श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 1591–1600
श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1591–1600
पृष्ठ 1591
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
सव्रीडनीचीनमुखो बभूव ह ॥१४ स तत्र हासीनमुदीक्ष्य सत्पतिं सुनन्दनन्दाद्यनुगैरुपासितम् । उपेत्य भूमौ शिरसा महामना ननाम मूर्ध्ना पुलकाश्रुविक्लवः ॥१५ प्रह्राद उवाच त्वयैव दत्तं पदमैन्द्रमूर्जितं हृतं तदेवाद्य तथैव शोभनम् । मन्ये महानस्य कृतो ह्यनुग्रहो विभ्रंशितो यच्छ्रिय आत्ममोहनात् ॥१६ यया हि विद्वानपि मुह्यते यत-स्तत् को विचष्टे गतिमात्मनो यथा । तस्मै नमस्ते जगदीश्वराय वै नारायणायाखिललोकसाक्षिणे ॥१७ श्रीशुक उवाच
तस्यानुशृण्वतो राजन् प्रह्रादस्य कृताञ्जलेः ।
हिरण्यगर्भो भगवानुवाच मधुसूदनम् ॥१८
बद्धं वीक्ष्य पतिं साध्वी तत्पत्नी भयविह्वला ।
प्राञ्जलिः प्रणतोपेन्द्रं बभाषेऽवाङ्मुखी नृप ॥ १ ९
विन्ध्यावलिरुवाच क्रीडार्थमात्मन इदं त्रिजगत् कृतं ते स्वाम्यं तु तत्र कुधियोऽपर ईश कुर्युः । कर्तुः प्रभोस्तव किमस्यत आवहन्ति त्यक्तह्रियस्त्वदवरोपितकर्तृवादाः ॥२० बलि इस समय वरुणपाशमें बँधे हुए थे । इसलिये प्रह्लादजीके आनेपर जैसे र ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
पृष्ठ 1592
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
उनकी पूजा किया करते थे, उस प्रकार न कर सके । उनके नेत्र आँसुओंसे चंचल हो उठे, लज्जाके मारे मुँह नीचा हो गया । उन्होंने केवल सिर झुकाकर उन्हें नमस्कार किया ॥१४ ॥
प्रह्लादजीने देखा कि भक्तवत्सल भगवान् वहीं विराजमान हैं और सुनन्द, नन्द आदि पार्षद उनकी सेवा कर रहे हैं । प्रेमके उद्रेकसे प्रह्लादजीका शरीर पुलकित हो गया, उनकी आँखोंमें आँसू छलक आये । वे आनन्दपूर्ण हृदयसे सिर झुकाये अपने स्वामीके पास गये और पृथ्वीपर सिर रखकर उन्हें साष्टांग प्रणाम किया ॥१५ ॥
प्रह्लादजीने कहा — प्रभो! आपने ही बलिको यह ऐश्वर्यपूर्ण इन्द्रपद दिया था, अब आज आपने ही उसे छीन लिया । आपका देना जैसा सुन्दर है, वैसा ही सुन्दर लेना भी! मैं समझता हूँ कि आपने इसपर बड़ी भारी कृपा की है, जो आत्माको मोहित करनेवाली राज्यलक्ष्मीसे इसे अलग कर दिया ॥ १६ ॥ प्रभो! लक्ष्मीके मदसे तो विद्वान् पुरुष भी मोहित हो जाते हैं ।
उसके रहते भला, अपने वास्तविक स्वरूपको ठीक - ठीक कौन जान सकता है? अतः उस लक्ष्मीको छीनकर महान् उपकार करनेवाले, समस्त जगत्के महान् ईश्वर, सबके हृदयमें विराजमान और सबके परम साक्षी श्रीनारायणदेवको मैं नमस्कार करता हूँ ॥१७ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं- परीक्षित्! प्रह्लादजी अंजलि बाँधकर खड़े थे । उनके सामने ही भगवान् ब्रह्माजीने वामनभगवान् से कुछ कहना चाहा ॥ १८ ॥ परन्तु इतनेमें ही राजा बलिकी
परम साध्वी पत्नी विन्ध्यावलीने अपने पतिको बँधा देखकर भयभीत हो भगवान्के चरणोंमें प्रणाम किया और हाथ जोड़, मुँह नीचा कर वह भगवान्से बोली ॥ १ ९ ॥ विन्ध्यावलीने कहा — प्रभो! आपने अपनी क्रीडाके लिये ही इस सम्पूर्ण जगत्की रचना की है । जो लोग कुबुद्धि हैं, वे ही अपनेको इसका स्वामी मानते हैं । जब आप ही इसके कर्ता, भर्ता और संहर्ता हैं, तब आपकी मायासे मोहित होकर अपनेको झूठमूठ कर्ता माननेवाले निर्लज्ज आपको समर्पण क्या करेंगे? ॥ २० ॥
ब्रह्मोवाच
भूतभावन भूतेश देवदेव जगन्मय ।
मुञ्चैनं हृतसर्वस्वं नायमर्हति निग्रहम् ॥२१
कृत्स्ना तेऽनेन दत्ता भूर्लोकाः कर्मार्जिताश्च ये ।
निवेदितं च सर्वस्वमात्माविक्लवया धिया ॥ २२
यत्पादयोरशठधीः सलिलं प्रदाय दूर्वाङ्कुरैरपि विधाय सतीं सपर्याम् । अप्युत्तमां गतिमसौ भजते त्रिलोकीं दाश्वानविक्लवमनाः कथमार्तिमृच्छेत् ॥२३ ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
पृष्ठ 1593
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रीभगवानुवाच
ब्रह्मन् यमनुगृह्णामि तद्विशो विधुनोम्यहम् ।
यन्मदः पुरुषः स्तब्धो लोकं मां चावमन्यते ॥२४
यदा कदाचिज्जीवात्मा संसरन् निजकर्मभिः ।
नानायोनिष्वनीशोऽयं पौरुषीं गतिमाव्रजेत् ॥२५
जन्मकर्मवयोरूपविद्यैश्वर्यधनादिभिः ।
यद्यस्य न भवेत् स्तम्भस्तत्रायं मदनुग्रहः ॥ २६
मानस्तम्भनिमित्तानां जन्मादीनां समन्ततः ।
सर्वश्रेयः प्रतीपानां हन्त मुह्येन्न मत्परः ॥२७
एष दानवदैत्यानामग्रणीः कीर्तिवर्धनः ।
अजैषीदजयां मायां सीदन्नपि न मुह्यति ॥२८
ब्रह्माजीने कहा — समस्त प्राणियोंके जीवनदाता, उनके स्वामी और जगत्स्वरूप देवाधिदेव प्रभो! अब आप इसे छोड़ दीजिये । आपने इसका सर्वस्व ले लिया है, अतः अब यह दण्डका पात्र नहीं है ॥२१ ॥
इसने अपनी सारी भूमि और पुण्यकर्मोंसे उपार्जित स्वर्ग आदि लोक, अपना सर्वस्व तथा आत्मातक आपको समर्पित कर दिया है एवं ऐसा करते समय इसकी बुद्धि स्थिर रही है, यह धैर्यसे च्युत नहीं हुआ है ॥२२ ॥
प्रभो! जो मनुष्य सच्चे हृदयसे कृपणता छोड़कर आपके चरणोंमें जलका अर्घ्य देता है और केवल दूर्वादलसे भी आपकी सच्ची पूजा करता है, उसे भी उत्तम गतिकी प्राप्ति होती है । फिर बलिने तो बड़ी प्रसन्नतासे धैर्य और स्थिरतापूर्वक आपको त्रिलोकीका दान कर दिया है । तब यह दुःखका भागी कैसे हो सकता है? ॥२३ ॥
श्रीभगवान्ने कहा — ब्रह्माजी! मैं जिसपर कृपा करता हूँ, उसका धन छीन लिया करता हूँ । क्योंकि जब मनुष्य धनके मदसे मतवाला हो जाता है, तब मेरा और लोगोंका तिरस्कार करने लगता है || २४ || यह जीव अपने कर्मोंके कारण विवश होकर अनेक योनियोंमें भटकता रहता है, जब कभी मेरी बड़ी कृपासे मनुष्यका शरीर प्राप्त करता है ॥ २५ ॥
मनुष्ययोनिमें जन्म लेकर यदि कुलीनता, कर्म, अवस्था, रूप, विद्या, ऐश्वर्य और धन आदिके कारण घमंड न हो जाय तो समझना चाहिये कि मेरी बड़ी ही कृपा है ॥२६ ॥ कुलीनता आदि
बहुत - से ऐसे कारण हैं, जो अभिमान और जडता आदि उत्पन्न करके मनुष्यको कल्याणके समस्त साधनोंसे वंचित कर देते हैं; परन्तु जो मेरे शरणागत होते हैं, वे इनसे मोहित नहीं ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
पृष्ठ 1594
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
होते ॥२७ ॥ यह बलि दानव और दैत्य दोनों ही वंशोंमें अग्रगण्य और उनकी कीर्ति
बढ़ानेवाला है । इसने उस मायापर विजय प्राप्त कर ली है, जिसे जीतना अत्यन्त कठिन है । तुम देख ही रहे हो, इतना दुःख भोगनेपर भी यह मोहित नहीं हुआ ॥२८ ॥
क्षीणरिक्थश्च्युतः १ स्थानात् क्षिप्तो बद्धश्च शत्रुभिः ।
ज्ञातिभिश्च परित्यक्तो यातनामनुयापितः ॥ २ ९
गुरुणा भर्त्सितः शप्तो जहौ सत्यं न सुव्रतः ।
छलैरुक्तो मया धर्मो नायं त्यजति सत्यवाक् ॥३०
एष मे प्रापितः स्थानं दुष्प्रापममरैरपि ।
सावर्णेरन्तरस्यायं भवितेन्द्रो मदाश्रयः २ ॥३१
तावत् सुतलमध्यास्तां विश्वकर्मविनिर्मितम् ।
यन्नाधयो व्याधयश्च क्लमस्तन्द्रा पराभवः ।
नोपसर्गा निवसतां संभवन्ति ममेक्षया ॥३२
इन्द्रसेन महाराज याहि भो भद्रमस्तु ते ।
सुतलं स्वर्गिभिः प्रार्थ्यं ज्ञातिभिः परिवारितः ॥ ३३
न त्वामभिभविष्यन्ति लोकेशाः किमुतापरे ।
त्वच्छासनातिगान् दैत्यांश्चक्रं मे सूदयिष्यति ॥ ३४
रक्षिष्ये सर्वतोऽहं त्वां सानुगं सपरिच्छदम् ।
सदा सन्निहितं वीर तत्र मां द्रक्ष्यते भवान् ॥३५
तत्र दानवदैत्यानां सङ्गात् ते भाव आसुरः ।
दृष्ट्वा मदनुभावं वै सद्यः कुण्ठो विनङ्क्ष्यति ॥३६
इसका धन छीन लिया, राजपदसे अलग कर दिया, तरह - तरहके आक्षेप किये, शत्रुओंने बाँध लिया, भाई - बन्धु छोड़कर चले गये, इतनी यातनाएँ भोगनी पड़ीं - यहाँतक कि गुरुदेवने भी इसको डाँटा - फटकारा और शापतक दे दिया । परन्तु इस दृढव्रतीने अपनी प्रतिज्ञा नहीं छोड़ी । मैंने इससे छलभरी बातें कीं, मनमें छल रखकर धर्मका उपदेश किया; परन्तु इस सत्यवादीने अपना धर्म न छोड़ा ॥२९ -३० ॥ ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
पृष्ठ 1595
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अतः मैंने इसे वह स्थान दिया है, जो बड़े - बड़े देवताओंको भी बड़ी कठिनाईसे प्राप्त होता है । सावर्णि मन्वन्तरमें यह मेरा परम भक्त इन्द्र होगा ॥३१ ॥
तबतक यह विश्वकर्माके बनाये हुए सुतललोकमें रहे । वहाँ रहनेवाले लोग मेरी कृपादृष्टिका अनुभव करते हैं । इसलिये उन्हें शारीरिक अथवा मानसिक रोग, थकावट, तन्द्रा, बाहरी या भीतरी शत्रुओंसे पराजय और किसी प्रकारके विघ्नोंका सामना नहीं करना पड़ता ॥३२ ॥
[ बलिको सम्बोधित कर ] महाराज इन्द्रसेन! तुम्हारा कल्याण हो । अब तुम अपने भाई-बन्धुओंके साथ उस सुतललोकमें जाओ जिसे स्वर्गके देवता भी चाहते रहते हैं ॥३३ ॥
बड़े - बड़े लोकपाल भी अब तुम्हें पराजित नहीं कर सकेंगे, दूसरोंकी तो बात ही क्या है! जो दैत्य तुम्हारी आज्ञाका उल्लंघन करेंगे, मेरा चक्र उनके टुकड़े - टुकड़े कर देगा ॥३४ ॥
मैं तुम्हारी, तुम्हारे अनुचरोंकी और भोगसामग्रीकी भी सब प्रकारके विघ्नोंसे रक्षा करूँगा । वीर बलि! तुम मुझे वहाँ सदा - सर्वदा अपने पास ही देखोगे ॥३५ ॥
दानव और दैत्योंके संसर्गसे तुम्हारा जो कुछ आसुरभाव होगा वह मेरे प्रभावसे तुरंत दब जायगा और नष्ट हो जायगा ॥ ३६ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामष्टमस्कन्धे वामनप्रादुर्भावे बलिवामनसंवादो नाम द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥
१. प्रा ० पा०- — क्षीणो विध्वंसितः स्था ० । २. प्रा ० पा ० — ममाश्रयः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
पृष्ठ 1596
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अथ त्रयोविंशोऽध्यायः बलिका बन्धनसे छूटकर सुतललोकको जाना श्रीशुक उवाच इत्युक्तवन्तं पुरुषं पुरातनं महानुभावोऽखिलसाधुसंमतः । बद्धाञ्जलिर्बाष्पकलाकुलेक्षणो भक्त्युद्गलो गद्गदया गिराब्रवीत् ॥ १ बलिरुवाच अहो प्रणामाय कृतः समुद्यमः
प्रपन्नभक्तार्थविधौ समाहितः ।
यल्लोकपालैस्त्वदनुग्रहो मरे-रलब्धपूर्वोऽपसदेऽसुरेऽर्पितः ॥२
श्रीशुक उवाच
इत्युक्त्वा हरिमानम्य ब्रह्माणं सभवं ततः ।
विवेश सुतलं प्रीतो बलिर्मुक्तः सहासुरैः ॥३
एवमिन्द्राय भगवान् प्रत्यानीय त्रिविष्टपम् ।
पूरयित्वादितेः काममशासत् सकलं जगत् ॥४
लब्धप्रसादं निर्मुक्तं पौत्रं वंशधरं बलिम् ।
निशाम्य भक्तिप्रवणः प्रह्लाद इदमब्रवीत् ॥ ५
प्रह्राद उवाच मं विरिञ्च लभते प्रसादं न श्रीर्न शर्वः किमुतापरे ते । यन्नोऽसुराणामसि दुर्गपालो विश्वाभिवन्द्यैरपि वन्दिताङ्घ्रिः ॥ ६ यत्पादपद्ममकरन्दनिषेवणेन ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
पृष्ठ 1597
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
ब्रह्मादयः शरणदाश्नुवते विभूतीः । श्रीशुकदेवजी कहते हैं- जब सनातन पुरुष भगवान्ने इस प्रकार कहा, तो साधुओंके आदरणीय महानुभाव दैत्यराजके नेत्रोंमें आँसू छलक आये । प्रेमके उद्रेकसे उनका गला भर आया । वे हाथ जोड़कर गद्गद वाणीसे भगवान्से कहने लगे ॥१ ॥
बलिने कहा — प्रभो! मैंने तो आपको पूरा प्रणाम भी नहीं किया, केवल प्रणाम करनेमात्रकी चेष्टाभर की । उसीसे मुझे वह फल मिला, जो आपके चरणोंके शरणागत भक्तोंको प्राप्त होता है । बड़े - बड़े लोकपाल और देवताओंपर आपने जो कृपा कभी नहीं की वह मुझ - जैसे नीच असुरको सहज ही प्राप्त हो गयी ॥२ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं— परीक्षित्! यों कहते ही बलि वरुणके पाशोंसे मुक्त हो गये । तब उन्होंने भगवान्, ब्रह्माजी और शंकरजीको प्रणाम किया और इसके बाद बड़ी प्रसन्नतासे असुरोंके साथ सुतल लोककी यात्रा की || ३ || इस प्रकार भगवान्ने बलिसे स्वर्गका राज्य लेकर इन्द्रको दे दिया, अदितिकी कामना पूर्ण की और स्वयं उपेन्द्र बनकर वे सारे जगत्का शासन करने लगे ॥४ ॥ जब प्रह्लादने देखा कि मेरे वंशधर पौत्र राजा बलि बन्धनसे छूट गये
और उन्हें भगवान्का कृपा प्रसाद प्राप्त हो गया तो वे भक्ति - भावसे भर गये । उस समय उन्होंने भगवान्की इस प्रकार स्तुति की ॥५ ॥
प्रह्लादजीने कहा — प्रभो! यह कृपाप्रसाद तो कभी ब्रह्माजी, लक्ष्मीजी और शंकरजीको भी नहीं प्राप्त हुआ तब दूसरोंकी बात ही क्या है । अहो! विश्ववन्द्य ब्रह्मा आदि भी जिनके चरणोंकी वन्दना करते रहते हैं, वही आप हम असुरोंके दुर्गपाल - किलेदार हो गये || ६ || शरणागतवत्सल प्रभो! ब्रह्मा आदि लोकपाल आपके चरणकमलोंका मकरन्द - रस सेवन करनेके कारण सृष्टिरचनाकी शक्ति आदि अनेक विभूतियाँ प्राप्त करते हैं । हमलोग तो जन्मसे ही खल और कुमार्गगामी हैं, हमपर आपकी ऐसी अनुग्रहपूर्ण दृष्टि कैसे हो गयी, जो आप हमारे द्वारपाल ही बन गये ॥७ ॥ आपने अपनी योगमायासे खेल - ही खेलमें त्रिभुवनकी रचना
कर दी । आप सर्वज्ञ, सर्वात्मा और समदर्शी हैं । फिर भी आपकी लीलाएँ बड़ी विलक्षण जान पड़ती हैं । आपका स्वभाव कल्प- - वृक्षके समान है; क्योंकि आप अपने भक्तोंसे अत्यन्त प्रेम करते है । इसीसे कभी - कभी उपासकोंके प्रति पक्षपात और विमुखोंके प्रति निर्दयता भी आपमें देखी जाती है ॥ ८ ॥
कस्माद् वयं कुसृतयः खलयोनयस्ते दाक्षिण्यदृष्टिपदवीं भवतः प्रणीताः ॥७ चित्रं तवेहितमहोऽमितयोगमाया-लीलाविसृष्टभुवनस्य विशारदस्य । सर्वात्मनः समदृशो विषमः स्वभावो भक्तप्रियो यदसि कल्पतरुस्वभावः ॥८ श्रीभगवानुवाच ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
पृष्ठ 1598
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वत्स प्रह्राद भद्रं ते प्रयाहि सुतलालयम् ।
मोदमानः स्वपौत्रेण ज्ञातीनां सुखमावह ॥९
नित्यं द्रष्टासि मां तत्र गदापाणिमवस्थितम् ।
मद्दर्शनमहाह्लादध्वस्तकर्मनिबन्धनः ॥ १०
श्रीशुक उवाच
आज्ञां भगवतो राजन् प्रह्रादो बलिना सह ।
बाढमित्यमलप्रज्ञो मूर्ध्याधाय कृताञ्जलिः ॥ ११
परिक्रम्यादिपुरुषं सर्वासुरचमूपतिः ।
प्रणतस्तदनुज्ञातः प्रविवेश महाबिलम् ॥१२
अथाहोशनसं राजन् हरिर्नारायणोऽन्तिके ।
आसीनमृत्विजां मध्ये सदसि ब्रह्मवादिनाम् ॥ १३
ब्रह्मन् संतनु शिष्यस्य कर्मच्छिद्रं वितन्वतः ।
यत् तत् कर्मसु वैषम्यं ब्रह्मदृष्टं समं भवेत् ॥१४
शुक्र उवाच
कुतस्तत्कर्मवैषम्यं यस्य कर्मेश्वरो भवान् ।
यज्ञेशो यज्ञपुरुषः सर्वभावेन पूजितः ॥१५
मन्त्रतस्तन्त्रतश्छिद्रं देशकालार्हवस्तुतः ।
सर्वं करोति निश्छिद्रं नामसंकीर्तनं तव ॥१६
श्रीभगवान्ने कहा- बेटा प्रह्लाद! तुम्हारा कल्याण हो । अब तुम भी सुतल लोकमें जाओ । वहाँ अपने पौत्र बलिके साथ आनन्दपूर्वक रहो और जाति - बन्धुओंको सुखी करो || ९ || वहाँ तुम मुझे नित्य ही गदा हाथमें लिये खड़ा देखोगे । मेरे दर्शनके परमानन्दमें मग्न रहनेके कारण तुम्हारे सारे कर्मबन्धन नष्ट हो जायँगे ॥१० ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! समस्त दैत्यसेनाके स्वामी विशुद्धबुद्धि प्रह्लादजीने ‘ जो आज्ञा ' कहकर, हाथ जोड़, भगवान्का आदेश मस्तकपर चढ़ाया । फिर उन्होंने बलिके साथ आदिपुरुष भगवान्की परिक्रमा की, उन्हें प्रणाम किया और उनसे अनुमति लेकर सुतल लोककी यात्रा की ॥११-१२ ॥ परीक्षित्! उस समय भगवान् श्रीहरिने ब्रह्मवादी ऋत्विजोंकी सभामें अपने पास ही बैठे हुए शुक्राचार्यजीसे कहा ॥१३ ॥ ' ब्रह्मन्! आपका शिष्य यज्ञ कर
****** ebook converter DEMO Watermarks *******
पृष्ठ 1599
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
रहा था । उसमें जो त्रुटि रह गयी है, उसे आप पूर्ण कर दीजिये । क्योंकि कर्म करनेमें जो कुछ भूल - चूक हो जाती है, वह ब्राह्मणोंकी कृपादृष्टिसे सुधर जाती है ' ॥१४ ॥
शुक्राचार्यजीने कहा – भगवन्! जिसने अपना समस्त कर्म समर्पित करके सब प्रकारसे यज्ञेश्वर यज्ञ - पुरुष आपकी पूजा की है— उसके कर्ममें कोई त्रुटि, कोई विषमता कैसे रह सकती है? ॥१५ ॥ क्योंकि मन्त्रोंकी, अनुष्ठान - पद्धतिकी, देश, काल, पात्र और वस्तुकी सारी
भूलें आपके नामसंकीर्तनमात्रसे सुधर जाती हैं; आपका नाम सारी त्रुटियोंको पूर्ण कर देता ॥१६ ॥
तथापि वदतो भूमन् करिष्याम्यनुशासनम् ।
एतच्छ्रेयः परं पुंसां यत् तवाज्ञानुपालनम् ॥१७
श्रीशुक उवाच
अभिनन्द्य हरेराज्ञामुशना भगवानिति ।
यज्ञच्छिद्रं समाधत्त बलेर्विप्रर्षिभिः सह ॥ १८
एवं बलेर्महीं राजन् भिक्षित्वा वामनो हरिः ।
ददौ भ्रात्रे महेन्द्राय त्रिदिवं यत् परैर्हृतम् ॥१९
प्रजापतिपतिर्ब्रह्मा देवर्षिपितृभूमिपैः ।
दक्षभृग्वङ्गिरोमुख्यैः कुमारेण भवेन च ॥२०
कश्यपस्यादितेः प्रीत्यै सर्वभूतभवाय च ।
लोकानां लोकपालानामकरोद् वामनं पतिम् ॥२१
वेदानां सर्वदेवानां धर्मस्य यशसः श्रियः ।
मङ्गलानां व्रतानां च कल्पं स्वर्गापवर्गयोः ॥२२
उपेन्द्रं कल्पयाञ्चक्रे पतिं सर्वविभूतये ।
तदा सर्वाणि भूतानि भृशं मुमुदिरे नृप ॥२३
ततस्त्विन्द्रः पुरस्कृत्य देवयानेन वामनम् ।
लोकपालैर्दिवं निन्ये ब्रह्मणा चानुमोदितः ॥२४
प्राप्य त्रिभुवनं चेन्द्र उपेन्द्रभुजपालितः ।
श्रिया परमया जुष्टो मुमुदे गतसाध्वसः ॥२५
ब्रह्मा शर्वः कुमारश्च भृग्वाद्या मुनयो नृप ।
पितरः सर्वभूतानि सिद्धा वैमानिकाश्च ये ॥२६
सुमहत् कर्म तद् विष्णोर्गायन्तः परमाद्भुतम् ।
धिष्ण्यानि स्वानि ते जग्मुरदितिं च शशंसिरे ॥ २७
****** ebook converter DEMO Watermarks *******
पृष्ठ 1600
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
सर्वमेतन्मयाऽऽख्यातं भवतः कुलनन्दन ।
उरुक्रमस्य चरितं श्रोतॄणामघमोचनम् ॥२८
तथापि अनन्त! जब आप स्वयं कह रहे हैं, तब मैं आपकी आज्ञाका अवश्य पालन करूँगा । मनुष्यके लिये सबसे बड़ा कल्याणका साधन यही है कि वह आपकी आज्ञाका पालन करे ॥१७ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं – भगवान् शुक्राचार्यने भगवान् श्रीहरिकी यह आज्ञा स्वीकार करके दूसरे ब्रह्मर्षियोंके साथ, बलिके यज्ञमें जो कमी रह गयी थी, उसे पूर्ण किया ॥१८ ॥
परीक्षित्! इस प्रकार वामनभगवान्ने बलिसे पृथ्वीकी भिक्षा माँगकर अपने बड़े भाई इन्द्रको स्वर्गका राज्य दिया, जिसे उनके शत्रुओंने छीन लिया था ॥ १ ९ ॥ इसके बाद प्रजापतियोंके स्वामी ब्रह्माजीने देवर्षि, पितर, मनु, दक्ष, भृगु, अंगिरा, सनत्कुमार और शंकरजीके साथ कश्यप एवं अदितिकी प्रसन्नताके लिये तथा सम्पूर्ण प्राणियोंके अभ्युदयके लिये समस्त लोक और लोकपालोंके स्वामीके पदपर वामनभगवान्का अभिषेक कर दिया ॥२०-२१ ॥ परीक्षित्! वेद, समस्त देवता, धर्म, यश, लक्ष्मी, मंगल, व्रत, स्वर्ग और अपवर्ग — सबके रक्षकके रूपमें सबके परम कल्याणके लिये सर्वशक्तिमान् वामन - भगवान्को उन्होंने उपेन्द्रका पद दिया । उस समय सभी प्राणियोंको अत्यन्त आनन्द हुआ ॥ २२-२३ ॥ इसके बाद ब्रह्माजीकी अनुमतिसे लोकपालोंके साथ देवराज इन्द्रने वामनभगवान्को सबसे आगे विमानपर बैठाया और अपने साथ स्वर्ग लिवा ले गये || २४ || इन्द्रको एक तो त्रिभुवनका राज्य मिल गया और दूसरे, वामनभगवान्के करकमलोंकी छत्रछाया! सर्वश्रेष्ठ ऐश्वर्यलक्ष्मी उनकी सेवा करने लगी और वे निर्भय होकर आनन्दोत्सव मनाने लगे || २५ || ब्रह्मा, शंकर, सनत्कुमार, भृगु आदि मुनि, पितर, सारे भूत, सिद्ध और विमानारोही देवगण भगवान्के इस परम अद्भुत एवं अत्यन्त महान् कर्मका गान करते हुए अपने - अपने लोकको चले गये और सबने अदितिकी भी बड़ी प्रशंसा की ॥ २६ - २७ ॥ परीक्षित्! तुम्हें मैंने भगवान्की यह सब लीला सुनायी । इससे सुननेवालोंके सारे पाप छूट जाते हैं ॥२८ ॥
पारं महिम्न उरु विक्रमतो गृणानो यः पार्थिवानि विममे स रजांसि मर्त्यः । किं जायमान उत जात उपैति मर्त्य इत्याह मन्त्रदृगृषिः पुरुषस्य यस्य ॥२९
य इदं देवदेवस्य हरेरद्भुतकर्मणः ।
अवतारानुचरितं शृण्वन् याति परां गतिम् ॥३०
क्रियमाणे कर्मणीदं दैवे पित्र्येऽथ मानुषे । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******