श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 371–380

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 371–380

पृष्ठ 371

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राजाओंके रूपमें तथा जब सृष्टिके प्रलयका समय होता है, तब अधर्म, रुद्र तथा क्रोधवश नामके सर्प एवं दैत्य आदिके रूपमें सर्वशक्तिमान् भगवान्‌की माया - विभूतियाँ ही प्रकट होती हैं ॥३९ ॥ अपनी प्रतिभाके बलसे पृथ्वीके एक - एक धूलिकणको गिन चुकनेपर भी जगत्में

ऐसा कौन पुरुष है, जो भगवान्‌की शक्तियोंकी गणना कर सके । जब वे त्रिविक्रम - अवतार लेकर त्रिलोकीको नाप रहे थे, उस समय उनके चरणोंके अदम्य वेगसे प्रकृतिरूप अन्तिम आवरणसे लेकर सत्यलोकतक सारा ब्रह्माण्ड काँपने लगा था । तब उन्होंने ही अपनी शक्तिसे उसे स्थिर किया था || ४० || समस्त सृष्टिकी रचना और संहार करनेवाली माया उनकी एक शक्ति है । ऐसी - ऐसी अनन्त शक्तियोंके आश्रय उनके स्वरूपको न मैं जानता हूँ और न वे तुम्हारे बड़े भाई सनकादि ही; फिर दूसरोंका तो कहना ही क्या है । आदिदेव भगवान् शेष सहस्र मुखसे उनके गुणोंका गायन करते आ रहे हैं; परन्तु वे अब भी उसके अन्तकी कल्पना नहीं कर सके ॥४१ ॥ जो निष्कपटभावसे अपना सर्वस्व और अपने - आपको भी उनके

चरणकमलोंमें निछावर कर देते हैं, उनपर वे अनन्तभगवान् स्वयं ही अपनी ओरसे दया करते हैं और उनकी दयाके पात्र ही उनकी दुस्तर मायाका स्वरूप जानते हैं और उसके पार जा पाते हैं । वास्तवमें ऐसे पुरुष ही कुत्ते और सियारोंके कलेवारूप अपने और पुत्रादिके शरीरमें ‘ यह मैं हूँ और यह मेरा है ' ऐसा भाव नहीं करते ॥४२ ॥ प्यारे नारद! परम पुरुषकी उस

योगमायाको मैं जानता हूँ तथा तुमलोग, भगवान् शंकर, दैत्यकुल- भूषण प्रह्लाद, शतरूपा, मनु, मनुपुत्र प्रियव्रत आदि, प्राचीनबर्हि, ऋभु और ध्रुव भी जानते हैं || ४३ ॥ इनके सिवा इक्ष्वाकु, पुरूरवा, मुचुकुन्द, जनक, गाधि, रघु, अम्बरीष, सगर, गय, ययाति आदि तथा मान्धाता, अलर्क, शतधन्वा, अनु, रन्तिदेव, भीष्म, बलि अमूर्त्तरय, दिलीप, सौभरि, उत्तंक, शिबि, देवल, पिप्पलाद, सारस्वत, उद्धव, पराशर, भूरिषेण एवं विभीषण, हनुमान्, शुकदेव, अर्जुन, आर्ष्टिषेण, विदुर और श्रुतदेव आदि महात्मा भी जानते हैं ॥४४-४५ ॥ जिन्हें भगवान्के प्रेमी भक्तोंका - सा स्वभाव बनानेकी शिक्षा मिली है, वे स्त्री, शूद्र, हूण, भील और पापके कारण पशु - पक्षी आदि योनियोंमें रहनेवाले भी भगवान्‌की मायाका रहस्य जान जाते हैं और इस संसारसागरसे सदाके लिये पार हो जाते हैं; फिर जो लोग वैदिक सदाचारका पालन करते हैं, उनके सम्बन्धमें तो कहना ही क्या है ॥ ४६ ॥

सौभर्युतङ्कशिबिदेवलपिप्पलाद- १ सारस्वतोद्धवपराशरभूरिषेणाः । येऽन्ये विभीषणहनूमदुपेन्द्रदत्त -२ पार्थार्ष्टिषेणविदुरश्रुतदेववर्याः ३ ॥४५ ते वै विदन्त्यतितरन्ति च देवमायां

स्त्री शूद्रहूणशबरा अपि पापजीवाः ।

यद्यद्भुतक्रमपरायणशीलशिक्षा-स्तिर्यग्जना अपि किमु श्रुतधारणा ये ॥४६

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पृष्ठ 372

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शश्वत् प्रशान्तमभयं प्रतिबोधमात्रं शुद्धं समं सदसतः परमात्मतत्त्वम् । शब्दो न यत्र पुरुकारकवान् क्रियार्थो माया परैत्यभिमुखे च विलज्जमाना ॥४७ तद् वै पदं भगवतः परमस्य पुंसो ब्रह्मेति यद् विदुरजस्रसुखं विशोकम् । सध्यङ् नियम्य यतयो यमकर्तहेतिं जह्युःस्वराडिव निपानखनित्रमिन्द्रः ॥४८ स श्रेयसामपि विभुर्भगवान् यतोऽस्य भावस्वभावविहितस्य सतः प्रसिद्धिः । देहे स्वधातुविगमेऽनुविशीर्यमाणे व्योमेव तत्र पुरुषो न विशीर्यतेऽजः५॥४९ परमात्माका वास्तविक स्वरूप एकरस, शान्त, अभय एवं केवल ज्ञानस्वरूप है । न उसमें मायाका मल है और न तो उसके द्वारा रची हुई विषमताएँ ही । वह सत् और असत् दोनोंसे परे है । किसी भी वैदिक या लौकिक शब्दकी वहाँतक पहुँच नहीं है । अनेक प्रकारके साधनोंसे सम्पन्न होनेवाले कर्मोंका फल भी वहाँतक नहीं पहुँच सकता । और तो क्या, स्वयं माया भी उसके सामने नहीं जा पाती, लजाकर भाग खड़ी होती है ॥ ४७ ॥ परमपुरुष

भगवान्का वही परमपद है । महात्मालोग उसीका शोकरहित अनन्त आनन्दस्वरूप ब्रह्मके रूपमें साक्षात्कार करते हैं । संयमशील पुरुष उसीमें अपने मनको समाहित करके स्थित हो जाते हैं । जैसे इन्द्र स्वयं मेघरूपसे विद्यमान होनेके कारण जलके लिये कुआँ खोदनेकी कुदाल नहीं रखते वैसे ही वे भेद दूर करनेवाले ज्ञान - साधनोंको भी छोड़ देते हैं ॥४८ ॥

समस्त कर्मोंके फल भी भगवान् ही देते हैं । क्योंकि मनुष्य अपने स्वभावके अनुसार जो शुभकर्म करता है, वह सब उन्हींकी प्रेरणासे होता है । इस शरीरमें रहनेवाले पंचभूतोंके अलग - अलग हो जानेपर जब - यह शरीर नष्ट हो जाता है, तब भी इसमें रहनेवाला अजन्मा पुरुष आकाशके समान नष्ट नहीं होता ॥४९ ॥

सोऽयं तेऽभिहितस्तात भगवान् विश्वभावनः ।

समासेन हरेर्नान्यदन्यस्मात् सदसच्च यत् ॥५०

इदं भागवतं नाम यन्मे भगवतोदितम् ।

संग्रहोऽयं विभूतीनां त्वमेतद् ' विपुलीकुरु ॥ ५१

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पृष्ठ 373

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यथा हरौ भगवति नृणां भक्तिर्भविष्यति ।

सर्वात्मन्यखिलाधारे इति सङ्कल्प्य वर्णय ' ॥५२

मायां वर्णयतोऽमुष्य ईश्वरस्यानुमोदतः ।

शृण्वतः श्रद्धया नित्यं माययाऽऽत्मा न मुह्यति ॥५३

बेटा नारद! संकल्पसे विश्वकी रचना करनेवाले षडैश्वर्यसम्पन्न श्रीहरिका मैंने तुम्हारे सामने संक्षेपसे वर्णन किया । जो कुछ कार्य - कारण अथवा भाव -अभाव है, वह सब भगवान्से भिन्न नहीं है । फिर भी भगवान् तो इससे पृथक् भी हैं ही ॥ ५० ॥ भगवान्ने मुझे

जो उपदेश किया था, वह यही ' भागवत ' है । इसमें भगवान्‌की विभूतियोंका संक्षिप्त वर्णन है । तुम इसका विस्तार करो ॥५१ ॥ जिस प्रकार सबके आश्रय और सर्वस्वरूप भगवान्

श्रीहरिमें लोगोंकी प्रेममयी भक्ति हो, ऐसा निश्चय करके इसका वर्णन करो ॥ ५२ ॥ जो पुरुष

भगवान्की अचिन्त्य शक्ति मायाका वर्णन या दूसरेके द्वारा किये हुए वर्णनका अनुमोदन करते हैं अथवा श्रद्धाके साथ नित्य श्रवण करते हैं, उनका चित्त मायासे कभी मोहित नहीं होता ॥५३ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे ब्रह्मनारदसंवादे सप्तमोऽध्यायः ॥७ ॥

१. प्रा ० पा ० — शीर्षशीर्षा । * ' पुत्र ' शब्दका अर्थ ही है ' पुत् ' नामक नरकसे रक्षा करनेवाला । १. प्रा ० पा ० — मनसा । २. प्रा ० पा ० — रवाप दुःखमायुश्च । ३. प्रा ० पा ० – उद्यन्नसाव ० । १. प्रा ० पा ० — भग्नमहे ० । २. प्रा ० पा ० – विलम्बित । ३. प्रा ० पा ० — तोऽरि ० । * केशोंके अवतार कहनेका अभिप्राय यह है कि पृथ्वीका भार उतारनेके लिये भगवानुका एक केश ही काफी है इसके अतिरिक्त श्रीबलरामजी और श्रीकृष्णके वर्णोंकी सूचना देनेके लिये भी उन्हें क्रमशः सफेद और काले केशोंका अवतार कहा गया है । वस्तुतः श्रीकृष्ण तो पूर्णपुरुष स्वयं भगवान् हैं - कृष्णस्तु भगवान् स्वयम् । १. प्रा ० पा ० — पिप्पलादाः | २. प्रा ० पा ० - दत्ताः । ३. प्रा ० पा ० – देवभूपाः । ४. प्रा ० पा ० — सम्यङ् । ५. प्रा ० पा ० — ऽतः । १. प्रा ० पा ० — तदेतद् । २. प्रा ० पा ० – वर्ण्यताम् । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 374

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पृष्ठ 375

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अथाष्टमोऽध्यायः राजा परीक्षित्के विविध प्रश्न राजोवाच

ब्रह्मणा चोदितो ब्रह्मन् गुणाख्यानेऽगुणस्य च ।

यस्मै यस्मै यथा प्राह नारदो देवदर्शनः ॥१

एतद् वेदितुमिच्छामि तत्त्वं वेदविदां वर ।

हरेरद्भुतवीर्यस्य कथा लोकसुमङ्गलाः ३ ॥ २

कथयस्व महाभाग यथाहमखिलात्मनि ।

कृष्णे निवेश्य निःसङ्गं मनस्त्यक्ष्ये कलेवरम् ॥३

राजा परीक्षित्ने कहा— भगवन्! आप वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ हैं । मैं आपसे यह जानना चाहता हूँ कि जब ब्रह्माजीने निर्गुण भगवान्‌के गुणोंका वर्णन करनेके लिये नारदजीको आदेश दिया, तब उन्होंने किन- किनको किस रूपमें उपदेश किया? एक तो अचिन्त्य शक्तियोंके आश्रय भगवान्की कथाएँ ही लोगोंका परम मंगल करनेवाली हैं, दूसरे देवर्षि नारदका सबको भगवद्दर्शन करानेका स्वभाव है । अवश्य ही आप उनकी बातें मुझे सुनाइये ॥१-२ ॥ महाभाग्यवान् शुकदेवजी! आप मुझे ऐसा उपदेश कीजिये कि मैं अपने आसक्तिरहित मनको सर्वात्मा भगवान् श्रीकृष्णमें तन्मय करके अपना शरीर छोड़ सकूँ ॥३ ॥

शृण्वतः श्रद्धया नित्यं गृणतश्च स्वचेष्टितम् ।

कालेन नातिदीर्घेण भगवान् विशते हृदि ॥४

प्रविष्टः कर्णरन्ध्रेण स्वानां भावसरोरुहम् ।

धुनोति शमलं कृष्णः सलिलस्य यथा शरत् ॥५

धौतात्मा पुरुषः कृष्णपादमूलं न मुञ्चति ।

मुक्त ' सर्वपरिक्लेशः पान्थः स्वशरणं यथा ॥६

यदधातुमतो ब्रह्मन् देहारम्भोऽस्य धातुभिः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 376

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यदृच्छया हेतुना वा भवन्तो जानते यथा ॥७ आसीद् यदुदरात् पद्मं लोकसंस्थानलक्षणम् ।

यावानयं वै पुरुष इयत्तावयवैः ः पृथक् ।

तावानसाविति प्रोक्तः संस्थावयववानिव ॥८

अजः सृजति भूतानि भूतात्मा यदनुग्रहात् ।

ददृशे येन तद्रूपं नाभिपद्मसमुद्भवः ॥ ९

स चापि यत्र पुरुषो विश्वस्थित्युद्भवाप्ययः ।

मुक्त्वाऽऽत्ममायां मायेशः शेते सर्वगुहाशयः ॥ १०

पुरुषावयवैर्लोकाः सपालाः पूर्वकल्पिताः ।

लोकैरमुष्यावयवाः सपालैरिति शुश्रुम ॥११

यावान् कल्पो विकल्पो वा यथा कालोऽनुमीयते ।

भूतभव्यभवच्छब्द आयुर्मानं च यत् सतः ॥१२

जो लोग उनकी लीलाओंका श्रद्धाके साथ नित्य श्रवण और कथन करते हैं, उनके हृदयमें थोड़े ही समयमें भगवान् प्रकट हो जाते हैं ॥४ ॥ श्रीकृष्ण कानके छिद्रोंके द्वारा अपने

भक्तोंके भावमय हृदयकमलपर जाकर बैठ जाते हैं और जैसे शरद् ऋतु जलका गँदलापन मिटा देती है, वैसे ही वे भक्तोंके मनोमलका नाश कर देते हैं || ५ || जिसका हृदय शुद्ध हो जाता है, वह श्रीकृष्णके चरणकमलोंको एक क्षणके लिये भी नहीं छोड़ता — जैसे मार्गके समस्त क्लेशोंसे छूटकर घर आया हुआ पथिक अपने घरको नहीं छोड़ता ॥६ ॥

भगवन्! जीवका पंचभूतोंके साथ कोई सम्बन्ध नहीं है । फिर भी इसका शरीर पंचभूतोंसे ही बनता है । तो क्या स्वभावसे ही ऐसा होता है, अथवा किसी कारणवश - आप इस बातका मर्म पूर्णरीतिसे जानते हैं ॥७ ॥ ( आपने बतलाया कि ) भगवान्की नाभिसे वह

कमल प्रकट हुआ, जिसमें लोकोंकी रचना हुई । यह जीव अपने सीमित अवयवोंसे जैसे परिच्छिन्न है, वैसे ही आपने परमात्माको भी सीमित अवयवोंसे परिच्छिन्न - सा वर्णन किया ( यह क्या बात है? ) ॥८ ॥ जिनकी कृपासे सर्वभूतमय ब्रह्माजी प्राणियोंकी सृष्टि करते हैं,

जिनके नाभिकमलसे पैदा होनेपर भी जिनकी कृपासे ही ये उनके रूपका दर्शन कर सके थे, वे संसारकी स्थिति, उत्पत्ति और प्रलयके हेतु, सर्वान्तर्यामी और मायाके स्वामी परमपुरुष परमात्मा अपनी मायाका त्याग करके किसमें किस रूपसे शयन करते हैं? ॥९ - १० ॥ पहले आपने बतलाया था कि विराट् पुरुषके अंगोंसे लोक और लोकपालोंकी रचना हुई और फिर यह भी बतलाया कि लोक और लोकपालोंके रूपमें उसके अंगोंकी कल्पना हुई । इन दोनों ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 377

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बातोंका तात्पर्य क्या है? ॥११ ॥

महाकल्प और उनके अन्तर्गत अवान्तर कल्प कितने हैं? भूत, भविष्यत् और वर्तमान कालका अनुमान किस प्रकार किया जाता है? क्या स्थूल देहाभिमानी जीवोंकी आयु भी बँधी हुई है ॥१२ ॥ ब्राह्मणश्रेष्ठ! कालकी सूक्ष्म गति त्रुटि आदि और स्थूल गति वर्ष आदि किस

प्रकारसे जानी जाती है? विविध कर्मोंसे जीवोंकी कितनी और कैसी गतियाँ होती हैं ॥१३ ॥

देव, मनुष्य आदि योनियाँ सत्त्व, रज, तम - इन तीन गुणोंके फलस्वरूप ही प्राप्त होती हैं । उनको चाहनेवाले जीवोंमेंसे कौन - कौन किस - किस योनिको प्राप्त करनेके लिये किस - किस प्रकारसे कौन - कौन कर्म स्वीकार करते हैं? ॥१४ ॥ पृथ्वी, पाताल, दिशा, आकाश, ग्रह,

नक्षत्र, पर्वत, नदी, समुद्र, द्वीप और उनमें रहनेवाले जीवोंकी उत्पत्ति कैसे होती है? ॥१५ ॥

ब्रह्माण्डका परिमाण भीतर और बाहर - दोनों प्रकारसे बतलाइये । साथ ही महापुरुषोंके चरित्र, वर्णाश्रमके भेद और उनके धर्मका निरूपण कीजिये ॥१६ ॥ युगोंके भेद, उनके

परिमाण और उनके अलग - अलग धर्म तथा भगवान्‌के विभिन्न अवतारोंके परम आश्चर्यमय चरित्र भी बतलाइये ॥१७ ॥ मनुष्योंके साधारण और विशेष धर्म कौन - कौन से हैं? विभिन्न

व्यवसायवाले लोगोंके, राजर्षियोंके और विपत्तिमें पड़े हुए लोगोंके धर्मका भी उपदेश कीजिये ॥१८ ॥ तत्त्वोंकी संख्या कितनी है, उनके स्वरूप और लक्षण क्या हैं? भगवान्की

आराधनाकी और अध्यात्मयोगकी विधि क्या है? ॥१९ ॥ योगेश्वरोंको क्या - क्या ऐश्वर्य प्राप्त

होते हैं, तथा अन्तमें उन्हें कौन- सी गति मिलती है? योगियोंका लिंगशरीर किय प्रकार भंग होता है? वेद, उपवेद, धर्मशास्त्र, इतिहास और पुराणोंका स्वरूप एवं तात्पर्य क्या है? ॥२० ॥ समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय कैसे होता है? बावली, कुआँ

खुदवाना आदि स्मार्त्त, यज्ञ - यागादि वैदिक एवं काम्य कर्मोंकी तथा अर्थ - धर्म - कामके साधनोंकी विधि क्या है? || २१ || प्रलयके समय जो जीव प्रकृतिमें लीन रहते हैं, उनकी उत्पत्ति कैसे होती है? पाखण्डकी उत्पत्ति कैसे होती है? आत्माके बन्ध - मोक्षका स्वरूप क्या है? और वह अपने स्वरूपमें किस प्रकार स्थित होता है? ॥ २२ ॥ भगवान् तो परम स्वतन्त्र

हैं । वे अपनी मायासे किस प्रकार क्रीड़ा करते हैं और उसे छोड़कर साक्षीके समान उदासीन कैसे हो जाते हैं? ॥२३ || भगवन्! मैं यह सब आपसे पूछ रहा हूँ । मैं आपकी शरणमें हूँ । महामुने! आप कृपा करके क्रमशः इनका तात्त्विक निरूपण कीजिये ॥२४ ॥ इस विषयमें

आप स्वयम्भू ब्रह्माके समान परम प्रमाण हैं । दूसरे लोग तो अपनी पूर्वपरम्परासे सुनी - सुनायी बातोंका ही अनुष्ठान करते हैं ॥ २५ ॥ ब्रह्मन्! आप मेरी भूख - प्यासकी चिन्ता न करें । मेरे

प्राण कुपित ब्राह्मणके शापके अतिरिक्त और किसी कारणसे निकल नहीं सकते; क्योंकि मैं आपके मुखारविन्दसे निकलनेवाली भगवान्‌की अमृतमयी लीलाकथाका पान कर रहा हूँ ॥२६ ॥

कालस्यानुगतिर्या तु लक्ष्यतेऽण्वी बृहत्यपि ।

यावत्यः कर्मगतयो यादृशीर्द्विजसत्तम ॥१३

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पृष्ठ 378

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यस्मिन् कर्मसमावायो यथा येनोपगृह्यते ।

गुणानां गुणिनां चैव परिणाममभीप्सताम् ॥१४

भूपातालककुब्व्योमग्रहनक्षत्रभूभृताम् ।

सरित्समुद्रद्वीपानां सम्भवश्चैतदोकसाम् ॥१५

प्रमाणमण्डकोशस्य बाह्याभ्यन्तरभेदतः ' ।

महतां चानुचरितं वर्णाश्रमविनिश्चयः ॥१६

युगानि युगमानं च धर्मो यश्च युगे युगे ।

अवतारानुचरितं यदाश्चर्यतमं हरेः ॥ १७

नृणां साधारणो धर्मः सविशेषश्च यादृशः ।

श्रेणीनां राजर्षीणां च धर्मः कृच्छ्रेषु जीवताम् ॥१८

तत्त्वानां परिसंख्यानं लक्षणं हेतुलक्षणम् ।

पुरुषाराधनविधिर्योगस्याध्यात्मिकस्य च ॥ १ ९

योगेश्वरैश्वर्यगतिर्लिङ्गभङ्गस्तु योगिनाम् ।

वेदोपवेदधर्माणामितिहासपुराणयोः ॥ २०

सम्प्लवः सर्वभूतानां विक्रमः प्रतिसंक्रमः ।

इष्टापूर्तस्य काम्यानां त्रिवर्गस्य च यो विधिः ॥२१

यश्चानुशायिनां सर्गः पाखण्डस्य च सम्भवः ।

आत्मनो बन्धमोक्षौ च व्यवस्थानं स्वरूपतः ॥२२

यथाऽऽत्मतन्त्रो भगवान् विक्रीडत्यात्ममायया ।

विसृज्य वा यथा मायामुदास्ते साक्षिवद् विभुः ॥२३

सर्वमेतच्च भगवन् पृच्छते मेऽनुपूर्वशः ।

तत्त्वतोऽर्हस्युदाहर्तुं प्रपन्नाय महामुने ॥२४

अत्र प्रमाणं हि भवान् परमेष्ठी यथाऽऽत्मभूः ।

परे चेहानुतिष्ठन्ति पूर्वेषां पूर्वजैः कृतम् ॥२५

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पृष्ठ 379

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न मेऽसवः परायन्ति ब्रह्मन्ननशनादमी ।

पिबतोऽच्युतपीयूषमन्यत्र कुपिताद् द्विजात् ॥२६

सूत उवाच

स उपामन्त्रितो राज्ञा कथायामिति सत्पतेः ।

ब्रह्मरातो भृशं प्रीतो विष्णुरातेन संसदि ॥२७

प्राह भागवतं नाम पुराणं ब्रह्मसम्मितम् ।

ब्रह्मणे भगवत्प्रोक्तं ब्रह्मकल्प उपागते ॥२८

यद् यत् परीक्षिदृषभः पाण्डूनामनुपृच्छति ।

आनुपूर्व्येण तत्सर्वमाख्यातुमुपचक्रमे ॥ २ ९

सूतजी कहते हैं - शौनकादि ऋषियो! जब राजा परीक्षितने संतोंकी सभामें भगवान्की लीला - कथा सुनानेके लिये इस प्रकार प्रार्थना की, तब श्रीशुकदेवजीको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥२७ ॥ उन्होंने उन्हें वही वेदतुल्य श्रीमद्भागवत महापुराण सुनाया, जो ब्राह्मकल्पके

आरम्भमें स्वयं भगवान्ने ब्रह्माजीको सुनाया था ॥२८ ॥ पाण्डुवंशशिरोमणि परीक्षित्ने उनसे

जो - जो प्रश्न किये थे, वे उन सबका उत्तर क्रमशः देने लगे ॥२९ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे प्रश्नविधिर्नामाष्टमोऽध्यायः ॥८ ॥

३. प्रा ० पा ० - योगे सुमंगलाः । १. प्रा ० पा ० — मुक्तः सर्वपरिक्लेशैः । २. प्रा ० पा०— - यावत्कल्पो । १. प्रा ० पा०— ० - भ्यन्तरवस्तुनः । २. प्रा ० पा ० - चारु चरितं । ३. प्रा ० पा ० — मयं । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 380

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अथ नवमोऽध्यायः ब्रह्माजीका भगवद्धामदर्शन और भगवान्‌के द्वारा उन्हें चतुःश्लोकी भागवतका उपदेश श्रीशुक उवाच

आत्ममायामृते राजन् परस्यानुभवात्मनः ।

न घटेतार्थसम्बन्धः स्वप्नद्रष्टुरिवाञ्जसा ॥ १

बहुरूप इवाभाति मायया बहुरूपया ।

रमाणो गुणेष्वस्या ममाहमिति मन्यते ॥ २

श्रीशुकदेवजीने कहा - परीक्षित्! जैसे स्वप्नमें देखे जानेवाले पदार्थोंके साथ उसे देखनेवालेका कोई सम्बन्ध नहीं होता, वैसे ही देहादिसे अतीत अनुभवस्वरूप आत्माका मायाके बिना दृश्य पदार्थोंके साथ कोई सम्बन्ध नहीं हो सकता || १ || विविध रूपवाली मायाके कारण वह विविध रूपवाला प्रतीत होता है और जब उसके गुणोंमें रम जाता है तब ‘ यह मैं हूँ, यह मेरा है ' इस प्रकार मानने लगता है ॥२ ॥

यर्हि वाव महिम्नि स्वे परस्मिन् कालमाययोः ।

रमेत गतसम्मोहस्त्यक्त्वोदास्ते तदोभयम् ॥३

आत्मतत्त्वविशुद्ध्यर्थं यदाह भगवानृतम् ।

ब्रह्मणे दर्शयन् रूपमव्यलीकव्रतादृतः ॥ ४

स आदिदेवो जगतां परो गुरुः स्वधिष्ण्यमास्थाय सिसृक्षयैक्षत । तां नाध्यगच्छद् दृशमत्र सम्मतां प्रपञ्चनिर्माणविधिर्यया भवेत् ॥५ स चिन्तयन् द्वयक्षरमेकदाम्भ-स्युपाशृणोद् द्विर्गदितं वचो विभुः । स्पर्शेषु यत्षोडशमेकविंशं निष्किञ्चनानां नृप यद् धनं विदुः ॥६ निशम्य तद्वदिदृक्षया दिशो विलोक्य तत्रान्यदपश्यमानः । स्वधिष्ण्यमास्थाय विमृश्य तद्धितं ****** ebook converter DEMO Watermarks *******