श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 791–800
श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 791–800
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कर सकता है '? ॥३३ ॥
इस प्रकार अपने छिपे हुए क्रोधको प्रकट कर उन्होंने उसे मारनेका निश्चय कर लिया । वह तो भगवान्की निन्दा करनेके कारण पहले ही मर चुका था, इसलिये केवल हुंकारोंसे ही उन्होंने उसका काम तमाम कर दिया || ३४ || जब मुनिगण अपने - अपने आश्रमोंको चले गये, तब इधर वेनकी शोकाकुला माता सुनीथा मन्त्रादिके बलसे तथा अन्य युक्तियोंसे अपने पुत्रके शवकी रक्षा करने लगी ॥ ३५ ॥
एक दिन वे मुनिगण सरस्वतीके पवित्र जलमें स्नान कर अग्निहोत्रसे निवृत्त हो नदीके तीरपर बैठे हुए हरिचर्चा कर रहे थे || ३६ || उन दिनों लोकोंमें आतंक फैलानेवाले बहुत - से उपद्रव होते देखकर वे आपसमें कहने लगे, ' आजकल पृथ्वीका कोई रक्षक नहीं है; इसलिये चोर - डाकुओंके कारण उसका कुछ अमंगल तो नहीं होनेवाला है? ' ॥ ३७ ॥ ऋषिलोग ऐसा
विचार कर ही रहे थे कि उन्होंने सब दिशाओं में धावा करनेवाले चोरों और डाकुओंके कारण उठी हुई बड़ी भारी धूल देखी ॥ ३८ ॥
तदुपद्रवमाज्ञाय लोकस्य वसु लुम्पताम् ।
भर्तर्युपरते तस्मिन्नन्योन्यं च जिघांसताम् ॥३९
चोरप्रायं जनपदं हीनसत्त्वमराजकम् ।
लोकान्नावारयञ्छक्ता अपि तद्दोषदर्शिनः ॥४०
ब्राह्मणः समदृक् शान्तो दीनानां समुपेक्षकः ।
स्रवते ब्रह्म तस्यापि भिन्नभाण्डात्पयो यथा ॥४१
नाङ्गस्य वंशो राजर्षेरेष संस्थातुमर्हति ।
अमोघवीर्या हि नृपा वंशेऽस्मिन् केशवाश्रयाः ॥४२
विनिश्चित्यैवमृषयो विपन्नस्य महीपतेः ।
ममन्थुरूरुं तरसा तत्रासीद्बाहुको नरः ॥४३
काककृष्णोऽतिह्रस्वांगो ह्रस्वबाहुर्महाहनुः ।
ह्रस्वपान्निम्ननासाग्रो रक्ताक्षस्ताम्रमूर्धजः ॥४४
तं तु तेऽवनतं दीनं किं करोमीति वादिनम् ।
निषीदेत्यब्रुवंस्तात स निषादस्ततोऽभवत् ॥४५
तस्य वंश्यास्तु नैषादा गिरिकाननगोचराः ।
येनाहरज्जायमानो वेनकल्मषमुल्बणम् ॥ ४६
देखते ही वे समझ गये कि राजा वेनके मर जानेके कारण देशमें अराजकता फैल गयी है, राज्य शक्तिहीन हो गया है और चोर - डाकू बढ़ गये हैं; यह सारा उपद्रव लोगोंका धन लूटनेवाले तथा एक - दूसरेके खूनके प्यासे लुटेरोंका ही है । अपने तेजसे अथवा तपोबलसे लोगोंको ऐसी कुप्रवृत्तिसे रोकनेमें समर्थ होनेपर भी ऐसा करनेमें हिंसादि दोष देखकर उन्होंने ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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इसका कोई निवारण नहीं किया ॥ ३ ९ -४० ॥ फिर सोचा कि ' ब्राह्मण यदि समदर्शी और शान्तस्वभाव भी हो तो भी दीनोंकी उपेक्षा करनेसे उसका तप उसी प्रकार नष्ट हो जाता है जैसे फूटे हुए घड़ेमेंसे जल बह जाता है ॥४१ ॥ फिर राजर्षि अंगका वंश भी नष्ट नहीं होना
चाहिये, क्योंकि इसमें अनेक अमोघ - शक्ति और भगवत्परायण राजा हो चुके हैं ' ॥४२ ॥ ऐसा
निश्चय कर उन्होंने मृत राजाकी जाँघको बड़े जोरसे मथा तो उसमेंसे एक बौना पुरुष उत्पन्न हुआ ॥४३ ॥ वह कौएके समान काला था; उसके सभी अगं और खासकर भुजाएँ बहुत
छोटी थीं, जबड़े बहुत बड़े, टाँगे छोटी, नाक चपटी, नेत्र लाल और केश ताँबेके - से रंगके थे ॥४४ ॥ उसने बड़ी दीनता और नम्रभावसे पूछा कि ' मैं क्या करूँ? ' तो ऋषियोंने कहा
- ' निषीद ( बैठ जा ) । ' इसीसे वह ' निषाद ' कहलाया ॥ ४५ ॥ उसने जन्म लेते ही राजा वेनके
भयंकर पापोंको अपने ऊपर ले लिया, इसीलिये उसके वंशधर नैषाद भी हिंसा, लूट - पाट आदि पापकर्मोंमें रत रहते हैं; अतः वे गाँव और नगरमें न टिककर वन और पर्वतोंमें ही निवास करते हैं ॥४६ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे पृथुचरिते निषादोत्पत्तिर्नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥१४ ॥
१. प्रा ० पा०- —वै । १. प्रा ० पा ० – भेजे । २. प्रा ० पा ० – देवं । ३. प्रा ० पा ० — तं । ४. -प्रा ० पा ० — सरित्स्वच्छ जला ० । ६. प्रा ० पा०- –भयान्तरान् । ****** ebook converter DEMO Watermarks ******* प्रा ० पा ० - परिरक्षेत । ५.
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अथ पञ्चदशोऽध्यायः महाराज पृथुका आविर्भाव और राज्याभिषेक मैत्रेय उवाच
अथ तस्य पुनर्विप्रैरपुत्रस्य महीपतेः ।
बाहुभ्यां मथ्यमानाभ्यां मिथुनं समपद्यत ॥१
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं — विदुरजी! इसके बाद ब्राह्मणोंने पुत्रहीन राजा वेनकी? मन्थन किया, तब उनसे एक स्त्री - पुरुषका जोड़ा प्रकट हुआ ॥१ ॥
तद् दृष्ट्वा मिथुनं जातमृषयो ब्रह्मवादिनः ।
ऊचुः परमसन्तुष्टा विदित्वा भगवत्कलाम् ॥२
ऋषय ऊचुः
एष विष्णोर्भगवतः कला भुवनपालिनी ।
इयं च लक्ष्म्याः सम्भूतिः पुरुषस्यानपायिनी ॥३
अयं तु प्रथमो राज्ञां पुमान् प्रथयिता यशः ।
पृथुर्नाम महाराजो भविष्यति पृथुश्रवाः ॥४
इयं च सुदती देवी गुणभूषणभूषणा ।
अर्चिर्नाम वरारोहा पृथुमेवावरुन्धती ॥५
एष साक्षाद्धरेरंशो जातो लोकरिरक्षया ।
इयं च तत्परा हि श्रीरनुजज्ञेऽनपायिनी ॥६
मैत्रेय उवाच
प्रशंसन्ति स्म तं विप्रा गन्धर्वप्रवरा जगुः ।
मुमुचुः सुमनोधाराः सिद्धा नृत्यन्ति स्वः स्त्रियः ॥७
शङ्खतूर्यमृदंगाद्या नेदुर्दुन्दुभयो दिवि ।
तत्र सर्व उपाजग्मुर्देवर्षिपितॄणां गणाः ॥ ८
ब्रह्मा जगद्गुरुर्देवैः सहासृत्य सुरेश्वरैः ।
वैन्यस्य दक्षिणे हस्ते दृष्ट्वा चिह्नं गदाभृतः ॥९
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पादयोररविन्दं च तं वै मेने हरेः कलाम् ।
यस्याप्रतिहतं चक्रमंशः स परमेष्ठिनः ॥१०
तस्याभिषेक आरब्धो ब्राह्मणैर्ब्रह्मवादिभिः ।
आभिषेचनिकान्यस्मै आजहुः सर्वतो जनाः ॥११
सरित्समुद्रा गिरयो नागा गावः खगा मृगाः ।
द्यौः क्षितिः सर्वभूतानि समाजहुरुपायनम् ॥१२
ब्रह्मवादी ऋषि उस जोड़ेको उत्पन्न हुआ देख और उसे भगवान्का अंश जान बहुत प्रसन्न हुए और बोले ॥२ ॥
ऋषियोंने कहा — यह पुरुष भगवान् विष्णुकी विश्वपालिनी कलासे प्रकट हुआ है और यह स्त्री उन परम पुरुषकी अनपायिनी ( कभी अलग न होनेवाली ) शक्ति लक्ष्मीजीका अवतार है ॥३ ॥ इनमेंसे जो पुरुष है वह अपने सुयशका प्रथन - विस्तार करनेके कारण परम
यशस्वी ‘ पृथु ' नामक सम्राट् होगा । राजाओंमें यही सबसे पहला होगा ॥४ ॥ यह सुन्दर
दाँतोवाली एवं गुण और आभूषणोंको भी विभूषित करनेवाली सुन्दरी इन पृथुको ही अपना पति बनायेगी । इसका नाम अर्चि होगा || ५ || पृथुके रूपमें साक्षात् श्रीहरिके अंशने ही संसारकी रक्षाके लिये अवतार लिया है और अर्चिके रूपमें, निरन्तर भगवान्की सेवामें रहनेवाली उनकी नित्य सहचरी श्रीलक्ष्मीजी ही प्रकट हुई हैं ॥ ६ ॥
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं — विदुरजी! उस समय ब्राह्मणलोग पृथुकी स्तुति करने लगे, श्रेष्ठ गन्धर्वोंने गुणगान किया, सिद्धोंने पुष्पोंकी वर्षा की, अप्सराएँ नाचने लगीं ॥७ ॥ आकाशमें
शंख, तुरही, मृदंग और दुन्दुभि आदि बाजे बजने लगे । समस्त देवता, ऋषि और पितर अपने - अपने लोकोंसे वहाँ आये || ८ || जगद्गुरु ब्रह्माजी देवता और देवेश्वरोंके साथ पधारे । उन्होंने वेनकुमार पृथुके दाहिने हाथमें भगवान् विष्णुकी हस्तरेखाएँ और चरणोंमें कमलका चिह्न देखकर उन्हें श्रीहरिका ही अंश समझा; क्योंकि जिसके हाथमें दूसरी रेखाओंसे बिना कटा हुआ चक्रका चिह्न होता है, वह भगवान्का ही अंश होता है ॥९ -१० ॥ वेदवादी ब्राह्मणोंने महाराज पृथुके अभिषेकका आयोजन किया । सब लोग उसकी सामग्री जुटानेमें लग गये ॥११ ॥ उस समय नदी, समुद्र, पर्वत, सर्प, गौ, पक्षी, मृग, स्वर्ग,
पृथ्वी तथा अन्य सब प्राणियोंने भी उन्हें तरह - तरहके उपहार भेंट किये ॥१२ ॥
सोऽभिषिक्तो महाराजः सुवासाः साध्वलङ्कृतः ।
पत्न्यार्चिषालङ्कृतया विरेजेऽग्निरिवापरः ॥१३
तस्मै जहार धनदो हैमं वीर वरासनम् ।
वरुणः सलिलस्रावमातपत्रं शशिप्रभम् ॥१४
वायुश्च वालव्यजने ' धर्मः कीर्तिमयीं स्रजम् ।
इन्द्रः किरीटमुत्कृष्टं दण्डं संयमनं यमः ॥१५
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ब्रह्मा ब्रह्ममयं वर्म ३ भारती हारमुत्तमम् ।
हरिः सुदर्शनं चक्रं तत्पत्न्यव्याहतां श्रियम् ॥१६
दशचन्द्रमसिं रुद्रः शतचन्द्रं तथाम्बिका ।
सोमोऽमृतमयानश्वांस्त्वष्टा रूपाश्रयं रथम् ॥१७
अग्निराजगवं चापं सूर्यो रश्मिमयानिषून् ।
भूः पादुके योगमय्यौ ४ द्यौः पुष्पावलिमन्वहम् ॥१८
नाट्यं सुगीतं वादित्रमन्तर्धानं च खेचराः ।
ऋषयश्चाशिषः सत्याः समुद्रः शङ्खमात्मजम् ॥१९
सिन्धवः पर्वता नद्यो रथवीथीर्महात्मनः ।
सूतोऽथ मागधो वन्दी तं स्तोतुमुपतस्थिरे ॥२०
स्तावकांस्तानभिप्रेत्य पृथुर्वैन्यः प्रतापवान् ।
मेघनिर्ह्रादया वाचा प्रहसन्निदमब्रवीत् ॥ २१
पृथुरुवाच भोः सूत हे ' मागध सौम्य वन्दिँ-ल्लोकेऽधुनास्पष्टगुणस्य मे स्यात् । किमाश्रयो मे स्तव एष योज्यतां मा मय्यभूवन् वितथा गिरो वः ॥२२ सुन्दर वस्त्र और आभूषणोंसे अलंकृत महाराज पृथुका विधिवत् राज्याभिषेक हुआ । उस समय अनेकों अलंकारोंसे सजी हुई महारानी अर्चिके साथ वे दूसरे अग्निदेवके सदृश जान पड़ते थे ॥१३ ॥
वीर विदुरजी! उन्हें कुबेरने बड़ा ही सुन्दर सोनेका सिंहासन दिया तथा वरुणने चन्द्रमाके समान श्वेत और प्रकाशमय छत्र दिया, जिससे निरन्तर जलकी फुहियाँ झरती रहती थीं ॥१४ ॥ वायुने दो चँवर, धर्मने कीर्तिमयी माला, इन्द्रने मनोहर मुकुट, यमने दमन
करनेवाला दण्ड, ब्रह्माने वेदमय कवच, सरस्वतीने सुन्दर हार, विष्णुभगवान्ने सुदर्शनचक्र, विष्णुप्रिया लक्ष्मीजीने अविचल सम्पत्ति, रुद्रने दस चन्द्राकार चिह्नोंसे युक्त कोषवाली तलवार, अम्बिकाजीने सौ चन्द्राकार चिह्नोंवाली ढाल, चन्द्रमाने अमृतमय अश्व, त्वष्टा ( विश्वकर्मा ) -ने सुन्दर रथ, अग्निने बकरे और गौके सींगोंका बना हुआ सुदृढ़ धनुष, सूर्यने तेजोमय बाण, पृथ्वीने चरणस्पर्श - मात्रसे अभीष्ट स्थानपर पहुँचा देनेवाली योगमयी पादुकाएँ, आकाशके अभिमानी द्यौ देवताने नित्य नूतन पुष्पोंकी माला, आकाशविहारी सिद्ध-गन्धर्वादिने नाचने - गाने, बजाने और अन्तर्धान हो जानेकी शक्तियाँ, ऋषियोंने अमोघ ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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आशीर्वाद, समुद्रने अपनेसे उत्पन्न हुआ शंख तथा सातों समुद्र, पर्वत और नदियोंने उनके रथके लिये बेरोक - टोक मार्ग उपहारमें दिये । इसके पश्चात् सूत, मागध और वन्दीजन उनकी स्तुति करनेके लिये उपस्थित हुए ॥ १५-२० ॥ तब उन स्तुति करनेवालोंका अभिप्राय समझकर वेनपुत्र परम प्रतापी महाराज पृथुने हँसते हुए मेघके समान गम्भीर वाणीमें कहा ॥२१ ॥
पृथुने कहा—– सौम्य सूत, मागध और वन्दीजन! अभी तो लोकमें मेरा कोई भी गुण प्रकट नहीं हुआ । फिर तुम किन गुणोंको लेकर मेरी स्तुति करोगे? मेरे विषयमें तुम्हारी वाणी
व्यर्थ नहीं होनी चाहिये । इसलिये मुझसे भिन्न किसी औरकी स्तुति करो ॥२२ ॥
तस्मात्परोक्षेऽस्मदुपश्रुतान्यलं करिष्यथ स्तोत्रमपीच्यवाचः । सत्युत्तमश्लोकगुणानुवादे जुगुप्सितं न स्वयन्ति सभ्याः ॥२३ महद्गुणानात्मनि कर्तुमीशः कः स्तावकैः स्तावयतेऽसतोऽपि । तेऽस्याभविष्यन्निति विप्रलब्धो जनावहासं कुमतिर्न वेद ॥२४
प्रभवो ह्यात्मनः स्तोत्रं जुगुप्सन्त्यपि विश्रुताः ।
ह्रीमन्तः परमोदाराः पौरुषं वा विगर्हितम् ॥२५
वयं त्वविदिता लोके सूताद्यापि वरीमभिः ।
कर्मभिः कथमात्मानं गापयिष्याम बालवत् ॥२६
मृदुभाषियो! कालान्तरमें जब मेरे अप्रकट गुण प्रकट हो जायँ, तब भरपेट अपनी मधुर वाणीसे मेरी स्तुति कर लेना । देखो, शिष्ट पुरुष पवित्रकीर्ति श्रीहरिके गुणानुवादके रहते हुए तुच्छ मनुष्योंकी स्तुति नहीं किया करते ॥ २३ ॥ महान् गुणोंको धारण करनेमें समर्थ होनेपर
भी ऐसा कौन बुद्धिमान् पुरुष है, जो उनके न रहनेपर भी केवल सम्भावनामात्रसे स्तुति करनेवालोंद्वारा अपनी स्तुति करायेगा? यदि यह विद्याभ्यास करता तो इसमें अमुक - अमुक गुण हो जाते - इस प्रकारकी स्तुतिसे तो मनुष्यकी वंचना की जाती है । वह मन्दमति यह नहीं समझता कि इस प्रकार तो लोग उसका उपहास ही कर रहे हैं ॥२४ ॥ जिस प्रकार
लज्जाशील उदार पुरुष अपने किसी निन्दित पराक्रमकी चर्चा होनी बुरी समझते हैं, उसी प्रकार लोकविख्यात समर्थ पुरुष अपनी स्तुतिको भी निन्दित मानते हैं ॥२५ ॥ सूतगण!
अभी हम अपने श्रेष्ठ कर्मोंके द्वारा लोकमें अप्रसिद्ध ही हैं; हमने अबतक कोई भी ऐसा काम नहीं किया है, जिसकी प्रशंसा की जा सके । तब तुमलोगोंसे बच्चोंके समान अपनी कीर्तिका ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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किस प्रकार गान करावें? ॥ २६ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे पृथुचरिते पञ्चदशोऽध्यायः ॥१५ ॥
१. प्रा ० पा ० – जनं । २. प्रा ० पा ० — मिव । ३. प्रा ० पा - धर्मं । ४. प्रा ० पा०— प्रा ० पा ० — भो । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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अथ षोडशोऽध्यायः वन्दीजनद्वारा महाराज पृथुकी स्तुति मैत्रेय उवाच
इति ब्रुवाणं नृपतिं गायका मुनिचोदिताः ।
तुष्टुवुस्तुष्टमनसस्तद्वागमृतसेवया ॥१
नालं वयं ते महिमानुवर्णने यो देववर्योऽवततार मायया । वेनांगजातस्य च पौरुषाणि ते वाचस्पतीनामपि बभ्रमुर्धियः ॥ २ श्रीमैत्रेयजी कहते हैं— महाराज पृथुने जब इस प्रकार कहा, तब उनके वचनामृतका आस्वादन करके सूत आदि गायकलोग बड़े प्रसन्न हुए । फिर वे मुनियोंकी प्रेरणासे उनकी इस प्रकार स्तुति करने लगे || १ || ' आप साक्षात् देवप्रवर श्रीनारायण ही हैं ' जो अपनी मायासे अवतीर्ण हुए हैं; हम आपकी महिमाका वर्णन करनेमें समर्थ नहीं हैं । आपने जन्म तो राजा वेनके मृतक शरीरसे लिया है, किन्तु आपके पौरुषोंका वर्णन करनेमें साक्षात् ब्रह्मादिकी बुद्धि भी चकरा जाती है ॥२ ॥
अथाप्युदारश्रवसः पृथोहरेः कलावतारस्य कथामृतादृताः । यथोपदेशं मुनिभिः प्रचोदिताः श्लाघ्यानि कर्माणि वयं वितन्महि ॥३
एष धर्मभृतां श्रेष्ठो लोकं धर्मेऽनुवर्तयन् ।
गोप्ता च धर्मसेतूनां शास्ता तत्परिपन्थिनाम् ॥४
एष वै लोकपालानां बिभर्त्येकस्तनौ तनूः ।
काले काले यथाभागं लोकयोरुभयोर्हितम् ॥५
वसु काल उपादत्ते काले चायं विमुंचति ।
समः सर्वेषु भूतेषु प्रतपन् सूर्यवद्विभुः ॥६
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तितिक्षत्यक्रमं वैन्य उपर्याक्रमतामपि ।
भूतानां करुणः शश्वदार्तानां क्षितिवृत्तिमान् ॥७
देवेऽवर्षत्यसौ देवो नरदेववपुर्हरिः ।
कृच्छ्रप्राणाः प्रजा ह्येष रक्षिष्यत्यंजसेन्द्रवत् ॥८
आप्याययत्यसौ लोकं वदनामृतमूर्तिना ।
सानुरागावलोकेन विशदस्मितचारुणा ॥ ९
अव्यक्तवर्त्येष निगूढकार्यो गम्भीरवेधा उपगुप्तवित्तः । अनन्तमाहात्म्यगुणैकधामा पृथुः प्रचेता इव संवृतात्मा ॥१०
दुरासदो दुर्विषह आसन्नोऽपि विदूरवत् ।
नैवाभिभवितुं शक्योवेनारण्युत्थितोऽनलः ॥ ११
तथापि आपके कथामृतके आस्वादनमें आदर - बुद्धि रखकर मुनियोंके उपदेशके अनुसार उन्हींकी प्रेरणासे हम आपके परम प्रशंसनीय कर्मोंका कुछ विस्तार करना चाहते हैं, आप साक्षात् श्रीहरिके कलावतार हैं और आपकी कीर्ति बड़ी उदार है ॥३ ॥
‘ ये धर्मधारियोंमें श्रेष्ठ महाराज पृथु लोकको धर्ममें प्रवृत्त करके धर्ममर्यादाकी रक्षा करेंगे तथा उसके विरोधियोंको दण्ड देंगे || ४ || ये अकेले ही समय - समयपर प्रजाके पालन, पोषण और अनुरंजन आदि कार्यके अनुसार अपने शरीरमें भिन्न - भिन्न लोकपालोंकी मूर्तिको धारण करेंगे तथा यज्ञ आदिके प्रचारद्वारा स्वर्गलोक और वृष्टिकी व्यवस्थाद्वारा भूलोक – दोनोंका ही हित साधन करेंगे ॥५ ॥ ये सूर्यके समान अलौकिक, महिमान्वित, प्रतापवान् और समदर्शी
होंगे । जिस प्रकार सूर्य देवता आठ महीने तपते रहकर जल खींचते हैं और वर्षा ऋतुमें उसे उड़ेल देते हैं, उसी प्रकार ये कर आदिके द्वारा कभी धन - संचय करेंगे और कभी उसका प्रजाके हितके लिये व्यय कर डालेंगे || ६ || ये बड़े दयालु होंगे । यदि कभी कोई दीन पुरुष इनके मस्तकपर पैर भी रख देगा, तो भी ये पृथ्वीके समान उसके इस अनुचित व्यवहारको सदा सहन करेंगे ॥७ ॥ कभी वर्षा न होगी और प्रजाके प्राण संकटमें पड़ जायँगे, तो ये
राजवेषधारी श्रीहरि इन्द्रकी भाँति जल बरसाकर अनायास ही उसकी रक्षा कर लेंगे ॥८ ॥ ये
अपने अमृतमय मुखचन्द्रकी मनोहर मुसकान और प्रेमभरी चितवनसे सम्पूर्ण लोकोंको आनन्दमग्न कर देंगे ॥९ ॥ इनकी गतिको कोई समझ न सकेगा, इनके कार्य भी गुप्त होंगे
तथा उन्हें सम्पन्न करनेका ढंग भी बहुत गम्भीर होगा । इनका धन सदा सुरक्षित रहेगा । ये अनन्त माहात्म्य और गुणोंके एकमात्र आश्रय होंगे । इस प्रकार मनस्वी पृथु साक्षात् वरुणके ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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ही समान होंगे ॥१० ॥
‘ महाराज पृथु वेनरूप अरणिके मन्थनसे प्रकट हुए अग्निके समान हैं । शत्रुओंके लिये ये अत्यन्त दुर्धर्ष और दुःसह होंगे । ये उनके समीप रहनेपर भी, सेनादिसे सुरक्षित रहनेके
कारण, बहुत दूर रहनेवाले - से होंगे । शत्रु कभी इन्हें हरा न सकेंगे ॥११ ॥
अन्तर्बहिश्च भूतानां पश्यन् कर्माणि चारणैः ।
उदासीन इवाध्यक्षो वायुरात्मेव देहिनाम् ॥१२
नादण्डयं दण्डयत्येष सुतमात्मद्विषामपि ।
दण्डयत्यात्मजमपि दण्ड्यं धर्मपथे स्थितः ॥ १३
अस्याप्रतिहतं चक्रं पृथोरामानसाचलात् ।
वर्तते भगवानर्को यावत्तपति गोगणैः ॥ १४
रंजयिष्यति यल्लोकमयमात्मविचेष्टितैः ।
अथामुमाहू राजानं मनोरंजनकैः प्रजाः ॥ १५
दृढव्रतः सत्यसन्धो ब्रह्मण्यो वृद्धसेवकः ।
शरण्यः सर्वभूतानां मानदो दीनवत्सलः ॥१६
मातृभक्तिः परस्त्रीषु पत्न्यामर्ध इवात्मनः ।
प्रजासु पितृवत्स्निग्धः किङ्करो ब्रह्मवादिनाम् ॥१७
देहिनामात्मवत्प्रेष्ठः सुहृदां नन्दिवर्धनः ।
मुक्तसंगप्रसंगोऽयं दण्डपाणिरसाधुषु ॥१८
अयं तु साक्षाद्भगवांस्त्र्यधीशः कूटस्थ आत्मा कलयावतीर्णः । यस्मिन्नविद्यारचितं निरर्थकं पश्यन्ति नानात्वमपि प्रतीतम् ॥१९ अयं भुवो मण्डलमोदयाद्रे-गोप्तकवीरो नरदेवनाथः । आस्थाय जैत्रं रथमात्तचापः पर्यस्यते दक्षिणतो यथार्कः ॥२० अस्मै नृपालाः किल तत्र तत्र बलिं हरिष्यन्ति सलोकपालाः । मंस्यन्त एषां स्त्रिय आदिराजं चक्रायुधं तद्यश उद्धरन्त्यः ॥२१ जिस प्रकार प्राणियोंके भीतर रहनेवाला प्राणरूप सूत्रात्मा शरीरके भीतर - बाहरके ****** ebook converter DEMO Watermarks *******