श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 971–980

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 971–980

पृष्ठ 971

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अथ षष्ठोऽध्यायः ऋषभदेवजीका देहत्याग राजोवाच न नूनं भगव आत्मारामाणां योगसमीरित - ज्ञानावभर्जितकर्मबीजानामैश्वर्याणि पुनः क्लेशदानि भवितुमर्हन्ति यदृच्छयोपगतानि ॥१ ॥

ऋषिरुवाच सत्यमुक्तं किन्त्विह वा एके न मनसोऽद्धा विश्रम्भमनवस्थानस्य शठकिरात इव संगच्छन्ते ॥२ ॥

तथा चोक्तम्-न कुर्यात्कर्हिचित्सख्यं मनसि ह्यनवस्थिते ।

यद्विश्रम्भाच्चिराच्चीर्णं चस्कन्द तप ऐश्वरम् ॥३

नित्यं ददाति कामस्य च्छिद्रं तमनु येऽरयः ।

योगिनः कृतमैत्रस्य पत्युर्जायेव पुंश्चली ॥४

कामो मन्युर्मदो लोभः शोकमोहभयादयः ।

कर्मबन्धश्च यन्मूलः स्वीकुर्यात्को नु तद् बुधः ॥ ५

अथैवमखिललोकपालललामोऽपि विलक्षणैर्जडवदवधूतवेषभाषाचरितैरविलक्षित भगवत्प्रभावो योगिनां साम्परायविधिमनु - शिक्षयन् जिहासुरात्मन्यात्मानम् स्वकलेवरं असंव्यवहितमनर्थान्तरभावेनान्वीक्षमाण उपरतानु - वृत्तिरुपरराम ॥ ६ ॥

राजा परीक्षितने पूछा – भगवन्! योगरूप वायुसे प्रज्वलित हुई ज्ञानाग्निसे जिनके रागादि कर्मबीज दग्ध हो गये हैं - उन आत्माराम मुनियोंको दैववश यदि स्वयं ही अणिमादि सिद्धियाँ प्राप्त हो जायँ, तो वे उनके राग - द्वेषादि क्लेशोंका कारण तो किसी प्रकार हो नहीं सकतीं । फिर भगवान् ऋषभने उन्हें स्वीकार क्यों नहीं किया? ॥१ ॥

श्रीशुकदेवजीने कहा – तुम्हारा कहना ठीक है; किन्तु संसारमें जैसे चालाक व्याध अपने पकड़े हुए मृगका विश्वास नहीं करते, उसी प्रकार बुद्धिमान लोग इस चंचल चित्तका भरोसा नहीं करते ॥२ ॥ ऐसा ही कहा भी है- ' इस चंचल चित्तसे कभी मैत्री नहीं करनी चाहिये ।

इसमें विश्वास करनेसे ही मोहिनीरूपमें फँसकर महादेवजीका चिरकालका संचित तप क्षीण ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 972

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हो गया था ॥३ ॥ जैसे व्यभिचारिणी स्त्री जार पुरुषोंको अवकाश देकर उनके द्वारा अपनेमें

विश्वास रखनेवाले पतिका वध करा देती है— उसी प्रकार जो योगी मनपर विश्वास करते हैं, उनका मन काम और उसके साथी क्रोधादि शत्रुओंको आक्रमण करनेका अवसर देकर उन्हें नष्ट - भ्रष्ट कर देता है ॥४ ॥ काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह और भय आदि शत्रुओंका तथा कर्म-बन्धनका मूल तो यह मन ही है; इसपर कोई भी बुद्धिमान् कैसे विश्वास कर सकता

है? ॥५ ॥

इसीसे भगवान् ऋषभदेव यद्यपि इन्द्रादि सभी लोकपालोंके भी भूषणस्वरूप थे, तो भी वे जड पुरुषोंकी भाँति अवधूतोंके से विविध वेष, भाषा और आचरणसे अपने ईश्वरीय प्रभावको छिपाये रहते थे । अन्तमें उन्होंने योगियोंको देहत्यागकी विधि सिखानेके लिये अपना शरीर छोड़ना चाहा । वे अपने अन्तःकरणमें अभेदरूपसे स्थित परमात्माको अभिन्नरूपसे देखते हुए वासनाओंकी अनुवृत्तिसे छूटकर लिंगदेहके अभिमानसे भी मुक्त होकर उपराम हो गये ॥६ ॥

तस्य ह वा एवं मुक्तलिङ्गस्य भगवत ऋषभस्य योगमायावासनया देह इमां जगतीमभिमानाभासेन संक्रममाणः कोङ्कवेङ्क - कुटकान्दक्षिणकर्णाटकान्देशान् यदृच्छयोपगतः कुटकाचलोपवन आस्यकृताश्मकवल उन्माद इव मुक्तमूर्धजोऽसंवीत एव अथ 11011 समीरवेगविधूतवेणुविकर्षणजातोग्र-विचचार दावानलस्तद्वनमालेलिहानः सह तेन ददाह ॥ ८ ॥

यस्य किलानुचरितमुपाकर्ण्य कोङ्कवेङ्कङ्कुटकानां राजार्हन्नामोपशिक्ष्य कलावधर्म उत्कृष्यमाणे भवितव्येन विमोहितः स्वधर्मपथमकुतोभयमपहाय कुपथपाखण्डमस - मञ्जसं निजमनीषया मन्दः सम्प्रवर्तयिष्यते || ९ || येन ह वाव कलौ मनुजापसदा देवमायामोहिताः स्वविधिनियोगशौचचारित्रविहीना देवहेलनान्यप-व्रतानि निजनिजेच्छ्या गृह्णाना अस्नान - अनाचमन - अशौच- केशोल्लुञ्चनादीनि कलिना अधर्मबहुलेनोपहतधियो ब्रह्मब्राह्मणयज्ञपुरुष - लोकविदूषकाः प्रायेण भविष्यन्ति ॥१० ॥ ते च ह्यर्वाक्तनया निजलोकयात्रयान्ध-परम्परयाऽऽश्वस्तास्तमस्यन्धे स्वयमेव प्रपतिष्यन्ति ॥११ ॥

अयमवतारो रजसोपप्लुतकैवल्योपशिक्षणार्थः || १२ || तस्यानुगुणान् श्लोकान् गायन्ति— अहो भुवः सप्तसमुद्रवत्या द्वीपेषु वर्षेष्वधिपुण्यमेतत् । गायन्ति यत्रत्यजना मुरारेः कर्माणि भद्राण्यवतारवन्ति ॥१३ इस प्रकार लिंगदेहके अभिमानसे मुक्त भगवान् ऋषभदेवजीका शरीर योगमायाकी वासनासे केवल अभिमानाभासके आश्रय ही इस पृथ्वीतलपर विचरता रहा । वह दैववश कोंक, वेंक और दक्षिण आदि कुटक कर्णाटकके देशोंमें गया और मुँहमें पत्थरका टुकड़ा ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 973

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डाले तथा बाल बिखेरे उन्मत्तके समान दिगम्बररूपसे कुटकाचलके वनमें घूमने लगा ॥७ ॥

इसी समय झंझावातसे झकझोरे हुए बाँसोंके घर्षणसे प्रबल दावाग्नि धधक उठी और उसने सारे वनको अपनी लाल - लाल लपटोंमें लेकर ऋषभदेवजीके सहित भस्म कर दिया ॥ ८ ॥

राजन्! जिस समय कलियुगमें अधर्मकी वृद्धि होगी, उस समय कोंक, वेंक और कुटक देशका मन्दमति राजा अर्हत् वहाँके लोगोंसे ऋषभदेवजीके आश्रमातीत आचरणका वृत्तान्त सुनकर तथा स्वयं उसे ग्रहणकर लोगोंके पूर्वसंचित पापफलरूप होनहारके वशीभूत हो भयरहित स्वधर्म - पथका परित्याग करके अपनी बुद्धिसे अनुचित और पाखण्डपूर्ण कुमार्गका प्रचार करेगा ॥९ ॥ उससे कलियुगमें देवमायासे मोहित अनेकों अधम मनुष्य अपने

शास्त्रविहित शौच और आचारको छोड़ बैठेंगे । अधर्मबहुल कलियुगके प्रभावसे बुद्धिहीन हो जानेके कारण वे स्नान न करना, आचमन न करना, अशुद्ध रहना, केश नुचवाना आदि ईश्वरका तिरस्कार करनेवाले पाखण्डधर्मोंको मनमाने ढंगसे स्वीकार करेंगे और प्रायः वेद, ब्राह्मण एवं भगवान् यज्ञपुरुषकी निन्दा करने लगेंगे ॥१० ॥ वे अपनी इस नवीन अवैदिक

स्वेच्छाकृत प्रवृत्तिमें अन्धपरम्परासे विश्वास करके मतवाले रहनेके कारण स्वयं ही घोर नरकमें गिरेंगे ॥११ ॥

भगवान्का यह अवतार रजोगुणसे भरे हुए लोगोंको मोक्षमार्गकी शिक्षा देनेके लिये ही हुआ था ॥१२ ॥ इसके गुणोंका वर्णन करते हुए लोग इन वाक्योंको कहा करते हैं — ‘ अहो!

सात समुद्रोंवाली पृथ्वीके समस्त द्वीप और वर्षोंमें यह भारतवर्ष बड़ी ही पुण्यभूमि है, क्योंकि यहाँके लोग श्रीहरिके मंगलमय अवतार- चरित्रोंका गान करते हैं ॥१३ ॥ अहो! महाराज

प्रियव्रतका वंश बड़ा ही उज्ज्वल एवं सुयशपूर्ण है, जिसमें पुराणपुरुष श्रीआदिनारायणने ऋषभावतार लेकर मोक्षकी प्राप्ति करानेवाले पारमहंस्य धर्मका आचरण किया ॥१४ ॥

अहो! इन जन्मरहित भगवान् ऋषभदेवके मार्गपर कोई दूसरा योगी मनसे भी कैसे चल सकता है । क्योंकि योगीलोग जिन योगसिद्धियोंके लिये लालायित होकर निरन्तर प्रयत्न करते रहते हैं, उन्हें इन्होंने अपने - आप प्राप्त होनेपर भी असत् समझकर त्याग दिया था ॥१५ ॥

अहो नु वंशो यशसावदातः

प्रैयव्रतो यत्र पुमान् पुराणः ।

कृतावतारः पुरुषः स आद्य-श्चचार धर्मं यदकर्महेतुम् ॥१४

को न्वस्य ' काष्ठामपरोऽनुगच्छे-न्मनोरथेनाप्यभवस्य योगी । यो योगमायाः स्पृहयत्युदस्ता ह्यसत्तया येन कृतप्रयत्नाः ॥१५ इति ह स्म सकलवेदलोकदेवब्राह्मणगवां परमगुरोर्भगवत ऋषभाख्यस्य विशुद्धाचरित - मीरितं ’ पुंसां समस्तदुश्चरिताभिहरणं परममहामङ्गलायनमिदमनुश्रद्धयोपचितयानु - शृणोत्याश्रावयति वावहितो भगवति ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 974

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तस्मिन् वासुदेव एकान्ततो भक्तिरनयोरपि समनु - वर्तते ॥ १६ ॥ यस्यामेव कवय

आत्मानमविरतं विविधवृजिनसंसारपरितापोपतप्यमानमनुसवनं स्नापयन्तस्तयैव परया निर्वृत्त्या ह्यपवर्गमात्यन्तिकं परमपुरुषार्थमपि स्वयमासादितं नो एवाद्रियन्ते ४ भगवदीयत्वेनैव ' परिसमाप्त- सर्वार्थाः ॥१७ ॥

राजन् पतिर्गुरुरलं भवतां यदूनां दैवं प्रियः कुलपतिः क्व च किङ्करो वः । अस्त्वेवमङ्ग भगवान् भजतां मुकुन्दो मुक्तिं ददाति कर्हिचित्स्म न भक्तियोगम् ॥१८ राजन्! इस प्रकार सम्पूर्ण वेद, लोक, देवता, ब्राह्मण और गौओंके परमगुरु भगवान् ऋषभदेवका यह विशुद्ध चरित्र मैंने तुम्हें सुनाया । यह मनुष्योंके समस्त पापोंको हरनेवाला है । जो मनुष्य इस परम मंगलमय पवित्र चरित्रको एकाग्रचित्तसे श्रद्धापूर्वक निरन्तर सुनते या सुनाते हैं, उन दोनोंकी ही भगवान् वासुदेवमें अनन्यभक्ति हो जाती है ॥१६ ॥ तरह - तरहके

पापोंसे पूर्ण, सांसारिक तापोंसे अत्यन्त तपे हुए अपने अन्तःकरणको पण्डितजन इस भक्ति-सरितामें ही नित्य - निरन्तर नहलाते रहते हैं । इससे उन्हें जो परम शान्ति मिलती है, वह इतनी आनन्दमयी होती है कि फिर वे लोग उसके सामने, अपने ही आप प्राप्त हुए मोक्षरूप परम पुरुषार्थका भी आदर नहीं करते । भगवान्‌के निजजन हो जानेसे ही उनके समस्त पुरुषार्थ सिद्ध हो जाते हैं ॥१७ ॥

राजन्! भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं पाण्डवलोगोंके और यदुवंशियोंके रक्षक, गुरु, इष्टदेव, सुहृद् और कुलपति थे; यहाँतक कि वे कभी - कभी आज्ञाकारी सेवक भी बन जाते थे । इसी प्रकार भगवान् दूसरे भक्तोंके भी अनेकों कार्य कर सकते हैं और उन्हें मुक्ति भी दे देते हैं, परन्तु मुक्तिसे भी बढ़कर जो भक्तियोग है, उसे सहजमें नहीं देते ॥१८ ॥

नित्यानुभूतनिजलाभनिवृत्ततृष्णः

श्रेयस्यतद्रचनया चिरसुप्तबुद्धेः ।

लोकस्य यः करुणयाभयमात्मलोक-माख्यान्नमो भगवते ऋषभाय तस्मै ॥१९

निरन्तर विषय - भोगोंकी अभिलाषा करनेके कारण अपने वास्तविक श्रेयसे चिरकालतक बेसुध हुए लोगोंको जिन्होंने करुणावश निर्भय आत्मलोकका उपदेश दिया और जो स्वयं निरन्तर अनुभव होनेवाले आत्मस्वरूपकी प्राप्तिसे सब प्रकारकी तृष्णाओंसे मुक्त थे, उन भगवान् ऋषभदेवको नमस्कार है ॥ १ ९ ॥ इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे ऋषभदेवानुचरिते षष्ठोध्यायः ॥६ ॥

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पृष्ठ 975

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१. प्रा ० पा ० – को ह्यस्य । २. प्रा ० पा ० – विशुद्धाचरितं पुंसां ० । ३. प्रा ० र वावहितस्तस्मिन् वासुदेव । ४. प्रा ० पा ० – नैवाद्रियन्ते । ५. प्रा ० पा ० - भगवत्तत्त्वेनैव । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 976

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अथ सप्तमोऽध्यायः भरत - चरित्र श्रीशुक उवाच भरतस्तु महाभागवतो यदा भगवतावनितलपरिपालनाय सञ्चिन्तितस्तदनु-शासनपरः पञ्चजनीं विश्वरूपदुहितरमुपयेमे || १ || तस्यामु ह वा आत्मजान् कार्त्स्न्येनानुरूपानात्मनः पञ्च जनयामास भूतादिरिव भूतसूक्ष्माणि || २ || सुमतिं राष्ट्रभृतं सुदर्शनमावरणं धूम्रकेतुमिति । अजनाभं नामैतद्वर्षं भारतमिति यत आरभ्य व्यपदिशन्ति || ३ || स बहुविन्महीपतिः पितृपितामहवद् उरुवत्सलतया स्वे स्वे कर्मणि वर्तमानाः प्रजाः स्वधर्ममनुवर्तमानः पर्यपालयत् || ४ || ईजे च भगवन्तं यज्ञक्रतुरूपं क्रतुभिरुच्चावचैः श्रद्धयाऽऽहृताग्निहोत्रदर्शपूर्णमासचातुर्मास्य- पशुसोमानां प्रकृतिविकृतिभिरनुसवनं चातुर्होत्रविधिना ॥५ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—- राजन्! महाराज भरत बड़े ही भगवद्भक्त थे । भगवान् ऋषभदेवने अपने संकल्पमात्रसे उन्हें पृथ्वीकी रक्षा करनेके लिये नियुक्त कर दिया । उन्होंने उनकी आज्ञामें स्थित रहकर विश्वरूपकी कन्या पंचजनीसे विवाह किया ॥१ ॥

जिस प्रकार तामस अहंकारसे शब्दादि पाँच भूततन्मात्र उत्पन्न होते हैं— उसी प्रकार पंचजनीके गर्भसे उनके सुमति, राष्ट्रभृत, सुदर्शन, आवरण और धूम्रकेतु नामक पाँच पुत्र हुए —जो सर्वथा उन्हींके समान थे । इस वर्षको, जिसका नाम पहले अजनाभवर्ष था, राजा भरतके समयसे ही ‘ भारतवर्ष ' कहते हैं ॥२-३ ॥ महाराज भरत बहुज्ञ थे । वे अपने - अपने कर्मोंमें लगी हुई प्रजाका अपने बाप- -दादोंके समान स्वधर्ममें स्थित रहते हुए अत्यन्त वात्सल्यभावसे पालन करने लगे ॥४ ॥ उन्होंने होता,

अध्वर्यु, उद्गाता और ब्रह्मा – इन चार ऋत्विजों द्वारा कराये जानेवाले प्रकृति और विकृति * दोनों प्रकारके अग्निहोत्र, दर्श, पूर्णमास, चातुर्मास्य, पशु और सोम आदि छोटे - बड़े क्रतुओं ( यज्ञों ) -से यथासमय श्रद्धापूर्वक यज्ञ और क्रतुरूप श्रीभगवान्का यजन किया ॥५ ॥

सम्प्रचरत्सु नानायागेषु विरचिताङ्ग - क्रियेष्वपूर्वं यत्तत्क्रियाफलं धर्माख्यं परे ब्रह्मणि यज्ञपुरुषे सर्वदेवतालिङ्गानां मन्त्राणामर्थनियामकतया साक्षात्कर्तरि परदेवताया भगवति वासुदेव एव ' भावयमान आत्मनैपुण्य - मृदितकषायो हविःष्वध्वर्युभिर्गृह्यमाणेषु स यजमानो यज्ञभाजो देवांस्तान् पुरुषा-वयवेष्वभ्यध्यायत् || ६ || एवं कर्मविशुद्ध्या विशुद्धसत्त्वस्यान्तर्हृदयाकाशशरीरे ब्रह्मणि भगवति वासुदेवे महापुरुषरूपोपलक्षणे श्रीवत्सकौस्तुभवनमालारिदरगदादिभिरुपलक्षिते निजपुरुषहल्लिखितेनात्मनि ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 977

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पुरुषरूपेण विरोचमान उच्चैस्तरां भक्तिरनुदिनमेधमानरया - जायत ॥७ ॥

एवं वर्षायुतसहस्रपर्यन्तावसितकर्म - निर्वाणावसरोऽधिभुज्यमानं * स्वतनयेभ्यो रिक्थं पितृपैतामहं यथादायं विभज्य स्वयं सकलसम्पन्निकेतात्स्वनिकेतात् पुलहाश्रमं “ प्रवव्राज || ८ || यत्र ह वाव भगवान् हरिरद्यापि तत्रत्यानां निजजनानां वात्सल्येन संनिधाप्यत इच्छारूपेण || ९ || यत्राश्रमपदान्युभयतो - नाभिभिर्दृषच्चक्रैश्चक्रनदी नाम सरित्प्रवरा सर्वतः पवित्रीकरोति ॥१० ॥

इस प्रकार अंग और क्रियाओंके सहित भिन्न - भिन्न यज्ञोंके अनुष्ठानके समय जब अध्वर्युगण आहुति देनेके लिये हवि हाथमें लेते, तो यजमान भरत उस यज्ञकर्मसे होनेवाले पुण्यरूप फलको यज्ञपुरुष भगवान् वासुदेवके अर्पण कर देते थे । वस्तुतः वे परब्रह्म ही इन्द्रादि समस्त देवताओंके प्रकाशक, मन्त्रोंके वास्तविक प्रतिपाद्य तथा उन देवताओंके भी नियामक होनेसे मुख्य कर्ता एवं प्रधान देव हैं । इस प्रकार अपनी भगवदर्पण बुद्धिरूप कुशलतासे हृदयके राग - द्वेषादि मलोंका मार्जन करते हुए वे सूर्यादि सभी यज्ञभोक्ता देवताओंका भगवान्के नेत्रादि अवयवोंके रूपमें चिन्तन करते थे || ६ || इस तरह कर्मकी शुद्धिसे उनका अन्तःकरण शुद्ध हो गया । तब उन्हें अन्तर्यामीरूपसे विराजमान, हृदयाकाशमें ही अभिव्यक्त होनेवाले, ब्रह्मस्वरूप एवं महापुरुषोंके लक्षणोंसे उपलक्षित भगवान् वासुदेवमें — जो श्रीवत्स, कौस्तुभ, वनमाला, चक्र, शंख और गदा आदिसे सुशोभित तथा नारदादि निजजनोंके हृदयोंमें चित्रके समान निश्चलभावसे स्थित रहते हैं - दिन - दिन वेगपूर्वक बढ़नेवाली उत्कृष्ट भक्ति प्राप्त हुई ॥७ ॥

इस प्रकार एक करोड़ वर्ष निकल जानेपर उन्होंने राज्यभोगका प्रारब्ध क्षीण हुआ जानकर अपनी भोगी हुई वंशपरम्परागत सम्पत्तिको यथायोग्य पुत्रोंमें बाँट दिया । फिर अपने सर्वसम्पत्तिसम्पन्न राजमहलसे निकलकर वे पुलहाश्रम ( हरिहरक्षेत्र ) - में चले आये ॥८ ॥ इस

पुलहाश्रममें रहनेवाले भक्तोंपर भगवान्‌का बड़ा ही वात्सल्य है । वे आज भी उनसे उनके इष्टरूपमें मिलते रहते हैं || ९ || वहाँ चक्रनदी ( गण्डकी ) नामकी प्रसिद्ध सरिता चक्राकार शालग्राम- शिलाओंसे, जिनके ऊपर - नीचे दोनों ओर नाभिके समान चिह्न होते हैं, सब ओरसे ऋषियोंके आश्रमोंको पवित्र करती रहती है ॥१० ॥

तस्मिन् वाव किल स एकलः पुलहाश्रमोपवन विविधकुसुमकिसलय-तुलसिकाम्बुभिः कन्दमूलफलोपहारैश्च समीहमानो भगवत आराधनं विविक्त उपरतविषयाभिलाष उपभृतोपशमः परां निर्वृतिमवाप ॥११ ॥ तयेत्थमविरतपुरुषपरि-चर्या भगवति प्रवर्धमानानुरागभरद्रुतहृदय - शैथिल्यः

प्रहर्षवेगेनात्मन्युद्भिद्यमानरोमपुलक - कुलक औत्कण्ठ्यप्रवृत्तप्रणयबाष्पनिरुद्धा-वलोकनयन एवं निजरमणारुणचरणारविन्दा - नुध्यानपरिचितभक्तियोगेन परिप्लुत-परमाह्लादगम्भीरहृदयहृदावगाढधिषणस्तामपि न क्रियमाणां भगवत्सपर्यं सस्मार ॥१२ ॥ इत्थं धृतभगवद्व्रतऐणेयाजिनवाससा-नुसवनाभिषेकार्द्रकपिशकुटिलजटाकलापेन च विरोचमानः सूर्यर्चा भगवन्तं हिरण्मयं

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पृष्ठ 978

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पुरुषमुज्जिहाने सूर्यमण्डलेऽभ्युपतिष्ठन्नेतदु होवाच- ॥ १३ ॥

परोरजः सवितुर्जातवेदो देवस्य भर्गो मनसेदं जजान । सुरेतसादः पुनराविश्य चष्टे हंसं गृध्राणं नृषद्रिङ्गिरामिमः ॥ १४ उस पुलहाश्रमके उपवनमें एकान्त स्थानमें अकेले ही रहकर वे अनेक प्रकारके पत्र, पुष्प, तुलसीदल, जल और कन्द - मूल - फलादि उपहारोंसे भगवान्‌की आराधना करने लगे । इससे उनका अन्तःकरण समस्त विषयाभिलाषाओंसे निवृत्त होकर शान्त हो गया और उन्हें परम आनन्द प्राप्त हुआ ॥११ ॥

इस प्रकार जब वे नियमपूर्वक भगवान्‌की परिचर्या करने लगे, तब उससे प्रेमका वेग बढ़ता गया — जिससे उनका हृदय द्रवीभूत होकर शान्त हो गया, आनन्दके प्रबल वेगसे शरीरमें रोमांच होने लगा तथा उत्कण्ठाके कारण नेत्रोंमें प्रेमके आँसू उमड़ आये, जिससे उनकी दृष्टि रुक गयी । अन्तमें जब अपने प्रियतमके अरुण चरणारविन्दोंके ध्यानसे भक्तियोगका आविर्भाव हुआ, तब परमानन्दसे सराबोर हृदयरूप गम्भीर सरोवरमें बुद्धिके डूब जानेसे उन्हें उस नियमपूर्वक की जानेवाली भगवत्पूजाका भी स्मरण न रहा ॥१२ ॥

इस प्रकार वे भगवत्सेवाके नियममें ही तत्पर रहते थे, शरीरपर कृष्णमृगचर्म धारण करते थे तथा त्रिकालस्नान के कारण भीगते रहनेसे उनके केश भूरी - भूरी घुँघराली लटोंमें परिणत हो गये थे, जिनसे वे बड़े ही सुहावने लगते थे । वे उदित हुए सूर्यमण्डलमें सूर्यसम्बन्धिनी ऋचाओंद्वारा ज्योतिर्मय परमपुरुष भगवान् नारायणकी आराधना करते और इस प्रकार कहते— ॥१३ ॥

‘ भगवान् सूर्यका कर्मफलदायक तेज प्रकृतिसे परे है । उसीने संकल्पद्वारा इस जगत्की उत्पत्ति की है । फिर वही अन्तर्यामीरूपसे इसमें प्रविष्ट होकर अपनी चित् - शक्तिद्वारा विषयलोलुप जीवोंकी रक्षा करता है । हम उसी बुद्धिप्रवर्त्तक तेजकी शरण लेते हैं ' ॥१४ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे भरतचरिते भगवत्परिचर्यायां सप्तमोऽध्यायः ॥७ ॥

* प्रकृति और विकृति - भेदसे अग्निहोत्रादि क्रतु दो प्रकारके होते हैं । सम्पूर्ण अंगोंसे युक्त क्रतुओंको ' प्रकृति ' कहते हैं और जिनमें सब अंग पूर्ण नहीं होते, किसी - न - किसी अंगकी कमी रहती है, उन्हें ' विकृति ' कहते हैं । १. प्रा ० पा ० — एवम् । २. प्रा ० पा ० – कर्मविशुद्धिः सत्त्वस्यान्तर्हृदयाका ० । ३. प्रा ० पा ० —विराजमान ०।४. प्रा ० पा ० – वसरो विभुज्यमानं तनयेभ्यः पितृ ० । ५. प्रा ० पा०— पुलहश्रममेष प्र ० । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 979

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पृष्ठ 980

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अथाष्टमोऽध्यायः भरतजीका मृगके मोहमें फँसकर मृगयोनिमें जन्म लेना श्रीशुक उवाच एकदा तु महानद्यां कृताभिषेक - नैयमिकावश्यको ब्रह्माक्षरमभिगृणानो मुहूर्तत्रयमुदकान्त उपविवेश ॥१ ॥ तत्र तदा राजन् हरिणी पिपासया

जलाशयाभ्याशमेकै - वोपजगाम || २ || तया पेपीयमान उदके तावदेवाविदूरेण नदतो मृगपतेरुन्नादो लोकभयङ्कर उदपतत् ॥३ ॥ तमुपश्रुत्य सा मृगवधूः प्रकृतिविक्लवा

चकितनिरीक्षणा सुतरामपि हरिभयाभिनिवेशव्यग्रहृदया पारिप्लवदृष्टिरगततृषा भयात् सहसैवोच्चक्राम ॥ ४ ॥

तस्या उत्पतन्त्या अन्तर्वत्न्या उरुभयावगलितो योनिनिर्गतो गर्भः स्रोतसि निपपात ॥५ ॥ तत्प्रसवोत्सर्पण भयखेदातुरा स्वगणेन वियुज्यमाना कस्याञ्चिद्दर्यां

कृष्णसारसती निपपाताथ च ममार ॥६ ॥

तं त्वेणकुणकं कृपणं स्रोतसानूह्यमानमभि - वीक्ष्यापविद्धं बन्धुरिवानुकम्पया राजर्षिर्भरत आदाय मृतमातरमित्याश्रमपदमनयत् ॥७ ॥ तस्य ह वा एणकुणक

उच्चैरेतस्मिन् अहरहस्तत्पोषणपालन-कृतनिजाभिमानस्य लालनप्रीणनानुध्यानेनात्मनियमाः सहयमाः पुरुषपरिचर्यादय एकैकशः कतिपयेनाहर्गणेन वियुज्यमानाः किल सर्व एवोदवसन् ॥८ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - एक बार भरतजी गण्डकीमें स्नान कर नित्य नैमित्तिक तथा शौचादि अन्य आवश्यक कृत्योंसे निवृत्त हो प्रणवका जप करते हुए तीन मुहूर्ततक नदीकी धाराके पास बैठे रहे ॥१ ॥ राजन्! इसी समय एक हरिनी प्याससे व्याकुल हो जल पीनेके

लिये अकेली ही उस नदीके तीरपर आयी || २ || अभी वह जल पी ही रही थी कि पास ही गरजते हुए सिंहकी लोकभयंकर दहाड़ सुनायी पड़ी || ३ || हरिनजाति तो स्वभावसे ही डरपोक होती है । वह पहले ही चौकन्नी होकर इधर - उधर देखती जाती थी । अब ज्यों ही उसके कानमें वह भीषण शब्द पड़ा कि सिंहके डरके मारे उसका कलेजा धड़कने लगा और नेत्र कातर हो गये । प्यास अभी बुझी न थी, किन्तु अब तो प्राणोंपर आ बनी थी । इसलिये उसने भयवश एकाकी नदी पार करनेके लिये छलाँग मारी ॥४ ॥

उसके पेटमें गर्भ था, अतः उछलते समय अत्यन्त भयके कारण उसका गर्भ अपने स्थानसे हटकर योनिद्वारसे निकलकर नदीके प्रवाहमें गिर गया ॥ ५ ॥ वह कृष्णमृगपत्नी

अकस्मात् गर्भके गिर जाने, लम्बी छलाँग मारने तथा सिंहसे डरी होनेके कारण बहुत पीड़ित हो गयी थी । अब अपने झुंडसे भी उसका बिछोह हो गया, इसलिये वह किसी गुफामें जा पड़ी और वहीं मर गयी ॥६ ॥

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