श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 201–210

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 201–210

पृष्ठ 201

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सन्धान किया ॥२० ॥ उस अस्त्रसे सब दिशाओंमें एक बड़ा प्रचण्ड तेज फैल गया । अर्जुनने

देखा कि अब तो मेरे प्राणोंपर ही आ बनी है, तब उन्होंने श्रीकृष्णसे प्रार्थना की ॥२१ ॥

अर्जुनने कहा— श्रीकृष्ण! तुम सच्चिदानन्द - स्वरूप परमात्मा हो । तुम्हारी शक्ति अनन्त है । तुम्हीं भक्तोंको अभय देनेवाले हो । जो संसारकी धधकती हुई आगमें जल रहे हैं, उन जीवोंको उससे उबारनेवाले एकमात्र तुम्हीं हो || २२ || तुम प्रकृतिसे परे रहनेवाले आदिपुरुष साक्षात् परमेश्वर हो । अपनी चित् - शक्ति ( स्वरूप - शक्ति ) - से बहिरंग एवं त्रिगुणमयी मायाको दूर भगाकर अपने अद्वितीय स्वरूपमें स्थित हो || २३ || वही तुम अपने प्रभावसे माया-मोहित जीवोंके लिये धर्मादिरूप कल्याणका विधान करते हो || २४ || तुम्हारा यह अवतार पृथ्वीका भार हरण करनेके लिये और तुम्हारे अनन्य प्रेमी भक्तजनोंके निरन्तर स्मरण - ध्यान करनेके लिये है ॥२५ ॥ स्वयम्प्रकाशस्वरूप श्रीकृष्ण! यह भयंकर तेज सब ओरसे मेरी ओर

आ रहा है । यह क्या है, कहाँसे, क्यों आ रहा है - इसका मुझे बिलकुल पता नहीं है! ॥२६ ॥

भगवान्ने कहा — अर्जुन! यह अश्वत्थामाका चलाया हुआ ब्रह्मास्त्र है । यह बात समझ लो कि प्राणसंकट उपस्थित होनेसे उसने इसका प्रयोग तो कर दिया है, परन्तु वह इस अस्त्रको लौटाना नहीं जानता ॥ २७ ॥ किसी भी दूसरे अस्त्रमें इसको दबा देनेकी शक्ति नहीं

है । तुम शस्त्रास्त्रविद्याको भलीभाँति जानते ही हो, ब्रह्मास्त्रके तेजसे ही इस ब्रह्मास्त्रकी प्रचण्डआगको ' बुझा दो ॥ २८ ॥

न ह्यस्यान्यतमं किञ्चिदस्त्रं प्रत्यवकर्शनम् ।

जह्यस्त्रतेज उन्नद्धमस्त्रज्ञो ह्यस्त्रतेजसा ॥२८

सूत उवाच

श्रुत्वा भगवता प्रोक्तं फाल्गुनः परवीरहा ।

स्पृष्ट्वापस्तं परिक्रम्य ब्राह्मं ब्राह्माय संदधे ॥२९

संहत्यान्योन्यमुभयोस्तेजसी शरसंवृते ।

आवृत्य रोदसी खं च ववृधातेऽर्कवह्निवत् ॥३०

दृष्ट्वास्त्रतेजस्तु तयोस्त्रीँल्लोकान् प्रदहन्महत् ।

दह्यमानाः प्रजाः सर्वाः सांवर्तकममंसत ॥३१

प्रजोपप्लवमालक्ष्य लोकव्यतिकरं च तम् ।

मतं च वासुदेवस्य संजहारार्जुनो द्वयम् ॥३२

तत आसाद्य तरसा दारुणं गौतमीसुतम् । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 202

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बबन्धामर्षताम्राक्षः पशुं रशनया यथा ॥३३

शिबिराय निनीषन्तं दाम्ना बद्ध्वा रिपुं बलात् ।

प्राहार्जुनं प्रकुपितो भगवानम्बुजेक्षणः ॥ ३४

मैनं पार्थार्हसि त्रातुं ब्रह्मबन्धुमिमं जहि ।

योऽसावनागसः सुप्तानवधीन्निशि बालकान् ॥३५

मत्तं प्रमत्तमुन्मत्तं सुप्तं बालं स्त्रियं जडम् ।

प्रपन्नं विरथं भीतं न रिपुं हन्ति धर्मवित् ॥३६

स्वप्राणान् यः परप्राणैः प्रपुष्णात्यघृणः खलः ।

तद्वधस्तस्य हि श्रेयो यद्दोषाद्यात्यधः पुमान् ॥३७

प्रतिश्रुतं च भवता पाञ्चाल्यै शृण्वतो मम ।

आहरिष्ये शिरस्तस्य यस्ते मानिनि पुत्रहा ॥३८

सूतजी कहते हैं - अर्जुन विपक्षी वीरोंको मारनेमें बड़े प्रवीण थे । भगवान्‌की बात सुनकर उन्होंने आचमन किया और भगवान्‌की परिक्रमा करके ब्रह्मास्त्रके निवारणके लिये ब्रह्मास्त्रका ही सन्धान किया ॥२९ ॥ बाणोंसे वेष्टित उन दोनों ब्रह्मास्त्रोंके तेज प्रलयकालीन

सूर्य एवं अग्निके समान आपसमें टकराकर सारे आकाश और दिशाओंमें फैल गये और बढ़ने लगे ॥३० ॥ तीनों लोकोंको जलानेवाली उन दोनों अस्त्रोंकी बढ़ी हुई लपटोंसे प्रजा जलने

लगी और उसे देखकर सबने यही समझा कि यह प्रलयकालकी सांवर्तक अग्नि है ॥ ३१ ॥

उस आगसे प्रजाका और लोकोंका नाश होते देखकर भगवान्‌की अनुमतिसे अर्जुनने उन दोनों को ही लौटा लिया || ३२ || अर्जुनकी आँखें क्रोधसे लाल - लाल हो रही थीं । उन्होंने झपटकर उस क्रूर अश्वत्थामाको पकड़ लिया और जैसे कोई रस्सीसे पशुको बाँध ले, वैसे ही बाँध लिया ॥३३ ॥ अश्वत्थामाको बलपूर्वक बाँधकर अर्जुनने जब शिविरकी ओर ले जाना

चाहा, तब उनसे कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णने कुपित होकर कहा - ॥३४ ॥ ' अर्जुन! इस

ब्राह्मणाधमको छोड़ना ठीक नहीं है, इसको तो मार ही डालो । इसने रातमें सोये हुए निरपराध बालकोंकी हत्या की है ॥ ३५ ॥ धर्मवेत्ता पुरुष असावधान, मतवाले, पागल, सोये हुए,

बालक, स्त्री, विवेकज्ञानशून्य, शरणागत, रथहीन और भयभीत शत्रुको कभी नहीं मारते ॥३६ ॥ परन्तु जो दुष्ट और क्रूर पुरुष दूसरोंको मारकर अपने प्राणोंका पोषण करता

है, उसका तो वध ही उसके लिये कल्याणकारी है; क्योंकि वैसी आदतको लेकर यदि वह जीता है तो और भी पाप करता है और उन पापोंके कारण नरकगामी होता है ॥ ३७ ॥ फिर

मेरे सामने ही तुमने द्रौपदीसे प्रतिज्ञा की थी कि ' मानवती! जिसने तुम्हारे पुत्रोंका वध किया ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 203

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है, उसका सिर मैं उतार लाऊँगा ' ॥ ३८ ॥ इस पापी कुलांगार आततायीने तुम्हारे पुत्रोंका वध

किया है और अपने स्वामी दुर्योधनको भी दुःख पहुँचाया है । इसलिये अर्जुन! इसे मार ही डालो ॥३९ ॥ भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनके धर्मकी परीक्षा लेनेके लिये इस प्रकार प्रेरणा की,

परन्तु अर्जुनका हृदय महान् था । यद्यपि अश्वत्थामाने उनके पुत्रोंकी हत्या की थी, फिर भी अर्जुनके मनमें गुरुपुत्रको मारनेकी इच्छा नहीं हुई ॥ ४० ॥

तदसौ वध्यतां पाप आतताय्यात्मबन्धुहा ।

भर्तुश्च विप्रियं वीर कृतवान् कुलपांसनः ॥३९

एवं परीक्षता धर्मं पार्थः कृष्णेन चोदितः ।

नैच्छ्द्धन्तुं गुरुसुतं यद्यप्यात्महनं महान् ॥४०

अथोपेत्य स्वशिबिरं गोविन्दप्रियसारथिः ।

न्यवेदयत्तं प्रियायै शोचन्त्या आत्मजान् हतान् ॥४१

तथाऽऽहृतं पशुवत् पाशबद्ध-मवाङ्मुखं कर्मजुगुप्सितेन । निरीक्ष्य कृष्णापकृतं गुरोः सुतं वामस्वभावा कृपया ननाम च ॥४२

उवाच चासहन्त्यस्य बन्धनानयनं सती ।

मुच्यतां मुच्यतामेष ब्राह्मणो नितरां गुरुः ॥४३

सरहस्यो धनुर्वेदः सविसर्गोपसंयमः ।

अस्त्रग्रामश्च भवता शिक्षितो यदनुग्रहात् ॥४४

स एष भगवान् द्रोणः प्रजारूपेण वर्तते ।

तस्यात्मनोऽर्धं पत्न्यास्ते नान्वगाद्वीरसूः कृपी ॥४५

तद् धर्मज्ञ महाभाग भवद्भिर्गौरवं कुलम् ।

वृजिनं नार्हति प्राप्तुं पूज्यं वन्द्यमभीक्ष्णशः ॥४६

मा रोदीदस्य जननी गौतमी पतिदेवता ।

यथाहं मृतवत्साऽऽर्ता रोदिम्यश्रुमुखी मुहुः ॥४७

यैः कोपितं ब्रह्मकुलं राजन्यैरजितात्मभिः ।

तत् कुलं प्रदहत्याशु सानुबन्धं शुचार्पितम् ॥४८

-शिविरमें इसके बाद अपने मित्र और सारथि श्रीकृष्णके साथ वे अपने युद्ध-- पहुँचे । वहाँ अपने मृत पुत्रोंके लिये शोक करती हुई द्रौपदीको उसे सौंप दिया ॥४१ ॥ द्रौपदीने देखा कि

अश्वत्थामा पशुकी तरह बाँधकर लाया गया है । निन्दित कर्म करनेके कारण उसका मुख नीचे की ओर झुका हुआ है । अपना अनिष्ट करनेवाले गुरुपुत्र अश्वत्थामाको इस प्रकार ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 204

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अपमानित देखकर द्रौपदीका कोमल हृदय कृपासे भर आया और उसने अश्वत्थामाको नमस्कार किया ॥४२ ॥ गुरुपुत्रका इस प्रकार बाँधकर लाया जाना सती द्रौपदीको सहन नहीं

हुआ । उसने कहा — ‘ छोड़ दो इन्हें, छोड़ दो । ये ब्राह्मण हैं, हमलोगोंके अत्यन्त पूजनीय ॥४३ ॥ जिनकी कृपासे आपने रहस्यके साथ सारे धनुर्वेद और प्रयोग तथा उपसंहारके

साथ सम्पूर्ण शस्त्रास्त्रोंका ज्ञान प्राप्त किया है, वे आपके आचार्य द्रोण ही पुत्रके रूपमें आपके सामने खड़े हैं । उनकी अर्धांगिनी कृपी अपने वीर पुत्रकी ममतासे ही अपने पतिका अनुगमन नहीं कर सकीं, वे अभी जीवित ॥४४-४५ ॥ महाभाग्यवान् आर्यपुत्र! आप तो बड़े धर्मज्ञ हैं । जिस गुरुवंशकी नित्य पूजा और वन्दना करनी चाहिये उसीको व्यथा पहुँचाना आपके योग्य कार्य नहीं है ॥४६ || जैसे अपने बच्चोंके मर जानेसे मैं दुःखी होकर रो रही हूँ और मेरी आँखोंसे बार - बार आँसू निकल रहे हैं, वैसे ही इनकी माता पतिव्रता गौतमी न रोयें ॥४७ ॥ जो उच्छृंखल राजा अपने कुकृत्योंसे ब्राह्मणकुलको कुपित कर देते हैं, वह

कुपित ब्राह्मणकुल उन राजाओंको सपरिवार शोकाग्निमें डालकर शीघ्र ही भस्म कर देता है ' ॥४८ ॥

सूत उवाच

धर्म्यं न्याय्यं सकरुणं निर्व्यलीकं समं महत् ।

राजा धर्मसुतो राज्ञ्याः प्रत्यनन्दद्वचो द्विजाः ॥४९

नकुलः सहदेवश्च युयुधानो धनञ्जयः ।

भगवान् देवकीपुत्रो ये चान्ये याश्च योषितः ॥५०

तत्राहामर्षितो भीमस्तस्य श्रेयान् वधः स्मृतः ।

न भर्तुर्नात्मनश्चार्थे योऽहन् सुप्तान् शिशून् वृथा ॥५१

निशम्य भीमगदितं द्रौपद्याश्च चतुर्भुजः ।

आलोक्य वदनं सख्युरिदमाह हसन्निव ॥५२

श्रीकृष्ण उवाच

ब्रह्मबन्धुर्न हन्तव्य आततायी वधार्हणः ' ।

मयैवोभयमाम्नातं परिपाह्यनुशासनम् ॥५३

कुरु प्रतिश्रुतं सत्यं यत्तत्सान्त्वयता प्रियाम् ।

प्रियं च भीमसेनस्य पाञ्चाल्या मह्यमेव च ॥५४

सूत उवाच ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 205

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अर्जुनः सहसाऽऽज्ञाय ' हरेर्हार्दमथासिना ।

मणिं जहार मूर्धन्यं द्विजस्य सहमूर्धजम् ॥५५

विमुच्य रशनाबद्धं बालहत्याहतप्रभम् ।

तेजसा मणिना हीनं शिबिरान्निरयापयत् ॥५६

वपनं द्रविणादानं स्थानान्निर्यापणं तथा ।

एष हि ब्रह्मबन्धूनां वधो नान्योऽस्ति दैहिकः ॥५७

पुत्रशोकातुराः सर्वे पाण्डवाः सह कृष्णया ।

स्वानां मृतानां यत्कृत्यं चक्रुर्निर्हरणादिकम् ॥५८

सूतजीने कहा— शौनकादि ऋषियो! द्रौपदीकी बात धर्म और न्यायके अनुकूल थी । उसमें कपट नहीं था, करुणा और समता थी । अतएव राजा युधिष्ठिरने रानीके इन हितभरे श्रेष्ठ वचनोंका अभिनन्दन किया ॥ ४ ९ ॥ साथ ही नकुल, सहदेव, सात्यकि, अर्जुन, स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण और वहाँपर उपस्थित सभी नर - नारियोंने द्रौपदीकी बातका समर्थन किया ॥५० ॥ उस समय क्रोधित होकर भीमसेनने कहा, ' जिसने सोते हुए बच्चोंको न अपने

लिये और न अपने स्वामीके लिये, बल्कि व्यर्थ ही मार डाला, उसका तो वध ही उत्तम है ' ॥५१ ॥ भगवान् श्रीकृष्णने द्रौपदी और भीमसेनकी बात सुनकर और अर्जुनकी ओर

देखकर कुछ हँसते हुए - से कहा ॥५२ ॥

भगवान् श्रीकृष्ण बोले- ' पतित ब्राह्मणका भी वध नहीं करना चाहिये और आततायीको मार ही डालना चाहिये ' - शास्त्रोंमें मैंने ही ये दोनों बातें कही हैं । इसलिये मेरी दोनों आज्ञाओंका पालन करो ॥ ५३ ॥ तुमने द्रौपदीको सान्त्वना देते समय जो प्रतिज्ञा की थी

उसे भी सत्य करो; साथ ही भीमसेन, द्रौपदी और मुझे जो प्रिय हो, वह भी करो ॥५४ ॥

सूतजी कहते हैं— अर्जुन भगवान्के हृदयकी बात तुरंत ताड़ गये और उन्होंने अपनी तलवारसे अश्वत्थामाके सिरकी मणि उसके बालोंके साथ उतार ली ॥ ५५ ॥ बालकोंकी हत्या

करनेसे वह श्रीहीन तो पहले ही हो गया था, अब मणि और ब्रह्मतेजसे भी रहित हो गया । इसके बाद उन्होंने रस्सीका बन्धन खोलकर उसे शिविरसे निकाल दिया ॥५६ ॥ मूँड देना,

धन छीन लेना और स्थानसे बाहर निकाल देना - यही ब्राह्मणाधमोंका वध है । उनके लिये इससे भिन्न शारीरिक वधका विधान नहीं है ॥ ५७ ॥ पुत्रोंकी मृत्युसे द्रौपदी और पाण्डव सभी

शोकातुर हो रहे थे । अब उन्होंने अपने मरे हुए भाई बन्धुओंकी दाहादि अन्त्येष्टि क्रिया की ॥५८ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे द्रौणिनिग्रहो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥७ ॥

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पृष्ठ 206

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* आग लगानेवाला, जहर देनेवाला, बुरी नीयतसे हाथमें शस्त्र ग्रहण करनेवाला, धन लूटनेवाला, खेत और स्त्रीको छीननेवाला — ये छ: ' आततायी ' कहलाते हैं । १. प्रा ० पा ० - महाभाग । २. प्रा ० पा ० – स्वानामनन्य ० । * शिवभक्त विद्युन्माली दैत्यको जब सूर्यने हरा दिया तब सूर्यपर क्रोधित हो भगवान् रुद्र त्रिशूल हाथमें लेकर उनकी ओर दौड़े । उस समय सूर्य भागते - भागते पृथ्वीपर काशीमें आकर गिरे, इसीसे वहाँ उनका ' लोलार्क ' नाम पड़ा है । १. प्रा ० पा ० — वधार्हकः । २. प्रा ० पा ० – सहसा ज्ञात्वा । ३. प्रा ० पा ० – प्राचीन प्रतिमें ‘ द्रौणिनिग्रहो नाम ' की जगह ' पारीक्षिते ' पाठ है । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 207

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अथाष्टमोऽध्यायः गर्भमें परीक्षित्की रक्षा, कुन्तीके द्वारा भगवान्‌की स्तुति और युधिष्ठिरका शोक सूत उवाच

अथ ते ' सम्परेतानां स्वानामुदकमिच्छताम् ।

दातुं सकृष्णा गङ्गायां पुरस्कृत्य ययुः स्त्रियः ॥१

ते निनीयोदकं सर्वे विलप्य च भृशं पुनः ।

आप्लुता हरिपादाब्जरजः पूतसरिज्जले ॥२

तत्रासीनं कुरुपतिं धृतराष्ट्रं सहानुजम् ।

गान्धारीं पुत्रशोकार्तां पृथां कृष्णां च माधवः ॥३

सान्त्वयामास मुनिभिर्हतबन्धूञ्छुचार्पितान् ।

भूतेषु कालस्य गतिं दर्शयन्नप्रतिक्रियाम् ॥४

साधयित्वाजातशत्रोः स्वं राज्यं कितवैर्हृतम् ।

घातयित्वासतो राज्ञः कचस्पर्शक्षतायुषः ॥ ५

याजयित्वाश्वमेधैस्तं त्रिभिरुत्तमकल्पकैः ।

तद्यशः पावनं दिक्षु शतमन्योरिवातनोत् ॥६

आमन्त्र्य पाण्डुपुत्रांश्च शैनेयोद्धवसंयुतः ।

द्वैपायनादिभिर्विप्रैः पूजितैः प्रतिपूजितः ॥ ७

गन्तुं कृतमतिर्ब्रह्मन् द्वारकां रथमास्थितः ।

उपलेभेऽभिधावन्तीमुत्तरां भयविह्वलाम् ॥ ८

सूतजी कहते हैं - इसके बाद पाण्डव श्रीकृष्णके साथ जलांजलिके इच्छुक मरे हुए स्वजनोंका तर्पण करनेके लिये स्त्रियोंको आगे करके गंगातटपर गये || १ || वहाँ उन सबने मृत बन्धुओंको जलदान दिया और उनके गुणोंका स्मरण करके बहुत विलाप किया । तदनन्तर भगवान्‌के चरण - कमलोंकी धूलिसे पवित्र गंगाजलमें पुन: स्नान किया || २ || वहाँ ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 208

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अपने भाइयोंके साथ कुरुपति महाराज युधिष्ठिर, धृतराष्ट्र, पुत्रशोकसे व्याकुल गान्धारी, कुन्ती और द्रौपदी - सब बैठकर मरे हुए स्वजनोंके लिये शोक करने लगे । भगवान् श्रीकृष्णने धौम्यादि मुनियोंके साथ उनको सान्त्वना दी और समझाया कि संसारके सभी प्राणी कालके अधीन हैं, मौतसे किसीको कोई बचा नहीं सकता ॥३-४ ॥ इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णने अजातशत्रु महाराज युधिष्ठिरको उनका वह राज्य, जो धूर्तोंने छलसे छीन लिया था, वापस दिलाया तथा द्रौपदीके केशोंका स्पर्श करनेसे जिनकी आयु क्षीण हो गयी थी, उन दुष्ट राजाओंका वध कराया || ५ || साथ ही युधिष्ठिरके द्वारा उत्तम सामग्रियोंसे तथा पुरोहितोंसे तीन अश्वमेध यज्ञ कराये । इस प्रकार युधिष्ठिरके पवित्र यशको सौ यज्ञ करनेवाले इन्द्रके यशकी तरह सब ओर फैला दिया || ६ || इसके बाद भगवान् श्रीकृष्णने वहाँसे जानेका विचार किया । उन्होंने इसके लिये पाण्डवोंसे विदा ली और व्यास आदि ब्राह्मणोंका सत्कार किया । उन लोगोंने भी भगवान्का बड़ा ही सम्मान किया । तदनन्तर सात्यकि और उद्धवके साथ द्वारका जानेके लिये वे रथपर सवार हुए । उसी समय उन्होंने देखा कि उत्तरा भयसे विह्वल होकर सामनेसे दौड़ी चली आ रही है ॥७-८ ॥ उत्तरोवाच

पाहि पाहि महायोगिन्देवदेव जगत्पते ।

नान्यं ' त्वदभयं पश्ये यत्र मृत्युः परस्परम् ॥९

अभिद्रवति मामीश शरस्तप्तायसो विभो ।

कामं दहतु े मां नाथ मा मे गर्भो निपात्यताम् ॥१०

सूत उवाच

उपधार्य वचस्तस्या भगवान् भक्तवत्सलः ।

अपाण्डवमिदं कर्तुं द्रौणेरस्त्रमबुध्यत ॥ ११

तर्ह्येवाथ मुनिश्रेष्ठः पाण्डवाः पञ्च सायकान् ।

आत्मनोऽभिमुखान्दीप्तानालक्ष्यास्त्राण्युपाददुः ॥ १२

व्यसनं वीक्ष्य तत्तेषामनन्यविषयात्मनाम् ।

सुदर्शनेन स्वास्त्रेण स्वानां रक्षां व्यधाद्विभुः ॥ १३

अन्तःस्थः सर्वभूतानामात्मा योगेश्वरो हरिः ।

स्वमाययाऽऽवृणोद्गर्भं वैराट्याः कुरुतन्तवे ॥१४

यद्यप्यस्त्रं ब्रह्मशिरस्त्वमोघं चाप्रतिक्रियम् ।

वैष्णवं तेज आसाद्य समशाम्यद् भृगूद्वह ॥१५

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पृष्ठ 209

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मा संस्था ह्येतदाश्चर्यं सर्वाश्चर्यमयेऽच्युते ।

य इदं मायया देव्या सृजत्यवति हन्त्यजः ॥१६

ब्रह्मतेजोविनिर्मुक्तैरात्मजैः सह कृष्णया ।

प्रयाणाभिमुखं कृष्णमिदमाह पृथा सती ॥ १७

कुन्त्युवाच

नमस्ये पुरुषं त्वाऽऽद्यमीश्वरं प्रकृतेः परम् ।

अलक्ष्यं सर्वभूतानामन्तर्बहिरवस्थितम् ॥१८

उत्तराने कहा — देवाधिदेव! जगदीश्वर! आप महायोगी हैं । आप मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये । आपके अतिरिक्त इस लोकमें मुझे अभय देनेवाला और कोई नहीं है; क्योंकि यहाँ सभी परस्पर एक - दूसरेकी मृत्युके निमित्त बन रहे हैं ॥ ९ ॥ प्रभो! आप सर्व - शक्तिमान् हैं । यह

दहकते हुए लोहेका बाण मेरी ओर दौड़ा आ रहा है । स्वामिन्! यह मुझे भले ही जला डाले, परन्तु मेरे गर्भको नष्ट न करे - ऐसी कृपा कीजिये ॥१० ॥

सूतजी कहते हैं — भक्तवत्सल भगवान् श्रीकृष्ण उसकी बात सुनते ही जान गये कि अश्वत्थामाने पाण्डवोंके वंशको निर्बीज करनेके लिये ब्रह्मास्त्रका प्रयोग किया है ॥११ ॥

शौनकजी! उसी समय पाण्डवोंने भी देखा कि जलते हुए पाँच बाण हमारी ओर आ रहे हैं । इसलिये उन्होंने भी अपने - अपने अस्त्र उठा लिये ॥ १२ ॥ सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीकृष्णने

अपने अनन्य प्रेमियोंपर - शरणागत भक्तोंपर बहुत बड़ी विपत्ति आयी जानकर अपने निज अस्त्र सुदर्शनचक्रसे उन निज जनोंकी रक्षा की । | १३ || योगेश्वर श्रीकृष्ण समस्त प्राणियोंके हृदयमें विराजमान आत्मा हैं । उन्होंने उत्तराके गर्भको पाण्डवोंकी वंशपरम्परा चलानेके लिये अपनी मायाके कवचसे ढक दिया ॥१४ ॥ शौनकजी! यद्यपि ब्रह्मास्त्र अमोघ है और उसके

निवारणका कोई उपाय भी नहीं है, फिर भी भगवान् श्रीकृष्णके तेजके सामने आकर वह शान्त हो गया ॥१५ ॥ यह कोई आश्चर्यकी बात नहीं समझनी चाहिये; क्योंकि भगवान् तो

सर्वाश्चर्यमय हैं, वे ही अपनी निज शक्ति मायासे स्वयं अजन्मा होकर भी इस संसारकी सृष्टि रक्षा और संहार करते हैं ॥ १६ ॥ जब भगवान् श्रीकृष्ण जाने लगे, तब ब्रह्मास्त्रकी ज्वालासे

मुक्त अपने पुत्रोंके और द्रौपदीके साथ सती कुन्तीने भगवान् श्रीकृष्णकी इस प्रकार स्तुति की ॥१७ ॥

कुन्तीने कहा- आप समस्त जीवोंके बाहर और भीतर एकरस स्थित हैं, फिर भी इन्द्रियों और वृत्तियोंसे देखे नहीं जाते; क्योंकि आप प्रकृतिसे परे आदिपुरुष परमेश्वर हैं । मैं आपको नमस्कार करती हूँ ॥१८ ॥ इन्द्रियोंसे जो कुछ जाना जाता है, उसकी तहमें आप

विद्यमान रहते हैं और अपनी ही मायाके परदेसे अपनेको ढके रहते हैं । मैं अबोध नारी आप अविनाशी पुरुषोत्तमको भला कैसे जान सकती हूँ? जैसे मूढ़ लोग दूसरा भेष धारण किये हुए नटको प्रत्यक्ष देखकर भी नहीं पहचान सकते, वैसे ही आप दीखते हुए भी नहीं ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 210

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दीखते ॥१९ ॥ आप शुद्ध हृदयवाले विचारशील जीवन्मुक्त परमहंसोंके हृदयमें अपनी

प्रेममयी भक्तिका सृजन करनेके लिये अवतीर्ण हुए हैं । फिर हम अल्पबुद्धि स्त्रियाँ आपको कैसे पहचान सकती हैं ॥२० ॥ आप श्रीकृष्ण, वासुदेव, देवकीनन्दन, नन्द गोपके लाड़ले

लाल गोविन्दको हमारा बारंबार प्रणाम है ॥ २१ ॥ जिनकी नाभिसे ब्रह्माका जन्मस्थान कमल

प्रकट हुआ है, जो सुन्दर कमलोंकी माला धारण करते हैं, जिनके नेत्र कमलके समान विशाल और कोमल हैं, जिनके चरणकमलोंमें कमलका चिह्न है— श्रीकृष्ण! ऐसे आपको मेरा बार-बार नमस्कार है ॥२२ ॥ हृषीकेश! जैसे आपने दुष्ट कंसके द्वारा कैद की हुई और चिरकालसे

शोकग्रस्त देवकीकी रक्षा की थी, वैसे ही पुत्रोंके साथ मेरी भी आपने बार - बार विपत्तियोंसे रक्षा की है । आप ही हमारे स्वामी हैं । आप सर्वशक्तिमान् हैं । श्रीकृष्ण! कहाँतक गिनाऊँ— विषसे, लाक्षागृहकी भयानक आगसे, हिडिम्ब आदि राक्षसोंकी दृष्टिसे, दुष्टोंकी द्यूतसभासे, वनवासकी विपत्तियोंसे और अनेक बारके युद्धोंमें अनेक महारथियोंके शस्त्रास्त्रोंसे और अभी - अभी इस अश्वत्थामाके ब्रह्मास्त्रसे भी आपने ही हमारी रक्षा की है ॥२३-२४ ॥ जगद्गुरो! हमारे जीवनमें सर्वदा पद - पदपर विपत्तियाँ आती रहें; क्योंकि विपत्तियोंमें ही निश्चितरूपसे आपके दर्शन हुआ करते हैं और आपके दर्शन हो जानेपर फिर जन्म - मृत्युके चक्करमें नहीं आना पड़ता || २५ || ऊँचे कुलमें जन्म, ऐश्वर्य, विद्या और सम्पत्तिके कारण जिसका घमंड बढ़ रहा है, वह मनुष्य तो आपका नाम भी नहीं ले सकता; क्योंकि आप तो उन लोगोंको दर्शन देते हैं जो अकिंचन हैं ॥ २६ ॥

मायाजवनिकाच्छन्नमज्ञाधोक्षजमव्ययम् ।

न लक्ष्यसे मूढदृशा नटो नाट्यधरो यथा ॥१९

तथा परमहंसानां मुनीनाममलात्मनाम् ।

भक्तियोगविधानार्थं कथं पश्येम हि स्त्रियः ॥२०

कृष्णाय वासुदेवाय देवकीनन्दनाय च ।

नन्दगोपकुमाराय गोविन्दाय नमो नमः ॥२१

नमः पङ्कजनाभाय नमः पङ्कजमालिने ।

नमः पङ्कजनेत्राय नमस्ते पङ्कजाङ्घ्रये ॥२२

यथा हृषीकेश खलेन देवकी कंसेन रुद्धातिचिरं शुचार्पिता । विमोचिताहं च सहात्मजा विभो त्वयैव नाथेन मुहुर्विपद्गणात् ॥२३ ****** ebook converter DEMO Watermarks *******