श्रीगणेशाय नमः।
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 1141–1150
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1141–1150
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गृह्यमाणेष्वहं कुर्यान्न विद्वान् यस्त्वविक्रियः ॥ ९
दैवाधीने शरीरेऽस्मिन् गुणभाव्येन कर्मणा ।
वर्तमानोऽबुधस्तत्र कर्तास्मीति निबद्धयते ॥१०
एवं विरक्तः शयने आसनाटनमज्जने ।
दर्शनस्पर्शनघ्राणभोजनश्रवणादिषु ॥ ११
प्यारे उद्धव! पूर्वोक्त पद्धतिसे विचार करके विवेकी पुरुष समस्त विषयोंसे विरक्त रहता है और सोने - बैठने, घूमने -फिरने, नहाने, देखने, छूने, सूँघने, खाने और सुनने आदि क्रियाओंमें अपनेको कर्ता नहीं मानता, बल्कि गुणोंको ही कर्ता मानता है । गुण ही सभी कर्मोंके कर्ता-भोक्ता हैं — ऐसा जानकर विद्वान् पुरुष कर्मवासना और फलोंसे नहीं बँधते । वे प्रकृतिमें रहकर भी वैसे ही असंग रहते हैं, जैसे स्पर्श आदिसे आकाश, जलकी आर्द्रता आदिसे सूर्य और गन्ध आदिसे वायु । उनकी विमल बुद्धिकी तलवार असंग- भावनाकी सानसे और भी तीखी हो जाती है, और वे उससे अपने सारे संशय - सन्देहोंको काट- कूटकर फेंक देते हैं । जैसे कोई स्वप्नसे जाग उठा हो, उसी प्रकार वे इस भेदबुद्धिके भ्रमसे मुक्त हो जाते हैं ॥११-१३ ॥ जिनके प्राण, इन्द्रिय, मन और बुद्धिकी समस्त चेष्टाएँ बिना संकल्पके होती हैं, वे देहमें स्थित रहकर भी उसके गुणोंसे मुक्त हैं ॥१४ ॥
न तथा बद्धयते विद्वांस्तत्र तत्रादयन् गुणान् ।
प्रकृतिस्थोऽप्यसंसक्तो यथा खं सवितानिलः ॥१२
वैशारद्येक्षयासंगशितया छिन्नसंशयः ।
प्रतिबुद्ध इव स्वप्नान्नानात्वाद् विनिवर्तते ॥१३
यस्य स्युर्वीतसंकल्पाः प्राणेन्द्रियमनोधियाम् ।
वृत्तयः स विनिर्मुक्तो देहस्थोऽपि हि तद्गुणैः ॥१४
यस्यात्मा हिंस्यते हिंस्रैर्येन किंचिद् यदृच्छया ।
अर्च्यते वा क्वचित्तत्र न व्यतिक्रियते बुधः ॥१५
न स्तुवीत न निन्देत कुर्वतः साध्वसाधु वा ।
वदतो गुणदोषाभ्यां वर्जितः समदृङ्मुनिः ॥१६
न कुर्यान्न वदेत् किंचिन्न ध्यायेत् साध्वसाधु वा ।
आत्मारामोऽनया वृत्त्या विचरेज्जडवन्मुनिः ॥१७
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शब्दब्रह्मणि निष्णातो न निष्णायात् परे यदि ।
श्रमस्तस्य श्रमफलो ह्यधेनुमिव रक्षतः ॥ १८
गां दुग्धदोहामसतीं च भार्यां देहं पराधीनमसत्प्रजां च । वित्तं त्वतीर्थीकृतमंग वाचं हीनां मया रक्षति दुःखदुःखी ॥१९ यस्यां न मे पावनमंग कर्म स्थित्युद्भवप्राणनिरोधमस्य । लीलावतारेप्सितजन्म वा स्याद् वन्ध्यां गिरं तां बिभृयान्न धीरः ॥२० उन तत्त्वज्ञ मुक्त पुरुषोंके शरीरको चाहे हिंसक लोग पीड़ा पहुँचायें और चाहे कभी कोई दैवयोगसे पूजा करने लगे– वे न तो किसीके सतानेसे दुःखी होते हैं और न पूजा करनेसे सुखी ॥१५ ॥ जो समदर्शी महात्मा गुण और दोषकी भेददृष्टिसे ऊपर उठ गये हैं, वे न तो
अच्छे काम करनेवालेकी स्तुति करते हैं और न बुरे काम करनेवालेकी निन्दा; न वे किसीकी अच्छी बात सुनकर उसकी सराहना करते हैं और न बुरी बात सुनकर किसीको झिड़कते ही हैं ॥१६ ॥ जीवन्मुक्त पुरुष न तो कुछ भला या बुरा काम करते हैं, न कुछ भला या बुरा
कहते हैं और न सोचते ही हैं । वे व्यवहारमें अपनी समान वृत्ति रखकर आत्मानन्दमें ही मग्न रहते हैं और जडके समान मानो कोई मूर्ख हो इस प्रकार विचरण करते रहते हैं ॥१७ ॥
प्यारे उद्धव! जो पुरुष वेदोंका तो पारगामी विद्वान् हो, परन्तु परब्रह्मके ज्ञानसे शून्य हो, उसके परिश्रमका कोई फल नहीं है वह तो वैसा ही है, जैसे बिना दूधकी गायका पालनेवाला ॥१८ ॥ दूध न देनेवाली गाय, व्यभिचारिणी स्त्री, पराधीन शरीर, दुष्ट पुत्र,
सत्पात्रके प्राप्त होनेपर भी दान न किया हुआ धन और मेरे गुणोंसे रहित वाणी व्यर्थ है । इन वस्तुओंकी रखवाली करनेवाला दुःख- पर-दुःख ही भोगता रहता है ॥१९ ॥ इसलिये उद्धव!
जिस वाणीमें जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयरूप मेरी लोक- पावन लीलाका वर्णन न हो और लीलावतारोंमें भी मेरे लोकप्रिय राम कृष्णादि अवतारोंका जिसमें यशोगान न हो, वह वाणी वन्ध्या है । बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि ऐसी वाणीका उच्चारण एवं श्रवण न करे ॥२० ॥
एवं जिज्ञासयापोह्य नानात्वभ्रममात्मनि ।
उपारमेत विरजं मनो मय्य सर्वगे ॥ २१
यद्यनीशो धारयितुं मनो ब्रह्मणि निश्चलम् ।
मयि सर्वाणि कर्माणि निरपेक्षः समाचर ॥२२
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श्रद्धालुर्मे कथाः शृण्वन् सुभद्रा लोकपावनीः ।
गायन्ननुस्मरन् कर्म जन्म चाभिनयन् मुहुः ॥ २३
मदर्थे धर्मकामार्थानाचरन् मदपाश्रयः ।
लभते निश्चलां भक्तिं मय्युद्धव सनातने ॥२४
सत्संगलब्धया भक्त्या मयि मां स उपासिता ।
स वै मे दर्शितं सद्भिरंजसा विन्दते पदम् ॥२५
उद्धव उवाच
साधुस्तवोत्तमश्लोक मतः कीदृग्विधः प्रभो ।
भक्तिस्त्वय्युपयुज्येत कीदृशी सद्भिरादृता ॥२६
एतन्मे पुरुषाध्यक्ष लोकाध्यक्ष जगत्प्रभो ।
प्रणतायानुरक्ताय प्रपन्नाय च कथ्यताम् ॥२७
त्वं ब्रह्म परमं व्योम पुरुषः प्रकृतेः परः ।
अवतीर्णोऽसि भगवन् स्वेच्छोपात्तपृथग्वपुः ॥२८
प्रिय उद्धव! जैसा कि ऊपर वर्णन किया गया है, आत्मजिज्ञासा और विचारके द्वारा आत्मामें जो अनेकताका भ्रम है उसे दूर कर दे और मुझ सर्वव्यापी परमात्मामें अपना निर्मल मन लगा दे तथा संसारके व्यवहारोंसे उपराम हो जाय ॥ २१ ॥ यदि तुम अपना मन परब्रह्ममें
स्थिर न कर सको तो सारे कर्म निरपेक्ष होकर मेरे लिये ही करो ॥ २२ ॥ मेरी कथाएँ समस्त
लोकोंको पवित्र करनेवाली एवं कल्याणस्वरूपिणी हैं । श्रद्धाके साथ उन्हें सुनना चाहिये । बार- बार मेरे अवतार और लीलाओंका गान, स्मरण और अभिनय करना चाहिये ॥२३ ॥ मेरे
आश्रित रहकर मेरे ही लिये धर्म, काम और अर्थका सेवन करना चाहिये। प्रिय उद्धव! जो ऐसा करता है, उसे मुझ अविनाशी पुरुषके प्रति अनन्य प्रेममयी भक्ति प्राप्त हो जाती है ॥२४ ॥
भक्तिकी प्राप्ति सत्संगसे होती है; जिसे भक्ति प्राप्त हो जाती है वह मेरी उपासना करता है, मेरे सान्निध्यका अनुभव करता है । इस प्रकार जब उसका अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है, तब वह संतोंके उपदेशोंके अनुसार उनके द्वारा बताये हुए मेरे परमपदको —वास्तविक स्वरूपको सहजहीमें प्राप्त हो जाता है ॥२५ ॥
उद्धवजीने पूछा — भगवन्! बड़े - बड़े संत आपकी कीर्तिका गान करते हैं । आप कृपया बतलाइये कि आपके विचारसे संत पुरुषका क्या लक्षण है? आपके प्रति कैसी भक्ति करनी चाहिये, जिसका संतलोग आदर करते हैं? || २६ || भगवन्! आप ही ब्रह्मा आदि श्रेष्ठ देवता, सत्यादि लोक और चराचर जगत्के स्वामी हैं । मैं आपका विनीत, प्रेमी और शरणागत भक्त
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। आप मुझे भक्ति और भक्तका रहस्य बतलाइये ॥ २७ ॥ भगवन्! मैं जानता हूँ कि आप
प्रकृतिसे परे पुरुषोत्तम एवं चिदाकाशस्वरूप ब्रह्म हैं । आपसे भिन्न कुछ भी नहीं है; फिर भी आपने लीलाके लिये स्वेच्छासे ही यह अलग शरीर धारण करके अवतार लिया है । इसलिये वास्तवमें आप ही भक्ति और भक्तका रहस्य बतला सकते हैं ॥२८ ॥
श्रीभगवानुवाच
कृपालुरकृतद्रोहस्तितिक्षुः सर्वदेहिनाम् ।
सत्यसारोऽनवद्यात्मा समः सर्वोपकारकः ॥२९
कामैरहतधीर्दान्तो मृदुः शुचिरकिंचनः ।
अनीहो मितभुक् शान्तः स्थिरो मच्छरणो मुनिः ॥३०
अप्रमत्तो गभीरात्मा धृतिमांजितषड्गुणः ।
अमानी मानदः कल्पो मैत्रः कारुणिकः कविः ॥३१
आज्ञायैवं गुणान् दोषान् मयाऽऽदिष्टानपि स्वकान् ।
धर्मान् सन्त्यज्य यः सर्वान् मां भजेत स सत्तमः ॥३२
ज्ञात्वाज्ञात्वाथ ये वै मां यावान् यश्चास्मि यादृशः ।
भजन्त्यनन्यभावेन ते मे भक्ततमा मताः ॥ ३३
मल्लिङ्गमद्भक्तजनदर्शनस्पर्शनार्चनम् ।
परिचर्या स्तुतिः प्रह्वगुणकर्मानुकीर्तनम् ॥ ३४
भगवान् श्रीकृष्णने कहा- प्यारे उद्धव! मेरा भक्त कृपाकी मूर्ति होता है । वह किसी भी प्राणीसे वैरभाव नहीं रखता और घोर से- घोर दुःख भी प्रसन्नतापूर्वक सहता है । उसके जीवनका सार है सत्य, और उसके मनमें किसी प्रकारकी पापवासना कभी नहीं आती । वह समदर्शी और सबका भला करनेवाला होता है ॥२९ ॥ उसकी बुद्धि कामनाओंसे कलुषित
नहीं होती । वह संयमी, मधुरस्वभाव और पवित्र होता है । संग्रह -परिग्रहसे सर्वथा दूर रहता है । किसी भी वस्तुके लिये वह कोई चेष्टा नहीं करता । परिमित भोजन करता है और शान्त रहता है । उसकी बुद्धि स्थिर होती है । उसे केवल मेरा ही भरोसा होता है और वह आत्मतत्त्वके चिन्तनमें सदा संलग्न रहता है ॥३० ॥ वह प्रमादरहित, गम्भीरस्वभाव और धैर्यवान् होता है ।
भूख- प्यास, शोक- मोह और जन्म- मृत्यु - ये छहों उसके वशमें रहते हैं । वह स्वयं तो कभी किसीसे किसी प्रकारका सम्मान नहीं चाहता, परन्तु दूसरोंका सम्मान करता रहता है । मेरे सम्बन्धकी बातें दूसरोंको समझानेमें बड़ा निपुण होता है और सभीके साथ मित्रताका व्यवहार करता है । उसके हृदयमें करुणा भरी होती है। मेरे तत्त्वका उसे यथार्थ ज्ञान होता
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है || ३१ || प्रिय उद्धव! मैंने वेदों और शास्त्रोंके रूपमें मनुष्योंके धर्मका उपदेश किया है, उनके पालनसे अन्तःकरणशुद्धि आदि गुण और उल्लंघनसे नरकादि दुःख प्राप्त होते हैं; परन्तु मेरा जो भक्त उन्हें भी अपने ध्यान आदिमें विक्षेप समझकर त्याग देता है और केवल मेरे ही भजनमें लगा रहता है, वह परम संत है || ३२ || मैं कौन हूँ, कितना बड़ा हूँ, कैसा हूँ– इन बातोंको जाने, चाहे न जाने; किन्तु जो अनन्यभावसे मेरा भजन करते हैं, वे मेरे विचारसे मेरे परम भक्त हैं ॥३३ ॥
प्यारे उद्धव! मेरी मूर्ति और मेरे भक्तजनोंका दर्शन, स्पर्श, पूजा, सेवा- शुश्रूषा, स्तुति और प्रणाम करे तथा मेरे गुण और कर्मोंका कीर्तन करे ॥ ३४ ॥ उद्धव! मेरी कथा सुननेमें श्रद्धा
रखे और निरन्तर मेरा ध्यान करता रहे । जो कुछ मिले, वह मुझे समर्पित कर दे और दास्यभावसे मुझे आत्मनिवेदन करे ॥ ३५ ॥ मेरे दिव्य जन्म और कर्मोंकी चर्चा करे ।
जन्माष्टमी, रामनवमी आदि पर्वोंपर आनन्द मनावे और संगीत, नृत्य, बाजे और समाजोंद्वारा मेरे मन्दिरोंमें उत्सव करे- करावे || ३६ || वार्षिक त्योहारोंके दिन मेरे स्थानोंकी यात्रा करे, जुलूस निकाले तथा विविध उपहारोंसे मेरी पूजा करे । वैदिक अथवा तान्त्रिक पद्धतिसे दीक्षा ग्रहण करे । मेरे व्रतोंका पालन करे ॥ ३७ ॥ मन्दिरोंमें मेरी मूर्तियोंकी स्थापनामें श्रद्धा रखे ।
यदि यह काम अकेला न कर सके, तो औरोंके साथ मिलकर उद्योग करे । मेरे लिये पुष्पवाटिका, बगीचे, क्रीड़ाके स्थान, नगर और मन्दिर बनवावे ॥ ३८ । । सेवककी भाँति श्रद्धाभक्तिके साथ निष्कपट भावसे मेरे मन्दिरोंकी सेवा- शुश्रूषा करे – झाड़े - बुहारे, लीपे-पोते, छिड़काव करे और तरह- तरहके चौक पूरे ॥ ३ ९ ॥ अभिमान न करे, दम्भ न करे । साथ ही अपने शुभ कर्मोंका ढिंढोरा भी न पीटे । प्रिय उद्धव! मेरे चढ़ावेकी, अपने काममें लगानेकी बात तो दूर रही, मुझे समर्पित दीपकके प्रकाशसे भी अपना काम न ले । किसी दूसरे देवताकी चढ़ायी हुई वस्तु मुझे न चढ़ावे ॥ ४० ॥ संसारमें जो वस्तु अपनेको सबसे प्रिय, सबसे अभीष्ट
जान पड़े वह मुझे समर्पित कर दे । ऐसा करनेसे वह वस्तु अनन्त फल देनेवाली हो जाती है ॥४१ ॥
मत्कथाश्रवणे श्रद्धा मदनुध्यानमुद्धव ।
सर्वलाभोपहरणं दास्येनात्मनिवेदनम् ॥३५
मज्जन्मकर्मकथनं मम पर्वानुमोदनम् ।
गीतताण्डववादित्रगोष्ठीभिर्मद्गृहोत्सवः ॥ ३६
यात्रा बलिविधानं च सर्ववार्षिकपर्वसु ।
वैदिकी तान्त्रिकी दीक्षा मदीयव्रतधारणम् ॥३७
ममार्चास्थापने श्रद्धा स्वतः संहत्य चोद्यमः ।
उद्यानोपवनाक्रीडपुरमन्दिरकर्मणि ॥३८
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सम्मार्जनोपलेपाभ्यां सेकमण्डलवर्तनैः ।
गृहशुश्रूषणं मह्यं दासवद् यदमायया ॥३९
अमानित्वमदम्भित्वं कृतस्यापरिकीर्तनम् ।
अपि दीपावलोकं मे नोपयुञ्ज्याान्निवेदितम् ॥४०
यद् यदिष्टतमं लोके यच्चातिप्रियमात्मनः ।
तत्तन्निवेदयेन्मह्यं तदानन्त्याय कल्पते ॥४१
सूर्योऽग्निर्ब्राह्मणो गावो वैष्णवः खं मरुज्जलम् ।
भूरात्मा सर्वभूतानि भद्र पूजापदानि मे ॥४२
सूर्ये तु विद्यया त्रय्या हविषाग्नौ यजेत माम् ।
आतिथ्येन तु विप्राग्र्ये गोष्वंग यवसादिना ॥ ४३
वैष्णवे बन्धुसत्कृत्या हृदि खे ध्याननिष्ठया ।
वायौ मुख्यधिया तोये द्रव्यैस्तोयपुरस्कृतैः ॥४४
भद्र! सूर्य, अग्नि, ब्राह्मण, गौ, वैष्णव, आकाश, वायु, जल, पृथ्वी, आत्मा और समस्त प्राणी - ये सब मेरी पूजाके स्थान हैं ॥ ४२ ॥ प्यारे उद्धव! ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदके
मन्त्रोंद्वारा सूर्यमें मेरी पूजा करनी चाहिये । हवनके द्वारा अग्निमें, आतिथ्यद्वारा श्रेष्ठ ब्राह्मणमें और हरी - हरी घास आदिके द्वारा गौमें मेरी पूजा करे ॥४३ ॥
भाई- बन्धुके समान सत्कारके द्वारा वैष्णवमें, निरन्तर ध्यानमें लगे रहनेसे हृदयाकाशमें, मुख्य प्राण समझनेसे वायुमें और जल- पुष्प आदि सामग्रियों द्वारा जलमें मेरी आराधना की जाती है ॥४४ ॥ गुप्त मन्त्रोंद्वारा न्यास करके मिट्टीकी वेदीमें, उपयुक्त भोगोंद्वारा आत्मामें
और समदृष्टिद्वारा सम्पूर्ण प्राणियोंमें मेरी आराधना करनी चाहिये, क्योंकि मैं सभीमें क्षेत्रज्ञ आत्माके रूपसे स्थित हूँ ॥ ४५ ॥ इन सभी स्थानोंमें शंख-चक्र- गदा - पद्म धारण किये चार
भुजाओंवाले शान्तमूर्ति श्रीभगवान् विराजमान हैं, ऐसा ध्यान करते हुए एकाग्रताके साथ मेरी पूजा करनी चाहिये ॥४६ ॥ इस प्रकार जो मनुष्य एकाग्र चित्त से यज्ञ- यागादि इष्ट और कुआँ-बावली बनवाना आदि पूर्त्तकर्मोंके द्वारा मेरी पूजा करता है, उसे मेरी श्रेष्ठ भक्ति प्राप्त होती है
तथा संत - पुरुषोंकी सेवा करनेसे मेरे स्वरूपका ज्ञान भी हो जाता है || ४७ ॥ प्यारे उद्धव! मेरा ऐसा निश्चय है कि सत्संग और भक्तियोग- इन दो साधनोंका एक साथ ही अनुष्ठान करते रहना चाहिये । प्रायः इन दोनोंके अतिरिक्त संसारसागरसे पार होनेका और कोई उपाय नहीं है, क्योंकि संतपुरुष मुझे अपना आश्रय मानते हैं और मैं सदा- सर्वदा उनके पास बना रहता हूँ ॥४८ ॥ प्यारे उद्धव! अब मैं तुम्हें एक अत्यन्त गोपनीय परम रहस्यकी बात बतलाऊँगा;
क्योंकितुम मेरे प्रिय सेवक, हितैषी, सुहृद् और प्रेमी सखा हो; साथ ही सुननेके भी इच्छुक
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हो ॥४९ ॥
स्थण्डिले मन्त्रहृदयैर्भोगैरात्मानमात्मनि ।
क्षेत्रज्ञं सर्वभूतेषु समत्वेन यजेत माम् ॥४५
धिष्ण्येष्वेष्विति मद्रूपं शंखचक्रगदाम्बुजैः ।
युक्तं चतुर्भुजं शान्तं ध्यायन्नर्चेत् समाहितः ॥४६
इष्टापूर्तेन मामेवं यो यजेत समाहितः ।
लभते मयि सद्भक्तिं मत्स्मृतिः साधुसेवया ॥४७
प्रायेण भक्तियोगेन सत्संगेन विनोद्धव ।
नोपायो विद्यते सध्रयप्रायणं हि सतामहम् ॥४८
अथैतत् परमं गुह्यं शृण्वतो यदुनन्दन ।
सुगोप्यमपि वक्ष्यामि त्वं मे भृत्यः सुहृत् सखा ॥४९
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे एकादशोऽध्यायः
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अथ द्वादशोऽध्यायः सत्संगकी महिमा और कर्म तथा कर्मत्यागकी विधि श्रीभगवानुवाच
न रोधयति मां योगो न सांख्यं धर्म एव च ।
न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो नेष्टापूर्तं न दक्षिणा ॥ १
व्रतानि यज्ञश्छन्दांसि तीर्थानि नियमा यमाः ।
यथावरुन्धे सत्संगः सर्वसंगापहो हि माम् ॥२
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं- प्रिय उद्धव! जगत्में जितनी आसक्तियाँ हैं, उन्हें सत्संग नष्ट कर देता है । यही कारण है कि सत्संग जिस प्रकार मुझे वशमें कर लेता है वैसा साधन न योग है न सांख्य, न धर्मपालन और न स्वाध्याय । तपस्या, त्याग, इष्टापूर्त और दक्षिणासे भी मैं वैसा प्रसन्न नहीं होता । कहाँतक कहूँ— व्रत, यज्ञ, वेद, तीर्थ और यम- नियम भी सत्संगके समान मुझे वशमें करनेमें समर्थ नहीं हैं ॥ १-२ ॥ निष्पाप उद्धवजी! यह एक युगकी नहीं, सभी युगोंकी एक- सी बात है। सत्संगके द्वारा ही दैत्य- राक्षस, पशु- पक्षी, गन्धर्व - अप्सरा, नाग- सिद्ध, चारण - गुह्यक और विद्याधरोंको मेरी प्राप्ति हुई है । मनुष्यों में वैश्य, शूद्र, स्त्री और अन्त्यज आदि रजोगुणी - तमोगुणी प्रकृतिके बहुत - से जीवोंने मेरा परमपद प्राप्त किया है । वृत्रासुर, प्रह्लाद, वृषपर्वा, बलि, बाणासुर, मयदानव, विभीषण, सुग्रीव, हनुमान्, जाम्बवान्, गजेन्द्र, जटायु, तुलाधार वैश्य, धर्मव्याध, कुब्जा, व्रजकी गोपियाँ, यज्ञपत्नियाँ और दूसरे लोग भी सत्संगके प्रभावसे ही मुझे प्राप्त कर सके हैं ॥ ३-६ ॥ उन लोगोंने न तो वेदोंका स्वाध्याय किया था और न विधिपूर्वक महापुरुषोंकी उपासना की थी । इसी प्रकार उन्होंने कृच्छ्रचान्द्रायण आदि व्रत और कोई तपस्या भी नहीं की थी । बस, केवल सत्संगके प्रभावसे ही वे मुझे प्राप्त हो गये || ७ || गोपियाँ, गायें, यमलार्जुन आदि वृक्ष, व्रजके हरिन आदि पशु, कालिय आदि नाग — ये तो साधन- साध्यके सम्बन्धमें सर्वथा ही मूढबुद्धि थे । इतने ही नहीं, ऐसे - ऐसे और भी बहुत हो गये हैं, जिन्होंने केवल प्रेमपूर्ण भावके द्वारा ही अनायास मेरी प्राप्ति कर ली और कृतकृत्य हो गये ॥८ ॥ उद्धव! बड़े - बड़े प्रयत्नशील साधक योग, सांख्य,
दान, व्रत, तपस्या, यज्ञ, श्रुतियोंकी व्याख्या, स्वाध्याय और संन्यास आदि साधनोंके द्वारा मुझे नहीं प्राप्त कर सकते; परन्तु सत्संगके द्वारा तो मैं अत्यन्त सुलभ हो जाता हूँ ॥९ ॥ उद्धव!
जिस समय अक्रूरजी भैया बलरामजीके साथ मुझे व्रजसे मथुरा ले आये, उस समय गोपियोंका हृदय गाढ़ प्रेमके कारण मेरे अनुरागके रंगमें रँगा हुआ था । मेरे वियोगकी तीव्र व्याधिसे वे व्याकुल हो रही थीं और मेरे अतिरिक्त कोई भी दूसरी वस्तु उन्हें सुखकारक नहीं जान पड़ती थी ॥१० ॥ तुम जानते हो कि मैं ही उनका एकमात्र प्रियतम हूँ। जब मैं
वृन्दावनमें था, तब उन्होंने बहुत- सी रात्रियाँ - वे रासकी रात्रियाँ मेरे साथ आधे क्षणके समान बिता दी थीं; परन्तु प्यारे उद्धव! मेरे बिना वे ही रात्रियाँ उनके लिये एक-एक कल्पके समान
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हो गयीं ॥११ ॥ जैसे बड़े - बड़े ऋषि-मुनि समाधिमें स्थित होकर तथा गंगा आदि बड़ी -बड़ी
नदियाँ समुद्रमें मिलकर अपने नाम रूप खो देती हैं, वैसे ही वे गोपियाँ परम प्रेमके द्वारा मुझमें इतनी तन्मय हो गयी थीं कि उन्हें लोक- परलोक, शरीर और अपने कहलानेवाले पति-पुत्रादिकी भी सुध- बुध नहीं रह गयी थी ॥ १२ ॥ उद्धव! उन गोपियोंमें बहुत- सी तो ऐसी थीं,
जो मेरे वास्तविक स्वरूपको नहीं जानती थीं । वे मुझे भगवान् न जानकर केवल प्रियतम ही समझती थीं और जारभावसे मुझसे मिलनेकी आकांक्षा किया करती थीं । उन साधनहीन सैकड़ों, हजारों अबलाओंने केवल संगके प्रभावसे ही मुझ परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लिया ॥१३ ॥ इसलिये उद्धव! तुम श्रुति स्मृति, विधि- निषेध, प्रवृत्ति-निवृत्ति और सुननेयोग्य
तथा सुने हुए विषयका भी परित्याग करके सर्वत्र मेरी ही भावना करते हुए समस्त प्राणियोंके आत्मस्वरूप मुझ एककी ही शरण सम्पूर्ण रूपसे ग्रहण करो; क्योंकि मेरी शरणमें आ जानेसे तुम सर्वथा निर्भय हो जाओगे ॥१४-१५ ॥
सत्संगेन हि दैतेया यातुधाना मृगाः खगाः ।
गन्धर्वाप्सरसो नागाः सिद्धाश्चारणगुह्यकाः ॥३
विद्याधरा मनुष्येषु वैश्याः शूद्राः स्त्रियोऽन्त्यजाः ।
रजस्तमःप्रकृतयस्तस्मिंस्तस्मिन् युगेऽनघ ॥४
बहवो मत्पदं प्राप्तास्त्वाष्ट्रकायाधवादयः ।
वृषपर्वा बलिर्बाणो मयश्चाथ विभीषणः ॥५
सुग्रीवो हनुमानृक्षो गजो गृध्रो वणिक्पथः ।
व्याधः कुब्जा व्रजे गोप्यो यज्ञपत्न्यस्तथापरे ॥६
ते नाधीतश्रुतिगणा नोपासितमहत्तमाः ।
अव्रतातप्ततपसः सत्संगान्मामुपागताः ॥७
केवलेन हि भावेन गोप्यो गावो नगा मृगाः ।
येऽन्ये मूढधियो नागाः सिद्धा मामीयुरञ्जसा ॥८
यं न योगेन सांख्येन दानव्रततपोऽध्वरैः ।
व्याख्यास्वाध्यायसंन्यासैः प्राप्नुयाद् यत्नवानपि ॥९
रामेण सार्धं मथुरां प्रणीते श्वाफल्किना मय्यनुरक्तचित्ताः ।
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विगाढभावेन न मे वियोग- तीव्राधयोऽन्यं ददृशुः सुखाय ॥१० तास्ताः क्षपाः प्रेष्ठतमेन नीता मयैव वृन्दावनगोचरेण । क्षणार्धवत्ताः पुनरंग तासां हीना मया कल्पसमा बभूवुः ॥११ ता नाविदन् मय्यनुषंगबद्ध- धियः स्वमात्मानमदस्तथेदम् । यथा समाधौ मुनयोऽब्धितोये नद्यः प्रविष्टा इव नामरूपे ॥१२
मत्कामा रमणं जारमस्वरूपविदोऽबलाः ।
ब्रह्म मां परमं प्रापुः संगाच्छतसहस्रशः ॥१३
तस्मात्त्वमुद्धवोत्सृज्य चोदनां प्रतिचोदनाम् ।
प्रवृत्तं च निवृत्तं च श्रोतव्यं श्रुतमेव च ॥१४
मामेकमेव शरणमात्मानं सर्वदेहिनाम् ।
याहि सर्वात्मभावेन मया स्या ह्यकुतोभयः ॥ १५
उद्धव उवाच
संशयः शृण्वतो वाचं तव योगेश्वरेश्वर ।
न निवर्तत आत्मस्थो येन भ्राम्यति मे मनः ॥१६
श्रीभगवानुवाच स एष जीवो विवरप्रसूतिः प्राणेन घोषेण गुहां प्रविष्टः । मनोमयं सूक्ष्ममुपेत्य रूपं मात्रा स्वरो वर्ण इति स्थविष्ठः ॥१७ उद्धवजीने कहा – सनकादि योगेश्वरोंके भी परमेश्वर प्रभो! यों तो मैं आपका उपदेश सुन रहा हूँ, परन्तु इससे मेरे मनका सन्देह मिट नहीं रहा है । मुझे स्वधर्मका पालन करना चाहिये या सब कुछ छोड़कर आपकी शरण ग्रहण करनी चाहिये, मेरा मन इसी दुविधामें लटक रहा है । आप कृपा करके मुझे भली- भाँति समझाइये ॥१६ ॥