श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 751–760
श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 751–760
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इस भूलके लिये पश्चात्ताप हुआ ॥२९ ॥
ध्रुवजी मन - ही - मन कहने लगे - अहो! सनकादि ऊर्ध्वरेता ( नैष्ठिक ब्रह्मचारी ) सिद्ध भी जिन्हें समाधिद्वारा अनेकों जन्मोंमें प्राप्त कर पाते हैं, उन भगवच्चरणोंकी छायाको मैंने छः महीनेमें ही पा लिया, किन्तु चित्तमें दूसरी वासना रहनेके कारण मैं फिर उनसे दूर हो गया ॥ ३० ॥
अहो! मुझ मन्दभाग्यकी मूर्खता तो देखो, मैंने संसार - पाशको काटनेवाले प्रभुके पादपद्मोंमें पहुँचकर भी उनसे नाशवान् वस्तुकी ही याचना की! ॥३१ ॥ देवताओंको
स्वर्गभोगके पश्चात् फिर नीचे गिरना होता है, इसलिये वे मेरी भगवत्प्राप्तिरूप उच्च स्थितिको सहन नहीं कर सके; अतः उन्होंने ही मेरी बुद्धिको नष्ट कर दिया । तभी तो मुझ दुष्टने नारदजीकी यथार्थ बात भी स्वीकार नहीं की ॥३२ ॥
दैवीं मायामुपाश्रित्य प्रसुप्त इव भिन्नदृक् ।
तये द्वितीयेऽप्यसति भ्रातृभ्रातृव्यहृद्रुजा ॥ ३३
मयैतत्प्रार्थितं व्यर्थं चिकित्सेव गतायुषि ।
प्रसाद्य जगदात्मानं तपसा दुष्प्रसादनम् ।
भवच्छिदमयाचेऽहं भवं भाग्यविवर्जितः ॥३४
स्वाराज्यं यच्छतो मौढ्यान्मानो मे भिक्षितो बत ।
ईश्वरात्क्षीणपुण्येन फलीकारानिवाधनः ॥ ३५
मैत्रेय उवाच न वै मुकुन्दस्य पदारविन्दयो रजोजुषस्तात भवादृशा जनाः । वाञ्छन्ति तद्दास्यमृतेऽर्थमात्मनो यदृच्छया लब्धमनःसमृद्धयः ॥३६
आकर्ण्यात्मजमायान्तं सम्परेत्य यथाऽऽगतम् ।
राजा न श्रद्दधे भद्रमभद्रस्य कुतो मम ॥३७
श्रद्धाय वाक्यं देवर्षेर्हर्षवेगेन धर्षितः ।
वार्ताहर्तुरतिप्रीतो हारं प्रादान्महाधनम् ॥३८
सदश्वं रथमारुह्य कार्तस्वरपरिष्कृतम् । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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ब्राह्मणैः कुलवृद्धैश्च पर्यस्तोऽमात्यबन्धुभिः ॥ ३ ९ यद्यपि संसारमें आत्माके सिवा दूसरा कोई भी नहीं है; तथापि सोया मनुष्य जैसे हुआ स्वप्नमें अपने ही कल्पना किये हुए व्याघ्रादिसे डरता है, उसी प्रकार मैंने भी भगवान्की मायासे मोहित होकर भाईको ही शत्रु मान लिया और व्यर्थ ही द्वेषरूप हार्दिक रोगसे जलने लगा ॥३३ ॥ जिन्हें प्रसन्न करना अत्यन्त कठिन है; उन्हीं विश्वात्मा श्रीहरिको तपस्या - द्वारा
प्रसन्न करके मैंने जो कुछ माँगा है, वह सब व्यर्थ है, ठीक उसी तरह, जैसे गतायु पुरुषके लिये चिकित्सा व्यर्थ होती है । ओह! मैं बड़ा भाग्यहीन हूँ, संसार - बन्धनका नाश करनेवाले प्रभुसे मैंने संसार ही माँगा ॥३४ ॥ मैं बड़ा ही पुण्यहीन हूँ! जिस प्रकार कोई कँगला किसी चक्रवर्ती
सम्राट्को प्रसन्न करके उससे तुषसहित चावलोंकी कनी माँगे, उसी प्रकार मैंने भी आत्मानन्द प्रदान करनेवाले श्रीहरिसे मूर्खतावश व्यर्थका अभिमान बढ़ानेवाले उच्चपदादि ही माँगे हैं ॥३५ ॥
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं - तात! तुम्हारी तरह जो लोग श्रीमुकुन्दपादारविन्द - मकरन्दके ही मधुकर हैं - जो निरन्तर प्रभुकी चरण - रजका ही सेवन करते हैं और जिनका मन अपने - आप आयी हुई सभी परिस्थितियोंमें सन्तुष्ट रहता है, वे भगवान्से उनकी सेवाके सिवा अपने लिये और कोई भी पदार्थ नहीं माँगते ॥ ३६ ॥
इधर जब राजा उत्तानपादने सुना कि उनका पुत्र ध्रुव घर लौट रहा है, तो उन्हें इस बातपर वैसे ही विश्वास नहीं हुआ जैसे कोई किसीके यमलोकसे लौटनेकी बातपर विश्वास न करे । उन्होंने यह सोचा कि ' मुझ अभागेका ऐसा भाग्य कहाँ ' ॥ ३७ ॥ परन्तु फिर उन्हें देवर्षि
नारदकी बात याद आ गयी । इससे उनका इस बातमें विश्वास हुआ और वे आनन्दके वेगसे अधीर हो उठे । उन्होंने अत्यन्त प्रसन्न होकर यह समाचार लानेवालेको एक बहुमूल्य हार दिया ॥३८ ॥ राजा उत्तानपादने पुत्रका मुख देखनेके लिये उत्सुक होकर बहुत - से ब्राह्मण,
कुलके बड़े - बूढ़े, मन्त्री और बन्धुजनोंको साथ लिया तथा एक बढ़िया घोड़ोंवाले सुवर्णजटित रथपर सवार होकर वे झटपट नगरके बाहर आये । उनके आगे - आगे वेदध्वनि होती जाती थी तथा शंख, दुन्दुभि एवं वंशी आदि अनेकों मांगलिक बाजे बजते जाते थे ॥३९ -४० ॥ उनकी दोनों रानियाँ सुनीति और सुरुचि भी सुवर्णमय आभूषणोंसे विभूषित हो राजकुमार उत्तमके साथ पालकियोंपर चढ़कर चल रही थीं ॥ ४१ ॥ ध्रुवजी उपवनके पास आ पहुँचे, उन्हें देखते
ही महाराज उत्तानपाद तुरंत रथसे उतर पड़े । पुत्रको देखनेके लिये वे बहुत दिनोंसे उत्कण्ठित हो रहे थे । उन्होंने झटपट आगे बढ़कर प्रेमातुर हो, लंबी - लंबी साँसें लेते हुए, ध्रुवको भुजाओंमें भर लिया । अब ये पहलेके ध्रुव नहीं थे, प्रभुके परमपुनीत पादपद्मोंका स्पर्श होनेसे इनके समस्त पाप - बन्धन कट गये थे ॥४२-४३ ॥ राजा उत्तानपादकी एक बहुत बड़ी कामना पूर्ण हो गयी । उन्होंने बार - बार पुत्रका सिर सूँघा और आनन्द तथा प्रेमके कारण निकलनेवाले ठंडे - ठंडे * आँसुओंसे उन्हें नहला दिया ॥४४ ॥
शङ्खदुन्दुभिनादेन ब्रह्मघोषेण वेणुभिः ।
निश्चक्राम पुरात्तूर्णमात्मजाभीक्षणोत्सुकः ॥४०
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सुनीतिः सुरुचिश्चास्य महिष्यौ रुक्मभूषिते ।
आरुह्य शिबिकां सार्धमुत्तमेनाभिजग्मतुः ॥४१
तं दृष्ट्वोपवनाभ्याश आयान्तं तरसा रथात् ।
अवरुह्य नृपस्तूर्णमासाद्य प्रेमविह्वलः ॥४२
परिरेभेऽङ्गजं दोर्भ्यां दीर्घोत्कण्ठमनाः श्वसन् ।
विष्वक्सेनाङ्घ्रिसंस्पर्शहताशेषाघबन्धनम् ॥४३
अथाजिघ्रन्मुहुर्मूर्ध्नि शीतैर्नयनवारिभिः १ ।
स्नापयामास तनयं जातोद्दाममनोरथः ॥४४
अभिवन्द्य े पितुः पादावाशीर्भिश्चाभिमन्त्रितः ३ ।
ननाम मातरौ शीर्ष्णा सत्कृतः सज्जनाग्रणीः ॥४५
सुरुचिस्तं समुत्थाप्य पादावनतमर्भकम् ।
परिष्वज्याह जीवेति बाष्पगद्गदया गिरा ॥४६
यस्य प्रसन्नो भगवान् गुणैर्मैत्र्यादिभिर्हरिः ।
तस्मै नमन्ति भूतानि निम्नमाप इव स्वयम् ॥४७
उत्तमश्च ध्रुवश्चोभावन्योन्यं प्रेमविह्वलौ ।
अंगसंगादुत्पुलकावस्त्रौघं मुहुरूहतुः ॥४८
सुनीतिरस्य जननी प्राणेभ्योऽपि प्रियं सुतम् ।
उपगुह्य जहावाधिं तदंगस्पर्शनिर्वृता ॥४९
तदनन्तर सज्जनोंमें अग्रगण्य ध्रुवजीने पिताके चरणोंमें प्रणाम किया और उनसे आशीर्वाद पाकर, कुशल - प्रश्नादिसे सम्मानित हो दोनों माताओंको प्रणाम किया ॥ ४५ ॥
छोटी माता सुरुचिने अपने चरणोंपर झुके हुए बालक ध्रुवको उठाकर हृदयसे लगा लिया और अश्रुगद्गद वाणीसे ‘ चिरंजीवी रहो ' ऐसा आशीर्वाद दिया ॥ ४६ ॥ जिस प्रकार जल स्वयं ही
नीचेकी ओर बहने लगता है - उसी प्रकार मैत्री आदि गुणोंके कारण जिसपर श्रीभगवान् प्रसन्न हो जाते हैं, उसके आगे सभी जीव झुक जाते हैं ॥ ४७ ॥ इधर उत्तम और ध्रुव दोनों ही
प्रेमसे विह्वल होकर मिले । एक - दूसरेके अंगोंका स्पर्श पाकर उन दोनोंके ही शरीरमें रोमांच हो आया तथा नेत्रोंसे बार - बार आसुओंकी धारा बहने लगी ॥४८ ॥ ध्रुवकी माता सुनीति अपने
प्राणोंसे भी प्यारे पुत्रको गले लगाकर सारा सन्ताप भूल गयी । उसके सुकुमार अंगोंके स्पर्शसे उसे बड़ा ही आनन्द प्राप्त हुआ ॥४९ ॥
पयःस्तनाभ्यां सुस्राव नेत्रजैः सलिलैः शिवैः ।
तदाभिषिच्यमानाभ्यां वीर वीरसुवो मुहुः ॥ ५०
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तां शशंसुर्जना राज्ञीं दिष्ट्या ते पुत्र आर्तिहा ।
प्रतिलब्धश्चिरं नष्टो रक्षिता मण्डलं भुवः ॥ ५१
अभ्यर्चितस्त्वया नूनं भगवान् प्रणतार्तिहा ।
यदनुध्यायिनो धीरा मृत्युं जिग्युः सुदुर्जयम् ॥५२
लाल्यमानं जनैरेवं ध्रुवं सभ्रातरं नृपः ।
आरोप्य करिणीं हृष्टः स्तूयमानोऽविशत्पुरम् ॥ ५३
तत्र तत्रोपसंक्लृप्तैर्लसन्मकरतोरणैः ।
सवृन्दैः कदलीस्तम्भैः पूगपोतैश्च तद्विधैः ॥ ५४
चूतपल्लववासःस्रङ्मुक्तादामविलम्बिभिः ।
उपस्कृतं प्रतिद्वारमपां कुम्भैः सदीपकैः ॥ ५५
प्राकारैर्गोपुरागारैः शातकुम्भपरिच्छदैः ।
सर्वतोऽलंकृतं श्रीमद्विमानशिखरद्युभिः ॥५६
मृष्टचत्वररथ्याट्टमार्गं चन्दनचर्चितम् ।
लाजाक्षतैः पुष्पफलैस्तण्डुलैर्बलिभिर्युतम् ॥५७
ध्रुवाय पथि दृष्टाय तत्र तत्र पुरस्त्रियः ।
सिद्धार्थाक्षतदध्यम्बुदूर्वापुष्पफलानि च ॥ ५८
उपजहुः प्रयुंजाना वात्सल्यादाशिषः सतीः ।
शृण्वंस्तद्वल्गुगीतानि प्राविशद्भवनं पितुः ॥ ५ ९
वीरवर विदुरजी! वीरमाता सुनीतिके स्तन उसके नेत्रोंसे झरते हुए मंगलमय आनन्दाश्रुओंसे भीग गये और उनसे बार - बार दूध बहने लगा ॥ ५० ॥ उस समय पुरवासी
लोग उनकी प्रशंसा करते हुए कहने लगे, ' महारानीजी! आपका लाल बहुत दिनोंसे खोया हुआ था; सौभाग्यवश अब वह लौट आया, यह हम सबका दुःख दूर करनेवाला है । बहुत दिनोंतक भूमण्डलकी रक्षा करेगा ॥ ५१ ॥ आपने अवश्य ही शरणागतभयभंजन श्रीहरिकी
उपासना की है । उनका निरन्तर ध्यान करनेवाले धीर पुरुष परम दुर्जय मृत्युको भी जीत लेते हैं ' ॥५२ ॥
विदुरजी! इस प्रकार जब सभी लोग ध्रुवके प्रति अपना लाड़ - प्यार प्रकट कर रहे थे, ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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उसी समय उन्हें भाई उत्तमके सहित हथिनीपर चढ़ाकर महाराज उत्तानपादने बड़े हर्षके साथ
राजधानीमें प्रवेश किया । उस समय सभी लोग उनके भाग्यकी बड़ाई कर रहे थे ॥५३ ॥
नगरमें जहाँ - तहाँ मगरके आकारके सुन्दर दरवाजे बनाये गये थे तथा फल - फूलोंके गुच्छोंके सहित केलेके खम्भे और सुपारीके पौधे सजाये गये थे ॥५४ ॥ द्वार - द्वारपर दीपकके
सहित जलके कलश रखे हुए थे - जो आमके पत्तों, वस्त्रों, पुष्पमालाओं तथा मोतीकी लड़ियोंसे सुसज्जित थे ॥ ५५ ॥ जिन अनेकों परकोटों, फाटकों और महलोंसे नगरी
सुशोभित थी, उन सबको सुवर्णकी सामग्रियोंसे सजाया गया था तथा उनके कँगूरे विमानोंके शिखरोंके समान चमक रहे थे ॥५६ ॥ नगरके चौक, गलियों, अटारियों और सड़कोंको झाड़-बुहारकर उनपर चन्दनका छिड़काव किया गया था और जहाँ - तहाँ खील, चावल, पुष्प, फल,
जौ एवं अन्य मांगलिक उपहार - सामग्रियाँ सजी रखी थीं ॥ ५७ ॥ ध्रुवजी राजमार्गसे जा रहे
थे । उस समय जहाँ - तहाँ नगरकी शीलवती सुन्दरियाँ उन्हें देखनेको एकत्र हो रही थीं । उन्होंने वात्सल्यभावसे अनेकों शुभाशीर्वाद देते हुए उनपर सफेद सरसों, अक्षत, दही, जल, दूर्वा, पुष्प और फलोंकी वर्षा की । इस प्रकार उनके मनोहर गीत सुनते हुए ध्रुवजीने अपने पिताके महलमें प्रवेश किया ॥५८-५९ ॥
महामणिव्रातमये स तस्मिन् भवनोत्तमे ।
लालितो नितरां पित्रा न्यवसद्दिवि देववत् ॥ ६०
पयःफेननिभाः शय्या दान्ता रुक्मपरिच्छदाः ।
आसनानि महार्हाणि यत्र रौक्मा उपस्कराः ॥६१
यत्र स्फटिककुड्येषु महामारकतेषु च ।
मणिप्रदीपा आभान्ति ललनारत्नसंयुताः ॥६२
उद्यानानि च रम्याणि विचित्रैरमरद्रुमैः ।
कूजद्विहंगमिथुनैर्गायन्मत्तमधुव्रतैः ॥६३
वाप्यो वैदूर्यसोपानाः पद्मोत्पलकुमुद्वतीः ।
हंसकारण्डवकुलैर्जुष्टाश्चक्राह्वसारसैः ॥६४
उत्तानपादो राजर्षिः प्रभावं तनयस्य तम् ।
श्रुत्वा दृष्ट्वाद्भुततमं प्रपेदे विस्मयं परम् ॥६५
वीक्ष्योढवयसं तं च प्रकृतीनां च सम्मतम् ।
अनुरक्तप्रजं राजा ध्रुवं चक्रे भुवः पतिम् ॥६६
आत्मानं च प्रवयसमाकलय्य विशाम्पतिः ।
वनं विरक्तः प्रातिष्ठद्विमृशन्नात्मनो गतिम् ॥६७
वह श्रेष्ठ भवन महामूल्य मणियोंकी लड़ियोंसे सुसज्जित था । उसमें अपने पिताजीके लाड़ - प्यारका सुख भोगते हुए वे उसी प्रकार आनन्दपूर्वक रहने लगे, जैसे स्वर्गमें देवतालोग ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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रहते हैं ॥६० ॥ वहाँ दूधके फेनके समान सफेद और कोमल शय्याएँ, हाथी - दाँतके पलंग,
सुनहरी कामदार परदे, बहुमूल्य आसन और बहुत - सा सोनेका सामान था ॥६१ ॥ उसकी
स्फटिक और महामरकतमणि ( पन्ने ) -की दीवारोंमें रत्नोंकी बनी हुई स्त्रीमूर्तियोंपर रखे हुए मणिमय दीपक जगमगा रहे थे ॥ ६२ ॥ उस महलके चारों ओर अनेक जातिके दिव्य वृक्षोंसे
सुशोभित उद्यान थे, जिनमें नर और मादा पक्षियोंका कलरव तथा मतवाले भौंरोंका गुंजार होता रहता था ॥ ६३ ॥ उन बगीचोंमें वैदूर्यमणि ( पुखराज ) - की सीढ़ियोंसे सुशोभित बावलियाँ
थीं - जिनमें लाल, नीले और सफेद रंगके कमल खिले रहते थे तथा हंस, कारण्डव, चकवा एवं सारस आदि पक्षी क्रीडा करते रहते थे ॥६४ ॥
राजर्षि उत्तानपादने अपने पुत्रके अति अद्भुत प्रभावकी बात देवर्षि नारदसे पहले ही सुन रखी थी; अब उसे प्रत्यक्ष वैसा ही देखकर उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ ॥ ६५ ॥
फिर यह देखकर कि अब ध्रुव तरुण अवस्थाको प्राप्त हो गये हैं, अमात्यवर्ग उन्हें आदरकी दृष्टिसे देखते हैं तथा प्रजाका भी उनपर अनुराग है, उन्होंने उन्हें निखिल भूमण्डलके राज्यपर अभिषिक्त कर दिया || ६६ || और आप वृद्धावस्था आयी जानकर आत्मस्वरूपका चिन्तन करते हुए संसारसे विरक्त होकर वनको चल दिये ॥६७ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे ध्रुवराज्याभिषेकवर्णनं नाम नवमोऽध्यायः || ९ || १. प्रा ० पा ० — स्थितिः । १. प्रा ० पा ० — न्तरे तदखि ० । २. प्रा ० पा ० – माद्य । १. प्रा ० पा ० – तत्र । २. प्रा ० पा ० - स्थिति । * कटी हुई फसल धान - गेहूँ आदिको कुचलनेके लिये घुमाये जानेवाले बैल जिस खंभेमें बँधे रहते हैं, उसका नाम मेढी है । १. प्रा ० पा ० – शान्तै ० । २. प्रा ० पा ० – वाद्य । ३. प्रा ० पा ० — चानुम ० । * आनन्द या प्रेमके कारण जो आँसू आते हैं वे ठंडे हुआ करते हैं और शोकके आँसू गरम होते हैं । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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अथ दशमोऽध्यायः उत्तमका मारा जाना, ध्रुवका यक्षोंके साथ युद्ध मैत्रेय उवाच
प्रजापतेर्दुहितरं शिशुमारस्य वै ध्रुवः ।
उपयेमे भ्रमिं नाम तत्सुतौ कल्पवत्सरौ ॥ १
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं — विदुरजी! ध्रुवने प्रजापति शिशुमारकी पुत्री भ्रमिके स् किया, उससे उनके कल्प और वत्सर नामके दो पुत्र हुए ॥१ ॥
इलायामपि भार्यायां वायोः पुत्र्यां महाबलः ।
पुत्रमुत्कलनामानं योषिद्रत्नमजीजनत् ॥२
उत्तमस्त्वकृतोद्वाहो मृगयायां बलीयसा ।
हतः पुण्यजनेनाद्रौ तन्मातास्य गतिं गता ॥३
ध्रुवो भ्रातृवधं श्रुत्वा कोपामर्षशुचार्पितः ।
जैत्रं स्यन्दनमास्थाय गतः पुण्यजनालयम् ॥४
गत्वोदीचीं दिशं राजा रुद्रानुचरसेविताम् ।
ददर्श हिमवद्द्रोण्यां पुरीं गुह्यकसंकुलाम् ॥ ५
दध्मौ शङ्खं बृहद्बाहुः खं दिशश्चानुनादयन् ।
येनोद्विग्नदृशः क्षत्तरुपदेव्योऽत्रसन्भृशम् ॥६
ततो निष्क्रम्य बलिन उपदेवमहाभटाः ।
असहन्तस्तन्निनादमभिपेतुरुदायुधाः ॥७
स तानापततो वीर उग्रधन्वा महारथः ।
एकैकं युगपत्सर्वानहन् बाणैस्त्रिभिस्त्रिभिः ॥८
ते वै ललाटलग्नैस्तैरिषुभिः सर्व एव हि ।
मत्वा निरस्तमात्मानमाशंसन् कर्म तस्य तत् ॥९
तेऽपि चामुममृष्यन्तः पादस्पर्शमिवोरगाः ।
शरैरविध्यन् युगपद् द्विगुणं प्रचिकीर्षवः ॥१०
ततः परिघनिस्त्रिंशैः प्रासशूलपरश्वधैः ।
शक्त्यृष्टिभिर्भुशुण्डीभिश्चित्रवाजैः शरैरपि ॥११
अभ्यवर्षन् प्रकुपिताः सरथं सहसारथिम् । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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इच्छन्तस्तत्प्रतीकर्तुमयुतानि त्रयोदश ॥१२
औत्तानपादिः स तदा शस्त्रवर्षेण भूरिणा ।
न उपादृश्यतच्छन्न आसारेण यथा गिरिः ॥१३
महाबली ध्रुवकी दूसरी स्त्री वायुपुत्री इला थी । उससे उनके उत्कल नामके एक पुत्र और एक कन्यारत्नका जन्म हुआ ॥२ ॥ उत्तमका अभी विवाह नहीं हुआ था कि एक दिन शिकार
खेलते समय उसे हिमालय पर्वतपर एक बलवान् यक्षने मार डाला । उसके साथ उसकी माता भी परलोक सिधार गयी ॥ ३ ॥
ध्रुवने जब भाईके मारे जानेका समाचार सुना तो वे क्रोध, शोक और उद्वेगसे भरकर एक विजयप्रद रथपर सवार हो यक्षोंके देशमें जा पहुँचे || ४ || उन्होंने उत्तर दिशामें जाकर हिमालयकी घाटीमें यक्षोंसे भरी हुई अलकापुरी देखी, उसमें अनेकों भूत - प्रेत - पिशाचादि रुद्रानुचर रहते थे ॥५ ॥ विदुरजी! वहाँ पहुँचकर महाबाहु ध्रुवने अपना शंख बजाया तथा
सम्पूर्ण आकाश और दिशाओंको गुँजा दिया | उस शंखध्वनि से यक्ष - पत्नियाँ बहुत ही डर गयीं, उनकी आँखें भयसे कातर हो उठीं ॥ ६ ॥
वीरवर विदुरजी! महाबलवान् यक्षवीरोंको वह शंखनाद सहन न हुआ । इसलिये वे तरह-तरहके अस्त्र - शस्त्र लेकर नगरके बाहर निकल आये और ध्रुवपर टूट पड़े || ७ ॥ महारथी ध्रुव प्रचण्ड धनुर्धर थे । उन्होंने एक ही साथ उनमेंसे प्रत्येकको तीन - तीन बाण मारे ॥८ ॥ उन
सभीने जब अपने - अपने मस्तकोंमें तीन - तीन बाण लगे देखे, तब उन्हें यह विश्वास हो गया कि हमारी हार अवश्य होगी । वे ध्रुवजीके इस अद्भुत पराक्रमकी प्रशंसा करने लगे ॥९ ॥ फिर
जैसे सर्प किसीके पैरोंका आघात नहीं सहते, उसी प्रकार ध्रुवके इस पराक्रमको न सहकर उन्होंने भी उनके बाणोंके जवाबमें एक ही साथ उनसे दूने – छः - छः बाण छोड़े ॥१० ॥
यक्षोंकी संख्या तेरह अयुत ( १,३०,००० ) थी । उन्होंने ध्रुवजीका बदला लेनेके लिये अत्यन्त कुपित होकर रथ और सारथीके सहित उनपर परिघ, खड्ग, प्रास, त्रिशूल, फरसा, शक्ति, ऋष्टि, भुशुण्डी तथा चित्र - विचित्र पंखदार बाणोंकी वर्षा की ॥११-१२ ॥ इस भीषण शस्त्रवर्षासे ध्रुवजी बिलकुल ढक गये । तब लोगोंको उनका दीखना वैसे ही बंद हो गया, जैसे भारी वर्षासे पर्वतका ॥१३ ॥ उस समय जो सिद्धगण आकाशमें स्थित होकर यह दृश्य देख
रहे थे, वे सब हाय - हाय करके कहने लगे- ' आज यक्षसेनारूप समुद्रमें डूबकर यह मानव-सूर्य अस्त हो गया ' ॥१४ ॥ यक्षलोग अपनी विजयकी घोषणा करते हुए युद्धक्षेत्रमें सिंहकी
तरह गरजने लगे । इसी बीचमें ध्रुवजीका रथ एकाएक वैसे ही प्रकट हो गया, जैसे कुहरेमेंसे सूर्यभगवान् निकल आते हैं ॥१५ ॥
हाहाकारस्तदैवासीत्सिद्धानां दिवि पश्यताम् ।
हतोऽयं मानवः सूर्यो मग्नः पुण्यजनार्णवे ॥१४
तदत्सु यातुधानेषु जयकाशिष्वथो मृधे ।
उदतिष्ठद्रथस्तस्य नीहारादिव भास्करः ॥ १५
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धनुर्विस्फूर्जयन्दिव्यं द्विषतां खेदमुद्वहन् ।
अस्त्रौघं व्यधमद्बाणैर्घनानीकमिवानिलः ॥ १६
तस्य ते चापनिर्मुक्ता भित्त्वा वर्माणि रक्षसाम् ।
कायानाविविशुस्तिग्मा गिरीनशनयो यथा ॥१७
भल्लैः संछिद्यमानानां शिरोभिश्चारुकुण्डलैः ।
ऊरुभिर्हेमतालाभैर्दोर्भिर्वलयवल्गुभिः ॥ १८
हारकेयूरमुकुटैरुष्णीषैश्च महाधनैः ।
आस्तृतास्ता रणभुवो रेजुर्वीरमनोहराः ॥ १ ९
हतावशिष्टा इतरे रणाजिराद्
रक्षोगणाः क्षत्रियवर्यसायकैः ।
प्रायो विवृक्णावयवा विदुद्रुवु-र्मृगेन्द्रविक्रीडितयूथपा इव ॥२०
अपश्यमानः स तदाऽऽततायिनं महामृधे कंचन मानवोत्तमः । पुरीं दिदृक्षन्नपि नाविशद् द्विषां न मायिनां वेद चिकीर्षितं जनः ॥२१ इति ब्रुवंश्चित्ररथः स्वसारथिं यत्तः परेषां प्रतियोगशङ्कितः । शुश्राव शब्दं जलधेरिवेरितं नभस्वतो दिक्षु रजोऽन्वदृश्यत ॥ २२ ध्रुवजीने अपने दिव्य धनुषकी टंकार करके शत्रुओंके दिल दहला दिये और फिर प्रचण्ड बाणोंकी वर्षा करके उनके अस्त्र - शस्त्रोंको इस प्रकार छिन्न - भिन्न कर दिया, जैसे आँधी बादलोंको तितर - बितर कर देती है ॥ १६ ॥ उनके धनुषसे छूटे हुए तीखे तीर यक्ष - राक्षसोंके
कवचोंको भेदकर इस प्रकार उनके शरीरोंमें घुस गये, जैसे इन्द्रके छोड़े हुए वज्र पर्वतोंमें प्रवेश कर गये थे ॥१७ ॥ विदुरजी! महाराज ध्रुवके बाणोंसे कटे हुए यक्षोंके सुन्दर
कुण्डलमण्डित मस्तकोंसे, सुनहरी तालवृक्षके समान जाँघोंसे, वलयविभूषित बाहुओंसे, हार, भुजबन्ध, मुकुट और बहुमूल्य पगड़ियोंसे पटी हुई वह वीरोंके मनको लुभानेवाली समरभूमि बड़ी शोभा पा रही थी ॥१८-१९ ॥ जो यक्ष किसी प्रकार जीवित बचे, वे क्षत्रियप्रवर ध्रुवजीके बाणोंसे प्रायः अंग - अंग छिन्न - भिन्न हो जानेके कारण युद्धक्रीडामें सिंहसे परास्त हुए गजराजके समान मैदान छोड़कर भाग गये ॥२० ॥
नरश्रेष्ठ ध्रुवजीने देखा कि उस विस्तृत रणभूमिमें अब एक भी शत्रु अस्त्र - शस्त्र लिये ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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उनके सामने नहीं है, तो उनकी इच्छा अलकापुरी देखनेकी हुई; किन्तु वे पुरीके भीतर नहीं गये ‘ ये मायावी क्या करना चाहते हैं इस बातका मनुष्यको पता नहीं लग सकता ' सारथिसे इस प्रकार कहकर वे उस विचित्र रथमें बैठे रहे तथा शत्रुके नवीन आक्रमणकी आशंकासे सावधान हो गये । इतनेमें ही उन्हें समुद्रकी गर्जनाके समान आँधीका भीषण शब्द सुनायी दिया तथा दिशाओंमें उठती हुई धूल भी दिखायी दी ॥२१-२२ ॥
क्षणेनाच्छादितं व्योम घनानीकेन सर्वतः ।
विस्फुरत्तडिता दिक्षु त्रासयत्स्तनयित्नुना ॥२३
ववृषू रुधिरौघासृक्पूयविण्मूत्रमेदसः ।
निपेतुर्गगनादस्य कबन्धान्यग्रतोऽनघ ॥२४
ततः खेऽदृश्यत गिरिर्निपेतुः सर्वतोदिशम् ।
गदापरिघनिस्त्रिंशमुसलाः साश्मवर्षिणः ॥२५
अहयोऽशनिनिःश्वासा वमन्तोऽग्निं रुषाक्षिभिः ।
अभ्यधावन् गजा मत्ताः सिंहव्याघ्राश्च यूथशः ॥ २६
समुद्र ऊर्मिभिर्भीमः प्लावयन् सर्वतो भुवम् ।
आससाद महाह्रादः कल्पान्त इव भीषणः ॥२७
एवंविधान्यनेकानि त्रासनान्यमनस्विनाम् ।
ससृजुस्तिग्मगतय आसुर्या माययासुराः ॥ २८
ध्रुवे प्रयुक्तामसुरैस्तां मायामतिदुस्तराम् ।
निशाम्य तस्य मुनयः शमाशंसन् समागताः ॥२९
मुनय ऊचुः औत्तानपादे भगवांस्तव शार्ङ्गधन्वा देवः क्षिणोत्ववनतार्तिहरो विपक्षान् । यन्नामधेयमभिधाय निशम्य चाद्धा लोकोऽञ्जसा तरति दुस्तरमंग मृत्युम् ॥३० एक क्षणमें ही सारा आकाश मेघमालासे घिर गया । सब ओर भयंकर गड़गड़ाहटके साथ बिजली चमकने लगी ॥ २३ ॥ निष्पाप विदुरजी! उन बादलोंसे खून, कफ, पीब, विष्ठा,
मूत्र एवं चर्बीकी वर्षा होने लगी और ध्रुवजीके आगे आकाशसे बहुत - से धड़ गिरने लगे ॥२४ ॥ फिर आकाशमें एक पर्वत दिखायी दिया और सभी दिशाओंमें पत्थरोंकी वर्षाके
साथ गदा, परिघ, तलवार और मूसल गिरने लगे || २५ || उन्होंने देखा कि बहुत - से सर्प वज्रकी तरह फुफकार मारते रोषपूर्ण नेत्रोंसे आगकी चिनगारियाँ उगलते आ रहे हैं; झुंड - के-****** ebook converter DEMO Watermarks *******