श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 1311–1320
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1311–1320
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देवादयो ब्रह्ममुख्या न विशन्तं स्वधामनि ।
अविज्ञातगतिं कृष्णं ददृशुश्चातिविस्मिताः ॥८
सौदामन्या यथाऽऽकाशे यान्त्या हित्वाभ्रमण्डलम् ।
गतिर्न लक्ष्यते मर्त्यैस्तथा कृष्णस्य दैवतैः ॥९
ब्रह्मरुद्रादयस्ते तु दृष्ट्वा योगगतिं हरेः ।
विस्मितास्तां प्रशंसन्तः स्वं स्वं लोकं ययुस्तदा ॥१०
राजन् परस्य तनुभृज्जननाप्ययेहा मायाविडम्बनमवेहि यथा नटस्य । सृष्ट्वाऽऽत्मनेदमनुविश्य विहृत्य चान्ते संहृत्य चात्ममहिमोपरतः स आस्ते ॥११ मर्त्येन यो गुरुसुतं यमलोकनीतं त्वां चानयच्छणदः परमास्त्रदग्धम् । जिग्येऽन्तकान्तकमपीशमसावनीशः किं स्वावने स्वरनयन्मृगयुं सदेहम् ॥१२ भगवान्का श्रीविग्रह उपासकोंके ध्यान और धारणाका मंगलमय आधार और समस्त लोकोंके लिये परम रमणीय आश्रय है; इसलिये उन्होंने ( योगियोंके समान ) अग्निदेवतासम्बन्धी योगधारणाके द्वारा असको जलाया नहीं, सशरीर अपने धाममें चले गये ॥६ ॥ उस समय स्वर्गमें नगारे बजने लगे और आकाशसे पुष्पोंकी वर्षा होने लगी ।
परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णके पीछे - पीछे इस लोकसे सत्य, धर्म, धैर्य, कीर्ति और श्रीदेवी भी चली गयीं || ७ || भगवान् श्रीकृष्णकी गति मन और वाणीके परे है; तभी तो जब भगवान् अपने धाममें प्रवेश करने लगे, तब ब्रह्मादि देवता भी उन्हें न देख सके । इस घटनासे उन्हें बड़ा ही विस्मय हुआ IICII जैसे बिजली मेघमण्डलको छोड़कर जब आकाशमें प्रवेश करती है, तब मनुष्य उसकी चाल नहीं देख पाते, वैसे ही बड़े - बड़े देवता भी श्रीकृष्णकी गतिके सम्बन्धमें कुछ न जान सके ॥९ ॥ ब्रह्माजी और भगवान् शंकर आदि देवता भगवान्की यह परमयोगमयी गति
देखकर बड़े विस्मयके साथ उसकी प्रशंसा करते अपने - अपने लोकमें चले गये ॥१० ॥
परीक्षित्! जैसे नट अनेकों प्रकारके स्वाँग बनाता है, परन्तु रहता है उन सबसे निर्लेप; वैसे ही भगवान्का मनुष्योंके समान जन्म लेना, लीला करना और फिर उसे संवरण कर लेना उनकी मायाका विलासमात्र है- अभिनयमात्र है । वे स्वयं ही इस जगत्की सृष्टि करके इसमें प्रवेश करके विहार करते हैं और अन्तमें संहार -लीला करके अपने अनन्त महिमामय स्वरूपमें ही स्थित हो जाते हैं ॥११ ॥ सान्दीपनि गुरुका पुत्र यमपुरी चला गया था, परन्तु
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उसे वे मनुष्य- शरीरके साथ लौटा लाये। तुम्हारा ही शरीर ब्रह्मास्त्रसे जल चुका था; परन्तु उन्होंने तुम्हें जीवित कर दिया । वास्तवमें उनकी शरणागतवत्सलता ऐसी ही है । और तो क्या कहूँ, उन्होंने कालोंके महाकाल भगवान् शंकरको भी युद्धमें जीत लिया और अत्यन्त अपराधी — अपने शरीरपर ही प्रहार करनेवाले व्याधको भी सदेह स्वर्ग भेज दिया । प्रिय परीक्षित्! ऐसी स्थितिमें क्या वे अपने शरीरको सदाके लिये यहाँ नहीं रख सकते थे? अवश्य ही रख सकते थे ॥१२ ॥ यद्यपि भगवान् श्रीकृष्ण सम्पूर्ण जगत्की स्थिति, उत्पत्ति और
संहारके निरपेक्ष कारण हैं और सम्पूर्ण शक्तियोंके धारण करनेवाले हैं तथापि उन्होंने अपने शरीरको इस संसारमें बचा रखनेकी इच्छा नहीं की । इससे उन्होंने यह दिखाया कि इस मनुष्य - शरीरसे मुझे क्या प्रयोजन है? आत्मनिष्ठ पुरुषोंके लिये यही आदर्श है कि वे शरीर रखनेकी चेष्टा न करें ॥१३ ॥ जो पुरुष प्रातःकाल उठकर भगवान् श्रीकृष्णके
परमधामगमनकी इस कथाका एकाग्रता और भक्तिके साथ कीर्तन करेगा, उसे भगवान्का वही सर्वश्रेष्ठ परमपद प्राप्त होगा ॥१४ ॥
तथाप्यशेषस्थितिसम्भवाप्यये- ष्वनन्यहेतुर्यदशेषशक्तिधृक् । नैच्छत् प्रणेतुं वपुरत्र शेषितं मर्त्येन किं स्वस्थगतिं प्रदर्शयन् ॥१३
य एतां प्रातरुत्थाय कृष्णस्य पदवीं पराम् ।
प्रयतः कीर्तयेद् भक्त्या तामेवाप्नोत्यनुत्तमाम् ॥१४
दारुको द्वारकामेत्य वसुदेवोग्रसेनयोः ।
पतित्वा चरणावस्त्रैर्न्यषिंचत् कृष्णविच्युतः ॥ १५
कथयामास निधनं वृष्णीनां कृत्स्नशो नृप ।
तच्छ्रुत्वोद्विग्नहृदया जनाः शोकविमूर्च्छिताः ॥१६
तत्र स्म त्वरिता जग्मुः कृष्णविश्लेषविह्वलाः ।
व्यसवः शेरते यत्र ज्ञातयो घ्नन्त आननम् ॥१७
देवकी रोहिणी चैव वसुदेवस्तथा सुतौ ।
कृष्णरामावपश्यन्तः शोकार्ता विजहुः स्मृतिम् ॥१८
प्राणांश्च विजहुस्तत्र भगवद्विरहातुराः ।
उपगुह्य पतींस्तात चितामारुरुहुः स्त्रियः ॥ १ ९
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रामपत्न्यश्च तद्देहमुपगुह्याग्निमाविशन् ।
वसुदेवपत्न्यस्तद्गात्रं प्रद्युम्नादीन् हरेः स्नुषाः ।
कृष्णपत्न्योऽविशन्नग्निं रुक्मिण्याद्यास्तदात्मिकाः ॥२०
अर्जुनः प्रेयसः सख्युः कृष्णस्य विरहातुरः ।
आत्मानं सान्त्वयामास कृष्णगीतैः सदुक्तिभिः ॥२१
इधर दारुक भगवान् श्रीकृष्णके विरहसे व्याकुल होकर द्वारका आया और वसुदेवजी तथा उग्रसेनके चरणोंपर गिर- गिरकर उन्हें आँसुओंसे भिगोने लगा ॥ १५ ॥ परीक्षित्! उसने
अपनेको सँभालकर यदुवंशियोंके विनाशका पूरा - पूरा विवरण कह सुनाया । उसे सुनकर लोग बहुत ही दुःखी हुए और मारे शोकके मूर्च्छित हो गये ॥ १६ ॥ भगवान् श्रीकृष्णके वियोगसे
विह्वल होकर वे लोग सिर पीटते हुए वहाँ तुरंत पहुँचे, जहाँ उनके भाई-बन्धु निष्प्राण होकर पड़े हुए थे ॥१७॥ देवकी, रोहिणी और वसुदेवजी अपने प्यारे पुत्र श्रीकृष्ण और बलरामको
न देखकर शोककी पीड़ासे बेहोश हो गये || १८ || उन्होंने भगवद्विरहसे व्याकुल होकर वहीं अपने प्राण छोड़ दिये । स्त्रियोंने अपने- अपने पतियोंके शव पहचानकर उन्हें हृदयसे लगा लिया और उनके साथ चितापर बैठकर भस्म हो गयीं ॥१९ ॥ बलरामजीकी पत्नियाँ उनके
शरीरको, वसुदेवजीकी पत्नियाँ उनके शवको और भगवान्की पुत्रवधुएँ अपने पतियोंकी लाशोंको लेकर अग्निमें प्रवेश कर गयीं । भगवान् श्रीकृष्णकी रुक्मिणी आदि पटरानियाँ उनके ध्यानमें मग्न होकर अग्निमें प्रविष्ट हो गयीं ॥ २० ॥
परीक्षित्! अर्जुन अपने प्रियतम और सखा भगवान् श्रीकृष्णके विरहसे पहले तो अत्यन्त व्याकुल हो गये; फिर उन्होंने उन्हींके गीतोक्त सदुपदेशोंका स्मरण करके अपने मनको सँभाला ॥२१ ॥ यदुवंशके मृत व्यक्तियोंमें जिनको कोई पिण्ड देनेवाला न था, उनका श्राद्ध
अर्जुनने क्रमशः विधिपूर्वक करवाया ॥ २२ ॥ महाराज! भगवान्के न रहनेपर समुद्रने एकमात्र
भगवान् श्रीकृष्णका निवासस्थान छोड़कर एक ही क्षणमें सारी द्वारका डुबो दी ॥ २३ ॥
भगवान् श्रीकृष्ण वहाँ अब भी सदा- सर्वदा निवास करते हैं । वह स्थान स्मरणमात्रसे ही सारे पाप- तापोंका नाश करनेवाला और सर्वमंगलोंको भी मंगल बनानेवाला है ॥२४ ॥ प्रिय
परीक्षित्! पिण्डदानके अनन्तर बची-खुची स्त्रियों, बच्चों और बूढ़ोंको लेकर अर्जुन इन्द्रप्रस्थ आये । वहाँ सबको यथायोग्य बसाकर अनिरुद्धके पुत्र वज्रका राज्याभिषेक कर दिया ॥२५ ॥
राजन्! तुम्हारे दादा युधिष्ठिर आदि पाण्डवोंको अर्जुनसे ही यह बात मालूम हुई कि यदुवंशियोंका संहार हो गया है । तब उन्होंने अपने वंशधर तुम्हें राज्यपदपर अभिषिक्त करके हिमालयकी वीरयात्रा की ॥२६ ॥
बन्धूनां नष्टगोत्राणामर्जुनः साम्परायिकम् ।
हतानां कारयामास यथावदनुपूर्वशः ॥२२
द्वारकां हरिणा त्यक्तां समुद्रोऽप्लावयत् क्षणात् । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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वर्जयित्वा महाराज श्रीमद्भगवदालयम् ॥२३
नित्यं सन्निहितस्तत्र भगवान् मधुसूदनः ।
स्मृत्याशेषाशुभहरं सर्वमंगलमंगलम् ॥२४
स्त्रीबालवृद्धानादाय हतशेषान् धनंजयः ।
इन्द्रप्रस्थं समावेश्य वज्रं तत्राभ्यषेचयत् ॥२५
श्रुत्वा सुहृद्वधं राजन्नर्जुनात्ते पितामहाः ।
त्वां तु वंशधरं कृत्वा जग्मुः सर्वे महापथम् ॥२६
य एतद् देवदेवस्य विष्णोः कर्माणि जन्म च ।
कीर्तयेच्छ्रद्धया मर्त्यः सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥२७
इत्थं हरेर्भगवतो रुचिरावतार- वीर्याणि बालचरितानि च शन्तमानि । अन्यत्र चेह च श्रुतानि गृणन् मनुष्यो भक्तिं परां परमहंसगतौ लभेत ॥२८ मैंने तुम्हें देवताओंके भी आराध्यदेव भगवान् श्रीकृष्णकी जन्मलीला और कर्मलीला सुनायी । जो मनुष्य श्रद्धाके साथ इसका कीर्तन करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥२७ ॥ परीक्षित्! जो मनुष्य इस प्रकार भक्तभयहारी निखिल सौन्दर्य- माधुर्यनिधि
श्रीकृष्णचन्द्रके अवतार- सम्बन्धी रुचिर पराक्रम और इस श्रीमद्भागवतमहापुराणमें तथा दूसरे पुराणोंमें वर्णित परमानन्दमयी बाललीला, कैशोरलीला आदिका संकीर्तन करता है, वह परमहंस मुनीन्द्रोंके अन्तिम प्राप्तव्य श्रीकृष्णके चरणोंमें पराभक्ति प्राप्त करता है ॥२८ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे वैयासिक्यामष्टादशसाहस्रयां पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे एकत्रिंशोऽध्यायः ॥३१ ॥
॥ इत्येकादशः स्कन्धः समाप्तः ॥ ॥ हरिः ॐ तत्सत् ॥ ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराणम् द्वादशः स्कन्धः अथ प्रथमोऽध्यायः कलियुगके राजवंशोंका वर्णन राजोवाच
स्वधामानुगते कृष्णे यदुवंशविभूषणे ।
कस्य वंशोऽभवत् पृथ्व्यामेतदाचक्ष्व मे मुने ॥ १
श्रीशुक उवाच
योऽन्त्यः पुरंजयो नाम भाव्यो बार्हद्रथो नृप ।
तस्यामात्यस्तु शुनको हत्वा स्वामिनमात्मजम् ॥२
प्रद्योतसंज्ञं राजानं कर्ता यत् पालकः सुतः ।
विशाखयूपस्तत्पुत्रो भविता राजकस्ततः ॥३
नन्दिवर्धनस्तत्पुत्रः पंच प्रद्योतना इमे ।
अष्टत्रिंशोत्तरशतं भोक्ष्यन्ति पृथिवीं नृपाः ॥४
शिशुनागस्ततो भाव्यः काकवर्णस्तु तत्सुतः ।
क्षेमधर्मा तस्य सुतः क्षेत्रज्ञः क्षेमधर्मजः ॥५
विधिसारः सुतस्तस्याजातशत्रुर्भविष्यति ।
दर्भकस्तत्सुतो भावी दर्भकस्याजयः स्मृतः ॥ ६
नन्दिवर्धन आजेयो महानन्दिः सुतस्ततः ।
शिशुनागा दशैवैते षष्ठ्युत्तरशतत्रयम् ॥७
समा भोक्ष्यन्ति पृथिवीं कुरुश्रेष्ठ कलौ नृपाः ।
महानन्दिसुतो राजन् शूद्रीगर्भोद्भवो बली ॥८
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महापद्मपतिः कश्चिन्नन्दः क्षत्रविनाशकृत् ।
ततो नृपा भविष्यन्ति शूद्रप्रायास्त्वधार्मिकाः ॥९
राजा परीक्षित्ने पूछा— भगवन्! यदुवंश-शिरोमणि भगवान् श्रीकृष्ण जब अपने परमधाम पधार गये, तब पृथ्वीपर किस वंशका राज्य हुआ? तथा अब किसका राज्य होगा? आप कृपा करके मुझे यह बतलाइये ॥१ ॥
श्रीशुकदेवजीने कहा -प्रिय परीक्षित! मैंने तुम्हें नवें स्कन्धमें यह बात बतलायी थी कि जरासन्धके पिता बृहद्रथके वंशमें अन्तिम राजा होगा पुरंजय अथवा रिपुंजय । उसके मन्त्रीका नाम होगा शुनक। वह अपने स्वामीको मार डालेगा और अपने पुत्र प्रद्योतको राजसिंहासनपर अभिषिक्त करेगा । प्रद्योतका पुत्र होगा पालक, पालकका विशाखयूप, विशाखयूपका राजक और राजकका पुत्र होगा नन्दिवर्द्धन । प्रद्योतवंशमें यही पाँच नरपति होंगे । इनकी संज्ञा होगी ‘ प्रद्योतन ' । ये एक सौ अड़तीस वर्षतक पृथ्वीका उपभोग करेंगे ॥२-४ ॥ इसके पश्चात् शिशुनाग नामका राजा होगा । शिशुनागका काकवर्ण, उसका क्षेमधर्मा और क्षेमधर्माका पुत्र होगा क्षेत्रज्ञ || ५ || क्षेत्रज्ञका विधिसार, उसका अजातशत्रु, फिर दर्भक और दर्भकका पुत्र अजय होगा ॥६ ॥ अजयसे नन्दिवर्द्धन और उससे महानन्दिका जन्म होगा ।
शिशुनाग- वंशमें ये दस राजा होंगे। ये सब मिलकर कलियुगमें तीन सौ साठ वर्षतक पृथ्वीपर राज्य करेंगे । प्रिय परीक्षित्! महानन्दिकी शूद्रा पत्नीके गर्भसे नन्द नामका पुत्र होगा । वह बड़ा बलवान् होगा । महानन्दि ' महापद्म ' नामक निधिका अधिपति होगा । इसीलिये लोग उसे ' महापद्म ' भी कहेंगे । वह क्षत्रिय राजाओंके विनाशका कारण बनेगा । तभीसे राजालोग प्रायः शूद्र और अधार्मिक हो जायँगे ॥७ - ९ ॥
स एकच्छत्रां पृथिवीमनुल्लंघितशासनः ।
शासिष्यति महापद्मो द्वितीय इव भार्गवः ॥ १०
तस्य चाष्टौ भविष्यन्ति सुमाल्यप्रमुखाः सुताः ।
य इमां भोक्ष्यन्ति महीं राजानः स्म शतं समाः ॥११
नव नन्दान् द्विजः कश्चित् प्रपन्नानुद्धरिष्यति ।
तेषामभावे जगतीं मौर्या भोक्ष्यन्ति वै कलौ ॥१२
स एव चन्द्रगुप्तं वै द्विजो राज्येऽभिषेक्ष्यति ।
तत्सुतो वारिसारस्तु ततश्चाशोकवर्धनः ॥ १३
सुयशा भविता तस्य संगतः सुयशःसुतः ।
शालिशूकस्ततस्तस्य सोमशर्मा भविष्यति ॥१४
शतधन्वा ततस्तस्य भविता तद् बृहद्रथः ।
मौर्या ह्येते दश नृपाः सप्तत्रिंशच्छतोत्तरम् ।
समा भोक्ष्यन्ति पृथिवीं कलौ कुरुकुलोद्वह ॥१५
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हत्वा बृहद्रथं मौर्यं तस्य सेनापतिः कलौ ।
पुष्यमित्रस्तु शुंगाह्वः स्वयं राज्यं करिष्यति ।
अग्निमित्रस्ततस्तस्मात् सुज्येष्ठोऽथ भविष्यति ॥१६
वसुमित्रो भद्रकश्च पुलिन्दो भविता ततः ।
ततो घोषः सुतस्तस्माद् वज्रमित्रो भविष्यति ॥ १७
ततो भागवतस्तस्माद् देवभूतिरिति श्रुतः ।
शुंगा दशैते भोक्ष्यन्ति भूमिं वर्षशताधिकम् ॥१८
ततः कण्वानियं भूमिर्यास्यत्यल्पगुणान् नृप ।
शुंगं हत्वा देवभूतिं कण्वोऽमात्यस्तु कामिनम् ॥ १ ९
स्वयं करिष्यते राज्यं वसुदेवो महामतिः ।
तस्य पुत्रस्तु भूमित्रस्तस्य नारायणः सुतः ।
नारायणस्य भविता सुशर्मा नाम विश्रुतः ॥ २०
महापद्म पृथ्वीका एकच्छत्र शासक होगा । उसके शासनका उल्लंघन कोई भी नहीं कर सकेगा । क्षत्रियोंके विनाशमें हेतु होनेकी दृष्टिसे तो उसे दूसरा परशुराम ही समझना चाहिये ॥१० ॥ उसके सुमाल्य आदि आठ पुत्र होंगे । वे सभी राजा होंगे और सौ वर्षतक इस
पृथ्वीका उपभोग करेंगे ॥११ ॥ कौटिल्य, वात्स्यायन तथा चाणक्यके नामसे प्रसिद्ध एक
ब्राह्मण विश्वविख्यात नन्द और उनके सुमाल्य आदि आठ पुत्रोंका नाश कर डालेगा । उनका नाश हो जानेपर कलियुगमें मौर्यवंशी नरपति पृथ्वीका राज्य करेंगे || १२ || वही ब्राह्मण पहले - पहल चन्द्रगुप्त मौर्यको राजाके पदपर अभिषिक्त करेगा । चन्द्रगुप्तका पुत्र होगा वारिसार और वारिसारका अशोकवर्द्धन ॥१३ ॥ अशोकवर्द्धनका पुत्र होगा सुयश । सुयशका
संगत, संगतका शालिशूक और शालिशूकका सोमशर्मा ॥१४ ॥ सोमशर्माका शतधन्वा और
शतधन्वाका पुत्र बृहद्रथ होगा। कुरुवंशविभूषण परीक्षित्! मौर्यवंशके ये दस * नरपति कलियुगमें एक सौ सैंतीस वर्षतक पृथ्वीका उपभोग करेंगे। बृहद्रथका सेनापति होगा पुष्यमित्र शुंग । वह अपने स्वामीको मारकर स्वयं राजा बन बैठेगा। पुष्यमित्रका अग्निमित्र और अग्निमित्रका सुज्येष्ठ होगा ॥१५-१६ ॥ सुज्येष्ठका वसुमित्र, वसुमित्रका भद्रक और भद्रकका पुलिन्द, पुलिन्दका घोष और घोषका पुत्र होगा वज्रमित्र ॥१७ ॥ वज्रमित्रका
भागवत और भागवतका पुत्र होगा देवभूति । शुंगवंशके ये दस नरपति एक सौ बारह वर्षतक पृथ्वीका पालन करेंगे ॥१८ ॥
परीक्षित्! शुंगवंशी नरपतियोंका राज्यकाल समाप्त होनेपर यह पृथ्वी कण्ववंशी नरपतियोंके हाथमें चली जायगी । कण्ववंशी नरपति अपने पूर्ववर्ती राजाओंकी अपेक्षा कम गुणवाले होंगे । शुंगवंशका अन्तिम नरपति देवभूति बड़ा ही लम्पट होगा । उसे उसका मन्त्री कण्ववंशी वसुदेव मार डालेगा और अपने बुद्धिबलसे स्वयं राज्य करेगा । वसुदेवका पुत्र होगा भूमित्र, भूमित्रका नारायण और नारायणका सुशर्मा । सुशर्मा बड़ा यशस्वी होगा ॥१९ -२० ॥ ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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कण्ववंशके ये चार नरपति काण्वायन कहलायेंगे और कलियुगमें तीन सौ पैंतालीस वर्षतक पृथ्वीका उपभोग करेंगे || २१ || प्रिय परीक्षित्! कण्ववंशी सुशर्माका एक शूद्र सेवक होगा— बली । वह अन्ध्रजातिका एवं बड़ा दुष्ट होगा । वह सुशर्माको मारकर कुछ समयतक स्वयं पृथ्वीका राज्य करेगा ॥२२ ॥ इसके बाद उसका भाई कृष्ण राजा होगा। कृष्णका पुत्र
श्रीशान्तकर्ण और उसका पौर्णमास होगा || २३ || पौर्णमासका लम्बोदर और लम्बोदरका पुत्र चिबिलक होगा । चिबिलकका मेघस्वाति, मेघस्वातिका अटमान, अटमानका अनिष्टकर्मा, अनिष्टकर्माका हालेय, हालेयका तलक, तलकका पुरीषभीरु और पुरीषभीरुका पुत्र होगा राजा सुनन्दन ॥२४-२५ ॥ परीक्षित्! सुनन्दनका पुत्र होगा चकोर; चकोरके आठ पुत्र होंगे, जो सभी ‘ बहु ' कहलायेंगे । इनमें सबसे छोटेका नाम होगा शिवस्वाति । वह बड़ा वीर होगा और शत्रुओंका दमन करेगा | शिवस्वातिका गोमतीपुत्र और उसका पुत्र होगा पुरीमान् || २६ || पुरीमानका मेदःशिरा, मेदः शिराका शिवस्कन्द, शिवस्कन्दका यज्ञश्री, यज्ञश्रीका विजय और विजयके दो पुत्र होंगे– चन्द्रविज्ञ और लोमधि || २७ || परीक्षित्! ये तीस राजा चार सौ छप्पन वर्षतक पृथ्वीका राज्य भोगेंगे ॥२८ ॥
काण्वायना इमे भूमिं चत्वारिंशच्च पंच च ।
शतानि त्रीणि भोक्ष्यन्ति वर्षाणां च कलौ युगे ॥२१
हत्वा काण्वं सुशर्माणं तद्भृत्यो वृषलो बली ।
गां भोक्ष्यत्यन्ध्रजातीयः कंचित् कालमसत्तमः ॥२२
कृष्णनामाथ तद्भ्राता भविता पृथिवीपतिः ।
श्रीशान्तकर्णस्तत्पुत्रः पौर्णमासस्तु तत्सुतः ॥२३
लम्बोदरस्तु तत्पुत्रस्तस्माच्चिबिलको नृपः ।
मेघस्वातिश्चिबिलकादटमानस्तु तस्य च ॥२४
अनिष्टकर्मा हालेयस्तलकस्तस्य चात्मजः ।
पुरीषभीरुस्तत्पुत्रस्ततो राजा सुनन्दनः ॥२५
चकोरो बहवो यत्र शिवस्वातिररिन्दमः ।
तस्यापि गोमतीपुत्रः पुरीमान् भविता ततः ॥ २६
मेदःशिराः शिवस्कन्दो यज्ञश्रीस्तत्सुतस्ततः ।
विजयस्तत्सुतो भाव्यश्चन्द्रविज्ञः सलोमधिः ॥ २७
एते त्रिंशन्नृपतयश्चत्वार्यब्दशतानि च ।
षट्पंचाशच्च पृथिवीं भोक्ष्यन्ति कुरुनन्दन ॥२८
सप्ताभीरा आवभृत्या दश गर्दभिनो नृपाः ।
कंकाः षोडश भूपाला भविष्यन्त्यतिलोलुपाः ॥ २ ९
ततोऽष्टौ यवना भाव्याश्चतुर्दश तुरुष्ककाः । ******ebook converter DEMO Watermarks *******
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भूयो दश गुरुण्डाश्च मौना एकादशैव तु ॥३०
एते भोक्ष्यन्ति पृथिवीं दशवर्षशतानि च ।
नवाधिकां च नवतिं मौना एकादश क्षितिम् ॥३१
भोक्ष्यन्त्यब्दशतान्यंग त्रीणि तैः संस्थिते ततः ।
किलिकिलायां नृपतयो भूतनन्दोऽथ वंगिरिः ॥३२
शिशुनन्दिश्च तद्भ्राता यशोनन्दिः प्रवीरकः ।
इत्येते वै वर्षशतं भविष्यन्त्यधिकानि षट् ॥ ३३
तेषां त्रयोदश सुता भवितारश्च बाह्लिकाः ।
पुष्पमित्रोऽथ राजन्यो दुर्मित्रोऽस्य तथैव च ॥ ३४
परीक्षित्! इसके पश्चात् अवभृति- नगरीके सात आभीर, दस गर्दभी और सोलह कंक पृथ्वीका राज्य करेंगे । ये सब- के - सब बड़े लोभी होंगे ॥ २ ९ ॥ इनके बाद आठ यवन और चौदह तुर्क राज्य करेंगे । इसके बाद दस गुरुण्ड और ग्यारह मौन नरपति होंगे ॥३० ॥ मौनोंके
अतिरिक्त ये सब एक हजार निन्यानबे वर्षतक पृथ्वीका उपभोग करेंगे । तथा ग्यारह मौन नरपति तीन सौ वर्षतक पृथ्वीका शासन करेंगे । जब उनका राज्यकाल समाप्त हो जायगा, तब किलिकिला नामकी नगरीमें भूतनन्द नामका राजा होगा । भूतनन्दका वंगिरि, वंगिरिका भाई शिशुनन्दि तथा यशोनन्दि और प्रवीरक- ये एक सौ छः वर्षतक राज्य करेंगे ॥३१-३३ ॥ इनके तेरह पुत्र होंगे और वे सब- के - सब बाह्लिक कहलायेंगे । उनके पश्चात् पुष्पमित्र नामक क्षत्रिय और उसके पुत्र दुर्मित्रका राज्य होगा ॥ ३४ ॥ परीक्षित्! बाह्लिकवंशी नरपति
एक साथ ही विभिन्न प्रदेशोंमें राज्य करेंगे । उनमें सात अन्ध्रदेशके तथा सात ही कोसलदेशके अधिपति होंगे, कुछ विदूर- भूमिके शासक और कुछ निषधदेशके स्वामी होंगे ॥३५ ॥
एककाला इमे भूपाः सप्तान्ध्राः सप्त कोसलाः ।
विदूरपतयो भाव्या निषधास्तत एव हि ॥३५
मागधानां तु भविता विश्वस्फूर्जिः पुरंजयः ।
करिष्यत्यपरो वर्णान् पुलिन्दयदुमद्रकान् ॥३६
प्रजाश्चाब्रह्मभूयिष्ठाः स्थापयिष्यति दुर्मतिः ।
वीर्यवान् क्षत्रमुत्साद्य पद्मवत्यां स वै पुरि ।
अनुगंगामाप्रयागं गुप्तां भोक्ष्यति मेदिनीम् ॥ ३७
सौराष्ट्रावन्त्याभीराश्च शूरा अर्बुदमालवाः ।
व्रात्या द्विजा भविष्यन्ति शूद्रप्राया जनाधिपाः ॥३८
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