श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 1121–1130

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1121–1130

पृष्ठ 1121

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विदेहानां पुरे ह्यस्मिन्नहमेकैव मूढधीः ।

यान्यमिच्छन्त्यसत्यस्मादात्मदात् काममच्युतात् ॥३४

सुहृत् प्रेष्ठतमो नाथ आत्मा चायं शरीरिणाम् ।

तं विक्रीयात्मनैवाहं रमेऽनेन यथा रमा ॥३५

कियत् प्रियं ते व्यभजन् कामा ये कामदा नराः ।

आद्यन्तवन्तो भार्याया देवा वा कालविद्रुताः ॥ ३६

नूनं मे भगवान् प्रीतो विष्णुः केनापि कर्मणा ।

निर्वेदोऽयं दुराशाया यन्मे जातः सुखावहः ॥३७

मैवं स्युर्मन्दभाग्यायाः क्लेशा निर्वेदहेतवः ।

येनानुबन्धं निर्हृत्य पुरुषः शममृच्छति ॥३८

तेनोपकृतमादाय शिरसा ग्राम्यसंगताः ।

त्यक्त्वा दुराशाः शरणं व्रजामि तमधीश्वरम् ॥३९

सन्तुष्टा श्रद्दधत्येतद्यथालाभेन जीवती ।

विहराम्यमुनैवाहमात्मना रमणेन वै ॥४०

यह शरीर एक घर है । इसमें हड्डियोंके टेढ़े - तिरछे बाँस और खंभे लगे हुए हैं; चाम, रोएँ और नाखूनोंसे यह छाया गया है । इसमें नौ दरवाजे हैं, जिनसे मल निकलते ही रहते हैं । इसमें संचित सम्पत्तिके नामपर केवल मल और मूत्र हैं । मेरे अतिरिक्त ऐसी कौन स्त्री है जो इस स्थूल शरीरको अपना प्रिय समझकर सेवन करेगी || ३३ || यों तो यह विदेहोंकी-जीवन्मुक्तोंकी नगरी है, परन्तु इसमें मैं ही सबसे मूर्ख और दुष्ट हूँ; क्योंकि अकेली मैं ही तो आत्मदानी, अविनाशी एवं परमप्रियतम परमात्माको छोड़कर दूसरे पुरुषकी अभिलाषा ,, सुहृद्,,करती हूँ ॥३४ ॥ मेरे हृदयमें विराजमान प्रभु समस्त प्राणियोंके हितैषी प्रियतम

स्वामी और आत्मा हैं । अब मैं अपने - आपको देकर इन्हें खरीद लूँगी और इनके साथ वैसे ही विहार करूँगी, जैसे लक्ष्मीजी करती हैं ॥ ३५ ॥ मेरे मूर्ख चित्त! तू बतला तो सही, जगत्के

विषयभोगोंने और उनको देनेवाले पुरुषोंने तुझे कितना सुख दिया है । अरे! वे तो स्वयं ही पैदा होते और मरते रहते हैं । मैं केवल अपनी ही बात नहीं कहती, केवल मनुष्योंकी भी नहीं; क्या देवताओंने भी भोगोंके द्वारा अपनी पत्नियोंको सन्तुष्ट किया है? वे बेचारे तो स्वयं कालके गालमें पड़े - पड़े कराह रहे हैं ॥ ३६ ॥ अवश्य ही मेरे किसी शुभकर्मसे विष्णुभगवान् मुझपर

प्रसन्न हैं, तभी तो दुराशासे मुझे इस प्रकार वैराग्य हुआ है । अवश्य ही मेरा यह वैराग्य सुख देनेवाला होगा ॥३७ ॥ यदि मैं मन्दभागिनी होती तो मुझे ऐसे दुःख ही न उठाने पड़ते, जिनसे

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पृष्ठ 1122

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वैराग्य होता है । मनुष्य वैराग्यके द्वारा ही घर आदिके सब बन्धनोंको काटकर शान्ति- लाभ करता है ॥३८ ॥ अब मैं भगवान्‌का यह उपकार आदरपूर्वक सिर झुकाकर स्वीकार करती हूँ

और विषयभोगोंकी दुराशा छोड़कर उन्हीं जगदीश्वरकी शरण ग्रहण करती हूँ ॥३९ ॥ अब

मुझे प्रारब्धके अनुसार जो कुछ मिल जायगा उसीसे निर्वाह कर लूँगी और बड़े सन्तोष तथा श्रद्धाके साथ रहूँगी । मैं अब किसी दूसरे पुरुषकी ओर न ताककर अपने हृदयेश्वर, आत्मस्वरूप प्रभुके साथ ही विहार करूँगी || ४० || यह जीव संसारके कूएँमें गिरा हुआ है । विषयोंने इसे अंधा बना दिया है, कालरूपी अजगरने इसे अपने मुँहमें दबा रखा है । अब भगवान्‌को छोड़कर इसकी रक्षा करनेमें दूसरा कौन समर्थ है ॥ ४१ ॥ जिस समय जीव

समस्त विषयोंसे विरक्त हो जाता है, उस समय वह स्वयं ही अपनी रक्षा कर लेता है । इसलिये बड़ी सावधानीके साथ यह देखते रहना चाहिये कि सारा जगत् कालरूपी अजगरसे ग्रस्त है ॥४२ ॥

संसारकूपे पतितं विषयैर्मुषितेक्षणम् ।

ग्रस्तं कालाहिनाऽऽत्मानं कोऽन्यस्त्रातुमधीश्वरः ॥४१

आत्मैव ह्यात्मनो गोप्ता निर्विद्येत यदाखिलात् ।

अप्रमत्त इदं पश्येद् ग्रस्तं कालाहिना जगत् ॥४२

ब्राह्मण उवाच

एवं व्यवसितमतिर्दुराशां कान्ततर्षजाम् ।

छित्त्वोपशममास्थाय शय्यामुपविवेश सा ॥ ४३

आशा हि परमं दुःखं नैराश्यं परमं सुखम् ।

यथा सञ्छिद्य कान्ताशां सुखं सुष्वाप पिंगला ॥४४

अवधूत दत्तात्रेयजी कहते हैं - राजन्! पिंगला वेश्याने ऐसा निश्चय करके अपने प्रिय धनियोंकी दुराशा, उनसे मिलनेकी लालसाका परित्याग कर दिया और शान्तभावसे जाकर वह अपनी सेजपर सो रही ॥४३ ॥ सचमुच आशा ही सबसे बड़ा दुःख है और निराशा ही

सबसे बड़ा सुख है; क्योंकि पिंगला वेश्याने जब पुरुषकी आशा त्याग दी, तभी वह सुखसे सो सकी ॥४४ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धेऽष्टमोऽध्यायः ॥८ ॥

* नहीं तो एक ही कमलके गन्धमें आसक्त हुआ भ्रमर जैसे रात्रिके समय उसमें बंद हो ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1123

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जानेसे नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार स्वादवासनासे एक ही गृहस्थका अन्न खानेसे उसके सांसर्गिक मोहमें फँसकर यति भी नष्ट हो जायगा । * हाथी पकड़नेवाले तिनकोंसे ढके हुए गड्ढेपर कागजकी हथिनी खड़ी कर देते हैं । उसे देखकर हाथी वहाँ आता है और गड्ढेमें गिरकर फँस जाता है । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1124

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अथ नवमोऽध्यायः अवधूतोपाख्यान - कुररसे लेकर भृंगीतक सात गुरुओंकी कथा ब्राह्मण उवाच

परिग्रहो हि दुःखाय यद् यत्प्रियतमं नृणाम् ।

अनन्तं सुखमाप्नोति तद् विद्वान् यस्त्वकिंचनः ॥१

सामिषं कुररं जघ्नुर्बलिनो ये निरामिषाः ।

तदामिषं परित्यज्य स सुखं समविन्दत ॥२

न मे मानावमानौ स्तो न चिन्ता गेहपुत्रिणाम् ।

आत्मक्रीड आत्मरतिर्विचरामीह बालवत् ॥३

अवधूत दत्तात्रेयजीने कहा- राजन्! मनुष्योंको जो वस्तुएँ अत्यन्त प्रिय लगती हैं, उन्हें इकट्ठा करना ही उनके दुःखका कारण है । जो बुद्धिमान् पुरुष यह बात समझकर अकिंचनभावसे रहता है – शरीरकी तो बात ही अलग, मनसे भी किसी वस्तुका संग्रह नहीं करता — उसे अनन्त सुखस्वरूप परमात्माकी प्राप्ति होती है ॥१ ॥ एक कुररपक्षी अपनी

चोंचमें मांसका टुकड़ा लिये हुए था । उस समय दूसरे बलवान् पक्षी, जिनके पास मांस नहीं था, उससे छीननेके लिये उसे घेरकर चोंचें मारने लगे । जब कुररपक्षीने अपनी चोंचसे मांसका टुकड़ा फेंक दिया, तभी उसे सुख मिला ॥ २ ॥

मुझे मान या अपमानका कोई ध्यान नहीं है और घर एवं परिवारवालोंको जो चिन्ता होती है, वह मुझे नहीं है । मैं अपने आत्मामें ही रमता हूँ और अपने साथ ही क्रीडा करता हूँ। यह शिक्षा मैंने बालकसे ली है । अतः उसीके समान मैं भी मौजसे रहता हूँ || ३ || इस जगत् में दो ही प्रकारके व्यक्ति निश्चिन्त और परमानन्दमें मग्न रहते हैं - एक तो भोलाभाला निश्चेष्ट नन्हा-सा बालक और दूसरा वह पुरुष जो गुणातीत हो गया हो ॥४ ॥

द्वावेव चिन्तया मुक्तौ परमानन्द आप्लुतौ ।

यो विमुग्धो जडो बालो यो गुणेभ्यः परं गतः ॥४

क्वचित् कुमारी त्वात्मानं वृणानान् गृहमागतान् ।

स्वयं तानर्हयामास क्वापि यातेषु बन्धुषु ॥ ५

तेषामभ्यवहारार्थं शालीन् रहसि पार्थिव ।

अवघ्नन्त्याः प्रकोष्ठस्थाश्चक्रुः शंखाः स्वनं महत् ॥६

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पृष्ठ 1125

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सा तज्जुगुप्सितं मत्वा महती व्रीडिता ततः ।

बभंजैकैकशः शंखान् द्वौ द्वौ पाण्योरशेषयत् ॥७

उभयोरप्यभूद् घोषो ह्यवघ्नन्त्याः स्म शंखयोः ।

तत्राप्येकं निरभिददेकस्मान्नाभवद् ध्वनिः ॥८

अन्वशिक्षमिमं तस्या उपदेशमरिन्दम ।

लोकाननुचरन्नेताँल्लोकतत्त्वविवित्सया ॥९

वासे बहूनां कलहो भवेद् वार्ता द्वयोरपि ।

एक एव चरेत्तस्मात् कुमार्या इव कंकणः ॥ १०

मन एकत्र संयुज्याज्जितश्वासो जितासनः ।

वैराग्याभ्यासयोगेन ध्रियमाणमतन्द्रितः ॥११

यस्मिन् मनो लब्धपदं यदेत- च्छनैः शनैर्मुचति कर्मरेणून् । सत्त्वेन वृद्धेन रजस्तमश्च विधूय निर्वाणमुपैत्यनिन्धनम् ॥१२ एक बार किसी कुमारी कन्याके घर उसे वरण करनेके लिये कई लोग आये हु थे । उस दिन उसके घरके लोग कहीं बाहर गये हुए थे । इसलिये उसने स्वयं ही उनका आतिथ्यसत्कार किया || ५ || राजन्! उनको भोजन करानेके लिये वह घरके भीतर एकान्तमें धान कूटने लगी । उस समय उसकी कलाईमें पड़ी शंखकी चूड़ियाँ जोर- जोरसे बज रही थीं ॥६॥ इस शब्दको

निन्दित समझकर कुमारीको बड़ी लज्जा मालूम हुई* और उसने एक- एक करके सब चूड़ियाँ तोड़ डाली और दोनों हाथोंमें केवल दो-दो चूड़ियाँ रहने दीं ||७ || अब वह फिर धान कूटने लगी । परन्तु वे दो - दो चूड़ियाँ भी बजने लगीं, तब उसने एक-एक चूड़ी और तोड़ दी । जब दोनों कलाइयोंमें केवल एक- एक चूड़ी रह गयी तब किसी प्रकारकी आवाज नहीं हुई ॥ ८ ॥

रिपुदमन! उस समय लोगोंका आचार- विचार निरखने- परखनेके लिये इधर- उधर घूमता-घामता मैं भी वहाँ पहुँच गया था । मैंने उससे यह शिक्षा ग्रहण की कि जब बहुत लोग एक साथ रहते हैं तब कलह होता है और दो आदमी साथ रहते हैं तब भी बातचीत तो होती ही है; इसलिये कुमारी कन्याकी चूड़ीके समान अकेले ही विचरना चाहिये ॥९ -१० ॥ राजन्! मैंने बाण बनानेवालेसे यह सीखा है कि आसन और श्वासको जीतकर वैराग्य और अभ्यासके द्वारा अपने मनको वशमें कर ले और फिर बड़ी सावधानीके साथ उसे एक लक्ष्यमें लगा दे ॥११ ॥ जब परमानन्दस्वरूप परमात्मामें मन स्थिर हो जाता है तब वह धीरे-

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पृष्ठ 1126

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धीरे कर्मवासनाओंती धूलको धो बहाता है । सत्त्वगुणकी वृद्धिसे रजोगुणी और तमोगुणी वृत्तियोंका त्याग करके मन वैसे ही शान्त हो जाता है, जैसे ईंधनके बिना अग्नि ॥१२ ॥ इस

प्रकार जिसका चित्त अपने आत्मामें ही स्थिर- निरुद्ध हो जाता है, उसे बाहर- भीतर कहीं किसी पदार्थका भान नहीं होता । मैंने देखा था कि एक बाण बनानेवाला कारीगर बाण बनानेमें इतना तन्मय हो रहा था कि उसके पाससे ही दलबलके साथ राजाकी सवारी निकल गयी और उसे पतातक न चला ॥१३ ॥

तदैवमात्मन्यवरुद्धचित्तो

न वेद किंचिद् बहिरन्तरं वा ।

यथेषुकारो नृपतिं व्रजन्त- मिषौ गतात्मा न ददर्श पार्श्वे ॥१३

एकचार्यनिकेतः स्यादप्रमत्तो गुहाशयः ।

अलक्ष्यमाण आचारैर्मुनिरेकोऽल्पभाषणः ॥१४

गृहारम्भोऽतिदुःखाय विफलश्चाध्रुवात्मनः ।

सर्पः परकृतं वेश्म प्रविश्य सुखमेधते ॥१५

एको नारायणो देवः पूर्वसृष्टं स्वमायया ।

संहृत्य कालकलया कल्पान्त इदमीश्वरः ॥१६

एक एवाद्वितीयोऽभूदात्माधारोऽखिलाश्रयः ।

कालेनात्मानुभावेन साम्यं नीतासु शक्तिषु ।

सत्त्वादिष्वादिपुरुषः प्रधानपुरुषेश्वरः ॥ १७

परावराणां परम आस्ते कैवल्यसंज्ञितः ।

केवलानुभवानन्दसन्दोहो निरुपाधिकः ॥ १८

केवलात्मानुभावेन स्वमायां त्रिगुणात्मिकाम् ।

संक्षोभयन् सृजत्यादौ तया सूत्रमरिन्दम ॥१९

राजन्! मैंने साँपसे यह शिक्षा ग्रहण की है कि संन्यासीको सर्पकी भाँति अकेले ही विचरण करना चाहिये, उसे मण्डली नहीं बाँधनी चाहिये, मठ तो बनाना ही नहीं चाहिये । वह एक स्थानमें न रहे, प्रमाद न करे, गुहा आदिमें पड़ा रहे, बाहरी आचारोंसे पहचाना न जाय । किसीसे सहायता न ले और बहुत कम बोले ॥१४ ॥ इस अनित्य शरीरके लिये घर बनानेके

बखेड़ेमें पड़ना व्यर्थ और दुःखकी जड़ है । साँप दूसरोंके बनाये घरमें घुसकर बड़े आरामसे ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1127

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अपना समय काटता है ॥१५ ॥

अब मकड़ीसे ली हुई शिक्षा सुनो । सबके प्रकाशक और अन्तर्यामी सर्वशक्तिमान् भगवान्ने पूर्वकल्पमें बिना किसी अन्य सहायकके अपनी ही मायासे रचे हुए जगत्को कल्पके अन्तमें ( प्रलयकाल उपस्थित होनेपर ) कालशक्तिके द्वारा नष्ट कर दिया - उसे अपनेमें लीन कर लिया और सजातीय, विजातीय तथा स्वगतभेदसे शून्य अकेले ही शेष रह गये । वे सबके अधिष्ठान हैं, सबके आश्रय हैं; परन्तु स्वयं अपने आश्रय - अपने ही आधारसे रहते हैं, उनका कोई दूसरा आधार नहीं है । वे प्रकृति और पुरुष दोनोंके नियामक, कार्य और कारणात्मक जगत्के आदिकारण परमात्मा अपनी शक्ति कालके प्रभावसे सत्त्व- रज आदि समस्त शक्तियोंको साम्यावस्थामें पहुँचा देते हैं और स्वयं कैवल्यरूपसे एक और अद्वितीयरूपसे विराजमान रहते हैं । वे केवल अनुभवस्वरूप और आनन्दघन मात्र हैं । किसी भी प्रकारकी उपाधिका उनसे सम्बन्ध नहीं है । वे ही प्रभु केवल अपनी शक्ति कालके द्वारा अपनी त्रिगुणमयी मायाको क्षुब्ध करते हैं और उससे पहले क्रियाशक्ति- प्रधान सूत्र ( महत्तत्त्व) की रचना करते हैं । यह सूत्ररूप महत्तत्त्व ही तीनों गुणोंकी पहली अभिव्यक्ति है, वही सब प्रकारकी सृष्टिका मूल कारण है । उसीमें यह सारा विश्व, सूतमें ताने - बानेकी तरह ओतप्रोत है और इसीके कारण जीवको जन्म- मृत्युके चक्कर में पड़ना पड़ता है ॥१६-२० ॥ जैसे मकड़ी अपने हृदयसे मुँहके द्वारा जाला फैलाती है, उसीमें विहार करती है और फिर उसे निगल जाती है, वैसे ही परमेश्वर भी इस जगत्को अपनेमेंसे उत्पन्न करते हैं, उसमें जीवरूपसे विहार करते हैं और फिर उसे अपनेमें लीन कर लेते हैं ॥२१ ॥

तामाहु स्त्रिगुणव्यक्तिं सृजन्तीं विश्वतोमुखम् ।

यस्मिन् प्रोतमिदं विश्वं येन संसरते पुमान् ॥२०

यथोर्णनाभिर्हृदयादूर्णां सन्तत्य वक्त्रतः ।

तया विहृत्य भूयस्तां ग्रसत्येवं महेश्वरः ॥२१

यत्र यत्र मनो देही धारयेत् सकलं धिया ।

स्नेहाद् द्वेषाद् भयाद् वापि याति तत्तत्सरूपताम् ॥२२

कीटः पेशस्कृतं ध्यायन् कुड्यां तेन प्रवेशितः ।

याति तत्सात्मतां राजन् पूर्वरूपमसन्त्यजन् ॥२३

एवं गुरुभ्य एतेभ्य एषा मे शिक्षिता मतिः ।

स्वात्मोपशिक्षितां बुद्धिं शृणु मे वदतः प्रभो ॥२४

देहो गुरुर्मम विरक्तिविवेकहेतु- ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1128

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बिभ्रत् स्म सत्त्वनिधनं सततार्त्यदर्कम् । तत्त्वान्यनेन विमृशामि यथा तथापि पारक्यमित्यवसितो विचराम्यसंग: ॥ २५ जायात्मजार्थपशुभृत्यगृहाप्तवर्गान् पुष्णाति यत्प्रियचिकीर्षुतया वितन्वन् । राजन्! मैंने भृंगी ( बिलनी ) कीड़ेसे यह शिक्षा ग्रहण की है कि यदि प्राणी स्नेहसे, द्वेषसे अथवा भयसे भी जान- बूझकर एकाग्ररूपसे अपना मन किसीमें लगा दे तो उसे उसी वस्तुका स्वरूप प्राप्त हो जाता है ॥ २२ ॥ राजन्! जैसे भृंगी एक कीड़ेको ले जाकर दीवारपर अपने

रहनेकी जगह बंद कर देता है और वह कीड़ा भयसे उसीका चिन्तन करते - करते अपने पहले शरीरका त्याग किये बिना ही उसी शरीरसे तद्रूप हो जाता है * ॥२३ ॥

राजन्! इस प्रकार मैंने इतने गुरुओंसे ये शिक्षाएँ ग्रहण कीं । अब मैंने अपने शरीरसे जो कुछ सीखा है, वह तुम्हें बताता हूँ, सावधान होकर सुनो ॥ २४ ॥ यह शरीर भी मेरा गुरु ही है;

क्योंकि यह मुझे विवेक और वैराग्यकी शिक्षा देता है । मरना और जीना तो इसके साथ लगा ही रहता है । इस शरीरको पकड़ रखनेका फल यह है कि दुःख - पर- दुःख भोगते जाओ । यद्यपि इस शरीरसे तत्त्वविचार करनेमें सहायता मिलती है, तथापि मैं इसे अपना कभी नहीं समझता; सर्वदा यही निश्चय रखता हूँ कि एक दिन इसे सियार कुत्ते खा जायँगे । इसीलिये मैं इससे असंग होकर विचरता हूँ ॥ २५ ॥ जीव जिस शरीरका प्रिय करनेके लिये ही अनेकों

प्रकारकी कामनाएँ और कर्म करता है तथा स्त्री- पुत्र, धन - दौलत, हाथी -घोड़े, नौकर- चाकर, घर- द्वार और भाई- बन्धुओंका विस्तार करते हुए उनके पालन- पोषणमें लगा रहता है । बड़ी-बड़ी कठिनाइयाँ सहकर धनसंचय करता है । आयुष्य पूरी होनेपर वही शरीर स्वयं तो नष्ट होता ही है, वृक्षके समान दूसरे शरीरके लिये बीज बोकर उसके लिये भी दुःखकी व्यवस्था कर जाता है ॥२६ ॥ जैसे बहुत-सी सौतें अपने एक पतिको अपनी- अपनी ओर खींचती हैं,

वैसे ही जीवको जीभ एक ओर– स्वादिष्ट पदार्थोंकी ओर खींचती है तो प्यास दूसरी ओर— जलकी ओर; जननेन्द्रिय एक ओर– स्त्रीसंभोगकी ओर ले जाना चाहती है तो त्वचा, पेट और कान दूसरी ओर- कोमल स्पर्श, भोजन और मधुर शब्दकी ओर खींचने लगते हैं । नाक कहीं सुन्दर गन्ध सूँघनेके लिये ले जाना चाहती है तो चंचल नेत्र कहीं दूसरी ओर सुन्दर रूप देखनेके लिये । इस प्रकार कर्मेन्द्रियाँ और ज्ञानेन्द्रियाँ दोनों ही इसे सताती रहती हैं ॥ २७ ॥

वैसे तो भगवान्ने अपनी अचिन्त्य शक्ति मायासे वृक्ष, सरीसृप ( रेंगनेवाले जन्तु) पशु, पक्षी, डाँस और मछली आदि अनेकों प्रकारकी योनियाँ रचीं; परन्तु उनसे उन्हें सन्तोष न हुआ । तब उन्होंने मनुष्यशरीरकी सृष्टि की । यह ऐसी बुद्धिसे युक्त है जो ब्रह्मका साक्षात्कार कर सकती है। इसकी रचना करके वे बहुत आनन्दित हुए || २८ || यद्यपि यह मनुष्यशरीर है तो अनित्य ही — मृत्यु सदा इसके पीछे लगी रहती है । परन्तु इससे परमपुरुषार्थकी प्राप्ति हो सकती है; इसलिये अनेक जन्मोंके बाद यह अत्यन्त दुर्लभ मनुष्य शरीर पाकर बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि शीघ्र - से - शीघ्र, मृत्युके पहले ही मोक्ष प्राप्तिका प्रयत्न कर ले । इस जीवनका मुख्य ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1129

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उद्देश्य मोक्ष ही है । विषय - भोग तो सभी योनियोंमें प्राप्त हो सकते हैं, इसलिये उनके संग्रहमें यह अमूल्य जीवन नहीं खोना चाहिये ॥ २ ९ ॥ स्वान्ते सकृच्छ्रमवरुद्धधनः स देहः सृष्ट्वास्य बीजमवसीदति वृक्षधर्मा ॥ २६ जिह्वैकतोऽमुमपकर्षति कर्हि तर्षा

शिश्नोऽन्यतस्त्वगुदरं श्रवणं कुतश्चित् ।

घ्राणोऽन्यतश्चपलदृक् क्व च कर्मशक्ति- र्बह्वयः सपत्न्य इव गेहपतिं लुनन्ति ॥२७

सृष्ट्वा पुराणि विविधान्यजयाऽऽत्मशक्त्या वृक्षान् सरीसृपपशून् खगदंशमत्स्यान् । तैस्तैरतुष्टहृदयः पुरुषं विधाय ब्रह्मावलोकधिषणं मुदमाप देवः ॥ २८ लब्ध्वा सुदुर्लभमिदं बहुसम्भवान्ते

मानुष्यमर्थदमनित्यमपीह धीरः ।

तूर्णं यतेत न पतेनुमृत्यु याव- न्निःश्रेयसाय विषयः खलु सर्वतः स्यात् ॥२९

एवं संजातवैराग्यो विज्ञानालोक आत्मनि ।

विचरामि महीमेतां मुक्तसंगोऽनहंकृतिः ॥ ३०

राजन्! यही सब सोच- विचारकर मुझे जगत्से वैराग्य हो गया । मेरे हृदयमें ज्ञान-विज्ञानकी ज्योति जगमगाती रहती है । न तो कहीं मेरी आसक्ति है और न कहीं अहंकार ही । अब मैं स्वच्छन्दरूपसे इस पृथ्वीमें विचरण करता हूँ ॥ ३० ॥ राजन्! अकेले गुरुसे ही यथेष्ट

और सुदृढ़ बोध नहीं होता, उसके लिये अपनी बुद्धिसे भी बहुत कुछ सोचने - समझनेकी आवश्यकता है । देखो! ऋषियोंने एक ही अद्वितीय ब्रह्मका अनेकों प्रकारसे गान किया है । ( यदि तुम स्वयं विचारकर निर्णय न करोगे तो ब्रह्मके वास्तविक स्वरूपको कैसे जान सकोगे? ) ॥३१ ॥

न ह्येकस्माद् गुरोर्ज्ञानं सुस्थिरं स्यात् सुपुष्कलम् ।

ब्रह्मैतदद्वितीयं वै गीयते बहुधर्षिभिः ॥ ३१

श्रीभगवानुवाच इत्युक्त्वा स यदुं विप्रस्तमामन्त्र्य गभीरधीः । ****** ebook converter DEMO Watermarks * ***

पृष्ठ 1130

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वन्दितोऽभ्यर्थितो राज्ञा ययौ प्रीतो यथागतम् ॥३२

अवधूतवचः श्रुत्वा पूर्वेषां नः स पूर्वजः ।

सर्वसंगविनिर्मुक्तः समचित्तो बभूव ह ॥३३

भगवान् श्रीकृष्णने कहा- प्यारे उद्धव! गम्भीरबुद्धि अवधूत दत्तात्रेयने राजा यदुको इस प्रकार उपदेश किया । यदुने उनकी पूजा और वन्दना की, दत्तात्रेयजी उनसे अनुमति लेकर बड़ी प्रसन्नतासे इच्छानुसार पधार गये ॥३२ ॥ हमारे पूर्वजोंके भी पूर्वज राजा यदु

अवधूत दत्तात्रेयकी यह बात सुनकर समस्त आसक्तियोंसे छुटकारा पा गये और समदर्शी हो गये । ( इसी प्रकार तुम्हें भी समस्त आसक्तियोंका परित्याग करके समदर्शी हो जाना चाहिये ) ॥३३ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे नवमोऽध्यायः ॥९ ॥

* क्योंकि उससे उसका स्वयं धान कूटना सूचित होता था, जो कि उसकी द्ररिद्रताका द्योतक था । * जब उसी शरीरसे चिन्तन किये रूपकी प्राप्ति हो जाती है; तब दूसरे शरीरसे तो कहना ही क्या है? इसलिये मनुष्यको अन्य वस्तुका चिन्तन न करके केवल परमात्माका ही चिन्तन करना चाहिये । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******