श्रीगणेशाय नमः।

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 101–110

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 101–110

पृष्ठ 101

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तत्र ते विस्मयः केन यतः प्रश्नकरो भवान् ।

श्रीमद्भागवतं श्राव्यं शोकदुःखविनाशनम् ॥७४

तब प्रेमरस प्रवाहित करनेवाली भक्ति ज्ञान और वैराग्यको साथ लेकर प्रत्येक घर और व्यक्तिके हृदयमें क्रीड़ा करेगी ॥ ६३ ॥

नारदजीने कहा- मैंने वेद - वेदान्तकी ध्वनि और गीतापाठ करके उन्हें बहुत जगाया, किंतु फिर भी भक्ति, ज्ञान और वैराग्य – ये तीनों नहीं जगे ॥६४ ॥ ऐसी स्थितिमें

श्रीमद्भागवत सुनानेसे वे कैसे जगेंगे? क्योंकि उस कथाके प्रत्येक श्लोक और प्रत्येक पदमें भी वेदोंका ही तो सारांश है ॥ ६५ ॥ आपलोग शरणागतवत्सल हैं तथा आपका दर्शन कभी

व्यर्थ नहीं होता; इसलिये मेरा यह संदेह दूर कर दीजिये, इस कार्यमें विलम्ब न कीजिये ॥६६ ॥

सनकादिने कहा — श्रीमद्भागवतकी कथा वेद और उपनिषदोंके सारसे बनी है । इसलिये उनसे अलग उनकी फलरूपा होनेके कारण वह बड़ी उत्तम जान पड़ती है ॥ ६७ ॥ जिस

प्रकार रस वृक्षकी जड़से लेकर शाखाग्रपर्यन्त रहता है, किंतु इस स्थितिमें उसका आस्वादन नहीं किया जा सकता; वही जब अलग होकर फलके रूपमें आ जाता है, तब संसारमें सभीको प्रिय लगने लगता है ॥ ६८ ॥ दूधमें घी रहता ही है, किन्तु उस समय उसका अलग

स्वाद नहीं मिलता; वही जब उससे अलग हो जाता है, तब देवताओंके लिये भी स्वादवर्धक हो जाता है ॥६९ ॥ खाँड ईखके ओर - छोर और बीचमें भी व्याप्त रहती है, तथापि अलग

होनेपर उसकी कुछ और ही मिठास होती है । ऐसी ही यह भागवतकी कथा है ॥७० ॥ यह

भागवतपुराण वेदोंके समान है । श्रीव्यासदेवने इसे भक्ति, ज्ञान और वैराग्यकी स्थापनाके लिये प्रकाशित किया है ॥७१ ॥ पूर्वकालमें जिस समय वेद - वेदान्तके पारगामी और गीताकी भी

रचना करनेवाले भगवान् व्यासदेव खिन्न होकर अज्ञानसमुद्रमें गोते खा रहे थे, उस समय आपने ही उन्हें चार श्लोकोंमें इसका उपदेश किया था । उसे सुनते ही उनकी सारी चिन्ता दूर हो गयी थी ॥७२-७३ ॥ फिर इसमें आपको आश्चर्य क्यों हो रहा है, जो आप हमसे प्रश्न कर रहे हैं? आपको उन्हें शोक और दुःखका विनाश करनेवाला श्रीमद्भागवत - पुराण ही सुनाना चाहिये ॥७४ ॥

नारद उवाच यद्दर्शनं च विनिहन्त्यशुभानि सद्यः श्रेयस्तनोति भवदुःखदवार्दितानाम् । निःशेषशेषमुखगीतकथैकपानाः प्रेमप्रकाशकृतये शरणं गतोऽस्मि ॥७५ भाग्योदयेन बहुजन्मसमर्जितेन सत्सङ्गमं च लभते पुरुषो यदा वै ।

पृष्ठ 102

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अज्ञानहेतुकृतमोहमदान्धकार-नाशं विधाय हि तदोदयते विवेकः ॥७६ नारदजीने कहा- महानुभावो! आपका दर्शन जीवके सम्पूर्ण पापोंको तत्काल नष्ट कर देता है और जो संसार- दुःखरूप दावानलसे तपे हुए हैं उनपर शीघ्र ही शान्तिकी वर्षा करता है । आप निरन्तर शेषजीके सहस्र मुखोंसे गाये हुए भगवत्कथामृतका ही पान करते रहते हैं । मैं प्रेमलक्षणा भक्तिका प्रकाश करनेके उद्देश्यसे आपकी शरण लेता हूँ ॥ ७५ ॥ जब अनेकों

जन्मोंके संचित पुण्यपुंजका उदय होनेसे मनुष्यको सत्संग मिलता है, तब वह उसके अज्ञान-जनित मोह और मदरूप अन्धकारका नाश करके विवेक उदय होता है ॥७६ ॥

इति श्रीपद्मपुराणे उत्तरखण्डे श्रीमद्भागवतमाहात्म्ये कुमारनारदसंवादो नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥२ ॥

पृष्ठ 103

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अथ तृतीयोऽध्यायः भक्तिके कष्टकी निवृत्ति नारद उवाच

ज्ञानयज्ञं करिष्यामि शुकशास्त्रकथोज्ज्वलम् ।

भक्तिज्ञानविरागाणां स्थापनार्थं प्रयत्नतः ॥१

कुत्र कार्यो मया यज्ञः स्थलं तद्वाच्यतामिह ।

महिमा शुकशास्त्रस्य वक्तव्यो वेदपारगैः ॥२

कियद्भिर्दिवसैः श्राव्या श्रीमद्भागवती कथा ।

को विधिस्तत्र कर्तव्यो ममेदं ब्रुवतामितः ॥३

कुमारा ऊचुः शृणु नारद वक्ष्यामो विनम्राय विवेकिने गङ्गाद्वारसमीपे तु तटमानन्दनामकम् ॥४

नानाऋषिगणैर्जुष्टं देवसिद्धनिषेवितम् ।

नानातरुलताकीर्णं नवकोमलवालुकम् ॥५

रम्यमेकान्तदेशस्थं हेमपद्मसुसौरभम् ।

यत्समीपस्थजीवानां वैरं चेतसि न स्थितम् ॥६

नारदजी कहते हैं— अब मैं भक्ति, ज्ञान और वैराग्यको स्थापित करनेके लिये प्रयत्नपूर्वक श्रीशुकदेवजीके कहे हुए भागवतशास्त्रकी कथाद्वारा उज्ज्वल ज्ञानयज्ञ करूँगा ॥१ ॥ यह यज्ञ मुझे कहाँ करना चाहिये, आप इसके लिये कोई स्थान बता दीजिये ।

आपलोग वेदके पारगामी हैं, इसलिये मुझे इस शुकशास्त्रकी महिमा सुनाइये ॥२ ॥ यह भी

बताइये कि श्रीमद्भागवतकी कथा कितने दिनोंमें सुनानी चाहिये और उसके सुननेकी विधि क्या है ॥३ ॥

सनकादि बोले —– नारदजी! आप बड़े विनीत और विवेकी हैं । सुनिये, हम आपको ये सब बातें बताते हैं । हरिद्वारके पास आनन्द नामका एक घाट है || ४ || वहाँ अनेकों ऋषि रहते हैं तथा देवता और सिद्धलोग भी उसका सेवन करते रहते हैं । भाँति - भाँतिके वृक्ष और लताओंके कारण वह बड़ा सघन है और वहाँ बड़ी कोमल नवीन बालू बिछी हुई है ॥५ ॥ वह

घाट बड़ा ही सुरम्य और एकान्त प्रदेशमें है, वहाँ हर समय सुनहले कमलोंकी सुगन्ध आया करती है । उसके आस - पास रहनेवाले सिंह, हाथी आदि परस्पर - विरोधी जीवोंके चित्तमें भी

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वैरभाव नहीं है ॥६ ॥ वहाँ आप बिना किसी विशेष प्रयत्नके ही ज्ञानयज्ञ आरम्भ कर दीजिये,

उस स्थानपर कथामें अपूर्व रसका उदय होगा || ७ || भक्ति भी अपनी आँखोंके ही सामने निर्बल और जराजीर्ण अवस्थामें पड़े हुए ज्ञान और वैराग्यको साथ लेकर वहाँ आ जायगी ॥८ ॥ क्योंकि जहाँ भी श्रीमद्भागवतकी कथा होती है वहाँ ये भक्ति आदि अपने-आप पहुँच जाते हैं । वहाँ कानोंमें कथाके शब्द पड़नेसे ये तीनों तरुण हो जायँगे ॥९ ॥

ज्ञानयज्ञस्त्वया तत्र कर्तव्यो ह्यप्रयत्नतः ।

अपूर्वरसरूपा च कथा तत्र भविष्यति ॥७

पुरःस्थं निर्बलं चैव जराजीर्णकलेवरम् ।

तद्द्वयं च पुरस्कृत्य भक्तिस्तत्रागमिष्यति ॥८

यत्र भागवती वार्ता तत्र भक्त्यादिकं व्रजेत् ।

कथाशब्दं समाकर्ण्य तत्त्रिकं तरुणायते ॥९

सूत उवाच

एवमुक्त्वा कुमारास्ते नारदेन समं ततः ।

गङ्गातटं समाजग्मुः कथापानाय सत्वराः ॥१०

यदा यातास्तटं ते तु तदा कोलाहलोऽप्यभूत् ।

भूर्लोके देवलोके च ब्रह्मलोके तथैव च ॥११

श्रीभागवतपीयूषपानाय रसलम्पटाः ।

धावन्तोऽप्याययुः सर्वे प्रथमं ये च वैष्णवाः ॥१२

भृगुर्वसिष्ठश्च्यवनश्च गौतमो मेधातिथिर्देवलदेवरातौ । रामस्तथा गाधिसुतश्च शाकलो मृकण्डुपुत्रात्रिजपिप्पलादाः ॥ १३ योगेश्वरौ व्यासपराशरौ च छायाशुको जाजलिजह्नुमुख्याः । सर्वेऽप्यमी मुनिगणाः सहपुत्रशिष्याः स्वस्त्रीभिराययुरतिप्रणयेन युक्ताः ॥१४

वेदान्तानि च वेदाश्च मन्त्रास्तन्त्राः समूर्तयः ।

दशसप्तपुराणानि षट्शास्त्राणि तथाऽऽययुः ॥ १५

गङ्गाद्याः सरितस्तत्र पुष्करादिसरांसि च ।

क्षेत्राणि च दिशः सर्वा दण्डकादिवनानि च ॥१६

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नगादयो ययुस्तत्र देवगन्धर्वदानवाः ।

गुरुत्वात्तत्र नायातान्भृगुः सम्बोध्य चानयत् ॥१७

दीक्षिता नारदेनाथ दत्तमासनमुत्तमम् ।

कुमारा वन्दिताः सर्वैर्निषेदुः कृष्णतत्पराः ॥१८

वैष्णवाश्च विरक्ताश्च न्यासिनो ब्रह्मचारिणः ।

मुखभागे स्थितास्ते च तदग्रे नारदः स्थितः ॥१९

सूतजी कहते हैं - इस प्रकार कहकर नारदजीके साथ सनकादि भी श्रीमद्भागवतकथामृतका पान करनेके लिये वहाँसे तुरंत गंगातटपर चले आये ॥१० ॥ जिस

समय वे तटपर पहुँचे, भूलोक, देवलोक और ब्रह्मलोक - सभी जगह इस कथाका हल्ला हो गया ॥११ ॥ जो - जो भगवत्कथाके रसिक विष्णुभक्त थे, वे सभी श्रीमद्भागवतामृतका पान

करनेके लिये सबसे आगे दौड़ - दौड़कर आने लगे ॥१२ ॥ भृगु, वसिष्ठ, च्यवन, गौतम,

मेधातिथि, देवल, देवरात, परशुराम, विश्वामित्र, शाकल, मार्कण्डेय, दत्तात्रेय, पिप्पलाद, योगेश्वर व्यास और पराशर, छायाशुक, जाजलि और जह्नु आदि सभी प्रधान प्रधान मुनिगण अपने - अपने पुत्र, शिष्य और स्त्रियोंसमेत बड़े प्रेमसे वहाँ आये ॥१३-१४ ॥ इनके सिवा वेद, वेदान्त ( उपनिषद् ), मन्त्र, तन्त्र, सत्रह पुराण और छहों शास्त्र भी मूर्तिमान् होकर वहाँ उपस्थित हुए ॥१५ ॥

गंगा आदि नदियाँ, पुष्कर आदि सरोवर, कुरुक्षेत्र आदि समस्त क्षेत्र, सारी दिशाएँ, दण्डक आदि वन, हिमालय आदि पर्वत तथा देव, गन्धर्व और दानव आदि सभी कथा सुनने चले आये । जो लोग अपने गौरवके कारण नहीं आये, महर्षि भृगु उन्हें समझा - बुझाकर ले आये ॥१६-१७ ॥ तब कथा सुनानेके लिये दीक्षित होकर श्रीकृष्णपरायण सनकादि नारदजीके दिये हुए

श्रेष्ठ आसनपर विराजमान हुए । उस समय सभी श्रोताओंने उनकी वन्दना की ॥१८ ॥

श्रोताओंमें वैष्णव, विरक्त, संन्यासी और ब्रह्मचारी लोग आगे बैठे और उन सबके आगे नारदजी विराजमान हुए ॥१९ ॥

एकभागे ऋषिगणास्तदन्यत्र दिवौकसः ।

वेदोपनिषदोऽन्यत्र तीर्थान्यत्र स्त्रियोऽन्यतः ॥२०

जयशब्दो नमःशब्दः शङ्खशब्दस्तथैव च ।

चूर्णलाजाप्रसूनानां निक्षेपः सुमहानभूत् ॥२१

विमानानि समारुह्य कियन्तो देवनायकाः ।

कल्पवृक्षप्रसूनैस्तान् सर्वांस्तत्र समाकिरन् ॥२२

सूत उवाच

पृष्ठ 106

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एवं तेष्वेकचित्तेषु श्रीमद्भागवतस्य च ।

माहात्म्यमूचिरे स्पष्टं नारदाय महात्मने ॥२३

कुमारा ऊचुः

अथ ते वर्ण्यतेऽस्माभिर्महिमा शुकशास्त्रजः ।

यस्य श्रवणमात्रेण मुक्तिः करतले स्थिता ॥२४

सदा सेव्या सदा सेव्या श्रीमद्भागवती कथा ।

यस्याः श्रवणमात्रेण हरिश्चित्तं समाश्रयेत् ॥२५

ग्रन्थोऽष्टादशसाहस्रो द्वादशस्कन्धसम्मितः ।

परीक्षिच्छुकसंवादः शृणु भागवतं च तत् ॥२६

तावत्संसारचक्रेऽस्मिन् भ्रमतेऽज्ञानतः पुमान् ।

यावत्कर्णगता नास्ति शुकशास्त्रकथा क्षणम् ॥२७

किं श्रुतैर्बहुभिः शास्त्रैः पुराणैश्च भ्रमावहैः ।

एकं भागवतं शास्त्रं मुक्तिदानेन गर्जति ॥२८

कथा भागवतस्यापि नित्यं भवति यद्गृहे ।

तद्गृहं तीर्थरूपं हि वसतां पापनाशनम् ॥२९

अश्वमेधसहस्राणि वाजपेयशतानि च ।

शुकशास्त्रकथायाश्च कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥३०

तावत्पापानि देहेऽस्मिन्निवसन्ति तपोधनाः ।

यावन्न श्रूयते सम्यक् श्रीमद्भागवतं नरैः ॥३१

न गङ्गा न गया काशी पुष्करं न प्रयागकम् ।

शुकशास्त्रकथायाश्च फलेन समतां नयेत् ॥३२

एक ओर ऋषिगण, एक ओर देवता, एक ओर वेद और उपनिषदादि तथा एक ओर तीर्थ बैठे, और दूसरी ओर स्त्रियाँ बैठीं ॥ २० ॥ उस समय सब ओर जय - जयकार, नमस्कार

और शंखोंका शब्द होने लगा और अबीर - गुलाल, खील एवं फूलोंकी खूब वर्षा होने लगी ॥२१ ॥ कोई - कोई देवश्रेष्ठ तो विमानोंपर चढ़कर वहाँ बैठे हुए सब लोगोंपर कल्पवृक्षके

पुष्पोंकी वर्षा करने लगे ॥२२ ॥

सूतजी कहते हैं - इस प्रकार पूजा समाप्त होनेपर जब सब लोग एकाग्रचित्त हो गये, तब सनकादि ऋषि महात्मा नारदको श्रीमद्भागवतका माहात्म्य स्पष्ट करके सुनाने लगे ॥२३ ॥

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सनकादिने कहा — अब हम आपको इस भागवतशास्त्रकी महिमा सुनाते हैं । इसके श्रवणमात्रसे मुक्ति हाथ लग जाती है || २४ || श्रीमद्भागवतकी कथाका सदा - सर्वदा सेवन, आस्वादन करना चाहिये । इसके श्रवणमात्रसे श्रीहरि हृदयमें आ विराजते हैं || २५ || इस ग्रन्थमें अठारह हजार श्लोक और बारह स्कन्ध हैं तथा श्रीशुकदेव और राजा परीक्षित्का संवाद है । आप यह भागवतशास्त्र ध्यान देकर सुनिये ॥ २६ ॥ यह जीव तभीतक अज्ञानवश

इस संसारचक्रमें भटकता है, जबतक क्षणभरके लिये भी कानोंमें इस शुकशास्त्र - की कथा नहीं पड़ती ॥२७ ॥ बहुत - से शास्त्र और पुराण सुननेसे क्या लाभ है, इससे तो व्यर्थका भ्रम

बढ़ता है । मुक्ति देनेके लिये तो एकमात्र भागवतशास्त्र ही गरज रहा है ॥२८ ॥ जिस घरमें

नित्यप्रति श्रीमद्भागवतकी कथा होती है, वह तीर्थरूप हो जाता है और जो लोग उसमें रहते हैं, उनके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं ॥ २ ९ ॥ हजारों अश्वमेध और सैकड़ों वाजपेय यज्ञ इस शुकशास्त्रकी कथाका सोलहवाँ अंश भी नहीं हो सकते ॥ ३० ॥ तपोधनो! जबतक लोग

अच्छी तरह श्रीमद्भागवतका श्रवण नहीं करते, तभीतक उनके शरीरमें पाप निवास करते हैं ॥३१ ॥ फलकी दृष्टिसे इस शुकशास्त्रकथाकी समता गंगा, गया, काशी, पुष्कर या प्रयाग

- कोई तीर्थ भी नहीं कर सकता ॥३२ ॥

श्लोकार्थं श्लोकपादं वा नित्यं भागवतोद्भवम् ।

पठस्व स्वमुखेनैव यदीच्छसि परां गतिम् ॥३३

वेदादिर्वेदमाता च पौरुषं सूक्तमेव च ।

त्रयी भागवतं चैव द्वादशाक्षर एव च ॥३४

द्वादशात्मा प्रयागश्च कालः संवत्सरात्मकः ।

ब्राह्मणाश्चाग्निहोत्रं च सुरभिर्द्वादशी तथा ॥ ३५

तुलसी च वसन्तश्च पुरुषोत्तम एव च ।

एतेषां तत्त्वतः प्राज्ञैर्न पृथग्भाव इष्यते ॥३६

यश्च भागवतं शास्त्रं वाचयेदर्थतोऽनिशम् जन्मकोटिकृतं पापं नश्यते नात्र संशयः ॥ ३७

श्लोकार्थं श्लोकपादं वा पठेद्भागवतं च यः ।

नित्यं पुण्यमवाप्नोति राजसूयाश्वमेधयोः ॥ ३८

उक्तं भागवतं नित्यं कृतं च हरिचिन्तनम् ।

तुलसीपोषणं चैव धेनूनां सेवनं समम् ॥३९

अन्तकाले तु येनैव श्रूयते शुकशास्त्रवाक् ।

प्रीत्या तस्यैव वैकुण्ठं गोविन्दोऽपि प्रयच्छति ॥ ४०

हेमसिंहयुतं चैतद्वैष्णवाय ददाति च ।

कृष्णेन सह सायुज्यं स पुमाँल्लभते ध्रुवम् ॥४१

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आजन्ममात्रमपि येन शठेन किञ्चि-च्चित्तं विधाय शुकशास्त्रकथा न पीता । चाण्डालवच्च खरवद्वत तेन नीतं मिथ्या स्वजन्म जननीजनिदुःखभाजा ॥४२ जीवच्छवोनिगदितः स तु पापकर्मा

येन श्रुतं शुककथावचनं न किञ्चित् ।

धिक् तं नरं पशुसमं भुवि भाररूप-मेवं वदन्ति दिवि देवसमाजमुख्याः ॥४३

दुर्लभैव कथा लोके श्रीमद्भागवतोद्भवा ।

कोटिजन्मसमुत्थेन पुण्येनैव तु लभ्यते ॥४४

तेन योगनिधे धीमन् श्रोतव्या सा प्रयत्नतः ।

दिनानां नियमो नास्ति सर्वदा श्रवणं मतम् ॥४५

यदि आपको परम गतिकी इच्छा है तो अपने मुखसे ही श्रीमद्भागवतके आधे अथवा चौथाई श्लोकका भी नित्य नियमपूर्वक पाठ कीजिये || ३३ || ॐकार, गायत्री, पुरुषसूक्त, तीनों वेद, श्रीमद्भागवत ' ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ' - यह द्वादशाक्षर मन्त्र, बारह मूर्तियोंवाले सूर्य भगवान्, प्रयाग, संवत्सररूप काल, ब्राह्मण, अग्निहोत्र, गौ, द्वादशी तिथि, तुलसी, वसन्त ऋतु और भगवान् पुरुषोत्तम - इन सबमें बुद्धिमान् लोग वस्तुतः कोई अन्तर नहीं मानते ॥३४-३६ ॥ जो पुरुष अहर्निश अर्थसहित श्रीमद्भागवतशास्त्रका पाठ करता है, उसके करोड़ों जन्मोंका पाप नष्ट हो जाता है - इसमें तनिक भी संदेह नहीं है ॥ ३७ ॥ जो

पुरुष नित्यप्रति भागवतका आधा या चौथाई श्लोक भी पढ़ता है, उसे राजसूय और अश्वमेधयज्ञोंका फल मिलता है ॥ ३८ ॥ नित्य भागवतका पाठ करना, भगवान्का चिन्तन

करना, तुलसीको सींचना और गौकी सेवा करना – ये चारों समान हैं || ३ ९ || जो पुरुष अन्तसमयमें श्रीमद्भागवतका वाक्य सुन लेता है, उसपर प्रसन्न होकर भगवान् उसे वैकुण्ठधाम देते हैं ॥४० ॥ जो पुरुष इसे सोनेके सिंहासनपर रखकर विष्णुभक्तको दान

करता है, वह अवश्य ही भगवान्का सायुज्य प्राप्त करता है ॥४१ ॥

जिस दुष्टने अपनी सारी आयुमें चित्तको एकाग्र करके श्रीमद्भागवतामृतका थोड़ा - सा भी रसास्वादन नहीं किया, उसने तो अपना सारा जन्म चाण्डाल और गधेके समान व्यर्थ ही गँवा दिया; वह तो अपनी माताको प्रसव पीड़ा पहुँचानेके लिये ही उत्पन्न हुआ ॥ ४२ ॥

जिसने इस शुकशास्त्रके थोड़े - से भी वचन नहीं सुने, वह पापात्मा तो जीता हुआ ही मुर्देके समान है । ‘ पृथ्वीके भारस्वरूप उस पशुतुल्य मनुष्यको धिक्कार है ' —यों स्वर्गलोकमें देवताओंमें प्रधान इन्द्रादि कहा करते हैं ॥४३ ॥

संसारमें श्रीमद्भागवतकी कथाका मिलना अवश्य ही कठिन है; जब करोड़ों जन्मोंका पुण्य होता है, तभी इसकी प्राप्ति होती है ॥४४ ॥ नारदजी! आप बड़े ही बुद्धिमान् और

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योगनिधि हैं । आप प्रयत्नपूर्वक कथाका श्रवण कीजिये । इसे सुननेके लिये दिनोंका कोई नियम नहीं है, इसे तो सर्वदा ही सुनना अच्छा है ॥४५ ॥ इसे सत्यभाषण और

ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक सर्वदा ही सुनना श्रेष्ठ माना गया है । किन्तु कलियुगमें ऐसा होना कठिन है; इसलिये इसकी शुकदेवजीने जो विशेष विधि बतायी है, वह जान लेनी चाहिये ॥४६ ॥

कलियुगमें बहुत दिनोंतक चित्तकी वृत्तियोंको वशमें रखना, नियमोंमें बँधे रहना और किसी पुण्यकार्यके लिये दीक्षित रहना कठिन है; इसलिये सप्ताहश्रवणकी विधि है ॥ ४७ ॥

श्रद्धापूर्वक कभी भी श्रवण करनेसे अथवा माघमासमें श्रवण करनेसे जो फल होता है, वही फल श्रीशुकदेवजीने सप्ताह श्रवणमें निर्धारित किया है ॥४८ ॥ मनके असंयम, रोगोंकी

बहुलता और आयुकी अल्पताके कारण तथा कलियुगमें अनेकों दोषोंकी सम्भावनासे ही सप्ताहश्रवणका विधान किया गया है ॥ ४ ९ ॥ जो फल तप, योग और समाधिसे भी प्राप्त नहीं हो सकता, वह सर्वांगरूपमें सप्ताहश्रवणसे सहजमें ही मिल जाता है ॥ ५० ॥

सप्ताहश्रवण यज्ञसे बढ़कर है, व्रतसे बढ़कर है, तपसे कहीं बढ़कर है । तीर्थसेवनसे तो सदा ही बड़ा है, योगसे बढ़कर है — यहाँतक कि ध्यान और ज्ञानसे भी बढ़कर है, अजी! इसकी विशेषताका कहाँतक वर्णन करें, यह तो सभीसे बढ़ - चढ़कर है ॥ ५१-५२ ॥

सत्येन ब्रह्मचर्येण सर्वदा श्रवणं मतम् ।

अशक्यत्वात्कलौ बोध्यो विशेषोऽत्र शुकाज्ञया ॥४६

मनोवृत्तिजयश्चैव नियमाचरणं तथा ।

दीक्षा कर्तुमशक्यत्वात्सप्ताहश्रवणं मतम् ॥४७

श्रद्धातः श्रवणे नित्यं माघे तावद्धि यत्फलम् ।

तत्फलं शुकदेवेन सप्ताहश्रवणे कृतम् ॥४८

मनसश्चाजयाद्रोगात्पुंसां चैवायुषः क्षयात् ।

कलेर्दोषबहुत्वाच्च सप्ताहश्रवणं मतम् ॥४९

यत्फलं नास्ति तपसा न योगेन समाधिना ।

अनायासेन तत्सर्वं सप्ताहश्रवणे लभेत् ॥५०

यज्ञाद्गर्जति सप्ताहः सप्ताहो गर्जति व्रतात् ।

तपसो गर्जति प्रोच्चैस्तीर्थान्नित्यं हि गर्जति ॥५१

योगाद्गर्जति सप्ताहो ध्यानाज्ज्ञानाच्च गर्जति ।

किं ब्रूमो गर्जनं तस्य रे रे गर्जति गर्जति ॥५२

शौनक उवाच साश्चर्यमेतत्कथितं कथानकं ज्ञानादिधर्मान् विगणय्य साम्प्रतम् ।

पृष्ठ 110

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निःश्रेयसे भागवतं पुराणं जातं कुतो योगविदादिसूचकम् ॥५३ सूत उवाच

यदा कृष्णो धरां त्यक्त्वा स्वपदं गन्तुमुद्यतः ।

एकादशं परिश्रुत्याप्युद्धवो वाक्यमब्रवीत् ॥५४

उद्धव उवाच

त्वं तु यास्यसि गोविन्द भक्तकार्यं विधाय च ।

मच्चित्ते महती चिन्ता तां श्रुत्वा सुखमावह ॥५५

शौनकजीने पूछा — सूतजी! यह तो आपने बड़े आश्चर्यकी बात कही । अवश्य ही यह भागवतपुराण योगवेत्ता ब्रह्माजीके भी आदिकारण श्रीनारायणका निरूपण करता है; परन्तु यह मोक्षकी प्राप्तिमें ज्ञानादि सभी साधनोंका तिरस्कार करके इस युगमें उनसे भी कैसे बढ़ गया? ॥५३ ॥

सूतजीने कहा— शौनकजी! जब भगवान् श्रीकृष्ण इस धराधामको छोड़कर अपने नित्यधामको जाने लगे, तब उनके मुखारविन्दसे एकादश स्कन्धका ज्ञानोपदेश सुनकर भी उद्धवजीने पूछा ॥५४ ॥

उद्धवजी बोले — गोविन्द! अब आप तो अपने भक्तोंका कार्य करके परमधामको पधारना चाहते हैं; किन्तु मेरे मनमें एक बड़ी चिन्ता है । उसे सुनकर आप मुझे शान्त कीजिये ॥५५ ॥ अब घोर कलिकाल आया ही समझिये, इसलिये संसारमें फिर अनेकों दुष्ट

प्रकट हो जायँगे; उनके संसर्गसे जब अनेकों सत्पुरुष भी उग्र प्रकृतिके हो जायँगे, तब उनके भारसे दबकर यह गोरूपिणी पृथ्वी किसकी शरणमें जायगी? कमलनयन! मुझे तो आपको छोड़कर इसकी रक्षा करनेवाला कोई दूसरा नहीं दिखायी देता ॥ ५६-५७ ॥ इसलिये भक्तवत्सल! आप साधुओंपर कृपा करके यहाँसे मत जाइये । भगवन्! आपने निराकार और चिन्मात्र होकर भी भक्तोंके लिये ही तो यह सगुण रूप धारण किया है ॥५८ ॥ फिर भला,

आपका वियोग होनेपर वे भक्तजन पृथ्वीपर कैसे रह सकेंगे? निर्गुणोपासनामें तो बड़ा कष्ट है । इसलिये कुछ और विचार कीजिये ॥५९ ॥

आगतोऽयं कलिर्घोरो भविष्यन्ति पुनः खलाः ।

तत्सङ्गेनैव सन्तोऽपि गमिष्यन्त्युग्रतां यदा ॥५६

तदा भारवती भूमिर्गोरूपेयं कमाश्रयेत् ।

अन्यो न दृश्यते त्राता त्वत्तः कमललोचन ॥५७