श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 221–230

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 221–230

पृष्ठ 221

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पुरुषस्वभावविहितान् यथावर्णं यथाश्रमम् ।

वैराग्यरागोपाधिभ्यामाम्नातोभयलक्षणान् ॥२६

दानधर्मान् राजधर्मान् मोक्षधर्मान् विभागशः ।

स्त्रीधर्मान् भगवद्धर्मान् समासव्यासयोगतः ॥ २७

धर्मार्थकाममोक्षांश्च सहोपायान् यथा मुने ।

नानाख्यानेतिहासेषु वर्णयामास तत्त्ववित् ॥२८

धर्मं प्रवदतस्तस्य स कालः प्रत्युपस्थितः ।

यो योगिनश्छन्दमृत्योर्वाञ्छितस्तूत्तरायणः ॥ २ ९

तदोपसंहृत्य गिरः सहस्रणी-र्विमुक्तसङ्गं ' मन आदिपूरुषे । कृष्णे लसत्पीतपटे चतुर्भुजे पुरः स्थितेऽमीलितदृग्व्यधारयत् ॥३०

विशुद्धया धारणया हताशुभ े-स्तदीक्षयैवाशु गतायुधव्यथः ।

निवृत्तसर्वेन्द्रियवृत्तिविभ्रम-स्तुष्टाव जन्यं विसृजञ्जनार्दनम् ॥३१

श्रीभीष्म उवाच इति मतिरुपकल्पिता वितृष्णा भगवति सात्वतपुङ्गवे विभूम्नि । स्वसुखमुपगते क्वचिद्विहर्तुं प्रकृतिमुपेयुषि यद्भवप्रवाहः ॥३२ त्रिभुवनकमनं तमालवर्णं रविकरगौरवराम्बरं दधाने । वपुरलककुलावृताननाब्जं विजयसखे रतिरस्तु मेऽनवद्या ॥३३ तब तत्त्ववेत्ता भीष्मपितामहने वर्ण और आश्रमके अनुसार पुरुषके स्वाभाविक धर्म और वैराग्य तथा रागके कारण विभिन्नरूपसे बतलाये हुए निवृत्ति और प्रवृत्तिरूप द्विविध धर्म, दानधर्म, राजधर्म, मोक्षधर्म, स्त्रीधर्म और भगवद्धर्म – इन सबका अलग - अलग संक्षेप और विस्तारसे वर्णन किया । शौनकजी! इनके साथ ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - इन चारों पुरुषार्थोंका तथा इनकी प्राप्तिके साधनोंका अनेकों उपाख्यान और इतिहास सुनाते हुए ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 222

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विभागशः वर्णन किया ॥ २६-२८ ॥ भीष्मपितामह इस प्रकार धर्मका प्रवचन कर ही रहे थे कि वह उत्तरायणका समय आ पहुँचा जिसे मृत्युको अपने अधीन रखनेवाले भगवत्परायण योगीलोग चाहा करते हैं ॥२९ ॥ उस समय हजारों रथियोंके नेता भीष्मपितामहने वाणीका

संयम करके मनको सब ओरसे हटाकर अपने सामने स्थित आदिपुरुष भगवान् श्रीकृष्णमें लगा दिया । भगवान् श्रीकृष्णके सुन्दर चतुर्भुज विग्रहपर उस समय पीताम्बर फहरा रहा था । भीष्मजीकी आँखें उसीपर एकटक लग गयीं ॥ ३० ॥ उनको शस्त्रोंकी चोटसे जो पीड़ा हो

रही थी वह तो भगवान्‌के दर्शनमात्रसे ही तुरंत दूर हो गयी तथा भगवान्की विशुद्ध धारणासे उनके जो कुछ अशुभ शेष थे वे सभी नष्ट हो गये । अब शरीर छोड़नेके समय उन्होंने अपनी समस्त इन्द्रियोंके वृत्तिविलासको रोक दिया और बड़े प्रेमसे भगवान्‌की स्तुति की ॥३१ ॥

भीष्मजीने कहा— अब मृत्युके समय मैं अपनी यह बुद्धि, जो अनेक प्रकारके साधनोंका अनुष्ठान करनेसे अत्यन्त शुद्ध एवं कामनारहित हो गयी है, यदुवंशशिरोमणि अनन्त भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंमें समर्पित करता हूँ, जो सदा - सर्वदा अपने आनन्दमय स्वरूपमें स्थित रहते हुए ही कभी विहार करनेकी - लीला करनेकी इच्छासे प्रकृतिको स्वीकार कर लेते हैं, जिससे यह सृष्टिपरम्परा चलती है ॥३२ ॥ जिनका शरीर त्रिभुवन - सुन्दर

एवं श्याम तमालके समान साँवला है, जिसपर सूर्यरश्मियोंके समान श्रेष्ठ पीताम्बर लहराता रहता है और कमल - सदृश मुखपर घुँघराली अलकें लटकती रहती हैं उन अर्जुन- - सखा श्रीकृष्णमें मेरी निष्कपट प्रीति हो ॥३३ ॥

युधि तुरगरजोविधूम्रविष्वक्-कचलुलित श्रमवार्यलङ्कृतास्ये ।

मम निशितशरैर्विभिद्यमान-त्वचि विलसत्कवचेऽस्तु कृष्ण आत्मा ॥३४

सपदि सखिवचो निशम्य मध्ये निजपरयोर्बलयो रथं निवेश्य । स्थितवति परसैनिकायुरक्ष्णा हृतवति पार्थसखे रतिर्ममास्तु ' ॥३५ व्यवहितपृतनामुखं निरीक्ष्य

स्वजनवधाद्विमुखस्य दोषबुद्ध्या ।

कुमतिमहरदात्मविद्यया य-श्चरणरतिः परमस्य तस्य मेऽस्तु ॥३६

स्वनिगममपहाय मत्प्रतिज्ञा-मृतमधिकर्तुमवप्लुतो रथस्थः ।

धृतरथचरणोऽभ्ययाच्चलद्गु-र्हरिरिव हन्तुमिभं गतोत्तरीयः ॥३७

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पृष्ठ 223

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शितविशिखहतो विशीर्णदंशः क्षतजपरिप्लुत आततायिनो मे । प्रसभमभिससार मद्वधार्थं स भवतु मे भगवान् गतिर्मुकुन्दः ॥३८ मुझे युद्धके समयकी उनकी वह विलक्षण छबि याद आती है । उनके मुखपर लहराते हुए घुँघराले बाल घोड़ोंकी टॉपकी धूलसे मटमैले हो गये थे और पसीनेकी छोटी - छोटी बूँदें शोभायमान हो रही थीं । मैं अपने तीखे बाणोंसे उनकी त्वचाको बींध रहा था । उन सुन्दर कवचमण्डित भगवान् श्रीकृष्णके प्रति मेरा शरीर, अन्तःकरण और आत्मा समर्पित हो जायँ ॥३४ ॥

अपने मित्र अर्जुनकी बात सुनकर, जो तुरंत ही पाण्डव सेना और कौरव - सेनाके बीचमें अपना रथ ले आये और वहाँ स्थित होकर जिन्होंने अपनी दृष्टिसे ही शत्रुपक्षके सैनिकोंकी आयु छीन ली, उन पार्थसखा भगवान् श्रीकृष्णमें मेरी परम प्रीति हो || ३५ || अर्जुनने जब दूरसे कौरवोंकी सेनाके मुखिया हमलोगोंको देखा तब पाप समझकर वह अपने स्वजनोंके वधसे विमुख हो गया । उस समय जिन्होंने गीताके रूपमें आत्मविद्याका उपदेश करके उसके सामयिक अज्ञानका नाश कर दिया, उन परमपुरुष भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंमें मेरी प्रीति बनी रहे ॥३६ ॥ मैंने प्रतिज्ञा कर ली थी कि मैं श्रीकृष्णको शस्त्र ग्रहण कराकर छोडूंगा; उसे

सत्य एवं ऊँची करनेके लिये उन्होंने अपनी शस्त्र ग्रहण न करनेकी प्रतिज्ञा तोड़ दी । उस समय वे रथसे नीचे कूद पड़े और सिंह जैसे हाथीको मारनेके लिये उसपर टूट पड़ता है, वैसे ही रथका पहिया लेकर मुझपर झपट पड़े । उस समय वे इतने वेगसे दौड़े कि उनके कंधेका दुपट्टा गिर गया और पृथ्वी काँपने लगी ॥ ३७ ॥

मुझ आततायीने तीखे बाण मार - मारकर उनके शरीरका कवच तोड़ डाला था, जिससे सारा शरीर लहूलुहान हो रहा था, अर्जुनके रोकनेपर भी वे बलपूर्वक मुझे मारनेके लिये मेरी ओर दौड़े आ थे । वे ही भगवान् श्रीकृष्ण, जो ऐसा करते हुए भी मेरे प्रति अनुग्रह और भक्तवत्सलतासे परिपूर्ण थे, मेरी एकमात्र गति हों — आश्रय हों ॥३८ ॥

विजयरथकुटुम्ब आत्ततोत्रे

धृतहयरश्मिनि तच्छ्रियेक्षणीये ।

भगवति रतिरस्तु मे मुमूर्षो-र्यमिह निरीक्ष्य हता गताः सरूपम् ॥३९

ललितगतिविलासवल्गुहास-प्रणयनिरीक्षणकल्पितोरुमानाः । कृतमनुकृतवत्य उन्मदान्धाः प्रकृतिमगन् किल यस्य गोपवध्वः ॥४० मुनिगणनृपवर्यसंकुलेऽन्तः-****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 224

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सदसि युधिष्ठिरराजसूय एषाम् । अर्हणमुपपेद ईक्षणीयो मम दृशिगोचर एष आविरात्मा ॥४१ तमिममहमजं शरीरभाजां हृदि हृदि धिष्ठितमात्मकल्पितानाम् । प्रतिदशमिव नैकधार्कमेकं समधिगतोऽस्मि विधूतभेदमोहः ॥४२ सूत उवाच

कृष्ण एवं भगवति मनोवाग्दृष्टिवृत्तिभिः ।

आत्मन्यात्मानमावेश्य सोऽन्तःश्वास उपारमत् ॥४३

सम्पद्यमानमाज्ञाय भीष्मं ब्रह्मणि निष्कले ।

सर्वे बभूवुस्ते तूष्णीं वयांसीव दिनात्यये ॥४४

तत्र दुन्दुभयो नेदुर्देवमानववादिताः ३ ।

शशंसुः साधवो राज्ञां खात्पेतुः पुष्पवृष्टयः ॥४५

अर्जुनके रथकी रक्षामें सावधान जिन श्रीकृष्णके बायें हाथमें घोड़ोंकी रास थी और दाहिने हाथमें चाबुक, इन दोनोंकी शोभासे उस समय जिनकी अपूर्व छवि बन गयी थी, तथा महाभारतयुद्धमें मरनेवाले वीर जिनकी इस छविका दर्शन करते रहनेके कारण सारूप्य मोक्षको प्राप्त हो गये, उन्हीं पार्थसारथि भगवान् श्रीकृष्णमें मुझ मरणासन्नकी परम प्रीति हो ॥३९ ॥ जिनकी लटकीली सुन्दर चाल, हाव - भावयुक्त चेष्टाएँ, मधुर मुसकान और प्रेमभरी

चितवनसे अत्यन्त सम्मानित गोपियाँ रासलीलामें उनके अन्तर्धान हो जानेपर प्रेमोन्मादसे मतवाली होकर जिनकी लीलाओंका अनुकरण करके तन्मय हो गयी थीं, उन्हीं भगवान् श्रीकृष्णमें मेरा परम प्रेम हो ॥ ४० ॥ जिस समय युधिष्ठिरका राजसूययज्ञ हो रहा था, मुनियों

और बड़े - बड़े राजाओंसे भरी हुई सभामें सबसे पहले सबकी ओरसे इन्हीं सबके दर्शनीय भगवान् श्रीकृष्णकी मेरी आँखोंके सामने पूजा हुई थी; वे ही सबके आत्मा प्रभु आज इस मृत्युके समय मेरे सामने खड़े हैं ॥ ४१ ॥ जैसे एक ही सूर्य अनेक आँखोंसे अनेक रूपोंमें

दीखते हैं, वैसे ही अजन्मा भगवान् श्रीकृष्ण अपने ही द्वारा रचित अनेक शरीरधारियोंके हृदयमें अनेक रूपसे जान पड़ते हैं; वास्तवमें तो वे एक और सबके हृदयमें विराजमान हैं ही । उन्हीं इन भगवान् श्रीकृष्णको मैं भेद - भ्रमसे रहित होकर प्राप्त हो गया हूँ ॥४२ ॥

सूतजी कहते हैं - इस प्रकार भीष्मपितामहने मन, वाणी और दृष्टिकी वृत्तियोंसे आत्मस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णमें अपने - आपको लीन कर दिया । उनके प्राण वहीं विलीन हो गये और वे शान्त हो गये ॥४३ ॥ उन्हें अनन्त ब्रह्ममें लीन जानकर सब लोग वैसे ही चुप हो

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पृष्ठ 225

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गये, जैसे दिनके बीत जानेपर पक्षियोंका कलरव शान्त हो जाता है ॥ ४४ ॥ उस समय देवता

और मनुष्य नगारे बजाने लगे । साधुस्वभावके राजा उनकी प्रशंसा करने लगे और आकाशसे पुष्पोंकी वर्षा होने लगी ॥४५ ॥

तस्य निर्हरणादीनि सम्परेतस्य भार्गव ।

युधिष्ठिरः कारयित्वा मुहूर्तं दुःखितोऽभवत् ॥४६

तुष्टुवुर्मुनयो हृष्टाः कृष्णं तद्गुह्यनामभिः ।

ततस्ते कृष्णहृदयाः स्वाश्रमान् प्रययुः पुनः ॥४७

ततो युधिष्ठिरो गत्वा सहकृष्णो गजाह्वयम् ।

पितरं सान्त्वयामास गान्धारीं च तपस्विनीम् ॥४८

पित्रा चानुमतो राजा वासुदेवानुमोदितः ।

चकार राज्यं धर्मेण पितृपैतामहं विभुः ॥४९

शौनकजी! युधिष्ठिरने उनके मृत शरीरकी अन्त्येष्टि क्रिया करायी और कुछ समयके लिये वे शोकमग्न हो गये ॥४६ ॥ उस समय मुनियोंने बड़े आनन्दसे भगवान् श्रीकृष्णकी

उनके रहस्यमय नाम ले - लेकर स्तुति की । इसके पश्चात् अपने हृदयोंको श्रीकृष्णमय बनाकर वे अपने - अपने आश्रमोंको लौट गये ॥ ४७ ॥ तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्णके साथ युधिष्ठिर

हस्तिनापुर चले आये और उन्होंने वहाँ अपने चाचा धृतराष्ट्र और तपस्विनी गान्धारीको ढाढस बँधाया ॥४८ ॥ फिर धृतराष्ट्रकी आज्ञा और भगवान् श्रीकृष्णकी अनुमतिसे समर्थ राजा

युधिष्ठिर अपने वंशपरम्परागत साम्राज्यका धर्मपूर्वक शासन करने लगे ॥४९ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे युधिष्ठिरराज्यप्रलम्भो नाम नवमोऽध्यायः ॥९ || १. प्रा ० पा ० — सन्नतान् । २. प्रा ० पा ० – कृच्छ्रं । ३. प्रा ० पा ० – संस्थिते विरथे । -१. प्रा ० पा ० — मुनिः । २. प्रा ० पा ० – भूतानु ० । ३. प्रा ० पा ० — सर्व ० । १. प्रा ० पा०— – विमुक्तसङ्गो । २. प्रा ० पा ० - हृता । ३. प्रा ० पा ० — मति ० । १. प्रा ० पा ० — नति ० । २. प्रा ० पा ० – व्यवसित ० । ३. प्रा ० पा ० - धर्मबुद्ध्या । १. प्रा ० पा ० — मनोवाग्वृत्तिदृष्टिभिः । २. प्रा ० पा ० – दिवात्यये । ३. प्रा ० पा ० — दानव ० । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 226

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पृष्ठ 227

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अथ दशमोऽध्यायः श्रीकृष्णका द्वारका - गमन शौनक उवाच हत्वा स्वरिक्थस्पृध आततायिनो युधिष्ठिरो धर्मभृतां वरिष्ठः । सहानुजैः प्रत्यवरुद्धभोजनः कथं प्रवृत्तः किमकारषीत्ततः ॥ १ सूत उवाच वंशं कुरोर्वंशदवाग्निनिर्हृतं संरोहयित्वा भवभावनो हरिः । निवेशयित्वा निजराज्य ईश्वरो युधिष्ठिरं प्रीतमना बभूव ह ॥२ निशम्य भीष्मोक्तमथाच्युतोक्तं प्रवृत्तविज्ञानविधूतविभ्रमः । शशास गामिन्द्र इवाजिताश्रयः परिध्युपान्तामनुजानुवर्तितः ॥३ शौनकजीने पूछा — धार्मिकशिरोमणि महाराज युधिष्ठिरने अपनी पैतृक सम्पत्तिको हड़प जानेके इच्छुक आततायियोंका नाश करके अपने भाइयोंके साथ किस प्रकारसे राज्य - शासन किया और कौन - कौन - से काम किये, क्योंकि भोगोंमें तो उनकी प्रवृत्ति थी ही नहीं ॥१ ॥

सूतजी कहते हैं – सम्पूर्ण सृष्टिको उज्जीवित करनेवाले भगवान् श्रीहरि परस्परकी कलहाग्निसे दग्ध कुरुवंशको पुनः अंकुरितकर और युधिष्ठिरको उनके राज्यसिंहासनपर बैठाकर बहुत प्रसन्न हुए || २ || भीष्मपितामह और भगवान् श्रीकृष्णके उपदेशोंके श्रवणसे उनके अन्तःकरणमें विज्ञानका उदय हुआ और भ्रान्ति मिट गयी । भगवान्‌ के आश्रयमें रहकर वे समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्वीका इन्द्रके समान शासन करने लगे । भीमसेन आदि उनके भाई पूर्णरूपसे उनकी आज्ञाओंका पालन करते थे ॥३ ॥

कामं ववर्ष पर्जन्यः सर्वकामदुघा मही ।

सिषिचुः स्म व्रजान् गावः पयसोधस्वतीर्मुदा ॥४

नद्यः समुद्रा गिरयः सवनस्पतिवीरुधः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 228

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फलन्त्योषधयः सर्वाः काममन्वृतु तस्य वै ॥५

नाधयो व्याधयः क्लेशा दैवभूतात्महेतवः ।

अजातशत्रावभवन् जन्तूनां राज्ञि कर्हिचित् ॥६

उषित्वा हास्तिनपुरे मासान् कतिपयान् हरिः ।

सुहृदां च विशोकाय स्वसुश्च प्रियकाम्यया ॥७

आमन्त्र्य चाभ्यनुज्ञातः परिष्वज्याभिवाद्य तम् ।

आरुरोह रथं कैश्चित्परिष्वक्तोऽभिवादितः ॥८

सुभद्रा द्रौपदी कुन्ती विराटतनया तथा ।

गान्धारी धृतराष्ट्रश्च युयुत्सुर्गौतमो यमौ ॥९

वृकोदरश्च धौम्यश्च स्त्रियो मत्स्यसुतादयः ।

न सेहिरे विमुह्यन्तो विरहं शार्ङ्गधन्वनः ॥१०

सत्सङ्गान्मुक्तदुःसङ्गो हातुं नोत्सहते बुधः ।

कीर्त्यमानं यशो यस्य सकृदाकर्ण्य रोचनम् ॥११

तस्मिन्न्यस्तधियः पार्थाः सहेरन् विरहं कथम् ।

दर्शनस्पर्शसंलापशयनासनभोजनैः ॥१२

सर्वे तेऽनिमिषैरक्षैस्तमनुद्रुतचेतसः ।

वीक्षन्तः स्नेहसम्बद्धा विचेलुस्तत्र तत्र ह ॥१३

न्यरुन्धन्नुद्गलद्बाष्पमीत्कण्ठ्याद्देवकीसुते ।

निर्यात्यगारान्नोऽभद्रमिति स्याद्वान्धवस्त्रियः ॥ १४

युधिष्ठिरके राज्यमें आवश्यकतानुसार यथेष्ट वर्षा होती थी, पृथ्वीमें समस्त अभीष्ट वस्तुएँ पैदा होती थीं, बड़े - बड़े थनोंवाली बहुत - सी गौएँ प्रसन्न रहकर गोशालाओंको दूधसे सींचती रहती थीं ॥४ ॥ नदियाँ, समुद्र, पर्वत, वनस्पति, लताएँ और ओषधियाँ प्रत्येक ऋतुमें

यथेष्टरूपसे अपनी - अपनी वस्तुएँ राजाको देती थीं || ५ || अजातशत्रु महाराज युधिष्ठिरके राज्यमें किसी प्राणीको कभी भी आधि - व्याधि अथवा दैविक, भौतिक और आत्मिक क्लेश नहीं होते थे ॥६ ॥

अपने बन्धुओंका शोक मिटानेके लिये और अपनी बहिन सुभद्राकी प्रसन्नताके लिये भगवान् श्रीकृष्ण कई महीनोंतक हस्तिनापुरमें ही रहे ॥७ ॥ फिर जब उन्होंने राजा

युधिष्ठिरसे द्वारका जानेकी अनुमति माँगी तब राजाने उन्हें अपने हृदयसे लगाकर स्वीकृति दे दी । भगवान् उनको प्रणाम करके रथपर सवार हुए । कुछ लोगों ( समान उम्रवालों ) -ने उनका आलिंगन किया और कुछ ( छोटी उम्रवालों ) ने प्रणाम || ८ || उस समय सुभद्रा, द्रौपदी, कुन्ती, उत्तरा, गान्धारी, धृतराष्ट्र, युयुत्सु, कृपाचार्य, नकुल, सहदेव, भीमसेन, धौम्य और ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 229

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सत्यवती आदि सब मूर्च्छित - से हो गये । वे शार्ङ्गपाणि श्रीकृष्णका विरह नहीं सह सके ॥९ -१० ॥ भगवद्भक्त सत्पुरुषोंके संगसे जिसका दुःसंग छूट गया है, वह विचारशील पुरुष भगवान्के मधुर - मनोहर सुयशको एक बार भी सुन लेनेपर फिर उसे छोड़नेकी कल्पना भी नहीं करता । उन्हीं भगवान्के दर्शन तथा स्पर्शसे, उनके साथ आलाप करनेसे तथा साथ-ही - साथ सोने, उठने - बैठने और भोजन करनेसे जिनका सम्पूर्ण हृदय उन्हें समर्पित हो चुका था, वे पाण्डव भला, उनका विरह कैसे सह सकते थे ॥११-१२ ॥ उनका चित्त द्रवित हो रहा था, वे सब निर्निमेष नेत्रोंसे भगवान्‌को देखते हुए स्नेहबन्धनसे बँधकर जहाँ - तहाँ दौड़ रहे थे ॥१३ ॥ भगवान् श्रीकृष्णके घरसे चलते समय उनके बन्धुओंकी स्त्रियोंके नेत्र उत्कण्ठावश

उमड़ते हुए आँसुओंसे भर आये; परंतु इस भयसे कि कहीं यात्राके समय अशकुन न हो जाय, उन्होंने बड़ी कठिनाईसे उन्हें रोक लिया ॥१४ ॥

मृदङ्गशङ्खभेर्यश्च वीणापणवगोमुखाः ।

धुन्धुर्यानकघण्टाद्या नेदुर्दुन्दुभयस्तथा ॥१५

प्रासादशिखरारूढाः कुरुनार्यो दिदृक्षया ।

ववृषुः कुसुमैः कृष्णं प्रेमव्रीडास्मितेक्षणाः ॥ १६

सितातपत्रं जग्राह मुक्तादामविभूषितम् ।

रत्नदण्डं गुडाकेशः प्रियः प्रियतमस्य ह ॥१७

उद्धवः सात्यकिश्चैव व्यजने परमाद्भुते ।

विकीर्यमाणः कुसुमै रेजे मधुपतिः पथि ॥१८

अश्रूयन्ताशिषः सत्यास्तत्र तत्र द्विजेरिताः ।

नानुरूपानुरूपाश्च निर्गुणस्य गुणात्मनः ॥१९

अन्योन्यमासीत्संजल्प उत्तमश्लोकचेतसाम् ।

कौरवेन्द्रपुरस्त्रीणां सर्वश्रुतिमनोहरः ॥ २०

स वै किलायं पुरुषः पुरातनो य एक आसीदविशेष आत्मनि । अग्रे गुणेभ्यो जगदात्मनीश्वरे निमीलितात्मन्निशि सुप्तशक्तिषु ॥ २१ स एव भूयो निजवीर्यचोदितां स्वजीवमायां प्रकृतिं सिसृक्षतीम् । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 230

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अनामरूपात्मनि रूपनामनी विधित्समानोऽनुससार शास्त्रकृत् ॥२२ स वा अयं यत्पदमत्र सूरयो जितेन्द्रिया निर्जितमातरिश्वनः । पश्यन्ति भक्त्युत्कलितामलात्मना नन्वेष सत्त्वं परिमार्टुमर्हति ॥२३ भगवान्के प्रस्थानके समय मृदंग, शङ्ख, भेरी, वीणा, ढोल, नरसिंगे, धुन्धुरी, नगारे, घंटे और दुन्दुभियाँ आदि बाजे बजने लगे || १५ || भगवान्‌के दर्शनकी लालसासे कुरुवंशकी स्त्रियाँ अटारियोंपर चढ़ गयीं और प्रेम, लज्जा एवं मुसकानसे युक्त चितवनसे भगवान्को देखती हुई उनपर पुष्पोंकी वर्षा करने लगीं ॥ १६ ॥ उस समय भगवान्के प्रिय सखा घुँघराले

बालोंवाले अर्जुनने अपने प्रियतम श्रीकृष्णका वह श्वेत छत्र, जिसमें मोतियोंकी झालर लटक रही थी और जिसका डंडा रत्नोंका बना हुआ था, अपने हाथमें ले लिया ॥१७ ॥ उद्धव और

सात्यकि बड़े विचित्र चँवर डुलाने लगे । मार्गमें भगवान् श्रीकृष्णपर चारों ओरसे पुष्पोंकी वर्षा हो रही थी । बड़ी ही मधुर झाँकी थी || १८ || जहाँ - तहाँ ब्राह्मणोंके दिये हुए सत्य आशीर्वाद सुनायी पड़ रहे थे । वे सगुण भगवान्‌के तो अनुरूप ही थे; क्योंकि उनमें सब कुछ है, परन्तु निर्गुणके अनुरूप नहीं थे, क्योंकि उनमें कोई प्राकृत गुण नहीं है || १ ९ ॥ हस्तिनापुरकी कुलीन रमणियाँ, जिनका चित्त भगवान् श्रीकृष्णमें रम गया था, आपसमें ऐसी बातें कर रही थीं, जो सबके कान और मनको आकृष्ट कर रही थीं ॥२० ॥

वे आपसमें कह रही थीं— ' सखियो! ये वे ही सनातन परम पुरुष हैं, जो प्रलयके समय भी अपने अद्वितीय निर्विशेष स्वरूपमें स्थित रहते हैं । उस समय सृष्टिके मूल ये तीनों गुण भी नहीं रहते । जगदात्मा ईश्वरमें जीव भी लीन हो जाते हैं और महत्तत्त्वादि समस्त शक्तियाँ अपने कारण अव्यक्तमें सो जाती हैं || २१ || उन्होंने ही फिर अपने नाम - रूपरहित स्वरूपमें नामरूपके निर्माणकी इच्छा की तथा अपनी काल - शक्तिसे प्रेरित प्रकृतिका, जो कि उनके अंशभूत जीवोंको मोहित कर लेती है और सृष्टिकी रचनामें प्रवृत्त रहती है, अनुसरण किया और व्यवहारके लिये वेदादि शास्त्रोंकी रचना की ॥ २२ ॥ इस जगत् में जिसके स्वरूपका

साक्षात्कार जितेन्द्रिय योगी अपने प्राणोंको वशमें करके भक्तिसे प्रफुल्लित निर्मल हृदयमें किया करते हैं, ये श्रीकृष्ण वही साक्षात् परब्रह्म हैं । वास्तवमें इन्हींकी भक्तिसे अन्तःकरणकी पूर्ण शुद्धि हो सकती है, योगादिके द्वारा नहीं ॥ २३ ॥ सखी! वास्तवमें ये वही हैं, जिनकी

सुन्दर लीलाओंका गायन वेदोंमें और दूसरे गोपनीय शास्त्रोंमें व्यासादि रहस्यवादी ऋषियोंने किया है— जो एक अद्वितीय ईश्वर हैं और अपनी लीलासे जगत्की सृष्टि, पालन तथा संहार करते हैं, परन्तु उनमें आसक्त नहीं होते || २४ || जब तामसी बुद्धिवाले राजा अधर्मसे अपना पेट पालने लगते हैं तब ये ही सत्त्वगुणको स्वीकारकर ऐश्वर्य, सत्य, ऋत, दया और यश प्रकट करते और संसारके कल्याणके लिये युग - युगमें अनेकों अवतार धारण करते हैं ॥२५ ॥ अहो!

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