श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 1531–1540

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1531–1540

पृष्ठ 1531

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देववानुपदेवश्च देवश्रेष्ठादयः सुताः ॥२७

ऋतधामा च तत्रेन्द्रो देवाश्च हरितादयः ।

ऋषयश्च तपोमूर्तिस्तपस्व्याग्नीध्रकादयः ॥२८

स्वधामाख्यो हरेरंशः साधयिष्यति तन्मनोः ।

अन्तरं सत्यसहसः सूनृतायाः सुतो विभुः ॥२९

देवगुह्यकी पत्नी सरस्वतीके गर्भसे सार्वभौम नामक भगवान्‌का अवतार होगा । ये ही प्रभु पुरन्दर इन्द्रसे स्वर्गका राज्य छीनकर राजा बलिको दे देंगे ॥१७ ॥ परीक्षित्! वरुणके पुत्र

दक्षसावर्णि नवें मनु होंगे । भूतकेतु, दीप्तकेतु आदि उनके पुत्र होंगे || १८ || पार, मरीचिगर्भ आदि देवताओंके गण होंगे और अद्भुत नामके इन्द्र होंगे । उस मन्वन्तरमें द्युतिमान् आदि सप्तर्षि होंगे ॥१९ ॥ आयुष्मान्‌की पत्नी अम्बुधाराके गर्भसे ऋषभके रूपमें भगवान्का

कलावतार होगा । अद्भुत नामक इन्द्र उन्हींकी दी हुई त्रिलोकीका उपभोग करेंगे ॥२० ॥

दसवें मनु होंगे उपश्लोकके पुत्र ब्रह्मसावर्णि । उनमें समस्त सद्गुण निवास करेंगे । भूरिषेण आदि उनके पुत्र होंगे और हविष्मान्, सुकृति, सत्य, जय, मूर्ति आदि सप्तर्षि । सुवासन, विरुद्ध आदि देवताओंके गण होंगे और इन्द्र होंगे शम्भु ॥२१-२२ ॥ विश्वसृज्की पत्नी विषूचिके गर्भसे भगवान् विष्वक्सेनके रूपमें अंशावतार ग्रहण करके शम्भु नामक इन्द्रसे मित्रता करेंगे ॥ २३ ॥

ग्यारहवें मनु होंगे अत्यन्त संयमी धर्मसावर्णि । उनके सत्य, धर्म आदि दस पुत्र होंगे ॥ २४ ॥ विहंगम, कामगम, निर्वाणरुचि आदि देवताओंके गण होंगे । अरुणादि सप्तर्षि

होंगे और वैधृत नामके इन्द्र होगें ॥ २५ ॥ आर्यककी पत्नी वैधृताके गर्भसे धर्मसेतुके रूपमें

भगवान्का अंशावतार होगा और उसी रूपमें वे त्रिलोकीकी रक्षा करेंगे ॥२६ ॥

परीक्षित्! बारहवें मनु होंगे रुद्रसावर्णि । उनके देववान्, उपदेव और देवश्रेष्ठ आदि पुत्र होंगे ॥२७ ॥ उस मन्वन्तरमें ऋतुधामा नामक इन्द्र होंगे और हरित आदि देवगण । तपोमूर्ति,

तपस्वी आग्नीध्रक आदि सप्तर्षि होंगे ॥ २८ ॥

सत्यसहाकी पत्नी सूनृताके गर्भसे स्वधामके रूपमें भगवान्‌का अंशावतार होगा और उसी रूपमें भगवान् उस मन्वन्तरका पालन करेंगे ॥२९ ॥

मनुस्त्रयोदशो भाव्यो देवसावर्णिरात्मवान् ।

चित्रसेनविचित्राद्या देवसावर्णिदेहजाः ॥ ३०

देवाः सुकर्मसुत्रामसंज्ञा इन्द्रो दिवस्पतिः ।

निर्मोकतत्त्वदर्शाद्या भविष्यन्त्यृषयस्तदा ॥३१

देवहोत्रस्य तनय उपहर्ता दिवस्पतेः ।

योगेश्वरो हरेरंशो बृहत्यां सम्भविष्यति ॥३२

मनुर्वा इन्द्रसावर्णिश्चतुर्दशम एष्यति । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1532

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उरुगम्भीरबुद्धयाद्या इन्द्रसावर्णिवीर्यजाः ॥ ३३

पवित्राश्चाक्षुषा देवाः शुचिरिन्द्रो भविष्यति ।

अग्निर्बाहुः शुचिः शुद्धो मागधाद्यास्तपस्विनः ॥३४

सत्रायणस्य तनयो बृहद्भानुस्तदा हरिः ।

वितानायां महाराज क्रियातन्तून्वितायिता ॥ ३५

राजंश्चतुर्दशैतानि त्रिकालानुगतानि ते ।

प्रोक्तान्येभिर्मितः कल्पो युगसाहस्रपर्ययः ॥३६

तेरहवें मनु होंगे परम जितेन्द्रिय देवसावर्णि । चित्रसेन, विचित्र आदि उनके पुत्र होंगे ॥३० ॥ सुकर्म और सुत्राम आदि देवगण होंगे तथा इन्द्रका नाम होगा दिवस्पति । उस

समय निर्मोक और तत्त्वदर्श आदि सप्तर्षि होंगे ॥३१ ॥

देवहोत्रकी पत्नी बृहतीके गर्भसे योगेश्वरके रूपमें भगवान्‌का अंशावतार होगा और उसी रूपमें भगवान् दिवस्पतिको इन्द्रपद देंगे ॥३२ ॥

महाराज! चौदहवें मनु होंगे इन्द्रसावर्णि । उरु, गम्भीर, बुद्धि आदि उनके पुत्र होंगे ॥३३ ॥ उस समय पवित्र, चाक्षुष आदि देवगण होंगे और इन्द्रका नाम होगा शुचि ।

अग्नि, बाहु, शुचि, शुद्ध और मागध आदि सप्तर्षि होंगे ॥३४ ॥ उस समय सत्रायणकी पत्नी

वितानाके गर्भसे बृहद्भानुके रूपमें भगवान् अवतार ग्रहण करेंगे तथा कर्मकाण्डका विस्तार करेंगे ॥३५ ॥

परीक्षित्! ये चौदह मन्वन्तर भूत, वर्तमान और भविष्य - तीनों ही कालमें चलते रहते हैं । इन्हींके द्वारा एक सहस्र चतुर्युगीवाले कल्पके समयकी गणना की जाती है ॥३६ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामष्टमस्कन्धे मन्वन्तरानुवर्णनं नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥१३ ॥

१. प्रा ० पा ० — निर्मोह ० । २. प्रा ० पा ० – नृपाः । ३. प्रा ० पा ० — स्तस्मिन् । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1533

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अथ चतुर्दशोऽध्यायः मनु आदिके पृथक् - पृथक् कर्मोंका निरूपण राजोवाच

मन्वन्तरेषु भगवन्यथा मन्वादयस्त्विमे ।

यस्मिन्कर्मणि ये येन नियुक्तास्तद्वदस्व मे ॥१

ऋषिरुवाच

मनवो मनुपुत्राश्च मुनयश्च महीपते ।

इन्द्राः सुरगणाश्चैव सर्वे पुरुषशासनाः ॥२

राजा परीक्षित्ने पूछा— भगवन्! आपके द्वारा वर्णित ये मनु, मनुपुत्र, सप्तर्षि आदि अपने - अपने मन्वन्तरमें किसके द्वारा नियुक्त होकर कौन - कौन - सा काम किस प्रकार करते हैं - यह आप कृपा करके मुझे बतलाइये ॥ १ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं- परीक्षित्! मनु, मनुपुत्र, सप्तर्षि और देवता – सबको नियुक्त करनेवाले स्वयं भगवान् ही हैं ॥२ ॥

यज्ञादयो याः कथिताः पौरुष्यस्तनवो नृप ' ।

मन्वादयो जगद्यात्रां नयन्त्याभिः प्रचोदिताः ॥ ३

चतुर्युगान्ते कालेन ग्रस्ताञ्छ्रुतिगणान्यथा ।

तपसा ऋषयोऽपश्यन्यतो धर्मः सनातनः ॥४

ततो धर्मं चतुष्पादं मनवो हरिणोदिताः ।

युक्ताः सञ्चारयन्त्यद्धा स्वे स्वे काले महीं नृप ॥५

पालयन्ति प्रजापाला यावदन्तं विभागशः ।

यज्ञभागभुजो देवा ये च तत्रान्विताश्च तैः ॥६

इन्द्रो भगवता दत्तां त्रैलोक्यश्रियमूर्जिताम् ।

भुञ्जानः पाति लोकांस्त्रीन् कामं लोके प्रवर्षति ॥७

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पृष्ठ 1534

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ज्ञानं चानुयुगं ब्रूते हरिः सिद्धस्वरूपधृक्.३ ।

ऋषिरूपधरः कर्म योगं योगेशरूपधृक् ॥८

सर्गं ४ प्रजेशरूपेण दस्यून्हन्यात् “ स्वराड्वपुः ।

कालरूपेण सर्वेषामभावाय पृथग्गुणः ॥९

स्तूयमानो जनैरेभिर्मायया नामरूपया ।

विमोहितात्मभिर्नानादर्शनैर्न च दृश्यते ॥१०

एतत् कल्पविकल्पस्य प्रमाणं परिकीर्तितम् ।

यत्र मन्वन्तराण्याहुश्चतुर्दश पुराविदः ॥ ११

राजन्! भगवान्के जिन यज्ञपुरुष आदि अवतारशरीरोंका वर्णन मैंने किया है, उन्हींकी प्रेरणासे मनु आदि विश्व - व्यवस्थाका संचालन करते हैं ॥३ ॥ चतुर्युगीके अन्तमें समयके

उलट - फेरसे जब श्रुतियाँ नष्टप्राय हो जाती हैं, तब सप्तर्षिगण अपनी तपस्यासे पुनः उनका साक्षात्कार करते हैं । उन श्रुतियोंसे ही सनातनधर्मकी रक्षा होती है ॥४ ॥ राजन्! भगवान्की

प्रेरणासे अपने - अपने मन्वन्तरमें बड़ी सावधानीसे सब - के - सब मनु पृथ्वीपर चारों चरणसे परिपूर्ण धर्मका अनुष्ठान करवाते हैं || ५ || मनुपुत्र मन्वन्तरभर काल और देश दोनोंका विभाग करके प्रजापालन तथा धर्मपालनका कार्य करते हैं । पंच - महायज्ञ आदि कर्मोंमें जिन ऋषि, पितर, भूत और मनुष्य आदिका सम्बन्ध है— उनके साथ देवता उस मन्वन्तरमें यज्ञका भाग स्वीकार करते हैं ॥६ ॥ इन्द्र भगवान्की दी हुई त्रिलोकीकी अतुल सम्पत्तिका उपभोग और

प्रजाका पालन करते हैं । संसारमें यथेष्ट वर्षा करनेका अधिकार भी उन्हींको है ॥७ ॥ भगवान्

युग - युगमें सनक आदि सिद्धोंका रूप धारण करके ज्ञानका, याज्ञवल्क्य आदि ऋषियोंका रूप धारण करके कर्मका और दत्तात्रेय आदि योगेश्वरोंके रूपमें योगका उपदेश करते हैं ॥८ ॥ वे मरीचि आदि प्रजापतियोंके रूपमें सृष्टिका विस्तार करते हैं, सम्राट्के रूपमें

लुटेरोंका वध करते हैं और शीत, उष्ण आदि विभिन्न गुणोंको धारण करके कालरूपसे सबको संहारकी ओर ले जाते हैं ॥९ ॥ नाम और रूपकी मायासे प्राणियोंकी बुद्धि विमूढ़ हो रही है ।

इसलिये वे अनेक प्रकारके दर्शनशास्त्रोंके द्वारा महिमा तो भगवान्‌की ही गाते हैं, परन्तु उनके वास्तविक स्वरूपको नहीं जान पाते || १० || परीक्षित्! इस प्रकार मैंने तुम्हें महाकल्प और अवान्तर कल्पका परिमाण सुना दिया । पुराणतत्त्वके विद्वानोंने प्रत्येक अवान्तर कल्पमें चौदह मन्वन्तर बतलाये हैं ॥११ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामष्टमस्कन्धे चतुर्दशोऽध्यायः ॥१४ ॥

१. प्रा ० पा ० — नृपाः । २. प्रा ० पा ० – यत्रा ० । ३. प्रा ० पा ० – सर्वस्व ० । ४. प्रा ० पा०— सर्गे । ५. प्रा ० पा ० — हन्ता स्व ० । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1535

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पृष्ठ 1536

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अथ पञ्चदशोऽध्यायः राजा बलिकी स्वर्गपर विजय राजोवाच

बलेः पदत्रयं भूमेः कस्माद्धरिरयाचत ।

भूत्वेश्वरः कृपणवल्लब्धार्थोऽपि बबन्ध तम् ॥१

एतद् वेदितुमिच्छामो महत् कौतूहलं हि नः ।

यज्ञेश्वरस्य पूर्णस्य बन्धनं चाप्यनागसः ॥२

श्रीशुक उवाच पराजितश्रीरसुभिश्च हापितो हीन्द्रेण राजन्भृगुभिः स जीवितः । सर्वात्मना तानभजद् भृगून्बलिः शिष्यो महात्मार्थनिवेदनेन ॥३ तं ब्राह्मणा भृगवः प्रीयमाणा अयाजयन्विश्वजिता त्रिणाकम् । जिगीषमाणं विधिनाभिषिच्य महाभिषेकेण महानुभावाः ॥४ ततो रथः काञ्चनपट्टनद्धो हयाश्च हर्यश्वतुरङ्गवर्णाः । ध्वजश्च सिंहेन विराजमानो हुताशनादास हविर्भिरिष्टात् ॥५ धनुश्च दिव्यं पुरटोपनद्धं

तूणावरिक्तौ कवचं च दिव्यम् ।

पितामहस्तस्य ददौ च माला-मम्लानपुष्पां जलजं च शुक्रः ॥६

एवं स विप्रार्जितयोधनार्थ-स्तैः कल्पितस्वस्त्ययनोऽथ विप्रान् । प्रदक्षिणीकृत्य कृतप्रणामः प्रह्रादमामन्त्र्य नमश्चकार ॥७ ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1537

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राजा परीक्षित्ने पूछा - भगवन्! श्रीहरि स्वयं ही सबके स्वामी हैं । फिर उन्होंने दीन-हीनकी भाँति राजा बलिसे तीन पग पृथ्वी क्यों माँगी? तथा जो कुछ वे चाहते थे, वह मिल जानेपर भी उन्होंने बलिको बाँधा क्यों? || १ || मेरे हृदयमें इस बातका बड़ा कौतूहल है कि स्वयं परिपूर्ण यज्ञेश्वरभगवान् के द्वारा याचना और निरपराधका बन्धन – ये दोनों ही कैसे सम्भव हुए? हमलोग यह जानना चाहते हैं ॥ २ ॥

श्रीशुकदेवजीने कहा- परीक्षित्! जब इन्द्रने बलिको पराजित करके उनकी सम्पत्ति छीन ली और उनके प्राण भी ले लिये, तब भृगुनन्दन शुक्राचार्यने उन्हें अपनी संजीवनी विद्यासे जीवित कर दिया । इसपर शुक्राचार्यजीके शिष्य महात्मा बलिने अपना सर्वस्व उनके चरणोंपर चढ़ा दिया और वे तन- मनसे गुरुजीके साथ ही समस्त भृगुवंशी ब्राह्मणोंकी सेवा करने लगे ॥३ ॥ इससे प्रभावशाली भृगुवंशी ब्राह्मण उनपर बहुत प्रसन्न हुए । उन्होंने स्वर्गपर

विजय प्राप्त करनेकी इच्छावाले बलिका महाभिषेककी विधिसे अभिषेक करके उनसे विश्वजित् नामका यज्ञ कराया ॥४ ॥ यज्ञकी विधिसे हविष्योंके द्वारा जब अग्निदेवताकी पूजा

की गयी, तब यज्ञकुण्डमेंसे सोनेकी चद्दरसे मढ़ा हुआ एक बड़ा सुन्दर रथ निकला । फिर इन्द्रके घोड़ों - जैसे हरे रंगके घोड़े और सिंहके चिह्नसे युक्त रथपर लगानेकी ध्वजा निकली ॥५ ॥ साथ ही सोनेके पत्रसे मढ़ा हुआ दिव्य धनुष, कभी खाली न होनेवाले दो

अक्षय तरकश और दिव्य कवच भी प्रकट हुए । दादा प्रह्लादजीने उन्हें एक ऐसी माला दी, जिसके फूल कभी कुम्हलाते न थे तथा शुक्राचार्यने एक शंख दिया ॥६ ॥ इस प्रकार

ब्राह्मणोंकी कृपासे युद्धकी सामग्री प्राप्त करके उनके द्वारा स्वस्तिवाचन हो जानेपर राजा बलिने उन ब्राह्मणोंकी प्रदक्षिणा की और नमस्कार किया । इसके बाद उन्होंने प्रह्लादजीसे सम्भाषण करके उनके चरणोंमें नमस्कार किया ॥७ ॥

अथारुह्य रथं दिव्यं भृगुदत्तं महारथः ।

सुस्रग्धरोऽथ संनह्य धन्वी खड्गी धृतेषुधिः ॥ ८

हेमाङ्गदलसद्बाहुः स्फुरन्मकरकुण्डलः ।

रराज रथमारूढो धिष्ण्यस्थ इव हव्यवाट् ॥९

तुल्यैश्वर्यबलश्रीभिः स्वयूथैर्दैत्ययूथपैः ।

पिबद्भिरिव खं दृग्भिर्दहद्भि परिधीनिव ॥१०

वृतो विकर्षन् महतीमासुरीं ध्वजिनीं विभुः ।

ययाविन्द्रपुरीं ” स्वृद्धां कम्पयन्निव रोदसी ॥११

रम्यामुपवनोद्यानैः २ श्रीमद्भिर्नन्दनादिभिः ।

कूजद्विहङ्गमिथुनैर्गायन्मत्तमधुव्रतैः ॥ १२

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पृष्ठ 1538

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प्रवालफलपुष्पोरुभारशाखामरद्रुमैः ।

हंससारसचक्राह्वकारण्डवकुलाकुलाः ।

नलिन्यो यत्र क्रीडन्ति प्रमदाः सुरसेविताः ॥ १३

आकाशगङ्गया देव्या वृतां परिखभूतया ।

प्राकारेणाग्निवर्णेन साट्टालेनोन्नतेन च ॥१४

रुक्मपट्टकपाटैश्च द्वारैः स्फटिकगोपुरैः ।

जुष्टां विभक्तप्रपथां विश्वकर्मविनिर्मिताम् ॥१५

फिर वे भृगुवंशी ब्राह्मणोंके दिये हुए दिव्य रथपर सवार हुए । जब महारथी राजा बलिने कवच धारण कर धनुष, तलवार, तरकश आदि शस्त्र ग्रहण कर लिये और दादाकी दी हुई सुन्दर माला धारण कर ली, तब उनकी बड़ी शोभा हुई || ८ || उनकी भुजाओंमें सोनेके बाजूबंद और कानोंमें मकराकृति कुण्डल जगमगा रहे थे । उनके कारण रथपर बैठे हुए वे ऐसे सुशोभित हो रहे थे, मानो अग्निकुण्डमें अग्नि प्रज्वलित हो रही हो ॥९ ॥ उनके साथ उन्हींके

समान ऐश्वर्य, बल और विभूतिवाले दैत्यसेनापति अपनी - अपनी सेना लेकर हो लिये । ऐसा जान पड़ता था मानो वे आकाशको पी जायँगे और अपने क्रोधभरे प्रज्वलित नेत्रोंसे समस्त दिशाओंको, क्षितिजको भस्म कर डालेंगे || १० || राजा बलिने इस बहुत बड़ी आसुरी सेनाको लेकर उसका युद्धके ढंगसे संचालन किया तथा आकाश और अन्तरिक्षको कँपाते हुए सकल ऐश्वर्योंसे परिपूर्ण इन्द्रपुरी अमरावतीपर चढ़ाई की ॥११ ॥

देवताओंकी राजधानी अमरावतीमें बड़े सुन्दर - सुन्दर नन्दन वन आदि उद्यान और उपवन हैं । उन उद्यानों और उपवनोंमें पक्षियोंके जोड़े चहकते रहते हैं । मधुलोभी भौंरे मतवाले होकर गुनगुनाते रहते हैं ॥१२ ॥ लाल - लाल नये - नये पत्तों, फलों और पुष्पोंसे

कल्पवृक्षोंकी शाखाएँ लदी रहती हैं । वहाँके सरोवरोंमें हंस, सारस, चकवे और बतखोंकी भीड़ लगी रहती है । उन्हींमें देवताओंके द्वारा सम्मानित देवांगनाएँ जलक्रीडा करती रहती हैं ॥१३ ॥ ज्योतिर्मय आकाशगंगाने खाईकी भाँति अमरावतीको चारों ओरसे घेर रखा है ।

उसके चारों ओर बहुत ऊँचा सोनेका परकोटा बना हुआ है, जिसमें स्थान - स्थानपर बड़ी - बड़ी अटारियाँ बनी हुई हैं || १४ || सोनेके किवाड़ द्वार - द्वारपर लगे हुए हैं और स्फटिकमणिके गोपुर ( नगरके बाहरी फाटक ) हैं । उसमें अलग - अलग बड़े - बड़े राजमार्ग हैं । स्वयं विश्वकर्माने ही उस पुरीका निर्माण किया है ॥१५ ॥

सभाचत्वररथ्याढ्यां विमानैर्न्यर्बुदैर्युताम् ।

शृङ्गाटकैर्मणिमयैर्वज्रविद्रुमवेदिभिः ॥१६

यत्र नित्यवयोरूपाः श्यामा विरजवाससः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1539

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भ्राजन्ते रूपवन्नार्यो ह्यर्चिर्भिरिव वह्नयः ॥१७

सुरस्त्रीकेशविभ्रष्टनवसौगन्धिकस्रजाम् ।

यत्रामोदमुपादाय मार्ग आवाति मारुतः ॥ १८

हेमजालाक्षनिर्गच्छद्धूमेनागुरुगन्धिना ।

पाण्डुरेण प्रतिच्छन्नमार्गे यान्ति सुरप्रियाः ॥ १ ९

मुक्तावितानैर्मणिहेमकेतुभि-र्नानापताकावलभीभिरावृताम् । शिखण्डिपारावतभृङ्गनादितां वैमानिकस्त्रीकलगीतमङ्गलाम् ॥२० मृदङ्गशङ्खानकदुन्दुभिस्वनैः

सतालवीणामुरजर्ष्टिवेणुभिः ।

नृत्यैः सवाद्यैरुपदेवगीतकै-र्मनोरमां स्वप्रभया जितप्रभाम् ॥२१

यां न व्रजन्त्यधर्मिष्ठाः खला भूतद्रुहः शठाः ।

मानिनः कामिनो लुब्धा एभिर्हीना व्रजन्ति यत् ॥२२

तां देवधानीं स वरूथिनीपति-र्बहिः समन्ताद् रुरुधे पृतन्यया । आचार्यदत्तं जलजं महास्वनं दध्मौ प्रयुञ्जन्भयमिन्द्रयोषिताम् ॥२३

मघवांस्तमभिप्रेत्य बलेः परममुद्यमम् ।

सर्वदेवगणोपेतो गुरुमेतदुवाच ह ॥२४

सभाके स्थान, खेलके चबूतरे और रथ चलनेके बड़े - बड़े मार्गों से वह शोभायमान है । दस करोड़ विमान उसमें सर्वदा विद्यमान रहते हैं और मणियोंके बड़े - बड़े चौराहे एवं हीरे और मूँगेकी वेदियाँ बनी हुई हैं ॥ १६ ॥ वहाँकी स्त्रियाँ सर्वदा सोलह वर्षकी - सी रहती हैं, उनका

यौवन और सौन्दर्य स्थिर रहता है । वे निर्मल वस्त्र पहनकर अपने रूपकी छटासे इस प्रकार देदीप्यमान होती हैं, जैसे अपनी ज्वालाओंसे अग्नि ॥१७ ॥

देवांगनाओंके जूड़ेसे गिरे हुए नवीन सौगन्धित पुष्पोंकी सुगन्ध लेकर वहाँके मार्गोंमें ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1540

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मन्द - मन्द हवा चलती रहती है ॥१८ ॥ सुनहली खिड़कियोंमेंसे अगरकी सुगन्धसे युक्त सफेद

धूआँ निकल - निकलकर वहाँके मार्गोंको ढक दिया करता है । उसी मार्गसे देवांगनाएँ जाती-आती हैं ॥१९ ॥ स्थान - स्थानपर मोतियोंकी झालरोंसे सजाये हुए चंदोवे तने रहते हैं । सोनेकी

मणिमय पताकाएँ फहराती रहती हैं । छज्जोंपर अनेकों झंडियाँ लहराती रहती हैं । मोर, कबूतर और भौरे कलगान करते रहते हैं । देवांगनाओंके मधुर संगीतसे वहाँ सदा ही मंगल छाया रहता है ॥२० ॥ मृदंग, शंख, नगारे, ढोल, वीणा, वंशी, मँजीरे और ऋष्टियाँ बजती

रहती हैं । गन्धर्व बाजोंके साथ गाया करते हैं और अप्सराएँ नाचा करती हैं । इनसे अमरावती इतनी मनोहर जान पड़ती है, मानो उसने अपनी छटासे छटाकी अधिष्ठात्री देवीको भी जीत लिया है ॥२१ ॥ उस पुरीमें अधर्मी, दुष्ट, जीवद्रोही, ठग, मानी, कामी और लोभी नहीं जा

सकते । जो इन दोषोंसे रहित हैं, वे ही वहाँ जाते हैं ॥२२ ॥ असुरोंकी सेनाके स्वामी राजा

बलिने अपनी बहुत बड़ी सेनासे बाहरकी ओर सब ओरसे अमरावतीको घेर लिया और इन्द्रपत्नियोंके हृदयमें भयका संचार करते हुए उन्होंने शुक्राचार्यजीके दिये हुए महान् शंखको बजाया । उस शंखकी ध्वनि सर्वत्र फैल गयी ॥ २३ ॥ इन्द्रने देखा कि बलिने युद्धकी बहुत बड़ी

तैयारी की है । अतः सब देवताओंके साथ वे अपने गुरु बृहस्पतिजीके पास गये और उनसे बोले— ॥२४ ॥

भगवन्नुद्यमो भूयान्बलेर्नः पूर्ववैरिणः ।

अविषह्यमिमं मन्ये केनासीत्तेजसोर्जितः ॥२५

नैनं कश्चित् कुतो वापि प्रतिव्योढुमधीश्वरः ।

पिबन्निव मुखेनेदं लिहन्निव दिशो दश ।

दहन्निव दिशो दृग्भिः संवर्ताग्निरिवोत्थितः ॥२६

ब्रूहि कारणमेतस्य दुर्धर्षत्वस्य मद्रिपोः ।

ओजः सहो बलं तेजो यत एतत्समुद्यमः ॥ २७

गुरुरुवाच जानामि मघवञ्छत्रोरुन्नतेरस्य कारणम् शिष्यायोपभृतं तेजो भृगुभिर्ब्रह्मवादिभिः ॥ २८

भवद्विधो भवान्वापि वर्जयित्वेश्वरं हरिम् ।

नास्य शक्तः पुरः स्थातुं कृतान्तस्य यथा जनाः ॥२९

तस्मान्निलयमुत्सृज्य यूयं सर्वे त्रिविष्टपम् । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******