । यही नहीं, मन भी वहीं रमण करने लगता । उसको इस दशामें देखकर भगवान् शंकर उसकी ओर अत्यन्त आकृष्ट हो गये । उन्हें मोहिनी भी अपने प्रति आसक्त जान पड़ती थी ॥२४ ॥ उसने शंकरजीका विवेक छीन लिया । वे उसके हाव - भावोंसे कामातुर

हो गये और भवानीके सामने ही लज्जा छोड़कर उसकी ओर चल पड़े ॥२५ ॥

मोहिनी वस्त्रहीन तो पहले ही हो चुकी थी, शंकरजीको अपनी ओर आते देख बहुत लज्जित हो गयी । वह एक वृक्षसे दूसरे वृक्षकी आड़में जाकर छिप जाती और हँसने लगती । परन्तु कहीं ठहरती न थी ॥ २६ ॥ भगवान् शंकरकी इन्द्रियाँ अपने वशमें नहीं रहीं, वे

कामवश हो गये थे; अतः हथिनीके पीछे हाथीकी तरह उसके पीछे - पीछे दौड़ने लगे ॥२७ ॥

उन्होंने अत्यन्त वेगसे उसका पीछा करके पीछेसे उसका जूड़ा पकड़ लिया और उसकी इच्छा न होनेपर भी उसे दोनों भुजाओंमें भरकर हृदयसे लगा लिया ॥२८ ॥

सोपगूढा भगवता करिणा करिणी यथा ।

इतस्ततः प्रसर्पन्ती विप्रकीर्णशिरोरुहा ॥२९

आत्मानं मोचयित्वाङ्ग सुरर्षभभुजान्तरात् ।

प्राद्रवत्सा पृथुश्रोणी माया देवविनिर्मिता ॥ ३०

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पृष्ठ 1524

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तस्यासी पदवीं रुद्रो विष्णोरद्भुतकर्मणः ।

प्रत्यपद्यत कामेन वैरिणेव विनिर्जितः ॥३१

तस्यानुधावतो रेतश्चस्कन्दामोघरेतसः ।

शुष्मिणो यूथपस्येव वासितामनु धावतः ॥३२

यत्र यत्रापतन्मह्यां रेतस्तस्य महात्मनः ।

तानि रूप्यस्य हेम्नश्च क्षेत्राण्यासन्महीपते ॥३३

सरित्सरस्सु शैलेषु वनेषूपवनेषु च ।

यत्र क्व चासन्नृषयस्तत्र संनिहितो हरः ॥ ३४

स्कन्ने रेतसि सोऽपश्यदात्मानं देवमायया । १ जडीकृतं नृपश्रेष्ठ संन्यवर्तत कश्मलात् ॥३५

अथावगतमाहात्म्य आत्मनो जगदात्मनः ।

अपरिज्ञेयवीर्यस्य न मेने तदु हाद्भुतम् ॥३६

तमविक्लवमव्रीडमालक्ष्य े मधुसूदनः ।

उवाच परमप्रीतो बिभ्रत्स्वां पौरुषीं तनुम् ॥३७

श्रीभगवानुवाच

दिष्ट्या त्वं विबुधश्रेष्ठ स्वां निष्ठामात्मनारे स्थितः ।

यन्मे स्त्रीरूपया स्वैरं मोहितोऽप्यङ्ग मायया ॥३८

जैसे हाथी हथिनीका आलिंगन करता है, वैसे ही भगवान् शंकरने उसका आलिंगन किया । वह इधर - उधर खिसककर छुड़ानेकी चेष्टा करने लगी, इसी छीना - झपटीमें उसके सिरके बाल बिखर गये ॥२९ ॥ वास्तवमें वह सुन्दरी भगवान्‌की रची हुई माया ही थी, इससे

उसने किसी प्रकार शंकरजीके भुजपाशसे अपनेको छुड़ा लिया और बड़े वेगसे भागी ॥ ३० ॥

भगवान् शंकर भी उन मोहिनीवेषधारी अद्भुतकर्मा भगवान् विष्णुके पीछे - पीछे दौड़ने लगे । उस समय ऐसा जान पड़ता था, मानो उनके शत्रु कामदेवने इस समय उनपर विजय प्राप्त कर ली है || ३१ || कामुक हथिनीके पीछे दौड़नेवाले मदोन्मत्त हाथीके समान वे मोहिनीके पीछे - पीछे दौड़ रहे थे । यद्यपि भगवान् शंकरका वीर्य अमोघ है, फिर भी मोहिनीकी मायासे ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1525

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वह स्खलित हो गया ॥३२ ॥ भगवान् शंकरका वीर्य पृथ्वीपर जहाँ - जहाँ गिरा, वहाँ - वहाँ

सोने - चाँदीकी खानें बन गयीं ॥ ३३ ॥ परीक्षित्! नदी, सरोवर, पर्वत, वन और उपवनमें एवं

जहाँ - जहाँ ऋषि - मुनि निवास करते थे, वहाँ वहाँ मोहिनीके पीछे - पीछे भगवान् शंकर गये थे ॥३४ ॥ परीक्षित्! वीर्यपात हो जानेके बाद उन्हें अपनी स्मृति हुई । उन्होंने देखा कि अरे,

भगवान्‌की मायाने तो मुझे खूब छकाया! वे तुरंत उस दुःखद प्रसंगसे अलग हो गये ॥ ३५ ॥

इसके बाद आत्मस्वरूप सर्वात्मा भगवान्‌की यह महिमा जानकर उन्हें कोई आश्चर्य नहीं हुआ । वे जानते थे कि भला, भगवान्‌की शक्तियोंका पार कौन पा सकता है ॥३६ ॥

भगवान्ने देखा कि भगवान् शंकरको इससे विषाद या लज्जा नहीं हुई है, तब वे पुरुषशरीर धारण करके फिर प्रकट हो गये और बड़ी प्रसन्नतासे उनसे कहने लगे ॥३७ ॥

श्रीभगवान्ने कहा— देवशिरोमणे! मेरी स्त्रीरूपिणी मायासे विमोहित होकर भी आप

स्वयं ही अपनी निष्ठामें स्थित हो गये । यह बड़े ही आनन्दकी बात है ॥ ३८ ॥

को नु मेऽतितरेन्मायां विषक्तस्त्वदृते पुमान् ।

तांस्तान्विसृजतीं भावान्दुस्तरामकृतात्मभिः ॥३९

गुणमयी माया न त्वामभिभविष्यति ।

मया समेता कालेन कालरूपेण भागशः ॥४०

श्रीशुक उवाच

एवं भगवता राजन् श्रीवत्साङ्केन सत्कृतः ।

आमन्त्र्य तं परिक्रम्य सगणः स्वालयं ययौ ॥४१

आत्मांशभूतां ' तां मायां भवानीं भगवान्भवः ।

शंसतामृषिमुख्यानां प्रीत्याऽऽचष्टाथ े भारत ॥४२

अपि व्यपश्यस्त्वमजस्य मायां परस्य पुंसः परदेवतायाः । अहं कलानामृषभो विमुह्ये ययावशोऽन्ये किमुतास्वतन्त्राः ॥४३ यं ४ मामपृच्छस्त्वमुपेत्य योगात् " समासहस्रान्त उपारतं ६ वै । स एष ° साक्षात् पुरुषः पुराणो ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1526

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न यत्र कालो विशते न वेदः ॥४४ श्रीशुक उवाच

इति तेऽभिहितस्तात विक्रमः शार्ङ्गधन्वनः ।

सिन्धोर्निर्मथने येन धृतः पृष्ठे महाचलः ॥४५

मेरी माया अपार है । वह ऐसे - ऐसे हाव - भाव रचती है कि अजितेन्द्रिय पुरुष तो किसी प्रकार उससे छुटकारा पा ही नहीं सकते । भला, आपके अतिरिक्त ऐसा कौन पुरुष है, जो एक बार मेरी मायाके फंदेमें फँसकर फिर स्वयं ही उससे निकल सके ॥ ३ ९ ॥ यद्यपि मेरी यह गुणमयी माया बड़ों - बड़ोंको मोहित कर देती है, फिर भी अब यह आपको कभी मोहित नहीं करेगी । क्योंकि सृष्टि आदिके लिये समयपर उसे क्षोभित करनेवाला काल मैं ही हूँ, इसलिये मेरी इच्छाके विपरीत वह रजोगुण आदिकी सृष्टि नहीं कर सकती ॥४० ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! इस प्रकार भगवान् विष्णुने भगवान् शंकरका सत्कार किया । तब उनसे विदा लेकर एवं परिक्रमा करके वे अपने गणोंके साथ कैलासको चले गये ॥४१ ॥ भरतवंशशिरोमणे! भगवान् शंकरने बड़े - बड़े ऋषियोंकी सभामें अपनी

अर्द्धांगिनी सती देवीसे अपने विष्णुरूपकी अंशभूता मायामयी मोहिनीका इस प्रकार बड़े प्रेमसे वर्णन किया ॥४२ || ' देवि! तुमने परम पुरुष परमेश्वर भगवान् विष्णुकी माया देखी? देखो, यों तो मैं समस्त कलाकौशल, विद्या आदिका स्वामी और स्वतन्त्र हूँ, फिर भी उस मायासे विवश होकर मोहित हो जाता हूँ । फिर दूसरे जीव तो परतन्त्र हैं ही; अतः वे मोहित हो जायँ — इसमें कहना ही क्या है || ४३ || जब मैं एक हजार वर्षकी समाधिसे उठा था, तब तुमने मेरे पास आकर पूछा था कि तुम किसकी उपासना करते हो । वे यही साक्षात् सनातन पुरुष हैं । न तो काल ही इन्हें अपनी सीमामें बाँध सकता है और न वेद ही इनका वर्णन कर सकता है । इनका वास्तविक स्वरूप अनन्त और अनिर्वचनीय है ' ॥४४ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - प्रिय परीक्षित्! मैंने विष्णुभगवान्‌की यह ऐश्वर्यपूर्ण लीला तुमको सुनायी, जिसमें समुद्रमन्थनके समय अपनी पीठपर मन्दराचल धारण करनेवाले भगवान्का वर्णन है ॥४५ ॥

एतन्मुहुः कीर्तयतोऽनुशृण्वतो न रिष्यते जातु समुद्यमः क्वचित् । यदुत्तमश्लोकगुणानुवर्णनं समस्तसंसारपरिश्रमापहम् ॥४६

असदविषयमंङ्घ्रि भावगम्यं प्रपन्ना-नमृतममरवर्यानाशयत् सिन्धुमथ्यम् ।

कपटयुवतिवेषो मोहयन्यः सुरारीं-स्तमहमुपसृतानां कामपूरं नतोऽस्मि ॥४७

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पृष्ठ 1527

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जो पुरुष बार - बार इसका कीर्तन और श्रवण करता है, उसका उद्योग कभी और कहीं निष्फल नहीं होता । क्योंकि पवित्रकीर्ति भगवान्‌के गुण और लीलाओंका गान संसारके समस्त क्लेश और परिश्रमको मिटा देनेवाला है ॥४६ ॥ दुष्ट पुरुषोंको भगवान्के

चरणकमलोंकी प्राप्ति कभी हो नहीं सकती । वे तो भक्तिभावसे युक्त पुरुषको ही प्राप्त होते हैं । इसीसे उन्होंने स्त्रीका मायामय रूप धारण करके दैत्योंको मोहित किया और अपने चरणकमलोंके शरणागत देवताओंको समुद्रमन्थनसे निकले हुए अमृतका पान कराया । केवल उन्हींकी बात नहीं - चाहे जो भी उनके चरणोंकी शरण ग्रहण करे, वे उसकी समस्त

कामनाएँ पूर्ण कर देते हैं । मैं उन प्रभुके चरणकमलोंमें नमस्कार करता हूँ ॥४७ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामष्टमस्कन्धे शङ्करमोहनं नाम द्वादशोऽध्यायः ॥१२ ॥

) -१. प्रा ० पा ० – प्रतिगृह्य । २. प्रा ० पा ० – मसि भूतानां त्व ० । ३. प्रा ० पा०-मनन्तमन्यत् । १. प्रा ० पा ० — स्तद्गत ० । - जडीकृतो । २. प्रा ० पा ० - मालोक्य । ३. प्रा ० पा ० — मात्मनि । १. प्रा ० पा०— १. प्रा ० पा ० – आत्मानुरूपां । २. प्रा ० पा ० – प्रत्यक्षमभिभाषत । ३. प्रा ० पा०— ययाञ्जसा वै किमुतापरो यः । ४. प्रा ० पा ० - यन्माम ० । ५. प्रा ० पा ० — योगं । ६. प्रा ० पा०— उपारमद्वै । ७. प्रा ० पा ० — एव । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1528

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अथ त्रयोदशोऽध्यायः आगामी सात मन्वन्तरोंका वर्णन श्रीशुक उवाच

मनुर्विवस्वतः पुत्रः श्राद्धदेव इति श्रुतः ।

सप्तमो वर्तमानो यस्तदपत्यानि मे शृणु ॥ १

इक्ष्वाकुर्न भगश्चैव धृष्टः शर्यातिरेव च ।

नरिष्यन्तोऽथ नाभागः सप्तमो दिष्ट उच्यते ॥२

करूषश्च पृषध्रश्च दशमो वसुमान्स्मृतः ।

मनोर्वैवस्वतस्यैते दश पुत्राः परन्तप ॥३

आदित्या वसवो रुद्रा विश्वेदेवा मरुद्गणाः ।

अश्विनावृभवो राजन्निन्द्रस्तेषां पुरन्दरः ॥४

कश्यपोऽत्रिर्वसिष्ठश्च विश्वामित्रोऽथ गौतमः ।

जमदग्निर्भरद्वाज इति सप्तर्षयः स्मृताः ॥ ५

अत्रापि भगवज्जन्म कश्यपाददितेरभूत् ।

आदित्यानामवरजो विष्णुर्वामनरूपधृक् ॥ ६

श्रीशुकदेवजी कहते हैं- परीक्षित्! विवस्वान्‌के पुत्र यशस्वी श्राद्धदेव ही सातवें ( वैवस्वत ) मनु हैं । यह वर्तमान मन्वन्तर ही उनका कार्यकाल है । उनकी सन्तानका वर्णन मैं करता हूँ ॥१ ॥

वैवस्वत मनुके दस पुत्र हैं - इक्ष्वाकु, नभग, धृष्ट, शर्याति, नरिष्यन्त, नाभाग, दिष्ट, करूष, पृषध्र और वसुमान ॥२-३ ॥ परीक्षित्! इस मन्वन्तरमें आदित्य, वसु, रुद्र, विश्वेदेव, मरुद्गण, अश्विनीकुमार और ऋभु — ये देवताओंके प्रधान गण हैं और पुरन्दर उनका इन्द्र है ॥४ ॥

कश्यप, अत्रि, वसिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और भरद्वाज – ये सप्तर्षि हैं || ५ || इस मन्वन्तरमें भी कश्यपकी पत्नी अदितिके गर्भसे आदित्योंके छोटे भाई वामनके रूपमें भगवान् विष्णुने अवतार ग्रहण किया था ॥ ६ ॥

संक्षेपतो मयोक्तानि सप्त मन्वन्तराणि ते ।

भविष्याण्यथ वक्ष्यामि विष्णोः शक्त्यान्वितानि च ॥७

विवस्वतश्च द्वे जाये विश्वकर्मसुते उभे । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1529

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संज्ञा छाया च राजेन्द्र ये प्रागभिहिते तव ॥८

तृतीयां वडवामेके तासां संज्ञासुतास्त्रयः ।

यमो यमी श्राद्धदेवश्छायायाश्च सुताञ्छृणु ॥९

सावर्णिस्तपती कन्या भार्या संवरणस्य या ।

शनैश्चरस्तृतीयोऽभूदश्विनी वडवात्मजौ ॥ १०

अष्टमेऽन्तर आयाते सावर्णिर्भविता मनुः ।

निर्मोकविरजस्काद्याः सावर्णितनया नृप ॥ ११

तत्र देवाः सुतपसो विरजा अमृतप्रभाः ।

तेषां विरोचनसुतो बलिरिन्द्रो भविष्यति ॥१२

दत्त्वेमां याचमानाय विष्णवे यः पदत्रयम् ।

राद्धमिन्द्रपदं हित्वा ततः सिद्धिमवाप्स्यति ॥ १३

योऽसौ भगवता बद्धः प्रीतेन सुतले पुनः ।

निवेशितोऽधिके स्वर्गादधुनाऽऽस्ते स्वराडिव ॥ १४

गालवो दीप्तिमान् रामो द्रोणपुत्रः कृपस्तथा ।

ऋष्यशृङ्गः पितास्माकं भगवान्बादरायणः ॥१५

इमे सप्तर्षयस्तत्र े भविष्यन्ति स्वयोगतः ।

इदानीमासते राजन् स्वे स्व आश्रममण्डले ॥१६

परीक्षित्! इस प्रकार मैंने संक्षेपसे तुम्हें सात मन्वन्तरोंका वर्णन सुनाया; अब भगवान्की शक्तिसे युक्त अगले ( आनेवाले ) सात मन्वन्तरोंका वर्णन करता हूँ ॥७ ॥

परीक्षित्! यह तो मैं तुम्हें पहले ( छठे स्कन्धमें ) बता चुका हूँ कि विवस्वान् ( भगवान् सूर्य ) -की दो पत्नियाँ थीं - संज्ञा और छाया । ये दोनों ही विश्वकर्माकी पुत्री थीं ॥८ ॥ कुछ

लोग ऐसा कहते हैं कि उनकी एक तीसरी पत्नी बडवा भी थी । ( मेरे विचारसे तो संज्ञाका ही नाम बडवा हो गया था । ) उन सूर्यपत्नियोंमें संज्ञासे तीन सन्तानें हुईं – यम, यमी और श्राद्धदेव । छायाके भी तीन सन्तानें हुईं - सावर्णि, शनैश्चर और तपती नामकी कन्या जो संवरणकी पत्नी हुई । जब संज्ञाने वडवाका रूप धारण कर लिया, तब उससे दोनों अश्विनीकुमार हुए ॥९ -१० ॥ ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1530

श्रीमद्भागवत महापुराण - १, पृष्ठ 1530 का मूल पृष्ठ
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आठवें मन्वन्तरमें सावर्णि मनु होंगे । उनके पुत्र होंगे निर्मोक, विरजस्क आदि ॥११ ॥

परीक्षित्! उस समय सुतपा, विरजा और अमृतप्रभ नामक देवगण होंगे । उन देवताओंके इन्द्र होंगे विरोचनके पुत्र बलि ॥१२ ॥

विष्णुभगवान्‌ने वामन अवतार ग्रहण करके इन्हींसे तीन पग पृथ्वी माँगी थी; परन्तु इन्होंने उनको सारी त्रिलोकी दे दी । राजा बलिको एक बार तो भगवान्ने बाँध दिया था, परन्तु फिर प्रसन्न होकर उन्होंने इनको स्वर्गसे भी श्रेष्ठ सुतल लोकका राज्य दे दिया । वे इस समय वहीं इन्द्रके समान विरजमान हैं । आगे चलकर ये ही इन्द्र होंगे और समस्त ऐश्वर्यांसे परिपूर्ण इन्द्रपदका भी परित्याग करके परम सिद्धि प्राप्त करेंगे ॥१३-१४ ॥ गालव, दीप्तिमान्, परशुराम, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, ऋष्यशृंग और हमारे पिता भगवान् व्यास — ये आठवें मन्वन्तरमें सप्तर्षि होंगे । इस समय ये लोग योगबलसे अपने - अपने आश्रममण्डलमें स्थित हैं ॥१५-१६ ॥

देवगुह्यात्सरस्वत्यां सार्वभौम इति प्रभुः ।

स्थानं पुरन्दराद् हृत्वा बलये दास्यतीश्वरः ॥ १७

नवमो दक्षसावर्णिर्मनुर्वरुणसम्भवः ।

भूतकेतुर्दीप्तकेतुरित्याद्यास्तत्सुता नृप ॥१८

पारा मरीचिगर्भाद्या देवा इन्द्रोऽद्भुतः स्मृतः ।

द्युतिमत्प्रमुखास्तत्र भविष्यन्त्यृषयस्ततः ॥१९

आयुष्मतोऽम्बुधारायामृषभो भगवत्कला ।

भविता येन संराद्धां त्रिलोकीं भोक्ष्यतेऽद्भुतः ॥२०

दशमो ब्रह्मसावर्णिरुपश्लोकसुतो महान् ।

तत्सुता भूरिषेणाद्या हविष्मत्प्रमुखा द्विजाः ॥ २१

हविष्मान्सुकृतिः सत्यो जयो मूर्तिस्तदा द्विजाः ।

सुवासनविरुद्धाद्या देवाः शम्भुः सुरेश्वरः ॥ २२

विष्वक्सेनो विषूच्यां तु शम्भोः सख्यं करिष्यति ।

जातः स्वांशेन भगवान्गृहे विश्वसृजो विभुः ॥२३

मनुर्वै धर्मसावर्णिरेकादशम आत्मवान् ।

अनागतास्तत्सुताश्च सत्यधर्मादयो दश ॥२४

विहङ्गमाः कामगमा निर्वाणरुचयः सुराः ।

इन्द्रश्च वैधृतस्तेषामृषयश्चारुणादयः ॥२५

आर्यकस्य सुतस्तत्र धर्मसेतुरिति स्मृतः ।

वैधृतायां हरेरंशस्त्रिलोकीं धारयिष्यति ॥२६

भविता रुद्रसावर्णी राजन्द्वादशमो मनुः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******