श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 1551–1560

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1551–1560

पृष्ठ 1551

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पूर्ववत् प्रतिदिन हवन और ब्राह्मण भोजन भी कराना चाहिये ॥४६ ॥

इस प्रकार पयोव्रती रहकर बारह दिनतक प्रतिदिन भगवान्‌की आराधना, होम और पूजा करे तथा ब्राह्मण भोजन कराता रहे ॥४७ ॥

फाल्गुन शुक्ल प्रतिपदासे लेकर त्रयोदशीपर्यन्त ब्रह्मचर्यसे रहे, पृथ्वीपर शयन करे और तीनों समय स्नान करे ॥४८ ॥

झूठ न बोले । पापियोंसे बात न करे । पापकी बात न करे । छोटे - बड़े सब प्रकारके भोगोंका त्याग कर दे । किसी भी प्राणीको किसी प्रकारसे कष्ट न पहुँचावे । भगवान्की आराधनामें लगा ही रहे ॥४९ ॥

त्रयोदशीके दिन विधि जाननेवाले ब्राह्मणोंके द्वारा शास्त्रोक्त विधिसे भगवान् विष्णुको पंचामृतस्नान करावे ॥५० ॥

उस दिन धनका संकोच छोड़कर भगवान्की बहुत बड़ी पूजा करनी चाहिये और दूधमें चरु ( खीर ) पकाकर विष्णुभगवान्‌को अर्पित करना चाहिये ॥५१ ॥

अत्यन्त एकाग्रचित्तसे उसी पकाये हुए चरुके द्वारा भगवान्‌का यजन करना चाहिये और उनको प्रसन्न करनेवाला गुणयुक्त तथा स्वादिष्ट नैवेद्य अर्पण करना चाहिये ॥५२ ॥

इसके बाद ज्ञानसम्पन्न आचार्य और ऋत्विजोंको वस्त्र, आभूषण और गौ आदि देकर

सन्तुष्ट करना चाहिये । प्रिये! इसे भी भगवान्‌की ही आराधना समझो ॥५३ ॥

भोजयेत् तान् गुणवता सदन्नेन शुचिस्मिते ।

अन्यांश्च ब्राह्मणाञ्छक्त्या ये च तत्र समागताः ॥५४

दक्षिण गुरवे दद्यादृत्विग्भ्यश्च यथार्हतः ।

अन्नाद्येनाश्वपाकांश्च प्रीणयेत्समुपागतान् ॥५५

भुक्तवत्सु च सर्वेषु दीनान्धकृपणेषु च ।

विष्णोस्तत्प्रीणनं विद्वान्भुञ्जीत सह बन्धुभिः ॥५६

नृत्यवादित्रगीतैश्च स्तुतिभिः स्वस्तिवाचकैः ।

कारयेत्तत्कथाभिश्च पूजां भगवतोऽन्वहम् ॥५७

एतत्पयोव्रतं नाम पुरुषाराधनं परम् ।

पितामहेनाभिहितं मया ते समुदाहृतम् ॥५८

त्वं चानेन महाभागे सम्यक्चीर्णेन केशवम् । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1552

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आत्मना शुद्धभावेन नियतात्मा ' भजाव्ययम् ॥५९

अयं वै सर्वयज्ञाख्यः सर्वव्रतमिति स्मृतम् ।

तपःसारमिदं भद्रे दानं चेश्वरतर्पणम् ॥६०

त एव नियमाः साक्षात्त एव च यमोत्तमाः ।

तपो दानं व्रतं यज्ञो येन तुष्यत्यधोक्षजः ॥६१

तस्मादेतद्व्रतं भद्रे प्रयता श्रद्धया चर ।

भगवान्परितुष्टस्ते वरानाशु विधास्यति ॥ ६२

प्रिये! आचार्य और ऋत्विजोंको शुद्ध, सात्त्विक और गुणयुक्त भोजन कराना ही चाहिये; दूसरे ब्राह्मण और आये हुए अतिथियोंको भी अपनी शक्तिके अनुसार भोजन कराना चाहिये ॥५४ ॥

गुरु और ऋत्विजोंको यथायोग्य दक्षिणा देनी चाहिये । जो चाण्डाल आदि अपने - आप वहाँ आ गये हों, उन सभीको तथा दीन, अंधे और असमर्थ पुरुषोंको भी अन्न आदि देकर सन्तुष्ट करना चाहिये । जब सब लोग खा चुकें, तब उन सबके सत्कारको भगवान्की प्रसन्नताका साधन समझते हुए अपने भाई - बन्धुओंके साथ स्वयं भोजन करे ॥५५-५६ ॥ प्रतिपदासे लेकर त्रयोदशीतक प्रतिदिन नाच - गान, बाजे - गाजे, स्तुति, स्वस्तिवाचन और भगवत्कथाओंसे भगवान्की पूजा करे- करावे ॥५७ ॥

प्रिये! यह भगवान्की श्रेष्ठ आराधना है । इसका नाम है ' पयोव्रत ' । ब्रह्माजीने मुझे जैसा बताया था, वैसा ही मैंने तुम्हें बता दिया ॥ ५८ ॥

देवि! तुम भाग्यवती हो । अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके शुद्ध भाव एवं श्रद्धापूर्ण चित्तसे इस व्रतका भलीभाँति अनुष्ठान करो और इसके द्वारा अविनाशी भगवान्की आराधना करो ॥५९ ॥

कल्याणी! यह व्रत भगवान्‌को सन्तुष्ट करनेवाला है, इसलिये इसका नाम है ‘ सर्वयज्ञ ’ और ‘ सर्वव्रत ’ । यह समस्त तपस्याओंका सार और मुख्य दान है ॥ ६० ॥

जिनसे भगवान् प्रसन्न हों - वे ही सच्चे नियम हैं, वे ही उत्तम यम हैं, वे ही वास्तवमें तपस्या, दान, व्रत और यज्ञ हैं ॥६१ ॥

इसलिये देवि! संयम और श्रद्धासे तुम इस व्रतका अनुष्ठान करो । भगवान् शीघ्र ही तुमपर प्रसन्न होंगे और तुम्हारी अभिलाषा पूर्ण करेंगे ॥६२ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामष्टमस्कन्धेऽदितिपयोव्रतकथनं नाम षोडशोऽध्यायः ॥१६ ॥

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पृष्ठ 1553

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१. प्रा ० पा ० — भक्तिः परा चेति मति ० । १. प्रा ० पा ० – देवाय । २. प्रा ० पा ० – देवदेवाय ते । ३. प्रा ० पा ० — यत्पा ० । १. प्रा ० पा ० — मुक्तान् । २. प्रा ० पा ० - कृपणादिषु । ३. प्रा ० पा ० – ' त्सत्कथ् प्रा ० पा०— मम । ५. प्रा ० पा ० - भजनीयं । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1554

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अथ सप्तदशोऽध्यायः भगवान्का प्रकट होकर अदितिको वर देना श्रीशुक उवाच

इत्युक्ता सादिती राजन्स्वभर्त्रा कश्यपेन वै ।

अन्वतिष्ठद् व्रतमिदं द्वादशाहमतन्द्रिता ॥१

चिन्तयन्त्येकया बुद्धया महापुरुषमीश्वरम् ।

प्रगृह्येन्द्रियदुष्टाश्वान्मनसा बुद्धिसारथिः ॥ २

मनश्चैकाग्रया बुद्धया भगवत्यखिलात्मनि ।

वासुदेवे समाधाय चचार ह पयोव्रतम् ॥३

तस्याः प्रादुरभूत्तात भगवानादिपूरुषः ।

पीतवासाश्चतुर्बाहुः शङ्खचक्रगदाधरः ॥४

तं नेत्रगोचरं वीक्ष्य सहसोत्थाय सादरम् ।

ननाम भुवि कायेन दण्डवत् प्रीतिविह्वला ॥५

सोत्थाय बद्धाञ्जलिरीडितुं स्थिता

नोत्सेह आनन्दजलाकुलेक्षणा ।

बभूव तूष्णीं पुलकाकुलाकृति-स्तद्दर्शनात्युत्सवगात्रवेपथुः ॥ ६

प्रीत्या शनैर्गद्गदया गिरा हरिं तुष्टाव सा देव्यदितिः कुरूद्वह । उद्वीक्षती सा पिबतीव चक्षुषा रमापतिं यज्ञपतिं जगत्पतिम् ॥७ अदितिरुवाच यज्ञेश यज्ञपुरुषाच्युत तीर्थपाद तीर्थश्रवः श्रवणमङ्गलनामधेय । आपन्नलोकवृजिनोपशमोदयाद्य शं नः कृधीश भगवन्नसि दीननाथः ॥८ ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1555

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श्रीशुकदेवजी कहते हैं— परीक्षित्! अपने पतिदेव महर्षि कश्यपजीका उपदेश प्राप्त करके अदितिने बड़ी सावधानीसे बारह दिनतक इस व्रतका अनुष्ठान किया || १ || बुद्धिको सारथि बनाकर मनकी लगामसे उसने इन्द्रियरूप दुष्ट घोड़ोंको अपने वशमें कर लिया और एकनिष्ठ बुद्धिसे वह पुरुषोत्तम भगवान्‌का चिन्तन करती रही || २ || उसने एकाग्र बुद्धिसे अपने मनको सर्वात्मा भगवान् वासुदेवमें पूर्णरूपसे लगाकर पयोव्रतका अनुष्ठान किया ॥३ ॥ तब पुरुषोत्तमभगवान् उसके सामने प्रकट हुए । परीक्षित्! वे पीताम्बर धारण

किये हुए थे, चार भुजाएँ थीं और शंख, चक्र, गदा लिये हुए थे ॥४ ॥ अपने नेत्रोंके सामने

भगवान्को सहसा प्रकट हुए देख अदिति सादर उठ खड़ी हुई और फिर प्रेमसे विह्वल होकर उसने पृथ्वीपर लोटकर उन्हें दण्डवत् प्रणाम किया ॥५ ॥ फिर उठकर, हाथ जोड़,

भगवान्की स्तुति करनेकी चेष्टा की; परन्तु नेत्रोंमें आनन्दके आँसू उमड़ आये, उससे बोला न गया । सारा शरीर पुलकित हो रहा था, दर्शनके आनन्दोल्लाससे उसके अंगोंमें कम्प होने लगा था, वह चुपचाप खड़ी रही ॥६ ॥ परीक्षित्! देवी अदिति अपने प्रेमपूर्ण नेत्रोंसे लक्ष्मीपति,

विश्वपति, यज्ञेश्वर - भगवानको इस प्रकार देख रही थी, मानो वह उन्हें पी जायगी । फिर बड़े प्रेमसे, गद्गद वाणीसे, धीरे - धीरे उसने भगवान्‌की स्तुति की ॥७ ॥

अदितिने कहा — आप यज्ञके स्वामी हैं और स्वयं यज्ञ भी आप ही हैं । अच्युत! आपके चरण - कमलोंका आश्रय लेकर लोग भवसागरसे तर जाते हैं । आपके यशकीर्तनका श्रवण भी संसारसे तारनेवाला है । आपके नामोंके श्रवणमात्रसे ही कल्याण हो जाता है । आदिपुरुष! जो आपकी शरणमें आ जाता है, उसकी सारी विपत्तियोंका आप नाश कर देते हैं । भगवन्! आप

दीनोंके स्वामी हैं । आप हमारा कल्याण कीजिये ॥ ८ ॥

विश्वाय विश्वभवनस्थितिसंयमाय

स्वैरं गृहीतपुरुशक्तिगुणाय भूम्ने ।

स्वस्थाय शश्वदुपबृंहितपूर्णबोध-व्यापादितात्मतमसे हरये नमस्ते ॥९

आयुः परं वपुरभीष्टमतुल्यलक्ष्मी-द्यभूरसाः सकलयोगगुणास्त्रिवर्गः । ज्ञानं च केवलमनन्त भवन्ति तुष्टात् त्वत्तो नृणां किमु सपत्नजयादिराशीः ॥१० श्रीशुक उवाच

अदित्यैवं स्तुतो राजन्भगवान्पुष्करेक्षणः ।

क्षेत्रज्ञः सर्वभूतानामिति होवाच भारत ॥११

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पृष्ठ 1556

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श्रीभगवानुवाच

देवमातर्भवत्या मे विज्ञातं चिरकाङ्क्षितम् ।

यत् सपत्नैर्हृतश्रीणां च्यावितानां स्वधामतः ॥१२

तान्विनिर्जित्य समरे दुर्मदानसुरर्षभान् ।

प्रतिलब्धजयश्रीभिः पुत्रैरिच्छस्युपासितुम् ॥ १३

इन्द्रज्येष्ठैः स्वतनयैर्हतानां युधि विद्विषाम् ।

स्त्रियो रुदन्तीरासाद्य द्रुष्टुमिच्छसि दुःखिताः ॥ १४

आत्मजान्सुसमृद्धांस्त्वं प्रत्याहृतयशः श्रियः ।

नाकपृष्ठमधिष्ठाय क्रीडतो द्रष्टुमिच्छसि ॥१५

प्रायोऽधुना तेऽसुरयूथनाथा अपारणीया इति देवि मे मतिः । यत्तेऽनुकूलेश्वरविप्रगुप्ता न विक्रमस्तत्र सुखं ददाति ॥१६ आप विश्वकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयके कारण हैं और विश्वरूप भी आप ही हैं । अनन्त होनेपर भी स्वच्छन्दतासे आप अनेक शक्ति और गुणोंको स्वीकार कर लेते हैं । आप सदा अपने स्वरूपमें ही स्थित रहते हैं । नित्य निरन्तर बढ़ते हुए पूर्ण बोधके द्वारा आप हृदयके अन्धकारको नष्ट करते रहते हैं । भगवन्! मैं आपको नमस्कार करती हूँ || ९ || प्रभो! अनन्त! जब आप प्रसन्न हो जाते हैं, तब मनुष्योंको ब्रह्माजीकी दीर्घ आयु, उनके ही समान दिव्य शरीर, प्रत्येक अभीष्ट वस्तु, अतुलित धन, स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल, योगकी समस्त सिद्धियाँ, अर्थ - धर्म - कामरूप त्रिवर्ग और केवल ज्ञानतक प्राप्त हो जाता है । फिर शत्रुओंपर विजय प्राप्त करना आदि जो छोटी - छोटी कामनाएँ हैं, उनके सम्बन्धमें तो कहना ही क्या है ॥१० ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! जब अदितिने इस प्रकार कमलनयनभगवान्‌की स्तुति की, तब समस्त प्राणियोंके हृदयमें रहकर उनकी गति - विधि जाननेवाले भगवान्ने यह बात कही ॥११ ॥

श्रीभगवान्ने कहा— देवताओंकी जननी अदिति! तुम्हारी चिरकालीन अभिलाषाको मैं जानता हूँ । शत्रुओंने तुम्हारे पुत्रोंकी सम्पत्ति छीन ली है, उन्हें उनके लोक ( स्वर्ग ) -से खदेड़ दिया है ॥१२ ॥ तुम चाहती हो कि युद्धमें तुम्हारे पुत्र उन मतवाले और बली असुरोंको

जीतकर विजयलक्ष्मी प्राप्त करें, तब तुम उनके साथ भगवान्‌की उपासना करो ॥१३ ॥

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पृष्ठ 1557

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तुम्हारी इच्छा यह भी है कि तुम्हारे इन्द्रादि पुत्र जब शत्रुओंको मार डालें, तब तुम उनकी रोती हुई दुःखी स्त्रियोंको अपनी आँखों देख सको ॥१४ ॥ अदिति! तुम चाहती हो कि

तुम्हारे पुत्र धन और शक्तिसे समृद्ध हो जायँ, उनकी कीर्ति और ऐश्वर्य उन्हें फिरसे प्राप्त हो जायँ तथा वे स्वर्गपर अधिकार जमाकर पूर्ववत् विहार करें ॥१५ ॥ परन्तु देवि! वे

असुरसेनापति इस समय जीते नहीं जा सकते, ऐसा मेरा निश्चय है; क्योंकि ईश्वर और ब्राह्मण इस समय उनके अनुकूल हैं । इस समय उनके साथ यदि लड़ाई छेड़ी जायगी, तो उससे सुख मिलनेकी आशा नहीं है ॥१६ ॥

अथाप्युपायो मम देवि चिन्त्यः सन्तोषितस्य व्रतचर्यया ते । ममार्चनं नार्हति गन्तुमन्यथा श्रद्धानुरूपं फलहेतुकत्वात् ॥१७ त्वयार्चितश्चाहमपत्यगुप्तये पयोव्रतेनानुगुणं समीडितः । स्वांशेन पुत्रत्वमुपेत्य ते सुतान् गोप्तास्मि मारीचतपस्यधिष्ठितः ॥१८

उपधाव पतिं भद्रे प्रजापतिमकल्मषम् ।

मां च भावयती पत्यावेवंरूपमवस्थितम् ॥१९

नैतत् परस्मा आख्येयं पृष्टयापि कथञ्चन ।

सर्वं सम्पद्यते देवि देवगुह्यं सुसंवृतम् ॥२०

श्रीशुक उवाच

एतावदुक्त्वा भगवांस्तत्रैवान्तरधीयत ।

अदितिर्दुर्लभं लब्ध्वा हरेर्जन्मात्मनि प्रभोः ॥ २१

उपाधावत् पतिं भक्त्या परया कृतकृत्यवत् ।

स वै समाधियोगेन कश्यपस्तदबुध्यत ॥२२

प्रविष्टमात्मनि हरेरंशं ह्यवितथेक्षणः ।

सोऽदित्यां वीर्यमाधत्त तपसा चिरसंभृतम् ।

समाहितमना राजन्दारुण्यग्निं यथानिलः ॥२३

अदितेर्धिष्ठितं गर्भं भगवन्तं सनातनम् ।

हिरण्यगर्भो विज्ञाय समीडे गुह्यनामभिः ॥२४

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पृष्ठ 1558

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ब्रह्मोवाच

जयोरुगाय भगवन्नुरुक्रम नमोऽस्तु ते ।

नमो ब्रह्मण्यदेवाय त्रिगुणाय नमो नमः ॥ २५

फिर भी देवि! तुम्हारे इस व्रतके अनुष्ठानसे मैं बहुत प्रसन्न हूँ, इसलिये मुझे इस सम्बन्धमें कोई - न - कोई उपाय सोचना ही पड़ेगा । क्योंकि मेरी आराधना व्यर्थ तो होनी नहीं चाहिये । उससे श्रद्धाके अनुसार फल अवश्य मिलता है ॥१७ ॥

तुमने अपने पुत्रोंकी रक्षाके लिये ही विधिपूर्वक पयोव्रतसे मेरी पूजा एवं स्तुति की है । अतः मैं अंशरूपसे कश्यपके वीर्यमें प्रवेश करूँगा और तुम्हारा पुत्र बनकर तुम्हारी सन्तानकी रक्षा करूँगा ॥१८ ॥

कल्याणी! तुम अपने पति कश्यपमें मुझे इसी रूपमें स्थति देखो और उन निष्पाप प्रजापतिकी सेवा करो ॥१९ ॥ देवि! देखो, किसीके पूछनेपर भी यह बात दूसरेको मत

बतलाना । देवताओंका रहस्य जितना गुप्त रहता है, उतना ही सफल होता है ॥२० ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - इतना कहकर भगवान् वहीं अन्तर्धान हो गये । उस समय अदिति यह जानकर कि स्वयं भगवान् मेरे गर्भसे जन्म लेंगे, अपनी कृतकृत्यताका अनुभव करने लगी । भला, यह कितनी दुर्लभ बात है! वह बड़े प्रेमसे अपने पतिदेव कश्यपकी सेवा करने लगी । कश्यपजी सत्यदर्शी थे, उनके नेत्रोंसे कोई बात छिपी नहीं रहती थी । अपने समाधि - योगसे उन्होंने जान लिया कि भगवान्का अंश मेरे अंदर प्रविष्ट हो गया है । जैसे वायु काठमें अग्निका आधान करती है, वैसे ही कश्यपजीने समाहित चित्तसे अपनी तपस्याके द्वारा चिर - संचित वीर्यका अदितिमें आधान किया ॥२१-२३ ॥ जब ब्रह्माजीको यह बात मालूम हुई कि अदितिके गर्भमें तो स्वयं अविनाशी भगवान् आये हैं, तब वे भगवान्‌के रहस्यमय नामोंसे उनकी स्तुति करने लगे ॥२४ ॥

ब्रह्माजीने कहा — समग्र कीर्तिके आश्रय भगवन्! आपकी जय हो । अनन्त शक्तियोंके अधिष्ठान! आपके चरणोंमें नमस्कार है । ब्रह्मण्यदेव! त्रिगुणोंके नियामक! आपके चरणोंमें मेरे बार - बार प्रणाम हैं ॥ २५ ॥

नमस्ते पृश्निगर्भाय वेदगर्भाय वेधसे ।

त्रिनाभाय त्रिपृष्ठाय शिपिविष्टाय विष्णवे ॥२६

त्वमादिरन्तो भुवनस्य मध्य-मनन्तशक्तिं पुरुषं यमाहुः । कालो भवानाक्षिपतीश विश्वं स्रोतों यथान्तःपतितं गभीरम् ॥२७ ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1559

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त्वं वै प्रजानां स्थिरजङ्गमानां प्रजापतीनामसि सम्भविष्णुः । दिवौकसां देव दिवश्च्युतानां परायणं नौरिव मज्जतोऽप्सु ॥२८ पृश्निके पुत्ररूपमें उत्पन्न होनेवाले! वेदोंके समस्त ज्ञानको अपने अंदर रखनेवाले प्रभो! वास्तवमें आप ही सबके विधाता हैं । आपको मैं बार - बार नमस्कार करता हूँ । ये तीनों लोक आपकी नाभिमें स्थित हैं । तीनों लोकोंसे परे वैकुण्ठमें आप निवास करते हैं । जीवोंके अन्तःकरणमें आप सर्वदा विराजमान रहते हैं । ऐसे सर्वव्यापक विष्णुको मैं नमस्कार करता ॥२६ ॥ प्रभो! आप ही संसारके आदि, अन्त और इसलिये मध्य भी हैं । यही कारण है कि

वेद अनन्तशक्ति पुरुषके रूपमें आपका वर्णन करते हैं । जैसे गहरा स्रोत अपने भीतर पड़े हुए तिनकेको बहा ले जाता है, वैसे ही आप कालरूपसे संसारका धाराप्रवाह संचालन करते रहते हैं ॥२७ ॥ आप चराचर प्रजा और प्रजापतियोंको भी उत्पन्न करनेवाले मूल कारण हैं ।

देवाधिदेव! जैसे जलमें डूबते हुएके लिये नौका ही सहारा है, वैसे ही स्वर्गसे भगाये हुए देवताओंके लिये एकमात्र आप ही आश्रय हैं ॥२८ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामष्टमस्कन्धे वामनप्रादुर्भावे सप्तदशोऽध्यायः ॥१७ ॥

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पृष्ठ 1560

श्रीमद्भागवत महापुराण - १, पृष्ठ 1560 का मूल पृष्ठ
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अथाष्टादशोऽध्यायः वामनभगवान्का प्रकट होकर राजा बलिकी यज्ञशालामें पधारना श्रीशुक उवाच इत्थं विरिञ्चस्तुतकर्मवीर्यः प्रादुर्बभूवामृतभूरदित्याम् । चतुर्भुजः शङ्खगदाब्जचक्रः पिशङ्गवासा नलिनायतेक्षणः ॥१

श्यामावदातो झषराजकुण्डल-त्विषोल्लसच्छ्रीवदनाम्बुजः पुमान् ।

श्रीवत्सवक्षा वलयाङ्गदोल्लस-त्किरीटकाञ्चीगुणचारुनूपुरः ॥ २

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! इस प्रकार जब ब्रह्माजीने भगवान्की शक्ति और लीलाकी स्तुति की, तब जन्म - मृत्युरहित भगवान् अदितिके सामने प्रकट हुए । भगवान्के चार भुजाएँ थीं; उनमें वे शंख, गदा, कमल और चक्र धारण किये हुए थे । कमलके समान कोमल और बड़े - बड़े नेत्र थे । पीताम्बर शोभायमान हो रहा था ॥ १ ॥ विशुद्ध श्यामवर्णका शरीर था ।

मकराकृति कुण्डलोंकी कान्तिसे मुखकमलकी शोभा और भी उल्लसित हो रही थी । वक्षःस्थलपर श्रीवत्सका चिह्न, हाथोंमें कंगन और भुजाओंमें बाजूबंद, सिरपर किरीट, कमरमें करधनीकी लड़ियाँ और चरणोंमें सुन्दर नूपुर जगमगा रहे थे ॥२ ॥

मधुव्रतव्रातविघुष्टया स्वया विराजितः श्रीवनमालया हरिः । प्रजापतेर्वेश्मतमः स्वरोचिषा विनाशयन् कण्ठनिविष्टकौस्तुभः ॥ ३ दिशः प्रसेदुः सलिलाशयास्तदा प्रजाः प्रहृष्टा ऋतवो गुणान्विताः । द्यौरन्तरिक्षं क्षितिरग्निजिह्वा गावो द्विजाः संजहृषुर्नगाश्च ॥४ श्रोणायां श्रवणद्वादश्यां मुहूर्तेऽभिजिति प्रभुः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******