श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 1311–1320

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1311–1320

पृष्ठ 1311

श्रीमद्भागवत महापुराण - २, पृष्ठ 1311 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

देवादयो ब्रह्ममुख्या न विशन्तं स्वधामनि ।

अविज्ञातगतिं कृष्णं ददृशुश्चातिविस्मिताः ॥८

सौदामन्या यथाऽऽकाशे यान्त्या हित्वाभ्रमण्डलम् ।

गतिर्न लक्ष्यते मर्त्यैस्तथा कृष्णस्य दैवतैः ॥९

ब्रह्मरुद्रादयस्ते तु दृष्ट्वा योगगतिं हरेः ।

विस्मितास्तां प्रशंसन्तः स्वं स्वं लोकं ययुस्तदा ॥१०

राजन् परस्य तनुभृज्जननाप्ययेहा मायाविडम्बनमवेहि यथा नटस्य । सृष्ट्वाऽऽत्मनेदमनुविश्य विहृत्य चान्ते संहृत्य चात्ममहिमोपरतः स आस्ते ॥११ मर्त्येन यो गुरुसुतं यमलोकनीतं त्वां चानयच्छणदः परमास्त्रदग्धम् । जिग्येऽन्तकान्तकमपीशमसावनीशः किं स्वावने स्वरनयन्मृगयुं सदेहम् ॥१२ भगवान्‌का श्रीविग्रह उपासकोंके ध्यान और धारणाका मंगलमय आधार और समस्त लोकोंके लिये परम रमणीय आश्रय है; इसलिये उन्होंने ( योगियोंके समान ) अग्निदेवतासम्बन्धी योगधारणाके द्वारा असको जलाया नहीं, सशरीर अपने धाममें चले गये ॥६ ॥ उस समय स्वर्गमें नगारे बजने लगे और आकाशसे पुष्पोंकी वर्षा होने लगी ।

परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णके पीछे - पीछे इस लोकसे सत्य, धर्म, धैर्य, कीर्ति और श्रीदेवी भी चली गयीं || ७ || भगवान् श्रीकृष्णकी गति मन और वाणीके परे है; तभी तो जब भगवान् अपने धाममें प्रवेश करने लगे, तब ब्रह्मादि देवता भी उन्हें न देख सके । इस घटनासे उन्हें बड़ा ही विस्मय हुआ IICII जैसे बिजली मेघमण्डलको छोड़कर जब आकाशमें प्रवेश करती है, तब मनुष्य उसकी चाल नहीं देख पाते, वैसे ही बड़े - बड़े देवता भी श्रीकृष्णकी गतिके सम्बन्धमें कुछ न जान सके ॥९ ॥ ब्रह्माजी और भगवान् शंकर आदि देवता भगवान्‌की यह परमयोगमयी गति

देखकर बड़े विस्मयके साथ उसकी प्रशंसा करते अपने - अपने लोकमें चले गये ॥१० ॥

परीक्षित्! जैसे नट अनेकों प्रकारके स्वाँग बनाता है, परन्तु रहता है उन सबसे निर्लेप; वैसे ही भगवान्‌का मनुष्योंके समान जन्म लेना, लीला करना और फिर उसे संवरण कर लेना उनकी मायाका विलासमात्र है- अभिनयमात्र है । वे स्वयं ही इस जगत्की सृष्टि करके इसमें प्रवेश करके विहार करते हैं और अन्तमें संहार -लीला करके अपने अनन्त महिमामय स्वरूपमें ही स्थित हो जाते हैं ॥११ ॥ सान्दीपनि गुरुका पुत्र यमपुरी चला गया था, परन्तु

****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1312

श्रीमद्भागवत महापुराण - २, पृष्ठ 1312 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

उसे वे मनुष्य- शरीरके साथ लौटा लाये। तुम्हारा ही शरीर ब्रह्मास्त्रसे जल चुका था; परन्तु उन्होंने तुम्हें जीवित कर दिया । वास्तवमें उनकी शरणागतवत्सलता ऐसी ही है । और तो क्या कहूँ, उन्होंने कालोंके महाकाल भगवान् शंकरको भी युद्धमें जीत लिया और अत्यन्त अपराधी — अपने शरीरपर ही प्रहार करनेवाले व्याधको भी सदेह स्वर्ग भेज दिया । प्रिय परीक्षित्! ऐसी स्थितिमें क्या वे अपने शरीरको सदाके लिये यहाँ नहीं रख सकते थे? अवश्य ही रख सकते थे ॥१२ ॥ यद्यपि भगवान् श्रीकृष्ण सम्पूर्ण जगत्की स्थिति, उत्पत्ति और

संहारके निरपेक्ष कारण हैं और सम्पूर्ण शक्तियोंके धारण करनेवाले हैं तथापि उन्होंने अपने शरीरको इस संसारमें बचा रखनेकी इच्छा नहीं की । इससे उन्होंने यह दिखाया कि इस मनुष्य - शरीरसे मुझे क्या प्रयोजन है? आत्मनिष्ठ पुरुषोंके लिये यही आदर्श है कि वे शरीर रखनेकी चेष्टा न करें ॥१३ ॥ जो पुरुष प्रातःकाल उठकर भगवान् श्रीकृष्णके

परमधामगमनकी इस कथाका एकाग्रता और भक्तिके साथ कीर्तन करेगा, उसे भगवान्का वही सर्वश्रेष्ठ परमपद प्राप्त होगा ॥१४ ॥

तथाप्यशेषस्थितिसम्भवाप्यये- ष्वनन्यहेतुर्यदशेषशक्तिधृक् । नैच्छत् प्रणेतुं वपुरत्र शेषितं मर्त्येन किं स्वस्थगतिं प्रदर्शयन् ॥१३

य एतां प्रातरुत्थाय कृष्णस्य पदवीं पराम् ।

प्रयतः कीर्तयेद् भक्त्या तामेवाप्नोत्यनुत्तमाम् ॥१४

दारुको द्वारकामेत्य वसुदेवोग्रसेनयोः ।

पतित्वा चरणावस्त्रैर्न्यषिंचत् कृष्णविच्युतः ॥ १५

कथयामास निधनं वृष्णीनां कृत्स्नशो नृप ।

तच्छ्रुत्वोद्विग्नहृदया जनाः शोकविमूर्च्छिताः ॥१६

तत्र स्म त्वरिता जग्मुः कृष्णविश्लेषविह्वलाः ।

व्यसवः शेरते यत्र ज्ञातयो घ्नन्त आननम् ॥१७

देवकी रोहिणी चैव वसुदेवस्तथा सुतौ ।

कृष्णरामावपश्यन्तः शोकार्ता विजहुः स्मृतिम् ॥१८

प्राणांश्च विजहुस्तत्र भगवद्विरहातुराः ।

उपगुह्य पतींस्तात चितामारुरुहुः स्त्रियः ॥ १ ९

****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1313

श्रीमद्भागवत महापुराण - २, पृष्ठ 1313 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

रामपत्न्यश्च तद्देहमुपगुह्याग्निमाविशन् ।

वसुदेवपत्न्यस्तद्गात्रं प्रद्युम्नादीन् हरेः स्नुषाः ।

कृष्णपत्न्योऽविशन्नग्निं रुक्मिण्याद्यास्तदात्मिकाः ॥२०

अर्जुनः प्रेयसः सख्युः कृष्णस्य विरहातुरः ।

आत्मानं सान्त्वयामास कृष्णगीतैः सदुक्तिभिः ॥२१

इधर दारुक भगवान् श्रीकृष्णके विरहसे व्याकुल होकर द्वारका आया और वसुदेवजी तथा उग्रसेनके चरणोंपर गिर- गिरकर उन्हें आँसुओंसे भिगोने लगा ॥ १५ ॥ परीक्षित्! उसने

अपनेको सँभालकर यदुवंशियोंके विनाशका पूरा - पूरा विवरण कह सुनाया । उसे सुनकर लोग बहुत ही दुःखी हुए और मारे शोकके मूर्च्छित हो गये ॥ १६ ॥ भगवान् श्रीकृष्णके वियोगसे

विह्वल होकर वे लोग सिर पीटते हुए वहाँ तुरंत पहुँचे, जहाँ उनके भाई-बन्धु निष्प्राण होकर पड़े हुए थे ॥१७॥ देवकी, रोहिणी और वसुदेवजी अपने प्यारे पुत्र श्रीकृष्ण और बलरामको

न देखकर शोककी पीड़ासे बेहोश हो गये || १८ || उन्होंने भगवद्विरहसे व्याकुल होकर वहीं अपने प्राण छोड़ दिये । स्त्रियोंने अपने- अपने पतियोंके शव पहचानकर उन्हें हृदयसे लगा लिया और उनके साथ चितापर बैठकर भस्म हो गयीं ॥१९ ॥ बलरामजीकी पत्नियाँ उनके

शरीरको, वसुदेवजीकी पत्नियाँ उनके शवको और भगवान्‌की पुत्रवधुएँ अपने पतियोंकी लाशोंको लेकर अग्निमें प्रवेश कर गयीं । भगवान् श्रीकृष्णकी रुक्मिणी आदि पटरानियाँ उनके ध्यानमें मग्न होकर अग्निमें प्रविष्ट हो गयीं ॥ २० ॥

परीक्षित्! अर्जुन अपने प्रियतम और सखा भगवान् श्रीकृष्णके विरहसे पहले तो अत्यन्त व्याकुल हो गये; फिर उन्होंने उन्हींके गीतोक्त सदुपदेशोंका स्मरण करके अपने मनको सँभाला ॥२१ ॥ यदुवंशके मृत व्यक्तियोंमें जिनको कोई पिण्ड देनेवाला न था, उनका श्राद्ध

अर्जुनने क्रमशः विधिपूर्वक करवाया ॥ २२ ॥ महाराज! भगवान्‌के न रहनेपर समुद्रने एकमात्र

भगवान् श्रीकृष्णका निवासस्थान छोड़कर एक ही क्षणमें सारी द्वारका डुबो दी ॥ २३ ॥

भगवान् श्रीकृष्ण वहाँ अब भी सदा- सर्वदा निवास करते हैं । वह स्थान स्मरणमात्रसे ही सारे पाप- तापोंका नाश करनेवाला और सर्वमंगलोंको भी मंगल बनानेवाला है ॥२४ ॥ प्रिय

परीक्षित्! पिण्डदानके अनन्तर बची-खुची स्त्रियों, बच्चों और बूढ़ोंको लेकर अर्जुन इन्द्रप्रस्थ आये । वहाँ सबको यथायोग्य बसाकर अनिरुद्धके पुत्र वज्रका राज्याभिषेक कर दिया ॥२५ ॥

राजन्! तुम्हारे दादा युधिष्ठिर आदि पाण्डवोंको अर्जुनसे ही यह बात मालूम हुई कि यदुवंशियोंका संहार हो गया है । तब उन्होंने अपने वंशधर तुम्हें राज्यपदपर अभिषिक्त करके हिमालयकी वीरयात्रा की ॥२६ ॥

बन्धूनां नष्टगोत्राणामर्जुनः साम्परायिकम् ।

हतानां कारयामास यथावदनुपूर्वशः ॥२२

द्वारकां हरिणा त्यक्तां समुद्रोऽप्लावयत् क्षणात् । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1314

श्रीमद्भागवत महापुराण - २, पृष्ठ 1314 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वर्जयित्वा महाराज श्रीमद्भगवदालयम् ॥२३

नित्यं सन्निहितस्तत्र भगवान् मधुसूदनः ।

स्मृत्याशेषाशुभहरं सर्वमंगलमंगलम् ॥२४

स्त्रीबालवृद्धानादाय हतशेषान् धनंजयः ।

इन्द्रप्रस्थं समावेश्य वज्रं तत्राभ्यषेचयत् ॥२५

श्रुत्वा सुहृद्वधं राजन्नर्जुनात्ते पितामहाः ।

त्वां तु वंशधरं कृत्वा जग्मुः सर्वे महापथम् ॥२६

य एतद् देवदेवस्य विष्णोः कर्माणि जन्म च ।

कीर्तयेच्छ्रद्धया मर्त्यः सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥२७

इत्थं हरेर्भगवतो रुचिरावतार- वीर्याणि बालचरितानि च शन्तमानि । अन्यत्र चेह च श्रुतानि गृणन् मनुष्यो भक्तिं परां परमहंसगतौ लभेत ॥२८ मैंने तुम्हें देवताओंके भी आराध्यदेव भगवान् श्रीकृष्णकी जन्मलीला और कर्मलीला सुनायी । जो मनुष्य श्रद्धाके साथ इसका कीर्तन करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥२७ ॥ परीक्षित्! जो मनुष्य इस प्रकार भक्तभयहारी निखिल सौन्दर्य- माधुर्यनिधि

श्रीकृष्णचन्द्रके अवतार- सम्बन्धी रुचिर पराक्रम और इस श्रीमद्भागवतमहापुराणमें तथा दूसरे पुराणोंमें वर्णित परमानन्दमयी बाललीला, कैशोरलीला आदिका संकीर्तन करता है, वह परमहंस मुनीन्द्रोंके अन्तिम प्राप्तव्य श्रीकृष्णके चरणोंमें पराभक्ति प्राप्त करता है ॥२८ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे वैयासिक्यामष्टादशसाहस्रयां पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे एकत्रिंशोऽध्यायः ॥३१ ॥

॥ इत्येकादशः स्कन्धः समाप्तः ॥ ॥ हरिः ॐ तत्सत् ॥ ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1315

श्रीमद्भागवत महापुराण - २, पृष्ठ 1315 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1316

श्रीमद्भागवत महापुराण - २, पृष्ठ 1316 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराणम् द्वादशः स्कन्धः अथ प्रथमोऽध्यायः कलियुगके राजवंशोंका वर्णन राजोवाच

स्वधामानुगते कृष्णे यदुवंशविभूषणे ।

कस्य वंशोऽभवत् पृथ्व्यामेतदाचक्ष्व मे मुने ॥ १

श्रीशुक उवाच

योऽन्त्यः पुरंजयो नाम भाव्यो बार्हद्रथो नृप ।

तस्यामात्यस्तु शुनको हत्वा स्वामिनमात्मजम् ॥२

प्रद्योतसंज्ञं राजानं कर्ता यत् पालकः सुतः ।

विशाखयूपस्तत्पुत्रो भविता राजकस्ततः ॥३

नन्दिवर्धनस्तत्पुत्रः पंच प्रद्योतना इमे ।

अष्टत्रिंशोत्तरशतं भोक्ष्यन्ति पृथिवीं नृपाः ॥४

शिशुनागस्ततो भाव्यः काकवर्णस्तु तत्सुतः ।

क्षेमधर्मा तस्य सुतः क्षेत्रज्ञः क्षेमधर्मजः ॥५

विधिसारः सुतस्तस्याजातशत्रुर्भविष्यति ।

दर्भकस्तत्सुतो भावी दर्भकस्याजयः स्मृतः ॥ ६

नन्दिवर्धन आजेयो महानन्दिः सुतस्ततः ।

शिशुनागा दशैवैते षष्ठ्युत्तरशतत्रयम् ॥७

समा भोक्ष्यन्ति पृथिवीं कुरुश्रेष्ठ कलौ नृपाः ।

महानन्दिसुतो राजन् शूद्रीगर्भोद्भवो बली ॥८

****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1317

श्रीमद्भागवत महापुराण - २, पृष्ठ 1317 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

महापद्मपतिः कश्चिन्नन्दः क्षत्रविनाशकृत् ।

ततो नृपा भविष्यन्ति शूद्रप्रायास्त्वधार्मिकाः ॥९

राजा परीक्षित्ने पूछा— भगवन्! यदुवंश-शिरोमणि भगवान् श्रीकृष्ण जब अपने परमधाम पधार गये, तब पृथ्वीपर किस वंशका राज्य हुआ? तथा अब किसका राज्य होगा? आप कृपा करके मुझे यह बतलाइये ॥१ ॥

श्रीशुकदेवजीने कहा -प्रिय परीक्षित! मैंने तुम्हें नवें स्कन्धमें यह बात बतलायी थी कि जरासन्धके पिता बृहद्रथके वंशमें अन्तिम राजा होगा पुरंजय अथवा रिपुंजय । उसके मन्त्रीका नाम होगा शुनक। वह अपने स्वामीको मार डालेगा और अपने पुत्र प्रद्योतको राजसिंहासनपर अभिषिक्त करेगा । प्रद्योतका पुत्र होगा पालक, पालकका विशाखयूप, विशाखयूपका राजक और राजकका पुत्र होगा नन्दिवर्द्धन । प्रद्योतवंशमें यही पाँच नरपति होंगे । इनकी संज्ञा होगी ‘ प्रद्योतन ' । ये एक सौ अड़तीस वर्षतक पृथ्वीका उपभोग करेंगे ॥२-४ ॥ इसके पश्चात् शिशुनाग नामका राजा होगा । शिशुनागका काकवर्ण, उसका क्षेमधर्मा और क्षेमधर्माका पुत्र होगा क्षेत्रज्ञ || ५ || क्षेत्रज्ञका विधिसार, उसका अजातशत्रु, फिर दर्भक और दर्भकका पुत्र अजय होगा ॥६ ॥ अजयसे नन्दिवर्द्धन और उससे महानन्दिका जन्म होगा ।

शिशुनाग- वंशमें ये दस राजा होंगे। ये सब मिलकर कलियुगमें तीन सौ साठ वर्षतक पृथ्वीपर राज्य करेंगे । प्रिय परीक्षित्! महानन्दिकी शूद्रा पत्नीके गर्भसे नन्द नामका पुत्र होगा । वह बड़ा बलवान् होगा । महानन्दि ' महापद्म ' नामक निधिका अधिपति होगा । इसीलिये लोग उसे ' महापद्म ' भी कहेंगे । वह क्षत्रिय राजाओंके विनाशका कारण बनेगा । तभीसे राजालोग प्रायः शूद्र और अधार्मिक हो जायँगे ॥७ - ९ ॥

स एकच्छत्रां पृथिवीमनुल्लंघितशासनः ।

शासिष्यति महापद्मो द्वितीय इव भार्गवः ॥ १०

तस्य चाष्टौ भविष्यन्ति सुमाल्यप्रमुखाः सुताः ।

य इमां भोक्ष्यन्ति महीं राजानः स्म शतं समाः ॥११

नव नन्दान् द्विजः कश्चित् प्रपन्नानुद्धरिष्यति ।

तेषामभावे जगतीं मौर्या भोक्ष्यन्ति वै कलौ ॥१२

स एव चन्द्रगुप्तं वै द्विजो राज्येऽभिषेक्ष्यति ।

तत्सुतो वारिसारस्तु ततश्चाशोकवर्धनः ॥ १३

सुयशा भविता तस्य संगतः सुयशःसुतः ।

शालिशूकस्ततस्तस्य सोमशर्मा भविष्यति ॥१४

शतधन्वा ततस्तस्य भविता तद् बृहद्रथः ।

मौर्या ह्येते दश नृपाः सप्तत्रिंशच्छतोत्तरम् ।

समा भोक्ष्यन्ति पृथिवीं कलौ कुरुकुलोद्वह ॥१५

****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1318

श्रीमद्भागवत महापुराण - २, पृष्ठ 1318 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

हत्वा बृहद्रथं मौर्यं तस्य सेनापतिः कलौ ।

पुष्यमित्रस्तु शुंगाह्वः स्वयं राज्यं करिष्यति ।

अग्निमित्रस्ततस्तस्मात् सुज्येष्ठोऽथ भविष्यति ॥१६

वसुमित्रो भद्रकश्च पुलिन्दो भविता ततः ।

ततो घोषः सुतस्तस्माद् वज्रमित्रो भविष्यति ॥ १७

ततो भागवतस्तस्माद् देवभूतिरिति श्रुतः ।

शुंगा दशैते भोक्ष्यन्ति भूमिं वर्षशताधिकम् ॥१८

ततः कण्वानियं भूमिर्यास्यत्यल्पगुणान् नृप ।

शुंगं हत्वा देवभूतिं कण्वोऽमात्यस्तु कामिनम् ॥ १ ९

स्वयं करिष्यते राज्यं वसुदेवो महामतिः ।

तस्य पुत्रस्तु भूमित्रस्तस्य नारायणः सुतः ।

नारायणस्य भविता सुशर्मा नाम विश्रुतः ॥ २०

महापद्म पृथ्वीका एकच्छत्र शासक होगा । उसके शासनका उल्लंघन कोई भी नहीं कर सकेगा । क्षत्रियोंके विनाशमें हेतु होनेकी दृष्टिसे तो उसे दूसरा परशुराम ही समझना चाहिये ॥१० ॥ उसके सुमाल्य आदि आठ पुत्र होंगे । वे सभी राजा होंगे और सौ वर्षतक इस

पृथ्वीका उपभोग करेंगे ॥११ ॥ कौटिल्य, वात्स्यायन तथा चाणक्यके नामसे प्रसिद्ध एक

ब्राह्मण विश्वविख्यात नन्द और उनके सुमाल्य आदि आठ पुत्रोंका नाश कर डालेगा । उनका नाश हो जानेपर कलियुगमें मौर्यवंशी नरपति पृथ्वीका राज्य करेंगे || १२ || वही ब्राह्मण पहले - पहल चन्द्रगुप्त मौर्यको राजाके पदपर अभिषिक्त करेगा । चन्द्रगुप्तका पुत्र होगा वारिसार और वारिसारका अशोकवर्द्धन ॥१३ ॥ अशोकवर्द्धनका पुत्र होगा सुयश । सुयशका

संगत, संगतका शालिशूक और शालिशूकका सोमशर्मा ॥१४ ॥ सोमशर्माका शतधन्वा और

शतधन्वाका पुत्र बृहद्रथ होगा। कुरुवंशविभूषण परीक्षित्! मौर्यवंशके ये दस * नरपति कलियुगमें एक सौ सैंतीस वर्षतक पृथ्वीका उपभोग करेंगे। बृहद्रथका सेनापति होगा पुष्यमित्र शुंग । वह अपने स्वामीको मारकर स्वयं राजा बन बैठेगा। पुष्यमित्रका अग्निमित्र और अग्निमित्रका सुज्येष्ठ होगा ॥१५-१६ ॥ सुज्येष्ठका वसुमित्र, वसुमित्रका भद्रक और भद्रकका पुलिन्द, पुलिन्दका घोष और घोषका पुत्र होगा वज्रमित्र ॥१७ ॥ वज्रमित्रका

भागवत और भागवतका पुत्र होगा देवभूति । शुंगवंशके ये दस नरपति एक सौ बारह वर्षतक पृथ्वीका पालन करेंगे ॥१८ ॥

परीक्षित्! शुंगवंशी नरपतियोंका राज्यकाल समाप्त होनेपर यह पृथ्वी कण्ववंशी नरपतियोंके हाथमें चली जायगी । कण्ववंशी नरपति अपने पूर्ववर्ती राजाओंकी अपेक्षा कम गुणवाले होंगे । शुंगवंशका अन्तिम नरपति देवभूति बड़ा ही लम्पट होगा । उसे उसका मन्त्री कण्ववंशी वसुदेव मार डालेगा और अपने बुद्धिबलसे स्वयं राज्य करेगा । वसुदेवका पुत्र होगा भूमित्र, भूमित्रका नारायण और नारायणका सुशर्मा । सुशर्मा बड़ा यशस्वी होगा ॥१९ -२० ॥ ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1319

श्रीमद्भागवत महापुराण - २, पृष्ठ 1319 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

कण्ववंशके ये चार नरपति काण्वायन कहलायेंगे और कलियुगमें तीन सौ पैंतालीस वर्षतक पृथ्वीका उपभोग करेंगे || २१ || प्रिय परीक्षित्! कण्ववंशी सुशर्माका एक शूद्र सेवक होगा— बली । वह अन्ध्रजातिका एवं बड़ा दुष्ट होगा । वह सुशर्माको मारकर कुछ समयतक स्वयं पृथ्वीका राज्य करेगा ॥२२ ॥ इसके बाद उसका भाई कृष्ण राजा होगा। कृष्णका पुत्र

श्रीशान्तकर्ण और उसका पौर्णमास होगा || २३ || पौर्णमासका लम्बोदर और लम्बोदरका पुत्र चिबिलक होगा । चिबिलकका मेघस्वाति, मेघस्वातिका अटमान, अटमानका अनिष्टकर्मा, अनिष्टकर्माका हालेय, हालेयका तलक, तलकका पुरीषभीरु और पुरीषभीरुका पुत्र होगा राजा सुनन्दन ॥२४-२५ ॥ परीक्षित्! सुनन्दनका पुत्र होगा चकोर; चकोरके आठ पुत्र होंगे, जो सभी ‘ बहु ' कहलायेंगे । इनमें सबसे छोटेका नाम होगा शिवस्वाति । वह बड़ा वीर होगा और शत्रुओंका दमन करेगा | शिवस्वातिका गोमतीपुत्र और उसका पुत्र होगा पुरीमान् || २६ || पुरीमानका मेदःशिरा, मेदः शिराका शिवस्कन्द, शिवस्कन्दका यज्ञश्री, यज्ञश्रीका विजय और विजयके दो पुत्र होंगे– चन्द्रविज्ञ और लोमधि || २७ || परीक्षित्! ये तीस राजा चार सौ छप्पन वर्षतक पृथ्वीका राज्य भोगेंगे ॥२८ ॥

काण्वायना इमे भूमिं चत्वारिंशच्च पंच च ।

शतानि त्रीणि भोक्ष्यन्ति वर्षाणां च कलौ युगे ॥२१

हत्वा काण्वं सुशर्माणं तद्भृत्यो वृषलो बली ।

गां भोक्ष्यत्यन्ध्रजातीयः कंचित् कालमसत्तमः ॥२२

कृष्णनामाथ तद्भ्राता भविता पृथिवीपतिः ।

श्रीशान्तकर्णस्तत्पुत्रः पौर्णमासस्तु तत्सुतः ॥२३

लम्बोदरस्तु तत्पुत्रस्तस्माच्चिबिलको नृपः ।

मेघस्वातिश्चिबिलकादटमानस्तु तस्य च ॥२४

अनिष्टकर्मा हालेयस्तलकस्तस्य चात्मजः ।

पुरीषभीरुस्तत्पुत्रस्ततो राजा सुनन्दनः ॥२५

चकोरो बहवो यत्र शिवस्वातिररिन्दमः ।

तस्यापि गोमतीपुत्रः पुरीमान् भविता ततः ॥ २६

मेदःशिराः शिवस्कन्दो यज्ञश्रीस्तत्सुतस्ततः ।

विजयस्तत्सुतो भाव्यश्चन्द्रविज्ञः सलोमधिः ॥ २७

एते त्रिंशन्नृपतयश्चत्वार्यब्दशतानि च ।

षट्पंचाशच्च पृथिवीं भोक्ष्यन्ति कुरुनन्दन ॥२८

सप्ताभीरा आवभृत्या दश गर्दभिनो नृपाः ।

कंकाः षोडश भूपाला भविष्यन्त्यतिलोलुपाः ॥ २ ९

ततोऽष्टौ यवना भाव्याश्चतुर्दश तुरुष्ककाः । ******ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1320

श्रीमद्भागवत महापुराण - २, पृष्ठ 1320 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

भूयो दश गुरुण्डाश्च मौना एकादशैव तु ॥३०

एते भोक्ष्यन्ति पृथिवीं दशवर्षशतानि च ।

नवाधिकां च नवतिं मौना एकादश क्षितिम् ॥३१

भोक्ष्यन्त्यब्दशतान्यंग त्रीणि तैः संस्थिते ततः ।

किलिकिलायां नृपतयो भूतनन्दोऽथ वंगिरिः ॥३२

शिशुनन्दिश्च तद्भ्राता यशोनन्दिः प्रवीरकः ।

इत्येते वै वर्षशतं भविष्यन्त्यधिकानि षट् ॥ ३३

तेषां त्रयोदश सुता भवितारश्च बाह्लिकाः ।

पुष्पमित्रोऽथ राजन्यो दुर्मित्रोऽस्य तथैव च ॥ ३४

परीक्षित्! इसके पश्चात् अवभृति- नगरीके सात आभीर, दस गर्दभी और सोलह कंक पृथ्वीका राज्य करेंगे । ये सब- के - सब बड़े लोभी होंगे ॥ २ ९ ॥ इनके बाद आठ यवन और चौदह तुर्क राज्य करेंगे । इसके बाद दस गुरुण्ड और ग्यारह मौन नरपति होंगे ॥३० ॥ मौनोंके

अतिरिक्त ये सब एक हजार निन्यानबे वर्षतक पृथ्वीका उपभोग करेंगे । तथा ग्यारह मौन नरपति तीन सौ वर्षतक पृथ्वीका शासन करेंगे । जब उनका राज्यकाल समाप्त हो जायगा, तब किलिकिला नामकी नगरीमें भूतनन्द नामका राजा होगा । भूतनन्दका वंगिरि, वंगिरिका भाई शिशुनन्दि तथा यशोनन्दि और प्रवीरक- ये एक सौ छः वर्षतक राज्य करेंगे ॥३१-३३ ॥ इनके तेरह पुत्र होंगे और वे सब- के - सब बाह्लिक कहलायेंगे । उनके पश्चात् पुष्पमित्र नामक क्षत्रिय और उसके पुत्र दुर्मित्रका राज्य होगा ॥ ३४ ॥ परीक्षित्! बाह्लिकवंशी नरपति

एक साथ ही विभिन्न प्रदेशोंमें राज्य करेंगे । उनमें सात अन्ध्रदेशके तथा सात ही कोसलदेशके अधिपति होंगे, कुछ विदूर- भूमिके शासक और कुछ निषधदेशके स्वामी होंगे ॥३५ ॥

एककाला इमे भूपाः सप्तान्ध्राः सप्त कोसलाः ।

विदूरपतयो भाव्या निषधास्तत एव हि ॥३५

मागधानां तु भविता विश्वस्फूर्जिः पुरंजयः ।

करिष्यत्यपरो वर्णान् पुलिन्दयदुमद्रकान् ॥३६

प्रजाश्चाब्रह्मभूयिष्ठाः स्थापयिष्यति दुर्मतिः ।

वीर्यवान् क्षत्रमुत्साद्य पद्मवत्यां स वै पुरि ।

अनुगंगामाप्रयागं गुप्तां भोक्ष्यति मेदिनीम् ॥ ३७

सौराष्ट्रावन्त्याभीराश्च शूरा अर्बुदमालवाः ।

व्रात्या द्विजा भविष्यन्ति शूद्रप्राया जनाधिपाः ॥३८

******ebook converter DEMO Watermarks *******