श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 741–750

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 741–750

पृष्ठ 741

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तत्प्रभावमविज्ञाय प्रावृङ्क्ते यद्यशो जगत् ॥६८

सुदुष्करं कर्म कृत्वा लोकपालैरपि प्रभुः ।

एष्यत्यचिरतो राजन् यशो विपुलयंस्तव ॥६९

मैत्रेय उवाच इति देवर्षिणा प्रोक्तं विश्रुत्य जगतीपतिः राजलक्ष्मीमनादृत्य पुत्रमेवान्वचिन्तयत् ॥७०

तत्राभिषिक्तः प्रयतस्तामुपोष्य विभावरीम् ।

समाहितः पर्यचरदृष्यादेशेन पूरुषम् ॥७१

त्रिरात्रान्ते त्रिरात्रान्ते कपित्थबदराशनः ।

आत्मवृत्त्यनुसारेण मासं निन्येऽर्चयन्हरिम् ॥७२

द्वितीयं च तथा मासं षष्ठे षष्ठेऽर्भको दिने ।

तृणपर्णादिभिः शीर्णैः कृतान्नोऽभ्यर्चयद्विभुम् ॥७३

तृतीयं चानयन्मासं नवमे नवमेऽहनि ।

अब्भक्ष उत्तमश्लोकमुपाधावत्समाधिना ॥७४

चतुर्थमपि वै मासं द्वादशे द्वादशेऽहनि ।

वायुभक्षो जितश्वासो ध्यायन्देवमधारयत् ॥७५

राजाने कहा – ब्रह्मन्! मैं बड़ा ही स्त्रैण और निर्दय हूँ । हाय, मैंने अपने पाँच वर्षके नन्हेसे बच्चेको उसकी माताके साथ घरसे निकाल दिया । मुनिवर! वह बड़ा ही बुद्धिमान् था ॥६५ ॥ उसका कमल - सा मुख भूख से कुम्हला गया होगा, वह थककर कहीं रास्तेमें पड़

गया होगा । ब्रह्मन्! उस असहाय बच्चेको वनमें कहीं भेड़िये न खा जायँ ॥६६ ॥ अहो! मैं

कैसा स्त्रीका गुलाम हूँ! मेरी कुटिलता तो देखिये - वह बालक प्रेमवश मेरी गोदमें चढ़ना चाहता था, किन्तु मुझ दुष्टने उसका तनिक भी आदर नहीं किया ॥ ६७ ॥

श्रीनारदजीने कहा- राजन्! तुम अपने बालककी चिन्ता मत करो । उसके रक्षक भगवान् हैं । तुम्हें उसके प्रभावका पता नहीं है, उसका यश सारे जगत्में फैल रहा है ॥६८ ॥

वह बालक बड़ा समर्थ है । जिस कामको बड़े - बड़े लोकपाल भी नहीं कर सके, उसे पूरा करके वह शीघ्र ही तुम्हारे पास लौट आयेगा । उसके कारण तुम्हारा यश भी बहुत बढ़ेगा ॥६९ ॥

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं— देवर्षि नारदजीकी बात सुनकर महाराज उत्तानपाद राजपाटकी ओरसे उदासीन होकर निरन्तर पुत्रकी ही चिन्तामें रहने लगे ॥ ७० ॥ इधर ध्रुवजीने मधुवनमें

पहुँचकर यमुनाजीमें स्नान किया और उस रात पवित्रतापूर्वक उपवास करके श्रीनारदजीके ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 742

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उपदेशानुसार एकाग्रचित्तसे परमपुरुष श्रीनारायणकी उपासना आरम्भ कर दी ॥७१ ॥

उन्होंने तीन - तीन रात्रिके अन्तरसे शरीरनिर्वाहके लिये केवल कैथ और बेरके फल खाकर श्रीहरिकी उपासना करते हुए एक मास व्यतीत किया ॥ ७२ ॥ दूसरे महीनेमें उन्होंने छः - छः

दिनके पीछे सूखे घास और पत्ते खाकर भगवान्का भजन किया ॥ ७३ ॥ तीसरा महीना नौ-नौ दिनपर केवल जल पीकर समाधियोगके द्वारा श्रीहरिकी आराधना करते हुए

बिताया ॥७४ ॥ चौथे महीनेमें उन्होंने श्वासको जीतकर बारह - बारह दिनके बाद केवल वायु

पीकर ध्यानयोगद्वारा भगवान्‌की आराधना की ॥७५ ॥

पंचमे मास्यनुप्राप्ते जितश्वासो नृपात्मजः ।

ध्यायन् ब्रह्म पदैकेन तस्थौ स्थाणुरिवाचलः ॥७६

सर्वतो मन आकृष्य हृदि भूतेन्द्रियाशयम् ।

ध्यायन्भगवतो रूपं नाद्राक्षीत्किंचनापरम् ॥७७

आधारं महदादीनां प्रधानपुरुषेश्वरम् ।

ब्रह्म धारयमाणस्य त्रयो लोकाश्चकम्पिरे ॥७८

यदैकपादेन स पार्थिवार्भक-स्तस्थौ तदङ्गुष्ठनिपीडिता मही । ननाम तत्रार्धमिभेन्द्रधिष्ठिता तरीव सव्येतरतः पदे पदे ॥७९ तस्मिन्नभिध्यायति विश्वमात्मनो द्वारं निरुध्यासुमनन्यया धिया । लोका निरुच्छ्वासनिपीडिता भृशं सलोकपालाः शरणं ययुर्हरिम् ॥८० देवा ऊचुः नैवं विदामो भगवन् प्राणरोधं चराचरस्याखिलसत्त्वधाम्नः । विधेहि तन्नो वृजिनाद्विमोक्षं प्राप्ता वयं त्वां शरणं शरण्यम् ॥८१ श्रीभगवानुवाच मा भैष्ट बालं तपसो दुरत्यया-न्निवर्तयिष्ये प्रतियात स्वधाम । यतो हि वः प्राणनिरोध आसी-****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 743

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दौत्तानपादिर्मयि संगतात्मा ॥८२ पाँचवाँ मास लगनेपर राजकुमार ध्रुव श्वासको जीतकर परब्रह्मका चिन्तन करते हुए एक पैरसे खंभेके समान निश्चल भावसे खड़े हो गये ॥७६ ॥ उस समय उन्होंने शब्दादि विषय

और इन्द्रियोंके नियामक अपने मनको सब ओरसे खींच लिया तथा हृदयस्थित हरिके स्वरूपका चिन्तन करते हुए चित्तको किसी दूसरी ओर न जाने दिया ॥७७ ॥ जिस समय

उन्होंने महदादि सम्पूर्ण तत्त्वोंके आधार तथा प्रकृति और पुरुषके भी अधीश्वर परब्रह्मकी धारणा की, उस समय ( उनके तेजको न सह सकनेके कारण ) तीनों लोक काँप उठे ॥७८ ॥

जब राजकुमार ध्रुव एक पैरसे खड़े हुए, तब उनके अँगूठेसे दबकर आधी पृथ्वी इस प्रकार झुक गयी, जैसे किसी गजराजके चढ़ जानेपर नाव पद - पदपर दायीं - बायीं ओर डगमगाने लगती है ॥७९ ॥ ध्रुवजी अपने इन्द्रियद्वार तथा प्राणोंको रोककर अनन्यबुद्धिसे विश्वात्मा

श्रीहरिका ध्यान करने लगे । इस प्रकार उनकी समष्टि प्राणसे अभिन्नता हो जानेके कारण सभी जीवोंका श्वास - प्रश्वास रुक गया । इससे समस्त लोक और लोकपालोंको बड़ी पीड़ा हुई और वे सब घबराकर श्रीहरिकी शरणमें गये ॥ ८० ॥

देवताओंने कहा — भगवन्! समस्त स्थावर - जंगम जीवोंके शरीरोंका प्राण एक साथ ही रुक गया है ऐसा तो हमने पहले कभी अनुभव नहीं किया । आप शरणागतोंकी रक्षा करनेवाले हैं, अपनी शरणमें आये हुए हमलोगोंको इस दुःखसे छुड़ाइये ॥८१ ॥

श्रीभगवान्ने कहा — देवताओ! तुम डरो मत । उत्तानपादके पुत्र ध्रुवने अपने चित्तको मुझ विश्वात्मामें लीन कर दिया है, इस समय मेरे साथ उसकी अभेदधारणा सिद्ध हो गयी है, इसीसे उसके प्राणनिरोधसे तुम सबका प्राण भी रुक गया है । अब तुम अपने - अपने लोकोंको जाओ, मैं उस बालकको इस दुष्कर तपसे निवृत्त कर दूँगा ॥८२ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे ध्रुवचरितेऽष्टमोऽध्यायः ॥८ ॥

१. प्रा ० पा ० — समर्चितम् । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 744

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अथ नवमोऽध्यायः ध्रुवका वर पाकर घर लौटना मैत्रेय उवाच त एवमुत्सन्नभया उरुक्रमे कृतावनामाः प्रययुस्त्रिविष्टपम् । सहस्रशीर्षापि ततो गरुत्मता मधोर्वनं भृत्यदिदृक्षया गतः ॥१ स वै धिया योगविपाकतीव्रया हृत्पद्मकोशे स्फुरितं तडित्प्रभम् । तिरोहितं सहसैवोपलक्ष्य बहिःस्थितं तदवस्थं ददर्श ॥२

तद्दर्शनेनागतसाध्वसः क्षिता-ववन्दताङ्गं विनमय्य दण्डवत् ।

दृग्भ्यां प्रपश्यन् प्रपिबन्निवार्भक-चम्बन्निवास्येन भुजैरिवाश्लिषन् ॥३

स तं विवक्षन्तमतद्विदं हरि-र्ज्ञात्वास्य सर्वस्य च हृद्यवस्थितः । कृतांजलिं ब्रह्ममयेन कम्बुना पस्पर्श बालं कृपया कपोले ॥४ स वै तदैव प्रतिपादितां गिरं दैवीं परिज्ञातपरात्मनिर्णयः । तं भक्तिभावोऽभ्यगुणादसत्वरं परिश्रुतोरुश्रवसं ध्रुवक्षितिः १ ॥५ ध्रुव उवाच योऽन्तः प्रविश्य मम वाचमिमां प्रसुप्तां संजीवयत्यखिलशक्तिधरः स्वधाम्ना । अन्यांश्च हस्तचरणश्रवणत्वगादीन् प्राणान्नमो भगवते पुरुषाय तुभ्यम् ॥६ ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 745

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श्रीमैत्रेयजी कहते हैं – विदुरजी! भगवान्‌के इस प्रकार आश्वासन देनेसे देवताओंका भय जाता रहा और वे उन्हें प्रणाम करके स्वर्गलोकको चले गये । तदनन्तर विराट्स्वरूप भगवान् गरुड़पर चढ़कर अपने भक्तको देखनेके लिये मधुवनमें आये ॥१ ॥ उस समय

ध्रुवजी तीव्र योगाभ्याससे एकाग्र हुई बुद्धिके द्वारा भगवान्‌की बिजलीके समान देदीप्यमान जिस मूर्तिका अपने हृदयकमलमें ध्यान कर रहे थे, वह सहसा विलीन हो गयी । इससे घबराकर उन्होंने ज्यों ही नेत्र खोले कि भगवान्‌के उसी रूपको बाहर अपने सामने खड़ा देखा ॥२ ॥ प्रभुका दर्शन पाकर बालक ध्रुवको बड़ा कुतूहल हुआ, वे प्रेममें अधीर हो गये ।

उन्होंने पृथ्वीपर दण्डके समान लोटकर उन्हें प्रणाम किया । फिर वे इस प्रकार प्रेमभरी दृष्टिसे उनकी ओर देखने लगे मानो नेत्रोंसे उन्हें पी जायँगे, मुखसे चूम लेंगे और भुजाओंमें कस लेंगे ॥३ ॥ वे हाथ जोड़े प्रभुके सामने खड़े थे और उनकी स्तुति करना चाहते थे, परन्तु किस

प्रकार करें यह नहीं जानते थे । सर्वान्तर्यामी हरि उनके मनकी बात जान गये; उन्होंने कृपापूर्वक अपने वेदमय शंखको उनके गालसे छुआ दिया || ४ || ध्रुवजी भविष्यमें अविचल पद प्राप्त करनेवाले थे । इस समय शंखका स्पर्श होते ही उन्हें वेदमयी दिव्यवाणी प्राप्त हो गयी और जीव तथा ब्रह्मके स्वरूपका भी निश्चय हो गया । वे अत्यन्त भक्तिभावसे धैर्यपूर्वक विश्वविख्यात कीर्तिमान् श्रीहरिकी स्तुति करने लगे ॥ ५ ॥

ध्रुवजीने कहा - प्रभो! आप सर्वशक्तिसम्पन्न हैं; आप ही मेरे अन्तःकरणमें प्रवेशकर अपने तेजसे मेरी इस सोयी हुई वाणीको सजीव करते हैं तथा हाथ, पैर, कान और त्वचा आदि अन्यान्य इन्द्रियों एवं प्राणोंको भी चेतनता देते हैं । मैं आप अन्तर्यामी भगवान्को प्रणाम करता हूँ ॥६ ॥

एकस्त्वमेव भगवन्निदमात्मशक्त्या मायाख्ययोरुगुणया महदाद्यशेषम् ।

सृष्ट्वानुविश्य पुरुषस्तदसद्गुणेषु ।

नानेव दारुषु विभावसुवद्विभासि ॥७

त्वद्दत्तया वयुनयेदमचष्ट विश्वं सुप्तप्रबुद्ध इव नाथ भवत्प्रपन्नः । तस्यापवर्ग्यशरणं तव पादमूलं विस्मर्यते कृतविदा कथमार्तबन्धो ॥८ नूनं विमुष्टमतयस्तव मायया ते

ये त्वां भवाप्ययविमोक्षणमन्यहेतोः ।

अर्चन्ति कल्पकतरुं कुणपोपभोग्य-मिच्छन्ति यत्स्पर्शजं निरयेऽपि नॄणाम् ॥९

या निर्वृतिस्तनुभृतां तव पादपद्म-****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 746

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ध्यानाद्भवज्जनकथाश्रवणेन वा स्यात् । सा ब्रह्मणि स्वमहिमन्यपि नाथ मा भूत् किं त्वन्तकासिलुलितात्पततां विमानात् ॥१० भक्तिं मुहुः प्रवहतां त्वयि मे प्रसंगो भूयादनन्त महताममलाशयानाम् । येनांजसोल्बणमुरुव्यसनं भवाब्धिं नेष्ये भवद्गुणकथामृतपानमत्तः ॥११ ते न स्मरन्त्यतितरां प्रियमीश मर्त्यं

ये चान्वदः सुतसुहृद्गृहवित्तदाराः ।

ये त्वब्जनाभ भवदीयपदारविन्द-सौगन्ध्यलुब्धहृदयेषु कृतप्रसंगाः ॥ १२

भगवन्! आप एक ही हैं, परन्तु अपनी अनन्त गुणमयी मायाशक्तिसे इस महदादि सम्पूर्ण प्रपंचको रचकर अन्तर्यामीरूपसे उसमें प्रवेश कर जाते हैं और फिर इसके इन्द्रियादि असत् गुणोंमें उनके अधिष्ठातृ - देवताओंके रूपमें स्थित होकर अनेकरूप भासते हैं — ठीक वैसे ही जैसे तरह - तरहकी लकड़ियोंमें प्रकट हुई आग अपनी उपाधियोंके अनुसार भिन्न - भिन्न रूपोंमें भासती है ॥७ ॥ नाथ! सृष्टिके आरम्भमें ब्रह्माजीने भी आपकी शरण लेकर आपके

दिये हुए ज्ञानके प्रभावसे ही इस जगत्‌को सोकर उठे हुए पुरुषके समान देखा था । दीनबन्धो! उन्हीं आपके चरणतलका मुक्त पुरुष भी आश्रय लेते हैं, कोई भी कृतज्ञ पुरुष उन्हें कैसे भूल सकता है? ॥८ ॥ प्रभो! इन शवतुल्य शरीरोंके द्वारा भोगा जानेवाला, इन्द्रिय और विषयोंके

संसर्गसे उत्पन्न सुख तो मनुष्योंको नरकमें भी मिल सकता है । जो लोग इस विषयसुखके लिये लालायित रहते हैं और जो जन्म - मरणके बन्धनसे छुड़ा देनेवाले कल्पतरुस्वरूप आपकी उपासना भगवत् - प्राप्तिके सिवा किसी अन्य उद्देश्यसे करते हैं, उनकी बुद्धि अवश्य ही आपकी मायाके द्वारा ठगी गयी है ॥९ ॥ नाथ! आपके चरणकमलोंका ध्यान करनेसे और

आपके भक्तोंके पवित्र चरित्र सुननेसे प्राणियोंको जो आनन्द प्राप्त होता है, वह निजानन्दस्वरूप ब्रह्ममें भी नहीं मिल सकता । फिर जिन्हें कालकी तलवार काटे डालती है उन स्वर्गीय विमानोंसे गिरनेवाले पुरुषोंको तो वह सुख मिल ही कैसे सकता है ॥१० ॥

अनन्त परमात्मन्! मुझे तो आप उन विशुद्धहृदय महात्मा भक्तोंका संग दीजिये, जिनका आपमें अविच्छिन्न भक्तिभाव है; उनके संगमें मैं आपके गुणों और लीलाओंकी कथा-सुधाको पी - पीकर उन्मत्त हो जाऊँगा और सहज ही इस अनेक प्रकारके दुःखोंसे पूर्ण भयंकर संसारसागरके उस पार पहुँच जाऊँगा ॥ ११ ॥ कमलनाभ प्रभो! जिनका चित्त आपके

चरणकमलकी सुगन्धमें लुभाया हुआ है, उन महानुभावोंका जो लोग संग करते हैं — वे अपने इस अत्यन्त प्रिय शरीर और इसके सम्बन्धी पुत्र, मित्र, गृह और स्त्री आदिकी सुधि भी नहीं ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 747

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करते ॥१२ ॥

तिर्यङ्नगद्विजसरीसृपदेवदैत्य-मर्त्यादिभिः परिचितं सदसद्विशेषम् । रूपं स्थविष्ठमज ते महदाद्यनेकं नातः परं परम वेद्मि न यत्र वादः ॥१३ कल्पान्त ’ एतदखिलं जठरेण गृह्णन्

शेते पुमान् स्वदृगनन्तसखस्तदङ्के ।

यन्नाभिसिन्धुरुहकांचनलोकपद्म-गर्भे द्युमान् भगवते प्रणतोऽस्मि तस्मै ॥१४

त्वं नित्यमुक्तपरिशुद्धविबुद्ध आत्मा कूटस्थ आदिपुरुषो भगवांत्र्यधीशः । यद्बुद्ध्यवस्थितिमखण्डितया स्वदृष्ट्या द्रष्टा स्थितावधिमखो व्यतिरिक्त आस्से ॥१५ यस्मिन् विरुद्धगतयो ह्यनिशं पतन्ति

विद्यादयो विविधशक्तय आनुपूर्व्यात् ।

तद्ब्रह्म विश्वभवमेकमनन्तमाद्य-मानन्दमात्रमविकारमहं प्रपद्ये ॥१६

सत्याऽऽशिषो हि भगवंस्तव पादपद्म-माशीस्तथानुभजतः पुरुषार्थमूर्तेः । अप्येवमर्य भगवान् परिपाति दीनान् वाश्रेव वत्सकमनुग्रहकातरोऽस्मान् ॥१७ अजन्मा परमेश्वर! मैं तो पशु, वृक्ष, पर्वत, पक्षी, सरीसृप ( सर्पादि रेंगनेवाले जन्तु ), देवता, दैत्य और मनुष्य आदिसे परिपूर्ण तथा महदादि अनेकों कारणोंसे सम्पादित आपके इस सदसदात्मक स्थूल विश्वरूपको ही जानता हूँ; इससे परे जो आपका परम स्वरूप है, जिसमें वाणीकी गति नहीं है, उसका मुझे पता नहीं है ॥१३ ॥

भगवन्! कल्पका अन्त होनेपर योगनिद्रामें स्थित जो परमपुरुष इस सम्पूर्ण विश्वको अपने उदरमें लीन करके शेषजीके साथ उन्हींकी गोदमें शयन करते हैं तथा जिनके नाभि-समुद्रसे प्रकट हुए सर्वलोकमय सुवर्णवर्ण कमलसे परम तेजोमय ब्रह्माजी उत्पन्न हुए, वे भगवान् आप ही हैं, मैं आपको प्रणाम करता हूँ ॥१४ ॥

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पृष्ठ 748

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प्रभो! आप अपनी अखण्ड चिन्मयी दृष्टिसे बुद्धिकी सभी अवस्थाओंके साक्षी हैं तथा नित्यमुक्त शुद्धसत्त्वमय, सर्वज्ञ, परमात्मस्वरूप, निर्विकार, आदि - पुरुष, षडैश्वर्य - सम्पन्न एवं तीनों गुणोंके अधीश्वर हैं । आप जीवसे सर्वथा भिन्न हैं तथा संसारकी स्थितिके लिये यज्ञाधिष्ठाता विष्णुरूपसे विराजमान हैं ॥ १५ ॥ आपसे ही विद्या अविद्या आदि विरुद्ध

गतियोंवाली अनेकों शक्तियाँ धारावाहिक रूपसे निरन्तर प्रकट होती रहती हैं । आप जगत्के कारण, अखण्ड, अनादि, अनन्त, आनन्दमय निर्विकार ब्रह्मस्वरूप हैं । मैं आपकी शरण ॥१६ ॥ भगवन्! आप परमानन्दमूर्ति हैं - जो लोग ऐसा समझकर निष्कामभावसे आपका

निरन्तर भजन करते हैं, उनके लिये राज्यादि भोगोंकी अपेक्षा आपके चरणकमलोंकी प्राप्ति ही भजनका सच्चा फल है । स्वामिन्! यद्यपि बात ऐसी ही है, तो भी गौ जैसे अपने तुरंतके जन्में हुए बछड़ेको दूध पिलाती और व्याघ्रादिसे बचाती रहती है, उसी प्रकार आप भी भक्तोंपर कृपा करनेके लिये निरन्तर विकल रहनेके कारण हम जैसे सकाम जीवोंकी भी कामना पूर्ण करके उनकी संसार - भयसे रक्षा करते रहते हैं ॥१७ ॥

मैत्रेय उवाच

अथाभिष्टुत एवं वै सत्संकल्पेन धीमता ।

भृत्यानुरक्तो भगवान् प्रतिनन्द्येदमब्रवीत् ॥१८

श्रीभगवानुवाच

वेदाहं ते व्यवसितं हृदि राजन्यबालक ।

तत्प्रयच्छामि भद्रं ते दुरापमपि सुव्रत ॥१९

नान्यैरधिष्ठितं भद्र यद्भ्राजिष्णु ध्रुवक्षिति ' ।

यत्र ग्रहर्क्षताराणां ज्योतिषां चक्रमाहितम् ॥२०

मेढ्यां गोचक्रवत्स्थास्नु परस्तात्कल्पवासिनाम् ।

धर्मोऽग्निः कश्यपः शुक्रो मुनयो ये वनौकसः ।

चरन्ति दक्षिणीकृत्य भ्रमन्तो यत्सतारकाः ॥२१

प्रस्थिते तु वनं पित्रा दत्त्वा गां धर्मसंश्रयः ।

षट्त्रिंशद्वर्षसाहस्रं रक्षिताव्याहतेन्द्रियः ॥ २२

त्वद्भ्रातर्युत्तमे नष्टे मृगयायां तु तन्मनाः ।

अन्वेषन्ती वनं माता दावाग्निं सा प्रवेक्ष्यति ॥२३

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पृष्ठ 749

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इष्ट्वा मां यज्ञहृदयं यज्ञैः पुष्कलदक्षिणैः ।

भुक्त्वा चेहाशिषः सत्या अन्ते मां संस्मरिष्यसि ॥२४

ततो गन्तासि मत्स्थानं सर्वलोकनमस्कृतम् ।

उपरिष्टादृषिभ्यस्त्वं यतो नावर्तते गतः ॥ २५

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं — विदुरजी! जब शुभ संकल्पवाले मतिमान् ध्रुवजीने इस प्रकार स्तुति की तब भक्तवत्सल भगवान् उनकी प्रशंसा करते हुए कहने लगे ॥ १८ ॥

श्रीभगवान्ने कहा — उत्तम व्रतका पालन करनेवाले राजकुमार! मैं तेरे हृदयका संकल्प जानता हूँ । यद्यपि उस पदका प्राप्त होना बहुत कठिन है, तो भी मैं तुझे वह देता हूँ । तेरा कल्याण हो ॥१९ ॥

भद्र! जिस तेजोमय अविनाशी लोकको आजतक किसीने प्राप्त नहीं किया, जिसके चारों ओर ग्रह, नक्षत्र और तारागणरूप ज्योतिश्चक्र उसी प्रकार चक्कर काटता रहता है जिस प्रकार मेढीके * चारों ओर दवरीके बैल घूमते रहते हैं । अवान्तर कल्पपर्यन्त रहनेवाले अन्य लोकोंका नाश हो जानेपर भी जो स्थिर रहता है तथा तारागणके सहित धर्म, अग्नि, कश्यप और शुक्र आदि नक्षत्र एवं सप्तर्षिगण जिसकी प्रदक्षिणा किया करते हैं, वह ध्रुवलोक मैं तुझे देता हूँ ॥२०-२१ ॥ यहाँ भी जब तेरे पिता तुझे राजसिंहासन देकर वनको चले जायँगे; तब तू छत्तीस हजार वर्षतक धर्मपूर्वक पृथ्वीका पालन करेगा । तेरी इन्द्रियोंकी शक्ति ज्यों - की - त्यों बनी रहेगी ॥२२ ॥ आगे चलकर किसी समय तेरा भाई उत्तम शिकार खेलता हुआ मारा जायगा,

तब उसकी माता सुरुचि पुत्र - प्रेममें पागल होकर उसे वनमें खोजती हुई दावानलमें प्रवेश कर जायगी ॥२३ ॥ यज्ञ मेरी प्रिय मूर्ति है, तू अनेकों बड़ी - बड़ी दक्षिणाओंवाले यज्ञोंके द्वारा मेरा

यजन करेगा तथा यहाँ उत्तम उत्तम भोग भोगकर अन्तमें मेरा ही स्मरण करेगा ॥२४ ॥ इससे

तू अन्तमें सम्पूर्ण लोकोंके वन्दनीय और सप्तर्षियोंसे भी ऊपर मेरे निज धामको जायगा, जहाँ पहुँच जानेपर फिर संसारमें लौटकर नहीं आना होता है ॥ २५ ॥

मैत्रेय उवाच

इत्यर्चितः स भगवानतिदिश्यात्मनः पदम् ।

बालस्य पश्यतो धाम स्वमगाद्गरुडध्वजः ॥ २६

सोऽपि संकल्पजं विष्णोः पादसेवोपसादितम् ।

प्राप्य संकल्पनिर्वाणं नातिप्रीतोऽभ्यगात्पुरम् ॥२७

विदुर उवाच ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 750

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सुदुर्लभं यत्परमं पदं हरे-र्मायाविनस्तच्चरणार्चनार्जितम् । लब्ध्वाप्यसिद्धार्थमिवैकजन्मना कथं स्वमात्मानममन्यतार्थवित् ॥२८ मैत्रेय उवाच

मातुः सपत्न्या वाग्बाणैर्हृदि विद्धस्तु तान् स्मरन् ।

नैच्छन्मुक्तिपतेर्मुक्तिं तस्मात्तापमुपेयिवान् ॥२९

ध्रुव उवाच समाधिना नैकभवेन यत्पदं

विदुः सनन्दादय ऊर्ध्वरेतसः ।

मासैरहं षड्भिरमुष्य पादयो-श्छायामुपेत्यापगतः पृथङ्मतिः ॥ ३०

अहो बत ममानात्म्यं मन्दभाग्यस्य पश्यत ।

भवच्छिदः पादमूलं गत्वायाचे यदन्तवत् ॥३१

मतिर्विदूषिता देवैः पतद्भिरसहिष्णुभिः ।

यो नारदवचस्तथ्यं नाग्राहिषमसत्तमः ॥३२

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं— बालक ध्रुवसे इस प्रकार पूजित हो और उसे अपना पद प्रदानकर भगवान् श्रीगरुडध्वज उसके देखते - देखते अपने लोकको चले गये ॥२६ ॥

प्रभुकी चरणसेवासे संकल्पित वस्तु प्राप्त हो जानेके कारण यद्यपि ध्रुवजीका संकल्प तो निवृत्त हो गया, किन्तु उनका चित्त विशेष प्रसन्न नहीं हुआ । फिर वे अपने नगरको लौट गये ॥२७ ॥

विदुरजीने पूछा— ब्रह्मन्! मायापति श्रीहरिका परमपद तो अत्यन्त दुर्लभ है और मिलता भी उनके चरणकमलोंकी उपासनासे ही है । ध्रुवजी भी सारासारका पूर्ण विवेक रखते थे; फिर एक ही जन्ममें उस परमपदको पा लेनेपर भी उन्होंने अपनेको अकृतार्थ क्यों समझा? ॥२८ ॥

श्रीमैत्रेयजीने कहा – ध्रुवजीका हृदय अपनी सौतेली माताके वाग्बाणोंसे बिंध गया था तथा वर माँगनेके समय भी उन्हें उनका स्मरण बना हुआ था; इसीसे उन्होंने मुक्तिदाता श्रीहरिसे मुक्ति नहीं माँगी । अब जब भगवद्दर्शनसे वह मनोमालिन्य दूर हो गया तो उन्हें अपनी ****** ebook converter DEMO Watermarks *******