श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 191–200
श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 191–200
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सास्वतन्त्रा न कल्पाऽऽसीद्योगक्षेमं ममेच्छती ।
ईशस्य हि वशे लोको योषा दारुमयी यथा ॥७
अहं च तद्ब्रह्मकुले ऊषिवांस्तदपेक्षया ।
दिग्देशकालाव्युत्पन्नो बालकः पञ्चहायनः ॥८
एकदा निर्गतां गेहाद्दुहन्तीं निशि गां पथि ।
सर्पोऽदशत्पदा स्पृष्टः कृपणां कालचोदितः ॥९
तदा तदहमीशस्य भक्तानां शमभीप्सतः ।
अनुग्रहं मन्यमानः प्रातिष्ठं दिशमुत्तराम् ॥१०
स्फीताञ्जनपदांस्तत्र पुरग्रामव्रजाकरान् ।
खेटखर्वटवाटीश्च वनान्युपवनानि च ॥ ११
चित्रधातुविचित्राद्रीनिभभग्नभुजद्रुमान् ।
जलाशयाञ्छिवजलान्नलिनीः सुरसेविताः ॥ १२
चित्रस्वनैः पत्ररथैर्विभ्रमद्भ्रमरश्रियः ।
नलवेणुशरस्तम्बकुशकीचकगह्वरम् ॥१३
एक एवातियातोऽहमद्राक्षं विपिनं महत् ।
घोरं प्रतिभयाकारं व्यालोलूकशिवाजिरम् ॥ १४
मैं अपनी माँका इकलौता लड़का था । एक तो वह स्त्री थी, दूसरे मूढ़ और तीसरे दासी थी । मुझे भी उसके सिवा और कोई सहारा नहीं था । उसने अपनेको मेरे स्नेहपाशसे जकड़ रखा था ॥६ ॥ वह मेरे योगक्षेमकी चिन्ता तो बहुत करती थी, परंतु पराधीन होनेके कारण
कुछ कर नहीं पाती थी । जैसे कठपुतली नचानेवालेकी इच्छाके अनुसार ही नाचती है, वैसे ही यह सारा संसार ईश्वरके अधीन है ॥ ७ ॥
मैं भी अपनी माँके स्नेहबन्धनमें बँधकर उस ब्राह्मण बस्तीमें ही रहा । मेरी अवस्था केवल पाँच वर्षकी थी; मुझे दिशा, देश और कालके सम्बन्धमें कुछ भी ज्ञान नहीं था ॥८ ॥
एक दिनकी बात है, मेरी माँ गौ दुहनेके लिये रातके समय घरसे बाहर निकली । रास्तेमें उसके पैरसे साँप छू गया, उसने उस बेचारीको डस लिया । उस साँपका क्या दोष, कालकी ऐसी ही प्रेरणा थी ॥९ ॥ मैंने समझा, भक्तोंका मंगल चाहनेवाले भगवान्का यह भी एक अनुग्रह ही
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है । इसके बाद मैं उत्तर दिशाकी ओर चल पड़ा ॥१० ॥
उस ओर मार्गमें मुझे अनेकों धन - धान्यसे सम्पन्न देश, नगर, गाँव, अहीरोंकी चलती-फिरती बस्तियाँ, खानें, खेड़े, नदी और पर्वतोंके तटवर्ती पड़ाव, वाटिकाएँ, वन - उपवन और रंग - बिरंगी धातुओंसे युक्त विचित्र पर्वत दिखायी पड़े । कहीं - कहीं जंगली वृक्ष थे, जिनकी बड़ी - बड़ी शाखाएँ हाथियोंने तोड़ डाली थीं । शीतल जलसे भरे हुए जलाशय थे, जिनमें देवताओंके काममें आनेवाले कमल थे; उनपर पक्षी तरह - तरहकी बोली बोल रहे थे और भौरे मँडरा रहे थे । यह सब देखता हुआ मैं आगे बढ़ा । मैं अकेला ही था । इतना लम्बा मार्ग तै करनेपर मैंने एक घोर गहन जंगल देखा । उसमें नरकट, बाँस, सेंठा, कुश, कीचक आदि खड़े थे । उसकी लम्बाई - चौड़ाई भी बहुत थी और वह साँप, उल्लू, स्यार आदि भयंकर जीवोंका घर हो रहा था । देखनेमें बड़ा भयावना लगता था ॥११-१४ ॥
परिश्रान्तेन्द्रियात्माहं तृट्परीतो बुभुक्षितः ।
स्नात्वा पीत्वा ह्रदे नद्या उपस्पृष्टो गतश्रमः ॥१५
तस्मिन्निर्मनुजेऽरण्ये पिप्पलोपस्थ आस्थितः १ ।
आत्मनाऽऽत्मानमात्मस्थं यथाश्रुतमचिन्तयम् ॥ १६
ध्यायतश्चरणाम्भोजं भावनिर्जितचेतसा ।
औत्कण्ठ्याश्रुकलाक्षस्य हृद्यासीन्मे शनैर्हरिः ॥१७
प्रेमातिभरनिर्भिन्नपुलकाङ्गोऽतिनिर्वृतः ।
आनन्दसम्प्लवे लीनो नापश्यमुभयं मुने ॥१८
रूपं भगवतो यत्तन्मनःकान्तं शुचापहम् ।
अपश्यन् सहसोत्तस्थे वैक्लव्याद्दुर्मना इव ॥१९
दिदृक्षुस्तदहं भूयः प्रणिधाय मनो हृदि ।
वीक्षमाणोऽपि नापश्यमवितृप्त इवातुरः ॥२०
एवं यतन्तं विजने मामाहागोचरो गिराम् ।
गम्भीरश्लक्ष्णया वाचा शुचः प्रशमयन्निव ॥ २१
हन्तास्मिञ्जन्मनि भवान्मा मां द्रष्टुमिहार्हति ।
अविपक्वकषायाणां दुर्दर्शोऽहं कुयोगिनाम् ॥२२
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सकृद् यद् दर्शितं रूपमेतत्कामाय तेऽनघ ।
मत्कामः शनकैः साधुः सर्वान्मुञ्चति हृच्छयान् ॥२३
चलते - चलते मेरा शरीर और इन्द्रियाँ शिथिल हो गयीं । मुझे बड़े जोरकी प्यास लगी, भूखा तो था ही । वहाँ एक नदी मिली । उसके कुण्डमें मैंने स्नान, जलपान और आचमन किया । इससे मेरी थकावट मिट गयी ॥ १५ ॥ उस विजन वनमें एक पीपलके नीचे आसन
लगाकर मैं बैठ गया । उन महात्माओंसे जैसा मैंने सुना था, हृदयमें रहनेवाले परमात्माके उसी स्वरूपका मैं मन - ही - मन ध्यान करने लगा ॥ १६ ॥ भक्तिभावसे वशीकृत चित्तद्वारा
भगवान्के चरण - कमलोंका ध्यान करते ही भगवत् - प्राप्तिकी उत्कट लालसासे मेरे नेत्रोंमें आँसू छलछला आये और हृदयमें धीरे - धीरे भगवान् प्रकट हो गये ॥१७ ॥ व्यासजी! उस
समय प्रेमभावके अत्यन्त उद्रेक से मेरा रोम - रोम पुलकित हो उठा । हृदय अत्यन्त शान्त और शीतल हो गया । उस आनन्दकी बाढ़में मैं ऐसा डूब गया कि मुझे अपना और ध्येय वस्तुका तनिक भी भान न रहा ॥ १८ ॥ भगवान्का वह अनिर्वचनीय रूप समस्त शोकोंका नाश
करनेवाला और मनके लिये अत्यन्त लुभावना था । सहसा उसे न देख मैं बहुत ही विकल हो गया और अनमना - सा होकर आसनसे उठ खड़ा हुआ ॥१९ ॥
मैंने उस स्वरूपका दर्शन फिर करना चाहा; किन्तु मनको हृदयमें समाहित करके बार-बार दर्शनकी चेष्टा करनेपर भी मैं उसे नहीं देख सका । मैं अतृप्तके समान आतुर हो उठा ॥२० ॥ इस प्रकार निर्जन वनमें मुझे प्रयत्न करते देख स्वयं भगवान्ने, जो वाणीके
विषय नहीं हैं, बड़ी गंभीर और मधुर वाणीसे मेरे शोकको शान्त करते हुए - से कहा ॥२१ ॥
‘ खेद है कि इस जन्ममें तुम मेरा दर्शन नहीं कर सकोगे । जिनकी वासनाएँ पूर्णतया शान्त नहीं हो गयीं हैं, उन अधकचरे योगियोंको मेरा दर्शन अत्यन्त दुर्लभ है ॥२२ ॥ निष्पाप बालक!
तुम्हारे हृदयमें मुझे प्राप्त करनेकी लालसा जाग्रत् करनेके लिये ही मैंने एक बार तुम्हें अपने रूपकी झलक दिखायी है । मुझे प्राप्त करनेकी आकांक्षासे युक्त साधक धीरे - धीरे हृदयकी सम्पूर्ण वासनाओंका भलीभाँति त्याग कर देता है ॥२३ ॥ अल्पकालीन संतसेवासे ही तुम्हारी
चित्तवृत्ति मुझमें स्थिर हो गयी है । अब तुम इस प्राकृतमलिन शरीरको छोड़कर मेरे पार्षद हो जाओगे ॥२४ ॥ मुझे प्राप्त करनेका तुम्हारा यह दृढ़ निश्चय कभी किसी प्रकार नहीं टूटेगा ।
समस्त सृष्टिका प्रलय हो जानेपर भी मेरी कृपासे तुम्हें मेरी स्मृति बनी रहेगी ' ॥ २५ ॥
आकाशके समान अव्यक्त सर्वशक्तिमान् महान् परमात्मा इतना कहकर चुप हो रहे । उनकी इस कृपाका अनुभव करके मैंने उन श्रेष्ठोंसे भी श्रेष्ठतर भगवान्को सिर झुकाकर प्रणाम किया ॥२६ ॥ तभीसे मैं लज्जा - संकोच छोड़कर भगवान्के अत्यन्त रहस्यमय और मंगलमय
मधुर नामों और लीलाओंका कीर्तन और स्मरण करने लगा । स्पृहा और मद - मत्सर मेरे हृदयसे पहले ही निवृत्त हो चुके थे, अब मैं आनन्दसे कालकी प्रतीक्षा करता हुआ पृथ्वीपर विचरने लगा ॥२७ ॥
सत्सेवयादीर्घया ते जाता मयिदृढामतिः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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हित्वावद्यमिमं लोकं गन्ता मज्जनतामसि ॥२४
मतिर्मयि निबद्धेयं न विपद्येत कर्हिचित् ।
प्रजासर्गनिरोधेऽपि स्मृतिश्च मदनुग्रहात् ॥२५
एतावदुक्त्वोपरराम तन्महद् भूतं नभोलिङ्गमलिङ्गमीश्वरम् । अहं च तस्मै महतां महीयसे शीर्णावनामं विदधेऽनुकम्पितः ॥ २६ नामान्यनन्तस्य हतत्रपः पठन् गुह्यानि भद्राणि कृतानि च स्मरन् । गां पर्यटंस्तुष्टमना गतस्पृहः कालं प्रतीक्षन् विमदो ' विमत्सरः ॥२७
एवं कृष्णमतेर्ब्रह्मन्नसक्तस्यामलात्मनः ।
कालः प्रादुरभूत्काले तडित्सौदामनी २ यथा ॥ २८
प्रयुज्यामाने मयि तां शुद्धां भागवतीं तनुम् ।
आरब्धकर्मनिर्वाणो न्यपतत् पाञ्चभौतिकः ॥२९
कल्पान्त इदमादाय शयानेऽम्भस्युदन्वतः ।
शिशयिषोरनुप्राणं विविशेऽन्तरहं विभोः ॥३०
सहस्रयुगपर्यन्ते उत्थायेदं सिसृक्षतः ।
मरीचिमिश्रा ऋषयः प्राणेभ्योऽहं च जज्ञिरे ॥ ३१
अन्तर्बहिश्च लोकांस्त्रीन् पर्येम्यस्कन्दितव्रतः ।
अनुग्रहान्महाविष्णोरविघातगतिः क्वचित् ॥३२
व्यासजी! इस प्रकार भगवान्की कृपासे मेरा हृदय शुद्ध हो गया, आसक्ति मिट गयी और मैं श्रीकृष्णपरायण हो गया । कुछ समय बाद, जैसे एकाएक बिजली कौंध जाती है, वैसे ही अपने समयपर मेरी मृत्यु आ गयी || २८ || मुझे शुद्ध भगवत्पार्षद - शरीर प्राप्त होनेका अवसर आनेपर प्रारब्धकर्म समाप्त हो जानेके कारण पांचभौतिक शरीर नष्ट हो गया ॥ २ ९ ॥ कल्पके अन्तमें जिस समय भगवान् नारायण एकार्णव ( प्रलय कालीन समुद्र ) - के जलमें शयन करते हैं, उस समय उनके हृदयमें शयन करनेकी इच्छासे इस सारी सृष्टिको समेटकर ब्रह्माजी जब प्रवेश करने लगे, तब उनके श्वासके साथ मैं भी उनके हृदयमें प्रवेश कर गया ॥३० ॥ एक सहस्र चतुर्युगी बीत जानेपर जब ब्रह्मा जगे और उन्होंने सृष्टि करनेकी
इच्छा की, तब उनकी इन्द्रियोंसे मरीचि आदि ऋषियोंके साथ मैं भी प्रकट हो गया || ३१ ॥ तभीसे मैं भगवान्की कृपासे वैकुण्ठादिमें और तीनों लोकोंमें बाहर और भीतर बिना रोक-****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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टोक विचरण किया करता हूँ । मेरे जीवनका व्रत भगवद्भजन अखण्डरूपसे चलता रहता है ॥३२ ॥ भगवान्की दी हुई इस स्वरब्रह्म से * विभूषित वीणापर तान छेड़कर मैं उनकी
लीलाओंका गान करता हुआ सारे संसारमें विचरता हूँ || ३३ || जब मैं उनकी लीलाओंका गान करने लगता हूँ, तब वे प्रभु, जिनके चरणकमल समस्त तीर्थोंके उद्गमस्थान हैं और जिनका यशोगान मुझे बहुत ही प्रिय लगता है, बुलाये हुएकी भाँति तुरन्त मेरे हृदयमें आकर दर्शन दे देते हैं ॥३४ ॥ जिन लोगोंका चित्त निरन्तर विषयभोगोंकी कामनासे आतुर हो रहा
है, उनके लिये भगवान्की लीलाओंका कीर्तन संसारसागरसे पार जानेका जहाज है, यह मेरा अपना अनुभव है ॥ ३५ ॥ काम और लोभकी चोटसे बार - बार घायल हुआ हृदय
श्रीकृष्णसेवासे जैसी प्रत्यक्ष शान्तिका अनुभव करता है, यम- - नियम आदि योगमार्गोंसे वैसी शान्ति नहीं मिल सकती ॥३६ ॥ व्यासजी! आप निष्पाप हैं । आपने मुझसे जो कुछ पूछा था,
वह सब अपने जन्म और साधनाका रहस्य तथा आपकी आत्मतुष्टिका उपाय मैंने बतला दिया ॥३७ ॥
देवदत्तामिमां वीणां स्वरब्रह्मविभूषिताम् ।
मूर्च्छयित्वा हरिकथां गायमानश्चराम्यहम् ॥३३
प्रगायतः स्ववीर्याणि तीर्थपादः प्रियश्रवाः ।
आहूत इव मे शीघ्रं दर्शनं याति चेतसि ॥३४
एतद्ध्यातुरचित्तानां मात्रास्पर्शेच्छया मुहुः ।
भवसिन्धुप्लवो दृष्टो हरिचर्यानुवर्णनम् ॥३५
यमादिभिर्योगपथैः कामलोभहतो मुहुः ।
मुकुन्दसेवया यद्वत्तथाऽऽत्माद्धा न शाम्यति ॥ ३६
सर्वं तदिदमाख्यातं यत्पृष्टोऽहं त्वयानघ ।
जन्मकर्मरहस्यं मे भवतश्चात्मतोषणम् ॥३७
सूत उवाच
एवं सम्भाष्य भगवान्नारदो वासवीसुतम् ।
आमन्त्र्य वीणां रणयन् ययौ यादृच्छिको मुनिः ॥३८
अहो देवर्षिर्धन्योऽयं यत्कीर्तिं शार्ङ्गधन्वनः ।
गायन्माद्यन्निदं तन्त्र्या रमयत्यातुरं जगत् ॥३९
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श्रीसूतजी कहते हैं - शौनकादि ऋषियो! देवर्षि नारदने व्यासजीसे इस प्रकार कहकर जानेकी अनुमति ली और वीणा बजाते हुए स्वच्छन्द विचरण करनेके लिये वे चल पड़े ॥३८ ॥ अहा! ये देवर्षि नारद धन्य हैं; क्योंकि ये शार्ङ्गपाणि भगवान्की कीर्तिको अपनी
वीणापर गा - गाकर स्वयं तो आनन्दमग्न होते ही हैं, साथ - साथ इस त्रितापतप्त जगत्को भी आनन्दित करते रहते हैं ॥ ३ ९ ॥ इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे व्यासनारदसंवादे षष्ठोऽध्यायः ॥६ ॥
१. प्रा ० पा ० — खेटान् । २. प्रा ० पा ० – रत्नरेणु । ३. प्रा ० पा ० - एवाभि ० । १. प्रा ० पा ० — आश्रितः । २. प्रा ० पा ० — आत्मनाऽऽत्मस्थमात्मानं । १. प्रा ० पा ० — प्रतीक्षन्नमदो । २. प्रा ० पा ० – विद्युत् । ३. प्रा ० पा ० – अनुग्रहादहं विष्णो । १. प्रा ० पा ० — यः कीर्तिं । * षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पञ्चम, धैवत और निषाद् – ये सातों स्वर ब्रह्मव्यंजक होनेके नाते ही ब्रह्मरूप कहे गये हैं । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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-अथ सप्तमोऽध्यायः अश्वत्थामाद्वारा द्रौपदीके पुत्रोंका मारा जाना और अर्जुनके द्वारा अश्वत्थामाका मानमर्दन शौनक उवाच
निर्गते नारदे सूत भगवान् बादरायणः ।
श्रुतवांस्तदभिप्रेतं ततः किमकरोद्विभुः ॥ १
सूत उवाच
ब्रह्मनद्यां सरस्वत्यामाश्रमः पश्चिमे तटे ।
शम्याप्रास इति प्रोक्त ऋषीणां सत्रवर्धनः ॥२
तस्मिन् स्व आश्रमे व्यासो बदरीषण्डमण्डिते ।
आसीनोऽप उपस्पृश्य प्रणिदध्यौ मनः स्वयम् ॥३
भक्तियोगेन मनसि सम्यक् प्रणिहितेऽमले ।
अपश्यत्पुरुषं पूर्वं मायां च तदपाश्रयाम् ॥४
यया सम्मोहितो जीव आत्मानं त्रिगुणात्मकम् ।
परोऽपि मनुतेऽनर्थं तत्कृतं चाभिपद्यते ॥५
अनर्थोपशमं साक्षाद्भक्तियोगमधोक्षजे ।
लोकस्याजानतो विद्वांश्चक्रे सात्वतसंहिताम् ॥६
यस्यां वै श्रूयमाणायां कृष्णे परमपूरुषे ।
भक्तिरुत्पद्यते पुंसः शोकमोहभयापहा ॥७
स संहितां भागवतीं कृत्वानुक्रम्य चात्मजम् ।
शुकमध्यापयामास निवृत्तिनिरतं मुनिः ॥८
शौनक उवाच
स वै निवृत्तिनिरतः सर्वत्रोपेक्षको मुनिः ।
कस्य वा बृहतीमेतामात्मारामः समभ्यसत् ॥९
श्रीशौनकजीने पूछा – सूतजी! सर्वज्ञ एवं सर्वशक्तिमान् व्यासभगवान्ने ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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अभिप्राय सुन लिया । फिर उनके चले जानेपर उन्होंने क्या किया? ॥ १ ॥
श्रीसूतजीने कहा — ब्रह्मनदी सरस्वतीके पश्चिम तटपर शम्याप्रास नामका एक आश्रम है । वहाँ ऋषियोंके यज्ञ चलते ही रहते हैं ॥२ ॥ वहीं व्यासजीका अपना आश्रम है । उसके
चारों ओर बेरका सुन्दर वन है । उस आश्रममें बैठकर उन्होंने आचमन किया और स्वयं अपने मनको समाहित किया ॥३ ॥ उन्होंने भक्तियोगके द्वारा अपने मनको पूर्णतया एकाग्र और
निर्मल करके आदिपुरुष परमात्मा और उनके आश्रयसे रहनेवाली मायाको देखा ॥४ ॥ इसी
मायासे मोहित होकर यह जीव तीनों गुणोंसे अतीत होनेपर भी अपनेको त्रिगुणात्मक मान लेता है और इस मान्यताके कारण होनेवाले अनर्थोंको भोगता है ॥५ ॥ इन अनर्थोंकी
शान्तिका साक्षात् साधन है - केवल भगवान्का भक्ति - योग । परन्तु संसारके लोग इस बातको नहीं जानते । यही समझकर उन्होंने इस परमहंसोंकी संहिता श्रीमद्भागवतकी रचना की ॥६ ॥
इसके श्रवणमात्रसे पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णके प्रति परम प्रेममयी भक्ति हो जाती है, जिससे जीवके शोक, मोह और भय नष्ट हो जाते हैं ॥७ ॥ उन्होंने इस भागवत - संहिताका
निर्माण और पुनरावृत्ति करके इसे अपने निवृत्तिपरायण पुत्र श्रीशुकदेवजीको पढ़ाया ॥८ ॥
श्रीशौनकजीने पूछा – श्रीशुकदेवजी तो अत्यन्त निवृत्तिपरायण हैं, उन्हें किसी भी वस्तुकी अपेक्षा नहीं है । वे सदा आत्मामें ही रमण करते हैं । फिर उन्होंने किसलिये इस विशाल ग्रन्थका अध्ययन किया? ॥ ९ ॥
सूत उवाच
आत्मारामाश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे ।
कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरिः ॥१०
हरेर्गुणाक्षिप्तमतिर्भगवान् बादरायणिः ।
अध्यगान्महदाख्यानं नित्यं विष्णुजनप्रियः ॥ ११
परीक्षितोऽथ राजर्षेर्जन्मकर्मविलापनम् ।
संस्थां च पाण्डुपुत्राणां वक्ष्ये कृष्णकथोदयम् ॥ १२
यदा मृधे कौरवसृञ्जयानां
वीरेष्वथो वीरगतिं गतेषु ।
वृकोदराविद्धगदाभिमर्श-भग्नोरुदण्डे धृतराष्ट्रपुत्रे ॥१३
भर्तुः प्रियं द्रौणिरिति स्म पश्यन् कृष्णासुतानां स्वपतां शिरांसि । उपाहरद् विप्रियमेव तस्य जुगुप्सितं कर्म विगर्हयन्ति ॥१४ माता शिशूनां निधनं सुतानां ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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निशम्य घोरं परितप्यमाना । तदारुदद्वाष्पकलाकुलाक्षी तां सान्त्वयन्नाह किरीटमाली ॥१५ तदा शुचस्ते प्रमृजामि भद्रे यद्ब्रह्मबन्धोः शिर आततायिनः । गाण्डीवमुक्तैर्विशिखैरुपाहरे त्वाऽऽक्रम्य यत्स्नास्यसि दग्धपुत्रा ॥१६ इति प्रियां वल्गुविचित्रजल्पैः स सान्त्वयित्वाच्युतमित्रसूतः । अन्वाद्रवद्दंशित उग्रधन्वा कपिध्वजो गुरुपुत्रं रथेन ॥१७ श्रीसूतजीने कहा — जो लोग ज्ञानी हैं, जिनकी अविद्याकी गाँठ खुल गयी है और जो सदा आत्मामें ही रमण करनेवाले हैं, वे भी भगवान्की हेतुरहित भक्ति किया करते हैं; क्योंकि भगवान्के गुण ही ऐसे मधुर हैं, जो सबको अपनी ओर खींच लेते हैं ॥१० ॥ फिर
श्रीशुकदेवजी तो भगवान्के भक्तोंके अत्यन्त प्रिय और स्वयं भगवान् वेदव्यासके पुत्र हैं । भगवान्के गुणोंने उनके हृदयको अपनी ओर खींच लिया और उन्होंने उससे विवश होकर ही इस विशाल ग्रन्थका अध्ययन किया ॥११ ॥
शौनकजी! अब मैं राजर्षि परीक्षित्के जन्म, कर्म और मोक्षकी तथा पाण्डवोंके स्वर्गारोहणकी कथा कहता हूँ; क्योंकि इन्हींसे भगवान् श्रीकृष्णकी अनेकों कथाओंका उदय होता है ॥१२ ॥ जिस समय महाभारतयुद्धमें कौरव और पाण्डव दोनों पक्षोंके बहुत - से वीर
वीरगतिको प्राप्त हो चुके थे और भीमसेनकी गदाके प्रहारसे दुर्योधनकी जाँघ टूट चुकी थी, तब अश्वत्थामाने अपने स्वामी दुर्योधनका प्रिय कार्य समझकर द्रौपदीके सोते हुए पुत्रोंके सिर काटकर उसे भेंट किये, यह घटना दुर्योधनको भी अप्रिय ही लगी; क्योंकि ऐसे नीच कर्मकी सभी निन्दा करते हैं ॥१३-१४ ॥ उन बालकोंकी माता द्रौपदी अपने पुत्रोंका निधन सुनकर अत्यन्त दुःखी हो गयी । उसकी आँखोंमें आँसू छलछला आये - वह रोने लगी । अर्जुनने उसे सान्त्वना देते हुए कहा ॥१५ ॥ ' कल्याणि! मैं तुम्हारे आँसू तब पोहूँगा, जब उस आततायी *
ब्राह्मणाधमका सिर गाण्डीव धनुषके बाणोंसे काटकर तुम्हें भेंट करूँगा और पुत्रोंकी अन्त्येष्टि क्रियाके बाद तुम उसपर पैर रखकर स्नान करोगी ' ॥ १६ ॥ अर्जुनने इन मीठी और
विचित्र बातोंसे द्रौपदीको सान्त्वना दी और अपने मित्र भगवान् श्रीकृष्णकी सलाहसे उन्हें सारथि बनाकर कवच धारणकर और अपने भयानक गाण्डीव धनुषको लेकर वे रथपर सवार हुए तथा गुरुपुत्र अश्वत्थामाके पीछे दौड़ पड़े ॥१७ ॥
तमापतन्तं स विलक्ष्य दूरात् कुमारहोद्विग्नमना रथेन । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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पराद्रवत्प्राणपरीप्सुरुर्व्यां यावद्गमं रुद्रभयाद्यथार्कः ॥१८
यदाशरणमात्मानमैक्षत श्रान्तवाजिनम् ।
अस्त्रं ब्रह्मशिरो मेने आत्मत्राणं द्विजात्मजः ॥१९
अथोपस्पृश्य सलिलं संदधे तत्समाहितः ।
अजानन्नुपसंहारं प्राणकृच्छ्र उपस्थिते ॥२०
ततः प्रादुष्कृतं तेजः प्रचण्डं सर्वतोदिशम् ।
प्राणापदमभिप्रेक्ष्य विष्णुं जिष्णुरुवाच ह ॥२१
अर्जुन उवाच
कृष्ण कृष्ण महाबाहो ' भक्तानामभयङ्कर ।
त्वमेको दह्यमानानामपवर्गोऽसि संसृतेः ॥२२
त्वमाद्यः पुरुषः साक्षादीश्वरः प्रकृतेः परः ।
मायां व्युदस्य चिच्छक्त्या कैवल्ये स्थित आत्मनि ॥२३
स एव जीवलोकस्य मायामोहितचेतसः ।
विधत्से स्वेन वीर्येण श्रेयो धर्मादिलक्षणम् ॥ २४
तथायं चावतारस्ते भुवो भारजिहीर्षया ।
स्वानां? चानन्यभावानामनुध्यानाय चासकृत् ॥२५
किमिदं स्वित्कुतो वेति देवदेव न वेद्भ्यहम् ।
सर्वतोमुखमायाति तेजः परमदारुणम् ॥२६
श्रीभगवानुवाच
वेत्थेदं द्रोणपुत्रस्य ब्राह्ममस्त्रं प्रदर्शितम् ।
नैवासौ वेद संहारं प्राणबाध उपस्थिते ॥२७
बच्चोंकी हत्यासे अश्वत्थामाका भी मन उद्विग्न हो गया था । जब उसने दूरसे ही देखा कि अर्जुन मेरी ओर झपटे हुए आ रहे हैं, तब वह अपने प्राणोंकी रक्षाके लिये पृथ्वीपर जहाँतक भाग सकता था, रुद्रसे भयभीत सूर्यकी * भाँति भागता रहा ॥१८ ॥ जब उसने देखा
कि मेरे रथके घोड़े थक गये हैं और मैं बिलकुल अकेला हूँ, तब उसने अपनेको बचानेका एकमात्र साधन ब्रह्मास्त्र ही समझा ॥१९ ॥ यद्यपि उसे ब्रह्मास्त्रको लौटानेकी विधि मालूम न
थी, फिर भी प्राणसंकट देखकर उसने आचमन किया और ध्यानस्थ होकर ब्रह्मास्त्रका ****** ebook converter DEMO Watermarks *******