श्रीगणेशाय नमः।

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 141–150

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 141–150

पृष्ठ 141

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भगवान् श्रीहरिने इस प्रकार भृगुवंशियोंमें अवतार ग्रहण करके पृथ्वीके भारभूत राजाओंका बहुत बार वध किया ॥२७ ॥

एवं भृगुषु विश्वात्मा भगवान् हरिरीश्वरः ।

अवतीर्य परं भारं भुवोऽहन् बहुशो नृपान् ॥२७

गाधेरभून्महातेजाः समिद्ध इव पावकः ।

तपसा क्षात्रमुत्सृज्य यो लेभे ब्रह्मवर्चसम् ॥२८

विश्वामित्रस्य चैवासन् पुत्रा एकशतं नृप ।

मध्यमस्तु मधुच्छन्दा मधुच्छन्दस एव ते ॥२९

पुत्रं कृत्वा शुनःशेपं देवरातं च भार्गवम् ।

आजीगर्तं सुतानाह ज्येष्ठ एष प्रकल्प्यताम् ॥३०

यो वै हरिश्चन्द्रमखे विक्रीतः पुरुषः पशुः ।

स्तुत्वा देवान् प्रजेशादीन् मुमुचे पाशबन्धनात् ॥३१

यो रातो देवयजने देवैर्गाधिषु तापसः ।

देवरात इति ख्यातः शुनःशेपः स भार्गवः ॥ ३२

ये मधुच्छन्दसो ज्येष्ठाः कुशलं मेनिरे न तत् ।

अशपत् तान्मुनिः क्रुद्धो म्लेच्छा भवत दुर्जनाः ॥३३

स होवाच मधुच्छन्दाः सार्धं पंचाशताः ततः ।

यन्नो भवान् संजानीते तस्मिंस्तिष्ठामहे वयम् ॥३४

ज्येष्ठं मन्त्रदृशं चक्रुस्त्वामन्वञ्चो वयं स्म हि ।

विश्वामित्रः१ सुतानाह वीरवन्तो भविष्यथ ।

ये मानं मेऽनुगृह्णन्तो वीरवन्तमकर्त माम् ॥३५

महाराज गाधिके पुत्र हुए प्रज्वलित अग्निके समान परम तेजस्वी विश्वामित्रजी । इन्होंने अपने तपोबलसे क्षत्रियत्वका त्याग करके ब्रह्मतेज प्राप्त कर लिया || २८ || परीक्षित्! विश्वामित्रजीके सौ पुत्र थे । उनमें बिचले पुत्रका नाम था मधुच्छन्दा । इसलिये सभी पुत्र ' मधुच्छन्दा' के ही नामसे विख्यात हुए || २ ९ || विश्वामित्रजीने भृगुवंशी अजीगर्तके पुत्र अपने भानजे शुनःशेपको, जिसका एक नाम देवरात भी था, पुत्ररूपमें स्वीकार कर लिया और

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अपने पुत्रोंसे कहा कि ' तुमलोग इसे अपना बड़ा भाई मानो' || ३० || यह वही प्रसिद्ध भृगुवंशी शुनःशेप था, जो हरिश्चन्द्रके यज्ञमें यज्ञपशुके रूपमें मोल लेकर लाया गया था । विश्वामित्रजीने प्रजापति वरुण आदि देवताओंकी स्तुति करके उसे पाशबन्धनसे छुड़ा लिया था। देवताओंके यज्ञमें यही शुनःशेप देवताओंद्वारा विश्वामित्रजीको दिया गया था; अत: ‘ देवैः रातः ' इस व्युत्पत्तिके अनुसार गाधिवंशमें यह तपस्वी देवरातके नामसे विख्यात हुआ ॥३१-३२ ॥ विश्वामित्रजीके पुत्रोंमें जो बड़े थे, उन्हें शुनःशेपको बड़ा भाई माननेकी बात अच्छी न लगी । इसपर विश्वामित्रजीने क्रोधित होकर उन्हें शाप दे दिया कि ‘ दुष्टो! तुम सब म्लेच्छ हो जाओ ' ॥३३ ॥ इस प्रकार जब उनचास भाई म्लेच्छ हो गये तब विश्वामित्रजीके

बिचले पुत्र मधुच्छन्दाने अपनेसे छोटे पचासों भाइयोंके साथ कहा — ' पिताजी! आप हमलोगोंको जो आज्ञा करते हैं, हम उसका पालन करनेके लिये तैयार हैं ' ॥३४ ॥ यह

कहकर मधुच्छन्दाने मन्त्रद्रष्टा शुनःशेपको बड़ा भाई स्वीकार कर लिया और कहा कि ' हम सब तुम्हारे अनुयायी — छोटे भाई हैं । ' तब विश्वामित्रजीने अपने इन आज्ञाकारी पुत्रोंसे कहा - 'तुम लोगोंने मेरी बात मानकर मेरे सम्मानकी रक्षा की है, इसलिये तुमलोगों- जैसे सुपुत्र प्राप्त करके मैं धन्य हुआ । मैं तुम्हें आशीर्वाद देता हूँ कि तुम्हें भी सुपुत्र प्राप्त होंगे ॥३५ ॥ मेरे

प्यारे पुत्रो! यह देवरात शुनःशेप भी तुम्हारे ही गोत्रका है । तुमलोग इसकी आज्ञामें रहना । ’ परीक्षित्! विश्वामित्रजीके अष्टक, हारीत, जय और क्रतुमान् आदि और भी पुत्र थे ॥३६ ॥

इस प्रकार विश्वामित्रजीकी सन्तानोंसे कौशिकगोत्रमें कई भेद हो गये और देवरातको बड़ा भाई माननेके कारण उसका प्रवर ही दूसरा हो गया ॥ ३७ ॥

एष वः कुशिका वीरो देवरातस्तमन्वित ।

अन्ये चाष्टकहारीतजयक्रतुमदादयः ॥ ३६

एवं कौशिकगोत्रं तु विश्वामित्रैः पृथग्विधम् ।

प्रवरान्तरमापन्नं तद्धि चैवं प्रकल्पितम् ॥३७

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां नवमस्कन्धे षोडशोऽध्यायः ॥१६ ॥

१. सः सुतः । १. त्रस्तु ताना० । २. वीरभावकसत्तमाः ।

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अथ सप्तदशोऽध्यायः क्षत्रवृद्ध, रजि आदि राजाओंके वंशका वर्णन श्रीशुक उवाच

यः पुरूरवसः पुत्र आयुस्तस्याभवन् सुताः ।

नहुषः क्षत्रवृद्धश्च रजी रम्भश्च वीर्यवान् ॥१

अनेना इति राजेन्द्र शृणु क्षत्रवृधोऽन्वयम् ।

क्षत्रवृद्धसुतस्यासन् सुहोत्रस्यात्मजास्त्रयः ॥२

काश्यः कुशो गृत्समद इति गृत्समदादभूत् ।

शुनकः शौनको यस्य बहृचप्रवरो मुनिः ॥३

काश्यस्य काशिस्तत्पुत्रो राष्ट्रो दीर्घतमः पिता ।

धन्वन्तरिर्देर्घतम आयुर्वेदप्रवर्तकः ॥ ४

यज्ञभुग् वासुदेवांशः स्मृतमात्रार्तिनाशनः ।

तत्पुत्रः केतुमानस्य जज्ञे भीमरथस्ततः ॥५

दिवोदासो द्युमांस्तस्मात् प्रतर्दन इति स्मृतः ।

स एव शत्रुजिद् वत्स ऋतध्वज इतीरितः ।

तथा कुवलयाश्वेति प्रोक्तोऽलर्कादयस्ततः ॥६

षष्टिवर्षसहस्राणि षष्टिवर्षशतानि च ।

नालर्कादपरो राजन्” मेदिनीं बुभुजे युवा ॥७

अलर्कात् सन्ततिस्तस्मात् सुनीथोऽथ सुकेतनः २ ।

धर्मकेतुः सुतस्तस्मात् सत्यकेतुरजायत ॥८

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! राजेन्द्र पुरूरवाका एक पुत्र था आयु । उसके पाँच लड़के हुए — नहुष, क्षत्रवृद्ध, रजि, शक्तिशाली रम्भ और अनेना । अब क्षत्रवृद्धका वंश सुनो । क्षत्रवृद्धके पुत्र थे सुहोत्र। सुहोत्रके तीन पुत्र हुए- काश्य, कुश और गृत्समद । गृत्समदका पुत्र हुआ शुनक । इसी शुनकके पुत्र ऋग्वेदियोंमें श्रेष्ठ मुनिवर शौनकजी हुए ॥१-३ ॥ काश्यका पुत्र काशि, काशिका राष्ट्र, राष्ट्रका दीर्घतमा और दीर्घतमाके धन्वन्तरि । यही आयुर्वेदके प्रवर्तक हैं ॥४ ॥ ये यज्ञभागके भोक्ता और भगवान् वासुदेवके अंश हैं । इनके

स्मरणमात्रसे ही सब प्रकारके रोग दूर हो जाते हैं। धन्वन्तरिका पुत्र हुआ केतुमान् और केतुमान्का भीमरथ ॥ ५ ॥

भीमरथका दिवोदास और दिवोदासका घुमान्—जिसका एक नाम प्रतर्दन भी है । यही द्युमान् शत्रुजित्, वत्स, ऋतध्वज और कुवलयाश्वकै नामसे भी प्रसिद्ध है । द्युमान्के ही पुत्र

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अलर्क आदि हुए ॥६ ॥ परीक्षित्! अलर्कके सिवा और किसी राजाने छाछठ हजार

( ६६,००० ) वर्षतक युवा रहकर पृथ्वीका राज्य नहीं भोगा || ७ || अलर्कका पुत्र हुआ सन्तति, सन्ततिका सुनीथ, सुनीथका सुकेतन, सुकेतनका धर्मकेतु और धर्मकेतुका सत्यकेतु ॥८ ॥

धृष्टकेतुः सुतस्तस्मात् सुकुमारः क्षितीश्वरः ।

वीतिहोत्रस्य भर्गोऽतो भार्गभूमिरभून्नृपः ॥ ९

इतीमे काशयो भूपाः क्षत्रवृद्धान्वयायिनः ।

रम्भस्य' रभसः पुत्रो गम्भीरश्चाक्रियस्ततः २ ॥१०

तस्य क्षेत्रे ब्रह्म जज्ञे शृणु वंशमनेनसः ।

शुद्धस्ततः शुचिस्तस्मात् त्रिककुद् धर्मसारथिः ॥११

ततः शान्तरयो जज्ञे कृतकृत्यः स आत्मवान् ।

रजेः पंचशतान्यासन् पुत्राणाममितौजसाम् ॥१२

देवैरभ्यर्थितो दैत्यान् हत्वेन्द्रायाददाद् दिवम् ।

इन्द्रस्तस्मै पुनर्दत्त्वा गृहीत्वा चरणौ रजेः ॥ १३

आत्मानमर्पयामास प्रह्रादाद्यरिशंकितः ४ ।

पितर्युपरते पुत्रा याचमानाय नो ददुः ॥१४

त्रिविष्टपं महेन्द्राय यज्ञभागान् समाददुः ।

गुरुणा हूयमानेऽग्नौ बलभित् तनयान् रजेः ॥१५

अवधीद् भ्रंशितान् मार्गान्न कश्चिदवशेषितः ।

कुशात् प्रतिः क्षात्रवृद्धात् संजयस्तत्सुतो जयः ॥१६

ततः कृतः कृतस्यापि जज्ञे हर्यवनो नृपः ।

सहदेवस्ततो हीनो जयसेनस्तु तत्सुतः ॥१७

संकृतिस्तस्य च ' जयः क्षत्रधर्मा महारथः ।

क्षत्रवृद्धान्वया भूपाः शृणु वंशं च नाहुषात् ॥१८

सत्यकेतु धृष्टकेतु, धृष्टकेतुसे राजा सुकुमार, सुकुमारसे वीतिहोत्र, वीतिहोत्रसे भर्ग और भर्गसे राजा भार्गभूमिका जन्म हुआ ॥९ ॥

ये सब- के - सब क्षत्रवृद्धके वंशमें काशिसे उत्पन्न नरपति हुए । रम्भके पुत्रका नाम था रभस, उससे गम्भीर और गम्भीरसे अक्रियका जन्म हुआ ॥१० ॥ अक्रियकी पत्नीसे

ब्राह्मणवंश चला । अब अनेनाका वंश सुनो । अनेनाका पुत्र था शुद्ध, शुद्धका शुचि, शुचिका त्रिककुद् और त्रिककुद्का धर्मसारथि ॥११ ॥ धर्मसारथिके पुत्र थे शान्तरय । शान्तरय

आत्मज्ञानी होनेके कारण कृतकृत्य थे, उन्हें सन्तानकी आवश्यकता न थी । परीक्षित्! आयुके पुत्र रजिके अत्यन्त तेजस्वी पाँच सौ पुत्र थे ॥१२ ॥

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देवताओंकी प्रार्थनासे रजिने दैत्योंका वध करके इन्द्रको स्वर्गका राज्य दिया । परन्तु वे अपने प्रह्लाद आदि शत्रुओंसे भयभीत रहते थे, इसलिये उन्होंने वह स्वर्ग फिर रजिको लौटा दिया और उनके चरण पकड़कर उन्हींको अपनी रक्षाका भार भी सौंप दिया । जब रजिकी मृत्यु हो गयी, तब इन्द्रके माँगनेपर भी रजिके पुत्रोंने स्वर्ग नहीं लौटाया । वे स्वयं ही यज्ञोंका भाग भी ग्रहण करने लगे । तब गुरु बृहस्पतिजीने इन्द्रकी प्रार्थनासे अभिचारविधिसे हवन किया । इससे वे धर्मके मार्गसे भ्रष्ट हो गये । तब इन्द्रने अनायास ही उन सब रजिके पुत्रोंको मार डाला । उनमेंसे कोई भी न बचा । क्षत्रवृद्धके पौत्र कुशसे प्रति, प्रतिसे संजय और संजयसे जयका जन्म हुआ ॥१३-१६ ॥ जयसे कृत, कृतसे राजा हर्यवन, हर्यवनसे सहदेव, सहदेवसे हीन और हीनसे जयसेन नामक पुत्र हुआ || १७ || जयसेनका संकृति, संकृतिका पुत्र हुआ महारथी वीरशिरोमणि जय । क्षत्रवृद्धकी वंश- परम्परामें इतने ही नरपति हुए । अब नहुषवंशका वर्णन सुनो ॥१८ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां नवमस्कन्धे चन्द्रवंशानुवर्णने सप्तदशोऽध्यायः ॥१७ ॥

१. राजा । २. सुतोत्तमः । १. नाभस्य । २. श्चक्रकस्ततः । ३. शुद्धः शुचिस्ततस्तस्मा ० । ४. द्यवि० । ५. तनयः ।

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अथाष्टादशोऽध्यायः ययाति - चरित्र श्रीशुक उवाच

यतिर्ययातिः संयातिरायतिर्वियतिः कृतिः ।

षडिमे नहुषस्यासन्निन्द्रियाणीव देहिनः ॥ १

राज्यं नैच्छद् यतिः पित्रा दत्तं तत्परिणामवित् ।

यत्र प्रविष्टः पुरुष आत्मानं नावबुध्यते ॥२

पितरि भ्रंशिते स्थानादिन्द्राण्या धर्षणाद् द्विजैः ।

प्रापितेऽजगरत्वं वै ययातिरभवन्नृपः ॥ ३

चतसृष्वादिशद् दिक्षु भ्रातॄन् भ्राता यवीयसः ।

कृतदारो जुगोपोर्वी काव्यस्य वृषपर्वणः ॥ ४

राजोवाच

ब्रह्मर्षिर्भगवान् काव्यः क्षत्रबन्धुश्च नाहुषः ।

राजन्यविप्रयोः कस्माद् विवाहः प्रतिलोमकः ॥५

श्रीशुक उवाच

एकदा दानवेन्द्रस्य शर्मिष्ठा नाम कन्यका ।

सखीसहस्रसंयुक्ता गुरुपुत्र्या च भामिनी ॥६

देवयान्या पुरोद्याने पुष्पितद्रुमसंकुले ।

व्यचरत् कलगीतालिनलिनीपुलिनेऽबला ॥७

ता जलाशयमासाद्य कन्याः कमललोचनाः ।

तीरे न्यस्य दुकूलानि विजहुः सिंचतीर्मिथः ॥ ८

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! जैसे शरीरधारियोंके छः इन्द्रियाँ होती हैं, वैसे ही नहुषके छः पुत्र थे । उनके नाम थे – यति, ययाति, संयाति, आयति, वियति और कृति ॥१ ॥

नहुष अपने बड़े पुत्र यतिको राज्य देना चाहते थे । परन्तु उसने स्वीकार नहीं किया; क्योंकि वह राज्य पानेका परिणाम जानता था । राज्य एक ऐसी वस्तु है कि जो उसके दाव - पेंच और प्रबन्ध आदिमें भीतर प्रवेश कर जाता है, वह अपने आत्मस्वरूपको नहीं समझ

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सकता ॥२ ॥ जब इन्द्रपत्नी शचीसे सहवास करनेकी चेष्टा करनेके कारण नहुषको ब्राह्मणोंने

इन्द्रपदसे गिरा दिया और अजगर बना दिया, तब राजाके पदपर ययाति बैठे ॥३ ॥ ययातिने

अपने चार छोटे भाइयोंको चार दिशाओंमें नियुक्त कर दिया और स्वयं शुक्राचार्यकी पुत्री देवयानी और दैत्यराज वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाको पत्नीके रूपमें स्वीकार करके पृथ्वीकी रक्षा करने लगा ॥४ ॥

राजा परीक्षित्ने पूछा- भगवन्! भगवान् शुक्राचार्यजी तो ब्राह्मण थे और ययाति क्षत्रिय । फिर ब्राह्मण - कन्या और क्षत्रिय -वरका प्रतिलोम ( उलटा ) विवाह कैसे हुआ? ॥५ ॥

श्रीशुकदेवजीने कहा- राजन्! दानवराज वृषपर्वाकी एक बड़ी मानिनी कन्या थी । उसका नाम था शर्मिष्ठा । वह एक दिन अपनी गुरुपुत्री देवयानी और हजारों सखियोंके साथ अपनी राजधानीके श्रेष्ठ उद्यानमें टहल रही थी । उस उद्यानमें सुन्दर- सुन्दर पुष्पोंसे लदे हुए अनेकों वृक्ष थे । उसमें एक बड़ा ही सुन्दर सरोवर था । सरोवरमें कमल खिले हुए थे और उनपर बड़े ही मधुर स्वरसे भरे गुंजार कर रहे थे । उसकी ध्वनिसे सरोवरका तट गूँज रहा था ॥६-७ ॥ जलाशयके पास पहुँचनेपर उन सुन्दरी कन्याओंने अपने - अपने वस्त्र तो घाटपर रख दिये और उस तालाब में प्रवेश करके वे एक- दूसरेपर जल उलीच उलीचकर क्रीडा करने लगीं ॥८ ॥

वीक्ष्य व्रजन्तं गिरिशं सह देव्या वृषस्थितम् ।

सहसोत्तीर्य वासांसि पर्यधुव्रडिताः स्त्रियः ॥ ९

शर्मिष्ठाजानती वासो गुरुपुत्र्याः समव्ययत् ।

स्वीयं मत्वा प्रकुपिता देवयानीदमब्रवीत् ॥१०

अहो निरीक्ष्यतामस्या दास्याः कर्म ह्यसाम्प्रतम् ।

अस्मद्धार्यं धृतवती शुनीव हविरध्वरे ॥११

यैरिदं तपसा सृष्टं मुखं पुंसः परस्य ये ।

धार्यते यैरिह ज्योतिः शिवः पन्थाश्च दर्शितः ॥१२

यान् वन्दन्त्युपतिष्ठन्ते लोकनाथाः सुरेश्वराः ।

भगवानपि विश्वात्मा पावनः श्रीनिकेतनः ॥१३

वयं तत्रापि भृगवः शिष्योऽस्या नः पितासुरः ।

अस्मद्धार्यं धृतवती शूद्रो वेदमिवासती ॥१४

एवं शपन्तीं शर्मिष्ठा गुरुपुत्रीमभाषत ।

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रुषा श्वसन्त्युरंगीव धर्षिता दष्टदच्छदा ॥१५

आत्मवृत्तमविज्ञाय कत्थसे बहु भिक्षुकि ।

किं न प्रतीक्षसेऽस्माकं गृहान् बलिभुजो यथा ॥१६

एवंविधैः सुपरुषैः क्षिप्त्वाऽऽचार्यसुतां सतीम् ।

शर्मिष्ठा प्राक्षिपत् कूपे वास आदाय मन्युना ॥१७

उसी समय उधरसे पार्वतीजीके साथ बैलपर चढ़े हुए भगवान् शंकर आ निकले । उनको देखकर सब- की - सब कन्याएँ सकुचा गयीं और उन्होंने झटपट सरोवरसे निकलकर अपने-अपने वस्त्र पहन लिये ॥९ ॥ शीघ्रताके कारण शर्मिष्ठाने अनजानमें देवयानीके वस्त्रको

अपना समझकर पहन लिया । इसपर देवयानी क्रोधके मारे आग- बबूला हो गयी । उसने कहा ॥१० ॥ ‘ अरे, देखो तो सही, इस दासीने कितना अनुचित काम कर डाला! राम - राम,

जैसे कुतिया यज्ञका हविष्य उठा ले जाय, वैसे ही इसने मेरे वस्त्र पहन लिये हैं ॥११ ॥ जिन

ब्राह्मणोंने अपने तपोबलसे इस संसारकी सृष्टि की है, जो परम पुरुष परमात्माके मुखरूप हैं, जो अपने हृदयमें निरन्तर ज्योतिर्मय परमात्माको धारण किये रहते हैं और जिन्होंने सम्पूर्ण प्राणियोंके कल्याणके लिये वैदिक मार्गका निर्देश किया है, बड़े-बड़े लोकपाल तथा देवराज इन्द्र- ब्रह्मा आदि भी जिनके चरणोंकी वन्दना और सेवा करते हैं— और तो क्या, लक्ष्मीजीके एकमात्र आश्रय परम पावन विश्वात्मा भगवान् भी जिनकी वन्दना और स्तुति करते हैं—उन्हीं ब्राह्मणोंमें हम सबसे श्रेष्ठ भृगुवंशी हैं । और इसका पिता प्रथम तो असुर है, फिर हमारा शिष्य है । इसपर भी इस दुष्टाने जैसे शूद्र वेद पढ़ ले, उसी तरह हमारे कपड़ोंको पहन लिया है' ॥१२-१४ ॥ जब देवयानी इस प्रकार गाली देने लगी, तब शर्मिष्ठा क्रोधसे तिलमिला उठी । वह चोट खायी हुई नागिनके समान लंबी साँस लेने लगी । उसने अपने दाँतोंसे होठ दबाकर कहा— ॥१५ ॥ ‘ भिखारिन! तू इतना बहक रही है । तुझे कुछ अपनी बातका भी पता है?

जैसे कौए और कुत्ते हमारे दरवाजेपर रोटीके टुकड़ोंके लिये प्रतीक्षा करते हैं, वैसे ही क्या तुम भी हमारे घरोंकी ओर नहीं ताकती रहतीं' ॥ १६ ॥ शर्मिष्ठाने इस प्रकार बड़ी कड़ी - कड़ी बात

कहकर गुरुपुत्री देवयानीका तिरस्कार किया और क्रोधवश उसके वस्त्र छीनकर उसे कुएँमें ढकेल दिया ॥१७ ॥

तस्यां गतायां स्वगृहं ययातिर्मृगयां चरन् ।

प्राप्तो यदृच्छया कूपे जलार्थी तां ददर्श ह ॥१८

दत्त्वा स्वमुत्तरं वासस्तस्यै राजा विवाससे ।

गृहीत्वा पाणिना पाणिमुज्जहार दयापरः ॥१९

तं वीरमाहौशनसी प्रेमनिर्भरया गिरा ।

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राजंस्त्वया गृहीतो मे पाणिः परपुरंजय ॥२० हस्तग्राहोऽपरो मा भूद् गृहीतायास्त्वया हि मे ।

एष ईशकृतो वीर सम्बन्धो नौ न पौरुषः ।

यदिदं कूपलग्नाया भवतो दर्शनं मम ॥॥२१

न ब्राह्मणो मे भविता हस्तग्राहो महाभुज ।

कचस्य बार्हस्पत्यस्य शापाद् यमशपं पुरा ॥२२

ययातिरनभिप्रेतं दैवोपहृतमात्मनः ।

मनस्तु तद्गतं बुद्ध्वा प्रतिजग्राह तद्वचः ॥ २३

गते राजनि सा वीरे तत्र स्म रुदती पितुः ।

न्यवेदयत् ततः सर्वमुक्तं शर्मिष्ठया कृतम् ॥२४

दुर्मना भगवान् काव्यः पौरोहित्यं विगर्हयन् ।

स्तुवन् वृत्तिं च कापोतीं दुहित्रा स ययौ पुरात् ॥२५

शर्मिष्ठाके चले जानेके बाद संयोगवश शिकार खेलते हुए राजा ययाति उधर आ निकले । उन्हें जलकी आवश्यकता थी, इसलिये कूएँमें पड़ी हुई देवयानीको उन्होंने देख लिया ॥१८ ॥

उस समय वह वस्त्रहीन थी । इसलिये उन्होंने अपना दुपट्टा उसे दे दिया और दया करके अपने हाथसे उसका हाथ पकड़कर उसे बाहर निकाल लिया ॥ १ ९ ॥ देवयानीने प्रेमभरी वाणीसे वीर ययातिसे कहा — ‘ वीरशिरोमणे राजन्! आज आपने मेरा हाथ पकड़ा है । अब जब आपने मेरा हाथ पकड़ लिया, तब कोई दूसरा इसे न पकड़े । वीरश्रेष्ठ! कुएँमें गिर जानेपर मुझे जो आपका अचानक दर्शन हुआ है, यह भगवान्‌का ही किया हुआ सम्बन्ध समझना चाहिये । इसमें हमलोगोंकी या और किसी मनुष्यकी कोई चेष्टा नहीं है ॥ २०-२१ ॥ वीरश्रेष्ठ! पहले मैंने बृहस्पतिके पुत्र कचको शाप दे दिया था, इसपर उसने भी मुझे शाप दे दिया । इसी कारण ब्राह्मण मेरा पाणिग्रहण नहीं कर सकता' * || २२ || ययातिको शास्त्रप्रतिकूल होनेके कारण यह सम्बन्ध अभीष्ट तो न था; परन्तु उन्होंने देखा कि प्रारब्धने स्वयं ही मुझे यह उपहार दिया

है और मेरा मन भी इसकी ओर खिंच रहा है । इसलिये ययातिने उसकी बात मान ली ॥२३ ॥

वीर राजा ययाति जब चले गये, तब देवयानी रोती-पीटती अपने पिता शुक्राचार्यके पास पहुँची और शर्मिष्ठाने जो कुछ किया था, वह सब उन्हें कह सुनाया ॥२४ ॥ शर्मिष्ठाके

व्यवहारसे भगवान् शुक्राचार्यजीका भी मन उचट गया । वे पुरोहिताईकी निन्दा करने लगे । उन्होंने सोचा कि इसकी अपेक्षा तो खेत या बाजारमेंसे कबूतरकी तरह कुछ बीनकर खा लेना अच्छा है । अतः अपनी कन्या देवयानीको साथ लेकर वे नगरसे निकल पड़े ॥ २५ ॥