श्रीगणेशाय नमः।
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 991–1000
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 991–1000
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सनन्दन उवाच
स्वसृष्टमिदमापीय शयानं सह शक्तिभिः ।
तदन्ते बोधयांचक्रुस्तल्लिङ्गैः श्रुतयः परम् ॥१२
यथा शयानं सम्राजं वन्दिनस्तत्पराक्रमैः ।
प्रत्यूषेऽभ्येत्य सुश्लोकैर्बोधयन्त्यनुजीविनः ॥ १३
भगवान् नारायणने ऋषियोंकी उस भरी सभामें नारदजीको उनके प्रश्नका उत्तर दिया और वह कथा सुनायी, जो पूर्वकालीन जनलोकनिवासियोंमें परस्पर वेदोंके तात्पर्य और ब्रह्मके स्वरूपके सम्बन्धमें विचार करते समय कही गयी थी ॥८ ॥
भगवान् नारायणने कहा - नारदजी! प्राचीन कालकी बात है। एक बार जनलोकमें वहाँ रहनेवाले ब्रह्माके मानस पुत्र नैष्ठिक ब्रह्मचारी सनक, सनन्दन, सनातन आदि परमर्षियोंका ब्रह्मसत्र ( ब्रह्मविषयक विचार या प्रवचन) हुआ था ॥९ ॥
उस समय तुम मेरी श्वेतद्वीपाधिपति अनिरुद्ध-मूर्तिका दर्शन करनेके लिये श्वेतद्वीप चले गये थे । उस समय वहाँ उस ब्रह्मके सम्बन्धमें बड़ी ही सुन्दर चर्चा हुई थी, जिसके विषयमें श्रुतियाँ भी मौन धारण कर लेती हैं, स्पष्ट वर्णन न करके तात्पर्यरूपसे लक्षित कराती हुई उसीमें सो जाती हैं । उस ब्रह्मसत्रमें यही प्रश्न उपस्थित किया गया था, जो तुम मुझसे पूछ रहे हो ॥१० ॥
सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार-ये चारों भाई शास्त्रीय ज्ञान, तपस्या और शील- स्वभावमें समान हैं । उन लोगोंकी दृष्टिमें शत्रु, मित्र और उदासीन एक- से हैं । फिर भी उन्होंने अपनेमेंसे सनन्दनको तो वक्ता बना लिया और शेष भाई सुननेके इच्छुक बनकर बैठ गये ॥११ ॥
सनन्दनजीने कहा – जिस प्रकार प्रातः काल होनेपर सोते हुए सम्राट्को जगानेके लिये अनुजीवी वंदीजन उसके पास आते हैं और सम्राट्के पराक्रम तथा सुयशका गान करके उसे जगाते हैं, वैसे ही जब परमात्मा अपने बनाये हुए सम्पूर्ण जगत्को अपनेमें लीन करके अपनी शक्तियोंके सहित सोये रहते हैं; तब प्रलयके अन्तमें श्रुतियाँ उनका प्रतिपादन करनेवाले वचनोंसे उन्हें इस प्रकार जगाती हैं ॥ १२-१३ ॥ श्रुतय ऊचुः जय जय जह्यजामजित दोषगृभीतगुणां त्वमसि यदात्मना समवरुद्धसमस्तभगः । अगजगदोकसामखिलशक्त्यवबोधक ते क्वचिदजयाऽऽत्मना च चरतोऽनुचरेन्निगमः ॥१४ बृहदुपलब्धमेतदवयन्त्यवशेषतया यत उदयास्तमयौ विकृतेर्मृदि वाविकृतात् ।
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श्रुतियाँ कहती हैं- अजित! आप ही सर्वश्रेष्ठ हैं, आपपर कोई विजय नहीं प्राप्त कर सकता । आपकी जय हो, जय हो । प्रभो! आप स्वभावसे ही समस्त ऐश्वर्यांसे पूर्ण हैं, इसलिये चराचर प्राणियोंको फँसानेवाली मायाका नाश कर दीजिये । प्रभो! इस गुणमयी मायाने दोषके लिये- जीवोंके आनन्दादिमय सहज स्वरूपका आच्छादन करके उन्हें बन्धनमें डालनेके लिये ही सत्त्वादि गुणोंको ग्रहण किया है । जगत्में जितनी भी साधना, ज्ञान, क्रिया आदि शक्तियाँ हैं, उन सबको जगानेवाले आप ही हैं । इसलिये आपके मिटाये बिना यह माया मिट नहीं सकती । ( इस विषयमें यदि प्रमाण पूछा जाय, तो आपकी श्वासभूता श्रुतियाँ ही- हम ही प्रमाण हैं । ) यद्यपि हम आपका स्वरूपतः वर्णन करनेमें असमर्थ हैं, परन्तु जब कभी आप मायाके द्वारा जगत्की सृष्टि करके सगुण हो जाते हैं या उसको निषेध करके स्वरूपस्थितिकी लीला करते हैं अथवा अपना सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीविग्रह प्रकट करके क्रीड़ा करते हैं, तभी हम यत्किंचित् आपका वर्णन करनेमें समर्थ होती हैं* ॥१४ ॥
इसमें सन्देह नहीं कि हमारे द्वारा इन्द्र, वरुण आदि देवताओंका भी वर्णन किया जाता है, परन्तु हमारे ( श्रुतियोंके ) सारे मन्त्र अथवा सभी मन्त्रद्रष्टा ऋषि प्रतीत होनेवाले इस सम्पूर्ण जगत्को ब्रह्मस्वरूप ही अनुभव करते हैं । क्योंकि जिस समय यह सारा जगत् नहीं रहता, उस समय भी आप बच रहते हैं । जैसे घट, शराव ( मिट्टीका प्याला — कसोरा ) आदि सभी विकार मिट्टीसे ही उत्पन्न और उसीमें लीन होते हैं, उसी प्रकार सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति और प्रलय आपमें ही होती है । तब क्या आप पृथ्वीके समान विकारी हैं? नहीं-नहीं, आप तो एकरस- निर्विकार हैं । इसीसे तो यह जगत् आपमें उत्पन्न नहीं, प्रतीत है । इसलिये जैसे घट, शराव आदिका वर्णन भी मिट्टीका ही वर्णन है, वैसे ही इन्द्र, वरुण आदि देवताओंका वर्णन भी आपका ही वर्णन है । यही कारण है कि विचारशील ऋषि, मनसे जो कुछ सोचा जाता है और वाणीसे जो कुछ कहा जाता है, उसे आपमें ही स्थित, आपका ही स्वरूप देखते हैं । मनुष्य अपना पैर चाहे कहीं भी रखे – ईंट, पत्थर या काठपर- होगा वह पृथ्वीपर ही; क्योंकि वे सब पृथ्वीस्वरूप ही हैं । इसलिये हम चाहे जिस नाम या जिस रूपका वर्णन करें, वह आपका ही नाम, आपका ही रूप है * ॥१५ ॥
अत ऋषयो दधुस्त्वयि मनोवचनाचरितं कथमयथा भवन्ति भुवि दत्तपदानि नृणाम् ॥१५ इति तव सूरयत्र्यधिपतेऽखिललोकमल- क्षपणकथामृताब्धिमवगाह्य तपांसि जहुः । किमुत पुनः स्वधामविधुताशयकालगुणाः परम भजन्ति ये पदमजस्रसुखानुभवम् ॥१६
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भगवन्! लोग सत्त्व, रज, तम -इन तीन गुणोंकी मायासे बने हुए अच्छे - बुरे भावों या अच्छी - बुरी क्रियाओंमें उलझ जाया करते हैं, परन्तु आप तो उस मायानटीके स्वामी, उसको नचानेवाले हैं । इसीलिये विचारशील पुरुष आपकी लीलाकथाके अमृतसागरमें गोते लगाते रहते हैं और इस प्रकार अपने सारे पाप तापको धो - बहा देते हैं । क्यों न हो, आपकी लीला- कथा सभी जीवोंके मायामलको नष्ट करनेवाली जो है । पुरुषोत्तम! जिन महापुरुषोंने आत्मज्ञानके द्वारा अन्तःकरणके राग-द्वेष आदि और शरीरके कालकृत जरा- मरण आदि दोष मिटा दिये हैं और निरन्तर आपके उस स्वरूपकी अनुभूतिमें मग्न रहते हैं, जो अखण्ड आनन्दस्वरूप है, उन्होंने अपने पाप- तापोंको सदाके लिये शान्त, भस्म कर दिया है— इसके विषयमें तो कहना ही क्या है' ॥ १६ ॥
दृतय इव श्वसन्त्यसुभृतो यदि तेऽनुविधा महदहमादयोऽण्डमसृजन् यदनुग्रहतः । पुरुषविधोऽन्वयोऽत्र चरमोऽन्नमयादिषु यः सदसतः परं त्वमथ यदेष्ववशेषमृतम् ॥१७ उदरमुपासते य ऋषिवर्त्मसु कूर्पदृशः परिसरपद्धतिं हृदयमारुणयो दहरम् । भगवन्! प्राणधारियोंके जीवनकी सफलता इसीमें है कि वे आपका भजन - सेवन करें, आपकी आज्ञाका पालन करें; यदि वे ऐसा नहीं करते तो उनका जीवन व्यर्थ है और उनके शरीरमें श्वासका चलना ठीक वैसा ही है, जैसा लुहारकी धौंकनीमें हवाका आना- जाना । महत्तत्त्व, अहंकार आदिने आपके अनुग्रहसे- आपके उनमें प्रवेश करनेपर ही इस ब्रह्माण्डकी सृष्टि की है । अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय – इन पाँचों कोशोंमें पुरुष-रूपसे रहनेवाले, उनमें 'मैं-मैं ' की स्फूर्ति करनेवाले भी आप ही हैं! आपके ही अस्तित्वसे उन कोशोंके अस्तित्वका अनुभव होता है और उनके न रहनेपर भी अन्तिम अवधिरूपसे आप विराजमान रहते हैं । इस प्रकार सबमें अन्वित और सबकी अवधि होनेपर भी आप असंग ही हैं । क्योंकि वास्तवमें जो कुछ वृत्तियोंके द्वारा अस्ति अथवा नास्तिके रूपमें अनुभव होता है, उन समस्त कार्य- कारणोंसे आप परे हैं । ' नेति नेति' के द्वारा इन सबका निषेध हो जानेपर भी आप ही शेष रहते हैं, क्योंकि आप उस निषेधके भी साक्षी हैं और वास्तवमें आप ही एकमात्र सत्य हैं ( इसलिये आपके भजनके बिना जीवका जीवन व्यर्थ ही है, क्योंकि वह इस महान् सत्यसे वंचित है ) * ॥१७ ॥
ऋषियोंने आपकी प्राप्तिके लिये अनेकों मार्ग माने हैं । उनमें जो स्थूल दृष्टिवाले हैं, वे मणिपूरक चक्रमें अग्निरूपसे आपकी उपासना करते हैं। अरुणवंशके ऋषि समस्त नाड़ियोंके निकलनेके स्थान हृदयमें आपके परम सूक्ष्मस्वरूप दहर ब्रह्मकी उपासना करते हैं । प्रभो! हृदयसे ही आपको प्राप्त करनेका श्रेष्ठ मार्ग सुषुम्ना नाड़ी ब्रह्मरन्ध्रतक
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गयी हुई है । जो पुरुष उस ज्योतिर्मय मार्गको प्राप्त कर लेता है और उससे ऊपरकी ओर बढ़ता है, वह फिर जन्म- मृत्युके चक्करमें नहीं पड़ता* ॥ १८ ॥ भगवन्! आपने ही
देवता, मनुष्य और पशु - पक्षी आदि योनियाँ बनायी हैं । सदा - सर्वत्र सब रूपोंमें आप हैं ही, इसलिये कारणरूपसे प्रवेश न करनेपर भी आप ऐसे जान पड़ते हैं, मानो उसमें प्रविष्ट हुए हों। साथ ही विभिन्न आकृतियोंका अनुकरण करके कहीं उत्तम, तो कहीं अधमरूपसे प्रतीत होते हैं, जैसे आग छोटी - बड़ी लकड़ियों और कर्मोंके अनुसार प्रचुर अथवा अल्प परिमाणमें या उत्तम अधमरूपमें प्रतीत होती है । इसलिये संत पुरुष लौकिक- पारलौकिक कर्मोंकी दूकानदारीसे, उनके फलोंसे विरक्त हो जाते हैं और अपनी निर्मल बुद्धिसे सत्य- असत्य, आत्मा- अनात्माको पहचानकर जगत्के झूठे रूपोंमें नहीं फँसते; आपके सर्वत्र एकरस, समभावसे स्थित सत्यस्वरूपका साक्षात्कार करते हैं ' ॥१९ ॥
तत उदगादनन्त तव धाम शिरः परमं पुनरिह यत् समेत्य न पतन्ति कृतान्तमुखे ॥१८ स्वकृतविचित्रयोनिषु विशन्निव हेतुतया तरतमतश्चकास्स्यनलवत् स्वकृतानुकृतिः । अथ वितथास्वमूष्ववितथं तव धाम समं विरजधियोऽन्वयन्त्यभिविपण्यव एकरसम् ॥१९ स्वकृतपुरेष्वमीष्वबहिरन्तरसंवरणं तव पुरुषं वदन्त्यखिलशक्तिधृतोंऽशकृतम् । प्रभो! जीव जिन शरीरोंमें रहता है, वे उसके कर्मके द्वारा निर्मित होते हैं और वास्तवमें उन शरीरोंके कार्य - कारणरूप आवरणोंसे वह रहित है, क्योंकि वस्तुतः उन आवरणोंकी सत्ता ही नहीं है । तत्त्वज्ञानी पुरुष ऐसा कहते हैं कि समस्त शक्तियोंको धारण करनेवाले आपका ही वह स्वरूप है । स्वरूप होनेके कारण अंश न होनेपर भी उसे अंश कहते हैं और निर्मित न होनेपर भी निर्मित कहते हैं । इसीसे बुद्धिमान् पुरुष जीवके वास्तविक स्वरूपपर विचार करके परम विश्वासके साथ आपके चरणकमलोंकी उपासना करते हैं । क्योंकि आपके चरण ही समस्त वैदिक कर्मोंके समर्पणस्थान और मोक्षस्वरूप हैं * ॥२० ॥ भगवन्! परमात्मतत्त्वका ज्ञान प्राप्त करना अत्यन्त कठिन है ।
उसीका ज्ञान करानेके लिये आप विविध प्रकारके अवतार ग्रहण करते हैं और उनके द्वारा ऐसी लीला करते हैं, जो अमृतके महासागरसे भी मधुर और मादक होती है । जो लोग उसका सेवन करते हैं, उनकी सारी थकावट दूर हो जाती है, वे परमानन्दमें मग्न हो जाते हैं । कुछ प्रेमी भक्त तो ऐसे होते हैं, जो आपकी लीला- कथाओंको छोड़कर मोक्षकी भी अभिलाषा नहीं करते - स्वर्ग आदिकी तो बात ही क्या है । वे आपके चरणकमलोंके प्रेमी परमहंसोंके सत्संगमें, जहाँ आपकी कथा होती है, इतना सुख
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मानते हैं कि उसके लिये इस जीवनमें प्राप्त अपनी घर-गृहस्थीका भी परित्याग कर देते हैं ' ॥२१ ॥
इति नृगतिं विविच्य कवयो निगमावपनं भवत उपासतेऽङ्घ्रिमभवं भुवि विश्वसिताः ॥२० दुरवगमात्मतत्त्वनिगमाय तवात्ततनो- श्चरितमहामृताब्धिपरिवर्तपरिश्रमणाः । न परिलषन्ति केचिदपवर्गमपीश्वर ते चरणसरोजहंसकुलसंगविसृष्टगृहाः ॥२१ त्वदनुपथं कुलायमिदमात्मसुहृत्प्रियव- च्चरति तथोन्मुखे त्वयि हिते प्रिय आत्मनि च । प्रभो! यह शरीर आपकी सेवाका साधन होकर जब आपके पथका अनुरागी हो जाता है, तब आत्मा, हितैषी, सुहृद् और प्रिय व्यक्तिके समान आचरण करता है । आप जीवके सच्चे हितैषी, प्रियतम और आत्मा ही हैं और सदा - सर्वदा जीवको अपनानेके लिये तैयार भी रहते हैं । इतनी सुगमता होनेपर तथा अनुकूल मानव शरीरको पाकर भी लोग सख्यभाव आदिके द्वारा आपकी उपासना नहीं करते, आपमें नहीं रमते, बल्कि इस विनाशी और असत् शरीर तथा उसके सम्बन्धियोंमें ही रम जाते हैं, उन्हींकी उपासना करने लगते हैं और इस प्रकार अपने आत्माका हनन करते हैं, उसे अधोगतिमें पहुँचाते हैं । भला, यह कितने कष्टकी बात है! इसका फल यह होता है कि उनकी सारी वृत्तियाँ, सारी वासनाएँ शरीर आदिमें ही लग जाती हैं और फिर उनके अनुसार उनको पशु-पक्षी आदिके न जाने कितने बुरे- बुरे शरीर ग्रहण करने पड़ते हैं और इस प्रकार अत्यन्त भयावह जन्म- मृत्युरूप संसारमें भटकना पड़ता है * ॥२२ ॥
न त रमन्त्यहो असदुपासनयाऽऽत्महनो यदनुशया भ्रमन्त्युरुभये कुशरीरभूतः ॥ २२ निभृतमरुन्मनोऽक्षदृढयोगयुजो हृदि य- न्मुनय उपासते तदरयोऽपि ययुः स्मरणात् । स्त्रिय उरगेन्द्रभोगभुजदण्डविषक्तधियो वयमपि ते समाः समदृशोऽङ्घ्रिसरोजसुधाः ॥२३ प्रभो! बड़े -बड़े विचारशील योगी- यति अपने प्राण, मन और इन्द्रियोंको वशमें करके दृढ़ योगाभ्यासके द्वारा हृदयमें आपकी उपासना करते हैं । परन्तु आश्चर्यकी बात तो यह है कि उन्हें जिस पदकी प्राप्ति होती है, उसीकी प्राप्ति उन शत्रुओंको भी हो जाती है, जो आपसे वैर भाव रखते हैं । क्योंकि स्मरण तो वे भी करते ही हैं । कहाँतक
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कहें, भगवन्! वे स्त्रियाँ, जो अज्ञानवश आपको परिच्छिन्न मानती हैं और आपकी शेषनागके समान मोटी, लम्बी तथा सुकुमार भुजाओंके प्रति कामभावसे आसक्त रहती हैं, जिस परम पदको प्राप्त करती हैं, वही पद हम श्रुतियोंको भी प्राप्त होता है— यद्यपि हम आपको सदा- सर्वदा एकरस अनुभव करती हैं और आपके चरणारविन्दका मकरन्दरस पान करती रहती हैं । क्यों न हो, आप समदर्शी जो हैं । आपकी दृष्टिमें उपासकके परिच्छिन्न या अपरिच्छिन्न भावमें कोई अन्तर नहीं है ॥ २३ ॥
क इह नु वेद बतावरजन्मलयोऽग्रसरं यत उदगादृषिर्यमनु देवगणा उभये । तर्हि न सन्न चासदुभयं न च कालजवः किमपि न तत्र शास्त्रमवकृष्य शयीत यदा ॥ २४ जनिमसतः सतो मृतिमुतात्मनि ये च भिदां विपणमृतं स्मरन्त्युपदिशन्ति त आरुपितैः । त्रिगुणमयः पुमानिति भिदा यदबोधकृता त्वयि न ततः परत्र स भवेदवबोधरसे ॥ २५ भगवन्! आप अनादि और अनन्त हैं । जिसका जन्म और मृत्यु कालसे सीमित है, वह भला, आपको कैसे जान सकता है । स्वयं ब्रह्माजी, निवृत्तिपरायण सनकादि तथा प्रवृत्तिपरायण मरीचि आदि भी बहुत पीछे आपसे ही उत्पन्न हुए हैं । जिस समय आप सबको समेटकर सो जाते हैं, उस समय ऐसा कोई साधन नहीं रह जाता, जिससे उनके साथ ही सोया हुआ जीव आपको जान सके। क्योंकि उस समय न तो आकाशादि स्थूल जगत् रहता है और न तो महत्तत्त्वादि सूक्ष्म जगत् । इन दोनोंसे बने हुए शरीर और उनके निमित्त क्षण- मुहूर्त आदि कालके अंग भी नहीं रहते। उस समय कुछ भी नहीं रहता । यहाँतक कि शास्त्र भी आपमें ही समा जाते हैं ( ऐसी अवस्थामें आपको जाननेकी चेष्टा न करके आपका भजन करना ही सर्वोत्तम मार्ग है। ) * ॥२४ ॥ प्रभो! कुछ लोग मानते
हैं कि असत् जगत्की उत्पत्ति होती है और कुछ लोग कहते हैं कि सत्-रूप दुःखोंका नाश होनेपर मुक्ति मिलती है । दूसरे लोग आत्माको अनेक मानते हैं, तो कई लोग कर्मके द्वारा प्राप्त होनेवाले लोक और परलोकरूप व्यवहारको सत्य मानते हैं । इसमें सन्देह नहीं कि ये सभी बातें भ्रममूलक हैं और वे आरोप करके ही ऐसा उपदेश करते हैं । पुरुष त्रिगुणमय है - इस प्रकारका भेदभाव केवल अज्ञानसे ही होता है और आप अज्ञानसे सर्वथा परे हैं । इसलिये ज्ञानस्वरूप आपमें किसी प्रकारका भेदभाव नहीं है ' ॥२५ ॥
सदिव मनस्त्रिवृत्त्वयि विभात्यसदामनुजात् सदभिमृशन्त्य शेषमिदमात्मतयाऽऽत्मविदः ।
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न हि विकृतिं त्यजन्ति कनकस्य तदात्मतया स्वकृतमनुप्रविष्टमिदमात्मतयावसितम् ॥२६ तव परि ये चरन्त्यखिलसत्त्वनिकेततया त उत पदाऽऽक्रमन्त्यविगणय्य शिरो निर्ऋतेः । परिवयसे पशूनिव गिरा विबुधानपि तां- स्त्वयि कृतसौहृदाः खलु पुनन्ति न ये विमुखाः ॥२७ यह त्रिगुणात्मक जगत् मनकी कल्पनामात्र है । केवल यही नहीं, परमात्मा और जगत्से पृथक् प्रतीत होनेवाला पुरुष भी कल्पनामात्र ही है । इस प्रकार वास्तवमें असत् होनेपर भी अपने सत्य अधिष्ठान आपकी सत्ताके कारण यह सत्य- सा प्रतीत हो रहा है । इसलिये भोक्ता, भोग्य और दोनोंके सम्बन्धको सिद्ध करनेवाली इन्द्रियाँ आदि जितना भी जगत् है, सबको आत्मज्ञानी पुरुष आत्मरूपसे सत्य ही मानते हैं । सोनेसे बने हुए कड़े, कुण्डल आदि स्वर्णरूप ही तो हैं; इसलिये उनको इस रूपमें जाननेवाला पुरुष उन्हें छोड़ता नहीं, वह समझता है कि यह भी सोना है । इसी प्रकार यह जगत् आत्मामें ही कल्पित, आत्मासे ही व्याप्त है; इसलिये आत्मज्ञानी पुरुष इसे आत्मरूप ही मानते हैं * ॥२६ ॥ भगवन्! जो लोग यह समझते हैं कि आप समस्त प्राणियों और पदार्थोंके
अधिष्ठान हैं, सबके आधार हैं और सर्वात्मभावसे आपका भजन- सेवन करते हैं, वे मृत्युको तुच्छ समझकर उसके सिरपर लात मारते हैं अर्थात् उसपर विजय प्राप्त कर लेते हैं । जो लोग आपसे विमुख हैं, वे चाहे जितने बड़े विद्वान् हों, उन्हें आप कर्मोंका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतियोंसे पशुओंके समान बाँध लेते हैं । इसके विपरीत जिन्होंने आपके साथ प्रेमका सम्बन्ध जोड़ रखा है, वे न केवल अपनेको बल्कि दूसरोंको भी पवित्र कर देते हैं — जगत्के बन्धनसे छुड़ा देते हैं । ऐसा सौभाग्य भला, आपसे विमुख लोगोंको कैसे प्राप्त हो सकता है ॥२७ ॥
त्वमकरणः स्वराडखिलकारकशक्तिधर- स्तव बलिमुद्वहन्ति समदन्त्यजयानिमिषाः । वर्षभुजोऽखिलक्षितिपतेरिव विश्वसृजो विदधति यत्र ये त्वधिकृता भवतश्चकिताः ॥ २८ स्थिरचरजातयः स्युरजयोत्थनिमित्तयुजो विहर उदीक्षया यदि परस्य विमुक्त ततः । न हि परमस्य कश्चिदपरो न परश्च भवेद् वियत इवापदस्य तव शून्यतुलां दधतः ॥ २९ प्रभो! आप मन, बुद्धि और इन्द्रिय आदि करणोंसे -चिन्तन, कर्म आदिके
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साधनोंसे सर्वथा रहित हैं । फिर भी आप समस्त अन्तःकरण और बाह्य करणोंकी शक्तियोंसे सदा - सर्वदा सम्पन्न हैं । आप स्वतः सिद्ध ज्ञानवान्, स्वयंप्रकाश हैं; अतः कोई काम करनेके लिये आपको इन्द्रियोंकी आवश्यकता नहीं है । जैसे छोटे- छोटे राजा अपनी- अपनी प्रजासे कर लेकर स्वयं अपने सम्राट्को कर देते हैं, वैसे ही मनुष्योंके पूज्य देवता और देवताओंके पूज्य ब्रह्मा आदि भी अपने अधिकृत प्राणियोंसे पूजा स्वीकार करते हैं और मायाके अधीन होकर आपकी पूजा करते रहते हैं। वे इस प्रकार आपकी पूजा करते हैं कि आपने जहाँ जो कर्म करनेके लिये उन्हें नियुक्त कर दिया है, वे आपसे भयभीत रहकर वहीं वह काम करते रहते हैं * ॥२८ ॥
नित्यमुक्त! आप मायातीत हैं, फिर भी जब अपने ईक्षणमात्रसे - संकल्पमात्रसे मायाके साथ क्रीडा करते हैं, तब आपका संकेत पाते ही जीवोंके सूक्ष्म शरीर और उनके सुप्त कर्म- संस्कार जग जाते हैं और चराचर प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है । प्रभो! आप परम दयालु हैं । आकाशके समान सबमें सम होनेके कारण न तो कोई आपका अपना है और न तो पराया । वास्तवमें तो आपके स्वरूपमें मन और वाणीकी गति ही नहीं है । आपमें कार्य - कारणरूप प्रपंचका अभाव होनेसे बाह्य दृष्टिसे आप शून्यके समान ही जान पड़ते हैं; परन्तु उस दृष्टिके भी अधिष्ठान होनेके कारण आप परम सत्य हैं ' ॥२९ ॥
अपरिमिता ध्रुवास्तनुभृतो यदि सर्वगता- स्तर्हि न शास्यतेति नियमो ध्रुव नेतरथा । अजनि च यन्मयं तदविमुच्य नियन्तृ भवेत् सममनुजानतां यदमतं मतदुष्टतया ॥३० न घटत उद्भवः प्रकृतिपूरुषयोरजयो- रुभययुजा भवन्त्यसुभृतो जलबुद्बुदवत् । भगवन्! आप नित्य एकरस हैं । यदि जीव असंख्य हों और सब- के - सब नित्य एवं सर्वव्यापक हों, तब तो वे आपके समान ही हो जायँगे; उस हालतमें वे शासित हैं और आप शासक — यह बात बन ही नहीं सकती, और तब आप उनका नियन्त्रण कर ही नहीं सकते । उनका नियन्त्रण आप तभी कर सकते हैं, जब वे आपसे उत्पन्न एवं आपकी अपेक्षा न्यून हों । इसमें सन्देह नहीं कि ये सब- के - सब जीव तथा इनकी एकता या विभिन्नता आपसे ही उत्पन्न हुई है । इसलिये आप उनमें कारणरूपसे रहते हुए भी उनके नियामक हैं । वास्तवमें आप उनमें समरूपसे स्थित हैं । परन्तु यह जाना नहीं जा सकता कि आपका वह स्वरूप कैसा है । क्योंकि जो लोग ऐसा समझते हैं कि हमने जान लिया, उन्होंने वास्तवमें आपको नहीं जाना; उन्होंने तो केवल अपनी बुद्धिके विषयको जाना है, जिससे आप परे हैं । और साथ ही मतिके द्वारा जितनी वस्तुएँ जानी
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जाती हैं, वे मतियोंकी भिन्नताके कारण भिन्न -भिन्न होती हैं; इसलिये उनकी दुष्टता, एक मतके साथ दूसरे मतका विरोध प्रत्यक्ष ही है । अतएव आपका स्वरूप समस्त मतोंके परे है * ॥३० ॥
स्वामिन्! जीव आपसे उत्पन्न होता है, यह कहनेका ऐसा अर्थ नहीं है कि आप परिणामके द्वारा जीव बनते हैं । सिद्धान्त तो यह है कि प्रकृति और पुरुष दोनों ही अजन्मा हैं । अर्थात् उनका वास्तविक स्वरूप – जो आप हैं - कभी वृत्तियोंके अंदर उतरता नहीं, जन्म नहीं लेता । तब प्राणियोंका जन्म कैसे होता है? अज्ञानके कारण प्रकृतिको पुरुष और पुरुषको प्रकृति समझ लेनेसे, एकका दूसरेके साथ संयोग हो जानेसे जैसे ' बुलबुला ' नामकी कोई स्वतन्त्र वस्तु नहीं है, परन्तु उपादान- कारण जल और निमित्त - कारण वायुके संयोगसे उसकी सृष्टि हो जाती है । प्रकृतिमें पुरुष और पुरुषमें प्रकृतिका अध्यास ( एकमें दूसरेकी कल्पना) हो जानेके कारण ही जीवोंके विविध नाम और गुण रख लिये जाते हैं। अन्तमें जैसे समुद्रमें नदियाँ और मधुमें समस्त पुष्पोंके रस समा जाते हैं, वैसे ही वे सब- के - सब उपाधिरहित आपमें समा जाते हैं । (इसलिये जीवोंकी भिन्नता और उनका पृथक् अस्तित्व आपके द्वारा नियन्त्रित है । उनकी पृथक् स्वतन्त्रता और सर्व व्यापकता आदि वास्तविक सत्यको न जाननेके कारण ही मानी जाती है ) * ॥३१ ॥
त्वयि त इमे ततो विविधनामगुणैः परमे सरित इवार्णवे मधुनि लिल्युरशेषरसाः ॥ ३१ नृषु तव मायया भ्रमममीष्ववगत्य भृशं त्वयि सुधियोऽभवे दधति भावमनुप्रभवम् । कथमनुवर्ततां भवभयं तव यद् भ्रुकुटि: सृजति मुहुस्त्रिणेमिरभवच्छरणेषु भयम् ॥३२ भगवन्! सभी जीव आपकी मायासे भ्रममें भटक रहे हैं, अपनेको आपसे पृथक् मानकर जन्म- मृत्युका चक्कर काट रहे हैं। परन्तु बुद्धिमान् पुरुष इस भ्रमको समझ लेते हैं और सम्पूर्ण भक्तिभावसे आपकी शरण ग्रहण करते हैं, क्योंकि आप जन्म- मृत्युके चक्करसे छुड़ानेवाले हैं। यद्यपि शीत, ग्रीष्म और वर्षा – इन तीन भागोंवाला कालचक्र आपका भ्रूविलासमात्र है, वह सभीको भयभीत करता है, परन्तु वह उन्हींको बार- बार भयभीत करता है, जो आपकी शरण नहीं लेते । जो आपके शरणागत भक्त हैं, उन्हें भला, जन्म- मृत्युरूप संसारका भय कैसे हो सकता है? ' ॥३२ ॥
विजितहृषीकवायुभिरदान्तमनस्तुरगं य इह यतन्ति यन्तुमतिलोलमुपायखिदः ।
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व्यसनशतान्विताः समवहाय गुरोश्चरणं वणिज इवाज सन्त्यकृतकर्णधरा जलधौ ॥३३ स्वजनसुतात्मदारधनधामधरासुरथै- स्त्वयि सति किं नृणां श्रयत आत्मनि सर्वरसे । इति सदजानतां मिथुनतो रतये चरतां सुखयति को विह स्वविहते स्वनिरस्तभगे ॥ ३४ भुवि पुरुपुण्यतीर्थसदनान्यृषयो विमदा- स्त उत भवत्पदाम्बुजहृदोऽघभिदङ्घ्रिजलाः । अजन्मा प्रभो! जिन योगियोंने अपनी इन्द्रियों और प्राणोंको वशमें कर लिया है, वे भी, जब गुरुदेवके चरणोंकी शरण न लेकर उच्छृंखल एवं अत्यन्त चंचल मन-तुरंगको अपने वशमें करनेका प्रयत्न करते हैं, तब अपने साधनोंमें सफल नहीं होते । उन्हें बार- बार खेद और सैकड़ों विपत्तियोंका सामना करना पड़ता है, केवल श्रम और दुःख ही उनके हाथ लगता है । उनकी ठीक वही दशा होती है, जैसी समुद्रमें बिना कर्णधारकी नावपर यात्रा करनेवाले व्यापारियोंकी होती है ( तात्पर्य यह कि जो मनको वशमें करना चाहते हैं, उनके लिये कर्णधार - गुरुकी अनिवार्य आवश्यकता है ) * ॥३३ ॥
भगवन्! आप अखण्ड आनन्दस्वरूप और शरणागतोंके आत्मा हैं । आपके रहते स्वजन, पुत्र, देह, स्त्री, धन, महल, पृथ्वी, प्राण और रथ आदिसे क्या प्रयोजन है? जो लोग इस सत्य सिद्धान्तको न जानकर स्त्री- पुरुषके सम्बन्धसे होनेवाले सुखोंमें ही रम रहे हैं, उन्हें संसारमें भला ऐसी कौन - सी वस्तु है, जो सुखी कर सके । क्योंकि संसारकी सभी वस्तुएँ स्वभावसे ही विनाशी हैं, एक न एक दिन मटियामेट हो जानेवाली हैं । और तो क्या, वे स्वरूपसे ही सारहीन और सत्ताहीन हैं; वे भला, क्या सुख दे सकती हैं ' ॥३४ ॥ भगवन्! जो ऐश्वर्य, लक्ष्मी, विद्या, जाति, तपस्या आदिके घमंडसे रहित हैं,
वे संतपुरुष इस पृथ्वीतलपर परम पवित्र और सबको पवित्र करनेवाले पुण्यमय सच्चे तीर्थस्थान हैं । क्योंकि उनके हृदयमें आपके चरणारविन्द सर्वदा विराजमान रहते हैं और यही कारण है कि उन संत पुरुषोंका चरणामृत समस्त पापों और तापोंको सदाके लिये नष्ट कर देनेवाला है । भगवन्! आप नित्य- आनन्दस्वरूप आत्मा ही हैं । जो एक बार भी आपको अपना मन समर्पित कर देते हैं- आपमें मन लगा देते हैं - वे उन देह - गेहोंमें कभी नहीं फँसते जो जीवके विवेक, वैराग्य, धैर्य, क्षमा और शान्ति आदि गुणोंका नाश करनेवाले हैं । वे तो बस, आपमें ही रम जाते हैं * ॥३५ ॥
दधति सकृन्मनस्त्वयि य आत्मनि नित्यसुखे न पुनरुपासते पुरुषसारहरावसथान् ॥३५