श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 271–280

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 271–280

पृष्ठ 271

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समस्त देवताओंने मेरी इन्हीं गाण्डीव धारण करनेवाली भुजाओंका निवातकवच आदि दैत्योंको मारनेके लिये आश्रय लिया । महाराज! यह सब जिनकी महती कृपाका फल था, उन्हीं पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णने मुझे आज ठग लिया? ॥१३ ॥

यद्बान्धवः कुरुबलाब्धिमनन्तपार-मेको रथेन ततरेऽहमतार्यसत्त्वम् । प्रत्याहृतं बहु ' धनं च मया परेषां तेजास्पदं मणिमयं च हृतं शिरोभ्यः ॥१४ यो भीष्मकर्णगुरुशल्यचमूष्वदभ्र -२

राजन्यवर्यरथमण्डलमण्डितासु ।

अग्रेचरो मम विभो रथयूथपाना-मायुर्मनांसि च दृशा सह ओज र आर्च्छत् ॥१५

यद्दोष्षु मा प्रणिहितं गुरुभीष्मकर्ण-नप्तृत्रिगर्तशलसैन्धवबाह्लिकाद्यैः । अस्त्राण्यमोघमहिमानि निरूपितानि नो पस्पृशुर्नृहरिदासमिवासुराणि ॥ १६ सौत्ये वृतः कुमतिनाऽऽत्मद ईश्वरो मे यत्पादपद्ममभवाय भजन्ति भव्याः । मां श्रान्तवाहमरयो रथिनो भुविष्ठं न प्राहरन् यदनुभावनिरस्तचित्ताः ॥१७ नर्माण्युदाररुचिरस्मितशोभितानि हे पार्थ हेऽर्जुन सखे कुरुनन्दनेति । संजल्पितानि नरदेव हृदिस्पृशानि स्मर्तुर्लुठन्ति हृदयं मम माधवस्य ॥१८ महाराज! कौरवोंकी सेना भीष्म द्रोण आदि अजेय महामत्स्योंसे पूर्ण अपार समुद्रके समान दुस्तर थी, परंतु उनका आश्रय ग्रहण करके अकेले ही रथपर सवार हो मैं उसे पार कर गया । उन्हींकी सहायतासे, आपको याद होगा, मैंने शत्रुओंसे राजा विराटका सारा गोधन तो वापस ले ही लिया, साथ ही उनके सिरोंपरसे चमकते हुए मणिमय मुकुट तथा अंगोंके अलंकारतक छीन लिये थे ॥ १४ ॥

भाईजी! कौरवोंकी सेना भीष्म, कर्ण, द्रोण, शल्य तथा अन्य बड़े - बड़े राजाओं और ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 272

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क्षत्रिय वीरोंके रथोंसे शोभायमान थी । उसके सामने मेरे आगे - आगे चलकर वे अपनी दृष्टिसे ही उन महारथी यूथपतियोंकी आयु, मन, उत्साह और बलको छीन लिया करते थे ॥१५ ॥

द्रोणाचार्य, भीष्म, कर्ण, भूरिश्रवा, सुशर्मा, शल्य, जयद्रथ और बाह्लीक आदि वीरोंने मुझपर अपने कभी न चूकनेवाले अस्त्र चलाये थे; परंतु जैसे हिरण्यकशिपु आदि दैत्योंके अस्त्र - शस्त्र भगवद्भक्त प्रह्लादका स्पर्श नहीं करते थे, वैसे ही उनके शस्त्रास्त्र मुझे छूतक नहीं सके । यह श्रीकृष्णके भुजदण्डोंकी छत्रछायामें रहनेका ही प्रभाव था ॥१६ ॥

श्रेष्ठ पुरुष संसारसे मुक्त होनेके लिये जिनके चरणकमलोंका सेवन करते हैं, अपने-आपतकको दे डालनेवाले उन भगवान्‌को मुझ दुर्बुद्धिने सारथितक बना डाला । अहा! जिस समय मेरे घोड़े थक गये थे और मैं रथसे उतरकर पृथ्वीपर खड़ा था, उस समय बड़े - बड़े महारथी शत्रु भी मुझपर प्रहार न कर सके; क्योंकि श्रीकृष्णके प्रभावसे उनकी बुद्धि मारी गयी थी ॥१७ ॥

महाराज! माधवके उन्मुक्त और मधुरमुसकानसे युक्त, विनोदभरे एवं हृदयस्पर्शी वचन और उनका मुझे ' पार्थ, अर्जुन, सखा, कुरुनन्दन ' आदि कहकर पुकारना, मुझे याद आनेपर मेरे हृदयमें उथल - पुथल मचा देते हैं ॥१८ ॥

शय्यासनाटनविकत्थनभोजनादि-ष्वैक्याद्वयस्य ऋतवानिति विप्रलब्धः । सख्युः सखेव पितृवत्तनयस्य सर्वं सेहे महान्महितया कुमतेरघं मे ॥ १ ९ सोऽहं नृपेन्द्र रहितः पुरुषोत्तमेन सख्या प्रियेण सुहृदा हृदयेन शून्यः । अध्वन्युरुक्रमपरिग्रहमङ्ग रक्षन् गोपैरसद्भिरबलेव विनिर्जितोऽस्मि ॥२० तद्वै धनुस्त इषवः स रथो हयास्ते सोऽहं रथी नृपतयो यत आनमन्ति । सर्वं क्षणेन तदभूसदीशरिक्तं भस्मन् हुतं कुहकराद्धमिवोप्तमूष्याम् ॥२१

राजंस्त्वयाभिपृष्टानां सुहृदां नः सुहृत्पुरे ।

विप्रशापविमूढानां निघ्नतां मुष्टिभिर्मिथः ॥२२

वारुणीं मदिरां पीत्वा मदोन्मथितचेतसाम् ।

अजानतामिवान्योन्यं चतुःपञ्चावशेषिताः ॥२३

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पृष्ठ 273

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प्रायेणैतद् भगवत ईश्वरस्य विचेष्टितम् ।

मिथो निघ्नन्ति भूतानि भावयन्ति च यन्मिथः ॥२४

जलौकसां जले यद्वन्महान्तोऽदन्त्यणीयसः ।

दुर्बलान्बलिनो राजन्महान्तो बलिनो मिथः ॥ २५

एवं बलिष्ठैर्यदुभिर्महद्भिरितरान् विभुः ।

यदून् यदुभिरन्योन्यं भूभारान् संजहार ह ॥२६

सोने, बैठने, टहलने और अपने सम्बन्धमें बड़ी - बड़ी बातें करने तथा भोजन आदि करनेमें हम प्रायः एक साथ रहा करते थे । किसी - किसी दिन मैं व्यंग्यसे उन्हें कह बैठता, ‘ मित्र! तुम तो बड़े सत्यवादी हो! ' उस समय भी वे महापुरुष अपनी महानुभावताके कारण, जैसे मित्र अपने मित्रका और पिता अपने पुत्रका अपराध सह लेता है उसी प्रकार, मुझ दुर्बुद्धिके अपराधोंको सह लिया करते थे ॥ १ ९ ॥ महाराज! जो मेरे सखा, प्रिय मित्र - नहीं -नहीं मेरे हृदय ही थे, उन्हीं पुरुषोत्तम भगवान् से मैं रहित हो गया हूँ । भगवान्की पत्नियोंको द्वारकासे अपने साथ ला रहा था, परंतु मार्गमें दुष्ट गोपोंने मुझे एक अबलाकी भाँति हरा दिया और मैं उनकी रक्षा नहीं कर सका ॥ २० ॥ वही मेरा गाण्डीव धनुष है, वे ही बाण हैं, वही रथ

है, वही घोड़े हैं और वही मैं रथी अर्जुन हूँ, जिसके सामने बड़े - बड़े राजालोग सिर झुकाया करते थे । श्रीकृष्णके बिना ये सब एक ही क्षणमें नहींके समान सारशून्य हो गये – ठीक उसी तरह, जैसे भस्ममें डाली हुई आहुति, कपटभरी सेवा और ऊसरमें बोया हुआ बीज व्यर्थ जाता है ॥२१ ॥

राजन्! आपने द्वारकावासी अपने जिन सुहृद् - सम्बन्धियोंकी बात पूछी है, वे ब्राह्मणोंके शापवश मोहग्रस्त हो गये और वारुणी मदिराके पानसे मदोन्मत्त होकर अपरिचितोंकी भाँति आपसमें ही एक - दूसरेसे भिड़ गये और घूँसोंसे मार - पीट करके सब - के - सब नष्ट हो गये । उनमेंसे केवल चार - पाँच ही बचे हैं ॥ २२-२३ ॥ वास्तवमें यह सर्वशक्तिमान् भगवान्की ही लीला है कि संसारके प्राणी परस्पर एक - दूसरेका पालन - पोषण भी करते हैं और एक - दूसरेको मार भी डालते हैं ॥२४ ॥ राजन्! जिस प्रकार जलचरोंमें बड़े जन्तु छोटोंको, बलवान्

दुर्बलोंको एवं बड़े और बलवान् भी परस्पर एक - दूसरेको खा जाते हैं, उसी प्रकार अतिशय बली और बड़े यदुवंशियोंके द्वारा भगवान् ने दूसरे राजाओंका संहार कराया । तत्पश्चात् यदुवंशियोंके द्वारा ही एकसे दूसरे यदुवंशीका नाश कराके पूर्णरूपसे पृथ्वीका भार उतार दिया ॥२५-२६ । |

देशकालार्थयुक्तानि हृत्तापोपशमानि च ।

हरन्ति स्मरतश्चित्तं गोविन्दाभिहितानि मे ॥२७

सूत उवाच ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 274

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एवं चिन्तयतो जिष्णोः कृष्णपादसरोरुहम् ।

सौहार्देनातिगाढेन शान्ताऽऽसीद्विमला मतिः ॥ २८

वासुदेवाङ्घ्यनुध्यानपरिबृंहितरंहसा ।

भक्त्या निर्मथिताशेषकषायधिषणोऽर्जुनः ॥२९

गीतं भगवता ज्ञानं यत् तत् सङ्ग्राममूर्धनि ।

कालकर्मतमोरुद्धं पुनरध्यगमद् विभुः ॥३०

विशोको ब्रह्मसम्पत्त्या संछिन्नद्वैतसंशयः ।

लीनप्रकृतिनैर्गुण्यादलिङ्गत्वादसम्भवः ॥३१

निशम्य भगवन्मार्गं संस्थां यदुकुलस्य च ।

स्वःपथाय मतिं चक्रे निभृतात्मा युधिष्ठिरः ॥३२

पृथाप्यनुश्रुत्य धनञ्जयोदितं नाशं यदूनां भगवद्गतिं च ताम् । एकान्तभक्त्या भगवत्यधोक्षजे निवेशितात्मोपरराम संसृतेः ॥३३

ययाहरद् भुवो भारं तां तनुं विजहावजः ।

कण्टकं कण्टकेनेव द्वयं चापीशितुः समम् ॥३४

यथा मत्स्यादिरूपाणि धत्ते जह्याद् यथा नटः ।

भूभारः क्षपितो येन जहौ तच्च कलेवरम् ॥३५

यदा मुकुन्दो भगवानिमां महीं

जहौ स्वतन्वा श्रवणीयसत्कथः ।

तदाहरेवाप्रतिबुद्धचेतसा-मधर्महेतुः कलिरन्ववर्तत ॥३६

भगवान् श्रीकृष्णने मुझे जो शिक्षाएँ दी थीं, वे देश, काल और प्रयोजनके अनुरूप तथा हृदयके तापको शान्त करनेवाली थीं; स्मरण आते ही वे हमारे चित्तका हरण कर लेती ॥२७ ॥

सूतजी कहते हैं - इस प्रकार प्रगाढ़ प्रेमसे भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलोंका चिन्तन करते - करते अर्जुनकी चित्तवृत्ति अत्यन्त निर्मल और प्रशान्त हो गयी || २८ || उनकी प्रेममयी भक्ति भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलोंके अहर्निश चिन्तनसे अत्यन्त बढ़ गयी । भक्तिके वेगने उनके हृदयको मथकर उसमेंसे सारे विकारोंको बाहर निकाल दिया ॥ २ ९ ॥ उन्हें युद्धके प्रारम्भमें भगवान्के द्वारा उपदेश किया हुआ गीता - ज्ञान पुनः स्मरण हो आया, जिसकी कालके व्यवधान और कर्मोंके विस्तारके कारण प्रमादवश कुछ दिनोंके लिये विस्मृति हो गयी थी ॥३० ॥ ब्रह्मज्ञानकी प्राप्तिसे मायाका आवरण भंग होकर गुणातीत अवस्था प्राप्त हो

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पृष्ठ 275

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गयी । द्वैतका संशय निवृत्त हो गया । सूक्ष्मशरीर भंग हुआ । वे शोक एवं जन्म - मृत्युके चक्रसे सर्वथा मुक्त हो गये ॥ ३१ ॥

भगवान्के स्वधामगमन और यदुवंशके संहारका वृत्तान्त सुनकर निश्चलमति युधिष्ठिरने स्वर्गारोहणका निश्चय किया || ३२ || कुन्तीने भी अर्जुनके मुखसे यदुवंशियोंके नाश और भगवान्‌के स्वधामगमनकी बात सुनकर अनन्य भक्तिसे अपने हृदयको भगवान् श्रीकृष्णमें लगा दिया और सदाके लिये इस जन्म - मृत्युरूप संसारसे अपना मुँह मोड़ लिया ॥ ३३ ॥

भगवान् श्रीकृष्णने लोकदृष्टिमें जिस यादवशरीरसे पृथ्वीका भार उतारा था, उसका वैसे ही परित्याग कर दिया, जैसे कोई काँटेसे काँटा निकालकर फिर दोनोंको फेंक दे । भगवान्‌की दृष्टिमें दोनों ही समान थे ॥३४ ॥ जैसे वे नटके समान मत्स्यादि रूप धारण करते हैं और फिर

उनका त्याग कर देते हैं, वैसे ही उन्होंने जिस यादवशरीरसे पृथ्वीका भार दूर किया था, उसे त्याग भी दिया ॥३५ ॥ जिनकी मधुर लीलाएँ श्रवण करनेयोग्य हैं, उन भगवान् श्रीकृष्णने

जब अपने मनुष्यके - से शरीरसे इस पृथ्वीका परित्याग कर दिया, उसी दिन विचारहीन लोगोंको अधर्ममें फँसानेवाला कलियुग आ धमका ॥३६ ॥

युधिष्ठिरस्तत्परिसर्पणं बुधः

पुरे च राष्ट्रे च गृहे तथाऽऽत्मनि ।

विभाव्य लोभानृतजिह्महिंसना-द्यधर्मचक्रं गमनाय पर्यधात् ॥३७

स्वराट् पौत्रं विनयिनमात्मनः सुसमं गुणैः ।

तोयनीव्याः पतिं भूमेरभ्यषिञ्चद्गजाह्वये ॥३८

मथुरायां तथा वज्रं शूरसेनपतिं ततः ।

प्राजापत्यां निरूप्येष्टिमग्नीनपिबदीश्वरः ॥ ३ ९

विसृज्य तत्र तत् सर्वं दुकूलवलयादिकम् ।

निर्ममो निरहङ्कारः संछिन्नाशेषबन्धनः ॥४०

वाचं जुहाव मनसि तत्प्राण इतरे च तम् ।

मृत्यावपानं सोत्सर्गं तं पञ्चत्वे ह्यजोहवीत् ॥४१

त्रित्वे ` हुत्वाथ पञ्चत्वं तच्चैकत्वेऽजुहोन्मुनिः ।

सर्वमात्मन्यजुहवीद् ब्रह्मण्यात्मानमव्यये ॥ ४२

चीरवासा निराहारो बद्धवाङ् मुक्तमूर्धजः ।

दर्शयन्नात्मनो रूपं जडोन्मत्तपिशाचवत् ॥४३

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पृष्ठ 276

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अनपेक्षमाणो निरगादशृण्वन्बधिरो यथा ।

उदीचीं प्रविवेशाशां गतपूर्वं महात्मभिः ।

हृदि ब्रह्म परं ध्यायन्नावर्तेत यतो गतः ॥४४

सर्वे तमनु निर्जग्मुर्भ्रातरः कृतनिश्चयाः ।

कलिनाधर्ममित्रेण दृष्ट्वा स्पृष्टाः प्रजा भुवि ॥४५

महाराज युधिष्ठिरसे कलियुगका फैलना छिपा न रहा । उन्होंने देखा – देशमें, नगरमें, घरोंमें और प्राणियोंमें लोभ, असत्य, छल, हिंसा आदि अधर्मोंकी बढ़ती हो गयी है । तब उन्होंने महाप्रस्थानका निश्चय किया || ३७ || उन्होंने अपने विनयी पौत्र परीक्षित्को, जो गुणोंमें उन्हींके समान थे, समुद्रसे घिरी हुई पृथ्वीके सम्राट् पदपर हस्तिनापुरमें अभिषिक्त किया ॥३८ ॥ उन्होंने मथुरामें शूरसेनाधिपतिके रूपमें अनिरुद्धके पुत्र वज्रका अभिषेक

किया । इसके बाद समर्थ युधिष्ठिरने प्राजापत्य यज्ञ करके आहवनीय आदि अग्नियोंको अपनेमें लीन कर दिया अर्थात् गृहस्थाश्रमके धर्मसे मुक्त होकर उन्होंने संन्यास ग्रहण किया ॥३९ ॥ युधिष्ठिरने अपने सब वस्त्राभूषण आदि वहीं छोड़ दिये एवं ममता और

अहंकारसे रहित होकर समस्त बन्धन काट डाले ॥ ४० ॥ उन्होंने दृढ़ भावनासे वाणीको

मनमें, मनको प्राणमें, प्राणको अपानमें और अपानको उसकी क्रियाके साथ मृत्युमें तथा मृत्युको पंचभूतमय शरीरमें लीन कर लिया ॥ ४१ ॥ इस प्रकार शरीरको मृत्युरूप अनुभव

करके उन्होंने उसे त्रिगुणमें मिला दिया, त्रिगुणको मूल प्रकृतिमें, सर्वकारणरूपा प्रकृतिको आत्मामें और आत्माको अविनाशी ब्रह्ममें विलीन कर दिया । उन्हें यह अनुभव होने लगा कि यह सम्पूर्ण दृश्यप्रपंच ब्रह्मस्वरूप है ॥ ४२ ॥ इसके पश्चात् उन्होंने शरीरपर चीर - वस्त्र धारण

कर लिया, अन्न - जलका त्याग कर दिया, मौन ले लिया और केश खोलकर बिखेर लिये । वे अपने रूपको ऐसा दिखाने लगे जैसे कोई जड, उन्मत्त या पिशाच हो ॥४३ ॥ फिर वे बिना

किसीकी बाट देखे तथा बहरेकी तरह बिना किसीकी बात सुने, घरसे निकल पड़े । हृदयमें उस परब्रह्मका ध्यान करते हुए, जिसको प्राप्त करके फिर लौटना नहीं होता, उन्होंने उत्तर दिशाकी यात्रा की, जिस ओर पहले बड़े - बड़े महात्माजन जा चुके हैं ॥४४ ॥

भीमसेन, अर्जुन आदि युधिष्ठिरके छोटे भाइयोंने भी देखा कि अब पृथ्वीमें सभी लोगोंको अधर्मके सहायक कलियुगने प्रभावित कर डाला है; इसलिये वे भी श्रीकृष्णचरणोंकी प्राप्तिका दृढ़ निश्चय करके अपने बड़े भाईके पीछे - पीछे चल पड़े ॥४५ ॥

उन्होंने जीवनके सभी लाभ भलीभाँति प्राप्त कर लिये थे; इसलिये यह निश्चय करके कि भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमल ही हमारे परम पुरुषार्थ हैं, उन्होंने उन्हें हृदयमें धारण किया ॥४६ ॥ पाण्डवोंके हृदयमें भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलोंके ध्यानसे भक्ति - भाव

उमड़ आया, उनकी बुद्धि सर्वथा शुद्ध होकर भगवान् श्रीकृष्णके उस सर्वोत्कृष्ट स्वरूपमें अनन्यभावसे स्थिर हो गयी; जिसमें निष्पाप पुरुष ही स्थिर हो पाते हैं । फलतः उन्होंने अपने विशुद्ध अन्तःकरणसे स्वयं ही वह गति प्राप्त की, जो विषयासक्त दुष्ट मनुष्योंको कभी प्राप्त ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 277

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नहीं हो सकती ॥४७-४८ ॥ संयमी एवं श्रीकृष्णके प्रेमावेशमें मुग्ध भगवन्मय विदुरजीने भी अपने शरीरको प्रभासक्षेत्रमें त्याग दिया । उस समय उन्हें लेनेके लिये आये हुए पितरोंके साथ वे अपने लोक ( यमलोक ) को चले गये ॥४९ ॥ द्रौपदीने देखा कि अब पाण्डवलोग निरपेक्ष

हो गये हैं; तब वे अनन्यप्रेमसे भगवान् श्रीकृष्णका ही चिन्तन करके उन्हें प्राप्त हो गयीं ॥५० ॥

ते साधुकृतसर्वार्था ज्ञात्वाऽऽत्यन्तिकमात्मनः ।

मनसा धारयामासुर्वैकुण्ठचरणाम्बुजम् ॥४६

तद्ध्यानोद्रिक्तया भक्त्या विशुद्धधिषणाः परे ।

तस्मिन् नारायणपदे एकान्तमतयो गतिम् ॥ ४७

अवापुर्दुरवापां ते असद्भिर्विषयात्मभिः ।

विधूतकल्मषास्थाने विरजेनात्मनैव हि ॥४८

विदुरोऽपि परित्यज्य प्रभासे देहमात्मवान् ।

कृष्णावेशेन तच्चित्तः पितृभिः स्वक्षयं ययौ ॥४९

द्रौपदी च तदाऽऽज्ञाय पतीनामनपेक्षताम् ।

वासुदेवे भगवति ह्येकान्तमतिराप तम् ॥५०

यः श्रद्धयैतद् भगवत्प्रियाणां पाण्डोः सुतानामिति सम्प्रयाणम् । शृणोत्यलं स्वस्त्ययनं पवित्रं लब्ध्वा हरौ भक्तिमुपैति सिद्धिम् ॥५१ भगवान्के प्यारे भक्त पाण्डवोंके महाप्रयाणकी इस परम पवित्र और मंगलमयी कथाको जो पुरुष श्रद्धासे सुनता है, वह निश्चय ही भगवान्की भक्ति और मोक्ष प्राप्त करता है ॥ ५१ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे पाण्डवस्वर्गारोहणं नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥१५ ॥

* एक बार राजा दुर्योधनने महर्षि दुर्वासाकी बड़ी सेवा की । उससे प्रसन्न होकर मुनिने दुर्योधनसे वर माँगनेको कहा । दुर्योधनने यह सोचकर कि ऋषिके शापसे पाण्डवोंको नष्ट ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 278

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करनेका अच्छा अवसर है, मुनिसे कहा - " ब्रह्मन्! हमारे कुलमें युधिष्ठिर प्रधान हैं, आप अपने दस सहस्र शिष्योंसहित उनका आतिथ्य स्वीकार करें । किंतु आप उनके यहाँ उस समय जायँ जबकि द्रौपदी भोजन कर चुकी हो, जिससे उसे भूखका कष्ट न उठाना पड़े । ” द्रौपदीके पास सूर्यकी दी हुई एक ऐसी बटलोई थी, जिसमें सिद्ध किया हुआ अन्न द्रौपदीके भोजन कर लेनेसे पूर्व शेष नहीं होता था; किन्तु उसके भोजन करनेके बाद वह समाप्त हो जाता था । दुर्वासाजी दुर्योधनके कथनानुसार उसके भोजन कर चुकनेपर मध्याह्नमें अपनी शिष्यमण्डलीसहित पहुँचे और धर्मराजसे बोले – “ हम नदीपर स्नान करने जाते हैं, तुम हमारे लिये भोजन तैयार रखना । " इससे द्रौपदीको बड़ी चिन्ता हुई और उसने अति आर्त होकर आर्तबन्धु भगवान् श्रीकृष्णकी शरण ली । भगवान् तुरंत ही अपना विलासभवन छोड़कर द्रौपदीकी झोंपड़ीपर आये और उससे बोले— “ कृष्णे! आज बड़ी भूख लगी है, कुछ खानेको दो । " द्रौपदी भगवान्‌की इस अनुपम दयासे गद्गद हो गयी और बोली, " प्रभो! मेरा बड़ा भाग्य है, जो आज विश्वम्भरने मुझसे भोजन माँगा; परन्तु क्या करूँ? अब तो कुटीमें कुछ भी नहीं है । " भगवान्ने कहा - " अच्छा, वह पात्र तो लाओ; उसमें कुछ होगा ही । ” द्रौपदी बटलोई ले आयी; उसमें कहीं शाकका एक कण लगा था । विश्वात्मा हरिने उसीको भोग लगाकर त्रिलोकीको तृप्त कर दिया और भीमसेनसे कहा कि मुनिमण्डलीको भोजनके लिये बुला लाओ । किन्तु मुनिगण तो पहले ही तृप्त होकर भाग गये थे । ( महाभारत ) । -१. प्रा ० पा ० – पुरु । २. प्रा ० पा ० - कृप । ३. प्रा ० पा ० – सह उज्जहार । १. प्रा ० पा ० — सत्त्वार्थाः । २. प्रा ० पा ० – गतयो । ३. प्रा ० पा०- — देहमात्मनः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 279

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अथ षोडशोऽध्यायः परीक्षित्की दिग्विजय तथा धर्म और पृथ्वीका संवाद सूत उवाच ततः परीक्षिद् द्विजवर्यशिक्षया महीं महाभागवतः शशास ह । यथा हि सूत्यामभिजातकोविदाः समादिशन् विप्र महद्गुणस्तथा ॥१ सूतजी कहते हैं— शौनकजी! पाण्डवोंके महाप्रयाणके पश्चात् भगवान्‌के परम भक्त राजा परीक्षित् श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी शिक्षाके अनुसार पृथ्वीका शासन करने लगे । उनके जन्मके समय ज्योतिषियोंने उनके सम्बन्धमें जो कुछ कहा था, वास्तवमें वे सभी महान् गुण उनमें विद्यमान थे ॥१ ॥

स उत्तरस्य तनयामुपयेम इरावतीम् ।

जनमेजयादींश्चतुरस्तस्यामुत्पादयत् सुतान् ॥ २

आजहाराश्वमेधांस्त्रीन् गङ्गायां भूरिदक्षिणान् ।

शारद्वतं गुरुं कृत्वा देवा यत्राक्षिगोचराः ॥३

निजग्राहौजसा वीरः कलिं दिग्विजये क्वचित् ।

नृपलिङ्गधरं शूद्रं घ्नन्तं गोमिथुनं पदा ॥ ४

शौनक उवाच कस्य हेतोर्निजग्राह कलिं दिग्विजये नृपः

नृदेवचिह्नधृक् शूद्रकोऽसौ गां यः पदाहनत् ।

तत्कथ्यतां महाभाग यदि कृष्णकथाश्रयम् ॥५

अथवास्य पदाम्भोजमकरन्दलिहां सताम् ।

किमन्यैरसदालापैरायुषो यदसद्व्ययः ॥ ६

क्षुद्रायुषां नृणामङ्ग मर्त्यानामृतमिच्छताम् । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 280

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इहोपहूतो भगवान् मृत्युः शामित्रकर्मणि ॥७ न कश्चिन्म्रियते तावद् यावदास्त इहान्तकः ।

एतदर्थं हि भगवानाहूतः परमर्षिभिः ।

अहो नृलोके पीयेत हरिलीलामृतं वचः ॥८

मन्दस्य मन्दप्रज्ञस्य वयो मन्दायुषश्च वै ।

निद्रया ह्रियते नक्तं दिवा च व्यर्थकर्मभिः ॥९

उन्होंने उत्तरकी पुत्री इरावतीसे विवाह किया । उससे उन्होंने जनमेजय आदि चार पुत्र उत्पन्न किये ॥२ ॥ तथा कृपाचार्यको आचार्य बनाकर उन्होंने गंगाके तटपर तीन अश्वमेधयज्ञ

किये, जिनमें ब्राह्मणोंको पुष्कल दक्षिणा दी गयी । उन यज्ञोंमें देवताओंने प्रत्यक्षरूपमें प्रकट होकर अपना भाग ग्रहण किया था || ३ || एक बार दिग्विजय करते समय उन्होंने देखा कि शूद्रके रूपमें कलियुग राजाका वेष धारण करके एक गाय और बैलके जोड़ेको ठोकरोंसे मार रहा है । तब उन्होंने उसे बलपूर्वक पकड़कर दण्ड दिया ॥४ ॥

शौनकजीने पूछा — महाभाग्यवान् सूतजी! दिग्विजयके समय महाराज परीक्षित्ने कलियुगको दण्ड देकर ही क्यों छोड़ दिया - मार क्यों नहीं डाला? क्योंकि राजाका वेष धारण करनेपर भी था तो वह अधम शूद्र ही, जिसने गायको लातसे मारा था? यदि यह प्रसंग भगवान् श्रीकृष्णकी लीलासे अथवा उनके चरणकमलोंके मकरन्द - रसका पान करनेवाले रसिक महानुभावोंसे सम्बन्ध रखता हो तो अवश्य कहिये । दूसरी व्यर्थकी बातोंसे क्या लाभ । उनमें तो आयु व्यर्थ नष्ट होती है ॥५-६ ॥ प्यारे सूतजी! जो लोग चाहते तो हैं मोक्ष परन्तु अल्पायु होनेके कारण मृत्युसे ग्रस्त हो रहे हैं, उनके कल्याणके लिये भगवान् यमका आवाहन करके उन्हें यहाँ शामित्रकर्ममें नियुक्त कर दिया गया है ॥७ ॥ जबतक यमराज यहाँ इस कर्ममें नियुक्त हैं, तबतक किसीकी मृत्यु

नहीं होगी । मृत्युसे ग्रस्त मनुष्यलोकके जीव भी भगवान्की सुधातुल्य लीला - कथाका पान कर सकें, इसीलिये महर्षियोंने भगवान् यमको यहाँ बुलाया है ॥८ ॥ एक तो थोड़ी आयु और

दूसरे कम समझ । ऐसी अवस्थामें संसारके मन्दभाग्य विषयी पुरुषोंकी आयु व्यर्थ ही बीती जा रही है— नींदमें रात और व्यर्थके कामोंमें दिन ॥९ ॥

सूत उवाच यदा परीक्षित् कुरुजाङ्गलेऽवसन् कलिं प्रविष्टं निजचक्रवर्तिते । निशम्य वार्तामनतिप्रियां ततः शरासनं संयुगशौण्डिराददे १ ॥१० ******* ****** ebook converter DEMO Watermarks **