श्रीगणेशाय नमः।
श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 281–290
श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 281–290
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स्वलङ्कृतं श्यामतुरङ्गयोजितं रथं मृगेन्द्रध्वजमाश्रितः पुरात् । वृतो रथाश्वद्विपपत्तियुक्तया स्वसेनया दिग्विजयाय निर्गतः ॥११
भद्राश्वं केतुमालं च भारतं चोत्तरान् कुरून् ।
किम्पुरुषादीनि वर्षाणि विजित्य जगृहे बलिम् ॥१२
तत्र तत्रोपशृण्वानः स्वपूर्वेषां महात्मनाम् ।
प्रगीयमाणं च यशः कृष्णमाहात्म्यसूचकम् ॥१३
आत्मानं च परित्रातमश्वत्थाम्नोऽस्त्रतेजसः ।
स्नेहं च वृष्णिपार्थानां तेषां भक्तिं च केशवे ॥१४
तेभ्यः परमसंतुष्टः प्रीत्युज्जृम्भितलोचनः ।
महाधनानि वासांसि ददौ हारान् महामनाः ॥१५
सारथ्यपारषदसेवनसख्यदौत्य-वीरासनानुगमनस्तवनप्रणामान् ।
स्निग्धेषु पाण्डुषु जगत्प्रणतिं च ३ विष्णो-र्भक्तिं करोति नृपतिश्चरणारविन्दे ॥१६
सूतजीने कहा — जिस समय राजा परीक्षित् कुरुजांगल देशमें सम्राट्के रूपमें निवास कर रहे थे, उस समय उन्होंने सुना कि मेरी सेनाद्वारा सुरक्षित साम्राज्यमें कलियुगका प्रवेश हो गया है । इस समाचारसे उन्हें दुःख तो अवश्य हुआ; परन्तु यह सोचकर कि युद्ध करनेका अवसर हाथ लगा, वे उतने दुःखी नहीं हुए । इसके बाद युद्धवीर परीक्षितने धनुष हाथमें ले लिया ॥१० ॥ वे श्यामवर्णके घोड़ोंसे जुते हुए, सिंहकी ध्वजावाले, सुसज्जित रथपर सवार
होकर दिग्विजय करनेके लिये नगरसे बाहर निकल पड़े । उस समय रथ, हाथी, घोड़े और पैदल सेना उनके साथ - साथ चल रही थी ॥ ११ । उन्होंने भद्राश्व, केतुमाल, भारत, उत्तरकुरु और किम्पुरुष आदि सभी वर्षोंको जीतकर वहाँके राजाओंसे भेंट ली ॥१२ ॥ उन्हें उन
देशोंमें सर्वत्र अपने पूर्वज महात्माओंका सुयश सुननेको मिला । उस यशोगानसे पद - पदपर भगवान् श्रीकृष्णकी महिमा प्रकट होती थी ॥१३ ॥ इसके साथ ही उन्हें यह भी सुननेको
मिलता था कि भगवान् श्रीकृष्णने अश्वत्थामाके ब्रह्मास्त्रकी ज्वालासे किस प्रकार उनकी रक्षा की थी, यदुवंशी और पाण्डवोंमें परस्पर कितना प्रेम था तथा पाण्डवोंकी भगवान् श्रीकृष्णमें
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कितनी भक्ति थी ॥१४ ॥ जो लोग उन्हें ये चरित्र सुनाते, उनपर महामना राजा परीक्षित् बहुत
प्रसन्न होते; उनके नेत्र प्रेमसे खिल उठते । वे बड़ी उदारतासे उन्हें बहुमूल्य वस्त्र और मणियोंके हार उपहाररूपमें देते ॥१५ ॥ वे सुनते कि भगवान् श्रीकृष्णने प्रेमपरवश होकर
पाण्डवोंके सारथिका काम किया, उनके सभासद् बने - यहाँतक कि उनके मनके अनुसार काम करके उनकी सेवा भी की । उनके सखा तो थे ही, दूत भी बने । वे रातको शस्त्र ग्रहण करके वीरासनसे बैठ जाते और शिविरका पहरा देते, उनके पीछे - पीछे चलते, स्तुति करते तथा प्रणाम करते; इतना ही नहीं, अपने प्रेमी पाण्डवोंके चरणोंमें उन्होंने सारे जगतको झुका दिया । तब परीक्षित्की भक्ति भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलोंमें और भी बढ़ जाती || १६ || इस प्रकार वे दिन - दिन पाण्डवोंके आचरणका अनुसरण करते हुए दिग्विजय कर रहे थे । उन्हीं दिनों उनके शिविरसे थोड़ी ही दूरपर एक आश्चर्यजनक घटना घटी । वह मैं आपको सुनाता हूँ ॥१७ ॥ धर्म बैलका रूप धारण करके एक पैरसे घूम रहा था । एक स्थानपर उसे
गायके रूपमें पृथ्वी मिली । पुत्रकी मृत्युसे दुःखिनी माताके समान उसके नेत्रोंसे आँसुओंके
झरने झर रहे थे । उसका शरीर श्रीहीन हो गया था । धर्म पृथ्वीसे पूछने लगा ॥१८ ॥
तस्यैवं वर्तमानस्य पूर्वेषां वृत्तिमन्वहम् ।
नातिदूरे किलाश्चर्यं यदासीत् तन्निबोध मे ॥ १७
धर्मः पदैकेन चरन् विच्छायामुपलभ्य गाम् ।
पृच्छति स्माश्रुवदनां विवत्सामिव मातरम् ॥१८
धर्म उवाच कच्चिद्भद्रेऽनामयमात्मनस्ते विच्छायासि म्लायतेषन्मुखेन । आलक्षये भवतीमन्तराधिं दूरे बन्धुं शोचसि कञ्चनाम्ब ॥१९ पादैर्न्यूनं शोचसि मैकपाद-मात्मानं वा वृषलैर्भोक्ष्यमाणम् । आहो सुरादीन् हृतयज्ञभागान् प्रजा उत स्विन्मघवत्यवर्षति ॥२० अरक्ष्यमाणाः स्त्रिय उर्वि बालान् शोचस्यथो पुरुषादैरिवार्तान् । वाचं देवीं ब्रह्मकुले कुकर्म-
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ण्यब्रह्मण्ये राजकुले कुलाग्रयान् ॥२१ किं क्षत्रबन्धून् कलिनोपसृष्टान्
राष्ट्राणि वा तैरवरोर्पितानि ।
इतस्ततो वाशनपानवासः-स्नानव्यवायोन्मुखजीवलोकम् ॥२२
धर्मने कहा — कल्याणि! कुशलसे तो हो न? तुम्हारा मुख कुछ - कुछ मलिन हो रहा है । तुम श्रीहीन हो रही हो, मालूम होता है तुम्हारे हृदयमें कुछ - न - कुछ दुःख अवश्य है । क्या तुम्हारा कोई सम्बन्धी दूर देशमें चला गया है, जिसके लिये तुम इतनी चिन्ता कर रही हो? ॥१९ ॥
कहीं तुम मेरी तो चिन्ता नहीं कर रही हो कि अब इसके तीन पैर टूट गये, एक ही पैर रह गया है? सम्भव है, तुम अपने लिये शोक कर रही हो कि अब शूद्र तुम्हारे ऊपर शासन करेंगे । तुम्हें इन देवताओंके लिये भी खेद हो सकता है, जिन्हें अब यज्ञोंमें आहुति नहीं दी जाती, अथवा उस प्रजाके लिये भी, जो वर्षा न होनेके कारण अकाल एवं दुर्भिक्षसे पीड़ित हो रही है ॥२० ॥
देवि! क्या तुम राक्षस- सरीखे मनुष्योंके द्वारा सतायी हुई अरक्षित स्त्रियों एवं आर्तबालकोंके लिये शोक कर रही हो? सम्भव है, विद्या अब कुकर्मी - ब्राह्मणोंके चंगुलमें पड़ गयी है और ब्राह्मण विप्रद्रोही राजाओंकी सेवा करने लगे हैं, और इसीका तुम्हें दुःख हो ॥२१ ॥
आजके नाममात्रके राजा तो सोलहों आने कलियुगी हो गये हैं, उन्होंने बड़े - बड़े देशोंको भी उजाड़ डाला है । क्या तुम उन राजाओं या देशोंके लिये शोक कर रही हो? आजकी जनता खान - पान, वस्त्र, स्नान और स्त्री सहवास आदिमें शास्त्रीय नियमोंका पालन न करके स्वेच्छाचार कर रही है; क्या इसके लिये तुम दुःखी हो? ॥२२ ॥
यद्वाम्ब ते भूरिभरावतार-कृतावतारस्य हरेर्धरित्रि । अन्तर्हितस्य स्मरती विसृष्टा कर्माणि निर्वाणविलम्बितानि ॥२३ इदं ममाचक्ष्व तवाधिमूलं वसुन्धरे येन विकर्शितासि । कालेन वा ते बलिनां बलीयसा सुरार्चितं किं हृतमम्ब सौभगम् ॥२४ धरण्युवाच १
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भवान् हि वेद तत्सर्वं यन्मां धर्मानुपृच्छसि ।
चतुर्भिर्वर्तसे येन पादैर्लोकसुखावहैः ॥ २५
सत्यं शौचं दया क्षान्तिस्त्यागः ३ सन्तोष आर्जवम् ।
शमो दमस्तपः साम्यं तितिक्षोपरतिः श्रुतम् ॥ २६
ज्ञानं विरक्तिरैश्वर्यं शौर्यं तेजो बलं ४ स्मृतिः ।
स्वातन्त्र्यं कौशलं कान्तिर्धैर्यं " मार्दवमेव च ॥२७
प्रागल्भ्यं प्रश्रयः शीलं सह ओजो बलं भगः ।
गाम्भीर्यं स्थैर्यमास्तिक्यं कीर्तिर्मानोऽनहङ्कृतिः ॥२८
एते चान्ये च भगवन्नित्या यत्र महागुणाः ।
प्रार्थ्या महत्त्वमिच्छद्भिर्न वियन्ति स्म कर्हिचित् ॥२९
तेनाहं गुणपात्रेण श्रीनिवासेन साम्प्रतम् ।
शोचामि रहितं लोकं पाप्मना कलिनेक्षितम् ॥३०
आत्मानं चानुशोचामि भवन्तं चामरोत्तमम् ।
देवान् पितॄनृषीन् साधून् सर्वान् वर्णांस्तथाऽऽश्रमान् ॥३१
मा पृथ्वी! अब समझमें आया, हो न हो तुम्हें भगवान् श्रीकृष्णकी याद आ रही होगी; क्योंकि उन्होंने तुम्हारा भार उतारनेके लिये ही अवतार लिया था और ऐसी लीलाएँ की थीं, जो मोक्षका भी अवलम्बन हैं । अब उनके लीला - संवरण कर लेनेपर उनके परित्यागसे तुम दुःखी हो रही हो ॥२३ ॥ देवि! तुम तो धन - रत्नोंकी खान हो । तुम अपने क्लेशका कारण,
जिससे तुम इतनी दुर्बल हो गयी हो, मुझे बतलाओ । मालूम होता है, बड़े - बड़े बलवानोंको भी हरा देनेवाले कालने देवताओंके द्वारा वन्दनीय तुम्हारे सौभाग्यको छीन लिया है ॥२४ ॥
पृथ्वीने कहा — धर्म! तुम मुझसे जो कुछ पूछ रहे हो, वह सब स्वयं जानते हो । जिन भगवान्के सहारे तुम सारे संसारको सुख पहुँचानेवाले अपने चारों चरणोंसे युक्त थे, जिनमें सत्य, पवित्रता, दया, क्षमा, त्याग, सन्तोष, सरलता, शम, दम, तप, समता, तितिक्षा, उपरति, शास्त्रविचार, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, वीरता, तेज, बल, स्मृति, स्वतन्त्रता, कौशल, कान्ति, धैर्य, कोमलता, निर्भीकता, विनय, शील, साहस, उत्साह, बल, सौभाग्य, गम्भीरता, स्थिरता, आस्तिकता, कीर्ति, गौरव और निरहंकारता - ये उनतालीस अप्राकृत गुण तथा महत्त्वाकांक्षी पुरुषोंके द्वारा वाञ्छनीय ( शरणागतवत्सलता आदि ) और भी बहुत - से महान् गुण उनकी
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सेवा करनेके लिये नित्य - निरन्तर निवास करते हैं, एक क्षणके लिये भी उनसे अलग नहीं होते —उन्हीं समस्त गुणोंके आश्रय, सौन्दर्यधाम भगवान् श्रीकृष्णने इस समय इस लोकसे अपनी लीला संवरण कर ली और यह संसार पापमय कलियुगकी कुदृष्टिका शिकार हो गया । यही देखकर मुझे बड़ा शोक हो रहा है ॥२५-३० ॥ अपने लिये, देवताओंमें श्रेष्ठ तुम्हारे लिये, देवता, पितर, ऋषि, साधु और समस्त वर्णों तथा आश्रमोंके मनुष्योंके लिये मैं शोकग्रस्त हो रही हूँ ॥३१ ॥
ब्रह्मादयो बहुतिथं ” यदपाङ्गमोक्ष-कामास्तपः २ समचरन् भगवत्प्रपन्नाः । सा श्रीः स्ववासमरविन्दवनं विहाय यत्पादसौभगमलं भजतेऽनुरक्ता ॥३२ तस्याहमब्जकुलिशाङ्कुशकेतुकेतैः श्रीमत्पदैर्भगवतः समलङ्कृताङ्गी । त्रीनत्यरोच उपलभ्य ततो विभूतिं लोकान् स मां व्यसृजदुत्स्मयतीं तदन्ते ॥३३ यो वै ममातिभरमासुरवंशराज्ञा-मक्षौहिणीशतमपानुददात्मतन्त्रः । त्वां दुःस्थमूनपदमात्मनि पौरुषेण सम्पादयन् यदुषु रम्यमबिभ्रदङ्गम् ॥३४ का वा सहेत विरहं पुरुषोत्तमस्य प्रेमावलोकरुचिरस्मितवल्गुजल्पैः । स्थैर्यं समानमहरन्मधुमानिनीनां रोमोत्सवो मम यदङ्घ्रिविटङ्कितायाः ॥३५
तयोरेवं कथयतोः पृथिवीधर्मयोस्तदा ।
परीक्षिन्नाम राजर्षिः प्राप्तः प्राचीं सरस्वतीम् ॥३६
जिनका कृपाकटाक्ष प्राप्त करनेके लिये ब्रह्मा आदि देवता भगवान्के शरणागत होकर बहुत दिनोंतक तपस्या करते रहे, वही लक्ष्मीजी अपने निवासस्थान कमलवनका परित्याग करके बड़े प्रेमसे जिनके चरणकमलोंकी सुभग छत्रछायाका सेवन करती हैं, उन्हीं भगवान्के कमल, वज्र, अंकुश, ध्वजा आदि चिह्नोंसे युक्त श्रीचरणोंसे विभूषित होनेके कारण मुझे महान् वैभव प्राप्त हुआ था और मेरी तीनों लोकोंसे बढ़कर शोभा हुई थी; परन्तु मेरे
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सौभाग्यका अब अन्त हो गया! भगवान्ने मुझ अभागिनीको छोड़ दिया! मालूम होता है मुझे अपने सौभाग्यपर गर्व हो गया था, इसीलिये उन्होंने मुझे यह दण्ड दिया है ॥३२-३३ ॥ तुम अपने तीन चरणोंके कम हो जानेसे मन - ही - मन कुढ़ रहे थे; अतः अपने पुरुषार्थसे तुम्हें अपने ही अन्दर पुनः सब अंगोंसे पूर्ण एवं स्वस्थ कर देनेके लिये वे अत्यन्त रमणीय श्यामसुन्दर विग्रहसे यदुवंशमें प्रकट हुए और मेरे बड़े भारी भारको, जो असुरवंशी राजाओंकी सैकड़ों अक्षौहिणियोंके रूपमें था, नष्ट कर डाला । क्योंकि वे परम स्वतन्त्र थे ॥३४ ॥ जिन्होंने अपनी प्रेमभरी चितवन, मनोहर मुसकान और मीठी - मीठी बातोंसे
सत्यभामा आदि मधुमयी मानिनियोंके मानके साथ धीरजको भी छीन लिया था और जिनके चरणकमलोंके स्पर्शसे मैं निरन्तर आनन्दसे पुलकित रहती थी, उन पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णका विरह भला कौन सह सकती है ॥ ३५ ॥
धर्म और पृथ्वी इस प्रकार आपसमें बातचीत कर ही रहे थे कि उसी समय राजर्षि परीक्षित् पूर्ववाहिनी सरस्वतीके तटपर आ पहुँचे ॥३६ ॥
इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे पृथ्वीधर्मसंवादो नाम षोडशोऽध्यायः ॥१६ ॥
१. प्रा ० पा ० — विष्णु । २. प्रा ० पा ० - भगवानुपहूतो महर्षिभिः । १. प्रा ० पा ० — शौण्ड आददे । २. प्रा ० पा ० – गीयमानं च पुरतः । ३. प्रा ० पा ० — स्म । १. प्रा ० पा ० — धरोवाच । २. प्रा ० पा ० – भवानेव हि तद्वेद यन्मां । ३. प्रा ० पा ० – दानं त्यागः । ४. प्रा ० पा०—- धृतिः । ५. प्रा ० पा ० – कान्तिः सौभाग्यं मार्दवं क्षमा । ६. प्रा ० पा०— इमे । -१. प्रा ० पा०- ० – यदनिशं । २. प्रा ० पा ० – तपोव्रतधरा भगव ० । ३. प्रा ० पा०-तपोविभूतिं । ४. प्रा ० पा ० — पारिक्षिते षोड ० ।
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अथ सप्तदशोऽध्यायः महाराज परीक्षितद्वारा कलियुगका दमन सूत उवाच
तत्र गोमिथुनं राजा हन्यमानमनाथवत् ।
दण्डहस्तं च वृषलं ददृशे नृपलाञ्छनम् ॥१
वृषं मृणालधवलं मेहन्तमिव बिभ्यतम् ।
वेपमानं पदैकेन सीदन्तं शूद्रताडितम् ॥२
गां च धर्मदुघां दीनां भृशं शूद्रपदाहताम् ।
विवत्सां साश्रुवदनां क्षामां यवसमिच्छतीम् ॥३
पप्रच्छ रथमारूढः कार्तस्वरपरिच्छदम् ।
मेघगम्भीरया वाचा समारोपितकार्मुकः ॥४
कस्त्वं मच्छरणे लोके बलाद्धंस्यबलान् बली ।
नरदेवोऽसि वेषेण नटवत्कर्मणाद्विजः ॥५
यस्त्वं कृष्णे गते दूरं सह गाण्डीवधन्वना ।
शोच्योऽस्यशोच्यान् रहसि प्रहरन् वधमर्हसि ॥६
त्वं वा मृणालधवलः पादैर्न्यूनः पदा चरन् ।
वृषरूपेण किं कश्चिद् देवो नः परिखेदयन् ॥७
न जातु पौरवेन्द्राणां दोर्दण्डपरिरम्भिते ।
भूतलेऽनुपतन्त्यस्मिन् विना ते प्राणिनां शुचः ॥८
सूतजी कहते हैं — शौनकजी! वहाँ पहुँचकर राजा परीक्षितने देखा कि एक राजवेषधारी शूद्र हाथमें डंडा लिये हुए है और गाय - बैलके एक जोड़ेको इस तरह पीटता जा रहा है, जैसे उनका कोई स्वामी ही न हो ॥ १ ॥ वह कमलतन्तुके समान श्वेत रंगका बैल एक पैरसे खड़ा
काँप रहा था तथा शूद्रकी ताड़नासे पीड़ित और भयभीत होकर मूत्र त्याग कर रहा था ॥२ ॥
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धर्मोपयोगी दूध, घी आदि हविष्य पदार्थोंको देनेवाली वह गाय भी बार - बार शूद्रके पैरोंकी ठोकरें खाकर अत्यन्त दीन हो रही थी । एक तो वह स्वयं ही दुबली - पतली थी, दूसरे उसका बछड़ा भी उसके पास नहीं था । उसे भूख लगी हुई थी और उसकी आँखोंसे आँसू बहते जा रहे थे ॥३ ॥ स्वर्णजटित रथपर चढ़े हुए राजा परीक्षित्ने अपना धनुष चढ़ाकर मेघके समान
गम्भीर वाणीसे उसको ललकारा ॥४ ॥ अरे! तू कौन है, जो बलवान् होकर भी मेरे राज्यके
इन दुर्बल प्राणियोंको बलपूर्वक मार रहा है? तूने नटकी भाँति वेष तो राजाका - सा बना रखा है, परन्तु कर्मसे तू शूद्र जान पड़ता है || ५ || हमारे दादा अर्जुनके साथ भगवान् श्रीकृष्णके परमधाम पधार जानेपर इस प्रकार निर्जन स्थानमें निरपराधोंपर प्रहार करनेवाला तू अपराधी है, अतः वधके योग्य है ॥ ६ ॥
उन्होंने धर्मसे पूछा – कमल - नालके समान आपका श्वेतवर्ण है । तीन पैर न होनेपर भी आप एक ही पैरसे चलते - फिरते हैं । यह देखकर मुझे बड़ा कष्ट हो रहा है । बतलाइये, आप क्या बैलके रूपमें कोई देवता हैं? ॥७ ॥ अभी यह भूमण्डल कुरुवंशी नरपतियोंके बाहुबलसे
सुरक्षित है । इसमें आपके सिवा और किसी भी प्राणीकी आँखोंसे शोकके आँसू बहते मैंने नहीं देखे ॥८ ॥
मा सौरभेयानुशुचो व्येतु ते वृषलाद् भयम् ।
मा रोदीरम्ब भद्रं ते खलानां मयि शास्तरि ॥९
यस्य राष्ट्रे प्रजाः सर्वास्त्रस्यन्ते ' साध्व्यसाधुभिः ।
तस्य मत्तस्य नश्यन्ति कीर्तिरायुर्भगो गतिः ॥१०
एष राज्ञां परो धर्मो ह्यार्तानामार्तिनिग्रहः ।
अत एनं वधिष्यामि भूतद्रुहमसत्तमम् ॥११
कोऽवृश्चत् तव पादांस्त्रीन् सौरभेय चतुष्पद ' ।
मा भूवंस्त्वादृशा राष्ट्रे राज्ञां कृष्णानुवर्तिनाम् ॥ १२
आख्याहि वृष भद्रं वः साधूनामकृतागसाम् ।
आत्मवैरूप्यकर्तारं पार्थानां कीर्तिदूषणम् ॥ १३
जनेऽनागस्यघं युञ्जन् सर्वतोऽस्य च मद्भयम् ।
साधूनां भद्रमेव स्यादसाधुदमने कृते ॥१४
अनागस्स्विह भूतेषु य आगस्कृन्निरङ्कुशः ।
आहर्तास्मि भुजं साक्षादमर्त्यस्यापि साङ्गदम् ॥१५
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राज्ञो हि परमो धर्मः स्वधर्मस्थानुपालनम् ।
शासतोऽन्यान् यथाशास्त्रमनापद्युत्पथानिह ॥ १६
धर्म उवाच
एतद् वः पाण्डवेयानां युक्तमार्ताभयं वचः ।
येषां गुणगणैः कृष्णो दौत्यादौ भगवान् कृतः ॥१७
न वयं क्लेशबीजानि यतः ४ स्युः पुरुषर्षभ ।
पुरुषं तं विजानीमो वाक्यभेदविमोहिताः ॥१८
धेनुपुत्र! अब आप शोक न करें । इस शूद्रसे निर्भय हो जायँ । गोमाता! मैं दुष्टोंको दण्ड
देनेवाला हूँ । अब आप रोयें नहीं । आपका कल्याण हो ॥९ ॥
देवि! जिस राजाके राज्यमें दुष्टोंके उपद्रवसे सारी प्रजा त्रस्त रहती है उस मतवाले राजाकी कीर्ति, आयु, ऐश्वर्य और परलोक नष्ट हो जाते हैं ॥१० ॥
राजाओंका परम धर्म यही है कि वे दुःखियोंका दुःख दूर करें । यह महादुष्ट और
प्राणियोंको पीड़ित करनेवाला है । अतः मैं अभी इसे मार डालूँगा ॥११ ॥
सुरभिनन्दन! आप तो चार पैरवाले जीव हैं । आपके तीन पैर किसने काट डाले? श्रीकृष्णके अनुयायी राजाओंके राज्यमें कभी कोई भी आपकी तरह दुःखी न हो ॥१२ ॥
वृषभ! आपका कल्याण हो । बताइये, आप जैसे निरपराध साधुओंका अंग - भंग करके किस दुष्टने पाण्डवोंकी कीर्तिमें कलंक लगाया है? ॥१३ ॥ जो किसी निरपराध प्राणीको
सताता है, उसे चाहे वह कहीं भी रहे, मेरा भय अवश्य होगा । दुष्टोंका दमन करनेसे साधुओंका कल्याण ही होता है ॥१४ ॥ जो उद्दण्ड व्यक्ति निरपराध प्राणियोंको दुःख देता है,
वह चाहे साक्षात् देवता ही क्यों न हो, मैं उसकी बाजूबंद से विभूषित भुजाको काट डालूँगा ॥१५ ॥ बिना आपत्तिकालके मर्यादाका उल्लंघन करनेवालोंको शास्त्रानुसार दण्ड
देतेहुए अपने धर्ममें स्थित लोगोंका पालन करना राजाओंका परम धर्म है ॥१६ ॥
धर्मने कहा — राजन्! आप महाराज पाण्डुके वंशज हैं । आपका इस प्रकार दुःखियोंको आश्वासन देना आपके योग्य ही है; क्योंकि आपके पूर्वजोंके श्रेष्ठ गुणोंने भगवान् श्रीकृष्णको उनका सारथि और दूत आदि बना दिया था ॥१७ ॥ नरेन्द्र! शास्त्रोंके विभिन्न वचनोंसे मोहित
होनेके कारण हम उस पुरुषको नहीं जानते, जिससे क्लेशोंके कारण उत्पन्न होते हैं ॥१८ ॥
केचिद् विकल्पवसना आहुरात्मानमात्मनः ।
दैवमन्ये परे कर्म स्वभावमपरे प्रभुम् ॥१९
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अप्रतर्क्यादनिर्देश्यादिति केष्वपि निश्चयः ।
अत्रानुरूपं राजर्षे विमृश स्वमनीषया ॥२०
सूत उवाच
एवं धर्मे प्रवदति स सम्राड् द्विजसत्तम ।
समाहितेन मनसा विखेदः पर्यचष्ट तम् ॥२१
राजोवाच
धर्मं ब्रवीषि धर्मज्ञ धर्मोऽसि वृषरूपधृक् ।
यदधर्मकृतः स्थानं सूचकस्यापि तद्भवेत् ॥२२
अथवा देवमायाया नूनं गतिरगोचरा ।
चेतसो वचसश्चापि भूतानामिति निश्चयः ॥२३
तपः शौचं दया सत्यमिति पादाः कृते कृताः ।
अधर्मांशैस्त्रयो भग्नाः स्मयसङ्गमदैस्तव ॥२४
इदानीं धर्म पादस्ते सत्यं निर्वर्तयेद्यतः ।
तं जिघृक्षत्यधर्मोऽयमनृतेनैधितः कलिः ॥२५
इयं च भूर्भगवता न्यासितोरुभरा सती ।
श्रीमद्भिस्तत्पदन्यासैः सर्वतः कृतकौतुका ॥ २६
शोचत्यश्रुकला साध्वी दुर्भगेवोज्झिताधुना ।
अब्रह्मण्या नृपव्याजाः शूद्रा भोक्ष्यन्ति मामिति ॥२७
जो लोग किसी भी प्रकारके द्वैतको स्वीकार नहीं करते, वे अपने - आपको ही अपने दुःखका कारण बतलाते हैं । कोई प्रारब्धको कारण बतलाते हैं, तो कोई कर्मको । कुछ लोग स्वभावको, तो कुछ लोग ईश्वरको दुःखका कारण मानते हैं ॥१९ ॥ किन्हीं - किन्हींका ऐसा भी
निश्चय है कि दुःखका कारण न तो तर्कके द्वारा जाना जा सकता है और न वाणीके द्वारा बतलाया जा सकता है । राजर्षे! अब इनमें कौन - सा मत ठीक है, यह आप अपनी बुद्धिसे ही विचार लीजिये || २० || सूतजी कहते हैं - ऋषिश्रेष्ठ शौनकजी! धर्मका यह प्रवचन सुनकर सम्राट् परीक्षित्