श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 131–140

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 131–140

पृष्ठ 131

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नहीं होना चाहिये । ' तब उन्होंने कहा–' अच्छी बात है । पुत्रके बदले तुम्हारा पौत्र वैसा ( घोर प्रकृतिका) होगा । ' समयपर सत्यवतीके गर्भसे जमदग्निका जन्म हुआ ॥ ११ ॥ सत्यवती

समस्त लोकोंको पवित्र करनेवाली परम पुण्यमयी ' कौशिकी' नदी बन गयी । रेणु ऋषिकी कन्या थी रेणुका । जमदग्निने उसका पाणिग्रहण किया ॥१२ ॥ रेणुकाके गर्भसे जमदग्नि

ऋषिके वसुमान् आदि कई पुत्र हुए। उनमें सबसे छोटे परशुरामजी थे । उनका यश सारे संसारमें प्रसिद्ध है ॥१३ ॥ कहते हैं कि हैहयवंशका अन्त करनेके लिये स्वयं भगवान्ने ही

परशुरामके रूपमें अंशावतार ग्रहण किया था । उन्होंने इस पृथ्वीको इक्कीस बार क्षत्रियहीन कर दिया ॥१४ ॥ यद्यपि क्षत्रियोंने उनका थोड़ा- सा ही अपराध किया था – फिर भी वे लोग

बड़े दुष्ट, ब्राह्मणोंके अभक्त, रजोगुणी और विशेष करके तमोगुणी हो रहे थे । यही कारण था कि वे पृथ्वीके भार हो गये थे और इसीके फलस्वरूप भगवान् परशुरामने उनका नाश करके पृथ्वीका भार उतार दिया ॥१५ ॥

राजोवाच

किं तदंहो भगवतो राजन्यैरजितात्मभिः ।

कृतं येन कुलं नष्टं क्षत्रियाणामभीक्ष्णशः ॥१६

श्रीशुक उवाच

हैहयानामधिपतिरर्जुनः क्षत्रियर्षभः ।

दत्तं नारायणस्यांशमाराध्य परिकर्मभिः ॥१७

बाहून् दशशतं लेभे दुर्धर्षत्वमरातिषु ।

अव्याहतेन्द्रियौजः श्रीतेजोवीर्ययशोबलम् ॥ १८

योगेश्वरत्वमैश्वर्यं गुणा यत्राणिमादयः ।

चचाराव्याहतगतिर्लोकेषु पवनो यथा ॥१९

स्त्रीरत्नैरावृतः क्रीडन् रेवाम्भसि मदोत्कटः ।

वैजयन्तीं स्रजं बिभ्रद् रुरोध सरितं भुजैः ॥२०

विप्लावितं स्वशिबिरं प्रतिस्रोतःसरिज्जलैः ।

नामृष्यत् तस्य तद् वीर्यं वीरमानी दशाननः ॥२१

गृहीतो लीलया स्त्रीणां समक्षं कृतकिल्बिषः ।

माहिष्मत्यां संनिरुद्धो मुक्तो येन कपिर्यथा ॥ २२

राजा परीक्षित्ने पूछा- भगवन्! अवश्य ही उस समयके क्षत्रिय विषयलोलुप हो गये ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 132

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थे; परन्तु उन्होंने परशुरामजीका ऐसा कौन- सा अपराध कर दिया, जिसके कारण उन्होंने बार - बार क्षत्रियोंके वंशका संहार किया? ॥१६ ॥

श्रीशुकदेवजी कहने लगे - परीक्षित्! उन दिनों हैहयवंशका अधिपति था अर्जुन । वह एक श्रेष्ठ क्षत्रिय था । उसने अनेकों प्रकारकी सेवा- शुश्रूषा करके भगवान् नारायणके अंशावतार दत्तात्रेयजीको प्रसन्न कर लिया और उनसे एक हजार भुजाएँ तथा कोई भी शत्रु युद्धमें पराजित न कर सके - यह वरदान प्राप्त कर लिया । साथ ही इन्द्रियोंका अबाध बल, अतुल सम्पत्ति, तेजस्विता, वीरता, कीर्ति और शारीरिक बल भी उसने उनकी कृपासे प्राप्त कर लिये थे ॥१७-१८ ॥ वह योगेश्वर हो गया था । उसमें ऐसा ऐश्वर्य था कि वह सूक्ष्म- से- सूक्ष्म, स्थूल- से - स्थूल रूप धारण कर लेता । सभी सिद्धियाँ उसे प्राप्त थीं । वह संसारमें वायुकी तरह सब जगह बेरोक- टोक विचरा करता ॥१९ ॥ एक बार गलेमें वैजयन्ती माला

पहने सहस्रबाहु अर्जुन बहुत - सी सुन्दरी स्त्रियोंके साथ नर्मदा नदीमें जल- विहार कर रहा था । उस समय मदोन्मत्त सहस्रबाहुने अपनी बाँहोंसे नदीका प्रवाह रोक दिया ॥२० ॥ दशमुख

रावणका शिविर भी वहीं कहीं पासमें ही था । नदीकी धारा उलटी बहने लगी, जिससे उसका शिविर डूबने लगा । रावण अपनेको बहुत बड़ा वीर तो मानता ही था, इसलिये सहस्रार्जुनका यह पराक्रम उससे सहन नहीं हुआ ॥ २१ ॥ जब रावण सहस्रबाहु अर्जुनके पास जाकर बुरा-भला कहने लगा, तब उसने स्त्रियोंके सामने ही खेल-खेलमें रावणको पकड़ लिया और

अपनी राजधानी माहिष्मतीमें ले जाकर बंदरके समान कैद कर लिया । पीछे पुलस्त्यजीके कहनेसे सहस्रबाहुने रावणको छोड़ दिया ॥ २२ ॥

स एकदा तु मृगयां विचरन् विपिने ' वने ।

यदृच्छयाऽऽश्रमपदं जमदग्नेरुपाविशत् ॥२३

तस्मै स नरदेवाय मुनिरर्हणमाहरत् ।

ससैन्यामात्यवाहाय हविष्मत्या तपोधनः ॥ २४

स वीरस्तत्र तद् दृष्ट्वा आत्मैश्वर्यातिशायनम् ।

तन्नाद्रियताग्निहोत्र्यां साभिलाषः स हैहयः ॥२५

हविर्धानीमृषेर्दर्पान्नरान् हर्तुमचोदयत् ।

ते च माहिष्मतीं निन्युः सवत्सां क्रन्दतीं बलात् ॥२६

अथ राजनि निर्याते राम आश्रम आगतः ।

श्रुत्वा तत् तस्य दौरात्म्यं चुक्रोधाहिरिवाहतः ॥२७

घोरमादाय ४ परशुं सतूणं चर्म कार्मुकम् । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 133

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अन्वधावत दुर्धर्षो ' मृगेन्द्र इव यूथपम् ॥२८ तमापतन्तं भृगुवर्यमोजसा

धनुर्धरं बाणपरश्वधायुधम् ।

ऐणेयचर्माम्बरमर्कधामभि- तं जटाभिर्ददृशे पुरीं विशन् ॥ २ ९

अचोदयद्धस्तिरथाश्वपत्तिभि- र्गदासिबाणर्ष्टिशतघ्निशक्तिभिः ।

अक्षौहिणीः सप्तदशातिभीषणा- स्ता राम एको भगवानसूदयत् ॥३०

एक दिन सहस्रबाहु अर्जुन शिकार खेलनेके लिये बड़े घोर जंगलमें निकल गया था । दैववश वह जमदग्नि मुनिके आश्रमपर जा पहुँचा || २३ || परम तपस्वी जमदग्नि मुनिके आश्रममें कामधेनु रहती थी । उसके प्रतापसे उन्होंने सेना, मन्त्री और वाहनोंके साथ हैहयाधिपतिका खूब स्वागत- सत्कार किया || २४ || वीर हैहयाधिपतिने देखा कि जमदग्नि मुनिका ऐश्वर्य तो मुझसे भी बढ़ा -चढ़ा है । इसलिये उसने उनके स्वागत- सत्कारको कुछ भी आदर न देकर कामधेनुको ही ले लेना चाहा ॥ २५ ॥

उसने अभिमानवश जमदग्नि मुनिसे माँगा भी नहीं, अपने सेवकोंको आज्ञा दी कि कामधेनुको छीन ले चलो । उसकी आज्ञासे उसके सेवक बछड़ेके साथ ' बाँ- बाँ ' डकराती हुई कामधेनुको बलपूर्वक माहिष्मतीपुरी ले गये || २६ || जब वे सब चले गये, तब परशुरामजी आश्रमपर आये और उसकी दुष्टताका वृत्तान्त सुनकर चोट खाये हुए साँपकी तरह क्रोधसे तिलमिला उठे ॥२७ ॥ वे अपना भयंकर फरसा, तरकस, ढाल एवं धनुष लेकर बड़े वेगसे

उसके पीछे दौड़े — जैसे कोई किसीसे न दबनेवाला सिंह हाथीपर टूट पड़े ॥ २८ ॥

सहस्रबाहु अर्जुन अभी अपने नगरमें प्रवेश कर ही रहा था कि उसने देखा परशुरामजी महाराज बड़े वेगसे उसीकी ओर झपटे आ रहे हैं । उनकी बड़ी विलक्षण झाँकी थी । वे हाथमें धनुष - बाण और फरसा लिये हुए थे, शरीरपर काला मृगचर्म धारण किये हुए थे और उनकी जटाएँ सूर्यकी किरणोंके समान चमक रही थीं ॥२९ ॥

उन्हें देखते ही उसने गदा, खड्ग, बाण, ऋष्टि, शतघ्नी और शक्ति आदि आयुधोंसे सुसज्जित एवं हाथी, घोड़े, रथ तथा पदातियोंसे युक्त अत्यन्त भयंकर सत्रह अक्षौहिणी सेना भेजी । भगवान् परशुरामने बात की-बातमें अकेले ही उस सारी सेनाको नष्ट कर दिया ॥ ३० ॥

यतो यतोऽसौ प्रहरत्परश्वधो मनोऽनिलौजाः परचक्रसूदनः । ततस्ततश्छिन्नभुजोरुकन्धरा ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 134

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निपेतुरुर्व्यां हतसूतवाहनाः ॥ ३१ दृष्ट्वा स्वसैन्यं रुधिरौघकर्दमे रणाजिरे रामकुठारसायकैः । विवृक्णचर्मध्वजचापविग्रहं निपातितं हैहय आपतद् रुषा ॥३२

अथार्जुनः पंचशतेषु बाहुभि- र्धनुःषु बाणान् युगपत् स सन्दधे ।

रामाय रामोऽस्त्रभृतां समग्रणी- स्तान्येकधन्वेषुभिराच्छिनत् समम् ॥३३

पुनः स्वहस्तैरचलान् मृधेऽङ्घ्रिपा- नुत्क्षिप्य वेगादभिधावतो युधि । भुजान् कुठारेण कठोरनेमिना चिच्छेद रामः प्रसभं त्वहेरिव ॥३४

कृत्तबाहोः शिरस्तस्य गिरेः शृंगमिवाहरत् ।

हते पितरि तत्पुत्रा अयुतं दुद्रुवुर्भयात् ॥३५

अग्निहोत्रीमुपावर्त्य सवत्सां परवीरहा ।

समुपेत्याश्रमं पित्रे परिक्लिष्टां समर्पयत् ॥ ३६

स्वकर्म तत्कृतं रामः पित्रे भ्रातृभ्य एव च ।

वर्णयामास तच्छ्रुत्वा जमदग्निरभाषत ॥३७

राम राम महाबाहो भवान् पापमकारषीत् ।

अवधीन्नरदेवं यत् सर्वदेवमयं वृथा ॥३८

वयं हि ब्राह्मणास्तात क्षमयार्हणतां गताः ।

यया लोकगुरुर्देवः पारमेष्ठ्यमगात् पदम् ॥३९

भगवान् परशुरामजीकी गति मन और वायुके समान थी । बस, वे शत्रुकी सेना काटते ही जा रहे थे । जहाँ-जहाँ वे अपने फरसेका प्रहार करते, वहाँ- वहाँ सारथि और वाहनोंके साथ बड़े - बड़े वीरोंकी बाँहें, जाँघें और कंधे कट- कटकर पृथ्वीपर गिरते जाते थे ॥३१ ॥

हैहयाधिपति अर्जुनने देखा कि मेरी सेनाके सैनिक, उनके धनुष, ध्वजाएँ और ढाल ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 135

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भगवान् परशुरामके फरसे और बाणोंसे कट- कटकर खूनसे लथपथ रणभूमिमें गिर गये हैं, तब उसे बड़ा क्रोध आया और वह स्वयं भिड़नेके लिये आ धमका ॥ ३२ ॥ उसने एक साथ

ही अपनी हजार भुजाओंसे पाँच सौ धनुषोंपर बाण चढ़ाये और परशुरामजीपर छोड़े । परन्तु परशुरामजी तो समस्त शस्त्रधारियोंके शिरोमणि ठहरे । उन्होंने अपने एक धनुषपर छोड़े हुए बाणोंसे ही एक साथ सबको काट डाला ॥३३ ॥ अब हैहयाधिपति अपने हाथोंसे पहाड़ और

पेड़ उखाड़कर बड़े वेगसे युद्धभूमिमें परशुरामजीकी ओर झपटा । परन्तु परशुरामजीने अपनी तीखी धारवाले फरसेसे बड़ी फुर्तीके साथ उसकी साँपोंके समान भुजाओंको काट डाला ॥३४ ॥ जब उसकी बाँहें कट गयीं, तब उन्होंने पहाड़की चोटीकी तरह उसका ऊँचा

सिर धड़से अलग कर दिया । पिताके मर जानेपर उसके दस हजार लड़के डरकर भग गये ॥३५ ॥

परीक्षित्! विपक्षी वीरोंके नाशक परशुरामजीने बछड़ेके साथ कामधेनु लौटा ली । वह बहुत ही दुःखी हो रही थी। उन्होंने उसे अपने आश्रमपर लाकर पिताजीको सौंप दिया ॥३६ ॥ और माहिष्मतीमें सहस्रबाहुने तथा उन्होंने जो कुछ किया था, सब अपने

पिताजी तथा भाइयोंको कह सुनाया । सब कुछ सुनकर जमदग्नि मुनिने कहा— ॥३७ ॥

‘हाय, हाय, परशुराम! तुमने बड़ा पाप किया । राम, राम! तुम बड़े वीर हो; परन्तु सर्वदेवमय नरदेवका तुमने व्यर्थ ही वध किया || ३८ || बेटा! हमलोग ब्राह्मण हैं । क्षमाके प्रभावसे ही हम संसारमें पूजनीय हुए हैं । और तो क्या, सबके दादा ब्रह्माजी भी क्षमाके बलसे ही ब्रह्मपदको प्राप्त हुए हैं ॥३९ ॥

क्षमया रोचते लक्ष्मीर्ब्राह्मी सौरी यथा प्रभा ।

क्षमिणामाशु भगवांस्तुष्यते हरिरीश्वरः ॥ ४०

राज्ञो मूर्धाभिषिक्तस्य वधो ब्रह्मवधाद् गुरुः ।

तीर्थसंसेवया चांहो जह्यंगाच्युतचेतनः ॥ ४१

ब्राह्मणोंकी शोभा क्षमाके द्वारा ही सूर्यकी प्रभाके समान चमक उठती है । सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीहरि भी क्षमावानोंपर ही शीघ्र प्रसन्न होते हैं ॥४० ॥

बेटा! सार्वभौम राजाका वध ब्राह्मणकी हत्यासे भी बढ़कर है । जाओ, भगवान्का स्मरण करते हुए तीर्थोंका सेवन करके अपने पापोंको धो डालो' ॥४१ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां नवमस्कन्धे पञ्चदशोऽध्यायः ॥१५ ॥

२. बादरायणिरुवाच । ३. शाम्बुर्मूर्तरयो । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 136

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१. सा चरुं । २. तु सा य ० । ३. मुपाहरत् । १. बादरायणिरुवाच । २. शोऽतुलम् । १. विजने । २. स चैश्वर्यं तु त० । ३. स तस्य। ४. परशुं घोरमादाय स क्षणाद्वर्मकार्मुकम्। ५. दुर्मर्षो । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 137

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अथ षोडशोऽध्यायः परशुरामजीके द्वारा क्षत्रियसंहार और विश्वामित्रजीके वंशकी कथा श्रीशुक उवाच

पित्रोपशिक्षितो रामस्तथेति कुरुनन्दन ।

संवत्सरं तीर्थयात्रां चरित्वाऽऽश्रममाव्रजत् ॥१

कदाचिद् रेणुका याता गंगायां पद्ममालिनम् ।

गन्धर्वराजं क्रीडन्तमप्सरोभिरपश्यत ॥२

विलोकयन्ती क्रीडन्तमुदकार्थं नदीं गता ।

होमवेलां न सस्मार किंचिच्चित्ररथस्पृहा ॥३

कालात्ययं तं विलोक्य मुनेः शापविशंकिता ।

आगत्य कलशं तस्थौ पुरोधाय कृतांजलिः ॥४

व्यभिचारं मुनिर्ज्ञात्वा पत्न्याः प्रकुपितोऽब्रवीत् ।

घ्नतैनां पुत्रकाः पापामित्युक्तास्ते न चक्रिरे ॥५

रामः संचोदितः पित्रा भ्रातॄन् मात्रा सहावधीत् ।

प्रभावज्ञो मुनेः सम्यक् समाधेस्तपसश्च' सः ॥६

श्रीशुकदेवजी कहते हैं- परीक्षित्! अपने पिताकी यह शिक्षा भगवान् परशुरामने ' जो आज्ञा ' कहकर स्वीकार की । इसके बाद वे एक वर्षतक तीर्थयात्रा करके अपने आश्रमपर लौट आये ॥१ ॥ एक दिनकी बात है, परशुरामजीकी माता रेणुका गंगातटपर गयी हुई थीं ।

वहाँ उन्होंने देखा कि गन्धर्वराज चित्ररथ कमलोंकी माला पहने अप्सराओंके साथ विहार कर रहा है ॥२ ॥ वे जल लानेके लिये नदीतटपर गयी थीं, परन्तु वहाँ जलक्रीडा करते हुए

गन्धर्वको देखने लगीं और पतिदेवके हवनका समय हो गया है - इस बातको भूल गयीं । उनका मन कुछ - कुछ चित्ररथकी ओर खिंच भी गया था || ३ || हवनका समय बीत गया, यह जानकर वे महर्षि जमदग्निके शापसे भयभीत हो गयीं और तुरंत वहाँसे आश्रमपर चली आयीं । वहाँ जलका कलश महर्षिके सामने रखकर हाथ जोड़ खड़ी हो गयीं ॥ ४ ॥ जमदग्नि

मुनिने अपनी पत्नीका मानसिक व्यभिचार जान लिया और क्रोध करके कहा — ‘ मेरे पुत्रो! इस पापिनीको मार डालो । ' परन्तु उनके किसी भी पुत्रने उनकी वह आज्ञा स्वीकार नहीं की ॥५ ॥ इसके बाद पिताकी आज्ञासे परशुरामजीने माताके साथ सब भाइयोंको भी मार

डाला । इसका कारण था । वे अपने पिताजीके योग और तपस्याका प्रभाव भलीभाँति जानते ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 138

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थे ॥६ ॥

वरेणच्छन्दयामास प्रीतः सत्यवतीसुतः ।

वव्रे हतानां रामोऽपि जीवितं चास्मृतिं वधे ॥७

उत्तस्थुस्ते कुशलिनो निद्रापाय इवांजसा ।

पितुर्विद्वांस्तपोवीर्यं रामश्चक्रे सुहृद्वधम् ॥८

येऽर्जुनस्य सुता राजन् स्मरन्तः स्वपितुर्वधम् ।

रामवीर्यपराभूता लेभिरे शर्म न क्वचित् ॥९

एकदाऽऽश्रमतो रामे सभ्रातरि वनं गते ।

वैरं सिसाधयिषवो लब्धच्छिद्रा उपागमन् ॥१०

दृष्ट्वाग्न्यगार आसीनमावेशितधियं मुनिम् ।

भगवत्युत्तमश्लोके जघ्नुस्ते पापनिश्चयाः ॥ ११

याच्यमानाः कृपणया राममात्रातिदारुणाः ।

प्रसह्य शिर उत्कृत्य निन्युस्ते क्षत्रबन्धवः ॥१२

रेणुका दुःखशोकार्ता निघ्नन्त्यात्मानमात्मना ।

राम रामेहि तातेति विचुक्रोशोच्चकैः सती ॥१३

तदुपश्रुत्य दूरस्थो हा रामेत्यार्तवत्स्वनम् ।

त्वरयाऽऽश्रममासाद्य ददृशे पितरं हतम् ॥१४

तद् दुःखरोषामर्षार्तिशोकवेगविमोहितः ।

हा तात साधो धर्मिष्ठ त्यक्त्वास्मान् स्वर्गतो भवान् ॥१५

परशुरामजीके इस कामसे सत्यवतीनन्दन महर्षि जमदग्नि बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने कहा — ' बेटा! तुम्हारी जो इच्छा हो, वर माँग लो। ' परशुरामजीने कहा - ' पिताजी! मेरी माता और सब भाई जीवित हो जायँ तथा उन्हें इस बातकी याद न रहे कि मैंने उन्हें मारा था ' || ७ || परशुरामजीके इस प्रकार कहते ही जैसे कोई सोकर उठे, सब- के - सब अनायास ही सकुशल उठ बैठे । परशुरामजीने अपने पिताजीका तपोबल जानकर ही तो अपने सुहृदोंका वध किया था ॥८ ॥

परीक्षित्! सहस्रबाहु अर्जुनके जो लड़के परशुरामजी से हारकर भाग गये थे, उन्हें अपने ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 139

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पिताके वधकी याद निरन्तर बनी रहती थी । कहीं एक क्षणके लिये भी उन्हें चैन नहीं मिलता था ॥९ ॥ एक दिनकी बात है, परशुरामजी अपने भाइयोंके साथ आश्रमसे बाहर वनकी ओर

गयेहुए थे । यह अवसर पाकर वैर साधनेके लिये सहस्रबाहुके लड़के वहाँ आ पहुँचे ॥१० ॥

उस समय महर्षि जमदग्नि अग्निशालामें बैठे हुए थे और अपनी समस्त वृत्तियोंसे पवित्रकीर्ति भगवानुके ही चिन्तनमें मग्न हो रहे थे । उन्हें बाहरकी कोई सुध न थी । उसी समय उन पापियोंने जमदग्नि ऋषिको मार डाला । उन्होंने पहलेसे ही ऐसा पापपूर्ण निश्चय कर रखा था ॥११ ॥ परशुरामकी माता रेणुका बड़ी दीनतासे उनसे प्रार्थना कर रही थीं, परन्तु उन

सबोंने उनकी एक न सुनी । वे बलपूर्वक महर्षि जमदग्निका सिर काटकर ले गये । परीक्षित्! वास्तवमें वे नीच क्षत्रिय अत्यन्त क्रूर थे || १२ || सती रेणुका दुःख और शोकसे आतुर हो गयीं । वे अपने हाथों अपनी छाती और सिर पीट - पीटकर जोर- जोर से रोने लगीं- ' परशुराम! बेटा परशुराम! शीघ्र आओ' ॥ १३ ॥ परशुरामजीने बहुत दूरसे माताका ‘ हा राम! ' यह

करुण- क्रन्दन सुन लिया । वे बड़ी शीघ्रतासे आश्रमपर आये और वहाँ आकर देखा कि पिताजी मार डाले गये हैं ॥१४ ॥ परीक्षित्! उस समय परशुरामजीको बड़ा दुःख हुआ । साथ

ही क्रोध, असहिष्णुता, मानसिक पीड़ा और शोकके वेगसे वे अत्यन्त मोहित हो गये । 'हाय पिताजी! आप तो बड़े महात्मा थे । पिताजी! आप तो धर्मके सच्चे पुजारी थे । आप हमलोगोंको छोड़कर स्वर्ग चले गये ' || १५ || इस प्रकार विलापकर उन्होंने पिताका शरीर तो भाइयोंको सौंप दिया और स्वयं हाथमें फरसा उठाकर क्षत्रियोंका संहार कर डालनेका निश्चय किया ॥१६ ॥

विलप्यैवं पितुर्देहं निधाय भ्रातृषु स्वयम् ।

प्रगृह्य परशुं रामः क्षत्रान्ताय मनो दधे ॥१६

गत्वा माहिष्मती रामो ब्रह्मघ्नविहतश्रियम् ।

तेषां स शीर्षभी राजन् मध्ये चक्रे महागिरिम् ॥१७

तद्रक्तेन नदीं घोरामब्रह्मण्यभयावहाम् ।

हेतुं कृत्वा पितृवधं क्षत्रेऽमंगलकारिणि ॥१८

त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवीं कृत्वा निःक्षत्रियां प्रभुः ।

समन्तपंचके चक्रे शोणितोदान् ह्रदान् नृप ॥१९

पितुः कायेन सन्धाय शिर आदाय बर्हिषि ।

सर्वदेवमयं देवमात्मानमयजन्मखैः ॥२०

ददौ प्राचीं दिशं होत्रे ब्रह्मणे दक्षिणां दिशम् । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 140

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अध्वर्यवे प्रतीचीं वै उद्गात्रे उत्तरां दिशम् ॥२१

अन्येभ्योऽवान्तरदिशः कश्यपाय च मध्यतः ।

आर्यावर्तमुपद्रष्ट्रे सदस्येभ्यस्ततः परम् ॥२२

ततश्चावभृथस्नानविधूताशेषकिल्बिषः ।

सरस्वत्यां ब्रह्मनद्यां रेजे व्यभ्र इवांशुमान् ॥२३

स्वदेहं जमदग्निस्तु लब्ध्वा संज्ञानलक्षणम् ।

ऋषीणां मण्डले सोऽभूत् सप्तमो रामपूजितः ॥२४

जामदग्न्योऽपि भगवान् रामः कमललोचनः ।

आगामिन्यन्तरे राजन् वर्तयिष्यति वै बृहत् ॥२५

आस्तेऽद्यापि महेन्द्राद्रौ न्यस्तदण्डः प्रशान्तधीः ।

उपगीयमानचरितः सिद्धगन्धर्वचारणैः ॥२६

परीक्षित्! परशुरामजीने माहिष्मती नगरीमें जाकर सहस्रबाहु अर्जुनके पुत्रोंके सिरोंसे नगरके बीचो - बीच एक बड़ा भारी पर्वत खड़ा कर दिया । उस नगरकी शोभा तो उन ब्रह्मघाती नीच क्षत्रियोंके कारण ही नष्ट हो चुकी थी ॥१७ ॥ उनके रक्तसे एक बड़ी भयंकर नदी बह

निकली, जिसे देखकर ब्राह्मणद्रोहियोंका हृदय भयसे काँप उठता था । भगवान्ने देखा कि वर्तमान क्षत्रिय अत्याचारी हो गये हैं । इसलिये राजन्! उन्होंने अपने पिताके वधको निमित्त बनाकर इक्कीस बार पृथ्वीको क्षत्रियहीन कर दिया और कुरुक्षेत्रके समन्तपंचकमें ऐसे - ऐसे पाँच तालाब बना दिये, जो रक्तके जलसे भरे हुए थे ॥१८-१९ ॥ परशुरामजीने अपने पिताजीका सिर लाकर उनके धड़से जोड़ दिया और यज्ञोंद्वारा सर्वदेवमय आत्मस्वरूप भगवान्का यजन किया ॥ २० ॥ यज्ञोंमें उन्होंने पूर्व दिशा होताको, दक्षिण दिशा ब्रह्माको,

पश्चिम दिशा अध्वर्युको और उत्तर दिशा सामगान करनेवाले उद्गाताको दे दी ॥२१ ॥ इसी

प्रकार अग्निकोण आदि विदिशाएँ ऋत्विजोंको दीं, कश्यपजीको मध्यभूमि दी, उपद्रष्टाको आर्यावर्त दिया तथा दूसरे सदस्योंको अन्यान्य दिशाएँ प्रदान कर दीं ॥२२ ॥ इसके बाद

यज्ञान्त - स्नान करके वे समस्त पापोंसे मुक्त हो गये और ब्रह्मनदी सरस्वतीके तटपर मेघरहित सूर्यके समान शोभायमान हुए || २३ || महर्षि जमदग्निको स्मृतिरूप संकल्पमय शरीरकी प्राप्ति हो गयी । परशुरामजीसे सम्मानित होकर वे सप्तर्षियोंके मण्डलमें सातवें ऋषि हो गये ॥२४ ॥ परीक्षित्! कमललोचन जमदग्निनन्दन भगवान् परशुराम आगामी मन्वन्तरमें

सप्तर्षियोंके मण्डलमें रहकर वेदोंका विस्तार करेंगे || २५ || वे आज भी किसीको किसी प्रकारका दण्ड न देते हुए शान्त चित्तसे महेन्द्र पर्वतपर निवास करते हैं । वहाँ सिद्ध, गन्धर्व और चारण उनके चरित्रका मधुर स्वरसे गान करते रहते हैं || २६ || सर्वशक्तिमान् विश्वात्मा ****** ebook converter DEMO Watermarks *******