श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 781–790

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 781–790

पृष्ठ 781

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अंगोऽश्वमेधं राजर्षिराजहार महाक्रतुम् ।

नाजग्मुर्देवतास्तस्मिन्नाहूता ब्रह्मवादिभिः ॥२५

तमूचुर्विस्मितास्तत्र यजमानमथर्त्विजः ।

हवींषि हूयमानानि न ते गृह्णन्ति देवताः ॥२६

राजन् हवींष्यदुष्टानि श्रद्धयाऽऽसादितानि ते ।

छन्दांस्ययातयामानि योजितानि धृतव्रतैः ॥ २७

न विदाह देवानां हेलनं वयमण्वपि ।

यन्न गृह्णन्ति भागान् स्वान् ये देवाः कर्मसाक्षिणः ॥२८

प्यारे विदुरजी! मुनियोंके वाक्य वज्रके समान अमोघ होते हैं; उन्होंने कुपित होकर वेनको शाप दिया और जब वह मर गया, तब कोई राजा न रहनेके कारण लोकमें लुटेरोंके द्वारा प्रजाको बहुत कष्ट होने लगा । यह देखकर उन्होंने वेनकी दाहिनी भुजाका मन्थन किया, जिससे भगवान् विष्णुके अंशावतार आदिसम्राट् महाराज पृथु प्रकट हुए ॥१९ -२० ॥ विदुरजीने पूछा— ब्रह्मन्! महाराज अंग तो बड़े शीलसम्पन्न, साधुस्वभाव, ब्राह्मण - भक्त और महात्मा थे । उनके वेन - जैसा दुष्ट पुत्र कैसे हुआ, जिसके कारण दुःखी होकर उन्हें नगर छोड़ना पड़ा ॥२१ ॥ राजदण्डधारी वेनका भी ऐसा क्या अपराध था, जो धर्मज्ञ मुनीश्वरोंने

उसके प्रति शापरूप ब्रह्मदण्डका प्रयोग किया || २२ || प्रजाका कर्तव्य है कि वह प्रजापालक राजासे कोई पाप बन जाय तो भी उसका तिरस्कार न करे; क्योंकि वह अपने प्रभावसे आठ लोकपालोंके तेजको धारण करता है || २३ || ब्रह्मन्! आप भूत - भविष्यकी बातें जाननेवालोंमें सर्वश्रेष्ठ हैं, इसलिये आप मुझे सुनीथाके पुत्र वेनकी सब करतूतें सुनाइये । मैं आपका श्रद्धालु भक्त हूँ ॥२४ ॥

श्रीमैत्रेयजीने कहा – विदुरजी! एक बार राजर्षि अंगने अश्वमेध - महायज्ञका अनुष्ठान किया । उसमें वेदवादी ब्राह्मणोंके आवाहन करनेपर भी देवतालोग अपना भाग लेने नहीं आये ॥२५ ॥ तब ऋत्विजोंने विस्मित होकर यजमान अंगसे कहा – ' राजन्! हम आहुतियोंके

रूपमें आपका जो घृत आदि पदार्थ हवन कर रहे हैं, उसे देवतालोग स्वीकार नहीं करते ॥२६ ॥ हम जानते हैं आपकी होम - सामग्री दूषित नहीं है; आपने उसे बड़ी श्रद्धासे

जुटाया है तथा वेदमन्त्र भी किसी प्रकार बलहीन नहीं हैं; क्योंकि उनका प्रयोग करनेवाले ऋत्विज्गण याजकोचित सभी नियमोंका पूर्णतया पालन करते हैं || २७ || हमें ऐसी कोई बात नहीं दीखती कि इस यज्ञमें देवताओंका किंचित् भी तिरस्कार हुआ है— फिर भी कर्माध्यक्ष देवतालोग क्यों अपना भाग नहीं ले रहे हैं? ' ॥२८ ॥

मैत्रेय उवाच अंगो द्विजवचः श्रुत्वा यजमानः सुदुर्मनाः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 782

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तत्प्रष्टुं व्यसृजद्वाचं सदस्यांस्तदनुज्ञया ॥ २ ९

नागच्छन्त्याहुता देवा न गृह्णन्ति ग्रहानिह ।

सदसस्पतयो ब्रूत किमवद्यं मया कृतम् ॥३०

सदसस्पतय ऊचुः नरदेवेह भवतो ” नाघं तावन्मनाक् स्थितम् अस्त्येकं प्राक्तनमघं? यदिहेदृक् त्वमप्रजः ॥ ३१

तथा साधय भद्रं ते आत्मानं सुप्रजं नृप ।

इष्टस्ते पुत्रकामस्य पुत्रं दास्यति यज्ञभुक् ॥३२

तथा स्वभागधेयानि ग्रहीष्यन्ति दिवौकसः ।

यद्यज्ञपुरुषः साक्षादपत्याय हरिर्वृतः ॥३३

तांस्तान् कामान् हरिर्दद्याद्यान् यान् कामयते जनः ।

आराधितो तथैवैष यथा पुंसां फलोदयः ॥३४

इति व्यवसिता विप्रास्तस्य राज्ञः प्रजातये ।

पुरोडाशं निरवपन् शिपिविष्टाय विष्णवे ॥ ३५

तस्मात्पुरुष उत्तस्थौ हेममाल्यमलाम्बरः ।

हिरण्मयेन पात्रेण सिद्धमादाय पायसम् ॥३६

स विप्रानुमतो राजा गृहीत्वाञ्जलिनौदनम् ।

अवघ्राय मुदा युक्तः प्रादात्पत्न्या उदारधीः ॥३७

सारे तत्पुंसवनं राज्ञी प्राश्य वै पत्युरादधे ।

गर्भं काल उपावृत्ते कुमारं सुषुवेऽप्रजा ॥३८

स बाल एव पुरुषो मातामहमनुव्रतः ।

अधर्मांशोद्भवं मृत्युं तेनाभवदधार्मिकः ॥३९

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं— ऋत्विजोंकी बात सुनकर यजमान अंग बहुत उदास हुए । तब उन्होंने याजकोंकी अनुमतिसे मौन तोड़कर सदस्योंसे पूछा ॥ २ ९ ॥ ' सदस्यो! देवतालोग आवाहन करनेपर भी यज्ञमें नहीं आ रहे और न सोमपात्र ही ग्रहण करते हैं; आप बतलाइये मुझसे ऐसा क्या अपराध हुआ है? ' ॥३० ॥

सदस्योंने कहा — राजन्! इस जन्ममें तो आपसे तनिक भी अपराध नहीं हुआ; हाँ, पूर्वजन्मका एक अपराध अवश्य है, जिसके कारण आप ऐसे सर्वगुण - सम्पन्न स होनेपर भी पुत्रहीन हैं ॥ ३१ ॥ आपका कल्याण हो! इसलिये पहले आप सुपुत्र प्राप्त करनेका कोई

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पृष्ठ 783

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उपाय कीजिये । यदि आप पुत्रकी कामनासे यज्ञ करेंगे, तो भगवान् यज्ञेश्वर आपको अवश्य पुत्र प्रदान करेंगे || ३२ || जब सन्तानके लिये साक्षात् यज्ञपुरुष श्रीहरिका आवाहन किया जायगा, तब देवतालोग स्वयं ही अपना - अपना यज्ञ - भाग ग्रहण करेंगे || ३३ || भक्त जिस-जिस वस्तुकी इच्छा करता है, श्रीहरि उसे वही वही पदार्थ देते हैं । उनकी जिस प्रकार आराधना की जाती है उसी प्रकार उपासकको फल भी मिलता है ॥३४ ॥

इस प्रकार राजा अंगको पुत्रप्राप्ति करानेका निश्चय कर ऋत्विजोंने पशुमें यज्ञरूपसे रहनेवाले श्रीविष्णुभगवान्‌के पूजनके लिये पुरोडाश नामक चरु समर्पण किया ॥३५ ॥

अग्निमें आहुति डालते ही अग्निकुण्डसे सोनेके हार और शुभ्र वस्त्रोंसे विभूषित एक पुरुष प्रकट हुए; वे एक स्वर्णपात्रमें सिद्ध खीर लिये हुए थे || ३६ || उदारबुद्धि राजा अंगने याजकोंकी अनुमतिसे अपनी अंजलिमें वह खीर ले ली और उसे स्वयं सूँघकर प्रसन्नतापूर्वक अपनी पत्नीको दे दिया ॥ ३७ ॥ पुत्रहीना रानीने वह पुत्र प्रदायिनी खीर खाकर अपने पतिके

सहवाससे गर्भ धारण किया । उससे यथासमय उसके एक पुत्र हुआ ॥ ३८ ॥ वह बालक

बाल्यावस्थासे ही अधर्मके वंशमें उत्पन्न हुए अपने नाना मृत्युका अनुगामी था ( सुनीथा मृत्युकी ही पुत्री थी ); इसलिये वह भी अधार्मिक ही हुआ ॥ ३ ९ ॥

स शरासनमुद्यम्य मृगयुर्वनगोचरः ।

हन्त्यसाधुर्मृगान् दीनान् वेनोऽसावित्यरौज्जनः ॥ ४०

आक्रीडे क्रीडतो बालान् वयस्यानतिदारुणः ।

प्रसह्य निरनुक्रोशः पशुमारममारयत् ॥४१

तं विचक्ष्य खलं पुत्रं शासनैर्विविधैर्नृपः ।

यदा न शासितुं कल्पो भृशमासीत्सुदुर्मनाः ॥ ४२

प्रायेणाभ्यर्चितो देवो येऽप्रजा गृहमेधिनः ।

कदपत्यभृतं दुःखं ये न विन्दन्ति दुर्भरम् ॥४३

यतः पापीयसी कीर्तिरधर्मश्च महान्नृणाम् ।

यतो विरोधः सर्वेषां यत आधिरनन्तकः ॥४४

कस्तं प्रजापदेशं वै मोहबन्धनमात्मनः ।

पण्डितो बहु मन्येत यदर्थाः क्लेशदा गृहाः ॥४५

कदपत्यं वरं मन्ये सदपत्याच्छुचां पदात् ।

निर्विद्येत गृहान्मर्त्यो यत्क्लेशनिवहा गृहाः ॥४६

एवं स निर्विण्णमना नृपो गृहा-न्निशीथ उत्थाय महोदयोदयात् ।

अलब्धनिद्रोऽनुपलक्षितो नृभि-र्हित्वा गतो वेनसुवं प्रसुप्ताम् ॥४७

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पृष्ठ 784

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विज्ञाय निर्विद्य गतं पतिं प्रजाः पुरोहितामात्यसुहृद्गणादयः । विचिक्युरुर्व्यामतिशोककातरा यथा निगूढं पुरुषं कुयोगिनः ॥४८ वह दुष्ट वेन धनुष - बाण चढ़ाकर वनमें जाता और व्याधके समान बेचारे भोले - भाले हरिणोंकी हत्या करता । उसे देखते ही पुरवासीलोग ' वेन आया! वेन आया! ' कहकर पुकार उठते ॥४० ॥ वह ऐसा क्रूर और निर्दयी था कि मैदानमें खेलते हुए अपनी बराबरीके

बालकोंको पशुओंकी भाँति बलात् मार डालता ॥ ४१ ॥ वेनकी ऐसी दुष्ट प्रकृति देखकर

महाराज अंगने उसे तरह - तरहसे सुधारनेकी चेष्टा की; परन्तु वे उसे सुमार्गपर लानेमें समर्थ न हुए । इससे उन्हें बड़ा ही दुःख हुआ ॥ ४२ ॥ ( वे मन - ही - मन कहने लगे — ) ' जिन गृहस्थोंके

पुत्र नहीं हैं, उन्होंने अवश्य ही पूर्वजन्ममें श्रीहरिकी आराधना की होगी; इसीसे उन्हें कुपूतकी करतूतोंसे होनेवाले असह्य क्लेश नहीं सहने पड़ते ॥ ४३ ॥ जिसकी करनीसे माता - पिताका

सारा सुयश मिट्टीमें मिल जाय, उन्हें अधर्मका भागी होना पड़े, सबसे विरोध हो जाय, कभी न छूटनेवाली चिन्ता मोल लेनी पड़े और घर भी दुःखदायी हो जाय - ऐसी नाममात्रकी सन्तानके लिये कौन समझदार पुरुष ललचावेगा? वह तो आत्माके लिये एक प्रकारका मोहमय बन्धन ही है ॥४४-४५ ॥ मैं तो सपूतकी अपेक्षा कुपूतको ही अच्छा समझता हूँ; क्योंकि सपूतको छोड़नेमें बड़ा क्लेश होता है । कुपूत घरको नरक बना देता है, इसलिये उससे सहज ही छुटकारा हो जाता है ' ॥४६ ॥

इस प्रकार सोचते - सोचते महाराज अंगको रातमें नींद नहीं आयी । उनका चित्त गृहस्थीसे विरक्त हो गया । वे आधी रातके समय बिछौनेसे उठे । इस समय वेनकी माता नींदमें बेसुध पड़ी थी । राजाने सबका मोह छोड़ दिया और उसी समय किसीको भी मालूम न हो, इस प्रकार चुपचाप उस महान् ऐश्वर्यसे भरे राजमहलसे निकलकर वनको चल दिये ॥४७ ॥

महाराज विरक्त होकर घरसे निकल गये हैं, यह जानकर सभी प्रजाजन, पुरोहित, मन्त्री और सुहृद्गण आदि अत्यन्त शोकाकुल होकर पृथ्वीपर उनकी खोज करने लगे । ठीक वैसे ही जैसे योगका यथार्थ रहस्य न जाननेवाले पुरुष अपने हृदयमें छिपे हुए भगवान्‌को बाहर खोजते हैं ॥४८ ॥

अलक्षयन्तः पदवीं प्रजापते-र्हतोद्यमाः प्रत्युपसृत्य ते पुरीम् । ऋषीन् समेतानभिवन्द्य साश्रवो न्यवेदयन् पौरव भर्तृविप्लवम् ॥४९ जब उन्हें अपने स्वामीका कहीं पता न लगा, तब वे निराश होकर नगरमें लौट आये और वहाँ जो मुनिजन एकत्रित हुए थे, उन्हें यथावत् प्रणाम करके उन्होंने आँखोंमें आँसू भरकर महाराजके न मिलनेका वृत्तान्त सुनाया ॥ ४ ९ ॥ ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 785

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इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे त्रयोदशोऽध्यायः ॥१ः १. प्रा ० पा ० — भगवता । १. प्रा ० पा ० — तदूचु ० । १. प्रा ० पा ० — भवता चावद्यं किं क्रियान्वितम् । २. प्रा ० पा ० — प्राक्तनावद्यम् । ३. पा ० — यावत्पुंस ० । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 786

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अथ चतुर्दशोऽध्यायः मैत्रेय उवाच राजा वेनकी कथा

भृग्वादयस्ते मुनयो लोकानां क्षेमदर्शिनः ।

गोप्तर्यसति वै नृणां पश्यन्तः पशुसाम्यताम् ॥१

वीर मातरमाहूय सुनीथां ब्रह्मवादिनः ।

प्रकृत्यसम्मतं वेनमभ्यषिञ्चन् पतिं भुवः ॥२

श्रुत्वा नृपासनगतं वेनमत्युग्रशासनम् ।

निलिल्युर्दस्यवः सद्यः सर्पत्रस्ता इवाखवः ॥३

स आरूढनृपस्थान उन्नद्धोऽष्टविभूतिभिः ।

अवमेने महाभागान् स्तब्धः सम्भावितः स्वतः ॥४

एवं मदान्ध उत्सिक्तो निरङ्कुश इव द्विपः ।

पर्यटन् रथमास्थाय कम्पयन्निव रोदसी ॥ ५

न यष्टव्यं न दातव्यं न होतव्यं द्विजाः क्वचित् ।

इति न्यवारयद्धर्मं भेरीघोषेण सर्वशः ॥६

वेनस्यावेक्ष्य मुनयो दुर्वृत्तस्य विचेष्टितम् ।

विमृश्य लोकव्यसनं कृपयोचुः स्म सत्रिणः ॥७

अहो उभयतः प्राप्तं लोकस्य व्यसनं महत् ।

दारुण्युभयतो दीप्ते इव तस्करपालयोः ॥८

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं - वीरवर विदुरजी! सभी लोकोंकी कुशल चाहनेवाले भृगु आदि मुनियोंने देखा कि अंगके चले जानेसे अब पृथ्वीकी रक्षा करनेवाला कोई नहीं रह गया है, सब लोग पशुओंके समान उच्छृंखल होते जा रहे हैं || १ || तब उन्होंने माता सुनीथाकी सम्मतिसे, मन्त्रियोंके सहमत न होनेपर भी वेनको भूमण्डलके राजपदपर अभिषिक्त कर दिया ॥२ ॥

वेन बड़ा कठोर शासक था । जब चोर डाकुओंने सुना कि वही राजसिंहासनपर बैठा है, तब सर्पसे डरे हुए चूहोंके समान वे सब तुरंत ही जहाँ - तहाँ छिप गये || ३ || राज्यासन पानेपर वेन आठों लोकपालोंकी ऐश्वर्यकलाके कारण उन्मत्त हो गया और अभिमानवश अपनेको ही सबसे बड़ा मानकर महापुरुषोंका अपमान करने लगा ॥४ ॥ वह ऐश्वर्यमदसे अंधा हो रथपर

चढ़कर निरंकुश गजराजके समान पृथ्वी और आकाशको कँपाता हुआ सर्वत्र विचरने लगा ॥५ ॥ ‘ कोई भी द्विजातिय वर्णका पुरुष कभी किसी प्रकारका यज्ञ, दान और हवन न

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पृष्ठ 787

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करे ' अपने राज्यमें यह ढिंढोरा पिटवाकर उसने सारे धर्म - कर्म बंद करवा दिये || ६ || दुष्ट वेनका ऐसा अत्याचार देख सारे ऋषि - मुनि एकत्र हुए और संसारपर संकट आया समझकर करुणावश आपसमें कहने लगे ॥७ ॥ ' अहो! जैसे दोनों ओर जलती हुई लकड़ीके

बीचमें रहनेवाले चींटी आदि जीव महान् संकटमें पड़ जाते हैं, वैसे ही इस समय सारी प्रजा एक ओर राजाके और दूसरी ओर चोर डाकुओंके अत्याचारसे महान् संकटमें पड़ रही है ॥८ ॥ हमने अराजकताके भयसे ही अयोग्य होनेपर भी वेनको राजा बनाया था; किन्तु

अब उससे भी प्रजाको भय हो गया । ऐसी अवस्थामें प्रजाको किस प्रकार सुख - शान्ति मिल सकती है? ॥९ ॥ सुनीथाकी कोखसे उत्पन्न हुआ यह वेन स्वभावसे ही दुष्ट है । परन्तु साँपको

दूध पिलानेके समान इसको पालना, पालनेवालोंके लिये अनर्थका कारण हो गया ॥ १० ॥

हमने इसे प्रजाकी रक्षा करनेके लिये नियुक्त किया था, यह आज उसीको नष्ट करनेपर तुला हुआ है । इतना सब होनेपर भी हमें इसे समझाना अवश्य चाहिये; ऐसा करनेसे इसके किये हुए पाप हमें स्पर्श नहीं करेंगे ॥ ११ ॥ हमने जान - बूझकर दुराचारी वेनको राजा बनाया था ।

किन्तु यदि समझानेपर भी यह हमारी बात नहीं मानेगा, तो लोकके धिक्कारसे दग्ध हुए इस दुष्टको हम अपने तेजसे भस्म कर देंगे । ' ऐसा विचार करके मुनिलोग वेनके पास गये और अपने क्रोधको छिपाकर उसे प्रिय वचनोंसे समझाते हुए इस प्रकार कहने लगे ॥१२-१३ ॥

अराजकभयादेष कृतो राजातदर्हणः ।

ततोऽप्यासीद्भयं त्वद्य कथं स्यात्स्वस्ति देहिनाम् ॥९

अहेरिव पयःपोषः पोषकस्याप्यनर्थभृत् ।

वेनः प्रकृत्यैव खलः सुनीथागर्भसम्भवः ॥ १०

निरूपितः प्रजापालः स जिघांसति वै प्रजाः ।

तथापि सान्त्वयेमामुं नास्मांस्तत्पातकं स्पृशेत् ॥११

तद्विद्वद्भिरसद्वृत्तो वेनोऽस्माभिः कृतो नृपः ।

सान्त्वितो यदि नो वाचं न ग्रहीष्यत्यधर्मकृत् ॥१२

लोकधिक्कारसन्दग्धं दहिष्यामः स्वतेजसा ।

एवमध्यवसायैनं मुनयो गूढमन्यवः ।

उपव्रज्याब्रुवन् वेनं सान्त्वयित्वा च सामभिः ॥१३

मुनय ऊचुः

नृपवर्य निबोधैतद्यत्ते विज्ञापयाम भोः ।

आयुःश्रीबलकीर्तीनां तव तात विवर्धनम् ॥१४

धर्म आचरितः पुंसां वाङ्मनःकायबुद्धिभिः ।

लोकान् विशोकान् वितरत्यथानन्त्यमसंगिनाम् ॥१५

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पृष्ठ 788

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स ते मा विनशेद्वीर प्रजानां क्षेमलक्षणः ।

यस्मिन् विनष्टे नृपतिरैश्वर्यादवरोहति ॥१६

राजन्नसाध्वमात्येभ्यश्चोरादिभ्यः प्रजा नृपः ।

रक्षन् यथा बलिं गृह्णन्निह प्रेत्य च मोदते ॥१७

यस्य राष्ट्रे पुरे चैव भगवान् यज्ञपूरुषः ।

इज्यते स्वेन धर्मेण जनैर्वर्णाश्रमान्वितैः ॥१८

तस्य राज्ञो महाभाग भगवान् भूतभावनः ।

परितुष्यति विश्वात्मा तिष्ठतो निजशासने ॥१९

मुनियोंने कहा- राजन्! हम आपसे जो बात कहते हैं, उसपर ध्यान दीजिये । इससे आपकी आयु, श्री, बल और कीर्तिकी वृद्धि होगी ॥१४ ॥ तात! यदि मनुष्य मन, वाणी, शरीर

और बुद्धिसे धर्मका आचरण करे, तो उसे स्वर्गादि शोकरहित लोकोंकी प्राप्ति होती है । यदि उसका निष्कामभाव हो, तब तो वही धर्म उसे अनन्त मोक्षपदपर पहुँचा देता है ॥१५ ॥

इसलिये वीरवर! प्रजाका कल्याणरूप वह धर्म आपके कारण नष्ट नहीं होना चाहिये । धर्मके नष्ट होनेसे राजा भी ऐश्वर्यसे च्युत हो जाता है ॥१६ ॥ जो राजा दुष्ट मन्त्री और चोर आदिसे

अपनी प्रजाकी रक्षा करते हुए न्यायानुकूल कर लेता है, वह इस लोक और परलोकमें दोनों जगह सुख पाता है ॥१७ ॥ जिसके राज्य अथवा नगरमें वर्णाश्रम धर्मोंका पालन करनेवाले

पुरुष स्वधर्मपालनके द्वारा भगवान् यज्ञपुरुषकी आराधना करते हैं, महाभाग! अपनी आज्ञाका पालन करनेवाले उस राजासे भगवान् प्रसन्न रहते हैं; क्योंकि वे ही सारे विश्वकी आत्मा तथा सम्पूर्ण भूतोंके रक्षक हैं ॥१८-१९ ॥

तस्मिंस्तुष्टे किमप्राप्यं जगतामीश्वरेश्वरे ।

लोकाः सपाला ह्येतस्मै हरन्ति बलिमादृताः ॥ २०

तं सर्वलोकामरयज्ञसंग्रहं त्रयीमयं द्रव्यमयं तपोमयम् । यज्ञैर्विचित्रैर्यजतो भवाय ते राजन् स्वदेशाननुरोद्धुमर्हसि ॥२१ यज्ञेन युष्मद्विषये द्विजातिभि-र्वितायमानेन सुराः कला हरेः । स्विष्टाः सुतुष्टाः प्रदिशन्ति वाञ्छितं तद्धेलनं नार्हसि वीर चेष्टितुम् ॥२२ वेन उवाच ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 789

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बालिशा बत यूयं वा ' अधर्मे धर्ममानिनः ।

ये वृत्तिदं पतिं हित्वा जारं पतिमुपासते ॥२३

अवजानन्त्यमी मूढा नृपरूपिणमीश्वरम् ।

नानुविन्दन्ति ते भद्रमिह लोके परत्र च ॥२४

को यज्ञपुरुषो नाम यत्र वो भक्तिरीदृशी ॥

भर्तृस्नेहविदूराणां यथा जारे कुयोषिताम् ॥२५

विष्णुर्विरिञ्चो गिरिश इन्द्रो वायुर्यमो रविः ।

पर्जन्यो धनदः सोमः क्षितिरग्निरपाम्पतिः ॥२६

एते चान्ये च विबुधाः प्रभवो वरशापयोः ।

देहे भवन्ति नृपतेः सर्वदेवमयो नृपः ॥२७

तस्मान्मां कर्मभिर्विप्रा यजध्वं गतमत्सराः ।

बलिं च मह्यं हरत मत्तोऽन्यः कोऽग्रभुक् पुमान् ॥२८

भगवान् ब्रह्मादि जगदीश्वरोंके भी ईश्वर हैं, उनके प्रसन्न होनेपर कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं रह जाती । तभी तो इन्द्रादि लोकपालोंके सहित समस्त लोक उन्हें बड़े आदरसे पूजोपहार समर्पण करते हैं ॥२० ॥ राजन्! भगवान् श्रीहरि समस्त लोक, लोकपाल और यज्ञोंके

नियन्ता हैं; वे वेदत्रयीरूप, द्रव्यरूप और तपःस्वरूप हैं । इसलिये आपके जो देशवासी आपकी उन्नतिके लिये अनेक प्रकारके यज्ञोंसे भगवान्‌का यजन करते हैं, आपको उनके अनुकूल ही रहना चाहिये ॥२१ ॥ जब आपके राज्यमें ब्राह्मणलोग यज्ञोंका अनुष्ठान करेंगे,

तब उनकी पूजासे प्रसन्न होकर भगवान्‌के अंशस्वरूप देवता आपको मनचाहा फल देंगे । अतः वीरवर! आपको यज्ञादि धर्मानुष्ठान बंद करके देवताओंका तिरस्कार नहीं करना चाहिये ॥२२ ॥

वेनने कहा- तुमलोग बड़े मूर्ख हो! खेद है, तुमने अधर्ममें ही धर्मबुद्धि कर रखी है । तभी तो तुम जीविका देनेवाले मुझ साक्षात् पतिको छोड़कर किसी दूसरे जारपतिकी उपासना करते हो ॥२३ ॥ जो लोग मूर्खतावश राजारूप परमेश्वरका अनादर करते हैं, उन्हें न

तो इस लोकमें सुख मिलता है और न परलोकमें ही ॥ २४ ॥ अरे! जिसमें तुमलोगोंकी इतनी

भक्ति है, वह यज्ञपुरुष है कौन? यह तो ऐसी ही बात हुई जैसे कुलटा स्त्रियाँ अपने विवाहित पतिसे प्रेम न करके किसी परपुरुषमें आसक्त हो जायँ || २५ || विष्णु, ब्रह्मा, महादेव, इन्द्र, वायु, यम, सूर्य, मेघ, कुबेर, चन्द्रमा, पृथ्वी, अग्नि और वरुण तथा इनके अतिरिक्त जो दूसरे वर और शाप देनेमें समर्थ देवता हैं, वे सब - के - सब राजाके शरीरमें रहते हैं; इसलिये राजा सर्वदेवमय है और देवता उसके अंशमात्र हैं ॥२६-२७ ॥ इसलिये ब्राह्मणो! तुम मत्सरता

छोड़कर अपने सभी कर्मोंद्वारा एक मेरा ही पूजन करो और मुझीको बलि समर्पण करो ।

भला मेरे सिवा और कौन अग्रपूजाका अधिकारी हो सकता है ॥२८ ॥

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पृष्ठ 790

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मैत्रेय उवाच

इत्थं विपर्ययमतिः पापीयानुत्पथं गतः ।

अनुनीयमानस्तद्याच्ञां न चक्रे ' भ्रष्टमंगलः ॥२९

इति तेऽसत्कृतास्तेन द्विजाः पण्डितमानिना ।

भग्नायां भव्ययाच्ञायां तस्मै विदुर चुक्रुधुः ॥३०

हन्यतां हन्यतामेष पापः प्रकृतिदारुणः ।

जीवञ्जगदसावाशु कुरुते भस्मसाद् ध्रुवम् ॥३१

नायमर्हत्यसद्वृत्तो नरदेववरासनम् ।

योऽधियज्ञपतिं विष्णुं २ विनिन्दत्यनपत्रपः ॥३२

को वैनं परिचक्षीत ' वेनमेकमृतेऽशुभम् ।

प्राप्त ईदृशमैश्वर्यं यदनुग्रहभाजनः ॥३३

इत्थं व्यवसिता हन्तुमृषयो रूढमन्यवः ।

निजघ्नुर्हुङ्कृतैर्वेनं हतमच्युतनिन्दया ॥३४

ऋषिभिः स्वाश्रमपदं गते पुत्रकलेवरम् ।

सुनीथा पालयामास विद्यायोगेन शोचती ॥ ३५

एकदा मुनयस्ते तु सरस्वत्सलिलाप्लुताः ५ ।

हुत्वाग्नीन् सत्कथाश्चक्रुरुपविष्टाः सरित्तटे ॥ ३६

वीक्ष्योत्थितांस्तदोत्पातानाहुर्लोकभयङ्करान् ।

अप्यभद्रमनाथाया दस्युभ्यो न भवेद्भुवः ॥ ३७

एवं मृशन्त ऋषयो धावतां सर्वतोदिशम् ।

पांसुः समुत्थितो भूरिश्चोराणामभिलुम्पताम् ॥३८

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं — इस प्रकार विपरीत बुद्धि होनेके कारण वह अत्यन्त पापी और कुमार्गगामी हो गया था । उसका पुण्य क्षीण हो चुका था, इसलिये मुनियोंके बहुत विनयपूर्वक प्रार्थना करनेपर भी उसने उनकी बातपर ध्यान न दिया || २ ९ || कल्याणरूप विदुरजी! अपनेको बड़ा बुद्धिमान् समझनेवाले वेनने जब उन मुनियोंका इस प्रकार अपमान किया, तब अपनी माँगको व्यर्थ हुई देख वे उसपर अत्यन्त कुपित हो गये || ३० || ‘ मार डालो! इस स्वभावसे ही दुष्ट पापीको मार डालो! यह यदि जीता रह गया तो कुछ ही दिनोंमें संसारको अवश्य भस्म कर डालेगा ॥ ३१ ॥ यह दुराचारी किसी प्रकार राज - सिंहासनके योग्य नहीं है,

क्योंकि यह निर्लज्ज साक्षात् यज्ञपति श्रीविष्णु भगवान्‌की निन्दा करता है ॥३२ ॥ अहो!

जिनकी कृपासे इसे ऐसा ऐश्वर्य मिला, उन श्रीहरिकी निन्दा अभागे वेनको छोड़कर और कौन ****** ebook converter DEMO Watermarks *******