श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 391–400
श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 391–400
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ओजः सहो बलं जज्ञे ३ ततः प्राणो महानसुः ॥१५
अनुप्राणन्ति यं प्राणाः प्राणन्तं सर्वजन्तुषु ।
अपानन्तमपानन्ति नरदेवमिवानुगाः ॥१६
जो नेत्र आदि इन्द्रियोंका अभिमानी द्रष्टा जीव है, वही इन्द्रियोंके अधिष्ठातृदेवता सूर्य आदिके रूपमें भी है और जो नेत्रगोलक आदिसे युक्त दृश्य देह है, वही उन दोनोंको अलग-अलग करता है ॥८ ॥ इन तीनोंमें यदि एकका भी अभाव हो जाय तो दूसरे दोकी उपलब्धि
नहीं हो सकती । अतः जो इन तीनोंको जानता है, वह परमात्मा ही सबका अधिष्ठान ' आश्रय ’ तत्त्व है । उसका आश्रय वह स्वयं ही है, दूसरा कोई नहीं ॥९ ॥
जब पूर्वोक्त विराट् पुरुष ब्रह्माण्डको फोड़कर निकला, तब वह अपने रहनेका स्थान ढूँढने लगा और स्थानकी इच्छासे उस शुद्ध- संकल्प पुरुषने अत्यन्त पवित्र जलकी सृष्टि की ॥१० ॥ विराट् पुरुषरूप ' नर ' से उत्पन्न होनेके कारण ही जलका नाम ' नार ' पड़ा और
उस अपने उत्पन्न किये हुए ' नार ' में वह पुरुष एक हजार वर्षोंतक रहा, इसीसे उसका नाम ‘ नारायण ' हुआ ॥११ ॥ उन नारायणभगवान्की कृपासे ही द्रव्य, कर्म, काल, स्वभाव और
जीव आदिकी सत्ता है । उनके उपेक्षा कर देनेपर और किसीका अस्तित्व नहीं रहता ॥१२ ॥
उन अद्वितीय भगवान् नारायणने योगनिद्रासे जगकर अनेक होनेकी इच्छा की । तब अपनी मायासे उन्होंने अखिल ब्रह्माण्डके बीजस्वरूप अपने सुवर्णमय वीर्यको तीन भागोंमें विभक्त कर दिया — अधिदैव, अध्यात्म और अधिभूत । परीक्षित्! विराट् पुरुषका एक ही वीर्य तीन भागोंमें कैसे विभक्त हुआ, सो सुनो ॥१३-१४ ॥ विराट् पुरुषके हिलने - डोलने पर उनके शरीरमें रहनेवाले आकाशसे इन्द्रियबल, मनोबल और शरीरबलकी उत्पत्ति हुई । उनसे इन सबका राजा प्राण उत्पन्न हुआ || १५ || जैसे सेवक अपने स्वामी राजाके पीछे - पीछे चलते हैं, वैसे ही सबके शरीरोंमें प्राणके प्रबल रहनेपर ही सारी इन्द्रियाँ प्रबल रहती हैं और जब वह सुस्त पड़ जाता है, तब सारी इन्द्रियाँ भी सुस्त हो जाती हैं ॥१६ ॥
प्राणेन क्षिपता क्षुत् तृडन्तरा जायते प्रभोः ” ।
पिपासतो जक्षतश्च प्राङ्मुखं निरभिद्यत ॥१७
मुखतस्तालु निर्भिन्नं जिह्वा तत्रोपजायते ।
ततो नानारसो जज्ञे जिह्वया योऽधिगम्यते ॥ १८
विवक्षोर्मुखतो भूम्नो वह्निर्वाग् व्याहृतं तयोः ।
जले वै तस्य सुचिरं निरोधः समजायत ॥१९
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नासिके निरभिद्येतां दोधूयति नभस्वति ।
तत्र वायुर्गन्धवहो घ्राणो नसि जिघृक्षतः ॥२०
यदाऽऽत्मनि निरालोकमात्मानं च दिदृक्षतः ।
निर्भिन्ने ह्यक्षिणी’तस्य ज्योतिश्चक्षुर्गुणग्रहः ॥ २१
बोध्यमानस्य ऋषिभिरात्मनस्तज्जिघृक्षतः ।
कर्णौ च निरभिद्येतां दिशः श्रोत्रं गुणग्रहः ॥ २२
वस्तुनो मृदुकाठिन्यलघुगुर्वोष्णशीतताम् ।
जिघृक्षतस्त्वनिर्भिन्ना तस्यां रोममहीरुहाः ।
तत्र चान्तर्बहिर्वातस्त्वचा लब्धगुणो वृतः ॥२३
हस्तौ रुरुहतुस्तस्य नानाकर्मचिकीर्षया ।
तयोस्तु बलमिन्द्रश्च ४ आदानमुभयाश्रयम् ॥२४
जब प्राण जोरसे आने - जाने लगा, तब विराट् पुरुषको भूख - प्यासका अनुभव हुआ । खाने - पीनेकी इच्छा करते ही सबसे पहले उनके शरीरमें मुख प्रकट हुआ ॥ १७ ॥ मुखसे तालु
और तालुसे रसनेन्द्रिय प्रकट हुई । इसके बाद अनेकों प्रकारके रस उत्पन्न हुए, जिन्हें रसना ग्रहण करती है ॥१८ ॥ जब उनकी इच्छा बोलनेकी हुई तब वाक् - इन्द्रिय, उसके
अधिष्ठातृदेवता अग्नि और उनका विषय बोलना – ये तीनों प्रकट हुए । इसके बाद बहुत दिनोंतक उस जलमें ही वे रुके रहे ॥१९ ॥ श्वासके वेगसे नासिका छिद्र प्रकट हो गये । जब
उन्हें सूँघनेकी इच्छा हुई, तब उनकी नाक घ्राणेन्द्रिय आकर बैठ गयी और उसके देवता गन्धको फैलानेवाले वायुदेव प्रकट हुए || २० || पहले उनके शरीरमें प्रकाश नहीं था; फिर जब उन्हें अपनेको तथा दूसरी वस्तुओंको देखनेकी इच्छा हुई, तब नेत्रोंके छिद्र, उनका अधिष्ठाता सूर्य और नेत्रेन्द्रिय प्रकट हो गये । इन्हींसे रूपका ग्रहण होने लगा ॥२१ ॥ जब
वेदरूप ऋषि विराट् पुरुषको स्तुतियोंके द्वारा जगाने लगे, तब उन्हें सुननेकी इच्छा हुई । उसी समय कान, उनकी अधिष्ठातृदेवता दिशाएँ और श्रोत्रेन्द्रिय प्रकट हुई । इसीसे शब्द सुनायी पड़ता है ॥२२ ॥ जब उन्होंने वस्तुओंकी कोमलता, कठिनता, हलकापन, भारीपन, उष्णता
और शीतलता आदि जाननी चाही तब उनके शरीरमें चर्म प्रकट हुआ । पृथ्वीमेंसे जैसे वृक्ष निकल आते हैं, उसी प्रकार उस चर्ममें रोएँ पैदा हुए और उसके भीतर - बाहर रहनेवाला वायु भी प्रकट हो गया । स्पर्श ग्रहण करनेवाली त्वचा - इन्द्रिय भी साथ - ही - साथ शरीरमें चारों ओर लिपट गयी और उससे उन्हें स्पर्शका अनुभव होने लगा || २३ || जब उन्हें अनेकों प्रकारके कर्म करनेकी इच्छा हुई, तब उनके हाथ उग आये । उन हाथोंमें ग्रहण करनेकी शक्ति हस्तेन्द्रिय तथा उनके अधिदेवता इन्द्र प्रकट हुए और दोनोंके आश्रयसे होनेवाला ग्रहणरूप ****** ebook converter DEMO Watermarks ********
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कर्म भी प्रकट हो गया ॥२४ ॥
गतिं जिगीषतः पादौ रुरुहातेऽभिकामिकाम् । १ पद्भ्यां यज्ञः स्वयं हव्यं कर्मभिः क्रियते नृभिः ॥२५
निरभिद्यत शिश्नो वै प्रजानन्दामृतार्थिनः ।
उपस्थ आसीत् कामानां प्रियं तदुभयाश्रयम् ॥२६
उत्सिसृक्षोर्धातुमलं निरभिद्यत वै गुदम् ।
ततः पायुस्ततो मित्र उत्सर्ग उभयाश्रयः ॥२७
आसिसृप्सोः पुरः पुर्या नाभिद्वारमपानतः ।
तत्रापानस्ततो मृत्युः पृथक्त्वमुभयाश्रयम् ॥२८
आदित्सोरन्नपानानामासन् कुक्ष्यन्त्रनाडयः ।
नद्यः समुद्राश्च तयोस्तुष्टिः पुष्टिस्तदाश्रये ॥२९
निदिध्यासोरात्ममायां हृदयं निरभिद्यत ।
ततो मनस्ततश्चन्द्रः ± सङ्कल्पः काम एव च ॥३०
त्वक्चर्ममांसरुधिरमेदोमज्जास्थिधातवः ।
भूम्यप्तेजोमयाः सप्त प्राणो व्योमाम्बुवायुभिः ॥ ३१
गुणात्मकानीन्द्रियाणि भूतादिप्रभवा गुणाः ।
मनः सर्वविकारात्मा बुद्धिर्विज्ञानरूपिणी ॥३२
जब उन्हें अभीष्ट स्थानपर जानेकी इच्छा हुई, तब उनके शरीरमें पैर उग आये । चरणोंके साथ ही चरण - इन्द्रियके अधिष्ठातारूपमें वहाँ स्वयं यज्ञपुरुष भगवान् विष्णु स्थित हो गये और उन्हींमें चलनारूप कर्म प्रकट हुआ । मनुष्य इसी चरणेन्द्रियसे चलकर यज्ञ - सामग्री एकत्र करते हैं ॥२५ ॥ सन्तान, रति और स्वर्ग - भोगकी कामना होनेपर विराट् पुरुषके शरीरमें
लिंगकी उत्पत्ति हुई । उसमें उपस्थेन्द्रिय और प्रजापति देवता तथा इन दोनोंके आश्रय रहनेवाले कामसुखका आविर्भाव हुआ || २६ || जब उन्हें मलत्यागकी इच्छा हुई, तब गुदाद्वार प्रकट हुआ । तत्पश्चात् उसमें पायु - इन्द्रिय और मित्र - देवता उत्पन्न हुए । इन्हीं दोनोंके द्वारा मलत्यागकी क्रिया सम्पन्न होती है ॥२७ ॥ अपानमार्गद्वारा एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जानेकी
इच्छा होनेपर नाभिद्वार प्रकट हुआ । उससे अपान और मृत्यु देवता प्रकट हुए । इन दोनोंके ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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आश्रयसे ही प्राण और अपानका बिछोह यानी मृत्यु होती है || २८ || जब विराट् पुरुषको अन्न - जल ग्रहण करनेकी इच्छा हुई, तब कोख, आँतें और नाड़ियाँ उत्पन्न हुईं । साथ ही कुक्षिके देवता समुद्र, नाड़ियोंके देवता नदियाँ एवं तुष्टि और पुष्टि – ये दोनों उनके आश्रित विषय उत्पन्न हुए ॥२९ ॥ जब उन्होंने अपनी मायापर विचार करना चाहा, तब हृदयकी
उत्पत्ति हुई । उससे मनरूप इन्द्रिय और मनसे उसका देवता चन्द्रमा तथा विषय, कामना और संकल्प प्रकट हुए ॥३० || विराट् पुरुषके शरीरमें पृथ्वी, जल और तेजसे सात धातुएँ प्रकट हुईं – त्वचा, चर्म, मांस, रुधिर, मेद, मज्जा और अस्थि । इसी प्रकार आकाश, जल और वायुसे प्राणोंकी उत्पत्ति हुई || ३१ || श्रोत्रादि सब इन्द्रियाँ शब्दादि विषयोंको ग्रहण करनेवाली हैं । वे विषय अहंकारसे उत्पन्न हुए हैं । मन सब विकारोंका उत्पत्तिस्थान है और बुद्धि समस्त पदार्थोंका बोध करानेवाली है ॥३२ ॥
एतद्भगवतो रूपं स्थूलं ते व्याहृतं मया ।
मह्यादिभिश्चावरणैरष्टभिर्बहिरावृतम् ॥३३
अतः परं सूक्ष्मतममव्यक्तं निर्विशेषणम् ।
अनादिमध्यनिधनं नित्यं वाङ्मनसः परम् ॥३४
अमुनी भगवद्रूपे मया ते अनुवर्णिते ।
उभे अपि न गृह्णन्ति मायासृष्टे विपश्चितः ॥ ३५
स वाच्यवाचकतया भगवान् ब्रह्मरूपधृक् ।
नामरूपक्रिया धत्ते सकर्माकर्मकः परः ॥ ३६
प्रजापतीन्मनून् देवानृषीन् पितृगणान् पृथक् ।
सिद्धचारणगन्धर्वान् विद्याधासुरगुह्यकान् ॥३७
किन्नराप्सरसो नागान् सर्पान् किम्पुरुषोरगान् ।
मातृ ' रक्षःपिशाचांश्च प्रेतभूतविनायकान् ॥३८
कूष्माण्डोन्मादवेतालान् यातुधानान् ग्रहानपि ।
खगान्मृगान् पशून् वृक्षान् गिरीन्नृप सरीसृपान् ॥३९
द्विविधाश्चतुर्विधा येऽन्ये जलस्थलनभौकसः ।
कुशलाकुशला े मिश्राः कर्मणां गतयस्त्विमाः ॥४०
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सत्त्वं रजस्तम इति तिस्रः सुरनृनारकाः ।
तत्राप्येकैकशो राजन् भिद्यन्ते गतयस्त्रिधा ।
यदैकैकतरोऽन्याभ्यां स्वभाव उपहन्यते ॥४१
मैंने भगवान्के इस स्थूलरूपका वर्णन तुम्हें सुनाया है । यह बाहरकी ओरसे पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, अहंकार, महत्तत्त्व और प्रकृति- इन आठ आवरणोंसे घिरा हुआ है ॥३३ ॥
इससे परे भगवान्का अत्यन्त सूक्ष्मरूप है । वह अव्यक्त, निर्विशेष, आदि, मध्य और
अन्तसे रहित एवं नित्य है । वाणी और मनकी वहाँतक पहुँच नहीं है ॥३४ ॥
मैंने तुम्हें भगवान्के स्थूल और सूक्ष्म - व्यक्त और अव्यक्त जिन दो रूपोंका वर्णन सुनाया है, ये दोनों ही भगवान्की मायाके द्वारा रचित हैं । इसलिये विद्वान् पुरुष इन दोनोंको ही स्वीकार नहीं करते ॥३५ ॥
वास्तवमें भगवान् निष्क्रिय हैं । अपनी शक्तिसे ही वे सक्रिय बनते हैं । फिर तो वे ब्रह्माका या विराट्रूप धारण करके वाच्य और वाचक - शब्द और उसके अर्थके रूपमें प्रकट होते हैं और अनेकों नाम, रूप तथा क्रियाएँ स्वीकार करते हैं ॥३६ ॥
परीक्षित्! प्रजापति, मनु, देवता, ऋषि, पितर, सिद्ध, चारण, गन्धर्व, विद्याधर, असुर, यक्ष, किन्नर, अप्सराएँ, नाग, सर्प, किम्पुरुष, उरग, मातृकाएँ, राक्षस, पिशाच, प्रेत, भूत, विनायक, कूष्माण्ड, उन्माद, वेताल, यातुधान, ग्रह, पक्षी, मृग, पशु, वृक्ष, पर्वत, सरीसृप इत्यादि जितने भी संसारमें नाम - रूप हैं, सब भगवान्के ही हैं ॥ ३७-३९ ॥ संसारमें चर और अचर भेदसे दो प्रकारके तथा जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज भेदसे चार प्रकारके जितने भी जलचर, थलचर तथा आकाशचारी प्राणी हैं, सब- ब - के-सब शुभ - अशुभ और मिश्रित कर्मोंके तदनुरूप फल हैं ॥४० ॥
सत्त्वकी प्रधानतासे देवता, रजोगुणकी प्रधानतासे मनुष्य और तमोगुणकी प्रधानतासे नारकीय योनियाँ मिलती हैं । इन गुणोंमें भी जब एक गुण दूसरे दो गुणोंसे अभिभूत हो जाता है, तब प्रत्येक गतिके तीन - तीन भेद और हो जाते हैं ॥।४१ ॥
स एवेदं जगद्धाता भगवान् धर्मरूपधृक् ।
पुष्णाति स्थापयन् विश्वं तिर्यङ्नरसुरात्मभिः ' ॥ ४२
ततः कालाग्निरुद्रात्मा यत्सृष्टमिदमात्मनः ।
संनियच्छति कालेन घनानीकमिवानिलः ॥४३
इत्थंभावेन कथितो भगवान् भगवत्तमः ।
नेत्थंभावेन हि परं द्रष्टुमर्हन्ति सूरयः ॥४४
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नास्य कर्मणि जन्मादौ परस्यानुविधीयते ।
कर्तृत्वप्रतिषेधार्थं माययारोपितं हि तत् ॥४५
अयं तु ब्रह्मणः कल्पः सविकल्प उदाहृतः । तु विधिः साधारणो यत्र सर्गाः प्राकृतवैकृताः ॥ ४६
परिमाणं च कालस्य कल्पलक्षणविग्रहम् ।
यथा पुरस्ताद्व्याख्यास्ये पाद्मं कल्पमथो शृणु ॥४७
शौनक उवाच
यदाह नो भवान् सूत क्षत्ता भागवतोत्तमः ।
चचार तीर्थानि भुवस्त्यक्त्वा बन्धून् सुदुस्त्यजान् ॥४८
वे भगवान् जगत्के धारण - पोषणके लिये धर्ममय विष्णुरूप स्वीकार करके देवता, मनुष्य और पशु, पक्षी आदि रूपोंमें अवतार लेते हैं तथा विश्वका पालन - पोषण करते हैं ॥४२ ॥
प्रलयका समय आनेपर वे ही भगवान् अपने बनाये हुए इस विश्वको कालाग्निस्वरूप रुद्रका रूप ग्रहण करके अपनेमें वैसे ही लीन कर लेते हैं, जैसे वायु मेघमालाको ॥४३ ॥
परीक्षित्! महात्माओंने अचिन्त्यैश्वर्य भगवान्का इसी प्रकार वर्णन किया है । परन्तु तत्त्वज्ञानी पुरुषोंको केवल इस सृष्टि, पालन और प्रलय करनेवाले रूपमें ही उनका दर्शन नहीं करना चाहिये; क्योंकि वे तो इससे परे भी हैं ॥४४ ॥
सृष्टिकी रचना आदि कर्मोंका निरूपण करके पूर्ण परमात्मासे कर्म या कर्तापनका सम्बन्ध नहीं जोड़ा गया है । वह तो मायासे आरोपित होनेके कारण कर्तृत्वका निषेध करनेके लिये ही है ॥४५ ॥
यह मैंने ब्रह्माजीके महाकल्पका अवान्तर कल्पोंके साथ वर्णन किया है । सब कल्पोंमें सृष्टि - क्रम एक - सा ही है । अन्तर है तो केवल इतना ही कि महाकल्पके प्रारम्भमें प्रकृतिसे क्रमशः महत्तत्त्वादिकी उत्पत्ति होती है और कल्पोंके प्रारम्भमें प्राकृत सृष्टि तो ज्यों - की - त्यों रहती ही है, चराचर प्राणियोंकी वैकृत सृष्टि नवीन रूपसे होती है ॥ ४६ ॥ परीक्षित्! कालका
परिमाण, कल्प और उसके अन्तर्गत मन्वन्तरोंका वर्णन आगे चलकर करेंगे । अब तुम पाद्मकल्पका वर्णन सावधान होकर सुनो ॥४७ ॥
शौनकजीने पूछा — सूतजी! आपने हमलोगोंसे कहा था कि भगवान्के परम भक्त विदुरजीने अपने अति दुस्त्यज कुटुम्बियोंको भी छोड़कर पृथ्वीके विभिन्न तीर्थोंमें विचरण किया था ॥ ४८ ॥
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कुत्र कौषारवेस्तस्य संवादोऽध्यात्मसंश्रितः ।
यद्वा स भगवांस्तस्मै पृष्टस्तत्त्वमुवाच ह ॥४९
ब्रूहि नस्तदिदं सौम्य विदुरस्य विचेष्टितम् ।
बन्धुत्यागनिमित्तं च तथैवागतवान् पुनः ॥५०
सूत उवाच
राज्ञा परीक्षिता पृष्टो यदवोचन्महामुनिः ।
तद्वोऽभिधास्ये शृणुत राज्ञः प्रश्नानुसारतः ॥५१
उस यात्रामें मैत्रेय ऋषिके साथ अध्यात्मके सम्बन्धमें उनकी बातचीत कहाँ हुई तथा मैत्रेयजीने उनके प्रश्न करनेपर किस तत्त्वका उपदेश किया? ॥४९ ॥ सूतजी! आपका
स्वभाव बड़ा सौम्य है । आप विदुरजीका वह चरित्र हमें सुनाइये । उन्होंने अपने भाई-बन्धुओंको क्यों छोड़ा और फिर उनके पास क्यों लौट आये? ॥५० ॥
सूतजीने कहा— शौनकादि ऋषियो! राजा परीक्षितने भी यही बात पूछी थी । उनके प्रश्नोंके उत्तरमें श्रीशुकदेवजी महाराजने जो कुछ कहा था, वही मैं आपलोगोंसे कहता हूँ । सावधान होकर सुनिये ॥५१ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे वैयासिक्यामष्टादशसाहस्रयां पारमहंस्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे पुरुषसंस्थानुवर्णनं नाम दशमोऽध्यायः ॥१० ॥
॥ इति द्वितीयः स्कन्धः समाप्तः ॥ ॐ ॐ ॐ १. प्रा ० पा ० – नुवर्णितम् । २. प्रा ० पा ० – तपस्तद् यत्र गीयते । ३. प्रा ० पा ० — जप्यते । १. प्रा ० पा ० — स स्मृतो । २. प्रा ० पा ० – विसर्गतः । ३. प्रा ० पा ० – तेजस्ततः । -१. प्रा ० पा ० — विभोः । २. प्रा ० पा ० – सुचिरं तस्य । ३. प्रा ० पा ० – अक्षिणी । ४. प्रा ० पा ० — बलवानिन्द्र आदा ० । १. प्रा ० पा ० — त्रिभिः । २. प्रा ० पा ० – मनश्चन्द्र इति । ३. प्रा ० पा ० — भूतात्म ० । १. प्रा ० पा ० — मातृरक्षः ० । २. प्रा ० पा ० - कुशलाकुशलमिश्राणां । १. प्रा ० पा ० — सुरादिभिः । २. प्रा ० पा ० – तत्काले । ३. प्रा ० पा ० — कल्पमिमं । ४. प्रा ० पा ० — कृत्स्नं च दुस्त्यजम् । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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॥ ॐ तत्सत् ॥ ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराणम् तृतीय स्कन्धः अथ प्रथमोऽध्यायः उद्धव और विदुरकी भेंट श्रीशुक उवाच
एवमेतत्पुरा पृष्टो मैत्रेयो भगवान् किल ।
क्षत्त्रा वनं प्रविष्टेन त्यक्त्वा स्वगृहमृद्धिमत् ॥१
यद्वा अयं मन्त्रकृद्वो भगवानखिलेश्वरः ।
पौरवेन्द्रगृहं हित्वा प्रविवेशात्मसास्कृतम् ॥२
राजोवाच
कुत्र क्षत्तुर्भगवता मैत्रेयेणास सङ्गमः ।
कदा वा सह संवाद एतद्वर्णय नः प्रभो ॥३
न ह्यल्पार्थोदयस्तस्य विदुरस्यामलात्मनः ।
तस्मिन् वरीयसि प्रश्नः साधुवादोपबृंहितः ॥४
सूत उवाच
स एवमृषिवर्योऽयं पृष्टो राज्ञा परीक्षिता ।
प्रत्याह तं सुबहुवित्प्रीतात्मा श्रूयतामिति ॥५
श्रीशुक उवाच यदा तु राजा स्वसुतानसाधून् ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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पुष्णन्नधर्मेण विनष्टदृष्टिः । भ्रातुर्यविष्ठस्य सुतान् विबन्धून् प्रवेश्य लाक्षाभवने ददाह ॥६ यदा सभायां कुरुदेवदेव्याः केशाभिमर्शं सुतकर्म गर्ह्यम् । न वारयामास नृपः स्नुषायाः स्वास्त्रैर्हरन्त्याः कुचकुङ्कुमानि ॥७ श्रीशुकदेवजीने कहा- परीक्षित्! जो बात तुमने पूछी है, वही पूर्वकालमें अपने सुख-समृद्धिसे पूर्ण घरको छोड़कर वनमें गये हुए विदुरजीने भगवान् मैत्रेयजीसे पूछी थी ॥१ ॥
जब सर्वेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण पाण्डवोंके दूत बनकर गये थे, तब वे दुर्योधनके महलोंको छोड़कर, उसी विदुरजीके घरमें उसे अपना ही समझकर बिना बुलाये चले गये थे ॥२ ॥
राजा परीक्षित्ने पूछा— प्रभो! यह तो बतलाइये कि भगवान् मैत्रेयके साथ विदुरजीका समागम कहाँ और किस समय हुआ था? || ३ || पवित्रात्मा विदुरने महात्मा मैत्रेयजीसे कोई साधारण प्रश्न नहीं किया होगा; क्योंकि उसे तो मैत्रेयजी- जैसे साधुशिरोमणिने अभिनन्दनपूर्वक उत्तर देकर महिमान्वित किया था ॥४ ॥
सूतजी कहते हैं - सर्वज्ञ शुकदेवजीने राजा परीक्षित्के इस प्रकार पूछनेपर अति प्रसन्न होकर कहा - सुनो ॥५ ॥
श्रीशुकदेवजी कहने लगे - परीक्षित्! यह उन दिनोंकी बात है, जब अन्धे राजा धृतराष्ट्रने अन्यायपूर्वक अपने दुष्ट पुत्रोंका पालन - पोषण करते हुए अपने छोटे भाई पाण्डुके अनाथ बालकोंको लाक्षाभवनमें भेजकर आग लगवा दी || ६ || जब उनकी पुत्रवधू और महाराज युधिष्ठिरकी पटरानी द्रौपदीके केश दुःशासनने भरी सभामें खींचे, उस समय द्रौपदीकी आँखोंसे आँसुओंकी धारा बह चली और उस प्रवाहसे उसके वक्षःस्थलपर लगा हुआ केसर भी बह चला; किन्तु धृतराष्ट्रने अपने पुत्रको उस कुकर्मसे नहीं रोका ॥७ ॥
द्यूते त्वधर्मेण जितस्य साधोः सत्यावलम्बस्य वनागतस्य । न याचतोऽदात्समयेन दायं तमो जुषाणो यदजातशत्रोः ॥८ यदा च पार्थप्रहितः सभायां जगद्गुरुर्यानि जगाद कृष्णः । न तानि पुंसाममृतायनानि राजोरु मेने क्षतपुण्यलेशः ॥९ यदोपहूतो भवनं प्रविष्टो मन्त्राय पृष्टः किल पूर्वजेन । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******