श्रीगणेशाय नमः।

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 91–100

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 91–100

पृष्ठ 91

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* इति श्रीपद्मपुराणे उत्तरखण्डे श्रीमद्भागवतमाहात्म्ये भक्तिनारदसमागमो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥१ ॥

अट्टमन्नं शिवो वेदः शूलो विक्रय उच्यते । केशो भगमिति प्रोक्तमृषिभिस्तत्त्वदर्शिभिः

पृष्ठ 92

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अथ द्वितीयोऽध्यायः भक्तिका दुःख दूर करनेके लिये नारदजीका उद्योग नारद उवाच

वृथा खेदयसे बाले अहो चिन्तातुरा कथम् ।

श्रीकृष्णचरणाम्भोजं स्मर दुःखं गमिष्यति ॥१

द्रौपदी च परित्राता येन कौरवकश्मलात् ।

पालिता गोपसुन्दर्यः स कृष्णः क्वापि नो गतः ॥२

त्वं तु भक्तिः प्रिया तस्य सततं प्राणतोऽधिका ।

त्वयाऽऽहूतस्तु भगवान् याति नीचगृहेष्वपि ॥३

सत्यादित्रियुगे बोधवैराग्यौ मुक्तिसाधकौ ।

कलौ तु केवला भक्तिर्ब्रह्मसायुज्यकारिणी ॥४

इति निश्चित्य चिद्रूपः सद्रूपां त्वां ससर्ज ह ।

परमानन्दचिन्मूर्तिः सुन्दरीं कृष्णवल्लभाम् ॥५

नारदजीने कहा – बाले! तुम व्यर्थ ही अपनेको क्यों खेदमें डाल रही हो? अरे! तुम इतनी चिन्तातुर क्यों हो? भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलोंका चिन्तन करो, उनकी कृपासे तुम्हारा सारा दुःख दूर हो जायगा ॥ १ ॥ जिन्होंने कौरवोंके अत्याचारसे द्रौपदीकी रक्षा की थी

और गोपसुन्दरियोंको सनाथ किया था, वे श्रीकृष्ण कहीं चले थोड़े ही गये हैं ॥२ ॥ फिर तुम

तो भक्ति हो और सदा उन्हें प्राणोंसे भी प्यारी हो; तुम्हारे बुलानेपर तो भगवान् नीचोंके घरोंमें भी चले जाते हैं ॥३ ॥ सत्य, त्रेता और द्वापर – इन तीन युगोंमें ज्ञान और वैराग्य मुक्तिके

साधन थे; किन्तु कलियुगमें तो केवल भक्ति ही ब्रह्मसायुज्य ( मोक्ष ) - की प्राप्ति करानेवाली है ॥४ ॥ यह सोचकर ही परमानन्दचिन्मूर्ति ज्ञानस्वरूप श्रीहरिने अपने सत्स्वरूपसे तुम्हें रचा

है; तुम साक्षात् श्रीकृष्णचन्द्रकी प्रिया और परम सुन्दरी हो || ५ || एक बार जब तुमने हाथ जोड़कर पूछा था कि ‘ मैं क्या करूँ? ' तब भगवान्ने तुम्हें यही आज्ञा दी थी कि ' मेरे भक्तोंका पोषण करो । ' ॥६ ॥ तुमने भगवान्की वह आज्ञा स्वीकार कर ली; इससे तुमपर श्रीहरि बहुत

प्रसन्न हुए और तुम्हारी सेवा करनेके लिये मुक्तिको तुम्हें दासीके रूपमें दे दिया और इन ज्ञान-वैराग्यको पुत्रोंके रूपमें || ७ || तुम अपने साक्षात् स्वरूपसे वैकुण्ठधाममें ही भक्तोंका पोषण करती हो, भूलोकमें तो तुमने उनकी पुष्टिके लिये केवल छायारूप धारण कर रखा है ॥८ ॥

बद्ध्वाञ्जलिं त्वया पृष्टं किं करोमीति चैकदा ।

त्वां तदाऽऽज्ञापयत्कृष्णो मद्भक्तान् पोषयेति च ॥६

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अङ्गीकृतं त्वया तद्वै प्रसन्नोऽभूद्धरिस्तदा ।

मुक्तिं दासीं ददौ तुभ्यं ज्ञानवैराग्यकाविमौ ॥७

पोषणं स्वेन रूपेण वैकुण्ठे त्वं करोषि च ।

भूमौ भक्तविपोषाय छायारूपं त्वया कृतम् ॥८

मुक्ति ज्ञानं विरक्तिं च सह कृत्वा गता भुवि ।

कृतादिद्वापरस्यान्तं महानन्देन संस्थिता ॥९

कलौ मुक्तिः क्षयं प्राप्ता पाखण्डामयपीडिता ।

त्वदाज्ञया गता शीघ्रं वैकुण्ठं पुनरेव सा ॥१०

स्मृता त्वयापि चात्रैव मुक्तिरायाति याति च ।

पुत्रीकृत्य त्वयेमौ च पार्श्वे स्वस्यैव रक्षितौ ॥११

उपेक्षातः कलौ मन्दौ वृद्धौ जातौ सुतौ तव ।

तथापि चिन्तां मुञ्च त्वमुपायं चिन्तयाम्यहम् ॥१२

कलिना सदृशः कोऽपि युगो नास्ति वरानने ।

तस्मिंस्त्वां स्थापयिष्यामि गेहे गेहे जने जने ॥१३

अन्यधर्मांस्तिरस्कृत्य पुरस्कृत्य महोत्सवान् ।

तदा नाहं हरेर्दासो लोके त्वां न प्रवर्तये ॥ १४

त्वदन्विताश्च ये जीवा भविष्यन्ति कलाविह ।

पापिनोऽपि गमिष्यन्ति निर्भयं कृष्णमन्दिरम् ॥१५

येषां चित्ते वसेद्भक्तिः सर्वदा प्रेमरूपिणी ।

न ते पश्यन्ति कीनाशं स्वप्नेऽप्यमलमूर्तयः ॥१६

न प्रेतो न पिशाचो वा राक्षसो वासुरोऽपि वा ।

भक्तियुक्तमनस्कानां स्पर्शने न प्रभुर्भवेत् ॥१७

तब तुम मुक्ति, ज्ञान और वैराग्यको साथ लिये पृथ्वीतलपर आयीं और सत्ययुगसे द्वापरपर्यन्त बड़े आनन्दसे रहीं ॥९ ॥ कलियुगमें तुम्हारी दासी मुक्ति पाखण्डरूप रोगसे

पीड़ित होकर क्षीण होने लगी थी, इसलिये वह तो तुरन्त ही तुम्हारी आज्ञासे वैकुण्ठलोकको चली गयी ॥१० ॥ इस लोकमें भी तुम्हारे स्मरण करनेसे ही वह आती है और फिर चली

जाती है; किंतु इन ज्ञान - वैराग्यको तुमने पुत्र मानकर अपने पास ही रख छोड़ा है ॥११ ॥

फिर भी कलियुगमें इनकी उपेक्षा होनेके कारण तुम्हारे ये पुत्र उत्साहहीन और वृद्ध हो गये हैं; फिर भी तुम चिन्ता न करो, मैं इनके नवजीवनका उपाय सोचता हूँ ॥१२ ॥ सुमुखि! कलिके

समान कोई भी युग नहीं है, इस युगमें मैं तुम्हें घर - घरमें प्रत्येक पुरुषके हृदयमें स्थापित कर दूँगा ॥१३ ॥ देखो, अन्य सब धर्मोंको दबाकर और भक्तिविषयक महोत्सवोंको आगे रखकर

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यदि मैंने लोकमें तुम्हारा प्रचार न किया तो मैं श्रीहरिका दास नहीं ॥ १४ ॥ इस कलियुगमें जो

जीव तुमसे युक्त होंगे, वे पापी होनेपर भी बेखटके भगवान् श्रीकृष्णके अभय धामको प्राप्त होंगे ॥१५ ॥ जिनके हृदयमें निरन्तर प्रेमरूपिणी भक्ति निवास करती है, वे शुद्धान्तःकरण

पुरुष स्वप्नमें भी यमराजको नहीं देखते ॥ १६ ॥ जिनके हृदयमें भक्ति महारानीका निवास है,

उन्हें प्रेत, पिशाच, राक्षस या दैत्य आदि स्पर्श करनेमें भी समर्थ नहीं हो सकते ॥१७ ॥

न तपोभिर्न वेदैश्च न ज्ञानेनापि कर्मणा ।

हरिर्हि साध्यते भक्त्या प्रमाणं तत्र गोपिकाः ॥१८

नृणां जन्मसहस्रेण भक्तौ प्रीतिर्हि जायते ।

कलौ भक्तिः कलौ भक्तिर्भक्त्या कृष्णः पुरः स्थितः ॥१९

भक्तिद्रोहकरा ये च ते सीदन्ति जगत्त्रये ।

दुर्वासा दुःखमापन्नः पुरा भक्तविनिन्दकः ॥२०

अलं व्रतैरलं तीर्थैरलं योगैरलं मखैः ।

अलं ज्ञानकथालापैर्भक्तिरेकैव मुक्तिदा ॥२१

सूत उवाच

इति नारदनिर्णीतं स्वमाहात्म्यं निशम्य सा ।

सर्वाङ्गपुष्टिसंयुक्ता नारदं वाक्यमब्रवीत् ॥२२

भक्तिरुवाच

अहो नारद धन्योऽसि प्रीतिस्ते मयि निश्चला ।

न कदाचिद्विमुञ्चामि चित्ते स्थास्यामि सर्वदा ॥२३

कृपालुना त्वया साधो मद्बाधा ध्वंसिता क्षणात् ।

पुत्रयोश्चेतना नास्ति ततो बोधय बोधय ॥२४

सूत उवाच

तस्या वचः समाकर्ण्य कारुण्यं नारदो गतः ।

तयोर्बोधनमारेभे कराग्रेण विमर्दयन् ॥२५

मुखं संयोज्य कर्णान्ते शब्दमुच्चैः समुच्चरन् ।

ज्ञान प्रबुध्यतां शीघ्रं रे वैराग्य प्रबुध्यताम् ॥२६

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वेदवेदान्तघोषैश्च गीतापाठैर्मुहुर्मुहुः ।

बोध्यमानौ तदा तेन कथंचिच्चोत्थितौ बलात् ॥२७

नेत्रैरनवलोकन्तौ जृम्भन्तौ सालसावुभौ ।

बकवत्पलितौ प्रायः शुष्ककाष्ठसमाङ्गकौ ॥२८

तप, वेदाध्ययन, ज्ञान और कर्म आदि किसी भी साधनसे भगवान् वशमें नहीं किये जा सकते; वे केवल भक्तिसे ही वशीभूत होते हैं । इसमें श्रीगोपीजन प्रमाण हैं || १८ || मनुष्योंका सहस्रों जन्मके पुण्य - प्रतापसे भक्तिमें अनुराग होता है । कलियुगमें केवल भक्ति, केवल भक्ति ही सार है । भक्तिसे तो साक्षात् श्रीकृष्णचन्द्र सामने उपस्थित हो जाते हैं ॥१९ ॥ जो लोग

भक्तिसे द्रोह करते हैं वे तीनों लोकोंमें दुःख ही दुःख पाते हैं । पूर्वकालमें भक्तका तिरस्कार करनेवाले दुर्वासा ऋषिको बड़ा कष्ट उठाना पड़ा था ॥२० ॥ बस, बस —व्रत, तीर्थ, योग,

यज्ञ और ज्ञानचर्चा आदि बहुत - से साधनोंकी कोई आवश्यकता नहीं है; एकमात्र भक्ति ही मुक्ति देनेवाली है ॥२१ ॥

सूतजी कहते हैं – इस प्रकार नारदजीके निर्णय किये हुए अपने माहात्म्यको सुनकर भक्तिके सारे अंग पुष्ट हो गये और वे उनसे कहने लगीं ॥२२ ॥

भक्तिने कहा – नारदजी! आप धन्य हैं । आपकी मुझमें निश्चल प्रीति है । मैं सदा आपके हृदयमें रहूँगी, कभी आपको छोड़कर नहीं जाऊँगी ॥ २३ ॥ साधो! आप बड़े कृपालु हैं ।

आपने क्षणभरमें ही मेरा सारा दुःख दूर कर दिया । किन्तु अभी मेरे पुत्रोंमें चेतना नहीं आयी है; आप इन्हें शीघ्र ही सचेत कर दीजिये, जगा दीजिये ॥२४ ॥

सूतजी कहते हैं- भक्तिके ये वचन सुनकर नारदजीको बड़ी करुणा आयी और वे उन्हें हाथसे हिला - डुलाकर जगाने लगे || २५ || फिर उनके कानके पास मुँह लगाकर जोरसे कहा, ‘ ओ ज्ञान! जल्दी जग पड़ो; ओ वैराग्य! जल्दी जग पड़ो । ' || २६ || फिर उन्होंने वेदध्वनि, वेदान्तघोष और बार - बार गीतापाठ करके उन्हें जगाया; इससे वे जैसे - तैसे बहुत जोर लगाकर उठे ॥२७ ॥ किन्तु आलस्यके कारण वे दोनों जँभाई लेते रहे, नेत्र उघाड़कर देख भी नहीं

सके । उनके बाल बगुलोंकी तरह सफेद हो गये थे, उनके अंग प्रायः सूखे काठके समान निस्तेज और कठोर हो गये थे ॥२८ ॥ इस प्रकार भूख - प्यासके मारे अत्यन्त दुर्बल होनेके

कारण उन्हें फिर सोते देख नारदजीको बड़ी चिन्ता हुई और वे सोचने लगे, ' अब मुझे क्या करना चाहिये? ॥२९ ॥ इनकी यह नींद और इससे भी बढ़कर इनकी वृद्धावस्था कैसे दूर

हो? ' शौनकजी! इस प्रकार चिन्ता करते - करते वे भगवान्का स्मरण करने लगे ॥३० ॥ उसी

समय यह आकाशवाणी हुई कि ' मुने! खेद मत करो, तुम्हारा यह उद्योग निःसंदेह सफल होगा ॥३१ ॥ देवर्षे! इसके लिये तुम एक सत्कर्म करो, वह कर्म तुम्हें संतशिरोमणि

महानुभाव बतायेंगे ॥३२ ॥ उस सत्कर्मका अनुष्ठान करते ही क्षणभरमें इनकी नींद और

वृद्धावस्था चली जायँगी तथा सर्वत्र भक्तिका प्रसार होगा ' || ३३ || यह आकाशवाणी वहाँ सभीको साफ - साफ सुनाई दी । इससे नारदजीको बड़ा विस्मय हुआ और वे कहने लगे, ' मुझे तो इसका कुछ आशय समझमें नहीं आया ' ॥३४ ॥

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क्षुत्क्षामौ तौ निरीक्ष्यैव पुनः स्वापपरायणौ ।

ऋषिश्चिन्तापरो जातः किं विधेयं मयेति च ॥२९

अहो निद्रा कथं याति वृद्धत्वं च महत्तरम् ।

चिन्तयन्निति गोविन्दं स्मारयामास भार्गव ॥३०

व्योमवाणी तदैवाभून्मा ऋषे खिद्यतामिति ।

उद्यमः सफलस्तेऽयं भविष्यति न संशयः ॥३१

एतदर्थं तु सत्कर्म सुरर्षे त्वं समाचर ।

तत्ते कर्माभिधास्यन्ति साधवः साधुभूषणाः ॥३२

सत्कर्मणि कृते तस्मिन् सनिद्रा वृद्धतानयोः ।

गमिष्यति क्षणाद्भक्तिः सर्वतः प्रसरिष्यति ॥३३

इत्याकाशवचः स्पष्टं तत्सर्वैरपि विश्रुतम् ।

नारदो विस्मयं लेभे नेदं ज्ञातमिति ब्रुवन् ॥३४

नारद उवाच

अनयाऽऽकाशवाण्यापि गोप्यत्वेन निरूपितम् ।

किं वा तत्साधनं कार्यं येन कार्यं भवेत्तयोः ॥ ३५

क्व भविष्यन्ति सन्तस्ते कथं दास्यन्ति साधनम् ।

मयात्र किं प्रकर्तव्यं यदुक्तं व्योमभाषया ॥३६

सूत उवाच

तत्र द्वावपि संस्थाप्य निर्गतो नारदो मुनिः ।

तीर्थं तीर्थं विनिष्क्रम्य पृच्छन्मार्गे मुनीश्वरान् ॥३७

वृत्तान्तः श्रूयते सर्वैः किञ्चिन्निश्चित्य नोच्यते ।

असाध्यं केचन प्रोचुर्दुर्ज्ञेयमिति चापरे ।

मूकीभूतास्तथान्ये तु कियन्तस्तु पलायिताः ॥ ३८

नारदजी बोले — इस आकाशवाणीने भी गुप्त रूपमें ही बात कही है । यह नहीं बताया कि वह कौन - सा साधन किया जाय जिससे इनका कार्य सिद्ध हो ॥ ३५ ॥ वे संत न जाने

कहाँ मिलेंगे और किस प्रकार उस साधनको बतायेंगे? अब आकाश - वाणीने जो कुछ कहा है, उसके अनुसार मुझे क्या करना चाहिये? ॥ ३६ ॥

सूतजी कहते हैं— शौनकजी! तब ज्ञान - वैराग्य दोनोंको वहीं छोड़कर नारदमुनि वहाँसे

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चल पड़े और प्रत्येक तीर्थमें जा - जाकर मार्गमें मिलनेवाले मुनीश्वरोंसे वह साधन पूछने लगे ॥३७ ॥ उनकी उस बातको सुनते तो सब थे, किंतु उसके विषयमें कोई कुछ भी निश्चित

उत्तर न देता । किन्हींने उसे असाध्य बताया; कोई बोले — ' इसका ठीक - ठीक पता लगना ही कठिन है । ' कोई सुनकर चुप रह गये और कोई - कोई तो अपनी अवज्ञा होनेके भयसे बातको टाल - टूलकर खिसक गये ॥ ३८ ॥ त्रिलोकीमें महान् आश्चर्यजनक हाहाकार मच गया । लोग

आपसमें कानाफूसी करने लगे – ' भाई! जब वेदध्वनि, वेदान्तघोष और बार - बार गीतापाठ सुनानेपर भी भक्ति, ज्ञान और वैराग्य – ये तीनों नहीं जगाये जा सके, तब और कोई उपाय नहीं है ॥३९ -४० ॥ स्वयं योगिराज नारदको भी जिसका ज्ञान नहीं है, उसे दूसरे संसारी लोग कैसे बता सकते हैं? ' ॥४१ ॥ इस प्रकार जिन - जिन ऋषियोंसे इसके विषयमें पूछा गया,

उन्होंने निर्णय करके यही कहा कि यह बात दुःसाध्य ही है ॥४२ ॥

हाहाकारो महानासीत्त्रैलोक्ये विस्मयावहः ।

वेदवेदान्तघोषैश्च गीतापाठैर्विबोधितम् ॥३९

भक्तिज्ञानविरागाणां नोदतिष्ठत्त्रिकं यदा ।

उपायो नापरोऽस्तीति कर्णे कर्णेऽजपञ्जनाः ॥४०

योगिना नारदेनापि स्वयं न ज्ञायते तु यत् ।

तत्कथं शक्यते वक्तुमितरैरिह मानुषैः ॥४१

एवमृषिगणैः पृष्टैर्निर्णीयोक्तं दुरासदम् ॥४२

ततश्चिन्तातुरः सोऽथ बदरीवनमागतः ।

तपश्चरामि चात्रेति तदर्थं कृतनिश्चयः ॥४३

तावद्ददर्श पुरतः सनकादीन्मुनीश्वरान् ।

कोटिसूर्यसमाभासानुवाच मुनिसत्तमः ॥४४

नारद उवाच

इदानीं भूरिभाग्येन भवद्भिः सङ्गमोऽभवत् ।

कुमारा ब्रुवतां शीघ्रं कृपां कृत्वा ममोपरि ॥४५

भवन्तो योगिनः सर्वे बुद्धिमन्तो बहुश्रुताः ।

पञ्चहायनसंयुक्ताः पूर्वेषामपि पूर्वजाः ॥४६

सदा वैकुण्ठनिलया हरिकीर्तनतत्पराः ।

लीलामृतरसोन्मत्ताः कथामात्रैकजीविनः ॥ ४७

हरिः शरणमेवं हि नित्यं येषां मुखे वचः ।

अतः कालसमादिष्टा जरा युष्मान्न बाधते ॥४८

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येषां भ्रूभङ्गमात्रेण द्वारपालौ हरेः पुरा ।

भूमौ निपतितौ सद्यो यत्कृपातः पुरं गतौ ॥४९

अहो भाग्यस्य योगेन दर्शनं भवतामिह ।

अनुग्रहस्तु कर्तव्यो मयि दीने दयापरैः ॥५०

तब नारदजी बहुत चिन्तातुर हुए और बदरीवनमें आये । ज्ञान - वैराग्यको जगानेके लिये वहाँ उन्होंने यह निश्चय किया कि ' मैं तप करूँगा ' ॥४३ ॥ इसी समय उन्हें अपने सामने

करोड़ों सूर्योंके समान तेजस्वी सनकादि मुनीश्वर दिखायी दिये । उन्हें देखकर वे मुनिश्रेष्ठ कहने लगे ॥४४ ॥

नारदजीने कहा – महात्माओ! इस समय बड़े भाग्यसे मेरा आपलोगोंके साथ समागम हुआ है, आप मुझपर कृपा करके शीघ्र ही वह साधन बताइये ॥ ४५ ॥ आप सभी लोग बड़े

योगी, बुद्धिमान और विद्वान् हैं । आप देखनेमें पाँच - पाँच वर्षके बालक - से जान पड़ते हैं, किंतु हैं पूर्वजोंके भी पूर्वज ॥ ४६ ॥ आपलोग सदा वैकुण्ठधाममें निवास करते हैं, निरन्तर

हरिकीर्तनमें तत्पर रहते हैं, भगवल्लीलामृतका रसास्वादन कर सदा उसीमें उन्मत्त रहते हैं और एकमात्र भगवत्कथा ही आपके जीवनका आधार है ॥४७ ॥ ' हरिः शरणम् ' ( भगवान् ही

हमारे रक्षक हैं ) यह वाक्य ( मन्त्र ) सर्वदा आपके मुखमें रहता है; इसीसे कालप्रेरित वृद्धावस्था भी आपको बाधा नहीं पहुँचाती ॥। ४८ ॥ पूर्वकालमें आपके भ्रूभंगमात्रसे भगवान् विष्णुके द्वारपाल जय और विजय तुरंत पृथ्वीपर गिर गये थे और फिर आपकी ही कृपासे वे पुनः वैकुण्ठलोक पहुँच गये ॥ ४ ९ ॥ धन्य है, इस समय आपका दर्शन बड़े सौभाग्यसे ही हुआ है । मैं बहुत दीन हूँ और आपलोग स्वभावसे ही दयालु हैं; इसलिये मुझपर आपको अवश्य कृपा करनी चाहिये ॥५० ॥

अशरीरगिरोक्तं यत्तत्किं साधनमुच्यताम् ।

अनुष्ठेयं कथं तावत्प्रब्रुवन्तु सविस्तरम् ॥५१

भक्तिज्ञानविरागाणां सुखमुत्पद्यते कथम् ।

स्थापनं सर्ववर्णेषु प्रेमपूर्वं प्रयत्नतः ॥ ५२

कुमारा ऊचुः

मा चिन्तां कुरु देवर्षे हर्षं चित्ते समावह ।

उपायः सुखसाध्योऽत्र वर्तते पूर्व एव हि ॥५३

अहो नारद धन्योऽसि विरक्तानां शिरोमणिः ।

सदा श्रीकृष्णदासानामग्रणीर्योगभास्करः ॥ ५४

त्वयि चित्रं न मन्तव्यं भक्त्यर्थमनुवर्तिनि ।

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घटते कृष्णदासस्य भक्तेः संस्थापना सदा ॥ ५५

ऋषिभिर्बहवो लोके पन्थानः प्रकटीकृताः ।

श्रमसाध्याश्च ते सर्वे प्रायः स्वर्गफलप्रदाः ॥५६

वैकुण्ठसाधकः पन्थाः स तु गोप्यो हि वर्तते ।

तस्योपदेष्टा पुरुषः प्रायो भाग्येन लभ्यते ॥ ५७

सत्कर्म तव निर्दिष्टं व्योमवाचा तु यत्पुरा ।

तदुच्यते शृणुष्वाद्य स्थिरचित्तः प्रसन्नधीः ॥५८

द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे ।

स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च ते तु कर्मविसूचकाः ॥५९

सत्कर्मसूचको नूनं ज्ञानयज्ञः स्मृतो बुधैः ।

श्रीमद्भागवतालापः स तु गीतः शुकादिभिः ॥ ६०

भक्तिज्ञानविरागाणां तद्घोषेण बलं महत् ।

व्रजिष्यति द्वयोः कष्टं सुखं भक्तेर्भविष्यति ॥६१

प्रलयं हि गमिष्यन्ति श्रीमद्भागवतध्वनेः ।

कलेर्दोषा इमे सर्वे सिंहशब्दाद् वृका इव ॥ ६२

बताइये — आकाशवाणीने जिसके विषयमें कहा है, वह कौन - सा साधन है, और मुझे

किस प्रकार उसका अनुष्ठान करना चाहिये । आप इसका विस्तारसे वर्णन कीजिये ॥ ५१ ॥

भक्ति, ज्ञान और वैराग्यको किस प्रकार सुख मिल सकता है? और किस तरह इनकी प्रेमपूर्वक सब वर्णोंमें प्रतिष्ठा की जा सकती है? ' ॥५२ ॥

सनकादिने कहा — देवर्षे! आप चिन्ता न करें, मनमें प्रसन्न हों; उनके उद्धारका एक सरल उपाय पहलेसे ही विद्यमान है ॥ ५३ ॥ नारदजी! आप धन्य हैं । आप विरक्तोंके

शिरोमणि हैं । श्रीकृष्ण - दासोंके शाश्वत पथ - प्रदर्शक एवं भक्तियोगके भास्कर हैं ॥५४ ॥ आप

भक्तिके लिये जो उद्योग कर रहे हैं, यह आपके लिये कोई आश्चर्यकी बात नहीं समझनी चाहिये । भगवान्के भक्तके लिये तो भक्तिकी सम्यक् स्थापना करना सदा उचित ही है ॥५५ ॥ ऋषियोंने संसारमें अनेकों मार्ग प्रकट किये हैं; किंतु वे सभी कष्टसाध्य हैं और

परिणाममें प्रायः स्वर्गकी ही प्राप्ति करानेवाले हैं ॥ ५६ ॥ अभीतक भगवान्की प्राप्ति

करानेवाला मार्ग तो गुप्त ही रहा है । उसका उपदेश करनेवाला पुरुष प्रायः भाग्यसे ही मिलता है ॥५७ ॥ आपको आकाशवाणीने जिस सत्कर्मका संकेत किया है, उसे हम बतलाते हैं;

आप प्रसन्न और समाहितचित्त होकर सुनिये ॥५८ ॥

नारदजी! द्रव्ययज्ञ, तपोयज्ञ, योगयज्ञ और स्वाध्यायरूप ज्ञानयज्ञ – ये सब तो स्वर्गादिकी प्राप्ति करानेवाले कर्मकी ही ओर संकेत करते हैं ॥५९ ॥ पण्डितोंने ज्ञानयज्ञको

ही सत्कर्म ( मुक्तिदायक कर्म ) - का सूचक माना है । वह श्रीमद्भागवतका पारायण है, जिसका

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गान शुकादि महानुभावोंने किया है ॥ ६० ॥ उसके शब्द सुननेसे ही भक्ति, ज्ञान और

वैराग्यको बड़ा बल मिलेगा । इससे ज्ञान - वैराग्यका कष्ट मिट जायगा और भक्तिको आनन्द मिलेगा ॥६१ ॥ सिंहकी गर्जना सुनकर जैसे भेड़िये भाग जाते हैं, उसी प्रकार

श्रीमद्भागवतकी ध्वनिसे कलियुगके सारे दोष नष्ट हो जायँगे ॥६२ ॥

ज्ञानवैराग्यसंयुक्ता भक्तिः प्रेमरसावहा ।

प्रतिगेहं प्रतिजनं ततः क्रीडां करिष्यति ॥ ६३

नारद उवाच

वेदवेदान्तघोषैश्च गीतापाठैः प्रबोधितम् ।

भक्तिज्ञानविरागाणां नोदतिष्ठत्त्रिकं यदा ॥६४

श्रीमद्भागवतालापात्तत्कथं बोधमेष्यति ।

तत्कथासु तु वेदार्थः श्लोके श्लोके पदे पदे ॥६५

छिन्दन्तु संशयं ह्येनं भवन्तोऽमोघदर्शनाः ।

विलम्बो नात्र कर्तव्यः शरणागतवत्सलाः ॥६६

कुमारा ऊचुः

वेदोपनिषदां साराज्जाता भागवती कथा ।

अत्युत्तमा ततो भाति पृथग्भूता फलाकृतिः ॥ ६७

आमूलाग्रं रसस्तिष्ठन्नास्ते न स्वाद्यते यथा ।

स भूयः संपृथग्भूतः फले विश्वमनोहरः ॥६८

यथा दुग्धे स्थितं सर्पिर्न स्वादायोपकल्पते ।

पृथग्भूतं हि तद्गव्यं देवानां रसवर्धनम् ॥६९

ईक्षूणामपि मध्यान्तं शर्करा व्याप्य तिष्ठति ।

पृथग्भूता च सा मिष्टा तथा भागवती कथा ॥७०

इदं भागवतं नाम पुराणं ब्रह्मसम्मितम् ।

भक्तिज्ञानविरागाणां स्थापनाय प्रकाशितम् ॥७१

वेदान्तवेदसुस्नाते गीताया अपि कर्तरि ।

परितापवति व्यासे मुह्यत्यज्ञानसागरे ॥७२

तदा त्वया पुरा प्रोक्तं चतुःश्लोकसमन्वितम् ।

तदीयश्रवणात्सद्यो निर्बाधो बादरायणः ॥७३