श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 1001–1010

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1001–1010

पृष्ठ 1001

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सत इदमुत्थितं सदिति चेन्ननु तर्कहतं व्यभिचरति क्व च क्व च मृषा न तथोभययुक् । भगवन्! जैसे मिट्टीसे बना हुआ घड़ा मिट्टीरूप ही होता है, वैसे ही सत्से बना हुआ जगत् भी सत् ही है — यह बात युक्तिसंगत नहीं है । क्योंकि कारण और कार्यका निर्देश ही उनके भेदका द्योतक है । यदि केवल भेदका निषेध करनेके लिये ही ऐसा कहा जा रहा हो तो पिता और पुत्रमें, दण्ड और घटना में कार्य - कारण- भाव होनेपर भी वे एक दूसरेसे भिन्न हैं । इस प्रकार कार्य- कारणकी एकता सर्वत्र एक सी नहीं देखी जाती । यदि कारण - शब्दसे निमित्त -कारण न लेकर केवल उपादान-कारण लिया जाय — जैसे कुण्डलका सोना- तो भी कहीं- कहीं कार्यकी असत्यता प्रमाणित होती है; जैसे रस्सीमें साँप । यहाँ उपादान - कारणके सत्य होनेपर भी उसका कार्य सर्प सर्वथा असत्य है । यदि यह कहा जाय कि प्रतीत होनेवाले सर्पका उपादान - कारण केवल रस्सी नहीं है, उसके साथ अविद्याका — भ्रमका मेल भी है, तो यह समझना चाहिये कि अविद्या और सत् वस्तुके संयोगसे ही इस जगत्की उत्पत्ति हुई है । इसलिये जैसे रस्सीमें प्रतीत होनेवाला सर्प मिथ्या है, वैसे ही सत् वस्तुमें अविद्याके संयोगसे प्रतीत होनेवाला नाम- रूपात्मक जगत् भी मिथ्या है । यदि केवल व्यवहारकी सिद्धिके लिये ही जगत्की सत्ता अभीष्ट हो, तो उसमें कोई आपत्ति नहीं; क्योंकि वह पारमार्थिक सत्य न होकर केवल व्यावहारिक सत्य है । यह भ्रम व्यावहारिक जगत्‌में माने हुए कालकी दृष्टिसे अनादि है; और अज्ञानीजन बिना विचार किये पूर्व- पूर्वके भ्रमसे प्रेरित होकर अन्धपरम्परासे इसे मानते चले आ रहे हैं । ऐसी स्थितिमें कर्मफलको सत्य बतलानेवाली श्रुतियाँ केवल उन्हीं लोगोंको भ्रममें डालती हैं, जो कर्ममें जड हो रहे हैं और यह नहीं समझते कि इनका तात्पर्य कर्मफलकी नित्यता बतलानेमें नहीं, बल्कि उनकी प्रशंसा करके उन कर्मोंमें लगानेमें है * ॥३६ || व्यवहृतये विकल्प इषितोऽन्धपरम्परया भ्रमयति भारती त उरुवृत्तिभिरुक्थजडान् ॥३६

न यदिदमग्र आस न भविष्यदतो निधना- दनुमितमन्तरा त्वयि विभाति मृषैकरसे ।

अत उपमीयते द्रविणजातिविकल्पपथै- र्वितथमनोविलासमृतमित्यवयन्त्यबुधाः ॥ ३७

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पृष्ठ 1002

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भगवन्! वास्तविक बात तो यह है कि यह जगत् उत्पत्तिके पहले नहीं था और प्रलयके बाद नहीं रहेगा; इससे यह सिद्ध होता है कि यह बीचमें भी एकरस परमात्मामें मिथ्या ही प्रतीत हो रहा है । इसीसे हम श्रुतियाँ इस जगत्का वर्णन ऐसी उपमा देकर करती हैं कि जैसे मिट्टीमें घड़ा, लोहेमें शस्त्र और सोनेमें कुण्डल आदि नाममात्र हैं, वास्तवमें मिट्टी, लोहा और सोना ही हैं । वैसे ही परमात्मामें वर्णित जगत् नाममात्र है,

सर्वथा मिथ्या और मनकी कल्पना है । इसे नासमझ मूर्ख ही सत्य मानते हैं ' ॥३७ ॥

स यदजया त्वजामनुशयीत गुणांश्च जुषन् भजति सरूपतां तदनु मृत्युमपेतभगः । त्वमुत जहासि तामहिरिव त्वचमात्तभगो महसि महीयसेऽष्टगुणितेऽपरिमेयभगः ॥ ३८ यदि न समुद्धरन्ति यतयो हृदि कामजटा

दुरधिगमोऽसतां हृदि गतोऽस्मृतकण्ठमणिः ।

असुतृपयोगिनामुभयतोऽप्यसुखं भगव- न्ननपगतान्तकादनधिरूढपदाद् भवतः ॥३९

भगवन्! जब जीव मायासे मोहित होकर अविद्याको अपना लेता है, उस समय उसके स्वरूपभूत आनन्दादि गुण ढक जाते हैं; वह गुणजन्य वृत्तियों, इन्द्रियों और देहोंमें फँस जाता है तथा उन्हींको अपना आपा मानकर उनकी सेवा करने लगता है । अब उनकी जन्म - मृत्युमें अपनी जन्म- मृत्यु मानकर उनके चक्करमें पड़ जाता है । परन्तु प्रभो! जैसे साँप अपने केंचुलसे कोई सम्बन्ध नहीं रखता, उसे छोड़ देता है— वैसे ही आप माया — अविद्यासे कोई सम्बन्ध नहीं रखते, उसे सदा - सर्वदा छोड़े रहते हैं । इसीसे आपके सम्पूर्ण ऐश्वर्य, सदा-सर्वदा आपके साथ रहते हैं । अणिमा आदि अष्टसिद्धियोंसे युक्त परमैश्वर्यमें आपकी स्थिति है । इसीसे आपका ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य अपरिमित है, अनन्त है; वह देश, काल और वस्तुओंकी सीमासे आबद्ध नहीं है * ॥३८ ॥

भगवन्! यदि मनुष्य योगी- यति होकर भी अपने हृदयकी विषय- वासनाओंको उखाड़ नहीं फेंकते तो उन असाधकोंके लिये आप हृदयमें रहनेपर भी वैसे ही दुर्लभ हैं, जैसे कोई अपने गलेमें मणि पहने हुए हो, परन्तु उसकी याद न रहनेपर उसे ढूँढ़ता फिरे इधर- उधर । जो साधक अपनी इन्द्रियोंको तृप्त करनेमें ही लगे रहते हैं, विषयोंसे विरक्त भोगना दुःख -ही- दुःख, नहीं होते उन्हें जीवनभर और जीवनके बाद भी पड़ता है । क्योंकि वे साधक नहीं, दम्भी हैं । एक तो अभी उन्हें मृत्युसे छुटकारा नहीं मिला है, लोगोंको रिझाने, धन कमाने आदिके क्लेश उठाने पड़ रहे हैं, और दूसरे आपका स्वरूप न जाननेके कारण अपने धर्म - कर्मका उल्लंघन करनेसे परलोकमें नरक आदि प्राप्त ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1003

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होनेका भय भी बना ही रहता है' ॥ ३ ९ ॥ त्वदवगमी न वेत्ति भवदुत्थशुभाशुभयो- र्गुणविगुणान्वयांस्तर्हि देहभृतां च गिरः । अनुगमन्वहं सगुण गीतपरम्परया श्रवणभृतो यतस्त्वमपवर्गगतिर्मनुजैः ॥ ४० द्युपतय एव ते न ययुरन्तमनन्ततया त्वमपि यदन्तराण्डनिचया ननु सावरणाः । भगवन्! आपके वास्तविक स्वरूपको जाननेवाला पुरुष आपके दिये हुए पुण्य और पाप- कर्मोंके फल सुख एवं दुःखोंको नहीं जानता, नहीं भोगता; वह भोग्य और भोक्तापनके भावसे ऊपर उठ जाता है । उस समय विधि - निषेधके प्रतिपादक शास्त्र भी उससे निवृत्त हो जाते हैं; क्योंकि वे देहाभिमानियोंके लिये हैं । उनकी ओर तो उसका ध्यान ही नहीं जाता । जिसे आपके स्वरूपका ज्ञान नहीं हुआ है, वह भी यदि प्रतिदिन आपकी प्रत्येक युगमें की हुई लीलाओं, गुणोंका गान सुन- सुनकर उनके द्वारा आपको अपने हृदयमें बैठा लेता है तो अनन्त, अचिन्त्य, दिव्यगुणगणोंके निवासस्थान प्रभो! आपका वह प्रेमी भक्त भी पाप- पुण्योंके फल सुख-दुःखों और विधि -निषेधोंसे अतीत हो जाता है । क्योंकि आप ही उनकी मोक्षस्वरूप गति हैं । ( परन्तु इन ज्ञानी और प्रेमियोंको छोड़कर और सभी शास्त्र बन्धनमें हैं तथा वे उसका उल्लंघन करनेपर दुर्गतिको प्राप्त होते हैं ) * ॥४० ॥

भगवन्! स्वर्गादि लोकोंके अधिपति इन्द्र, ब्रह्मा प्रभृति भी आपकी थाह— आपका पार न पा सके; और आश्चर्यकी बात तो यह है कि आप भी उसे नहीं जानते । क्योंकि जब अन्त है ही नहीं, तब कोई जानेगा कैसे? प्रभो! जैसे आकाशमें हवासे धूलके नन्हें- नन्हें कण उड़ते रहते हैं, वैसे ही आपमें कालके वेगसे अपनेसे उत्तरोत्तर दसगुने सात आवरणोंके सहित असंख्य ब्रह्माण्ड एक साथ ही घूमते रहते हैं । तब भला, आपकी सीमा कैसे मिले । हम श्रुतियाँ भी आपके स्वरूपका साक्षात् वर्णन नहीं कर सकतीं, आपके अतिरिक्त वस्तुओंका निषेध करते - करते अन्तमें अपना भी निषेध कर देती हैं और आपमें ही अपनी सत्ता खोकर सफल हो जाती हैं * ॥४१ ॥

ख इव रजांसि वान्ति वयसा सह यच्छ्रुतय- स्त्वयि हि फलन्त्यतन्निरसनेन भवन्निधनाः ॥४१ श्रीभगवानुवाच इत्येतद् ब्रह्मणः पुत्रा आश्रुत्यात्मानुशासनम् । ******ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1004

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सनन्दनमथानर्चुः सिद्धा ज्ञात्वाऽऽत्मनो गतिम् ॥४२

इत्यशेषसमाम्नायपुराणोपनिषद्रसः ।

समुद्धृतः पूर्वजातैर्व्योमयानैर्महात्मभिः ॥ ४३

त्वं चैतद् ब्रह्मदायाद श्रद्धयाऽऽत्मानुशासनम् ।

धारयंश्चर गां कामं कामानां भर्जनं नृणाम् ॥४४

श्रीशुक उवाच

एवं स ऋषिणाऽऽदिष्टं गृहीत्वा श्रद्धयाऽऽत्मवान् ।

पूर्णः श्रुतधरो राजन्नाह वीरव्रतो मुनिः ॥४५

भगवान् नारायणने कहा- देवर्षे! इस प्रकार सनकादि ऋषियोंने आत्मा और ब्रह्मकी एकता बतलानेवाला उपदेश सुनकर आत्मस्वरूपको जाना और नित्य सिद्ध होनेपर भी इस उपदेशसे कृतकृत्य से होकर उन लोगोंने सनन्दनकी पूजा की ॥४२ ॥

नारद! सनकादि ऋषि सृष्टिके आरम्भमें उत्पन्न हुए थे, अतएव वे सबके पूर्वज हैं । उन आकाशगामी महात्माओंने इस प्रकार समस्त वेद, पुराण और उपनिषदोंका रस निचोड़ लिया है, यह सबका सार- सर्वस्व है ॥ ४३ ॥

देवर्षे! तुम भी उन्हींके समान ब्रह्माके मानस पुत्र हो-उनकी ज्ञान- सम्पत्तिके उत्तराधिकारी हो । तुम भी श्रद्धाके साथ इस ब्रह्मात्मविद्याको धारण करो और स्वच्छन्दभावसे पृथ्वीमें विचरण करो । यह विद्या मनुष्योंकी समस्त वासनाओंको भस्म कर देनेवाली है ॥४४ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! देवर्षि नारद बड़े संयमी, ज्ञानी, पूर्णकाम और नैष्ठिक ब्रह्मचारी हैं । वे जो कुछ सुनते हैं, उन्हें उसकी धारणा हो जाती है । भगवान् नारायणने उन्हें जब इस प्रकार उपदेश किया, तब उन्होंने बड़ी श्रद्धासे उसे ग्रहण किया और उनसे यह कहा ॥४५ ॥

नारद उवाच

नमस्तस्मै भगवते कृष्णायामलकीर्तये ।

यो धत्ते सर्वभूतानामभवायोशतीः कलाः ॥४६

इत्याद्यमृषिमानम्य तच्छिष्यांश्च महात्मनः ।

ततोऽगादाश्रमं साक्षात् पितुर्द्वैपायनस्य मे ॥४७

सभाजितो भगवता कृतासनपरिग्रहः ।

तस्मै तद् वर्णयामास नारायणमुखाच्छ्रुतम् ॥४८

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पृष्ठ 1005

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इत्येतद् वर्णितं राजन् यन्नः प्रश्नः कृतस्त्वया ।

यथा ब्रह्मण्यनिर्देश्ये निर्गुणेऽपि मनश्चरेत् ॥४९

योऽस्योत्प्रेक्षक आदिमध्यनिधने योऽव्यक्तजीवेश्वरो यः सृष्ट्वेदमनुप्रविश्य ऋषिणा चक्रे पुरः शास्ति ताः । यं संपद्य जहात्यजामनुशयी सुप्तः कुलायं यथा तं कैवल्यनिरस्तयोनिमभयं ध्यायेदजस्रं हरिम् ॥५० देवर्षि नारदने कहा- भगवन्! आप सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्ण हैं । आपकी कीर्ति परम पवित्र है । आप समस्त प्राणियोंके परम कल्याण– मोक्षके लिये कमनीय

कलावतार धारण किया करते हैं । मैं आपको नमस्कार करता हूँ ॥ ४६ ॥

परीक्षित्! इस प्रकार महात्मा देवर्षि नारद आदि ऋषि भगवान् नारायणको और उनके शिष्योंको नमस्कार करके स्वयं मेरे पिता श्रीकृष्णद्वैपायनके आश्रमपर गये ॥४७ ॥ भगवान् वेदव्यासने उनका यथोचित सत्कार किया । वे आसन स्वीकार

करके बैठ गये, इसके बाद देवर्षि नारदने जो कुछ भगवान् नारायणके मुँहसे सुना था, वह सब कुछ मेरे पिताजीको सुना दिया ॥ ४८ ॥ राजन्! इस प्रकार मैंने तुम्हें बतलाया

कि मन - वाणीसे अगोचर और समस्त प्राकृत गुणोंसे रहित परब्रह्म परमात्माका वर्णन श्रुतियाँ किस प्रकार करती हैं और उसमें मनका कैसे प्रवेश होता है? यही तो तुम्हारा प्रश्न था ॥४९ ॥ परीक्षित्! भगवान् ही इस विश्वका संकल्प करते हैं तथा उसके आदि,

मध्य और अन्तमें स्थित रहते हैं। वे प्रकृति और जीव दोनोंके स्वामी हैं । उन्होंने ही इसकी सृष्टि करके जीवके साथ इसमें प्रवेश किया है और शरीरोंका निर्माण करके वे ही उनका नियन्त्रण करते हैं । जैसे गाढ़ निद्रा- सुषुप्तिमें मग्न पुरुष अपने शरीरका अनुसन्धान छोड़ देता है, वैसे ही भगवान्‌को पाकर यह जीव मायासे मुक्त हो जाता है । भगवान् ऐसे विशुद्ध, केवल चिन्मात्र तत्त्व हैं कि उनमें जगत्के कारण माया अथवा प्रकृतिका रत्तीभर भी अस्तित्व नहीं है । वे ही वास्तवमें अभय -स्थान हैं । उनका चिन्तन निरन्तर करते रहना चाहिये ॥ ५० ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे नारदनारायणसंवादे वेदस्तुतिर्नाम सप्ताशीतितमोऽध्यायः ॥८७ ॥

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पृष्ठ 1006

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* इन श्लोकोंपर श्रीश्रीधरस्वामीने बहुत सुन्दर श्लोक लिखे हैं, वे अर्थसहित यहाँ दिये जाते हैं—

जय जयाजित जह्यगजंगमावृतिमजामुपनीतमृषागुणाम् ।

न हि भवन्तमृते प्रभवन्त्यमी निगमगीतगुणार्णवता तव ॥१ ॥

अजित! आपकी जय हो, जय हो! झूठे गुण धारण करके चराचर जीवको आच्छादित करनेवाली इस मायाको नष्ट कर दीजिये । आपके बिना बेचारे जीव इसको नहीं मार सकेंगे- नहीं पार कर सकेंगे । वेद इस बातका गान करते रहते हैं कि आप सकल सद्गुणोंके समुद्र हैं ॥१ ॥

* द्रुहिणवह्निरवीन्द्रमुखामरा जगदिदं न भवेत्पृथगुत्थितम् ।

बहुमुखैरपि मन्त्रगणैरजस्त्वमुरुमूर्तिरतो विनिगद्यसे ॥ २ ॥

ब्रह्मा, अग्नि, सूर्य, इन्द्र आदि देवता तथा यह सम्पूर्ण जगत् प्रतीत होनेपर भी आपसे पृथक् नहीं है । इसलिये अनेक देवताओंका प्रतिपादन करनेवाले वेद- मन्त्र

उन देवताओंके नामसे पृथक् - पृथक् आपकी ही विभिन्न मूर्तियोंका वर्णन करते हैं ।

वस्तुतः आप अजन्मा हैं; उन मूर्तियोंके रूपमें भी आपका जन्म नहीं होता ॥२ ॥

+ सकलवेदगणेरितसद्गुणस्त्वमिति सर्वमनीषिजना रताः ।

त्वयि सुभद्रगुणश्रवणादिभिस्तव पदस्मरणेन गतक्लमाः ॥३ ॥

सारे वेद आपके सद्गुणोंका वर्णन करते हैं । इसलिये संसारके सभी विद्वान् आपके मंगलमय कल्याणकारी गुणोंके श्रवण, स्मरण आदिके द्वारा आपसे ही प्रेम करते हैं और आपके चरणोंका स्मरण करके सम्पूर्ण क्लेशोंसे मुक्त हो जाते हैं ॥३ ॥

*नवपुः प्रतिपद्य यदि त्वयि श्रवणवर्णनसंस्मरणादिभिः ।

नरहरे! न भजन्ति नृणामिदं दृतिवदुच्छ्वसितं विफलं ततः ॥४ ॥

नरहरे! मनुष्य- शरीर प्राप्त करके यदि जीव आपके श्रवण, वर्णन और संस्मरण आदिके द्वारा आपका भजन करते तो जीवोंका श्वास लेना धौंकनीके समान ही सर्वथा व्यर्थ है ॥४ ॥

* उदरादिषु यः पुंसां चिन्तितो मुनिवर्त्मभिः ।

हन्ति मृत्युभयं देवो हृद्गतं तमुपास्महे ॥५ ॥

मनुष्य ऋषि-मुनियोंके द्वारा बतलायी हुई पद्धतियोंसे उदर आदि स्थानोंमें जिनका चिन्तन करते हैं और जो प्रभु उनके चिन्तन करनेपर मृत्यु - भयका नाश कर देते हैं, उन हृदयदेशमें विराजमान प्रभुकी हम उपासना करते हैं ॥ ५॥

+ स्वनिर्मितेषु कार्येषु तारतम्यविवर्जितम् ।

सर्वानुस्यूतसन्मात्रं भगवन्तं भजामहे ॥६ ॥

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पृष्ठ 1007

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अपने द्वारा निर्मित सम्पूर्ण कार्योंमें जो न्यूनाधिक श्रेष्ठ - कनिष्ठके भावसे रहित एवं सबमें भरपूर हैं, इस रूपमें अनुभवमें आनेवाली निर्विशेष सत्ताके रूपमें स्थित हैं, उन भगवान्का हम भजन करते हैं ॥६ ॥

* त्वदंशस्य ममेशान त्वन्मायाकृतबन्धनम् ।

त्वदङ्घ्रिसेवामादिश्य परानन्द निवर्तय ॥७ ॥

मेरे परमानन्दस्वरूप स्वामी! मैं आपका अंश हूँ । अपने चरणोंकी सेवाका आदेश देकर अपनी मायाके द्वारा निर्मित मेरे बन्धनको निवृत्त कर दो ॥ ७ ॥

+ त्वत्कथामृतपाथोघौ विहरन्तो महामुदः ।

कुर्वन्ति कृतिनः केचिच्चतुर्वर्गं तृणोपमम् ॥ ८ ॥

कोई- कोई विरले शुद्धान्तःकरण महापुरुष आपके अमृतमय कथा- समुद्रमें विहार करते हुए परमानन्दमें मग्न रहते हैं और धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष- इन चारों पुरुषार्थोंको तृणके समान तुच्छ बना देते हैं ।

* त्वय्यात्मनि जगन्नाथे मन्मनो रमतामिह ।

कदा ममेदृशं जन्म मानुषं सम्भविष्यति ॥९ ॥

आप जगत्के स्वामी हैं और अपनी आत्मा ही हैं । इस जीवनमें ही मेरा मन आपमें रम जाय । मेरे स्वामी! मेरा ऐसा सौभाग्य कब होगा, जब मुझे इस प्रकारका मनुष्यजन्म प्राप्त होगा?

+ चरणस्मरणं प्रेम्णा तव देव सुदुर्लभम् ।

यथाकथञ्चिन्नृहरे मम भूयादहर्निशम् ॥१० ॥

देव! आपके चरणोंका प्रेमपूर्वक स्मरण अत्यन्त दुर्लभ है । चाहे जैसे - कैसे भी हो, नृसिंह! मुझे तो आपके चरणोंका स्मरण दिन - रात बना रहे । *

क्वाहं बुद्ध्यादिसंरुद्धः क्व च भूमन्महस्तव ।

दीनबन्धो दयासिन्धो भक्तिं मे नृहरे दिश ॥११ ॥

अनन्त! कहाँ बुद्धि आदि परिच्छिन्न उपाधियोंसे घिरा हुआ मैं और कहाँ आपका मन, वाणी आदिके अगोचर स्वरूप! ( आपका ज्ञान तो बहुत ही कठिन है ) इसलिये दीनबन्ध, दयासिन्धु! नरहरि देव! मुझे तो अपनी भक्ति ही दीजिये । + मिथ्यातर्कसुकर्कशेरितमहावादान्धकारान्तर- भ्राम्यन्मन्दमतेरमन्दमहिमंस्त्वज्ज्ञानवर्त्मास्फुटम् । श्रीमन्माधव वामन त्रिनयन श्रीशंकर श्रीपते गोविन्देति मुदा वदन् मधुपते मुक्तः कदा स्यामहम् ॥१२ ॥

अनन्त महिमाशाली प्रभो! जो मन्दमति पुरुष झूठे तर्कोंके द्वारा प्रेरित अत्यन्त कर्कश वाद- विवादके घोर अन्धकारमें भटक रहे हैं, उनके लिये आपके ज्ञानका ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1008

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मार्ग स्पष्ट सूझना सम्भव नहीं है । इसलिये मेरे जीवनमें ऐसी सौभाग्यकी घड़ी कब आवेगी कि मैं श्रीमन्माधव, वामन, त्रिलोचन, श्रीशंकर, श्रीपते, गोविन्द, मधुपते— इस प्रकार आपको आनन्दमें भरकर पुकारता हुआ मुक्त हो जाऊँगा ।

*` यत्सत्त्वतः सदाभाति जगदेतदसत् स्वतः ।

सदाभासमसत्यस्मिन् भगवन्तं भजाम तम् ॥१३ ॥

यह जगत् अपने स्वरूप, नाम और आकृतिके रूपमें असत् है, फिर भी जिस अधिष्ठान - सत्ताकी सत्यतासे यह सत्य जान पड़ता है तथा जो इस असत्य प्रपंचमें सत्यके रूपसे सदा प्रकाशमान रहता है, उस भगवान्‌का हम भजन करते हैं ।

+ तपन्तु तापैः प्रपतन्तु पर्वतादटन्तु तीर्थानि पठन्तु चागमान् ।

यजन्तु यागैर्विवदन्तु वादैर्हरिं विना नैव मृतिं तरन्ति ॥१४ ॥

लोग पंचाग्नि आदि तापोंसे तप्त हों, पर्वतसे गिरकर आत्मघात कर लें, तीर्थोंका पर्यटन करें, वेदोंका पाठ करें, यज्ञोंके द्वारा यजन करें अथवा भिन्न-भिन्न मतवादोंके द्वारा आपसमें विवाद करें, परन्तु भगवान् के बिना इस मृत्युमय संसार- सागरसे पार नहीं जाते ।

* अनिन्द्रियोऽपि यो देवः सर्वकारकशक्तिधृक् ।

सर्वज्ञः सर्वकर्ता च सर्वसेव्यं नमामि तम् ॥१५ ॥

जो प्रभु इन्द्रियरहित होनेपर भी समस्त बाह्य और आन्तरिक इन्द्रियकी शक्तिको धारण करता है और सर्वज्ञ एवं सर्वकर्ता है, उस सबके सेवनीय प्रभुको मैं नमस्कार करता हूँ ।

+ त्वदीक्षणवशक्षोभमायाबोधितकर्मभिः ।

जातान् संसरतः खिन्नान्नृहरे पाहि नः पितः ॥ १६ ॥

नृसिंह! आपके सृष्टि- संकल्पसे क्षुब्ध होकर मायाने कर्मोंको जाग्रत् कर दिया है । उन्हींके कारण हम लोगोंका जन्म हुआ और अब आवागमनके चक्करमें भटककर हम दुःखी हो रहे हैं । पिताजी! आप हमारी रक्षा कीजिये ।

* अन्तर्यन्ता सर्वलोकस्य गीतः श्रुत्या युक्त्या चैवमेवावसेयः ।

यः सर्वज्ञः सर्वशक्तिर्नृसिंहः श्रीमन्तं तं चेतसैवावलम्बे ॥१७ ॥

श्रुतिने समस्त दृश्यप्रपंचके अन्तर्यामीके रूपमें जिनका गान किया है, और युक्तिसे भी वैसा ही निश्चय होता है । जो सर्वज्ञ, सर्वशक्ति और नृसिंह – पुरुषोत्तम उन्हीं सर्वसौन्दर्य- माधुर्यनिधि प्रभुका मैं मन - ही- मन आश्रय ग्रहण करता हूँ । * यस्मिन्नुद्यद् विलयमपि यद् भाति विश्वं लयादौ जीवोपेतं गुरुकरुणया केवलात्मावबोधे । अत्यन्तान्तं व्रजति सहसा सिन्धुवत्सिन्धुमध्ये ******ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1009

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मध्येचित्तं त्रिभुवनगुरुं भावये तं नृसिंहम् ॥१८ ॥

जीवोंके सहित यह सम्पूर्ण विश्व जिनमें उदय होता है और सुषुप्ति आदि अवस्थाओंमें विलयको प्राप्त होता है तथा भान होता है, गुरुदेवकी करुणा प्राप्त होनेपर जब शुद्ध आत्माका ज्ञान होता है, तब समुद्रमें नदीके समान सहसा यह जिनमें आत्यन्तिक प्रलयको प्राप्त हो जाता है, उन्हीं त्रिभुवनगुरु नृसिंह भगवान्की मैं अपने हृदयमें भावना करता हूँ।

+ संसारचक्रक्रकचैर्विदीर्णमुदीर्णनानाभवतापतप्तम् ।

कथंचिदापन्नमिह प्रपन्नं त्वमुद्धर श्रीनृहरे नृलोकम् ॥१९ ॥

नृसिंह! यह जीव संसार-चक्रके आरेसे टुकड़े- टुकड़े हो रहा है और नाना प्रकारके सांसारिक तापोंकी धधकती हुई लपटोंसे झुलस रहा है । यह आपत्तिग्रस्त जीव किसी प्रकार आपकी कृपासे आपकी शरणमें आया है । आप इसका उद्धार कीजिये ।

* यदा परानन्दगुरो भवत्पदे पदं मनो मे भगवँल्लभेत ।

तदा निरस्ताखिलसाधन श्रमः श्रयेय सौख्यं भवतः कृपातः ॥२० ॥

परमानन्दमय गुरुदेव! भगवन्! जब मेरा मन आपके चरणोंमें स्थान प्राप्त कर लेगा, तब मैं आपकी कृपासे समस्त साधनोंके परिश्रमसे छुटकारा पाकर परमानन्द प्राप्त करूँगा ।

+ भजतो हि भवान् साक्षात्परमानन्दचिद्घनः ।

आत्मैव किमतः कृत्यं तुच्छदारसुतादिभिः ॥२१ ॥

जो आपका भजन करते हैं, उनके लिये आप स्वयं साक्षात् परमानन्दचिद्घन आत्मा ही हैं । इसलिये उन्हें तुच्छ स्त्री, पुत्र, धन आदिसे क्या प्रयोजन है? * मुंचन्नंगतदंगसंगमनिशं त्वामेव संचिन्तयन् सन्तः सन्ति यतो यतो गतमदास्तानाश्रमानावसन् । नित्यं तन्मुखपंकजाद्विगलितत्वत्पुण्यगाथामृत- स्रोतःसम्प्लवसंप्लुतो नरहरे न स्यामहं देहभृत् ॥२२ ॥

मैं शरीर और उसके सम्बन्धियोंकी आसक्ति छोड़कर रात -दिन आपका ही चिन्तन करूँगा और जहाँ-जहाँ निरभिमान सन्त निवास करते हैं, उन्हीं- उन्हीं आश्रमोंमें रहूँगा । उन सत्पुरुषोंके मुख कमलसे निःसृत आपकी पुण्यमयी कथा- सुधाकी नदियोंकी धारामें प्रतिदिन स्नान करूँगा और नृसिंह! फिर मैं कभी देहके बन्धनमें नहीं पहुँगा । * उद्भूतं भवतः सतोऽपि भुवनं सन्नैव सर्पः स्रजः कुर्वत् कार्यमपीह कूटकनकं वेदोऽपि नैवंपरः । ******ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1010

श्रीमद्भागवत महापुराण - २, पृष्ठ 1010 का मूल पृष्ठ
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अद्वैतं तव सत्परं तु परमानन्दं पदं तन्मुदा वन्दे सुन्दरमिन्दिरानुत हरे मा मुंच मामानतम् ॥२३ ॥

मालामें प्रतीयमान सर्पके समान सत्यस्वरूप आपसे उदय होनेपर भी यह त्रिभुवन सत्य नहीं है । झूठा सोना बाजारमें चल जानेपर भी सत्य नहीं हो जाता । वेदोंका तात्पर्य भी जगत्की सत्यतामें नहीं है । इसलिये आपका जो परम सत्य परमानन्दस्वरूप अद्वैत सुन्दर पद है, हे इन्दिरावन्दित श्रीहरे! मैं उसीकी वन्दना करता हूँ । मुझ शरणागतको मत छोड़िये ।

+ मुकुटकुण्डलकंकणकिंकिणीपरिणतं कनकं परमार्थतः ।

महदहङ्कृतिखप्रमुखं तथा नरहरे न परं परमार्थतः ॥२४ ॥

सोना मुकुट, कुण्डल, कंकण और किंकिणीके रूपमें परिणत होनेपर भी वस्तुतः सोना ही है । इसी प्रकार नृसिंह! महत्तत्त्व, अहंकार और आकाश, वायु आदिके रूपमें उपलब्ध होनेवाला यह सम्पूर्ण जगत् वस्तुतः आपसे भिन्न नहीं है । * नृत्यन्ती तव वीक्षणांगणगता कालस्वभावादिभि- भवान् सत्त्वरजस्तमोगुणमयानुन्मीलयन्ती बहून् । मामाक्रम्य पदा शिरस्यतिभरं सम्मर्दयन्त्यातुरं माया ते शरणं गतोऽस्मि नृहरे त्वामेव तां वारय ॥२५ ॥

प्रभो! आपकी यह माया आपकी दृष्टिके आँगनमें आकर नाच रही है और काल, स्वभाव आदिके द्वारा सत्त्वगुण, रजोगुणी और तमोगुणी अनेकानेक भावोंका प्रदर्शन कर रही है । साथ ही यह मेरे सिरपर सवार होकर मुझ आतुरको बलपूर्वक रौंद रही है। नृसिंह! मैं आपकी शरणमें आया हूँ, आप ही इसे रोक दीजिये । + दम्भन्यासमिषेण वंचितजनं भोगैकचिन्तातुरं सम्मुह्यन्तमहर्निशं विरचितोद्योगक्लमैराकुलम् । आज्ञालंघिनमज्ञमज्ञजनतासम्माननासन्मदं दीनानाथ दयानिधान परमानन्द प्रभो पाहि माम् ॥ २६ ॥

प्रभो! मैं दम्भपूर्ण संन्यासके बहाने लोगोंको ठग रहा हूँ। एकमात्र भोगकी चिन्तासे ही आतुर हूँ तथा रात- दिन नाना प्रकारके उद्योगोंकी रचनाकी थकावटसे व्याकुल तथा बेसुध हो रहा हूँ । मैं आपकी आज्ञाका उल्लंघन करता हूँ, अज्ञानी हूँ और अज्ञानी लोगोंके द्वारा प्राप्त सम्मानसे ' मैं सन्त हूँ ' ऐसा घमण्ड कर बैठा हूँ । दीनानाथ, दयानिधान, परमानन्द! मेरी रक्षा कीजिये ।

* अवगमं तव मे दिशि माधव स्फुरति यन्न सुखासुखसंगमः ।

श्रवणवर्णनभावमथापि वा न हि भवामि यथा विधिकिंकरः ॥२७ ॥

माधव! आप मुझे अपने स्वरूपका अनुभव कराइये, जिससे फिर सुख- ****** ebook converter DEMO Watermarks *******