श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 981–990

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 981–990

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राजर्षि भरतने देखा कि बेचारा हरिनीका बच्चा अपने बन्धुओं से बिछुड़कर नदीके प्रवाहमें बह रहा है । इससे उन्हें उसपर बड़ी दया आयी और वे आत्मीयके समान उस मातृहीन बच्चेको अपने आश्रमपर ले आये ॥७ ॥ उस मृगछौनेके प्रति भरतजीकी ममता

उत्तरोत्तर बढ़ती ही गयी । वे नित्य उसके खाने - पीनेका प्रबन्ध करने, व्याघ्रादिसे बचाने, लाड़ लड़ाने और पुचकारने आदिकी चिन्तामें ही डूबे रहने लगे । कुछ ही दिनोंमें उनके यम, नियम और भगवत्पूजा आदि आवश्यक कृत्य एक - एक करके छूटने लगे और अन्तमें सभी छूट गये || ८ || अहो बतायं हरिणकुणकः कृपण ईश्वररथचरणपरिभ्रमणरयेण स्वगण-सुहृद्बन्धुभ्यः परिवर्जितः शरणं च मोपसादितो मामेव मातापितरौ भ्रातृज्ञातीन् यौथिकांश्चै - वोपेयाय नान्यं कञ्चन वेद मय्यतिविस्रब्ध - श्चात एव मया मत्परायणस्य पोषणपालन- प्रीणनलालनमनसूयुनानुष्ठेयं शरण्योपेक्षादोष - विदुषा || ९ || नूनं ह्यार्याः साधव उपशमशीलाः कृपणसुहृद् एवंविधार्थे स्वार्थानपि गुरुतरानुपेक्षन्ते ॥१० ॥

इति कृतानुषङ्ग आसनशयनाटनस्थाना - शनादिषु सह मृगजहुना स्नेहानुबद्धहृदय आसीत् ॥११ ॥ कुशकुसुमसमित्पलाश- फलमूलोदकान्याहरिष्यमाणो वृकसालावृका-दिभ्यो भयमाशंसमानो यदा सह हरिणकुणकेन वनं समाविशति || १२ || पथिषु च

मुग्ध भावेन तत्र तत्र विषक्तमतिप्रणयभरहृदयः कार्पण्यात्स्कन्धेनोद्वहति एवमुत्सङ्ग उरसि चाधायोपलालयन्मुदं परमामवाप ॥१३ ॥ क्रियायां

निर्वर्त्यमानायामन्तरालेऽप्युत्थायोत्थाय यदैनमभिचक्षीत तर्हि वाव स वर्षपतिः प्रकृतिस्थेन मनसा तस्मा आशिष आशास्ते स्वस्ति स्ताद्वत्स ते सर्वत इति ॥१४ ॥

अन्यदा भृशमुद्विग्नमना नष्टद्रविण इव कृपणः सकरुणमतितर्षेण हरिणकुणकविरह - विह्वलहृदयसन्तापस्तमेवानुशोचन् किल कश्मलं महदभिरम्भित इति होवाच ॥१५ ॥

उन्हें ऐसा विचार रहने लगा- ' अहो! कैसे खेदकी बात है! इस बेचारे दीन मृगछौनेको कालचक्रके वेगने अपने झुंड, सुहृद् और बन्धुओंसे दूर करके मेरी शरणमें पहुँचा दिया है । यह मुझे ही अपना माता - पिता, भाई - बन्धु और यूथके साथी - संगी समझता है । इसे मेरे सिवा और किसीका पता नहीं है और मुझमें इसका विश्वास भी बहुत है । मैं भी शरणागतकी उपेक्षा करनेमें जो दोष हैं, उन्हें जानता हूँ । इसलिये मुझे अब अपने इस आश्रितका सब प्रकारकी दोषबुद्धि छोड़कर अच्छी तरह पालन - पोषण और प्यार - दुलार करना चाहिये || ९ || निश्चय ही शान्त - स्वभाव और दीनोंकी रक्षा करनेवाले परोपकारी सज्जन ऐसे शरणागतकी रक्षाके लिये अपने बड़े - से - बड़े स्वार्थकी भी परवाह नहीं करते ' ॥१० ॥

इस प्रकार उस हरिनके बच्चेमें आसक्ति बढ़ जानेसे बैठते, सोते, टहलते, ठहरते और भोजन करते समय भी उनका चित्त उसके स्नेहपाशमें बँधा रहता था ॥११ ॥ जब उन्हें कुश,

पुष्प, समिधा, पत्र और फल- मूलादि लाने होते तो भेड़ियों और कुत्तोंके भयसे उसे वे साथ लेकर ही वनमें जाते ॥१२ ॥ मार्गमें जहाँ - तहाँ कोमल घास आदिको देखकर मुग्धभावसे वह

हरिणशावक अटक जाता तो वे अत्यन्त प्रेमपूर्ण हृदयसे दयावश उसे अपने कंधेपर चढ़ा ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

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लेते । इसी प्रकार कभी गोदमें लेकर और कभी छातीसे लगाकर उसका दुलार करनेमें भी उन्हें बड़ा सुख मिलता ॥१३ ॥ नित्य नैमित्तिक कर्मोंको करते समय भी राजराजेश्वर भरत

बीच - बीचमें उठ - उठकर उस मृगबालकको देखते और जब उसपर उनकी दृष्टि पड़ती, तभी उनके चित्तको शान्ति मिलती । उस समय उसके लिये मंगलकामना करते हुए वे कहने लगते - ' बेटा! तेरा सर्वत्र कल्याण हो ' ॥१४ ॥

कभी यदि वह दिखायी न देता तो जिसका धन लुट गया हो, उस दीन मनुष्यके समान उनका चित्त अत्यन्त उद्विग्न हो जाता और फिर वे उस हरिनीके बच्चेके विरहसे व्याकुल एवं सन्तप्त हो करुणावश अत्यन्त उत्कण्ठित एवं मोहाविष्ट हो जाते तथा शोकमग्न होकर इस प्रकार कहने लगते ॥१५ ॥

अपि बत स वै कृपण एणबालको मृतहरिणीसुतोऽहो ममानार्यस्य शठकिरातमतेरकृतसुकृतस्य कृतविस्रम्भ आत्मप्रत्ययेन तदविगणयन् सुजन इवागमिष्यति ॥१६ ॥ अपि क्षेमेणास्मिन्नाश्रमोप - वने शष्पाणि चरन्तं देवगुप्तं

द्रक्ष्यामि ॥१७ ॥ अपि च न वृकः सालावृकोऽन्यतमो वा नैकचर एकचरो वा

भक्षयति ॥१८ ॥ निम्लोचति ह भगवान् सकलजगत्क्षेमोदय- स्त्रय्यात्माद्यापि मम न

मृगवधून्यास आगच्छति || १ ९ || अपिस्विदकृतसुकृतमागत्य मां सुखयिष्यति हरिणराजकुमारो विविध - रुचिरदर्शनीयनिजमृगदारकविनोदैरसन्तोषं स्वानामपनुदन् ॥२० ॥ क्ष्वेलिकायां मां मृषा - समाधिनाऽऽमीलितदृशं प्रेमसंरम्भेण

चकितचकित आगत्य पृषदपरुषविषाणाग्रेण लुठति ॥२१ ॥ आसादितहविषि बर्हिषि

दूषिते मयोपालब्धो भीतभीतः सपद्युपरतरास ऋषिकुमारवद् अवहितकरणकलाप आस्ते ॥२२ ॥

किं वा अरे आचरितं तपस्तपस्विन्यानया यदियमवनिः सविनयकृष्णसारतनयतनुतरसुभग - शिवतमाखरखुरपदपङ्क्तिभिर्द्रविणविधुरातुरस्य कृपणस्य मम द्रविणपदवीं सूचयन्त्यात्मानं च सर्वतः कृतकौतुकं द्विजानां स्वर्गापवर्गकामानां देवयजनं करोति ॥ । २३ ॥ अपिस्विदसौ भगवानुडुपतिरेनं मृगपतिभयान्मृतमातरं मृगबालकं स्वाश्रमपरिभ्रष्टमनुकम्पया कृपणजनवत्सलः परिपाति किं ॥२४ ॥

वाऽऽत्मजविश्लेषज्वर-दवदहनशिखाभिरुपतप्यमानहृदयस्थलनलिनीकं मामुपसृतमृगीतनयं शिशिरशान्तानुरागगुणित - निजवदनसलिलामृतमयगभस्तिभिः स्वधयतीति च ॥ २५ ॥

‘ अहो! क्या कहा जाय? क्या वह मातृहीन दीन मृगशावक दुष्ट बहेलियेकी - सी बुद्धिवाले मुझ पुण्यहीन अनार्यका विश्वास करके और मुझे अपना मानकर मेरे किये हुए अपराधोंको सत्पुरुषोंके समान भूलकर फिर लौट आयेगा? ॥ १६ ॥ क्या मैं उसे फिर इस आश्रमके

उपवनमें भगवान्की कृपासे सुरक्षित रहकर निर्विघ्न हरी - हरी दूब चरते देखूँगा? ॥१७ ॥ ऐसा

न हो कि कोई भेड़िया, कुत्ता, गोल बाँधकर विचरनेवाले सूकरादि अथवा अकेले घूमनेवाले व्याघ्रादि ही उसे खा जायँ ॥ १८ ॥ अरे! सम्पूर्ण जगत्की कुशलके लिये प्रकट होनेवाले

वेदत्रयीरूप भगवान् सूर्य अस्त होना चाहते हैं; किन्तु अभीतक वह मृगीकी धरोहर लौटकर ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

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नहीं आयी! ॥१९ ॥ क्या वह हरिणराजकुमार मुझ पुण्यहीनके पास आकर अपनी भाँति-भाँतिकी मृगशावकोचित मनोहर एवं दर्शनीय क्रीडाओंसे अपने स्वजनोंका शोक दूर करते

हुए मुझे आनन्दित करेगा? ॥२० ॥ अहो! जब कभी मैं प्रणयकोपसे खेलमें झूठ - मूठ

समाधिके बहाने आँखें मूँदकर बैठ जाता, तब वह चकित चित्तसे मेरे पास आकर जलबिन्दुके समान कोमल और नन्हें - नन्हें सींगोंकी नोकसे किस प्रकार मेरे अंगोंको खुजलाने लगता था ॥२१ ॥ मैं कभी कुशोंपर हवनसामग्री रख देता और वह उन्हें दाँतोंसे खींचकर अपवित्र

कर देता तो मेरे डाँटने - डपटनेपर वह अत्यन्त भयभीत होकर उसी समय सारी उछल - कूद छोड़ देता और ऋषिकुमारके समान अपनी समस्त इन्द्रियोंको रोककर चुपचाप बैठ जाता था ' ॥२२ ॥

[ फिर पृथ्वीपर उस मृगशावकके खुरके चिह्न देखकर कहने लगते – ] ‘ अहो! इस तपस्विनी धरतीने ऐसा कौन - सा तप किया है जो उस अतिविनीत कृष्णसारकिशोरके छोटे-छोटे सुन्दर, सुखकारी और सुकोमल खुरोंवाले चरणोंके चिह्नोंसे मुझे, जो मैं अपना मृगधन लुट जानेसे अत्यन्त व्याकुल और दीन हो रहा हूँ, उस द्रव्यकी प्राप्तिका मार्ग दिखा रही है और स्वयं अपने शरीरको भी सर्वत्र उन पदचिह्नोंसे विभूषित कर स्वर्ग और अपवर्गके इच्छुक द्विजोंके लिये यज्ञस्थल * बना रही है || २३ || ( चन्द्रमामें मृगका - सा श्याम चिह्न देख उसे अपना ही मृग मानकर कहने लगते — ) ' अहो! जिसकी माता सिंहके भयसे मर गयी थी, आज वही मृगशिशु अपने आश्रमसे बिछुड़ गया है । अतः उसे अनाथ देखकर क्या ये दीनवत्सल भगवान् नक्षत्रनाथ दयावश उसकी रक्षा कर रहे हैं? ॥२४ ॥ [ फिर उसकी शीतल

किरणोंसे आह्लादित होकर कहने लगते — ] ' अथवा अपने पुत्रोंके वियोगरूप दावानलकी विषम ज्वालासे हृदयकमल दग्ध हो जानेके कारण मैंने एक मृगबालकका सहारा लिया था । अब उसके चले जानेसे फिर मेरा हृदय जलने लगा है; इसलिये ये अपनी शीतल, शान्त, स्नेहपूर्ण और वदनसलिलरूपा अमृतमयी किरणोंसे मुझे शान्त कर रहे हैं ' ॥२५ ॥

एवमघटमानमनोरथाकुलहृदयो मृगदारका भासेन स्वारब्धकर्मणा योगारम्भणतो विभ्रंशितः स योगतापसो भगवदाराधनलक्षणाच्च कथमितरथा जात्यन्तर एणकुणक आसङ्गः साक्षान्निःश्रेयसप्रतिपक्षतया प्राक्परित्यक्तदुस्त्यज - हृदयाभिजातस्य तस्यैवमन्तरायविहतयोगा - रम्भणस्य राजर्षेर्भरतस्य तावन्मृगार्भकपोषण-पालनप्रीणनलालनानुषङ्गेणाविगणयत आत्मान- महिरिवाखुबिलं दुरतिक्रमः कालः करालरभस आपद्यत ॥ २६ ॥

तदानीमपि पार्श्ववर्तिनमात्मजमिवानुशोचन्तम् अभिवीक्षमाणो मृग एवाभिनिवेशितमना विसृज्य लोकमिमं सह मृगेण कलेवरं मृतमनु न मृतजन्मानुस्मृतिरितरवन्मृगशरीरमवाप ॥ २७ ॥

राजन्! इस प्रकार जिनका पूरा होना सर्वथा असम्भव था, उन विविध मनोरथोंसे भरतका चित्त व्याकुल रहने लगा । अपने मृगशावकके रूपमें प्रतीत होनेवाले प्रारब्धकर्मके कारण तपस्वी भरतजी भगवदाराधनरूप कर्म एवं योगानुष्ठानसे च्युत हो गये । नहीं तो, जिन्होंने मोक्षमार्गमें साक्षात् विघ्नरूप समझकर अपने ही हृदयसे उत्पन्न दुस्त्यज पुत्रादिको ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

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भी त्याग दिया था, उन्हींकी अन्यजातीय हरिणशिशुमें ऐसी आसक्ति कैसे हो सकती थी । इस प्रकार राजर्षि भरत विघ्नोंके वशीभूत होकर योगसाधनसे भ्रष्ट हो गये और उस मृगछौनेके पालन - पोषण और लाड़ - प्यारमें ही लगे रहकर आत्मस्वरूपको भूल गये । इसी समय जिसका टलना अत्यन्त कठिन है, वह प्रबल वेगशाली कराल काल, चूहेके बिलमें जैसे सर्प घुस आये, उसी प्रकार उनके सिरपर चढ़ आया ॥ २६ ॥ उस समय भी वह हरिणशावक उनके पास बैठा

पुत्रके समान शोकातुर हो रहा था । वे उसे इस स्थितिमें देख रहे थे और उनका चित्त उसीमें लग रहा था । इस प्रकारकी आसक्तिमें ही मृगके साथ उनका शरीर भी छूट गया । तदनन्तर उन्हें अन्तकालकी भावनाके अनुसार अन्य साधारण पुरुषोंके समान मृगशरीर ही मिला । किन्तु उनकी साधना पूरी थी, इससे उनकी पूर्वजन्मकी स्मृति नष्ट नहीं हुई ॥२७ ॥ उस

योनिमें भी पूर्वजन्मकी भगवदाराधनाके प्रभावसे अपने मृगरूप होनेका कारण जानकर वे अत्यन्त पश्चात्ताप करते हुए कहने लगे, || २८ || ' अहो! बड़े खेदकी बात है, मैं संयमशील महानुभावोंके मार्गसे पतित हो गया! मैंने तो धैर्यपूर्वक सब प्रकारकी आसक्ति छोड़कर एकान्त और पवित्र वनका आश्रय लिया था । वहाँ रहकर जिस चित्तको मैंने सर्वभूतात्मा श्रीवासुदेवमें, निरन्तर उन्हींके गुणोंका श्रवण, मनन और संकीर्तन करके तथा प्रत्येक पलको उन्हींकी आराधना और स्मरणादिसे सफल करके, स्थिरभावसे पूर्णतया लगा दिया था, मुझ अज्ञानीका वही मन अकस्मात् एक नन्हे - से हरिण - शिशुके पीछे अपने लक्ष्यसे च्युत हो गया! ' ॥२९ ॥

ऽहमात्मवतामनुपथाद्यद्विमुक्तसमस्तसङ्गस्य सर्वेषामात्मनां आत्मनि समावेशितं समाहितं पुनर्ममाबुधस्यारान्मृगसुतमनुपरिसुस्राव ॥२९ ॥

विविक्तपुण्यारण्यशरणस्यात्मवत भगवति वासुदेवे काले कार्त्स्न्येन मनस्तत्तु इत्येवं निगूढनिर्वेदो विसृज्य मृगीं मातरं पुनः भगवत्क्षेत्रमुपशमशीलमुनिगणदयितं शालग्रामं पुलस्त्यपुलहाश्रमं कालञ्जरात्प्रत्याजगाम || ३० || तस्मिन्नपि कालं प्रतीक्षमाणः सङ्गाच्च भृशमुद्विग्न आत्मसहचरः शुष्कपर्णतृणवीरुधा वर्तमानो मृगत्वनिमित्तावसानमेव गणयन्मृगशरीरं तीर्थोदकक्लिन्नमुत्ससर्ज ॥३१ ॥

इस प्रकार मृग बने हुए राजर्षि भरतके हृदयमें जो वैराग्य - भावना जाग्रत् हुई, उसे छिपाये रखकर उन्होंने अपनी माता मृगीको त्याग दिया और अपनी जन्मभूमि कालंजर पर्वतसे वे फिर शान्तस्वभाव मुनियोंके प्रिय उसी शालग्रामतीर्थमें, जो भगवान्‌का क्षेत्र है, पुलस्त्य और पुलह ऋषिके आश्रमपर चले आये || ३० || वहाँ रहकर भी वे कालकी ही प्रतीक्षा करने लगे । आसक्तिसे उन्हें बड़ा भय लगने लगा था । बस, अकेले रहकर वे सूखे पत्ते, घास और झाड़ियोंद्वारा निर्वाह करते मृगयोनिकी प्राप्ति करानेवाले प्रारब्धके क्षयकी बाट ****** ebook converter DEMO Watermarks ******* तत्रापि ह वा आत्मनो मृगत्वकारणं भगवदाराधनसमीहानुभावेनानुस्मृत्य भृशमनु - आह तप्यमान ॥२८ ॥ अहो कष्टं भ्रष्टो-तदनुश्रवणमननसङ्कीर्तनाराधनानुस्मरणाभि - योगेनाशून्यसकलयामेन

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देखते रहे । अन्तमें उन्होंने अपने शरीरका आधा भाग गण्डकीके जलमें डुबाये रखकर उस मृगशरीरको छोड़ दिया ॥३१ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे भरतचरितेऽष्टमोऽध्यायः ॥८ ॥

* शास्त्रोंमें उल्लेख आता है कि जिस भूमिमें कृष्णमृग विचरते हैं, वह अत्यन्त पवित्र और यज्ञानुष्ठानके योग्य होती है । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

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अथ अथ नवमोऽध्यायः भरतजीका ब्राह्मणकुलमें जन्म श्रीशुक उवाच कस्यचिद् शमदमतपःस्वाध्यायाध्ययनत्यागसन्तोषतितिक्षा-द्विजवरस्याङ्गिरःप्रवरस्य प्रश्रयविद्यानसूयात्मज्ञानानन्दयुक्तस्यात्मसदृश श्रुतशीलाचाररूपौदार्यगुणा नव सोदर्या अङ्गजा बभूवुर्मिथुनं च यवीयस्यां भार्यायाम् || १ || यस्तु तत्र पुमांस्तं परमभागवतं राजर्षिप्रवरं भरतमुत्सृष्टमृगशरीरं चरमशरीरेण विप्रत्वं गतमाहुः ॥२ ॥

तत्रापि स्वजनसङ्गाच्च भृशमुद्विजमानो भगवतः कर्मबन्धऽविध्वंसन-श्रवणस्मरणगुणविवरणचरणारविन्दयुगलं मनसा विदधदात्मनः प्रतिघातमाशङ्कमानो भगवदनुग्रहेणानु - स्मृतस्वपूर्वजन्मावलिरात्मानमुन्मत्त जडान्ध - बधिरस्वरूपेण दर्शयामास लोकस्य || ३ || तस्यापि ह वा आत्मजस्य विप्रःपुत्रस्नेहानुबद्धमना आसमावर्तनात्संस्कारान् यथोपदेशं विदधान उपनीतस्य च पुनः शौचाचमनादीन् कर्मनियमाननभि प्रेतानपि समशिक्षयदनुशिष्टेन हि भाव्यं पितुः पुत्रेणेति ॥४ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - राजन्! आंगिरस गोत्रमें शम, दम, तप, स्वाध्याय, वेदाध्ययन, त्याग ( अतिथि आदिको अन्न देना ), सन्तोष तितिक्षा, विनय, विद्या ( कर्मविद्या ), अनसूया ( दूसरोंके गुणोंमें दोष न ढूँढ़ना ), आत्मज्ञान ( आत्माके कर्तृत्व और भोक्तृत्वका ज्ञान ) एवं आनन्द ( धर्मपालनजनित सुख ) सभी गुणोंसे सम्पन्न एक श्रेष्ठ ब्राह्मण थे । उनकी बड़ी स्त्रीसे उन्हींके समान विद्या, शील, आचार, रूप और उदारता आदि गुणोंवाले नौ पुत्र हुए तथा छोटी पत्नीसे एक ही साथ एक पुत्र और एक कन्याका जन्म हुआ ॥१ ॥

इन दोनोंमें जो पुरुष था वह परम भागवत राजर्षिशिरोमणि भरत ही थे । वे मृगशरीरका परित्याग करके अन्तिम जन्ममें ब्राह्मण हुए थे - ऐसा महापुरुषोंका कथन है ॥२ ॥

इस जन्ममें भी भगवान्की कृपासे अपनी पूर्वजन्मपरम्पराका स्मरण रहनेके कारण, वे इस आशंकासे कि कहीं फिर कोई विघ्न उपस्थित न हो जाय, अपने स्वजनोंके संगसे भी बहुत डरते थे । हर समय जिनका श्रवण, स्मरण और गुणकीर्तन सब प्रकारके कर्मबन्धनको काट देता है, श्रीभगवान् के उन युगल चरणकमलोंको ही हृदयमें धारण किये रहते तथा दूसरोंकी दृष्टिमें अपनेको पागल, मूर्ख, अंधे और बहरेके समान दिखाते ॥३ ॥

पिताका तो उनमें भी वैसा ही स्नेह था । इसलिये ब्राह्मणदेवताने अपने पागल पुत्रके भी शास्त्रानुसार समावर्तनपर्यन्त विवाहसे पूर्वके सभी संस्कार करनेके विचारसे उनका उपनयन-संस्कार किया । यद्यपि वे चाहते नहीं थे तो भी ' पिताका कर्तव्य है कि पुत्रको शिक्षा दे ' इस ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

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शास्त्रविधिके अनुसार उन्होंने इन्हें शौच - आचमन आदि आवश्यक कर्मोंकी शिक्षा दी ॥४ ॥

स चापि तदु ह पितृसंनिधावे - वासध्रीचीनमिव स्म करोति छन्दांस्यध्यापयिष्यन् सह व्याहतिभिः सप्रणवशिरस्त्रिपदीं सावित्रीं ग्रैष्मवासन्तिकान्मासानधीयानमप्यसमवेतरूपं ग्राहयामास ॥५ ॥

एवं स्वतनुज आत्मन्यनुरागावेशितचित्तः शौचाध्ययनव्रतनियमगुर्वनलशुश्रूषणाद्यौप - कुर्वाणककर्माण्यनभियुक्तान्यपि समनुशिष्टेन भाव्यमित्यसदाग्रहः पुत्रमनुशास्य स्वयं तावदनधिगतमनोरथः कालेनाप्रमत्तेन स्वयं गृह एव प्रमत्त उपसंहृतः || ६ || अथ यवीयसी द्विजसती स्वगर्भजातं मिथुनं सपत्न्या उपन्यस्य स्वयमनुसंस्थया पतिलोकमगात् ॥७ ॥

पितर्युपरते भ्रातर एनमतत्प्रभावविदस्त्रय्यां विद्यायामेव पर्यवसितमतयो न परविद्यायां जडमतिरिति भ्रातुरनुशासननिर्बन्धान्न्यवृत्सन्त ॥८ ॥ स च

प्राकृतैर्द्विपदपशुभिरुन्मत्त - जडबधिरेत्यभिभाष्यमाणो यदा तदनुरूपाणि प्रभाषते कर्माणि च स कार्यमाणः परेच्छया करोति विष्टितो वेतनतो वा याच्ञया यदृच्छया वोपसादितमल्पं बहु मृष्टं कदन्नं वाभ्यवहरति परं नेन्द्रियप्रीतिनिमित्तम् । नित्यनिवृत्तनिमित्त - स्वसिद्धविशुद्धानुभवानन्दस्वात्मलाभाधिगमः सुखदुःखयोर्द्वन्द्वनिमित्तयोरसम्भावितदेहाभिमानः ॥ ९ ॥ शीतोष्णवातवर्षेषु वृष

इवानावृताङ्गः? पीनः संहननाङ्गः स्थण्डिलसंवेश - नानुन्मर्दनामज्जनरजसा महामणिरिवानभि - व्यक्तब्रह्मवर्चसः कुपटावृतकटि - रुपवीतेनोरुमषिणा द्विजातिरिति ब्रह्मबन्धुरिति संज्ञयातज्ज्ञजनावमतो ' विचचार || १० || यदा तु परत आहारं कर्मवेतनत ईहमानः स्वभ्रातृभिरपि केदारकर्मणि निरूपितस्तदपि करोति किन्तु न समं विषमं न्यूनमधिकमिति वेद कणपिण्याकफलीकरणकुल्माषस्थालीपुरीषा-दीन्यप्यमृतवदभ्यवहरति ॥११ ॥

किन्तु भरतजी तो पिताके सामने ही उनके उपदेशके विरुद्ध आचरण करने लगते थे । पिता चाहते थे कि वर्षाकालमें इसे वेदाध्ययन आरम्भ करा दूँ । किन्तु वसन्त और ग्रीष्म ऋतुके चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ और आषाढ़ – चार महीनोंतक पढ़ाते रहनेपर भी वे इन्हें व्याहृति और शिरोमन्त्रप्रणवके सहित त्रिपदा गायत्री भी अच्छी तरह याद न करा सके ॥५ ॥

ऐसा होनेपर भी अपने इस पुत्रमें उनका आत्माके समान अनुराग था । इसलिये उसकी प्रवृत्ति न होनेपर भी वे ' पुत्रको अच्छी तरह शिक्षा देनी चाहिये ' इस अनुचित आग्रहसे उसे शौच, वेदाध्ययन, व्रत, नियम तथा गुरु और अग्निकी सेवा आदि ब्रह्मचर्याश्रमके आवश्यक नियमोंकी शिक्षा देते ही रहे । किन्तु अभी पुत्रको सुशिक्षित देखनेका उनका मनोरथ पूरा न हो पाया था और स्वयं भी भगवद्भजनरूप अपने मुख्य कर्तव्यसे असावधान रहकर केवल घरके धंधोंमें ही व्यस्त थे कि सदा सजग रहनेवाले कालभगवान्ने आक्रमण करके उनका अन्त कर दिया ॥६ ॥ तब उनकी छोटी भार्या अपने गर्भसे उत्पन्न हुए दोनों बालक अपनी

सौतको सौंपकर स्वयं सती होकर पतिलोकको चली गयी ॥ ७ ॥

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भरतजीके भाई कर्मकाण्डको सबसे श्रेष्ठ समझते थे । वे ब्रह्मज्ञानरूप पराविद्यासे सर्वथा अनभिज्ञ थे । इसलिये उन्हें भरतजीका प्रभाव भी ज्ञात नहीं था, वे उन्हें निरा मूर्ख समझते थे । अतः पिताके परलोक सिधारनेपर उन्होंने उन्हें पढ़ाने - लिखानेका आग्रह छोड़ दिया ॥८ ॥ भरतजीको मानापमानका कोई विचार न था । जब साधारण नर पशु उन्हें पागल,

मूर्ख अथवा बहरा कहकर पुकारते तब वे भी उसीके अनुरूप भाषण करने लगते । कोई भी उनसे कुछ भी काम कराना चाहते, तो वे उनकी इच्छाके अनुसार कर देते । बेगारके रूपमें, मजदूरीके रूपमें, माँगनेपर अथवा बिना माँगे जो भी थोड़ा - बहुत अच्छा या बुरा अन्न उन्हें मिल जाता, उसीको जीभका जरा भी स्वाद न देखते हुए खा लेते । अन्य किसी कारणसे उत्पन्न न होनेवाला स्वतःसिद्ध केवल ज्ञानानन्दस्वरूप आत्मज्ञान उन्हें प्राप्त हो गया था; इसलिये शीतोष्ण, मानापमान आदि द्वन्द्वोंसे होनेवाले सुख - दुःखादिमें उन्हें देहाभिमानकी स्फूर्ति नहीं होती थी ॥९ ॥ वे सर्दी, गरमी, वर्षा और आँधीके समय साँड़के समान नंगे पड़े

रहते थे । उनके सभी अंग हृष्ट - पुष्ट एवं गठे हुए थे । वे पृथ्वीपर ही पड़े रहते थे, कभी तेल-उबटन आदि नहीं लगाते थे और न कभी स्नान ही करते थे, इससे उनके शरीरपर मैल जम गयी थी । उनका ब्रह्मतेज धूलिसे ढके हुए मूल्यवान् मणिके समान छिप गया था । वे अपनी कमरमें एक मैला - कुचैला कपड़ा लपेटे रहते थे । उनका यज्ञोपवीत भी बहुत ही मैला हो गया था । इसलिये अज्ञानी जनता ' यह कोई द्विज है ', ' कोई अधम ब्राह्मण है ' ऐसा कहकर उनका तिरस्कार कर दिया करती थी, किन्तु वे इसका कोई विचार न करके स्वच्छन्द विचरते थे ॥१० ॥ दूसरोंकी मजदूरी करके पेट पालते देख जब उन्हें उनके भाइयोंने खेतकी क्यारियाँ

ठीक करनेमें लगा दिया तब वे उस कार्यको भी करने लगे । परन्तु उन्हें इस बातका कुछ भी ध्यान न था कि उन क्यारियोंकी भूमि समतल है या ऊँची - नीची अथवा वह छोटी है या बड़ी । उनके भाई उन्हें चावलकी कनी, खली, भूसी, घुने हुए उड़द अथवा बरतनोंमें लगी हुई जले अन्नकी खुरचन – जो कुछ भी दे देते, उसीको वे अमृतके समान खा लेते थे ॥११ ॥

अथ कदाचित्कश्चिद् वृषलपतिर्भद्रकाल्यै पुरुषपशुमालभतापत्यकामः ॥१२ ॥

तस्य ह दैवमुक्तस्य पशोः पदवीं तदनुचराः परिधावन्तो निशि निशीथसमये तमसाऽऽवृतायामनधि - गतपशव आकस्मिकेन विधिना केदारान् वीरासनेन मृगवराहादिभ्यः संरक्षमाणमङ्गिरः प्रवर - सुतमपश्यन् ॥१३ ॥

किसी समय डाकुओंके सरदारने, जिसके सामन्त शूद्र जातिके थे, पुत्रकी कामनासे भद्रकालीको मनुष्यकी बलि देनेका संकल्प किया ॥१२ ॥ उसने जो पुरुष - पशु बलि देनेके

लिये पकड़ मँगाया था, वह दैववश उसके फंदेसे निकलकर भाग गया । उसे ढूँढ़नेके लिये उसके सेवक चारों ओर दौड़े; किन्तु अँधेरी रातमें आधी रातके समय कहीं उसका पता न लगा । इसी समय दैवयोगसे अकस्मात् उनकी दृष्टि इन आंगिरसगोत्रीय ब्राह्मणकुमारपर पड़ी, जो वीरासनसे बैठे हुए मृग - वराहादि जीवोंसे खेतोंकी रखवाली कर रहे थे ॥१३ ॥

अथ त एनमनवद्यलक्षणमवमृश्य भर्तृकर्मनिष्पत्तिं मन्यमाना बद्ध्वारशनया चण्डिकागृहमुपनिन्युर्मुदा विकसितवदनाः ॥ १४ ॥

अथ पणयस्तं स्वविधिनाभिषिच्याहतेन वाससाऽऽच्छाद्य भूषणालेपस्रक्-****** ebook converter DEMO Watermarks *******

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तिलकादिभिरुपस्कृतं भुक्तवन्तं धूपदीपमाल्य - लाजकिसलयाङ्कुरफलोपहारोपेतया वैशस - संस्थया महता गीतस्तुतिमृदङ्गपणवघोषेण च पुरुषपशुं भद्रकाल्याः पुरत उपवेशयामासुः ॥१५ ॥ अथ वृषलराजपणिः पुरुषपशोरसृगासवेन देवीं भद्रकालीं

यक्ष्यमाण - स्तदभिमन्त्रितमसिमतिकरालनिशितमुपाददे ॥ १६ ॥

तेषां वृषलानां रजस्तमःप्रकृतीनां धनमदरजउत्सिक्तमनसां भगवत्कलावीरकुलं कदर्थीकृत्योत्पथेन स्वैरं विहरतां हिंसाविहाराणां कर्मातिदारुणं यद्ब्रह्मभूतस्य साक्षाद्ब्रह्मर्षिसुतस्य निर्वैरस्य सर्वभूतसुहृदः सूनायामप्यननुमत-मालम्भनं तदुपलभ्य ब्रह्मतेजसातिदुर्विषहेण दन्दह्यमानेन वपुषा सहसोच्चचाट सैव देवी भद्रकाली ॥१७ ॥ भृशममर्षरोषावेशरभस-विलसितभ्रुकुटिविटपकुटिलदंष्ट्रारुणेक्षणाटोपाति - भयानकवदना हन्तुकामेवेदं

महाट्टहासमति - संरम्भेण विमुंचन्ती तत उत्पत्य पापीयसां दुष्टानां तेनैवासिना विवृक्णशीर्णां गलात्स्रवन्तमसृगासवमत्युष्णं सह गणेन निपीयातिपानमदविह्वलोच्चैस्तरां स्वपार्षदैः सह जगौ ननर्त च विजहार च शिरः कन्दुक - लीलया || १८ || एवमेव खलु महदभिचाराति - क्रमः कार्त्स्न्येनात्मने फलति ॥१९ ॥ न वा एतद्विष्णुदत्त महदद्भुतं यदसम्भ्रमः स्वशिरश्छेदन आपतितेऽपि

विमुक्तदेहाद्यात्मभावसुदृढ हृदयग्रन्थीनां सर्वसत्त्वसुहृदात्मनां निर्वैराणां साक्षाद्भगवतानिमिषारिवरायुधेनाप्रमत्तेन तैस्तै - र्भावैः परिरक्ष्यमाणानां तत्पादमूलमकुतश्चि - द्भयमुपसृतानां भागवतपरमहंसानाम् ॥२० ॥

उन्होंने देखा कि यह पशु तो बड़े अच्छे लक्षणोंवाला है, इससे हमारे स्वामीका कार्य अवश्य सिद्ध हो जायगा । यह सोचकर उनका मुख आनन्दसे खिल उठा और वे उन्हें रस्सियोंसे बाँधकर चण्डिकाके मन्दिरमें ले आये ॥१४ ॥

तदनन्तर उन चोरोंने अपनी पद्धतिके अनुसार विधिपूर्वक उनको अभिषेक एवं स्नान कराकर कोरे वस्त्र पहनाये तथा नाना प्रकारके आभूषण, चन्दन, माला और तिलक आदिसे विभूषित कर अच्छी तरह भोजन कराया । फिर धूप, दीप, माला, खील, पत्ते, अंकुर और फल आदि उपहार - सामग्रीके सहित बलिदानकी विधिसे गान, स्तुति और मृदंग एवं ढोल आदिका महान् शब्द करते उस पुरुष - पशुको भद्रकालीके सामने नीचा सिर कराके बैठा दिया ॥१५ ॥

इसके पश्चात् दस्युराजके पुरोहित बने हुए लुटेरेने उस नर - पशुके रुधिरसे देवीको तृप्त करनेके लिये देवीमन्त्रोंसे अभिमन्त्रित एक तीक्ष्ण खड्ग उठाया ॥१६ ॥

चोर स्वभावसे तो रजोगुणी - तमोगुणी थे ही, धनके मदसे उनका चित्त और भी उन्मत्त हो गया था । हिंसामें भी उनकी स्वाभाविक रुचि थी । इस समय तो वे भगवान्के अंशस्वरूप ब्राह्मणकुलका तिरस्कार करके स्वच्छन्दतासे कुमार्गकी ओर बढ़ रहे थे । आपत्तिकालमें भी जिस हिंसाका अनुमोदन किया गया है, उसमें भी ब्राह्मणवधका सर्वथा निषेध है, तो भी वे साक्षात् ब्रह्मभावको प्राप्त हुए वैरहीन तथा समस्त प्राणियोंके सुहृद् एक ब्रह्मर्षिकुमारकी बलि देना चाहते थे । यह भयंकर कुकर्म देखकर देवी भद्रकालीके शरीरमें अति दुःसह ब्रह्मतेजसे दाह होने लगा और वे एकाएक मूर्तिको फोड़कर प्रकट हो गयीं ॥१७ ॥ अत्यन्त

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असहनशीलता और क्रोधके कारण उनकी भौंहें चढ़ी हुई थीं तथा कराल दाढ़ों और चढ़ी हुई लाल आँखोंके कारण उनका चेहरा बड़ा भयानक जान पड़ता था । उनके उस विकराल वेषको देखकर ऐसा जान पड़ता था मानो वे इस संसारका संहार कर डालेंगी । उन्होंने क्रोधसे तड़ककर बड़ा भीषण अट्टहास किया और उछलकर उस अभिमन्त्रित खड्गसे ही उन सारे पापियोंके सिर उड़ा दिये और अपने गणोंके सहित उनके गलेसे बहता हुआ गरम - गरम रुधिररूप आसव पीकर अति उन्मत्त हो ऊँचे स्वरसे गाती और नाचती हुई उन सिरोंको ही गेंद बनाकर खेलने लगीं ॥१८ ॥ सच है, महापुरुषोंके प्रति किया हुआ अत्याचाररूप अपराध

इसी प्रकार ज्यों - का - त्यों अपने ही ऊपर पड़ता है ॥१९ ॥ परीक्षित्! जिनकी देहाभिमानरूप

सुदृढ़ हृदयग्रन्थि छूट गयी है, जो समस्त प्राणियोंके सुहृद् एवं आत्मा तथा वैरहीन हैं, साक्षात् भगवान् ही भद्रकाली आदि भिन्न - भिन्न रूप धारण करके अपने कभी न चूकनेवाले कालचक्ररूप श्रेष्ठ शस्त्रसे जिनकी रक्षा करते हैं और जिन्होंने भगवान्के निर्भय चरणकमलोंका आश्रय ले रखा है- उन भगवद्भक्त परमहंसोंके लिये अपना सिर कटनेका अवसर आनेपर भी किसी प्रकार व्याकुल न होना - यह कोई बड़े आश्चर्यकी बात नहीं है ॥२० ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे जडभरतचरिते नवमोऽध्यायः ॥९ || १. प्रा ० पा ० — इवापावृतांग । २. प्रा ० पा ० – बन्धुरिति संज्ञोऽतज्ज्ञः । ३. प्रा ० पा०-वेतन ईहमानः । ४. प्रा ० पा ० - भद्रकाल्यै पशुमालभता । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******