श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 441–450

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 441–450

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कालशक्तिको स्वीकार करके एक साथ ही महत्तत्त्व, अहंकार, पंचभूत, पंच- तन्मात्रा और मनसहित ग्यारह इन्द्रियाँ - इन तेईस तत्त्वोंके समुदायमें प्रविष्ट हो गये ॥१-२ ॥ उनमें प्रविष्ट होकर उन्होंने जीवोंके सोये हुए अदृष्टको जाग्रत किया और परस्पर विलग हुए । उस तत्त्वसमूहको अपनी क्रियाशक्तिके द्वारा आपसमें मिला दिया || ३ || इस प्रकार जब भगवान्ने अदृष्टको कार्योन्मुख किया, तब उस तेईस तत्त्वोंके समूहने भगवान्‌की प्रेरणासे अपने अंशोंद्वारा अधिपुरुष - विराट्को उत्पन्न किया || ४ || अर्थात् जब भगवान्ने अंशरूपसे अपने उस शरीरमें प्रवेश किया, तब वह विश्वरचना करनेवाला महत्तत्त्वादिका समुदाय एक-दूसरेसे मिलकर परिणामको प्राप्त हुआ । यह तत्त्वोंका परिणाम ही विराट् पुरुष है, जिसमें चराचर जगत् विद्यमान है || ५ || जलके भीतर जो अण्डरूप आश्रयस्थान था, उसमें वह हिरण्यमय विराट् पुरुष सम्पूर्ण जीवोंको साथ लेकर एक हजार दिव्य वर्षोंतक रहा ॥६ ॥ वह

विश्वरचना करनेवाले तत्त्वोंका गर्भ ( कार्य ) था तथा ज्ञान, क्रिया और आत्म - शक्तिसे सम्पन्न था । इन शक्तियोंसे उसने स्वयं अपने क्रमशः एक ( हृदयरूप ), दस ( प्राणरूप ) और तीन ( आध्यात्मिक, आधिदैविक, आधिभौतिक ) विभाग किये ॥७ ॥ यह विराट् पुरुष ही प्रथम

जीव होनेके कारण समस्त जीवोंका आत्मा, जीवरूप होनेके कारण परमात्माका अंश और प्रथम अभिव्यक्त होनेके कारण भगवान्‌का आदि - अवतार है । यह सम्पूर्ण भूतसमुदाय इसीमें प्रकाशित होता है ॥८ ॥ यह अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवरूपसे तीन प्रकारका,

प्राणरूपसे दस प्रकारका * और हृदयरूपसे एक प्रकारका है ॥ ९ ॥

स्मरन् विश्वसृजामीशो विज्ञापितमधोक्षजः ।

विराजमतपत्स्वेन तेजसैषां विवृत्तये ॥१०

अथ तस्याभितप्तस्य कति चायतनानि ह ।

निरभिद्यन्त देवानां तानि मे गदतः शृणु ॥११

तस्याग्निरास्यं निर्भिन्नं लोकपालोऽविशत्पदम् ।

वाचा स्वांशेन वक्तव्यं ययासौ प्रतिपद्यते ॥१२

निर्भिन्नं तालु वरुणो लोकपालोऽविशद्धरेः ।

जिह्वयांशेन च रसं ययासौ प्रतिपद्यते ॥१३

निर्भिन्ने अश्विनौ नासे विष्णोराविशतां पदम् ।

घ्राणेनांशेन गन्धस्य प्रतिपत्तिर्यतो भवेत् ॥१४

निर्भिन्ने अक्षिणी त्वष्टा लोकपालोऽविशद्विभोः ।

चक्षुषांशेन रूपाणां प्रतिपत्तिर्यतो भवेत् ॥१५

निर्भिन्नान्यस्य चर्माणि लोकपालोऽनिलोऽविशत् ।

प्राणेनांशेन संस्पर्शं येनासौ प्रतिपद्यते ॥१६

कर्णावस्य विनिर्भिन्नौ धिष्ण्यं स्वं विविशुर्दिशः ।

श्रोत्रेणांशेन शब्दस्य सिद्धिं येन प्रपद्यते ॥ १७

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त्वचमस्य विनिर्भिन्नां विविशुर्धिष्ण्यमोषधीः ।

अंशेन रोमभिः कण्डूं यैरसौ प्रतिपद्यते ॥१८

मेढ्रं तस्य विनिर्भिन्नं स्वधिष्ण्यं क उपाविशत् ।

रेतसांशेन येनासावानन्दं प्रतिपद्यते ॥१९

गुदं पुंसो विनिर्भिन्नं मित्रो लोकेश आविशत् ।

पायुनांशेन येनासौ विसर्गं प्रतिपद्यते ॥२०

हस्तावस्य विनिर्भिन्नाविन्द्रः स्वर्पतिराविशत् ।

वार्तयांशेन पुरुषो यया वृतिं प्रपद्यते ॥२१

फिर विश्वकी रचना करनेवाले महत्तत्त्वादिके अधिपति श्रीभगवान्‌ने उनकी प्रार्थनाको स्मरण कर उनकी वृत्तियोंको जगानेके लिये अपने चेतनरूप तेजसे उस विराट् पुरुषको प्रकाशित किया, उसे जगाया ॥१० ॥ उसके जाग्रत् होते ही देवताओंके लिये कितने स्थान

प्रकट हुए — यह मैं बतलाता हूँ, सुनो ॥११ ॥ विराट् पुरुषके पहले मुख प्रकट हुआ; उसमें

लोकपाल अग्नि अपने अंश वागिन्द्रियके समेत प्रविष्ट हो गया, जिससे यह जीव बोलता है ॥१२ ॥ फिर विराट् पुरुषके तालु उत्पन्न हुआ; उसमें लोकपाल वरुण अपने अंश

रसनेन्द्रियके सहित स्थित हुआ, जिससे जीव रस ग्रहण करता है ॥१३ ॥ इसके पश्चात् उस

विराट् पुरुषके नथुने प्रकट हुए; उनमें दोनों अश्विनीकुमार अपने अंश घ्राणेन्द्रियके सहित प्रविष्ट हुए, जिससे जीव गन्ध ग्रहण करता है ॥१४ ॥ इसी प्रकार जब उस विराट् देहमें आँखें

प्रकट हुईं, तब उनमें अपने अंश नेत्रेन्द्रियके सहित - लोकपति सूर्यने प्रवेश किया, जिस नेत्रेन्द्रियसे पुरुषको विविध रूपोंका ज्ञान होता है || १५ || फिर उस विराट् विग्रहमें त्वचा उत्पन्न हुई; उसमें अपने अंश त्वगिन्द्रियके सहित वायु स्थित हुआ, जिस त्वगिन्द्रियसे जीव स्पर्शका अनुभव करता है ॥ १६ ॥ जब इसके कर्णछिद्र प्रकट हुए, तब उनमें अपने अंश

श्रवणेन्द्रियके सहित दिशाओंने प्रवेश किया, जिस श्रवणेन्द्रियसे जीवको शब्दका ज्ञान होता है ॥१७ ॥ फिर विराट् शरीरमें चर्म उत्पन्न हुआ; उसमें अपने अंश रोमोंके सहित ओषधियाँ

स्थित हुईं, जिन रोमोंसे जीव खुजली आदिका अनुभव करता है ॥ १८ ॥ अब उसके लिंग

उत्पन्न हुआ । अपने इस आश्रयमें प्रजापतिने अपने अंश वीर्यके सहित प्रवेश किया, जिससे जीव आनन्दका अनुभव करता है ॥१९ ॥ फिर विराट् पुरुषके गुदा प्रकट हुई; उसमें

लोकपाल मित्रने अपने अंश पायु - इन्द्रियके सहित प्रवेश किया, इससे जीव मलत्याग करता है ॥२० ॥ इसके पश्चात् उसके हाथ प्रकट हुए; उनमें अपनी ग्रहण - त्यागरूपा शक्तिके सहित

देवराज इन्द्रने प्रवेश किया, इस शक्तिसे जीव अपनी जीविका प्राप्त करता है ॥२१ ॥

पादावस्य विनिर्भिन्नौ लोकेशो विष्णुराविशत् ।

गत्या स्वांशेन पुरुषो यया प्राप्यं प्रपद्यते ॥२२

बुद्धिं चास्य विनिर्भिन्नां वागीशो धिष्ण्यमाविशत् ।

बोधेनांशेन बोद्धव्यप्रतिपत्तिर्यतो भवेत् ॥२३

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पृष्ठ 443

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हृदयं चास्य निर्भिन्नं चन्द्रमा धिष्ण्यमाविशत् ।

मनसांशेन येनासौ विक्रियां प्रतिपद्यते ॥२४

आत्मानं चास्य निर्भिन्नमभिमानोऽविशत्पदम् ।

कर्मणांशेन येनासौ कर्तव्यं प्रतिपद्यते ॥२५

सत्त्वं चास्य विनिर्भिन्नं महान्धिष्ण्यमुपाविशत् ।

चित्तेनांशेन येनासौ विज्ञानं प्रतिपद्यते ॥ २६

शीर्णोऽस्य द्यौर्धरा पद्भ्यां खं नाभेरुदपद्यत ।

गुणानां वृत्तयो येषु प्रतीयन्ते सुरादयः ॥२७

आत्यन्तिकेन सत्त्वेन दिवं देवाः प्रपेदिरे ।

धरां रजःस्वभावेन पणयो ये च ताननु ॥२८

तार्तीयेन स्वभावेन भगवन्नाभिमाश्रिताः ।

उभयोरन्तरं व्योम ये रुद्रपार्षदां गणाः ॥२९

मुखतोऽवर्तत ब्रह्म पुरुषस्य कुरूद्वह ।

यस्तून्मुखत्वाद्वर्णानां मुख्योऽभूद्ब्राह्मणो गुरुः ॥ ३०

बाहुभ्योऽवर्तत क्षत्रं क्षत्रियस्तदनुव्रतः ।

यो जातस्त्रायते वर्णान् पौरुषः कण्टकक्षतात् ॥३१

विशोऽवर्तन्त तस्योर्वोर्लोकवृत्तिकरीर्विभोः ।

वैश्यस्तदुद्भवो वार्तां नृणां यः समवर्तयत् ॥३२

जब इसके चरण उत्पन्न हुए, तब उनमें अपनी शक्ति गतिके सहित लोकेश्वर विष्णुने प्रवेश किया — इस गतिशक्तिद्वारा जीव अपने गन्तव्य स्थानपर पहुँचता है ॥२२ ॥ फिर इसके

बुद्धि उत्पन्न हुई; अपने इस स्थानमें अपने अंश बुद्धिशक्तिके साथ वाक्पति ब्रह्माने प्रवेश किया, इस बुद्धिशक्तिसे जीव ज्ञातव्य विषयोंको जान सकता है || २३ || फिर इसमें हृदय प्रकट हुआ; उसमें अपने अंश मनके सहित चन्द्रमा स्थित हुआ । इस मनःशक्तिके द्वारा जीव संकल्प - विकल्पादिरूप विकारोंको प्राप्त होता है ॥ २४ ॥ तत्पश्चात् विराट् पुरुषमें अहंकार

उत्पन्न हुआ; इस अपने आश्रयमें क्रियाशक्तिसहित अभिमान ( रुद्र ) - ने प्रवेश किया । इससे जीव अपने कर्तव्यको स्वीकार करता है ॥ २५ ॥ अब इसमें चित्त प्रकट हुआ । उसमें

चित्तशक्तिके सहित महत्तत्त्व ( ब्रह्मा ) स्थित हुआ; इस चित्तशक्तिसे जीव विज्ञान ( चेतना ) - को उपलब्ध करता है ॥२६ ॥ इस विराट् पुरुषके सिरसे स्वर्गलोक, पैरोंसे पृथ्वी और नाभिसे

अन्तरिक्ष ( आकाश ) उत्पन्न हुआ । इनमें क्रमशः सत्त्व, रज और तम – इन तीन गुणोंके परिणामरूप देवता, मनुष्य और प्रेतादि देखे जाते हैं ॥ २७ ॥ इनमें देवतालोग सत्त्वगुणकी

अधिकताके कारण स्वर्गलोकमें, मनुष्य और उनके उपयोगी गौ आदि जीव रजोगुणकी प्रधानताके कारण पृथ्वीमें तथा तमोगुणी स्वभाववाले होनेसे रुद्रके पार्षदगण ( भूत, प्रेत ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

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आदि ) दोनोंके बीचमें स्थित भगवान्के नाभिस्थानीय अन्तरिक्षलोकमें रहते हैं ॥२८-२९ ॥ विदुरजी! वेद और ब्राह्मण भगवान्‌के मुखसे प्रकट हुए । मुखसे प्रकट होनेके कारण ही ब्राह्मण सब वर्णोंमें श्रेष्ठ और सबका गुरु है || ३० || उनकी भुजाओंसे क्षत्रियवृत्ति और उसका अवलम्बन करनेवाला क्षत्रिय वर्ण उत्पन्न हुआ, जो विराट् भगवान्‌का अंश होनेके कारण जन्म लेकर सब वर्णोंकी चोर आदिके उपद्रवोंसे रक्षा करता है ॥ ३१ ॥ भगवान्की दोनों

जाँघोंसे सब लोगोंका निर्वाह करनेवाली वैश्यवृत्ति उत्पन्न हुई और उन्हींसे वैश्य वर्णका भी प्रादुर्भाव हुआ । यह वर्ण अपनी वृत्तिसे सब जीवोंकी जीविका चलाता है ॥३२ ॥

पद्भ्यां भगवतो जज्ञे शुश्रूषा धर्मसिद्धये ।

तस्यां जातः पुरा शूद्रो सद्वृत्त्या तुष्यते हरिः ॥ ३३

एते वर्णाः स्वधर्मेण यजन्ति स्वगुरुं हरिम् ।

श्रद्धयाऽऽत्मविशुद्ध्यर्थं यज्जाताः सह वृत्तिभिः ॥ ३४

एतत्क्षत्तर्भगवतो दैवकर्मात्मरूपिणः ।

कः श्रद्दध्यादुपाकर्तुं योगमायाबलोदयम् ॥ ३५

अथापि कीर्तयाम्यङ्ग यथामति यथाश्रुतम् ।

कीर्तिं हरेः स्वां सत्कर्तुं गिरमन्याभिधासतीम् ॥३६

एकान्तलाभं वचसो नु पुंसां सुश्लोकमौलेर्गुणवादमाहुः । श्रुतेश्च विद्वद्भिरुपाकृतायां कथासुधायामुपसम्प्रयोगम् ॥३७

आत्मनोऽवसितो वत्स महिमा कविनाऽऽदिना ।

संवत्सरसहस्रान्ते धिया योगविपक्वया ॥ ३८

अतो भगवतो माया मायिनामपि मोहिनी ।

यत्स्वयं चात्मवर्त्मात्मा न वेद किमुतापरे ॥ ३ ९

यतोऽप्राप्य न्यवर्तन्त वाचश्च मनसा सह ।

अहं चान्य इमे देवास्तस्मै भगवते नमः ॥४०

फिर सब धर्मोंकी सिद्धिके लिये भगवान्‌के चरणोंसे सेवावृत्ति प्रकट हुई और उन्हींसे पहले - पहल उस वृत्तिका अधिकारी शूद्रवर्ण भी प्रकट हुआ, जिसकी वृत्तिसे ही श्रीहरि प्रसन्न ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 445

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हो जाते हैं * ॥३३ ॥ ये चारों वर्ण अपनी - अपनी वृत्तियोंके सहित जिनसे उत्पन्न हुए हैं, उन

अपने गुरु श्रीहरिका अपने - अपने धर्मोंसे चित्तशुद्धिके लिये श्रद्धापूर्वक पूजन करते हैं ॥३४ ॥ विदुरजी! यह विराट् पुरुष काल, कर्म और स्वभावशक्तिसे युक्त भगवान्‌की

योगमायाके प्रभावको प्रकट करनेवाला है । इसके स्वरूपका पूरा - पूरा वर्णन करनेका कौन साहस कर सकता है ॥ ३५ ॥ तथापि प्यारे विदुरजी! अन्य व्यावहारिक चर्चाओंसे अपवित्र

हुई अपनी वाणीको पवित्र करनेके लिये, जैसी मेरी बुद्धि है और जैसा मैंने गुरुमुखसे सुना है वैसा, श्रीहरिका सुयश वर्णन करता हूँ || ३६ || महापुरुषोंका मत है कि पुण्यश्लोकशिरोमणि श्रीहरिके गुणोंका गान करना ही मनुष्योंकी वाणीका तथा विद्वानोंके मुखसे भगवत्कथामृतका पान करना ही उनके कानोंका सबसे बड़ा लाभ है ॥ ३७ ॥ वत्स! हम ही

नहीं, आदि - कवि श्रीब्रह्माजीने एक हजार दिव्य वर्षोंतक अपनी योगपरिपक्व बुद्धिसे विचार किया; तो भी क्या वे भगवान्‌की अमित महिमाका पार पा सके? || ३८ || अतः भगवान्‌की माया बड़े - बड़े मायावियोंको भी मोहित कर देनेवाली है । उसकी चक्करमें डालनेवाली चाल अनन्त है; अतएव स्वयं भगवान् भी उसकी थाह नहीं लगा सकते, फिर दूसरोंकी तो बात ही क्या है ॥३९ ॥ जहाँ न पहुँचकर मनके सहित वाणी भी लौट आती है तथा जिनका पार

पानेमें अहंकारके अभिमानी रुद्र तथा अन्य इन्द्रियाधिष्ठाता देवता भी समर्थ नहीं हैं, उन श्रीभगवान्को हम नमस्कार करते हैं ॥४० ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे षष्ठोऽध्यायः ॥६ ॥

* सब धर्मकी सिद्धिका मूल सेवा है, सेवा किये बिना कोई भी धर्म सिद्ध नहीं होता । अतः सब धर्मोकी मूलभूता सेवा ही जिसका धर्म है, वह शूद्र सब वर्णोंमें महान है । ब्राह्मणका धर्म मोक्षके लिये है, क्षत्रियका धर्म भोगनेके लिये है, वैश्यका धर्म अर्थके लिये है और शूद्रका धर्म धर्मके लिये है । इस प्रकार प्रथम तीन वर्णोंके धर्म अन्य पुरुषार्थोंके लिये हैं, किन्तु शूद्रका धर्म स्वपुरुषार्थके लिये है; अतः इसकी वृत्तिसे ही भगवान् प्रसन्न हो जाते हैं । * दस इन्द्रियोंसहित मन अध्यात्म है, इन्द्रियादिके विषय अधिभूत हैं, इन्द्रियाधिष्ठाता देव आधिदैव हैं तथा प्राण, अपान, उदान, समान, व्यान, नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त और धनंजय — ये दस प्राण हैं । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 446

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अथ सप्तमोऽध्यायः विदुरजीके प्रश्न श्रीशुक उवाच

एवं ब्रुवाणं मैत्रेयं द्वैपायनसुतो बुधः ।

प्रीणयन्निव भारत्या विदुरः प्रत्यभाषत ॥१

विदुर उवाच

ब्रह्मन् कथं भगवतश्चिन्मात्रस्याविकारिणः ।

लीलया चापि युज्येरन्निर्गुणस्य गुणाः क्रियाः ॥२

क्रीडायामुद्यमोऽर्भस्य कामश्चिक्रीडिषान्यतः ।

स्वतस्तृप्तस्य च कथं निवृत्तस्य सदान्यतः ॥३

अस्राक्षीद्भगवान् विश्वं गुणमय्याऽऽत्ममायया ।

तया संस्थापयत्येतद्भूयः प्रत्यपिधास्यति ॥४

देशतः कालतो योऽसाववस्थातः स्वतोऽन्यतः ।

अविलुप्तावबोधात्मा स युज्येताजया कथम् ॥५

भगवानेक एवैष सर्वक्षेत्रेष्ववस्थितः ।

अमुष्य दुर्भगत्वं वा क्लेशो वा कर्मभिः कुतः ॥६

एतस्मिन्मे मनो विद्वन् खिद्यतेऽज्ञानसङ्कटे ।

तन्नः पराणुद विभो कश्मलं मानसं महत् ॥७

श्रीशुक उवाच

स इत्थं चोदितः क्षत्त्रा तत्त्वजिज्ञासुना मुनिः ।

प्रत्याह भगवच्चित्तः स्मयन्निव गतस्मयः ॥८

मैत्रेय उवाच

सेयं भगवतो माया यन्नयेन विरुध्यते ।

ईश्वरस्य विमुक्तस्य कार्पण्यमुत बन्धनम् ॥९

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पृष्ठ 447

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यदर्थेन विनामुष्य पुंस आत्मविपर्ययः ।

प्रतीयत उपद्रष्टुः स्वशिरश्छेदनादिकः ॥१०

श्रीशुकदेवजी कहते हैं- मैत्रेयजीका यह भाषण सुनकर बुद्धिमान् व्यासनन्दन विदुरजीने उन्हें अपनी वाणीसे प्रसन्न करते हुए कहा ॥१ ॥

विदुरजीने पूछा— ब्रह्मन्! भगवान् तो शुद्ध बोधस्वरूप, निर्विकार और निर्गुण हैं; उनके साथ लीलासे भी गुण और क्रियाका सम्बन्ध कैसे हो सकता है ॥२ ॥ बालकमें तो कामना

और दूसरोंके साथ खेलनेकी इच्छा रहती है, इसीसे वह खेलनेके लिये प्रयत्न करता है; किन्तु भगवान् तो स्वतः नित्यतृप्त - पूर्णकाम और सर्वदा असंग हैं, वे क्रीडाके लिये भी क्यों संकल्प करेंगे ॥३ ॥ भगवान् ने अपनी गुणमयी मायासे जगत्की रचना की है, उसीसे वे

इसका पालन करते हैं और फिर उसीसे संहार भी करेंगे || ४ || जिनके ज्ञानका देश, काल अथवा अवस्थासे, अपने - आप या किसी दूसरे निमित्तसे भी कभी लोप नहीं होता, उनका मायाके साथ किस प्रकार संयोग हो सकता है ॥ ५ ॥ एकमात्र ये भगवान् ही समस्त क्षेत्रोंमें

उनके साक्षीरूपसे स्थित हैं, फिर इन्हें दुर्भाग्य या किसी प्रकारके कर्मजनित क्लेशकी प्राप्ति कैसे हो सकती है ॥६ ॥ भगवन्! इस अज्ञानसंकटमें पड़कर मेरा मन बड़ा खिन्न हो रहा है,

आप मेरे मनके इस महान् मोहको कृपा करके दूर कीजिये ॥७ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - तत्त्वजिज्ञासु विदुरजीकी यह प्रेरणा प्राप्तकर अहंकारहीन श्रीमैत्रेयजीने भगवान्का स्मरण करते हुए मुसकराते हुए कहा ॥८ ॥

श्रीमैत्रेयजीने कहा- जो आत्मा सबका स्वामी और सर्वथा मुक्तस्वरूप है, वही दीनता और बन्धनको प्राप्त हो— यह बात युक्तिविरुद्ध अवश्य है; किन्तु वस्तुतः यही तो भगवान्की माया है ॥९ ॥ जिस प्रकार स्वप्न देखनेवाले पुरुषको अपना सिर कटना आदि व्यापार न

होनेपर भी अज्ञानके कारण सत्यवत् भासते हैं, उसी प्रकार इस जीवको बन्धनादि न होते हुए भी अज्ञानवश भास रहे हैं ॥१० ॥

यथा जले चन्द्रमसः कम्पादिस्तत्कृतो गुणः ।

दृश्यतेऽसन्नपि द्रष्टुरात्मनो नात्मनो गुणः ॥ ११

सवै निवृत्तिधर्मेण वासुदेवानुकम्पया ।

भगवद्भक्तियोगेन तिरोधत्ते शनैरिह ॥१२

यदेन्द्रियोपरामोऽथ द्रष्ट्रात्मनि परे हरौ ।

विलीयन्ते तदा क्लेशाः संसुप्तस्येव कृत्स्नशः ॥१३

अशेषसंक्लेशशमं विधत्ते गुणानुवादश्रवणं मुरारेः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 448

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कुतः पुनस्तच्चरणारविन्द-परागसेवारतिरात्मलब्धा ॥१४ विदुर उवाच

संछिन्नः संशयो मह्यं तव सूक्तासिना विभो ।

उभयत्रापि भगवन्मनो मे सम्प्रधावति ॥१५

साध्वेतद् व्याहृतं विद्वन्नात्ममायायनं हरेः ।

आभात्यपार्थं निर्मूलं विश्वमूलं न यद्बहिः ॥१६

यश्च मूढतमो लोके यश्च बुद्धेः परं गतः ।

तावुभौ सुखमेधेते क्लिश्यत्यन्तरितो जनः ॥१७

अर्थाभावं विनिश्चित्य प्रतीतस्यापि ३ नात्मनः ।

तां चापि युष्मच्चरणसेवयाहं पराणुदे ॥१८

यदि यह कहा जाय कि फिर ईश्वरमें इनकी प्रतीति क्यों नहीं होती, तो इसका उत्तर यह है कि जिस प्रकार जलमें होनेवाली कम्प आदि क्रिया जलमें दीखनेवाले चन्द्रमाके प्रतिबिम्बमें न होनेपर भी भासती है, आकाशस्थ चन्द्रमामें नहीं, उसी प्रकार देहाभिमानी जीवमें ही देहके मिथ्या धर्मोकी प्रतीति होती है, परमात्मामें नहीं ॥११ ॥ निष्कामभावसे

धर्मोंका आचरण करनेपर भगवत्कृपासे प्राप्त हुए भक्तियोगके द्वारा यह प्रतीति धीरे - धीरे निवृत्त हो जाती है ॥१२ ॥ जिस समय समस्त इन्द्रियाँ विषयोंसे हटकर साक्षी परमात्मा

श्रीहरिमें निश्चलभावसे स्थित हो जाती हैं, उस समय गाढ निद्रामें सोये हुए मनुष्यके समान जीवकेराग- -द्वेषादि सारे क्लेश सर्वथा नष्ट हो जाते हैं ॥ १३ ॥ श्रीकृष्णके गुणोंका वर्णन एवं

श्रवण अशेष दुःखराशिको शान्त कर देता है; फिर यदि हमारे हृदयमें उनके चरणकमलकी रजके सेवनका प्रेम जग पड़े, तब तो कहना ही क्या है? ॥१४ ॥

विदुरजीने कहा – भगवन्! आपके युक्तियुक्त वचनोंकी तलवारसे मेरे सन्देह छिन्न - भिन्न हो गये हैं । अब मेरा चित्त भगवान्‌की स्वतन्त्रता और जीवकी परतन्त्रता- दोनों ही विषयोंमें खूब प्रवेश कर रहा है ॥ १५ ॥ विद्वन्! आपने यह बात बहुत ठीक कही कि जीवको जो

क्लेशादिकी प्रतीति हो रही है, उसका आधार केवल भगवान्की माया ही है । वह क्लेश मिथ्या एवं निर्मूल ही है; क्योंकि इस विश्वका मूल कारण ही मायाके अतिरिक्त और कुछ नहीं है ॥१६ ॥ इस संसारमें दो ही प्रकारके लोग सुखी हैं - या तो जो अत्यन्त मूढ़ ( अज्ञानग्रस्त )

हैं या जो बुद्धि आदिसे अतीत श्रीभगवान्‌को प्राप्त कर चुके हैं । बीचकी श्रेणीके संशयापन्न लोग तो दुःख ही भोगते रहते हैं ॥१७ ॥ भगवन्! आपकी कृपासे मुझे यह निश्चय हो गया कि

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पृष्ठ 449

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ये अनात्म पदार्थ वस्तुतः हैं नहीं, केवल प्रतीत ही होते हैं । अब मैं आपके चरणोंकी सेवाके प्रभावसे उस प्रतीतिको भी हटा दूँगा ॥१८ ॥ इन श्रीचरणोंकी सेवासे नित्यसिद्ध भगवान्

श्रीमधुसूदनके चरणकमलोंमें उत्कट प्रेम और आनन्दकी वृद्धि होती है, जो आवागमनकी यन्त्रणाका नाश कर देती है ॥ १ ९ ॥ महात्मालोग भगवत्प्राप्तिके साक्षात् मार्ग ही होते हैं, उनके यहाँ सर्वदा देवदेव श्रीहरिके गुणोंका गान होता रहता है; अल्पपुण्य पुरुषको उनकी सेवाका अवसर मिलना अत्यन्त कठिन है ॥ २० ॥

यत्सेवया भगवतः कूटस्थस्य मधुद्विषः ।

रतिरासो भवेत्तीव्रः पादयोर्व्यसनार्दनः ॥ १ ९

दुरापा ह्यल्पतपसः सेवा वैकुण्ठवर्त्मसु ।

यत्रोपगीयते नित्यं देवदेवो जनार्दनः ॥ २०

सृष्ट्वाग्रे महदादीनि सविकाराण्यनुक्रमात् ।

तेभ्यो विराजमुद्धृत्य तमनु प्राविशद्विभुः ॥ २१

यमाहुराद्यं पुरुषं सहस्राङ्घ्रयूरुबाहुकम् ।

यत्र विश्व इमे लोकाः सविकाशं समासते ॥२२

यस्मिन् दशविधः प्राणः सेन्द्रियार्थेन्द्रियस्त्रिवृत् ।

त्वयेरितो यतो वर्णास्तद्विभूतीर्वदस्व नः ॥२३

यत्र पुत्रैश्च पौत्रैश्च नप्तृभिः सह गोत्रजैः ।

प्रजा विचित्राकृतय आसन् याभिरिदं ततम् ॥२४

प्रजापतीनां स पतिश्चक्लृपे कान् प्रजापतीन् ।

सर्गांश्चैवानुसर्गांश्च मनून्मन्वन्तराधिपान् ॥२५

एतेषामपि वंशांश्च वंशानुचरितानि च ।

उपर्यधश्च ये लोका भूमेर्मित्रात्मजासते ॥२६

तेषां संस्थां प्रमाणं च भूर्लोकस्य च वर्णय ।

तिर्यङ्मानुषदेवानां सरीसृपपतत्त्रिणाम् ।

वद नः सर्गसंव्यूहं गार्भस्वेदद्विजोद्भिदाम् ॥२७

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पृष्ठ 450

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गुणावतारैर्विश्वस्य सर्गस्थित्यप्ययाश्रयम् ।

सृजतः श्रीनिवासस्य व्याचक्ष्वोदारविक्रमम् ॥२८

भगवन्! आपने कहा कि सृष्टिके प्रारम्भमें भगवान्ने क्रमशः महदादि तत्त्व और उनके विकारोंको रचकर फिर उनके अंशोंसे विराट्को उत्पन्न किया और इसके पश्चात् वे स्वयं उसमें प्रविष्ट हो गये ॥२१ ॥ उन विराट्के हजारों पैर, जाँघें और बाँहें हैं; उन्हींको वेद आदिपुरुष

कहते हैं; उन्हींमें ये सब लोक विस्तृतरूपसे स्थित हैं ॥२२ ॥ उन्हींमें इन्द्रिय, विषय और

इन्द्रियाभिमानी देवताओंके सहित दस प्रकारके प्राणोंका - जो इन्द्रियबल, मनोबल और शारीरिक बलरूपसे तीन प्रकारके हैं - आपने वर्णन किया है और उन्हींसे ब्राह्मणादि वर्ण भी उत्पन्न हुए हैं । अब आप मुझे उनकी ब्रह्मादि विभूतियोंका वर्णन सुनाइये -जिनसे पुत्र, पौत्र, नाती और कुटुम्बियोंके सहित तरह - तरह की प्रजा उत्पन्न हुई और उससे यह सारा ब्रह्माण्ड भर गया ॥२३-२४ ॥ वह विराट् ब्रह्मादि प्रजापतियोंका भी प्रभु है । उसने किन - किन प्रजापतियोंको उत्पन्न किया तथा सर्ग, अनुसर्ग और मन्वन्तरोंके अधिपति मनुओंकी भी किस क्रमसे रचना की? ॥२५ ॥ मैत्रेयजी! उन मनुओंके वंश और वंशधर राजाओंके चरित्रोंका,

पृथ्वीके ऊपर और नीचेके लोकों तथा भूर्लोकके विस्तार और स्थितिका भी वर्णन कीजिये तथा यह भी बताइये कि तिर्यक्, मनुष्य, देवता, सरीसृप ( सर्पादि रेंगनेवाले जन्तु ) और पक्षी तथा जरायुज, स्वेदज, अण्डज और उद्भिज्ज – ये चार प्रकारके प्राणी किस प्रकार उत्पन्न हुए ॥२६-२७ ॥ श्रीहरिने सृष्टि करते समय जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और संहारके लिये अपने गुणावतार ब्रह्मा, विष्णु और महादेवरूपसे जो कल्याणकारी लीलाएँ कीं, उनका भी वर्णन कीजिये ॥२८ ॥

वर्णाश्रमविभागांश्च रूपशीलस्वभावतः ।

ऋषीणां जन्मकर्मादि वेदस्य च विकर्षणम् ॥२९

यज्ञस्य च वितानानि योगस्य च पथः प्रभो ।

नैष्कर्म्यस्य च सांख्यस्य तन्त्रं वा भगवत्स्मृतम् ॥३०

पाखण्डपथवैषम्यं प्रतिलोमनिवेशनम् ।

जीवस्य गतयो याश्च यावतीर्गुणकर्मजाः ॥ ३१

धर्मार्थकाममोक्षाणां निमित्तान्यविरोधतः ।

वार्ताया दण्डनीतेश्च श्रुतस्य च विधिं पृथक् ॥ ३२

श्राद्धस्य च विधिं ब्रह्मन् पितॄणां सर्गमेव च ।

ग्रहनक्षत्रताराणां कालावयवसंस्थितिम् ॥३३

दानस्य तपसो वापि यच्चेष्टापूर्तयोः फलम् ।

प्रवासस्थस्य यो धर्मो यश्च पुंस उतापदि ॥३४

येन वा भगवांस्तुष्येद्धर्मयोनिर्जनार्दनः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******