श्रीगणेशाय नमः।

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 1151–1160

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1151–1160

पृष्ठ 1151

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भगवान् श्रीकृष्णने कहा – प्रिय उद्धव! जिस परमात्माका परोक्षरूपसे वर्णन किया जाता है, वे साक्षात् अपरोक्ष- प्रत्यक्ष ही हैं, क्योंकि वे ही निखिल वस्तुओंको सत्ता- स्फूर्ति— जीवन- दान करनेवाले हैं, वे ही पहले अनाहत नादस्वरूप परा वाणी नामक प्राणके साथ मूलाधारचक्रमें प्रवेश करते हैं । उसके बाद मणिपूरकचक्र (नाभि स्थान ) में आकर पश्यन्ती वाणीका मनोमय सूक्ष्मरूप धारण करते हैं । तदनन्तर कण्ठदेशमें स्थित विशुद्ध नामक चक्रमें आते हैं और वहाँ मध्यमा वाणीके रूपमें व्यक्त होते हैं । फिर क्रमशः मुखमें आकर ह्रस्व-दीर्घादि मात्रा, उदात्त- अनुदात्त आदि स्वर तथा ककारादि वर्णरूप स्थूल- वैखरी वाणीका रूप ग्रहण कर लेते हैं ॥१७ ॥ अग्नि आकाशमें ऊष्मा अथवा विद्युत्के रूपसे अव्यक्तरूपमें

स्थित है । जब बलपूर्वक काष्ठमन्थन किया जाता है, तब वायुकी सहायतासे वह पहले अत्यन्त सूक्ष्म चिनगारीके रूपमें प्रकट होती है और फिर आहुति देनेपर प्रचण्ड रूप धारण कर लेती है, वैसे ही मैं भी शब्दब्रह्मस्वरूपसे क्रमशः परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी वाणीके रूपमें प्रकट होता हूँ ॥ १८ ॥ इसी प्रकार बोलना, हाथोंसे काम करना, पैरोंसे चलना,

मूत्रेन्द्रिय तथा गुदासे मल- मूत्र त्यागना, सूँघना, चखना, देखना, छूना, सुनना, मनसे संकल्प-विकल्प करना, बुद्धिसे समझना, अहंकारके द्वारा अभिमान करना, महत्तत्त्वके रूपमें सबका ताना-बाना बुनना तथा सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुणके सारे विकार; कहाँतक कहूँ— समस्त कर्ता, करण और कर्म मेरी ही अभिव्यक्तियाँ हैं ॥१९ ॥ यह सबको जीवित करनेवाला

परमेश्वर ही इस त्रिगुणमय ब्रह्माण्ड- कमलका कारण है। यह आदि पुरुष पहले एक और अव्यक्त था । जैसे उपजाऊ खेतमें बोया हुआ बीज शाखा- पत्र- पुष्पादि अनेक रूप धारण कर लेता है, वैसे ही कालगतिसे मायाका आश्रय लेकर शक्ति- विभाजनके द्वारा परमेश्वर ही अनेक रूपोंमें प्रतीत होने लगता है ॥२० ॥ जैसे तागोंके ताने - बानेमें वस्त्र ओतप्रोत रहता है, वैसे ही

यह सारा विश्व परमात्मामें ही ओतप्रोत है । जैसे सूतके बिना वस्त्रका अस्तित्व नहीं है; किन्तु सूत वस्त्रके बिना भी रह सकता है, वैसे ही इस जगत्के न रहनेपर भी परमात्मा रहता है; किन्तु यह जगत् परमात्मस्वरूप ही है - परमात्माके बिना इसका कोई अस्तित्व नहीं है । यह संसारवृक्ष अनादि और प्रवाहरूपसे नित्य है । इसका स्वरूप ही है — कर्मकी परम्परा तथा इस वृक्षके फल- फूल हैं— मोक्ष और भोग ॥ २१ ॥

यथानलः खेऽनिलबन्धुरूष्मा बलेन दारुण्यधिमथ्यमानः । अणुः प्रजातो हविषा समिध्यते तथैव मे व्यक्तिरियं हि वाणी ॥ १८ एवं गदिः कर्म गतिर्विसर्गो घ्राणो रसो दृक् स्पर्शः श्रुतिश्च । संकल्पविज्ञानमथाभिमानः सूत्रं रजःसत्त्वतमोविकारः ॥१९

पृष्ठ 1152

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अयं हि जीवस्त्रिवृदब्जयोनि- व्यक्त एको वयसा स आद्यः । विश्लिष्टशक्तिर्बहुधेव भाति बीजानि योनिं प्रतिपद्य यद्वत् ॥२० यस्मिन्निदं प्रोतमशेषमोतं पटो यथा तन्तुवितानसंस्थः । य एष संसारतरुः पुराणः कर्मात्मकः पुष्पफले प्रसूते ॥२१ अस्य बीजे शतमूलस्त्रिनालः

पंचस्कन्धः पंचरसप्रसूतिः ।

दशैकशाखो द्विसुपर्णनीड- स्त्रिवल्कलो द्विफलोऽर्कं प्रविष्टः ॥२२

अदन्ति चैकं फलमस्य गृध्रा

ग्रामेचरा एकमरण्यवासाः ।

हंसा य एक बहुरूपमिज्यै- र्मायामयं वेद स वेद वेदम् ॥२३

एवं गुरूपासनयैकभक्त्या विद्याकुठारेण शितेन धीरः । विवृश्य जीवाशयमप्रमत्तः सम्पद्य चात्मानमथ त्यजास्त्रम् ॥२४ इस संसारवृक्षके दो बीज हैं- पाप और पुण्य। असंख्य वासनाएँ जड़ें हैं और तीन गुण तने हैं । पाँच भूत इसकी मोटी- मोटी प्रधान शाखाएँ हैं और शब्दादि पाँच विषय रस हैं, ग्यारह इन्द्रियाँ शाखा हैं तथा जीव और ईश्वर- दो पक्षी इसमें घोंसला बनाकर निवास करते हैं । इस वृक्षमें वात, पित्त और कफरूप तीन तरहकी छाल है। इसमें दो तरहके फल लगते हैं — सुख और दुःख । यह विशाल वृक्ष सूर्यमण्डलतक फैला हुआ है ( इस सूर्यमण्डलका भेदन कर जानेवाले मुक्त पुरुष फिर संसार- चक्रमें नहीं पड़ते ) ॥२२ ॥ जो गृहस्थ शब्द-रूप- रस आदि

विषयोंमें फँसे हुए हैं, वे कामनासे भरे हुए होनेके कारण गीधके समान हैं । वे इस वृक्षका दुःखरूप फल भोगते हैं, क्योंकि वे अनेक प्रकारके कर्मोंके बन्धनमें फँसे रहते हैं । जो अरण्यवासी परमहंस विषयोंसे विरक्त हैं, वे इस वृक्षमें राजहंसके समान हैं और वे इसका सुखरूप फल भोगते हैं । प्रिय उद्धव! वास्तवमें मैं एक ही हूँ। यह मेरा जो अनेकों प्रकारका रूप है, वह तो केवल मायामय है। जो इस बातको गुरुओंके द्वारा समझ लेता है, वही

पृष्ठ 1153

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वास्तवमें समस्त वेदोंका रहस्य जानता है || २३ || अतः उद्धव! तुम इस प्रकार गुरुदेवकी उपासनारूप अनन्य भक्तिके द्वारा अपने ज्ञानकी कुल्हाड़ीको तीखी कर लो और उसके द्वारा धैर्य एवं सावधानीसे जीवभावको काट डालो । फिर परमात्मस्वरूप होकर उस वृत्तिरूप अस्त्रोंको भी छोड़ दो और अपने अखण्ड स्वरूपमें ही स्थित हो रहो ॥२४ ॥ *

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥

* ईश्वर अपनी मायाके द्वारा प्रपंचरूपसे प्रतीत हो रहा है । इस प्रपंचके अध्यासके कारण ही जीवोंको अनादि अविद्यासे कर्तापन आदिकी भ्रान्ति होती है। फिर ' यह करो, यह मत करो ’ इस प्रकारके विधि - निषेधका अधिकार होता है । तब ' अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये कर्म करो'– यह बात कही जाती है । जब अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है, तब कर्मसम्बन्धी दुराग्रह मिटानेके लिये यह बात कही जाती है कि भक्तिमें विक्षेप डालनेवाले कर्मोंके प्रति आदरभाव छोड़कर दृढ़ विश्वाससे भजन करो । तत्त्वज्ञान हो जानेपर कुछ भी कर्तव्य शेष नहीं रह जाता । यही इस प्रसंगका अभिप्राय है ।

पृष्ठ 1154

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अथ त्रयोदशोऽध्यायः हंसरूपसे सनकादिको दिये हुए उपदेशका वर्णन श्रीभगवानुवाच

सत्त्वं रजस्तम इति गुणा बुद्धेर्न चात्मनः ।

सत्त्वेनान्यतमौ हन्यात् सत्त्वं सत्त्वेन चैव हि ॥१

सत्त्वाद् धर्मो भवेद् वृद्धात् पुंसो मद्भक्तिलक्षणः ।

सात्त्विकोपासया सत्त्वं ततो धर्मः प्रवर्तते ॥२

धर्मो रजस्तमो हन्यात् सत्त्ववृद्धिरनुत्तमः ।

आशु नश्यति तन्मूलो ह्यधर्म उभये हते ॥ ३

आगमोऽपः प्रजा देशः कालः कर्म च जन्म च ।

ध्यानं मन्त्रोऽथ संस्कारो दशैते गुणहेतवः ॥४

तत्तत् सात्त्विकमेवैषां यद् यद् वृद्धाः प्रचक्षते ।

निन्दन्ति तामसं तत्तद् राजसं तदुपेक्षितम् ॥५

सात्त्विकान्येव सेवेत पुमान् सत्त्वविवृद्धये ।

ततो धर्मस्ततो ज्ञानं यावत् स्मृतिरपोहनम् ॥६

वेणुसंघर्षजो वह्निर्दग्ध्वा शाम्यति तद्वनम् ।

एवं गुणव्यत्ययजो देहः शाम्यति तत्क्रियः ॥७

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं - प्रिय उद्धव! सत्त्व, रज और तम – ये तीनों बुद्धि ( प्रकृति ) गुण हैं, आत्मा नहीं । सत्त्वके द्वारा रज और तम– इन दो गुणोंपर विजय प्राप्त कर लेनी चाहिये । तदनन्तर सत्त्वगुणकी शान्तवृत्तिके द्वारा उसकी दया आदि वृत्तियोंको भी शान्त कर देना चाहिये || १ || जब सत्त्वगुणकी वृद्धि होती है, तभी जीवको मेरे भक्तिरूप स्वधर्मकी प्राप्ति होती है । निरन्तर सात्त्विक वस्तुओंका सेवन करनेसे ही सत्त्वगुणकी वृद्धि होती है और तब मेरे भक्तिरूप स्वधर्ममें प्रवृत्ति होने लगती है ॥२ ॥ जिस धर्मके पालनसे सत्त्वगुणकी

वृद्धि हो, वही सबसे श्रेष्ठ है । वह धर्म रजोगुण और तमोगुणको नष्ट कर देता है । जब वे दोनों नष्ट हो जाते हैं, तब उन्हींके कारण होनेवाला अधर्म भी शीघ्र ही मिट जाता है ॥३ ॥ शास्त्र,

जल, प्रजाजन, देश, समय, कर्म, जन्म, ध्यान, मन्त्र और संस्कार— ये दस वस्तुएँ यदि सात्त्विक हों तो सत्त्वगुणकी, राजसिक हों तो रजोगुणकी और तामसिक हों तो तमोगुणकी

पृष्ठ 1155

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वृद्धि करती हैं ॥४ ॥ इनमेंसे शास्त्रज्ञ महात्मा जिनकी प्रशंसा करते हैं, वे सात्त्विक हैं,

जिनकी निन्दा करते हैं, वे तामसिक हैं और जिनकी उपेक्षा करते हैं, वे वस्तुएँ राजसिक हैं ॥५ ॥

जबतक अपने आत्माका साक्षात्कार तथा स्थूल सूक्ष्म शरीर और उनके कारण तीनों गुणोंकी निवृत्ति न हो, तबतक मनुष्यको चाहिये कि सत्त्वगुणकी वृद्धिके लिये सात्त्विक शास्त्र आदिका ही सेवन करे; क्योंकि उससे धर्मकी वृद्धि होती है और धर्मकी वृद्धिसे अन्तःकरण शुद्ध होकर आत्मतत्त्वका ज्ञान होता है ॥६ ॥ बाँसोंकी रगड़से आग पैदा होती है और वह

उनके सारे वनको जलाकर शान्त हो जाती है । वैसे ही यह शरीर गुणोंके वैषम्यसे उत्पन्न हुआ है । विचारद्वारा मन्थन करनेपर इससे ज्ञानाग्नि प्रज्वलित होती है और वह समस्त शरीरों एवं गुणोंको भस्म करके स्वयं भी शान्त हो जाती है ॥७ ॥

उद्धव उवाच

विदन्ति मर्त्याः प्रायेण विषयान् पदमापदाम् ।

तथापि भुंजते कृष्ण तत् कथं श्वखराजवत् ॥८

श्रीभगवानुवाच

अहमित्यन्यथाबुद्धिः प्रमत्तस्य यथा हृदि ।

उत्सर्पति रजो घोरं ततो वैकारिकं मनः ॥९

रजोयुक्तस्य मनसः संकल्पः सविकल्पकः ।

ततः कामो गुणध्यानाद् दुःसहः स्याद्धि दुर्मतेः ॥ १०

करोति कामवशगः कर्माण्यविजितेन्द्रियः ।

दुःखोदर्काणि सम्पश्यन् रजोवेगविमोहितः ॥११

रजस्तमोभ्यां यदपि विद्वान् विक्षिप्तधीः पुनः ।

अतन्द्रितो मनो युंजन् दोषदृष्टिर्न सज्जते ॥१२

अप्रमत्तोऽनुयुंजीत मनो मय्यर्पयञ्छनैः ।

अनिर्विण्णो यथाकालं जितश्वासो जितासनः ॥१३

एतावान् योग आदिष्टो मच्छिष्यैः सनकादिभिः ।

सर्वतो मन आकृष्य मय्यवाऽऽवेश्यते यथा ॥१४

उद्धव उवाच यदा त्वं सनकादिभ्यो येन रूपेण केशव ।

पृष्ठ 1156

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योगमादिष्टवानेतद् रूपमिच्छामि वेदितुम् ॥१५ उद्धवजीने पूछा — भगवन्! प्रायः सभी मनुष्य इस बातको जानते हैं कि विषय विपत्तियोंके घर हैं; फिर भी वे कुत्ते, गधे और बकरेके समान दुःख सहन करके भी उन्हींको

ही भोगते रहते हैं । इसका क्या कारण है? ॥ ८ ॥

भगवान् श्रीकृष्णने कहा – प्रिय उद्धव! जीव जब अज्ञानवश अपने स्वरूपको भूलकर हृदयसे सूक्ष्म - स्थूलादि शरीरोंमें अहंबुद्धि कर बैठता है - जो कि सर्वथा भ्रम ही है — तब उसका सत्त्वप्रधान मन घोर रजोगुणकी ओर झुक जाता है; उससे व्याप्त हो जाता है || ९ || बस, जहाँ मनमें रजोगुणकी प्रधानता हुई कि उसमें संकल्प - विकल्पोंका ताँता बँध जाता है । अब वह विषयोंका चिन्तन करने लगता है और अपनी दुर्बुद्धिके कारण कामके फंदेमें फँस जाता है, जिससे फिर छुटकारा होना बहुत ही कठिन है ॥१० ॥ अब वह अज्ञानी कामवश

अनेकों प्रकारके कर्म करने लगता है और इन्द्रियोंके वश होकर, यह जानकर भी कि इन कर्मोंका अन्तिम फल दुःख ही है, उन्हींको करता है, उस समय वह रजोगुणके तीव्र वेगसे अत्यन्त मोहित रहता है ॥११ ॥ यद्यपि विवेकी पुरुषका चित्त भी कभी -कभी रजोगुण और

तमोगुणके वेगसे विक्षिप्त होता है, तथापि उसकी विषयोंमें दोषदृष्टि बनी रहती है; इसलिये वह बड़ी सावधानीसे अपने चित्तको एकाग्र करनेकी चेष्टा करता रहता है, जिससे उसकी विषयोंमें आसक्ति नहीं होती ॥१२ ॥ साधकको चाहिये कि आसन और प्राणवायुपर विजय

प्राप्त कर अपनी शक्ति और समयके अनुसार बड़ी सावधानीसे धीरे- धीरे मुझमें अपना मन लगावे और इस प्रकार अभ्यास करते समय अपनी असफलता देखकर तनिक भी ऊबे नहीं, बल्कि और भी उत्साहसे उसीमें जुड़ जाय || १३ || प्रिय उद्धव! मेरे शिष्य सनकादि परमर्षियोंने योगका यही स्वरूप बताया है कि साधक अपने मनको सब ओरसे खींचकर विराट् आदिमें नहीं, साक्षात् मुझमें ही पूर्णरूपसे लगा दें ॥१४ ॥

उद्धवजीने कहा – श्रीकृष्ण! आपने जिस समय जिस रूपसे, सनकादि परमर्षियोंको योगका आदेश दिया था, उस रूपको मैं जानना चाहता हूँ ॥१५ ॥

श्रीभगवानुवाच

पुत्रा हिरण्यगर्भस्य मानसाः सनकादयः ।

पप्रच्छुः पितरं सूक्ष्मां योगस्यैकान्तिकीं गतिम् ॥१६

सनकादय ऊचुः

गुणेष्वाविशते चेतो गुणाश्चेतसि च प्रभो ।

कथमन्योन्यसंत्यागो मुमुक्षोरतितितीर्षोः ॥१७

श्रीभगवानुवाच

एवं पृष्टो महादेवः स्वयंभूर्भूतभावनः ।

ध्यायमानः प्रश्नबीजं नाभ्यपद्यत कर्मधीः ॥१८

पृष्ठ 1157

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स मामचिन्तयद् देवः प्रश्नपारतितीर्षया ।

तस्याहं हंसरूपेण सकाशमगमं तदा ॥१९

दृष्ट्वा मां त उपव्रज्य कृत्वा पादाभिवन्दनम् ।

ब्रह्माणमग्रतः कृत्वा पप्रच्छुः को भवानिति ॥२०

इत्यहं मुनिभिः पृष्टस्तत्त्वजिज्ञासुभिस्तदा ।

यदवोचमहं तेभ्यस्तदुद्धव निबोध मे ॥२१

वस्तुनो यद्यनानात्वमात्मनः प्रश्न ईदृशः ।

कथं घटेत वो विप्रा वक्तुर्वा मे क आश्रयः ॥२२

पंचात्मकेषु भूतेषु समानेषु च वस्तुतः ।

को भवानिति वः प्रश्नो वाचारम्भो ह्यनर्थकः ॥२३

भगवान् श्रीकृष्णने कहा– प्रिय उद्धव! सनकादि परमर्षि ब्रह्माजीके मानस पुत्र हैं। उन्होंने एक बार अपने पितासे योगकी सूक्ष्म अन्तिम सीमाके सम्बन्धमें इस प्रकार प्रश्न किया था ॥१६ ॥

सनकादि परमर्षियोंने पूछा - पिताजी! चित्त गुणों अर्थात् विषयोंमें घुसा ही रहता है और गुण भी चित्तकी एक -एक वृत्तिमें प्रविष्ट रहते ही हैं । अर्थात् चित्त और गुण आपसमें मिले - जुले ही रहते हैं । ऐसी स्थितिमें जो पुरुष इस संसारसागरसे पार होकर मुक्तिपद प्राप्त करना चाहता है, वह इन दोनोंको एक- दूसरेसे अलग कैसे कर सकता है? ॥१७ ॥

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं - प्रिय उद्धव! यद्यपि ब्रह्माजी सब देवताओंके शिरोमणि, स्वयम्भू और प्राणियोंके जन्मदाता हैं । फिर भी सनकादि परमर्षियोंके इस प्रकार पूछनेपर ध्यान करके भी वे इस प्रश्नका मूल कारण न समझ सके; क्योंकि उनकी बुद्धि कर्मप्रवण थी ॥१८ ॥ उद्धव! उस समय ब्रह्माजीने इस प्रश्नका उत्तर देनेके लिये भक्तिभावसे मेरा

चिन्तन किया । तब मैं हंसका रूप धारण करके उनके सामने प्रकट हुआ ॥ १९ ॥ मुझे

देखकर सनकादि ब्रह्माजीको आगे करके मेरे पास आये और उन्होंने मेरे चरणोंकी वन्दना करके मुझसे पूछा कि ‘ आप कौन हैं? ' || २० || प्रिय उद्धव! सनकादि परमार्थतत्त्वके जिज्ञासु थे; इसलिये उनके पूछनेपर उस समय मैंने जो कुछ कहा वह तुम मुझसे सुनो– ॥२१ ॥

‘ब्राह्मणो! यदि परमार्थरूप वस्तु नानात्वसे सर्वथा रहित है, तब आत्माके सम्बन्धमें आपलोगोंका ऐसा प्रश्न कैसे युक्तिसंगत हो सकता है? अथवा मैं यदि उत्तर देनेके लिये बोलूँ भी तो किस जाति, गुण, क्रिया और सम्बन्ध आदिका आश्रय लेकर उत्तर दूँ? ॥२२ ॥

देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि सभी शरीर पंच भूतात्मक होनेके कारण अभिन्न ही हैं और परमार्थ- रूपसे भी अभिन्न हैं । ऐसी स्थितिमें ' आप कौन हैं? ' आपलोगोंका यह प्रश्न ही केवल वाणीका व्यवहार है । विचारपूर्वक नहीं है, अतः निरर्थक है || २३ || मनसे, वाणीसे,

पृष्ठ 1158

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दृष्टिसे तथा अन्य इन्द्रियोंसे भी जो कुछ ग्रहण किया जाता है, वह सब मैं ही हूँ, मुझसे भिन्न और कुछ नहीं है । यह सिद्धान्त आपलोग तत्त्व -विचारके द्वारा समझ लीजिये ॥२४ ॥ पुत्रो!

यह चित्त चिन्तन करते - करते विषयाकार हो जाता है और विषय चित्तमें प्रविष्ट हो जाते हैं, यह बात सत्य है, तथापि विषय और चित्त ये दोनों ही मेरे स्वरूपभूत जीवके देह हैं — उपाधि हैं । अर्थात् आत्माका चित्त और विषयके साथ कोई सम्बन्ध ही नहीं है ॥२५ ॥ इसलिये बार-बार विषयोंका सेवन करते रहनेसे जो चित्त विषयोंमें आसक्त हो गया है और विषय भी

चित्तमें प्रविष्ट हो गये हैं, इन दोनोंको अपने वास्तविकसे अभिन्न मुझ परमात्माका साक्षात्कार करके त्याग देना चाहिये || २६ || जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति –ये तीनों अवस्थाएँ सत्त्वादि गुणोंके अनुसार होती हैं और बुद्धिकी वृत्तियाँ हैं, सच्चिदानन्दका स्वभाव नहीं । इन वृत्तियोंका साक्षी होनेके कारण जीव उनसे विलक्षण है । यह सिद्धान्त श्रुति, युक्ति और अनुभूतिसे युक्त है ॥२७ ॥ क्योंकि बुद्धि- वृत्तियोंके द्वारा होनेवाला यह बन्धन ही आत्मामें त्रिगुणमयी

वृत्तियोंका दान करता है । इसलिये तीनों अवस्थाओंसे विलक्षण और उनमें अनुगत मुझ तुरीय तत्त्वमें स्थित होकर इस बुद्धिके बन्धनका परित्याग कर दे । तब विषय और चित्त दोनोंका युगपत् त्याग हो जाता है ॥२८ ॥ यह बन्धन अहंकारकी ही रचना है और यही आत्माके

परिपूर्णतम सत्य, अखण्डज्ञान और परमानन्दस्वरूपको छिपा देता है । इस बातको जानकर विरक्त हो जाय और अपने तीन अवस्थाओंमें अनुगत तुरीयस्वरूपमें होकर संसारकी चिन्ताको छोड़ दे ॥२९ ॥ जबतक पुरुषकी भिन्न- भिन्न पदार्थोंमें सत्यत्वबुद्धि, अहंबुद्धि और

ममबुद्धि युक्तियोंके द्वारा निवृत्त नहीं हो जाती, तबतक वह अज्ञानी यद्यपि जागता है तथापि सोता हुआ - सा रहता है -जैसे स्वप्नावस्थामें जान पड़ता है कि मैं जाग रहा हूँ || ३० || आत्मासे अन्य देह आदि प्रतीयमान नाम-रूपात्मक प्रपंचका कुछ भी अस्तित्व नहीं है । इसलिये उनके कारण होनेवाले वर्णाश्रमादिभेद, स्वर्गादिफल और उनके कारणभूत कर्म — ये सब - के - सब इस आत्माके लिये वैसे ही मिथ्या हैं; जैसे स्वप्नदर्शी पुरुषके द्वारा देखे हुए सब-के - सब पदार्थ ॥३१ ||

मनसा वचसा दृष्टया गृह्यतेऽन्यैरपीन्द्रियैः ।

अहमेव न मत्तोऽन्यदिति बुध्यध्वमंजसा ॥२४

गुणेष्वाविशते चेतो गुणाश्चेतसि च प्रजाः ।

जीवस्य देह उभयं गुणाश्चेतो मदात्मनः ॥ २५

गुणेषु चाविशच्चित्तमभीक्ष्णं गुणसेवया ।

गुणाश्च चित्तप्रभवा मद्रूप उभयं त्यजेत् ॥२६

जाग्रत् स्वप्नः सुषुप्तं च गुणतो बुद्धिवृत्तयः ।

तासां विलक्षणो जीवः साक्षित्वेन विनिश्चितः ॥२७

पृष्ठ 1159

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यर्हि संसृतिबन्धोऽयमात्मनो गुणवृत्तिदः ।

मयि तुर्ये स्थितो जह्यात् त्यागस्तद् गुणचेतसाम् ॥२८

अहंकारकृतं बन्धमात्मनोऽर्थविपर्ययम् ।

विद्वान् निर्विद्य संसारचिन्तां तुर्ये स्थितस्त्यजेत् ॥२९

यावन्नानार्थधीः पुंसो न निवर्तेत युक्तिभिः ।

जागर्त्यपि स्वपन्नज्ञः स्वप्ने जागरणं यथा ॥३०

असत्त्वादात्मनोऽन्येषां भावानां तत्कृता भिदा ।

गतयो हेतवश्चास्य मृषा स्वप्नदृशो यथा ॥३१

यो जागरे बहिरनुक्षणधर्मिणोऽर्थान् भुङ्क्ते समस्तकरणैर्हृदि तत्सदृक्षान् । स्वप्ने सुषुप्त उपसंहरते स एकः स्मृत्यन्वयात्त्रिगुणवृत्तिदृगिन्द्रियेशः ॥३२ एवं विमृश्य गुणतो मनसत्र्यवस्था

मन्मायया मयि कृता इति निश्चितार्थाः ।

संछिद्य हार्दमनुमानसदुक्तितीक्ष्ण- ज्ञानासिना भजत माखिलसंशयाधिम् ॥३३

ईक्षेत विभ्रममिदं मनसो विलासं दृष्टं विनष्टमतिलोलमलातचक्रम् । विज्ञानमेकमुरुधेव विभाति माया स्वप्नस्त्रिधा गुणविसर्गकृतो विकल्पः ॥३४ जो जाग्रत्- अवस्थामें समस्त इन्द्रियोंके द्वारा बाहर दीखनेवाले सम्पूर्ण क्षणभंगुर पदार्थोंको अनुभव करता है और स्वप्नावस्थामें हृदयमें ही जाग्रत्में देखे हुए पदार्थोंके समान ही वासनामय विषयोंका अनुभव करता है और सुषुप्ति-अवस्थामें उन सब विषयोंको समेटकर उनके लयको भी अनुभव करता है, वह एक ही है। जाग्रत् अवस्थाके इन्द्रिय, स्वप्नावस्थाके मन और सुषुप्तिकी संस्कारवती बुद्धिका भी वही स्वामी है । क्योंकि वह त्रिगुणमयी तीनों अवस्थाओंका साक्षी है । ' जिस मैंने स्वप्न देखा, जो मैं सोया, वही मैं जाग रहा हूँ' – इस स्मृतिके बलपर एक ही आत्माका समस्त अवस्थाओंमें होना सिद्ध हो जाता है ॥३२ ॥ ऐसा विचारकर मनकी ये तीनों अवस्थाएँ गुणोंके द्वारा मेरी मायासे मेरे अंशस्वरूप

जीवमें कल्पित की गयी हैं और आत्मामें ये नितान्त असत्य हैं, ऐसा निश्चय करके तुमलोग

पृष्ठ 1160

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अनुमान, सत्पुरुषोंद्वारा किये गये उपनिषदोंके श्रवण और तीक्ष्ण ज्ञानखड्गके द्वारा सकल संशयोंके आधार अहंकारका छेदन करके हृदयमें स्थित मुझ परमात्माका भजन करो ॥३३ ॥

यह जगत् मनका विलास है, दीखनेपर भी नष्टप्राय है, अलातचक्र ( लुकारियोंकी बनेठी ) के समान अत्यन्त चंचल है और भ्रममात्र है - ऐसा समझे । ज्ञाता और ज्ञेयके भेदसे रहित एक ज्ञानस्वरूप आत्मा ही अनेक-सा प्रतीत हो रहा है। यह स्थूल शरीर इन्द्रिय और अन्तःकरणरूप तीन प्रकारका विकल्प गुणोंके परिणामकी रचना है और स्वप्नके समान मायाका खेल है, अज्ञानसे कल्पित है ॥ ३४ ॥ इसलिये उस देहादिरूप दृश्यसे दृष्टि हटाकर

तृष्णारहित इन्द्रियोंके व्यापारसे हीन और निरीह होकर आत्मानन्दके अनुभवमें मग्न हो जाय । यद्यपि कभी - कभी आहार आदिके समय यह देहादिक प्रपंच देखनेमें आता है, तथापि यह पहले ही आत्मवस्तुसे अतिरिक्त और मिथ्या समझकर छोड़ा जा चुका है । इसलिये वह पुनः भ्रान्तिमूलक मोह उत्पन्न करनेमें समर्थ नहीं हो सकता । देहपातपर्यन्त केवल संस्कारमात्र उसकी प्रतीति होती है ॥ ३५ ॥ जैसे मदिरा पीकर उन्मत्त पुरुष यह नहीं देखता कि मेरे द्वारा

पहना हुआ वस्त्र शरीरपर है या गिर गया, वैसे ही सिद्ध पुरुष जिस शरीरसे उसने अपने स्वरूपका साक्षात्कार किया है, वह प्रारब्धवश खड़ा है, बैठा है या दैववश कहीं गया या आया है — नश्वर शरीरसम्बन्धी इन बातोंपर दृष्टि नहीं डालता ॥३६ ॥

दृष्टिं ततः प्रतिनिवर्त्य निवृत्ततृष्ण- स्तूष्णीं भवेन्निजसुखानुभवो निरीहः । संदृश्यते क्व च यदीदमवस्तुबुद्धया त्यक्तं भ्रमाय न भवेत् स्मृतिरानिपातात् ॥३५ देहं च नश्वरमवस्थितमुत्थितं वा सिद्धो न पश्यति यतोऽध्यगमत् स्वरूपम् । दैवादपेतमुत दैववशादुपेतं वासो यथा परिकृतं मदिरामदान्धः ॥३६ देहोऽपि दैववशगः खलु कर्म यावत् स्वारम्भकं प्रतिसमीक्षत एव सासुः । तं सप्रपंचमधिरूढसमाधियोगः स्वाप्नं पुनर्न भजते प्रतिबुद्धवस्तुः ॥ ३७

मयैतदुक्तं वो विप्रा गुह्यं यत् सांख्ययोगयोः ।

जानीत माऽऽगतं यज्ञं युष्मद्धर्मविवक्षया ॥३८

अहं योगस्य सांख्यस्य सत्यस्यर्तस्य तेजसः ।