श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 451–460
श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 451–460
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सम्प्रसीदति वा येषामेतदाख्याहि चानघ ॥३५
अनुव्रतानां शिष्याणां पुत्राणां च द्विजोत्तम ।
अनापृष्टमपि ब्रूयुर्गुरवो दीनवत्सलाः ॥३६
तत्त्वानां भगवंस्तेषां कतिधा प्रतिसंक्रमः ।
तत्रेमं क उपासीरन् क उ स्विदनुशेरते ॥३७
पुरुषस्य च संस्थानं स्वरूपं वा परस्य च ।
ज्ञानं च नैगमं यत्तद्गुरुशिष्यप्रयोजनम् ॥३८
निमित्तानि च तस्येह प्रोक्तान्यनघ सूरिभिः ।
स्वतो ज्ञानं कुतः पुंसां भक्तिर्वैराग्यमेव वा ॥३९
एतान्मे पृच्छतः प्रश्नान् हरेः कर्मविवित्सया ।
ब्रूहि मेऽज्ञस्य मित्रत्वादजया नष्टचक्षुषः ॥४०
वेष, आचरण और स्वभावके अनुसार वर्णाश्रमका विभाग, ऋषियोंके जन्म - कर्मादि, वेदोंका विभाग, यज्ञोंका विस्तार, योगका मार्ग, ज्ञानमार्ग और उसका साधन सांख्यमार्ग तथा भगवान्के कहे हुए नारदपांचरात्र आदि तन्त्रशास्त्र, विभिन्न पाखण्डमार्गोंके प्रचारसे होनेवाली विषमता, नीचवर्णके पुरुषसे उच्चवर्णकी स्त्रीमें होनेवाली सन्तानोंके प्रकार तथा भिन्न - भिन्न गुण और कर्मोंके कारण जीवकी जैसी और जितनी गतियाँ होती हैं, वे सब हमें सुनाइये ॥२९ -३१ ॥ ब्रह्मन्! धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी प्राप्तिके परस्पर अविरोधी साधनोंका, वाणिज्य, दण्डनीति और शास्त्रश्रवणकी विधियोंका, श्राद्धकी विधिका, पितृगणोंकी सृष्टिका तथा कालचक्रमें ग्रह, नक्षत्र और तारागणकी स्थितिका भी अलग - अलग वर्णन कीजिये ॥३२-३३ ॥ दान, तप तथा इष्ट और पूर्त कर्मोंका क्या फल है? प्रवास और आपत्तिके समय मनुष्यका क्या धर्म होता है? ॥ ३४ ॥ निष्पाप मैत्रेयजी! धर्मके मूल कारण
श्रीजनार्दनभगवान् किस आचरणसे सन्तुष्ट होते हैं और किनपर अनुग्रह करते हैं, यह वर्णन कीजिये ॥३५ ॥ द्विजवर! दीनवत्सल गुरुजन अपने अनुगत शिष्यों और पुत्रोंको बिना पूछे
भी उनके हितकी बात बतला दिया करते हैं ॥ ३६ ॥ भगवन्! उन महदादि तत्त्वोंका प्रलय
कितने प्रकारका है? तथा जब भगवान् योगनिद्रामें शयन करते हैं, तब उनमेंसे कौन - कौन तत्त्व उनकी सेवा करते हैं और कौन उनमें लीन हो जाते हैं? || ३७ || जीवका तत्त्व, परमेश्वरका स्वरूप, उपनिषत् - प्रतिपादित ज्ञान तथा गुरु और शिष्यका पारस्परिक प्रयोजन क्या है? ॥३८ ॥ पवित्रात्मन् विद्वानोंने उस ज्ञानकी प्राप्तिके क्या - क्या उपाय बतलाये हैं?
क्योंकि मनुष्योंको ज्ञान, भक्ति अथवा वैराग्यकी प्राप्ति अपने - आप तो हो नहीं सकती ॥३९ ॥ ब्रह्मन्! माया - मोहके कारण मेरी विचारदृष्टि नष्ट हो गयी है । मैं अज्ञ हूँ, आप
मेरे परम सुहृद् हैं; अतः श्रीहरिलीलाका ज्ञान प्राप्त करनेकी इच्छासे मैंने जो प्रश्न किये हैं, उनका उत्तर मुझे दीजिये ॥ ४० ॥
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सर्वे वेदाश्च यज्ञाश्च तपो दानानि चानघ ।
जीवाभयप्रदानस्य न कुर्वीरन् कलामपि ॥४१
श्रीशुक उवाच स इत्थमापृष्टपुराणकल्पः कुरुप्रधानेन मुनिप्रधानः । प्रवृद्धहर्षो भगवत्कथायां सञ्चोदितस्तं प्रहसन्निवाह ॥४२ पुण्यमय मैत्रेयजी! भगवत्तत्त्वके उपदेशद्वारा जीवको जन्म - मृत्युसे छुड़ाकर उसे अभय कर देनेमें जो पुण्य होता है, समस्त वेदोंके अध्ययन, यज्ञ, तपस्या और दानादिसे होनेवाला पुण्य उस पुण्यके सोलहवें अंशके बराबर भी नहीं हो सकता ॥४१ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं — राजन्! जब कुरुश्रेष्ठ विदुरजीने मुनिवर मैत्रेयजीसे इस प्रकार पुराणविषयक प्रश्न किये, तब भगवच्चर्चा के लिये प्रेरित किये जानेके कारण वे बड़े प्रसन्न हुए और मुसकराकर उनसे कहने लगे ॥४२ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे सप्तमोऽध्यायः ॥७ ॥
१. प्रा ० पा ० - किं वा । २. प्रा ० पा ० - ० । ३. प्रा ० पा ० — तश्चा ० । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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अथाष्टमोऽध्यायः ब्रह्माजीकी उत्पत्ति मैत्रेय उवाच सत्सेवनीयो बत पूरुवंशो यल्लोकपालो भगवत्प्रधानः । बभूविथेहाजितकीर्तिमालां पदे पदे नूतनयस्यभीक्ष्णम् ॥ १ सोऽहं नृणां क्षुल्लसुखाय दुःखं महद्गतानां विरमाय तस्य । प्रवर्तये भागवतं पुराणं यदाह साक्षाद्भगवानृषिभ्यः ॥२ आसीनमुर्व्यां भगवन्तमाद्यं सङ्कर्षणं देवमकुण्ठसत्त्वम् । विवित्सवस्तत्त्वमतः परस्य कुमारमुख्या मुनयोऽन्वपृच्छन् ॥३ स्वमेव धिष्ण्यं बहु मानयन्तं
यं वासुदेवाभिधमामनन्ति ।
प्रत्यग्धृताक्षाम्बुजकोशमीष-दुन्मीलयन्तं विबुधोदयाय ॥४
श्रीमैत्रेयजीने कहा – विदुरजी! आप भगवद्भक्तोंमें प्रधान लोकपाल यमराज ही हैं; आपके पूरुवंशमें जन्म लेनेके कारण वह वंश साधु - पुरुषोंके लिये भी सेव्य हो गया है । धन्य हैं! आप निरन्तर पद - पदपर श्रीहरिकी कीर्तिमयी मालाको नित्य नूतन बना रहे हैं ॥१ ॥ अब
मैं, क्षुद्र विषय - सुखककी कामनासे महान् दुःखको मोल लेनेवाले पुरुषोंकी दुःखनिवृत्तिके लिये, श्रीमद्भागवतपुराण प्रारम्भ करता हूँ – जिसे स्वयं श्रीसंकर्षणभगवान्ने सनकादि ऋषियोंको सुनाया था ॥२ ॥
अखण्ड ज्ञानसम्पन्न आदिदेव भगवान् संकर्षण पाताललोकमें विराजमान थे । सनत्कुमार आदि ऋषियोंने परम पुरुषोत्तम ब्रह्मका तत्त्व जाननेके लिये उनसे प्रश्न किया ॥३ ॥ उस समय शेषजी अपने आश्रय - स्वरूप उन परमात्माकी मानसिक पूजा कर रहे
थे, जिनका वेद वासुदेवके नामसे निरूपण करते हैं । उनके कमलकोशसरीखे नेत्र बंद थे । प्रश्न करनेपर सनत्कुमारादि ज्ञानीजनोंके आनन्दके लिये उन्होंने अधखुले नेत्रोंसे देखा ॥४ ॥
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स्वर्धुन्युदार्द्रैः स्वजटाकलापै-रुपस्पृशन्तश्चरणोपधानम् । पद्मं यदर्चन्त्यहिराजकन्याः सप्रेमनानाबलिभिर्वरार्थाः ॥५
मुहुर्गृणन्तो वचसानुराग-स्खलत्पदेनास्य कृतानि तज्ज्ञाः ।
किरीटसाहस्रमणिप्रवेक-प्रद्योतितोद्दामफणासहस्रम् ॥६
प्रोक्तं किलैतद्भगवत्तमेन निवृत्तिधर्माभिरताय तेन । सनत्कुमाराय स चाह पृष्टः सांख्यायनायाङ्ग धृतव्रताय ॥७ सांख्यायनः पारमहंस्यमुख्यो विवक्षमाणो भगवद्विभूतीः । जगाद सोऽस्मद्गुरवेऽन्विताय पराशरायाथ बृहस्पतेश्च ॥८ प्रोवाच मह्यं स दयालुरुक्तो मुनिः पुलस्त्येन पुराणमाद्यम् । सोऽहं तवैतत्कथयामि वत्स श्रद्धालवे नित्यमनुव्रताय ॥ ९ उदाप्लुतं ' विश्वमिदं तदाऽऽसीद् यन्निद्रयामीलितदृङ् न्यमीलयत् । अहीन्द्रतल्पेऽधिशयान एकः कृतक्षणः स्वात्मरतौर निरीहः ॥१० सोऽन्तःशरीरेऽर्पितभूतसूक्ष्मः कालात्मिकां शक्तिमुदीरयाणः । उवास तस्मिन् सलिले पदे स्वे यथानलो दारुणि रुद्धवीर्यः ॥११ सनत्कुमार आदि ऋषियोंने मन्दाकिनीके जलसे भीगे अपने जटासमूहसे उनके चरणोंकी चौकीके रूपमें स्थित कमलका स्पर्श किया, जिसकी नागराजकुमारियाँ अभिलषित वरकी प्राप्तिके लिये प्रेमपूर्वक अनेकों उपहार - सामग्रियोंसे पूजा करती हैं ॥५ ॥
सनत्कुमारादि उनकी लीलाके मर्मज्ञ हैं । उन्होंने बार - बार प्रेम - गद्गद वाणीसे उनकी ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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लीलाका गान किया । उस समय शेषभगवान्के उठे हुए सहस्रों फण किरीटोंकी सहस्र - सहस्र श्रेष्ठ मणियोंकी छिटकती हुई रश्मियोंसे जगमगा रहे थे || ६ || भगवान् संकर्षणने निवृत्तिपरायण सनत्कुमारजीको यह भागवत सुनाया था- था - ऐसा प्रसिद्ध है । सनत्कुमारजीने फिर इसे परम व्रतशील सांख्यायन मुनिको, उनके प्रश्न करनेपर सुनाया ॥७ ॥ परमहंसोंमें
प्रधान श्रीसांख्यायनजीको जब भगवान्की विभूतियोंका वर्णन करनेकी इच्छा हुई, तब उन्होंने इसे अपने अनुगत शिष्य, हमारे गुरु श्रीपराशरजीको और बृहस्पतिजीको सुनाया ॥८ ॥ इसके पश्चात् परम दयालु पराशरजीने पुलस्त्य मुनिके कहनेसे वह आदिपुराण
मुझसे कहा । वत्स! श्रद्धालु और सदा अनुगत देखकर अब वही पुराण मैं तुम्हें सुनाता ॥९ ॥
सृष्टिके पूर्व यह सम्पूर्ण विश्व जलमें डूबा हुआ था । उस समय एकमात्र श्रीनारायणदेव शेषशय्यापर पौढ़े हुए थे । वे अपनी ज्ञानशक्तिको अक्षुण्ण रखते हुए ही, योगनिद्राका आश्रय ले, अपने नेत्र मूँदे हुए थे । सृष्टिकर्मसे अवकाश लेकर आत्मानन्दमें मग्न थे । उनमें किसी भी क्रियाका उन्मेष नहीं था ॥ १० ॥ जिस प्रकार अग्नि अपनी दाहिका आदि शक्तियोंको छिपाये
हुए काष्ठमें व्याप्त रहता है, उसी प्रकार श्रीभगवान्ने सम्पूर्ण प्राणियोंके सूक्ष्म शरीरोंको अपने शरीरमें लीन करके अपने आधारभूत उस जलमें शयन किया, उन्हें सृष्टिकाल आनेपर पुनः जगानेके लिये केवल कालशक्तिको जाग्रत् रखा ॥११ ॥
चतुर्युगानां च सहस्रमप्सु स्वपन् स्वयोदीरितया स्वशक्त्या । कालाख्ययाऽऽसादितकर्मतन्त्रो लोकानपीतान्ददृशे स्वदेहे ॥१२ तस्यार्थसूक्ष्माभिनिविष्टदृष्टे-रन्तर्गतोऽर्थो रजसा तनीयान् । गुणेन कालानुगतेन विद्धः सूष्यंस्तदाभिद्यत नाभिदेशात् ॥१३ स पद्मकोशः सहसोदतिष्ठत् कालेन कर्मप्रतिबोधनेन । स्वरोचिषा तत्सलिलं विशालं विद्योतयन्नर्क इवात्मयोनिः ॥१४ तल्लोकपद्मं स उ एव विष्णुः प्रावीविशत्सर्वगुणावभासम् । तस्मिन् स्वयं वेदमयो विधाता स्वयम्भुवं यं स्म वदन्ति सोऽभूत् ॥१५ तस्यां स चाम्भोरुहकर्णिकाया-मवस्थितो लोकमपश्यमानः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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परिक्रमन् व्योम्नि विवृत्तनेत्र-श्चत्वारि लेभेऽनुदिशं मुखानि ॥१६ तस्माद्युगान्तश्वसनावघूर्ण-जलोर्मिचक्रात्सलिलाद्विरूढम् । उपाश्रितः कञ्जमु लोकतत्त्वं नात्मानमद्धाविददादिदेवः ॥१७ क एष योऽसावहमब्जपृष्ठ
एतत्कुतो वाब्जमनन्यदप्सु ।
अस्ति ह्यधस्तादिह किञ्चनैत-दधिष्ठितं यत्र सता नु भाव्यम् ॥१८
स इत्थमुद्वीक्ष्य तदब्जनाल-नाडीभिरन्तर्जलमाविवेश ।
नार्वाग्गतस्तत्खरनालनाल-नाभिं विचिन्वंस्तदविन्दताजः ॥१९
इस प्रकार अपनी स्वरूपभूता चिच्छक्तिके साथ एक सहस्र चतुर्युगपर्यन्त जलमें शयन करनेके अनन्तर जब उन्हींके द्वारा नियुक्त उनकी कालशक्तिने उन्हें जीवोंके कर्मोंकी प्रवृत्तिके लिये प्रेरित किया, तब उन्होंने अपने शरीरमें लीन हुए अनन्त लोक देखे ॥१२ ॥ जिस समय
भगवान्की दृष्टि अपनेमें निहित लिंगशरीरादि सूक्ष्मतत्त्वपर पड़ी, तब वह कालाश्रित रजोगुणसे क्षुभित होकर सृष्टिरचनाके निमित्त उनके नाभिदेशसे बाहर निकला ॥१३ ॥
कर्मशक्तिको जाग्रत् करनेवाले कालके द्वारा विष्णुभगवान्की नाभिसे प्रकट हुआ वह सूक्ष्मतत्त्व कमलकोशके रूपमें सहसा ऊपर उठा और उसने सूर्यके समान अपने तेजसे उस अपार जलराशिको देदीप्यमान कर दिया ॥ १४ ॥ सम्पूर्ण गुणोंको प्रकाशित करनेवाले उस
सर्वलोकमय कमलमें वे विष्णुभगवान् ही अन्तर्यामीरूपसे प्रविष्ट हो गये । तब उसमेंसे बिना पढ़ाये ही स्वयं सम्पूर्ण वेदोंको जाननेवाले साक्षात् वेदमूर्ति श्रीब्रह्माजी प्रकट हुए, जिन्हें लोग स्वयम्भू कहते हैं ॥१५ ॥ उस कमलकी कर्णिका ( गद्दी ) में बैठे हुए ब्रह्माजीको जब कोई
लोक दिखायी नहीं दिया, तब वे आँखें फाड़कर आकाशमें चारों ओर गर्दन घुमाकर देखने लगे, इससे उनके चारों दिशाओंमें चार मुख हो गये ॥१६ ॥ उस समय प्रलयकालीन पवनके
थपेड़ोंसे उछलती हुई जलकी तरंगमालाओंके कारण उस जलराशिसे ऊपर उठे हुए कमलपर विराजमान आदिदेव ब्रह्माजीको अपना तथा उस लोकतत्त्वरूप कमलका कुछ भी रहस्य न जान पड़ा ॥१७ ॥
वे सोचने लगे, ‘ इस कमलकी कर्णिकापर बैठा हुआ मैं कौन हूँ? यह कमल भी बिना किसी अन्य आधारके जलमें कहाँसे उत्पन्न हो गया? इसके नीचे अवश्य कोई ऐसी वस्तु होनी चाहिये, जिसके आधारपर यह स्थित है ' ॥१८ ॥
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ऐसा सोचकर वे उस कमलकी नालके सूक्ष्म छिद्रोंमें होकर उस जलमें घुसे । किन्तु उस नालके आधारको खोजते खोजते नाभि - देशके समीप पहुँच जानेपर भी वे उसे पा न सके ॥१९ ॥
तमस्यपारे विदुरात्मसर्गं विचिन्वतोऽभूत्सुमहांस्त्रिणेमिः । यो देहभाजां भयमीरयाणः परिक्षिणोत्यायुरजस्य हेतिः ॥२० ततो निवृत्तोऽप्रतिलब्धकामः स्वधिष्ण्यमासाद्य पुनः स देवः । शनैर्जितश्वासनिवृत्तचित्तो न्यषीददारूढसमाधियोगः ॥२१
कालेन सोऽजः पुरुषायुषाभि-प्रवृत्तयोगेन विरूढबोधः ।
स्वयं तदन्तर्हृदयेऽवभात-मपश्यतापश्यत यन्न पूर्वम् ॥२२
मृणालगौरायतशेषभोग-पर्यङ्क एकं पुरुषं शयानम् ।
फणातपत्रायुतमूर्धरत्न-द्युभिर्हतध्वान्तयुगान्ततोये ॥ २३
प्रेक्षां क्षिपन्तं हरितोपलाद्रेः
सन्ध्याभ्रनीवेरुरुरुक्ममूर्ध्नः ।
रत्नोदधारौषधिसौमनस्य-वनस्रजो वेणुभुजाङ्घ्रिपाङ्घ्रः ॥२४
आयामतो विस्तरतः स्वमान-देहेन लोकत्रयसंग्रहेण । विचित्रदिव्याभरणांशुकानां कृतश्रियापाश्रितवेषदेहम् ' ॥२५ विदुरजी! उस अपार अन्धकारमें अपने उत्पत्ति स्थानको खोजते खोजते ब्रह्माजीको बहुत काल बीत गया । यह काल ही भगवान्का चक्र है, जो प्राणियोंको भयभीत ( करता हुआ ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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उनकी आयुको क्षीण ) करता रहता है ॥२० ॥ अन्तमें विफलमनोरथ हो वे वहाँसे लौट आये
और पुनः अपने आधारभूत कमलपर बैठकर धीरे - धीरे प्राणवायुको जीतकर चित्तको निःसंकल्प किया और समाधिमें स्थित हो गये ॥२१ ॥ इस प्रकार पुरुषकी पूर्ण आयुके
बराबर कालतक ( अर्थात् दिव्य सौ वर्षतक ) अच्छी तरह योगाभ्यास करनेपर ब्रह्माजीको ज्ञान प्राप्त हुआ; तब उन्होंने अपने उस अधिष्ठानको, जिसे वे पहले खोजनेपर भी नहीं देख पाये थे, अपने ही अन्तःकरणमें प्रकाशित होते देखा ॥२२ ॥ उन्होंने देखा कि उस प्रलयकालीन
जलमें शेषजीके कमलनालसदृश गौर और विशाल विग्रहकी शय्यापर पुरुषोत्तमभगवान् अकेले ही लेटे हुए हैं । शेषजीके दस हजार फण छत्रके समान फैले हुए हैं । उनके मस्तकोंपर किरीट शोभायमान हैं, उनमें जो मणियाँ जड़ी हुई हैं, उनकी कान्तिसे चारों ओरका अन्धकार दूर हो गया है || २३ || वे अपने श्याम शरीरकी आभासे मरकतमणिके पर्वतकी शोभाको लज्जित कर रहे हैं । उनकी कमरका पीतपट पर्वतके प्रान्त देशमें छाये हुए सायंकालके पीले-पीले चमकीले मेघोंकी आभाको मलिन कर रहा है, सिरपर सुशोभित सुवर्णमुकुट सुवर्णमय शिखरोंका मान मर्दन कर रहा है । उनकी वनमाला पर्वतके रत्न, जलप्रपात, ओषधि और पुष्पोंकी शोभाको परास्त कर रही है तथा उनके भुजदण्ड वेणुदण्डका और चरण वृक्षोंका तिरस्कार करते हैं ॥२४ ॥ उनका वह श्रीविग्रह अपने परिमाणसे लंबाई - चौड़ाईमें त्रिलोकीका
संग्रह किये हुए है । वह अपनी शोभासे विचित्र एवं दिव्य वस्त्राभूषणोंकी शोभाको सुशोभित करनेवाला होनेपर भी पीताम्बर आदि अपनी वेशभूषासे सुसज्जित है ॥ २५ ॥
पुंसां स्वकामाय विविक्तमार्गै-रभ्यर्चतां कामदुघाङ्घ्रिपद्मम् ।
प्रदर्शयन्तं कृपया नखेन्दु-मयूखभिन्नाङ्गुलिचारुपत्रम् ॥२६
मुखेन लोकार्तिहरस्मितेन परिस्फुरत्कुण्डलमण्डितेन । शोणायितेनाधरबिम्बभासा प्रत्यर्हयन्तं सुनसेन सुभ्रुवा ॥२७ कदम्बकिञ्जल्कपिशङ्गवाससा स्वलङ्कृतं मेखलया नितम्बे । हारेण चानन्तधनेन वत्स श्रीवत्सवक्षःस्थलवल्लभेन ॥ २८
परार्घ्यकेयूरमणिप्रवेक-पर्यस्तदोर्दण्डसहस्रशाखम् ।
अव्यक्तमूलं भुवनाङ्घ्रिपेन्द्र-महीन्द्रभोगैरधिवीतवल्शम् ॥२९
चराचरौको भगवन्महीध्र-****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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महीन्द्रबन्धुं सलिलोपगूढम् ।
किरीटसाहस्रहिरण्यशृङ्ग-माविर्भवत्कौस्तुभरत्नगर्भम् ॥३०
निवीतमाम्नायमधुव्रतश्रिया स्वकीर्तिमय्या वनमालया हरिम् । सूर्येन्दुवाय्वग्न्यगमं त्रिधामभिः परिक्रमत्प्राधनिकैर्दुरासदम् ॥३१ तर्ह्येव तन्नाभिसरःसरोज-मात्मानमम्भः श्वसनं वियच्च । ददर्श देवो जगतो विधाता नातः परं लोकविसर्गदृष्टिः ॥३२ -अपनी - अपनी अभिलाषाकी पूर्तिके लिये भिन्न - भिन्न मार्गोंसे पूजा करनेवाले भक्तजनोंको कृपापूर्वक अपने भक्तवाञ्छाकल्पतरु चरणकमलोंका दर्शन दे रहे हैं, जिनके सुन्दर अंगुलिदल नखचन्द्रकी चन्द्रिकासे अलग - अलग स्पष्ट चमकते रहते हैं ॥२६ ॥ सुन्दर
नासिका, अनुग्रहवर्षी भौंहें, कानोंमें झिलमिलाते हुए कुण्डलोंकी शोभा, बिम्बाफलके समान लाल - लाल अधरोंकी कान्ति एवं लोकार्तिहारी मुसकानसे युक्त मुखारविन्दके द्वारा वे अपने उपासकोंका सम्मान — अभिनन्दन कर रहे हैं || २७ || वत्स! उनके नितम्बदेशमें कदम्बकुसुमकी केसरके समान पीतवस्त्र और सुवर्णमयी मेखला सुशोभित है तथा वक्षःस्थलमें अमूल्य हार और सुनहरी रेखावाले श्रीवत्सचिह्नकी अपूर्व शोभा हो रही है ॥२८ ॥ वे अव्यक्तमूल चन्दनवृक्षके समान हैं । महामूल्य केयूर और उत्तम उत्तम मणियोंसे
सुशोभित उनके विशाल भुजदण्ड ही मानो उसकी सहस्रों शाखाएँ हैं और चन्दनके वृक्षोंमें जैसे बड़े - बड़े साँप लिपटे रहते हैं, उसी प्रकार उनके कंधोंको शेषजीके फणोंने लपेट रखा है ॥२९ ॥ वे नागराज अनन्तके बन्धु श्रीनारायण ऐसे जान पड़ते हैं, मानो कोई जलसे घिरे
हुए पर्वतराज ही हों । पर्वतपर जैसे अनेकों जीव रहते हैं, उसी प्रकार वे सम्पूर्ण चराचरके आश्रय हैं; शेषजीके फणोंपर जो सहस्रों मुकुट हैं वे ही मानो उस पर्वतके सुवर्णमण्डित शिखर हैं तथा वक्षःस्थलमें विराजमान कौस्तुभमणि उसके गर्भसे प्रकट हुआ रत्न है ॥३० ॥
प्रभुके गलेमें वेदरूप भौंरोंसे गुंजायमान अपनी कीर्तिमयी वनमाला विराज रही है; सूर्य, चन्द्र, वायु और अग्नि आदि देवताओंकी भी आपतक पहुँच नहीं है तथा त्रिभुवनमें बेरोक - टोक विचरण करनेवाले सुदर्शनचक्रादि आयुध भी प्रभुके आस - पास ही घूमते रहते हैं, उनके लिये भी आप अत्यन्त दुर्लभ हैं ॥ ३१ ॥
तब विश्वरचनाकी इच्छावाले लोकविधाता ब्रह्माजीने भगवान्के नाभिसरोवरसे प्रकट हुआ वह कमल, जल, आकाश, वायु और अपना शरीर - केवल ये पाँच ही पदार्थ देखे, इनके सिवा और कुछ उन्हें दिखायी न दिया ॥ ३२ ॥
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स कर्मबीजं रजसोपरक्तः
प्रजाः सिसृक्षन्नियदेव दृष्ट्वा ।
अस्तौद्विसर्गाभिमुखस्तमीड्य-मव्यक्तवर्त्मन्यभिवेशितात्मा ॥३३
रजोगुणसे व्याप्त ब्रह्माजी प्रजाकी रचना करना चाहते थे । जब उन्होंने सृष्टिके कारणरूप केवल ये पाँच ही पदार्थ देखे, तब लोकरचनाके लिये उत्सुक होनेके कारण वे अचिन्त्यगति श्रीहरिमें चित्त लगाकर उन परमपूजनीय प्रभुकी स्तुति करने लगे ॥३३ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां तृतीयस्कन्धेऽष्टमोऽध्यायः ॥८ ॥
१. प्रा ० पा ० – उदप्लुतं । २. प्रा ० पा ० - रतावनीहः । १. प्रा ० पा ० — श्रीतदेहवेषम् । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******