श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 211–220

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 211–220

पृष्ठ 211

श्रीमद्भागवत महापुराण - १, पृष्ठ 211 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

विषान्महाग्नेः पुरुषाददर्शना-दसत्सभाया वनवासकृच्छ्रतः । मृधे मृधेऽनेकमहारथास्त्रतो द्रौण्यस्त्रतश्चास्म हरेऽभिरक्षिताः ॥२४

विपदः सन्तु नः शश्वत्तत्र तत्र जगद्गुरो ।

भवतो दर्शनं यत्स्यादपुनर्भवदर्शनम् ॥२५

जन्मैश्वर्यश्रुतश्रीभिरेधमानमदः पुमान् ।

नैवार्हत्यभिधातुं वै त्वामकिञ्चनगोचरम् ॥२६

नमोऽकिञ्चनवित्ताय निवृत्तगुणवृत्तये ।

आत्मारामाय शान्ताय कैवल्यपतये नमः ॥२७

मन्ये त्वां कालमीशानमनादिनिधनं विभुम् ।

समं चरन्तं सर्वत्र भूतानां यन्मिथः कलिः ॥२८

न वेद कश्चिद्भगवंश्चिकीर्षितं तवेहमानस्य नृणां विडम्बनम् । न यस्य कश्चिद्दयितोऽस्ति कर्हिचिद् द्वेष्यश्च यस्मिन् विषमा मतिर्नृणाम् ॥२९

जन्म कर्म च विश्वात्मन्नजस्याकर्तुरात्मनः ।

तिर्यङ्नृषिषु ' यादःसु तदत्यन्तविडम्बनम् ॥३०

गोप्याददे त्वयि कृतागसि दाम तावद् या ते दशाश्रुकलिलाञ्जनसम्भ्रमाक्षम् । वक्त्रं निनीय भयभावनया स्थितस्य सा मां विमोहयति भीरपि यद्विभेति ॥३१

केचिदाहुरजं जातं पुण्यश्लोकस्य कीर्तये ।

यदोः प्रियस्यान्ववाये मलयस्येव चन्दनम् ॥३२

आप निर्धनोंके परम धन हैं । मायाका प्रपंच आपका स्पर्श भी नहीं कर सकता । आप अपने - आपमें ही विहार करनेवाले, परम शान्तस्वरूप हैं । आप ही कैवल्य मोक्षके अधिपति ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 212

श्रीमद्भागवत महापुराण - १, पृष्ठ 212 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

हैं । आपको मैं बार - बार नमस्कार करती हूँ || २७ || मैं आपको अनादि, अनन्त, सर्वव्यापक, सबके नियन्ता, कालरूप, परमेश्वर समझती हूँ । संसारके समस्त पदार्थ और प्राणी आपसमें टकराकर विषमताके कारण परस्पर विरुद्ध हो रहे हैं, परंतु आप सबमें समानरूपसे विचर रहे हैं ॥२८ ॥ भगवन्! आप जब मनुष्योंकी - सी लीला करते हैं, तब आप क्या करना चाहते हैं—

यह कोई नहीं जानता । आपका कभी कोई न प्रिय है और न अप्रिय । आपके सम्बन्धमें लोगोंकी बुद्धि ही विषम हुआ करती है ॥ २ ९ ॥ आप विश्वके आत्मा हैं, विश्वरूप हैं । न आप जन्म लेते हैं और न कर्म ही करते हैं । फिर भी पशु - पक्षी, मनुष्य, ऋषि, जलचर आदिमें आप जन्म लेते हैं और उन योनियोंके अनुरूप दिव्य कर्म भी करते हैं । यह आपकी लीला ही तो है ॥३० ॥ जब बचपनमें आपने दूधकी मटकी फोड़कर यशोदा मैयाको खिझा दिया था और

उन्होंने आपको बाँधनेके लिये हाथमें रस्सी ली थी, तब आपकी आँखोंमें आँसू छलक आये थे, काजल कपोलोंपर बह चला था, नेत्र चंचल हो रहे थे और भयकी भावनासे आपने अपने मुखको नीचेकी ओर झुका लिया था! आपकी उस दशाका - लीला - छबिका ध्यान करके मैं मोहित हो जाती हूँ । भला, जिससे भय भी भय मानता है, उसकी यह दशा! ॥ ३१ ॥ आपने

अजन्मा होकर भी जन्म क्यों लिया है, इसका कारण बतलाते हुए कोई - कोई महापुरुष यों कहते हैं कि जैसे मलयाचलकी कीर्तिका विस्तार करनेके लिये उसमें चन्दन प्रकट होता है, वैसे ही अपने प्रिय भक्त पुण्यश्लोक राजा यदुकी कीर्तिका विस्तार करनेके लिये ही आपने उनके वंशमें अवतार ग्रहण किया है ॥३२ ॥

अपरे वसुदेवस्य देवक्यां याचितोऽभ्यगात् ।

अजस्त्वमस्य क्षेमाय वधाय च सुरद्विषाम् ॥३३

भारावतारणायान्ये भुवो नाव इवोदधौ ।

सीदन्त्या भूरिभारेण जातो ह्यात्मभुवार्थितः ॥ ३४

भवेऽस्मिन् क्लिश्यमानानामविद्याकामकर्मभिः ।

श्रवणस्मरणार्हाणि करिष्यन्निति केचन ॥३५

शृण्वन्ति गायन्ति गृणन्त्यभीक्ष्णशः ’ स्मरन्ति नन्दन्ति तवेहितं जनाः । त एव पश्यन्त्यचिरेण तावकं भवप्रवाहोपरमं पदाम्बुजम् ॥३६ अप्यद्य नस्त्वं स्वकृतेहित प्रभो जिहाससि स्वित्सुहृदोऽनुजीविनः । येषां न चान्यद्भवतः पदाम्बुजात् परायणं राजसु योजितांहसाम् ॥३७

के वयं नामरूपाभ्यां यदुभिः सह पाण्डवाः ।

भवतोऽदर्शनं यर्हि हृषीकाणामिवेशितुः ॥३८

****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 213

श्रीमद्भागवत महापुराण - १, पृष्ठ 213 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

नेयं शोभिष्यते तत्र यथेदानीं गदाधर ।

त्वत्पदैरङ्किता भाति स्वलक्षणविलक्षितैः ॥३९

इमे जनपदाः स्वृद्धाः सुपक्वौषधिवीरुधः ।

वनाद्रिनद्युदन्वन्तो ह्येधन्ते तव वीक्षितैः ४ ॥४०

अथ विश्वेश विश्वात्मन् विश्वमूर्ते स्वकेषु मे ।

स्नेहपाशमिमं छिन्धि दृढं पाण्डुषु वृष्णिषु ॥४१

दूसरे लोग यों कहते हैं कि वसुदेव और देवकीने पूर्वजन्ममें ( सुतपा और पृश्निके रूपमें ) आपसे यही वरदान प्राप्त किया था, इसीलिये आप अजन्मा होते हुए भी जगत्के कल्याण और दैत्योंके नाशके लिये उनके पुत्र बने हैं || ३३ || कुछ और लोग यों कहते हैं कि यह पृथ्वी दैत्योंके अत्यन्त भारसे समुद्रमें डूबते हुए जहाजकी तरह डगमगा रही थी - पीड़ित हो रही थी, तब ब्रह्माकी प्रार्थनासे उसका भार उतारनेके लिये ही आप प्रकट हुए ॥३४ ॥ कोई

महापुरुष यों कहते हैं की जो लोग इस संसारमें अज्ञान, कामना और कर्मोंके बन्धनमें जकड़े हुए पीड़ित हो रहे हैं उन लोगोंके लिये श्रवण और स्मरण करनेयोग्य लीला करनेके विचारसे ही आपने अवतार ग्रहण किया है || ३५ || भक्तजन बार - बार आपके चरित्रका श्रवण, गान, कीर्तन एवं स्मरण करके आनन्दित होते रहते हैं; वे ही अविलम्ब आपके उस चरणकमलका दर्शन कर पाते हैं; जो जन्म - मृत्युके प्रवाहको सदाके लिये रोक देता है ॥३६ ॥

भक्तवाञ्छाकल्पतरु प्रभो! क्या अब आप अपने आश्रित और सम्बन्धी हमलोगोंको छोड़कर जाना चाहते हैं । आप जानते हैं कि आपके चरणकमलोंके अतिरिक्त हमें और किसीका सहारा नहीं है । पृथ्वीके राजाओंके तो हम यों ही विरोधी हो गये हैं ॥३७ ॥ जैसे

जीवके बिना इन्द्रियाँ शक्तिहीन हो जाती हैं, वैसे ही आपके दर्शन बिना यदुवंशियोंके और हमारे पुत्र पाण्डवोंके नाम तथा रूपका अस्तित्व ही क्या रह जाता है ॥३८ ॥ गदाधर!

आपके विलक्षण चरणचिह्नोंसे चिह्नित यह कुरुजांगल - देशकी भूमि आज जैसी शोभायमान हो रही है, वैसी आपके चले जानेके बाद न रहेगी ॥ ३ ९ ॥ आपकी दृष्टिके प्रभावसे ही यह देश पकीहुई फसल तथा लता- - वृक्षोंसे समृद्ध हो रहा है । ये वन, पर्वत, नदी और समुद्र भी आपकी दृष्टिसे ही वृद्धिको प्राप्त हो रहे हैं ॥ ४० ॥ आप विश्वके स्वामी हैं, विश्वके आत्मा हैं

और विश्वरूप हैं । यदुवंशियों और पाण्डवोंमें मेरी बड़ी ममता हो गयी है । आप कृपा करके स्वजनोंके साथ जोड़े हुए इस स्नेहकी दृढ़ फाँसीको काट दीजिये ॥४१ ॥ श्रीकृष्ण! जैसे

गंगाकी अखण्ड धारा समुद्रमें गिरती रहती है, वैसे ही मेरी बुद्धि किसी दूसरी ओर न जाकर आपसे ही निरन्तर प्रेम करती रहे ॥४२ ॥ श्रीकृष्ण! अर्जुनके प्यारे सखा यदुवंशशिरोमणे!

आप पृथ्वीके भाररूप राजवेशधारी दैत्योंको जलानेके लिये अग्निस्वरूप हैं । आपकी शक्ति अनन्त है । गोविन्द! आपका यह अवतार गौ, ब्राह्मण और देवताओंका दुःख मिटानेके लिये ही है । योगेश्वर! चराचरके गुरु भगवन्! मैं आपको नमस्कार करती हूँ ॥ ४३ ॥

त्वयि मेऽनन्यविषया मतिर्मधुपतेऽसकृत् । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 214

श्रीमद्भागवत महापुराण - १, पृष्ठ 214 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

रतिमुद्वहतादद्धा ' गङ्गेवौघमुदन्वति ॥४२ श्रीकृष्ण कृष्णसख वृष्ण्यृषभावनिधुग्-राजन्यवंशदहनानपवर्गवीर्य । गोविन्द गोद्विजसुरार्तिहरावतार योगेश्वराखिलगुरो भगवन्नमस्ते ॥४३ सूत उवाच

पृथयेत्थं कलपदैः परिणूताखिलोदयः ।

मन्दं जहास वैकुण्ठो मोहयन्निव मायया ॥४४

तां बाढमित्युपामन्त्र्य प्रविश्य गजसाह्वयम् ।

स्त्रियश्च स्वपुरं यास्यन् प्रेम्णा राज्ञा निवारितः ॥४५

व्यासाद्यैरीश्वरेहाज्ञैः कृष्णेनाद्भुतकर्मणा ।

प्रबोधितोऽपीतिहासैर्नाबुध्यत शुचार्पितः २ ॥४६

आह राजा धर्मसुतश्चिन्तयन् सुहृदां वधम् ।

प्राकृतेनात्मना विप्राः स्नेहमोहवशं गतः ॥४७

अहो मे पश्यताज्ञानं हृदि रूढं दुरात्मनः ।

पारक्यस्यैव देहस्य बह्वयो मेऽक्षौहिणीर्हताः ॥ ४८

बालद्विजसुहृन्मित्रपितृभ्रातृगुरुद्रुहः ।

न मे स्यान्निरयान्मोक्षो ह्यपि वर्षायुतायुतैः ॥४९

सूतजी कहते हैं - इस प्रकार कुन्तीने बड़े मधुर शब्दोंमें भगवान्‌की अधिकांश लीलाओंका वर्णन किया । यह सब सुनकर भगवान् श्रीकृष्ण अपनी मायासे उसे मोहित करते हुए - से मन्द - मन्द मुसकराने लगे ॥ ४४ ॥ उन्होंने कुन्तीसे कह दिया- ' अच्छा ठीक है ' और

रथके स्थानसे वे हस्तिनापुर लौट आये । वहाँ कुन्ती और सुभद्रा आदि देवियोंसे विदा लेकर जब वे जाने लगे, तब राजा युधिष्ठिरने बड़े प्रेमसे उन्हें रोक लिया ॥ ४५ ॥ राजा युधिष्ठिरको

अपने भाई - बन्धुओंके मारे जानेका बड़ा शोक हो रहा था । भगवान्की लीलाका मर्म जाननेवाले व्यास आदि महर्षियोंने और स्वयं अद्भुत चरित्र करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णने भी अनेकों इतिहास कहकर उन्हें समझानेकी बहुत चेष्टा की; परंतु उन्हें सान्त्वना न मिली, ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 215

श्रीमद्भागवत महापुराण - १, पृष्ठ 215 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

उनका शोक न मिटा ॥४६ ॥ शौनकादि ऋषियो! धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरको अपने स्वजनोंके

वधसे बड़ी चिन्ता हुई । वे अविवेकयुक्त चित्तसे स्नेह और मोहके वशमें होकर कहने लगे— भला, मुझ दुरात्माके हृदयमें बद्धमूल हुए इस अज्ञानको तो देखो; मैंने सियार - कुत्तोंके आहार इस अनात्मा शरीरके लिये अनेक अक्षौहिणी सेनाका नाश कर डाला ॥४७-४८ ॥ मैंने बालक, ब्राह्मण, सम्बन्धी, मित्र, चाचा - ताऊ, भाई - बन्धु और गुरुजनोंसे द्रोह किया है । करोड़ों बरसोंसे भी नरकसे मेरा छुटकारा नहीं हो सकता ॥४९ ॥ यद्यपि शास्त्रका वचन है कि राजा

यदि प्रजाका पालन करनेके लिये धर्मयुद्धमें शत्रुओंको मारे तो उसे पाप नहीं लगता, फिर भी इससे मुझे संतोष नहीं होता ॥ ५० ॥ स्त्रियोंके पति और भाई - बन्धुओंको मारनेसे उनका मेरे

द्वारा यहाँ जो अपराध हुआ है । उसका मैं गृहस्थोचित यज्ञ - यागादिकोंके द्वारा मार्जन करनेमें समर्थ नहीं हूँ ॥५१ ॥ जैसे कीचड़से गँदला जल स्वच्छ नहीं किया जा सकता, मदिरासे

मदिराकी अपवित्रता नहीं मिटायी जा सकती, वैसे ही बहुत - से हिंसाबहुल यज्ञोंके द्वारा एक भी प्राणीकी हत्याका प्रायश्चित्त नहीं किया जा सकता ॥ ५२ ॥

नैनो राज्ञः प्रजाभर्तुर्धर्मयुद्धे वधो द्विषाम् ।

इति मे न तु बोधाय कल्पते शासनं वचः ॥५०

स्त्रीणां मद्धतबन्धूनां द्रोहो योऽसाविहोत्थितः ।

कर्मभिर्गृहमेधीयैर्नाहं कल्पो व्यपोहितुम् ॥५१

यथा पङ्केन पङ्काम्भः सुरया वा सुराकृतम् ।

भूतहत्यां तथैवैकां न यज्ञैर्मार्टुमर्हति ॥५२

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे कुन्तीस्तुतिर्युधिष्ठिरानुतापो नामाष्टमोऽध्यायः ॥८ ॥

१. प्रा ० पा ० – तेषां परेतानां । २. प्रा ० पा ० – शुचार्दितान् । १. प्रा ० पा ० — नान्यत्र त्वभयं । २. प्रा ० पा ० - दहति । ३. प्रा ० पा ० — भृगुश्रेष्ठ । ४. प्रा ० पा ० – बहिरपि ध्रुवम् । | १. प्रा ० पा ० — नृष्वपि यादस्सु । २. प्रा ० पा ० — मृषा ० । १. प्रा ० पा ० — करिष्य इति । २. प्रा ० पा ० – वदन्त्य ० । ३. प्रा ० प्रा ० स्वकृतेहितः । ४. प्रा ० पा ० – वीक्षिताः । १. प्रा ० पा ० — रतिमुद्वहतां तद्वत् । २. प्रा ० पा०— –शुचार्दिताः । * २१,८७० रथ, २१,८७० हाथी, १,० ९, ३५० पैदल और ६५,६०० घुड़सवार — इतनी सेनाको अक्षौहिणी कहते हैं । ( महाभारत ) ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 216

श्रीमद्भागवत महापुराण - १, पृष्ठ 216 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 217

श्रीमद्भागवत महापुराण - १, पृष्ठ 217 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अथ नवमोऽध्यायः युधिष्ठिरादिका भीष्मजीके पास जाना और भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति करते हुए भीष्मजीका प्राणत्याग करना सूत उवाच

इति भीतः प्रजाद्रोहात्सर्वधर्मविवित्सया ।

ततो विनशनं प्रागाद् यत्र देवव्रतोऽपतत् ॥१

तदा ते भ्रातरः सर्वे सदश्वैः स्वर्णभूषितैः ।

अन्वगच्छन् रथैर्विप्रा व्यासधौम्यादयस्तथा ॥२

भगवानपि विप्रर्षे रथेन सधनञ्जयः ।

स तैर्व्यरोचत नृपः कुबेर इव गुह्यकैः ॥ ३

दृष्ट्वा निपतितं भूमौ दिवश्च्युतमिवामरम् ।

प्रणेमुः पाण्डवा भीष्मं सानुगाः सह चक्रिणा ॥४

तत्र ब्रह्मर्षयः सर्वे देवर्षयश्च सत्तम ।

राजर्षयश्च तत्रासन् द्रष्टुं भरतपुङ्गवम् ॥५

सूतजी कहते हैं - इस प्रकार राजा युधिष्ठिर प्रजाद्रोहसे भयभीत हो गये । फिर सब धर्मोंका ज्ञान प्राप्त करनेकी इच्छासे उन्होंने कुरुक्षेत्रकी यात्रा की, जहाँ भीष्मपितामह शरशय्यापर पड़े हुए थे ॥१ ॥ शौनकादि ऋषियो! उस समय उन सब भाइयोंने स्वर्णजटित

रथोंपर, जिनमें अच्छे - अच्छे घोड़े जुते हुए थे, सवार होकर अपने भाई युधिष्ठिरका अनुगमन किया । उनके साथ व्यास, धौम्य आदि ब्राह्मण भी थे ॥२ ॥ शौनकजी! अर्जुनके साथ

भगवान् श्रीकृष्ण भी रथपर चढ़कर चले । उन सब भाइयोंके साथ महाराज युधिष्ठिरकी ऐसी शोभा हुई, मानो यक्षोंसे घिरे हुए स्वयं कुबेर ही जा रहे हों ॥ ३ ॥ अपने अनुचरों और भगवान्

श्रीकृष्णके साथ वहाँ जाकर पाण्डवोंने देखा कि भीष्मपितामह स्वर्गसे गिरे हुए देवताके समान पृथ्वीपर पड़े हुए हैं । उन लोगोंने उन्हें प्रणाम किया || ४ || शौनकजी! उसी समय भरतवंशियोंके गौरवरूप भीष्मपितामहको देखनेके लिये सभी ब्रह्मर्षि, देवर्षि और राजर्षि वहाँ आये ॥५ ॥

पर्वतो नारदो धौम्यो भगवान् बादरायणः ।

बृहदश्वो भरद्वाजः सशिष्यो रेणुकासुतः ॥६

वसिष्ठ इन्द्रप्रमदस्त्रितो गृत्समदोऽसितः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 218

श्रीमद्भागवत महापुराण - १, पृष्ठ 218 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

कक्षीवान् गौतमोऽत्रिश्च कौशिकोऽथ सुदर्शनः ॥७

अन्ये च मुनयो ब्रह्मन् ब्रह्मरातादयोऽमलाः ।

शिष्यैरुपेता आजग्मुः कश्यपाङ्गिरसादयः ॥८

तान् समेतान् महाभागानुपलभ्य वसूत्तमः ।

पूजयामास धर्मज्ञो देशकालविभागवित् ॥९

कृष्णं च तत्प्रभावज्ञ आसीनं जगदीश्वरम् ।

हृदिस्थं पूजयामास माययोपात्तविग्रहम् ॥१०

पाण्डुपुत्रानुपासीनान् प्रश्रयप्रेमसङ्गतान् ।

अभ्याचष्टानुरागात्रैरन्धीभूतेन चक्षुषा ॥ ११

अहो कष्टमहोऽन्याय्यं यद्यूयं धर्मनन्दनाः ।

जीवितुं नार्हथ क्लिष्टं विप्रधर्माच्युताश्रयाः ॥ १२

संस्थितेऽतिरथेः पाण्डौ पृथा बालप्रजा वधूः ।

युष्मत्कृते बहून् क्लेशान् प्राप्ता तोकवती मुहुः ॥१३

सर्वं कालकृतं मन्ये भवतां च यदप्रियम् ।

सपालो यद्वशे लोको वायोरिव घनावलिः ॥ १४

यत्र धर्मसुतो राजा गदापाणिर्वृकोदरः ।

कृष्णोऽस्त्री गाण्डिवं चापं सुहृत्कृष्णस्ततो विपत् ॥१५

न ह्यस्य कर्हिचिद्राजन् पुमान् वेद विधित्सितम् ।

यद्विजिज्ञासया युक्ता मुह्यन्ति कवयो s पि हि ॥१६

पर्वत, नारद, धौम्य, भगवान् व्यास, बृहदश्व, भरद्वाज, शिष्योंके साथ परशुरामजी, वसिष्ठ, इन्द्रप्रमद, त्रित, गृत्समद, असित, कक्षीवान्, गौतम, अत्रि, विश्वामित्र, सुदर्शन तथा और भी शुकदेव आदि शुद्ध हृदय महात्मागण एवं शिष्योंके सहित कश्यप, अंगिरापुत्र बृहस्पति आदि मुनिगण भी वहाँ पधारे ॥ ६-८ ॥ भीष्मपितामह धर्मको और देश - कालके विभागको – कहाँ किस समय क्या करना चाहिये, इस बातको जानते थे । उन्होंने उन बड़भागी ऋषियोंको सम्मिलित हुआ देखकर उनका यथायोग्य सत्कार किया ॥९ ॥ वे

****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 219

श्रीमद्भागवत महापुराण - १, पृष्ठ 219 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

भगवान् श्रीकृष्णका प्रभाव भी जानते थे । अतः उन्होंने अपनी लीलासे मनुष्यका वेष धारण करके वहाँ बैठे हुए तथा जगदीश्वरके रूपमें हृदयमें विराजमान भगवान् श्रीकृष्णकी बाहर तथा भीतर दोनों जगह पूजा की ॥१० ॥

पाण्डव बड़े विनय और प्रेमके साथ भीष्म पितामहके पास बैठ गये । उन्हें देखकर भीष्मपितामहकी आँखें प्रेमके आँसुओंसे भर गयीं । उन्होंने उनसे कहा – ॥११ ॥ ' धर्मपुत्रो!

हाय! हाय! यह बड़े कष्ट और अन्यायकी बात है कि तुमलोगोंको ब्राह्मण, धर्म और भगवान्‌के आश्रित रहनेपर भी इतने कष्टके साथ जीना पड़ा, जिसके तुम कदापि योग्य नहीं थे ॥१२ ॥ अतिरथी पाण्डुकी मृत्युके समय तुम्हारी अवस्था बहुत छोटी थी । उन दिनों

तुमलोगोंके लिये कुन्तीरानीको और साथ - साथ तुम्हें भी बार - बार बहुत - से कष्ट झेलने पड़े ॥१३ ॥ जिस प्रकार बादल वायुके वशमें रहते हैं, वैसे ही लोकपालोंके सहित सारा

संसार कालभगवान्के अधीन है । मैं समझता हूँ कि तुमलोगोंके जीवनमें ये जो अप्रिय घटनाएँ घटित हुई हैं, वे सब उन्हींकी लीला हैं || १४ || नहीं तो जहाँ साक्षात् धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर हों, गदाधारी भीमसेन और धनुर्धारी अर्जुन रक्षाका काम कर रहे हों, गाण्डीव धनुष हो और स्वयं श्रीकृष्ण सुहृद् हों - भला, वहाँ भी विपत्तिकी सम्भावना है? ॥१५ ॥ ये कालरूप

श्रीकृष्ण कब क्या करना चाहते हैं, इस बातको कभी कोई नहीं जानता । बड़े - बड़े ज्ञानी भी इसे जाननेकी इच्छा करके मोहित हो जाते हैं ॥१६ ॥

तस्मादिदं दैवतन्त्रं व्यवस्य भरतर्षभ ।

तस्यानुविहितोऽनाथा नाथ पाहि प्रजाः प्रभो ॥१७

एष वै भगवान् साक्षादाद्यो नारायणः पुमान् ।

मोहयन्मायया लोकं गूढश्चरति वृष्णिषु ॥१८

अस्यानुभावं भगवान् वेद गुह्यतमं शिवः ।

देवर्षिर्नारदः साक्षाद्भगवान् कपिलो नृप ॥१९

यं मन्यसे मातुलेयं प्रियं मित्रं सुहृत्तमम् ।

अकरोः सचिवं दूतं सौहृदादथ सारथिम् ॥२०

सर्वात्मनः समदृशो ह्यद्वयस्यानहङ्कृतेः ।

तत्कृतं मतिवैषम्यं निरवद्यस्य न क्वचित् ॥२१

तथाप्येकान्तभक्तेषु पश्य भूपानुकम्पितम् ।

यन्मेऽसूंस्त्यजतः साक्षात्कृष्णो दर्शनमागतः ॥ २२

****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 220

श्रीमद्भागवत महापुराण - १, पृष्ठ 220 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

भक्त्याऽऽवेश्य मनो यस्मिन् वाचा यन्नाम कीर्तयन् ।

त्यजन् कलेवरं योगी मुच्यते कामकर्मभिः ३ ॥२३

स देवदेवो भगवान् प्रतीक्षतां

कलेवरं यावदिदं हिनोम्यहम् ।

प्रसन्नहासारुणलोचनोल्लस-न्मुखाम्बुजो ध्यानपथश्चतुर्भुजः ॥ २४

सूत उवाच

युधिष्ठिरस्तदाकर्ण्य शयानं शरपञ्जरे ।

अपृच्छद्विविधान्धर्मानृषीणां चानुशृण्वताम् ॥२५

युधिष्ठिर! संसारकी ये सब घटनाएँ ईश्वरेच्छाके अधीन हैं । उसीका अनुसरण करके तुम इस अनाथ प्रजाका पालन करो; क्योंकि अब तुम्हीं इसके स्वामी और इसे पालन करनेमें समर्थ हो ॥१७ ॥

ये श्रीकृष्ण साक्षात् भगवान् हैं । ये सबके आदिकारण और परम पुरुष नारायण हैं ।

अपनी मायासे लोगोंको मोहित करते हुए ये यदुवंशियोंमें छिपकर लीला कर रहे हैं ॥ १८ ॥

इनका प्रभाव अत्यन्त गूढ़ एवं रहस्यमय है । युधिष्ठिर! उसे भगवान् शंकर, देवर्षि नारद और स्वयं भगवान् कपिल ही जानते हैं ॥१९ ॥ जिन्हें तुम अपना ममेरा भाई, प्रिय मित्र और

सबसे बड़ा हितू मानते हो तथा जिन्हें तुमने प्रेमवश अपना मन्त्री, दूत और सारथितक बनानेमें संकोच नहीं किया है, वे स्वयं परमात्मा हैं ॥२० ॥ इन सर्वात्मा, समदर्शी, अद्वितीय,

अहंकाररहित और निष्पाप परमात्मामें उन ऊँचे - नीचे कार्योंके कारण कभी किसी प्रकारकी विषमता नहीं होती ॥ २१ ॥ युधिष्ठिर! इस प्रकार सर्वत्र सम होनेपर भी देखो तो सही, वे

अपने अनन्यप्रेमी भक्तोंपर कितनी कृपा करते हैं । यही कारण है कि ऐसे समयमें जबकि मैं अपने प्राणोंका त्याग करने जा रहा हूँ, इन भगवान् श्रीकृष्णने मुझे साक्षात् दर्शन दिया है ॥२२ ॥ भगवत्परायण योगी पुरुष भक्तिभावसे इनमें अपना मन लगाकर और वाणीसे

इनके नामका कीर्तन करते हुए शरीरका त्याग करते हैं और कामनाओंसे तथा कर्मके बन्धनसे छूट जाते हैं ॥२३ ॥

वे ही देवदेव भगवान् अपने प्रसन्न हास्य और रक्तकमलके समान अरुण नेत्रोंसे उल्लसित मुखवाले चतुर्भुजरूपसे, जिसका और लोगोंको केवल ध्यानमें दर्शन होता है, तबतक यहीं स्थित रहकर प्रतीक्षा करें जबतक मैं इस शरीरका त्याग न कर दूँ ॥२४ ॥

सूतजी कहते हैं — युधिष्ठिरने उनकी यह बात सुनकर शरशय्यापर सोये हुए भीष्मपितामहसे बहुत - से ऋषियोंके सामने ही नाना प्रकारके धर्मोंके सम्बन्धमें अनेकों रहस्य पूछे ॥२५ ॥

****** ebook converter DEMO Watermarks *******