श्रीगणेशाय नमः।
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 1111–1120
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1111–1120
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तं तं समनयत् कामं कृच्छ्रेणाप्यजितेन्द्रियः ॥ ५६
कपोती प्रथमं गर्भं गृह्णती काल आगते ।
अण्डानि सुषुवे नीडे स्वपत्युः सन्निधौ सती ॥ ५७
तेषु काले व्यजायन्त रचितावयवा हरेः ।
शक्तिभिर्दुर्विभाव्याभिः कोमलांगतनूरुहाः ॥ ५८
प्रजाः पुपुषतुः प्रीतौ दम्पती पुत्रवत्सलौ ।
शृण्वन्तौ कूजितं तासां निर्वृतौ कलभाषितैः ॥५९
स्थूलबुद्धि पुरुषोंको जलके विभिन्न पात्रोंमें प्रतिबिम्बित हुआ सूर्य उन्हींमें प्रविष्ट- सा होकर भिन्न- भिन्न दिखायी पड़ता है । परन्तु इससे स्वरूपतः सूर्य अनेक नहीं हो जाता; वैसे ही चल- अचल उपाधियोंके भेदसे ऐसा जान पड़ता है कि प्रत्येक व्यक्तिमें आत्मा अलग- अलग है । परन्तु जिनको ऐसा मालूम होता है, उनकी बुद्धि मोटी है । असल बात तो यह है कि
आत्मा सूर्यके समान एक ही है । स्वरूपतः उसमें कोई भेद नहीं है ॥ ५१ ॥
राजन्! कहीं किसीके साथ अत्यन्त स्नेह अथवा आसक्ति न करनी चाहिये, अन्यथा उसकी बुद्धि अपना स्वातन्त्र्य खोकर दीन हो जायगी और उसे कबूतरकी तरह अत्यन्त क्लेश उठाना पड़ेगा ॥५२ ॥ राजन्! किसी जंगलमें एक कबूतर रहता था, उसने एक पेड़पर अपना
घोंसला बना रखा था । अपनी मादा कबूतरीके साथ वह कई वर्षोंतक उसी घोंसलेमें रहा ॥५३ ॥ उस कबूतरके जोड़ेके हृदयमें निरन्तर एक- दूसरेके प्रति स्नेहकी वृद्धि होती
जाती थी । वे गृहस्थधर्ममें इतने आसक्त हो गये थे कि उन्होंने एक- दूसरेकी दृष्टि- से - दृष्टि, अंग- से - अंग और बुद्धि - से- बुद्धिको बाँध रखा था ॥५४ ॥
उनका एक- दूसरेपर इतना विश्वास हो गया था कि वे निःशंक होकर वहाँकी वृक्षावलीमें एक साथ सोते, बैठते, घूमते -फिरते, ठहरते, बातचीत करते, खेलते और खाते- पीते थे ॥५५ ॥ राजन्! कबूतरीपर कबूतरका इतना प्रेम था कि वह जो कुछ चाहती, कबूतर बड़े-से-बड़ा कष्ट उठाकर उसकी कामना पूर्ण करता; वह कबूतरी भी अपने कामुक पतिकी
कामनाएँ पूर्ण करती ॥५६ ॥ समय आनेपर कबूतरीको पहला गर्भ रहा । उसने अपने पतिके
पास ही घोंसलेमें अंडे दिये ॥ ५७ ॥ भगवान्की अचिन्त्य शक्तिसे समय आनेपर वे अंडे फूट
गये और उनमेंसे हाथ- पैरवाले बच्चे निकल आये । उनका एक-एक अंग और रोएँ अत्यन्त कोमल थे ॥५८ ॥ अब उन कबूतर- कबूतरीकी आँखें अपने बच्चोंपर लग गयीं, वे बड़े प्रेम
और आनन्दसे अपने बच्चोंका लालन- पालन, लाड़- प्यार करते और उनकी मीठी बोली, उनकी गुटर -गूँ सुन - सुनकर आनन्दमग्न हो जाते ॥५९ ॥
तासां पतत्त्रैः सुस्पर्शैः कूजितैर्मुग्धचेष्टितैः ।
प्रत्युद्गमैरदीनानां पितरौ मुदमापतुः ॥६०
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स्नेहानुबद्धहृदयावन्योन्यं विष्णुमायया ।
विमोहितौ दीनधियौ शिशून् पुपुषतुः प्रजाः ॥ ६१
एकदा जग्मतुस्तासामन्नार्थं तौ कुटुम्बिनौ ।
परितः कानने तस्मिन्नर्थिनौ चेरतुश्चिरम् ॥६२
दृष्ट्वा ताँल्लुब्धकः कश्चिद् यदृच्छातो वनेचरः ।
जगृहे जालमातत्य चरतः स्वालयान्तिके ॥६३
कपोतश्च कपोती च प्रजापोषे सदोत्सुकौ ।
गतौ पोषणमादाय स्वनीडमुपजग्मतुः ॥६४
कपोती स्वात्मजान् वीक्ष्य बालकान् जालसंवृतान् ।
तानभ्यधावत् क्रोशन्ती क्रोशतो भृशदुःखिता ॥ ६५
सासकृत्स्नेहगुणिता दीनचित्ताजमायया ।
स्वयं चाबध्यत शिचा बद्धान् पश्यन्त्यपस्मृतिः ॥६६
कपोतश्चात्मजान् बद्धानात्मनोऽप्यधिकान् प्रियान् ।
भार्यां चात्मसमां दीनो विललापातिदुःखितः ॥ ६७
बच्चे तो सदा- सर्वदा प्रसन्न रहते ही हैं; वे जब अपने सुकुमार पंखोंसे माँ - बापका स्पर्श करते, कूजते, भोली - भाली चेष्टाएँ करते और फुदक- फुदककर अपने माँ- बापके पास दौड़ आते तब कबूतर- कबूतरी आनन्दमग्न हो जाते ॥ ६० ॥ राजन्! सच पूछो तो वे कबूतर-कबूतरी भगवान्की मायासे मोहित हो रहे थे । उनका हृदय एक- दूसरेके स्नेहबन्धनसे बँध रहा
था । वे अपने नन्हें - नन्हें बच्चोंके पालन- पोषणमें इतने व्यग्र रहते कि उन्हें दीन- दुनिया, लोक-परलोककी याद ही न आती ॥ ६१ ॥ एक दिन दोनों नर-मादा अपने बच्चोंके लिये चारा लाने
जंगलमें गये हुए थे । क्योंकि अब उनका कुटुम्ब बहुत बढ़ गया था । वे चारेके लिये चिरकालतक जंगलमें चारों ओर विचरते रहे ॥६२ ॥ इधर एक बहेलिया घूमता-घूमता
संयोगवश उनके घोंसलेकी ओर आ निकला । उसने देखा कि घोंसलेके आस-पास कबूतरके बच्चे फुदक रहे हैं; उसने जाल फैलाकर उन्हें पकड़ लिया ॥ ६३ ॥ कबूतर- कबूतरी बच्चोंको
खिलाने - पिलानेके लिये हर समय उत्सुक रहा करते थे । अब वे चारा लेकर अपने घोंसलेके पास आये ॥६४ ॥ कबूतरीने देखा कि उसके नन्हें- नन्हें बच्चे, उसके हृदयके टुकड़े जालमें
फँसे हुए हैं और दुःखसे चें - चें कर रहे हैं । उन्हें ऐसी स्थितिमें देखकर कबूतरीके दुःखकी सीमा न रही । वह रोती - चिल्लाती उनके पास दौड़ गयी ॥६५ ॥
भगवान्की मायासे उसका चित्त अत्यन्त दीन- दुःखी हो रहा था । वह उमड़ते हुए स्नेहकी
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रस्सीसे जकड़ी हुई थी; अपने बच्चोंको जालमें फँसा देखकर उसे अपने शरीरकी भी सुध- बुध न रही । और वह स्वयं ही जाकर जालमें फँस गयी ॥ ६६ ॥ जब कबूतरने देखा कि मेरे
प्राणोंसे भी प्यारे बच्चे जालमें फँस गये और मेरी प्राणप्रिया पत्नी भी उसी दशामें पहुँच गयी, तब वह अत्यन्त दुःखित होकर विलाप करने लगा । सचमुच उस समय उसकी दशा अत्यन्त दयनीय थी ॥६७ ॥ ‘ मैं अभागा हूँ, दुर्मति हूँ। हाय, हाय! मेरा तो सत्यानाश हो गया । देखो,
देखो, न मुझे अभी तृप्ति हुई और न मेरी आशाएँ ही पूरी हुईं । तबतक मेरा धर्म, अर्थ और कामका मूल यह गृहस्थाश्रम ही नष्ट हो गया ॥ ६८ ॥ हाय! मेरी प्राणप्यारी मुझे ही अपना
इष्टदेव समझती थी; मेरी एक- एक बात मानती थी, मेरे इशारेपर नाचती थी, सब तरहसे मेरे योग्य थी । आज वह मुझे सूने घरमें छोड़कर हमारे सीधे -सादे निश्छल बच्चोंके साथ स्वर्ग सिधार रही है ॥६९ ॥ मेरे बच्चे मर गये । मेरी पत्नी जाती रही । मेरा अब संसारमें क्या काम
है? मुझ दीनका यह विधुर जीवन- बिना गृहिणीका जीवन जलनका - व्यथाका जीवन है । अब मैं इस सूने घरमें किसके लिये जीऊँ? ॥ ७० ॥ राजन्! कबूतरके बच्चे जालमें फँसकर
तड़फड़ा रहे थे, स्पष्ट दीख रहा था कि वे मौतके पंजे में हैं, परन्तु वह मूर्ख कबूतर यह सब देखते हुए भी इतना दीन हो रहा था कि स्वयं जान- बूझकर जालमें कूद पड़ा ॥७१ ॥ राजन्!
वह बहेलिया बड़ा क्रूर था । गृहस्थाश्रमी कबूतर-कबूतरी और उनके बच्चोंके मिल जानेसे उसे बड़ी प्रसन्नता हुई; उसने समझा मेरा काम बन गया और वह उन्हें लेकर चलता बना ॥७२ ॥
जो कुटुम्बी है, विषयों और लोगोंके संग-साथमें ही जिसे सुख मिलता है एवं अपने कुटुम्बके भरण- पोषणमें ही जो सारी सुध- बुध खो बैठा है, उसे कभी शान्ति नहीं मिल सकती । वह उसी कबूतरके समान अपने कुटुम्बके साथ कष्ट पाता है ॥७३ ॥ यह मनुष्य- शरीर मुक्तिका
खुला हुआ द्वार है । इसे पाकर भी जो कबूतरकी तरह अपनी घर- गृहस्थीमें ही फँसा हुआ है,
वह बहुत ऊँचेतक चढ़कर गिर रहा है । शास्त्रकी भाषामें वह ' आरूढच्युत' है ॥७४ ॥
अहो मे पश्यतापायमल्पपुण्यस्य दुर्मतेः ।
अतृप्तस्याकृतार्थस्य गृहस्त्रैवर्गिको हतः ॥६८
अनुरूपानुकूला च यस्य मे पतिदेवता ।
शून्ये गृहे मां सन्त्यज्य पुत्रैः स्वर्याति साधुभिः ॥६९
सोऽहं शून्ये गृहे दीनो मृतदारो मृतप्रजः ।
जिजीविषे किमर्थं वा विधुरो दुःखजीवितः ॥७०
तांस्तथैवावृताञ्छिग्भिर्मृत्युग्रस्तान् विचेष्टतः ।
स्वयं च कृपणः शिक्षु पश्यन्नप्यबुधोऽपतत् ॥७१
तं लब्ध्वा लुब्धकः क्रूरः कपोतं गृहमेधिनम् ।
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कपोतकान् कपोतीं च सिद्धार्थः प्रययौ गृहम् ॥७२
एवं कुटुम्ब्यशान्तात्मा द्वन्द्वारामः पतत्त्रिवत् ।
पुष्णन् कुटुम्बं कृपणः सानुबन्धोऽवसीदति ॥ ७३
यः प्राप्य मानुषं लोकं मुक्तिद्वारमपावृतम् ।
गृहेषु खगवत् सक्तस्तमारूढच्युतं विदुः ॥७४
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे सप्तमोऽध्यायः ॥७ ॥
* विहित कर्म । + विहित कर्मका लोप । + निषिद्ध कर्म । * अनुसन्धानके दो प्रकार हैं –( १ ) एक स्वप्रकाश तत्त्वके बिना बुद्धि आदि जड पदार्थोंका प्रकाश नहीं हो सकता । इस प्रकार अर्थापत्तिके द्वारा और ( २ ) जैसे बसूला आदि औजार किसी कर्ताके द्वारा प्रयुक्त होते हैं। इसी प्रकार यह बुद्धि आदि औजार किसी कर्ताके द्वारा ही प्रयुक्त हो रहे हैं। परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि आत्मा आनुमानिक है । यह तो देहादिसे विलक्षण त्वम् पदार्थके शोधनकी युक्तिमात्र है ।
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अथाष्टमोऽध्यायः अवधूतोपाख्यान – अजगरसे लेकर पिंगलातक नौ गुरुओंकी कथा ब्राह्मण उवाच
सुखमैन्द्रियकं राजन् स्वर्गे नरक एव च ।
देहिनां यद् यथा दुःखं तस्मान्नेच्छेत तद् बुधः ॥१
ग्रासं सुमृष्टं विरसं महान्तं स्तोकमेव वा ।
यदृच्छयैवापतितं ग्रसेदाजगरोऽक्रियः ॥ २
शयीताहानि भूरीणि निराहारोऽनुपक्रमः ।
यदि नोपनमेद् ग्रासो महाहिरिव दिष्टभुक् ॥ ३
ओजःसहोबलयुतं बिभ्रद् देहमकर्मकम् ।
शयानो वीतनिद्रश्च नेहेतेन्द्रियवानपि ॥४
मुनिः प्रसन्नगम्भीरो दुर्विगाह्यो दुरत्ययः ।
अनन्तपारो ह्यक्षोभ्यः स्तिमितोद इवार्णवः ॥५
समृद्धकामो हीनो वा नारायणपरो मुनिः ।
नोत्सर्पेत न शुष्येत सरिद्भिरिव सागरः ॥६
अवधूत दत्तात्रेयजी कहते हैं - राजन्! प्राणियोंको जैसे बिना इच्छाके, बिना किसी प्रयत्नके, रोकनेकी चेष्टा करनेपर भी पूर्वकर्मानुसार दुःख प्राप्त होते हैं, वैसे ही स्वर्गमें या नरकमें— कहीं भी रहें, उन्हें इन्द्रियसम्बन्धी सुख भी प्राप्त होते ही हैं। इसलिये सुख और दुःखका रहस्य जाननेवाले बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि इनके लिये इच्छा अथवा किसी प्रकारका प्रयत्न न करे || १ || बिना माँगे, बिना इच्छा किये स्वयं ही अनायास जो कुछ मिल जाय - वह चाहे रूखा-सूखा हो, चाहे बहुत मधुर और स्वादिष्ट, अधिक हो या थोड़ा-बुद्धिमान् पुरुष अजगरके समान उसे ही खाकर जीवन निर्वाह कर ले और उदासीन रहे ॥२ ॥ यदि भोजन न मिले तो उसे भी प्रारब्ध भोग समझकर किसी प्रकारकी चेष्टा न
करे, बहुत दिनोंतक भूखा ही पड़ा रहे । उसे चाहिये कि अजगरके समान केवल प्रारब्धके अनुसार प्राप्त हुए भोजनमें ही सन्तुष्ट रहे ॥३ ॥ उसके शरीरमें मनोबल, इन्द्रियबल और
देहबल तीनों हों तब भी वह निश्चेष्ट ही रहे। निद्रारहित होनेपर भी सोया हुआ - सा रहे और कर्मेन्द्रियोंके होनेपर भी उनसे कोई चेष्टा न करे । राजन्! मैंने अजगरसे यही शिक्षा ग्रहण की है ॥४ ॥
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समुद्रसे मैंने यह सीखा है कि साधकको सर्वदा प्रसन्न और गम्भीर रहना चाहिये, उसका भाव अथाह, अपार और असीम होना चाहिये तथा किसी भी निमित्तसे उसे क्षोभ न होना चाहिये । उसे ठीक वैसे ही रहना चाहिये, जैसे ज्वार- भाटे और तरंगोंसे रहित शान्त समुद्र ॥५ ॥ देखो, समुद्र वर्षाऋतुमें नदियोंकी बाढ़के कारण बढ़ता नहीं और न ग्रीष्म ऋतुमें
घटता ही है; वैसे ही भगवत्परायण साधकको भी सांसारिक पदार्थोंकी प्राप्तिसे प्रफुल्लित न होना चाहिये और न उनके घटनेसे उदास ही होना चाहिये ॥६ ॥
दृष्ट्वा स्त्रियं देवमायां तद्भावैरजितेन्द्रियः ।
प्रलोभितः पतत्यन्धे तमस्यग्नौ पतंगवत् ॥७
योषिद्धिरण्याभरणाम्बरादि- द्रव्येषु मायारचितेषु मूढः । प्रलोभितात्मा ह्युपभोगबुद्धया पतंगवन्नश्यति नष्टदृष्टिः ॥८
स्तोकं स्तोकं ग्रसेद् ग्रासं देहो वर्तेत यावता ।
गृहानहिंसन्नातिष्ठेद् वृत्तिं माधुकरीं मुनिः ॥ ९
अणुभ्यश्च महद्भ्यश्च शास्त्रेभ्यः कुशलो नरः ।
सर्वतः सारमादद्यात् पुष्पेभ्य इव षट्पदः ॥१०
सायन्तनं श्वस्तनं वा न संगृह्णीत भिक्षितम् ।
पाणिपात्रोदरामत्रो मक्षिकेव न सङ्ग्रही ॥११
सायन्तनं श्वस्तनं वा न संगृह्णीत भिक्षुकः ।
मक्षिका इव संगृह्णन् सह तेन विनश्यति ॥१२
राजन्! मैंने पतिंगेसे यह शिक्षा ग्रहण की है कि जैसे वह रूपपर मोहित होकर आगमें कूद पड़ता है और जल मरता है, वैसे ही अपनी इन्द्रियोंको वशमें न रखनेवाला पुरुष जब स्त्रीको देखता है तो उसके हाव- भावपर लट्टू हो जाता है और घोर अन्धकारमें, नरकमें गिरकर अपना सत्यानाश कर लेता है । सचमुच स्त्री देवताओंकी वह माया है, जिससे जीव भगवान् या मोक्षकी प्राप्तिसे वञ्चित रह जाता है ॥७ ॥ जो मूढ़ कामिनी - कंचन, गहने - कपड़े
आदि नाशवान् मायिक पदार्थोंमें फँसा हुआ है और जिसकी सम्पूर्ण चित्तवृत्ति उनके उपभोगके लिये ही लालायित है, वह अपनी विवेकबुद्धि खोकर पतिंगेके समान नष्ट हो जाता है ॥८ ॥
राजन्! संन्यासीको चाहिये कि गृहस्थोंको किसी प्रकारका कष्ट न देकर भौरेकी तरह
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अपना जीवन - निर्वाह करे । वह अपने शरीरके लिये उपयोगी रोटीके कुछ टुकड़े कई घरोंसे माँग ले * ॥९ ॥ जिस प्रकार भौंरा विभिन्न पुष्पोंसे चाहे वे छोटे हों या बड़े — उनका सार
संग्रह करता है, वैसे ही बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि छोटे- बड़े सभी शास्त्रोंसे उनका सार— उनका रस निचोड़ ले ॥१० ॥ राजन्! मैंने मधुमक्खीसे यह शिक्षा ग्रहण की है कि
संन्यासीको सायंकाल अथवा दूसरे दिनके लिये भिक्षाका संग्रह न करना चाहिये । उसके पास भिक्षा लेनेको कोई पात्र हो तो केवल हाथ और रखनेके लिये कोई बर्तन हो तो पेट । वह कहीं संग्रह न कर बैठे, नहीं तो मधुमक्खियोंके समान उसका जीवन ही दूभर हो जायगा ॥११ ॥
यह बात खूब समझ लेनी चाहिये कि संन्यासी सबेरे- शामके लिये किसी प्रकारका संग्रह न करे; यदि संग्रह करेगा तो मधुमक्खियोंके समान अपने संग्रहके साथ ही जीवन भी गँवा बैठेगा ॥१२ ॥
पदापि युवतीं भिक्षुर्न स्पृशेद् दारवीमपि ।
स्पृशन् करीव बध्येत करिण्या अंगसंगतः ॥१३
नाधिगच्छेत् स्त्रियं प्राज्ञः कर्हिचिन्मृत्युमात्मनः ।
बलाधिकैः स हन्येत गजैरन्यैर्गजो यथा ॥१४
न देयं नोपभोग्यं च लुब्धैर्यद् दुःखसंचितम् ।
भुङ्क्ते तदपि तच्चान्यो मधुहेवार्थविन्मधु ॥१५
सुदुःखोपार्जितैर्वित्तैराशासानां गृहाशिषः ।
मधुहेवाग्रतो भुङ्क्ते यतिर्वै गृहमेधिनाम् ॥१६
ग्राम्यगीतं न शृणुयाद् यतिर्वनचरः क्वचित् ।
शिक्षेत हरिणाद् बद्धान्मृगयोर्गीतमोहितात् ॥१७
नृत्यवादित्रगीतानि जुषन् ग्राम्याणि योषिताम् ।
आसां क्रीडनको वश्य ऋष्यशृंगो मृगीसुतः ॥ १८
राजन्! मैंने हाथीसे यह सीखा कि संन्यासीको कभी पैरसे भी काठकी बनी हुई स्त्रीका भी स्पर्श न करना चाहिये । यदि वह ऐसा करेगा तो जैसे हथिनीके अंग- संगसे हाथी बँध जाता है, वैसे ही वह भी बँध जायगा* ॥१३ ॥ विवेकी पुरुष किसी भी स्त्रीको कभी भी भोग्यरूपसे
स्वीकार न करे; क्योंकि यह उसकी मूर्तिमती मृत्यु है । यदि वह स्वीकार करेगा तो हाथियोंसे हाथीकी तरह अधिक बलवान् अन्य पुरुषोंके द्वारा मारा जायगा ॥१४ ॥
मैंने मधु निकालनेवाले पुरुषसे यह शिक्षा ग्रहण की है कि संसारके लोभी पुरुष बड़ी कठिनाईसे धनका संचय तो करते रहते हैं, किन्तु वह संचित धन न किसीको दान करते हैं
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और न स्वयं उसका उपभोग ही करते हैं । बस, जैसे मधु निकालनेवाला मधुमक्खियोंद्वारा संचित रसको निकाल ले जाता है वैसे ही उनके संचित धनको भी उसकी टोह रखनेवाला कोई दूसरा पुरुष ही भोगता है ॥१५ ॥
तुम देखते हो न कि मधुहारी मधुमक्खियोंका जोड़ा हुआ मधु उनके खानेसे पहले ही साफ कर जाता है; वैसे ही गृहस्थोंके बहुत कठिनाईसे संचित किये पदार्थोंको, जिनसे वे सुखभोगकी अभिलाषा रखते हैं, उनसे भी पहले संन्यासी और ब्रह्मचारी भोगते हैं । क्योंकि गृहस्थ तो पहले अतिथि- अभ्यागतोंको भोजन कराकर ही स्वयं भोजन करेगा ॥१६ ॥
मैंने हरिनसे यह सीखा है कि वनवासी संन्यासीको कभी विषय सम्बन्धी गीत नहीं सुनने चाहिये । वह इस बातकी शिक्षा उस हरिनसे ग्रहण करे जो व्याधके गीतसे मोहित होकर बँध जाता है ॥१७ ॥ तुम्हें इस बातका पता है कि हरिनीके गर्भसे पैदा हुए ऋष्यशृंग मुनि
स्त्रियोंका विषय- सम्बन्धी गाना-बजाना, नाचना आदि देख- सुनकर उनके वशमें हो गये थे और उनके हाथकी कठपुतली बन गये थे ॥ १८ ॥
जिह्वयातिप्रमाथिन्या जनो रसविमोहितः ।
मृत्युमृच्छत्यसद्बुद्धिर्मीनस्तु बडिशैर्यथा ॥ १ ९
इन्द्रियाणि जयन्त्याशु निराहारा मनीषिणः । वर्जयित्वा तु रसनं तन्निरन्नस्य वर्धते || २० तु
तावज्जितेन्द्रियो न स्याद् विजितान्येन्द्रियः पुमान् ।
न जयेद् रसनं यावज्जितं सर्वं जिते रसे ॥२१
पिंगला नाम वेश्याऽऽसीद् विदेहनगरे पुरा ।
तस्या मे शिक्षितं किंचिन्निबोध नृपनन्दन ॥२२
सा स्वैरिण्येकदा कान्तं संकेत उपनेष्यती ।
अभूत् काले बहिर्द्वारि बिभ्रती रूपमुत्तमम् ॥२३
मार्ग आगच्छतो वीक्ष्य पुरुषान् पुरुषर्षभ ।
ताञ्छुल्कदान् वित्तवतः कान्तान् मेनेऽर्थकामुका ॥२४
आगतेष्वपयातेषु सा संकेतोपजीविनी ।
अप्यन्यो वित्तवान् कोऽपि मामुपैष्यति भूरिदः ॥२५
एवं दुराशया ध्वस्तनिद्रा द्वार्यवलम्बती ।
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निर्गच्छन्ती प्रविशती निशीथं समपद्यत ॥२६ अब मैं तुम्हें मछलीकी सीख सुनाता हूँ । जैसे मछली काँटेमें लगे हुए मांसके टुकड़ेके लोभसे अपने प्राण गँवा देती है, वैसे ही स्वादका लोभी दुर्बुद्धि मनुष्य भी मनको मथकर व्याकुल कर देनेवाली अपनी जिह्वाके वशमें हो जाता है और मारा जाता है ॥१९ ॥ विवेकी
पुरुष भोजन बंद करके दूसरी इन्द्रियोंपर तो बहुत शीघ्र विजय प्राप्त कर लेते हैं, परन्तु इससे उनकी रसना- इन्द्रिय वशमें नहीं होती । वह तो भोजन बंद कर देनेसे और भी प्रबल हो जाती है ॥२० ॥ मनुष्य और सब इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त कर लेनेपर भी तबतक जितेन्द्रिय नहीं हो
सकता, जबतक रसनेन्द्रियको अपने वशमें नहीं कर लेता । और यदि रसनेन्द्रियको वशमें कर लिया, तब तो मानो सभी इन्द्रियाँ वशमें हो गयीं ॥२१ ॥
नृपनन्दन! प्राचीन कालकी बात है, विदेहनगरी मिथिलामें एक वेश्या रहती थी । उसका नाम था पिंगला । मैंने उससे जो कुछ शिक्षा ग्रहण की, वह मैं तुम्हें सुनाता हूँ; सावधान होकर सुनो ॥२२ ॥ वह स्वेच्छाचारिणी तो थी ही, रूपवती भी थी । एक दिन रात्रिके समय किसी
पुरुषको अपने रमणस्थानमें लानेके लिये खूब बन-ठनकर- उत्तम वस्त्राभूषणोंसे सजकर बहुत देरतक अपने घरके बाहरी दरवाजेपर खड़ी रही || २३ || नररत्न! उसे पुरुषकी नहीं, धनकी कामना थी और उसके मनमें यह कामना इतनी दृढमूल हो गयी थी कि वह किसी भी पुरुषको उधरसे आते- जाते देखकर यही सोचती कि यह कोई धनी है और मुझे धन देकर उपभोग करनेके लिये ही आ रहा है ॥ २४ ॥
जब आने - जानेवाले आगे बढ़ जाते, तब फिर वह संकेतजीविनी वेश्या यही सोचती कि अवश्य ही अबकी बार कोई ऐसा धनी मेरे पास आवेगा जो मुझे बहुत सा धन देगा ॥ २५ ॥
उसके चित्तकी यह दुराशा बढ़ती ही जाती थी। वह दरवाजेपर बहुत देरतक टँगी रही । उसकी नींद भी जाती रही । वह कभी बाहर आती तो कभी भीतर जाती । इस प्रकार आधी रात हो गयी ॥२६ ॥
तस्या वित्ताशया शुष्यद्वक्त्राया दीनचेतसः ।
निर्वेदः परमो जज्ञे चिन्ताहेतुः सुखावहः ॥२७
तस्या निर्विण्णचित्ताया गीतं शृणु यथा मम ।
निर्वेद आशापाशानां पुरुषस्य यथा ह्यसिः ॥२८
न ह्यंगाज्जातनिर्वेदो देहबन्धं जिहासति ।
यथा विज्ञानरहितो मनुजो ममतां नृप ॥२९
पिंगलोवाच
अहो मे मोहविततिं पश्यताविजितात्मनः ।
या कान्तादसतः कामं कामये येन बालिशा ॥३०
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सन्तं समीपे रमणं रतिप्रदं
वित्तप्रदं नित्यमिमं विहाय ।
अकामदं दुःखभयाधिशोक- मोहप्रदं तुच्छमहं भजेऽज्ञा ॥३१
अहो मयाऽऽत्मा परितापितो वृथा सांकेत्यवृत्त्यातिविगर्ह्यवार्तया । स्त्रैणान्नराद् यार्थतृषोऽनुशोच्यात् क्रीतेन वित्तं रतिमात्मनेच्छती ॥३२ राजन्! सचमुच आशा और सो भी धनकी - बहुत बुरी है । धनीकी बाट जोहते - जोहते उसका मुँह सूख गया, चित्त व्याकुल हो गया। अब उसे इस वृत्तिसे बड़ा वैराग्य हुआ । उसमें दुःख - बुद्धि हो गयी । इसमें सन्देह नहीं कि इस वैराग्यका कारण चिन्ता ही थी । परन्तु ऐसा वैराग्य भी है तो सुखका ही हेतु ॥ २७ ॥ जब पिंगलाके चित्तमें इस प्रकार वैराग्यकी भावना
जाग्रत् हुई, तब उसने एक गीत गाया । वह मैं तुम्हें सुनाता हूँ । राजन्! मनुष्य आशाकी फाँसीपर लटक रहा है । इसको तलवारकी तरह काटनेवाली यदि कोई वस्तु है तो वह केवल वैराग्य है ॥२८ ॥ प्रिय राजन्! जिसे वैराग्य नहीं हुआ है, जो इन बखेड़ोंसे ऊबा नहीं है, वह
शरीर और इसके बन्धनसे उसी प्रकार मुक्त नहीं होना चाहता, जैसे अज्ञानी पुरुष ममता छोड़नेकी इच्छा भी नहीं करता ॥२९ ॥
पिंगलाने यह गीत गाया था - हाय! हाय! मैं इन्द्रियोंके अधीन हो गयी । भला! मेरे मोहका विस्तार तो देखो, मैं इन दुष्ट पुरुषोंसे, जिनका कोई अस्तित्व ही नहीं है, विषयसुखकी लालसा करती हूँ । कितने दुःखकी बात है! मैं सचमुच मूर्ख हूँ || ३० || देखो तो सही, मेरे निकट- से - निकट हृदयमें ही मेरे सच्चे स्वामी भगवान् विराजमान हैं । वे वास्तविक प्रेम, सुख और परमार्थका सच्चा धन भी देनेवाले हैं । जगत्के पुरुष अनित्य हैं और वे नित्य हैं । हाय! हाय! मैंने उनको तो छोड़ दिया और उन तुच्छ मनुष्योंका सेवन किया जो मेरी एक भी कामना पूरी नहीं कर सकते; उलटे दुःख- भय, आधि- व्याधि, शोक और मोह ही देते हैं । यह मेरी मूर्खताकी हद है कि मैं उनका सेवन करती हूँ ॥ ३१ ॥ बड़े खेदकी बात है, मैंने अत्यन्त
निन्दनीय आजीविका वेश्यावृत्तिका आश्रय लिया और व्यर्थमें अपने शरीर और मनको क्लेश दिया, पीड़ा पहुँचायी । मेरा यह शरीर बिक गया है । लम्पट, लोभी और निन्दनीय मनुष्योंने इसे खरीद लिया है और मैं इतनी मूर्ख हूँ कि इसी शरीरसे धन और रति- सुख चाहती हूँ। मुझे धिक्कार है! ॥३२ ॥
यदस्थिभिर्निर्मितवंशवंश्य- स्थूणं त्वचा रोमनखैः पिनद्धम् । क्षरन्नवद्वारमगारमेतद् विण्मूत्रपूर्णं मदुपैति कान्या ॥३३