श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 381–390

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 381–390

पृष्ठ 381

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तपस्युपादिष्ट इवादधे मनः ॥७ दिव्यं सहस्राब्दममोघदर्शनो जितानिलात्मा विजितोभयेन्द्रियः । अतप्यत स्माखिललोकतापनं तपस्तपीयांस्तपतां समाहितः ॥८ तस्मै स्वलोकं भगवान् सभाजितः सन्दर्शयामास परं न यत्परम् । व्यपेतसंक्लेशविमोहसाध्वसं स्वदृष्टवद्भिर्विबुधैरभिष्टुतम् ॥९ किन्तु जब यह गुणोंको क्षुब्ध करनेवाले काल और मोह उत्पन्न करनेवाली माया – इन दोनोंसे परे अपने अनन्त स्वरूपमें मोहरहित होकर रमण करने लगता है - आत्माराम हो जाता है; तब यह ‘ मैं, मेरा ' का भाव छोड़कर पूर्ण उदासीन - गुणातीत हो जाता है ॥३ ॥

ब्रह्माजीकी निष्कपट तपस्यासे प्रसन्न होकर भगवान्ने उन्हें अपने रूपका दर्शन कराया और आत्म - तत्त्वके ज्ञानके लिये उन्हें परम सत्य परमार्थ वस्तुका उपदेश किया ( वही बात मैं तुम्हें सुनाता हूँ ) ॥४ ॥

तीनों लोकोंके परम गुरु आदिदेव ब्रह्माजी अपने जन्मस्थान कमलपर बैठकर सृष्टि करनेकी इच्छासे विचार करने लगे । परन्तु जिस ज्ञानदृष्टिसे सृष्टिका निर्माण हो सकता था और जो सृष्टि - व्यापारके लिये वांछनीय है, वह दृष्टि उन्हें प्राप्त नहीं हुई || ५ || एक दिन वे यही चिन्ता कर रहे थे कि प्रलयके समुद्रमें उन्होंने व्यंजनोंके सोलहवें एवं इक्कीसवें अक्षर ‘ त ’ तथा ‘ प ' को — ‘ तप - तप ' ( ' तप करो ' ) इस प्रकार दो बार सुना । परीक्षित्! महात्मालोग इस तपको ही त्यागियोंका धन मानते हैं || ६ || यह सुनकर ब्रह्माजीने वक्ताको देखनेकी इच्छासे चारों ओर देखा, परन्तु वहाँ दूसरा कोई दिखायी न पड़ा । वे अपने कमलपर बैठ गये और ' मुझे तप करनेकी प्रत्यक्ष आज्ञा मिली है ' ऐसा निश्चयकर और उसीमें अपना हित समझकर उन्होंने अपने मनको तपस्यामें लगा दिया || ७ || ब्रह्माजी तपस्वियोंमें सबसे बड़े तपस्वी हैं । उनका ज्ञान अमोघ है । उन्होंने उस समय एक सहस्र दिव्य वर्षपर्यन्त एकाग्र चित्तसे अपने प्राण, मन, कर्मेन्द्रिय और ज्ञानेन्द्रियोंको वशमें करके ऐसी तपस्या की, जिससे वे समस्त लोकोंको प्रकाशित करनेमें समर्थ हो सके ॥८ ॥

उनकी तपस्यासे प्रसन्न होकर भगवान्ने उन्हें अपना वह लोक दिखाया, जो सबसे श्रेष्ठ है और जिससे परे कोई दूसरा लोक नहीं है । उस लोकमें किसी भी प्रकारके क्लेश, मोह और भय नहीं हैं । जिन्हें कभी एक बार भी उसके दर्शनका सौभाग्य प्राप्त हुआ है, वे देवता बार-बार उसकी स्तुति करते रहते हैं ॥९ ॥

प्रवर्तते यत्र रजस्तमस्तयोः सत्त्वं च मिश्रं न च कालविक्रमः १ । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 382

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न यत्र माया किमुतापरे हरे-रनुव्रता यत्र सुरासुरार्चिताः ॥१० श्यामावदाताः शतपत्रलोचनाः पिशङ्गवस्त्राः सुरुचः सुपेशसः । सर्वे चतुर्बाहव उन्मिषन्मणि-प्रवेकनिष्काभरणाः सुवर्चसः । प्रवालवैदूर्यमृणालवर्चसः परिस्फुरत्कृण्डलमौलिमालिनः ॥११ भ्राजिष्णुभिर्यः परितो विराजते लसद्विमानावलिभिर्महात्मनाम् । विद्योतमानः प्रमदोत्तमाद्युभिः सविद्युदभ्रावलिभिर्यथा नभः ॥१२ श्रीर्यत्र रूपिण्युरुगायपादयोः

करोति मानं बहुधा विभूतिभिः ।

प्रेङ्खं श्रिता या कुसुमाकरानुगै-र्विगीयमाना प्रियकर्म गायती ॥१३

ददर्श तत्राखिलसात्वतां पतिं श्रियः पतिं यज्ञपतिं जगत्पतिम् । सुनन्दनन्दप्रबलार्हणादिभिः २ स्वपार्षदमुख्यैः परिसेवितं विभुम् ॥१४ भृत्यप्रसादाभिमुखं दृगासवं प्रसन्नहासारुणलोचनाननम् । किरीटिनं कुण्डलिनं चतुर्भुजं पीताम्बरं वक्षसि लक्षितं श्रिया ॥ १५ वहाँ रजोगुण, तमोगुण और इनसे मिला हुआ सत्त्वगुण भी नहीं है । वहाँ न कालकी दाल गलती है और न माया ही कदम रख सकती है; फिर मायाके बाल - बच्चे तो जा ही कैसे सकते हैं । वहाँ भगवान्के वे पार्षद निवास करते हैं, जिनका पूजन देवता और दैत्य दोनों ही करते हैं ॥१० ॥ उनका उज्ज्वल आभासे युक्त श्याम शरीर शतदल कमलके समान कोमल

नेत्र और पीले रंगके वस्त्रसे शोभायमान है । अंग - अंगसे राशि राशि सौन्दर्य बिखरता रहता है । वे कोमलताकी मूर्ति हैं । सभीके चार - चार भुजाएँ हैं । वे स्वयं तो अत्यन्त तेजस्वी हैं ही, मणिजटित सुवर्णके प्रभामय आभूषण भी धारण किये रहते हैं । उनकी छबि मूँगे, वैदूर्यमणि और कमलके उज्ज्वल तन्तुके समान है । उनके कानोंमें कुण्डल, मस्तकपर मुकुट और कण्ठमें मालाएँ शोभायमान हैं ॥११ ॥ जिस प्रकार आकाश बिजलीसहित बादलोंसे

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पृष्ठ 383

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शोभायमान होता है, वैसे ही वह लोक मनोहर कामिनियोंकी कान्तिसे युक्त महात्माओंके दिव्य तेजोमय विमानोंसे स्थान - स्थानपर सुशोभित होता रहता है ॥१२ ॥ उस वैकुण्ठलोकमें

लक्ष्मीजी सुन्दर रूप धारण करके अपनी विविध विभूतियोंके द्वारा भगवान्के चरणकमलोंकी अनेकों प्रकारसे सेवा करती रहती हैं । कभी - कभी जब वे झूलेपर बैठकर अपने प्रियतम भगवान्की लीलाओंका गायन करने लगती हैं, तब उनके सौन्दर्य और सुरभिसे उन्मत्त होकर भौंरे स्वयं उन लक्ष्मीजीका गुणगान करने लगते हैं ॥१३ ॥

ब्रह्माजीने देखा कि उस दिव्य लोकमें समस्त भक्तोंके रक्षक, लक्ष्मीपति, यज्ञपति एवं विश्वपति भगवान् विराजमान हैं । सुनन्द, नन्द, प्रबल और अर्हण आदि मुख्य - मुख्य पार्षदगण उन प्रभुकी सेवा कर रहे हैं ॥१४ ॥

उनका मुखकमल प्रसाद - मधुर मुसकानसे युक्त है । आँखोंमें लाल - लाल डोरियाँ हैं । बड़ी मोहक और मधुर चितवन है । ऐसा जान पड़ता है कि अभी - अभी अपने प्रेमी भक्तको अपना सर्वस्व दे देंगे । सिरपर मुकुट, कानोंमें कुण्डल और कंधेपर पीताम्बर जगमगा रहे हैं । वक्षःस्थलपर एक सुनहरी रेखाके रूपमें श्रीलक्ष्मीजी विराजमान हैं और सुन्दर चार भुजाएँ हैं ॥१५ ॥ वे एक सर्वोत्तम और बहुमूल्य आसनपर विराजमान हैं । पुरुष, प्रकृति, महत्तत्त्व,

अहंकार, मन, दस इन्द्रिय, शब्दादि पाँच तन्मात्राएँ और पंचभूत - ये पचीस शक्तियाँ मूर्तिमान् होकर उनके चारों ओर खड़ी हैं । समग्र ऐश्वर्य, धर्म, कीर्ति, श्री, ज्ञान और वैराग्य – इन छः नित्यसिद्ध स्वरूपभूत शक्तियोंसे वे सर्वदा युक्त रहते हैं । उनके अतिरिक्त और कहीं भी ये नित्यरूपसे निवास नहीं करतीं । वे सर्वेश्वर प्रभु अपने नित्य आनन्दमय स्वरूपमें ही नित्य-निरन्तर निमग्न रहते हैं ॥ १६ ॥ उनका दर्शन करते ही ब्रह्माजीका हृदय आनन्दके उद्रेकसे

लबालब भर गया । शरीर पुलकित हो उठा, नेत्रोंमें प्रेमाश्रु छलक आये । ब्रह्माजीने भगवान्के उन चरणकमलोंमें, जो परमहंसोंके निवृत्तिमार्गसे प्राप्त हो सकते हैं, सिर झुकाकर प्रणाम किया ॥१७ ॥ ब्रह्माजीके प्यारे भगवान् अपने प्रिय ब्रह्माको प्रेम और दर्शनके आनन्दमें

निमग्न, शरणागत तथा प्रजा - सृष्टिके लिये आदेश देनेके योग्य देखकर बहुत प्रसन्न हुए । उन्होंने ब्रह्माजीसे हाथ मिलाया तथा मन्द मुसकानसे अलंकृत वाणीमें कहा— ॥१८ ॥

अध्यर्हणीयासनमास्थितं परं वृतं चतुःषोडशपञ्चशक्तिभिः । युक्तं भगैः स्वैरितरत्र चाध्रुवैः स्व एव धामन् रममाणमीश्वरम् ॥१६ तद्दर्शनाह्लादपरिप्लुतान्तरो हृष्यत्तनुः प्रेमभराश्रुलोचनः । ननाम पादाम्बुजमस्य विश्वसृग् यत् पारमहंस्येन पथाधिगम्यते ॥१७ ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 384

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तं प्रीयमाणं समुपस्थितं तदा प्रजाविसर्गे निजशासनार्हणम् । बभाष ईषत्स्मितशोचिषा गिरा प्रियः प्रियं प्रीतमनाः करे स्पृशन् ॥१८ श्रीभगवानुवाच

त्वयाहं तोषितः सम्यग् वेदगर्भ सिसृक्षया ।

चिरं भृतेन तपसा दुस्तोषः कूटयोगिनाम् ॥१९

वरं वरय भद्रं ते वरेशं माभिवाञ्छितम् ।

ब्रह्मञ्छ्रेयः परिश्रामः पुंसो मद्दर्शनावधिः ॥२०

मनीषितानुभावोऽयं मम लोकावलोकनम् ।

यदुपश्रुत्य रहसि चकर्थ परमं तपः ॥२१

श्रीभगवान्ने कहा – ब्रह्माजी! तुम्हारे हृदयमें तो समस्त वेदोंका ज्ञान विद्यमान है । तुमने सृष्टिरचनाकी इच्छासे चिरकालतक तपस्या करके मुझे भलीभाँति सन्तुष्ट कर दिया है । मनमें कपट रखकर योगसाधन करनेवाले मुझे कभी प्रसन्न नहीं कर सकते ॥१९ ॥ तुम्हारा

कल्याण हो । तुम्हारी जो अभिलाषा हो, वही वर मुझसे माँग लो । क्योंकि मैं मुँहमाँगी वस्तु देनेमें समर्थ हूँ । ब्रह्माजी! जीवके समस्त कल्याणकारी साधनोंका विश्राम – पर्यवसान मेरे दर्शनमें ही है ॥२० ॥ तुमने मुझे देखे बिना ही उस सूने जलमें मेरी वाणी सुनकर इतनी घोर

तपस्या की है, इसीसे मेरी इच्छासे तुम्हें मेरे लोकका दर्शन हुआ है ॥२१ ॥

प्रत्यादिष्टं मया तत्र त्वयि कर्मविमोहिते ।

तपो मे हृदयं साक्षादात्माहं तपसोऽनघ ॥२२

सृजामि तपसैवेदं ग्रसामि तपसा पुनः ।

बिभर्मि तपसा विश्वं वीर्यं मे दुश्चरं तपः ॥ २३

ब्रह्मोवाच

भगवन् सर्वभूतानामध्यक्षोऽवस्थितो गुहाम् ।

वेद ह्यप्रतिरुद्धेन प्रज्ञानेन चिकीर्षितम् ॥२४

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पृष्ठ 385

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तथापि ' नाथमानस्य नाथ २ नाथय नाथितम् ।

परावरे यथा रूपे जानीयां ते त्वरूपिणः ॥२५

यथाऽऽत्ममायायोगेन नानाशक्त्युपबृंहितम् ।

विलुम्पन् विसृजन् गृह्णन् बिभ्रदात्मानमात्मना ॥२६

क्रीडस्यमोघसङ्कल्प ऊर्णनाभिर्यथोर्णुते ।

तथा तद्विषयां धेहि मनीषां मयि माधव ॥ २७

भगवच्छिक्षितमहं करवाणि ह्यतन्द्रितः ।

नेहमानः प्रजासर्गं बध्येयं यदनुग्रहात् ॥२८

यावत् सखा सख्युरिवेश ते कृतः प्रजाविसर्गे विभजामि भो जनम् । अविक्लवस्ते परिकर्मणि स्थितो मा मे समुन्नद्धमदोऽजमानिनः ॥२९ तुम उस समय सृष्टिरचनाका कर्म करनेमें किंकर्तव्यविमूढ़ हो रहे थे । इसीसे मैंने तुम्हें तपस्या करनेकी आज्ञा दी थी । क्योंकि निष्पाप! तपस्या मेरा हृदय है और मैं स्वयं तपस्याका आत्मा हूँ ॥२२ ॥ मैं तपस्यासे ही इस संसारकी सृष्टि करता हूँ, तपस्यासे ही इसका धारण-पोषण करता हूँ और फिर तपस्यासे ही इसे अपनेमें लीन कर लेता हूँ । तपस्या मेरी एक

दुर्लङ्घ्य शक्ति है ॥२३ ॥

ब्रह्माजीने कहा – भगवन्! आप समस्त प्राणियोंके अन्तःकरणमें साक्षीरूपसे विराजमान रहते हैं । आप अपने अप्रतिहत ज्ञानसे यह जानते ही हैं कि मैं क्या करना चाहता हूँ ॥२४ ॥ नाथ! आप कृपा करके मुझ याचककी यह माँग पूरी कीजिये कि मैं रूपरहित

आपके सगुण और निर्गुण दोनों ही रूपोंको जान सकूँ ॥ २५ ॥ आप मायाके स्वामी हैं,

आपका संकल्प कभी व्यर्थ नहीं होता । जैसे मकड़ी अपने मुँहसे जाला निकालकर उसमें क्रीड़ा करती है और फिर उसे अपनेमें लीन कर लेती है, वैसे ही आप अपनी मायाका आश्रय लेकर इस विविध - शक्तिसम्पन्न जगत्की उत्पत्ति, पालन और संहार करनेके लिये अपने-आपको ही अनेक रूपोंमें बना देते हैं और क्रीड़ा करते हैं । इस प्रकार आप कैसे करते हैं— इस मर्मको मैं जान सकूँ, ऐसा ज्ञान आप मुझे दीजिये ॥२६-२७ ॥ आप मुझपर ऐसी कृपा कीजिये कि मैं सजग रहकर सावधानीसे आपकी आज्ञाका पालन कर सकूँ और सृष्टिकी रचना करते समय भी कर्तापन आदिके अभिमानसे बँध न जाऊँ ॥२८ ॥

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पृष्ठ 386

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प्रभो! आपने एक मित्रके समान हाथ पकड़कर मुझे अपना मित्र स्वीकार किया है । अतः जब मैं आपकी इस सेवा – सृष्टिरचनामें लगूँ और सावधानीसे पूर्वसृष्टिके गुण-कर्मानुसार जीवोंका विभाजन करने लगूँ, तब कहीं अपनेको जन्म - कर्मसे स्वतन्त्र मानकर प्रबल अभिमान न कर बैठूं ॥२९ ॥

श्रीभगवानुवाच

ज्ञानं परमगुह्यं मे यद् विज्ञानसमन्वितम् ।

सरहस्यं तदङ्गं च गृहाण गदितं मया ॥३०

यावानहं यथाभावो यद्रूपगुणकर्मकः ।

तथैव तत्त्वविज्ञानमस्तु ते मदनुग्रहात् ॥३१

अहमेवासमेवाग्रे नान्यद् यत् सदसत् परम् ।

पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम् ॥ ३२

ऋतेऽर्थं यत् प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि ।

तद्विद्यादात्मनो मायां यथाऽऽभासो यथा तमः ॥३३

यथा महान्ति भूतानि भूतेषूच्चावचेष्वनु ' ।

प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा तेषु न तेष्वहम् ॥३४

एतावदेव जिज्ञास्यं तत्त्वजिज्ञासुनाऽऽत्मनः ।

अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यत् स्यात् सर्वत्र सर्वदा ॥ ३५

एतन्मतं समातिष्ठ परमेण समाधिना ।

भवान् कल्पविकल्पेषु न विमुह्यति कर्हिचित् ॥ ३६

श्रीभगवान्ने कहा— अनुभव, प्रेमाभक्ति और साधनोंसे युक्त अत्यन्त गोपनीय अपने स्वरूपका ज्ञान मैं तुम्हें कहता हूँ; तुम उसे ग्रहण करो || ३० || मेरा जितना विस्तार है, मेरा जो लक्षण है, मेरे जितने और जैसे रूप, गुण और लीलाएँ हैं - मेरी कृपासे तुम उनका तत्त्व ठीक - ठीक वैसा ही अनुभव करो || ३१ || सृष्टिके पूर्व केवल मैं ही मैं था । मेरे अतिरिक्त न स्थूल था न सूक्ष्म और न तो दोनोंका कारण अज्ञान । जहाँ यह सृष्टि नहीं है, वहाँ मैं - ही - मैं हूँ और इस सृष्टिके रूपमें जो कुछ प्रतीत हो रहा है, वह भी मैं ही हूँ और जो कुछ बच रहेगा, वह भी मैं ही हूँ ॥ ३२ ॥ वास्तवमें न होनेपर भी जो कुछ अनिर्वचनीय वस्तु मेरे अतिरिक्त मुझ

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पृष्ठ 387

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परमात्मामें दो चन्द्रमाओंकी तरह मिथ्या ही प्रतीत हो रही है अथवा विद्यमान होनेपर भी आकाश - मण्डलके नक्षत्रोंमें राहुकी भाँति जो मेरी प्रतीति नहीं होती, इसे मेरी माया समझना चाहिये ॥३३ ॥ जैसे प्राणियोंके पंचभूतरचित छोटे - बड़े शरीरोंमें आकाशादि पंचमहाभूत उन

शरीरोंके कार्यरूपसे निर्मित होनेके कारण प्रवेश करते भी हैं और पहलेसे ही उन स्थानों और रूपोंमें कारणरूपसे विद्यमान रहनेके कारण प्रवेश नहीं भी करते, वैसे ही उन प्राणियोंके शरीरकी दृष्टिसे मैं उनमें आत्माके रूपसे प्रवेश किये हुए हूँ और आत्मदृष्टिसे अपने अतिरिक्त और कोई वस्तु न होनेके कारण उनमें प्रविष्ट नहीं भी हूँ ॥ ३४ ॥ यह ब्रह्म नहीं, यह ब्रह्म नहीं

– इस प्रकार निषेधकी पद्धतिसे, और यह ब्रह्म है, यह ब्रह्म है – इस अन्वयकी पद्धतिसे यही सिद्ध होता है कि सर्वातीत एवं सर्वस्वरूप भगवान् ही सर्वदा और सर्वत्र स्थित हैं, वही वास्तविक तत्त्व हैं । जो आत्मा अथवा परमात्माका तत्त्व जानना चाहते हैं, उन्हें केवल इतना ही जाननेकी आवश्यकता है ॥ ३५ ॥ ब्रह्माजी! तुम अविचल समाधिके द्वारा मेरे इस

सिद्धान्तमें पूर्ण निष्ठा कर लो । इससे तुम्हें कल्प - कल्पमें विविध प्रकारकी सृष्टिरचना करते रहनेपर भी कभी मोह नहीं होगा ॥ ३६ ॥

श्रीशुक उवाच

सम्प्रदिश्यैवमजनो जनानां परमेष्ठिनम् ।

पश्यतस्तस्य तद् रूपमात्मनो न्यरुणद्धरिः ॥३७

अन्तर्हितेन्द्रियार्थाय हरये विहिताञ्जलिः ।

सर्वभूतमयो विश्वं ससर्जेदं स पूर्ववत् ॥३८

प्रजापतिर्धर्मपतिरेकदा नियमान् यमान् ।

भद्रं प्रजानामन्विच्छन्नातिष्ठत् स्वार्थकाम्यया ॥३९

तं नारदः प्रियतमो रिक्थादानामनुव्रतः ।

शुश्रूषमाणः शीलेन प्रश्रयेण दमेन च ॥४०

मायां विविदिषन् विष्णोर्मायेशस्य महामुनिः ।

महाभागवतो राजन् पितरं पर्यतोषयत् ॥४१

तुष्टं निशाम्य पितरं लोकानां प्रपितामहम् ।

देवर्षिः परिपप्रच्छ भवान् यन्मानुपृच्छति ' ॥४२

तस्मा इदं भागवतं पुराणं दशलक्षणम् ।

प्रोक्तं भगवता प्राह प्रीतः पुत्राय भूतकृत् ॥४३

नारदः प्राह मुनये सरस्वत्यास्तटे नृप ।

ध्यायते ब्रह्म परमं व्यासायामिततेजसे ॥४४

यदुताहं त्वया पृष्टो वैराजात् पुरुषादिदम् । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 388

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यथाऽऽसीत्तदुपाख्यास्ये प्रश्नानन्यांश्च कृत्स्नशः ॥४५ श्रीशुकदेवजी कहते हैं - लोकपितामह ब्रह्माजीको इस प्रकार उपदेश देकर अजन्मा भगवान्ने उनके देखते - ही - देखते अपने उस रूपको छिपा लिया || ३७ || जब सर्वभूतस्वरूप ब्रह्माजीने देखा कि भगवान् ने अपने इन्द्रियगोचर स्वरूपको हमारे नेत्रोंके सामनेसे हटा लिया है, तब उन्होंने अंजलि बाँधकर उन्हें प्रणाम किया और पहले कल्पमें जैसी सृष्टि थी, उसी रूपमें इस विश्वकी रचना की || ३८ || एक बार धर्मपति, प्रजापति ब्रह्माजीने सारी जनताका कल्याण हो, अपने इस स्वार्थकी पूर्तिके लिये विधिपूर्वक यम - नियमोंको धारण किया ॥ ३ ९ ॥ उस समय उनके पुत्रोंमें सबसे अधिक प्रिय, परम भक्त देवर्षि नारदजीने मायापति भगवान्की मायाका तत्त्व जाननेकी इच्छासे बड़े संयम, विनय और सौम्यतासे अनुगत होकर उनकी सेवा की और उन्होंने सेवासे ब्रह्माजीको बहुत ही सन्तुष्ट कर लिया ॥४०-४१ ॥ परीक्षित्! जब देवर्षि नारदने देखा कि मेरे लोकपितामह पिताजी मुझपर प्रसन्न हैं, तब उन्होंने उनसे यही प्रश्न किया, जो तुम मुझसे कर रहे हो ॥४२ ॥ उनके प्रश्नसे ब्रह्माजी और भी प्रसन्न हुए । फिर

उन्होंने यह दस लक्षणवाला भागवतपुराण अपने पुत्र नारदको सुनाया, जिसका स्वयं भगवान्ने उन्हें उपदेश किया था || ४३ || परीक्षित्! जिस समय मेरे परमतेजस्वी पिता सरस्वतीके तटपर बैठकर परमात्माके ध्यानमें मग्न थे, उस समय देवर्षि नारदजीने वही भागवत उन्हें सुनाया ॥ ४४ ॥ तुमने मुझसे जो यह प्रश्न किया है कि विराट्पुरुषसे इस

जगत्की उत्पत्ति कैसे हुई तथा दूसरे भी जो बहुत - से प्रश्न किये हैं, उन सबका उत्तर मैं उसी भागवतपुराणके रूपमें देता हूँ ॥ ४५ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे नवमोऽध्यायः ॥९ ॥

१. प्रा ० पा ० – कालविभ्रमः । २. प्रा ० पा ० — प्रमुखा ० । ) -१. प्रा ० पा ० — अथापि । २. प्रा ० पा ० — नाथनाथ जनार्चित । ३. प्रा ० पा ० — मम । १. प्रा ० पा ० — चेषु च । १. प्रा ० पा ० — भवान् यदनु । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 389

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अथ दशमोऽध्यायः भागवतके दस लक्षण श्रीशुक उवाच

अत्र सर्गो विसर्गश्च स्थानं पोषणमूतयः ।

मन्वन्तरेशानुकथा निरोधो मुक्तिराश्रयः ॥ १

दशमस्य विशुद्ध्यर्थं नवानामिह लक्षणम् ।

वर्णयन्ति महात्मानः श्रुतेनार्थेन चाञ्जसा ॥२

भूतमात्रेन्द्रियधियां जन्म सर्ग उदाहृतः ।

ब्रह्मणो गुणवैषम्याद् विसर्गः पौरुषः स्मृतः ॥३

स्थितिर्वैकुण्ठविजयः पोषणं तदनुग्रहः ।

मन्वन्तराणि सद्धर्म ऊतयः कर्मवासनाः ॥४

अवतारानुचरितं हरेश्चास्यानुवर्तिनाम् ।

सतामीशकथाः प्रोक्ता नानाख्यानोपबृंहिताः ॥५

निरोधोऽस्यानुशयनमात्मनः सह शक्तिभिः ।

मुक्तिर्हित्वान्यथारूपं स्वरूपेण व्यवस्थितिः ॥६

आभासश्च निरोधश्च यतश्चाध्यवसीयते ।

स आश्रयः परं ब्रह्म परमात्मेति शब्द्यते॥७

श्रीशुकदेवजी कहते हैं- परीक्षित्! इस भागवतपुराणमें सर्ग, विसर्ग, स्थान, पोषण, ऊति, मन्वन्तर, ईशानुकथा, निरोध, मुक्ति और आश्रय- इन दस विषयोंका वर्णन है ॥१ ॥

इनमें जो दसवाँ आश्रय - तत्त्व है, उसीका ठीक - ठीक निश्चय करनेके लिये कहीं श्रुतिसे, कहीं तात्पर्यसे और कहीं दोनोंके अनुकूल अनुभवसे महात्माओंने अन्य नौ विषयोंका बड़ी सुगम रीतिसे वर्णन किया है ॥२ ॥ ईश्वरकी प्रेरणासे गुणोंमें क्षोभ होकर रूपान्तर होनेसे जो

आकाशादि पंचभूत, शब्दादि तन्मात्राएँ, इन्द्रियाँ, अहंकार और महत्तत्त्वकी उत्पत्ति होती है, उसको ‘ सर्ग ’ कहते हैं । उस विराट् पुरुषसे उत्पन्न ब्रह्माजीके द्वारा जो विभिन्न चराचर ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 390

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सृष्टियोंका निर्माण होता है, उसका नाम है ' विसर्ग ' ॥३ ॥ प्रतिपद नाशकी ओर बढ़नेवाली

सृष्टिको एक मर्यादामें स्थिर रखनेसे भगवान् विष्णुकी जो श्रेष्ठता सिद्ध होती है, उसका नाम ' स्थान ' है । अपने द्वारा सुरक्षित सृष्टिमें भक्तोंके ऊपर उनकी जो कृपा होती है, उसका नाम है ‘ पोषण ’ । मन्वन्तरोंके अधिपति जो भगवद्भक्ति और प्रजापालनरूप शुद्ध धर्मका अनुष्ठान करते हैं, उसे ‘ मन्वन्तर ' कहते हैं । जीवोंकी वे वासनाएँ, जो कर्मके द्वारा उन्हें बन्धनमें डाल देती हैं, ' ऊति ' नामसे कही जाती हैं || ४ || भगवान्‌के विभिन्न अवतारोंके और उनके प्रेमी भक्तोंकी विविध आख्यानोंसे युक्त गाथाएँ ' ईशकथा ' हैं || ५ || जब भगवान् योगनिद्रा स्वीकार करके शयन करते हैं, तब इस जीवका अपनी उपाधियोंके साथ उनमें लीन हो जाना ‘ निरोध ' है । अज्ञानकल्पित कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि अनात्मभावका परित्याग करके अपने वास्तविक स्वरूप परमात्मामें स्थित होना ही ' मुक्ति ' है ॥६ ॥ परीक्षित्! इस चराचर जगत्की

उत्पत्ति और प्रलय जिस तत्त्वसे प्रकाशित होते हैं, वह परम ब्रह्म ही आश्रय ' है । शास्त्रोंमें उसीको परमात्मा कहा गया है ॥७ ॥

योऽध्यात्मिकोऽयं पुरुषः सोऽसावेवाधिदैविकः 5: 1 यस्तत्रोभयविच्छेदः पुरुषो ह्याधिभौतिकः ॥ ८

एकमेकतराभावे यदा नोपलभामहे ।

त्रितयं तत्र यो वेद स आत्मा स्वाश्रयाश्रयः ॥९

पुरुषोऽण्डं विनिर्भिद्य यदासौ स विनिर्गतः २ ।

आत्मनोऽयनमन्विच्छन्नपोऽस्राक्षीच्छुचिः शुचीः ॥१०

तास्ववात्सीत् स्वसृष्टासु सहस्रपरिवत्सरान् ।

तेन नारायणो नाम यदापः पुरुषोद्भवाः ॥ ११

द्रव्यं कर्म च कालश्च स्वभावो जीव एव च ।

यदनुग्रहतः सन्ति न सन्ति यदुपेक्षया ॥१२

एको नानात्वमन्विच्छन् योगतल्पात् समुत्थितः ।

वीर्यं हिरण्मयं देवो मायया व्यसृजत् त्रिधा ॥ १३

अधिदैवमथाध्यात्ममधिभूतमिति प्रभुः ।

यथैकं पौरुषं वीर्यं त्रिधाभिद्यत तच्छृणु ॥१४

अन्तःशरीर आकाशात् पुरुषस्य विचेष्टतः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******