श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 1351–1360

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1351–1360

पृष्ठ 1351

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पासतक न फटक सकेंगे || १० || तुम इस प्रकार अनुसंधान -चिन्तन करो कि ' मैं ही सर्वाधिष्ठान परब्रह्म हूँ। सर्वाधिष्ठान ब्रह्म मैं ही हूँ । ' इस प्रकार तुम अपने - आपको अपने वास्तविक एकरस अनन्त अखण्ड स्वरूपमें स्थित कर लो ॥११ ॥

दशन्तं तक्षकं पादे लेलिहानं विषाननैः ।

न द्रक्ष्यसि शरीरं च विश्वं च पृथगात्मनः ॥१२

एतत्ते कथितं तात यथाऽऽत्मा पृष्टवान् नृप ।

हरेर्विश्वात्मनश्चेष्टां किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥१३

उस समय अपनी विषैली जीभ लपलपाता हुआ, अपने होठोंके कोने चाटता हुआ तक्षक आये और अपने विषपूर्ण मुखोंसे तुम्हारे पैरोंमें डस ले - कोई परवा नहीं । तुम अपने आत्मस्वरूपमें स्थित होकर इस शरीरको - और तो क्या, सारे विश्वको भी अपनेसे पृथक् न देखोगे ॥१२ ॥ आत्मस्वरूप बेटा परीक्षित्! तुमने विश्वात्मा भगवान्‌की लीलाके सम्बन्धमें

जो प्रश्न किया था, उसका उत्तर मैंने दे दिया, अब और क्या सुनना चाहते हो? ॥१३ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां द्वादशस्कन्धे ब्रह्मोपदेशो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥५ ॥

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पृष्ठ 1352

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अथ षष्ठोऽध्यायः परीक्षित्की परमगति, जनमेजयका सर्पसत्र और वेदोंके शाखाभेद सूत उवाच एतन्निशम्य मुनिनाभिहितं परीक्षिद् व्यासात्मजेन निखिलात्मदृशा समेन । तत्पादमूलमुपसृत्य तेन मूर्ध्ना बद्धांजलिस्तमिदमाह स विष्णुरातः ॥१ राजोवाच

सिद्धोऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि भवता करुणात्मना ।

श्रावितो यच्च मे साक्षादनादिनिधनो हरिः ॥२

नात्यद्भुतमहं मन्ये महतामच्युतात्मनाम् ।

अज्ञेषु तापतप्तेषु भूतेषु यदनुग्रहः ॥३

श्रीसूतजी कहते हैं - शौनकादि ऋषियो! व्यासनन्दन श्रीशुकदेव मुनि समस्त चराचर जगत्को अपनी आत्माके रूपमें अनुभव करते हैं और व्यवहारमें सबके प्रति समदृष्टि रखते हैं । भगवान्‌के शरणागत एवं उनके द्वारा सुरक्षित राजर्षि परीक्षित्ने उनका सम्पूर्ण उपदेश बड़े ध्यानसे श्रवण किया । अब वे सिर झुकाकर उनके चरणोंके तनिक और पास खिसक आये तथा अंजलि बाँधकर उनसे यह प्रार्थना करने लगे ॥१ ॥

राजा परीक्षित्ने कहा — भगवन्! आप करुणाके मूर्तिमान् स्वरूप हैं । आपने मुझपर परम कृपा करके अनादि- अनन्त, एकरस, सत्य भगवान् श्रीहरिके स्वरूप और लीलाओंका वर्णन किया है । अब मैं आपकी कृपासे परम अनुगृहीत और कृतकृत्य हो गया हूँ ॥२ ॥

संसारके प्राणी अपने स्वार्थ और परमार्थके ज्ञानसे शून्य हैं और विभिन्न प्रकारके दुःखोंके दावानलसे दग्ध हो रहे हैं । उनके ऊपर भगवन्मय महात्माओंका अनुग्रह होना कोई नयी घटना अथवा आश्चर्यकी बात नहीं है । यह तो उनके लिये स्वाभाविक ही है ॥३ ॥ मैंने और

मेरे साथ और बहुत - से लोगोंने आपके मुखारविन्दसे इस श्रीमद्भागवतमहापुराणका श्रवण किया है । इस पुराणमें पद- पदपर भगवान् श्रीहरिके उस स्वरूप और उन लीलाओंका वर्णन हुआ है, जिसके गानमें बड़े -बड़े आत्माराम पुरुष रमते रहते हैं ॥४ ॥

पुराणसंहितामेतामश्रौष्म भवतो वयम् ।

यस्यां खलूत्तमश्लोको भगवाननुवर्ण्यते ॥४

भगवंस्तक्षकादिभ्यो मृत्युभ्यो न बिभेम्यहम् । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1353

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प्रविष्टो ब्रह्म निर्वाणमभयं दर्शितं त्वया ॥५

अनुजानीहि मां ब्रह्मन् वाचं यच्छाम्यधोक्षजे ।

मुक्तकामाशयं चेतः प्रवेश्य विसृजाम्यसून् ॥६

अज्ञानं च निरस्तं मे ज्ञानविज्ञाननिष्ठया ।

भवता दर्शितं क्षेमं परं भगवतः पदम् ॥७

सूत उवाच

इत्युक्तस्तमनुज्ञाप्य भगवान् बादरायणिः ।

जगाम भिक्षुभिः साकं नरदेवेन पूजितः ॥८

परीक्षिदपि राजर्षिरात्मन्यात्मानमात्मना ।

समाधाय परं दध्यावस्पन्दासुर्यथा तरुः ॥९

प्राक्कूले बर्हिष्यासीनो गंगाकूल उदङ्मुखः ।

ब्रह्मभूतो महायोगी निःसंगश्छिन्नसंशयः ॥१०

भगवन्! आपने मुझे अभयपदका, ब्रह्म और आत्माकी एकताका साक्षात्कार करा दिया है । अब मैं परम शान्ति-स्वरूप ब्रह्ममें स्थित हूँ। अब मुझे तक्षक आदि किसी भी मृत्युके निमित्तसे अथवा दल - के - दल मृत्युओंसे भी भय नहीं है । मैं अभय हो गया हूँ || ५ ॥ ब्रह्मन्! अब आप मुझे आज्ञा दीजिये कि मैं अपनी वाणी बंद कर लूँ, मौन हो जाऊँ और साथ ही कामनाओंके संस्कारसे भी रहित चित्तको इन्द्रियातीत परमात्माके स्वरूपमें विलीन करके अपने प्राणोंका त्याग कर दूँ || ६ || आपके द्वारा उपदेश किये हुए ज्ञान और विज्ञानमें परिनिष्ठित हो जानेसे मेरा अज्ञान सर्वदाके लिये नष्ट हो गया । आपने भगवान्के परम कल्याणमय स्वरूपका मुझे साक्षात्कार करा दिया है ॥७ ॥

सूतजी कहते हैं— शौनकादि ऋषियो! राजा परीक्षितने भगवान् श्रीशुकदेवजीसे इस प्रकार कहकर बड़े प्रेमसे उनकी पूजा की । अब वे परीक्षित्से विदा लेकर समागत त्यागी महात्माओं, भिक्षुओंके साथ वहाँसे चले गये || ८ || राजर्षि परीक्षितने भी बिना किसी बाह्य सहायताके स्वयं ही अपने अन्तरात्माको परमात्माके चिन्तनमें समाहित किया और ध्यानमग्न हो गये । उस समय उनका श्वास-प्रश्वास भी नहीं चलता था, ऐसा जान पड़ता था मानो कोई वृक्षका ठूंठ हो ॥९ ॥ उन्होंने गंगाजीके तटपर कुशोंको इस प्रकार बिछा रखा था, जिसमें

उनका अग्रभाग पूर्वकी ओर हो और उनपर स्वयं उत्तर मुँह होकर बैठे हुए थे । उनकी आसक्ति और संशय तो पहले ही मिट चुके थे । अब वे ब्रह्म और आत्माकी एकतारूप महायोगमें स्थित होकर ब्रह्मस्वरूप हो गये ॥१० ॥

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पृष्ठ 1354

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तक्षकः प्रहितो विप्राः क्रुद्धेन द्विजसूनुना ।

हन्तुकामो नृपं गच्छन् ददर्श पथि कश्यपम् ॥११

तं तर्पयित्वा द्रविणैर्निवर्त्य विषहारिणम् ।

द्विजरूपप्रतिच्छन्नः कामरूपोऽदशन्नृपम् ॥१२

ब्रह्मभूतस्य राजर्षेर्देहोऽहिगरलाग्निना ।

बभूव भस्मसात् सद्यः पश्यतां सर्वदेहिनाम् ॥१३

हाहाकारो महानासीद् भुवि खे दिक्षु सर्वतः ।

विस्मिता ह्यभवन् सर्वे देवासुरनरादयः ॥१४

देवदुन्दुभयो नेदुर्गन्धर्वाप्सरसो जगुः ।

ववृषुः पुष्पवर्षाणि विबुधाः साधुवादिनः ॥१५

जनमेजयः स्वपितरं श्रुत्वा तक्षकभक्षितम् ।

यथा जुहाव संक्रुद्धो नागान् सत्रे सह द्विजैः ॥ १६

सर्पसत्रे समिद्धाग्नी दह्यमानान् महोरगान् ।

दृष्ट्वेन्द्रं भयसंविग्नस्तक्षकः शरणं ययौ ॥१७

अपश्यंस्तक्षकं तत्र राजा पारीक्षितो द्विजान् ।

उवाच तक्षकः कस्मान्न दह्येतोरगाधमः ॥ १८

तं गोपायति राजेन्द्र शक्रः शरणमागतम् ।

तेन संस्तम्भितः सर्पस्तस्मान्नाग्नौ पतत्यसौ ॥१९

शौनकादि ऋषियो! मुनिकुमार शृंगीने क्रोधित होकर परीक्षितको शाप दे दिया था । अब उनका भेजा हुआ तक्षक सर्प राजा परीक्षित्‌को डसनेके लिये उनके पास चला । रास्तेमें उसने कश्यप नामके एक ब्राह्मणको देखा ॥११ ॥ कश्यपब्राह्मण सर्पविषकी चिकित्सा करनेमें बड़े

निपुण थे । तक्षकने बहुत सा धन देकर कश्यपको वहींसे लौटा दिया, उन्हें राजाके पास न जाने दिया । और स्वयं ब्राह्मणके रूपमें छिपकर, क्योंकि वह इच्छानुसार रूप धारण कर सकता था, राजा परीक्षित्के पास गया और उन्हें डस लिया ॥१२ ॥ राजर्षि परीक्षित्

तक्षकके डसनेके पहले ही ब्रह्ममें स्थित हो चुके थे । अब तक्षकके विषकी आगसे उनका शरीर सबके सामने ही जलकर भस्म हो गया ॥१३ ॥

पृथ्वी, आकाश और सब दिशाओंमें बड़े जोरसे ' हाय हाय ' की ध्वनि होने लगी । देवता, ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1355

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असुर, मनुष्य आदि सब - के - सब परीक्षित्की यह परम गति देखकर विस्मित हो गये ॥१४ ॥

देवताओंकी दुन्दुभियाँ अपने- आप बज उठीं । गन्धर्व और अप्सराएँ गान करने लगीं ।

देवतालोग ‘ साधु - साधु ' के नारे लगाकर पुष्पोंकी वर्षा करने लगे ॥ १५ ॥

जब जनमेजयने सुना कि तक्षकने मेरे पिताजीको डस लिया है, तो उसे बड़ा क्रोध हुआ । अब वह ब्राह्मणोंके साथ विधिपूर्वक सर्पोंका अग्निकुण्डमें हवन करने लगा || १६ || तक्षकने देखा कि जनमेजयके सर्प- सत्रकी प्रज्वलित अग्निमें बड़े- बड़े महासर्प भस्म होते जा रहे हैं, तब वह अत्यन्त भयभीत होकर देवराज इन्द्रकी शरणमें गया ॥ १७ ॥ बहुत सर्पोंके भस्म

होनेपर भी तक्षक न आया, यह देखकर परीक्षित्नन्दन राजा जनमेजयने ब्राह्मणोंसे कहा कि ‘ ब्राह्मणो! अबतक सर्पाधम तक्षक क्यों नहीं भस्म हो रहा है? ' ॥१८ ॥ ब्राह्मणोंने कहा

—‘राजेन्द्र! तक्षक इस समय इन्द्रकी शरणमें चला गया है और वे उसकी रक्षा कर रहे हैं । उन्होंने ही तक्षकको स्तम्भित कर दिया है, इसीसे वह अग्निकुण्डमें गिरकर भस्म नहीं हो रहा है ' ॥१९ ॥

पारीक्षित इति श्रुत्वा प्राहर्त्विज उदारधीः ।

सहेन्द्रस्तक्षको विप्रा नाग्नौ किमिति पात्यते ॥२०

तच्छ्रुत्वाऽऽजुहुवुर्विप्राः सहेन्द्रं तक्षकं मखे ।

तक्षकाशु पतस्वेह सहेन्द्रेण मरुत्त्वता ॥२१

इति ब्रह्मोदिताक्षेपैः स्थानादिन्द्रः प्रचालितः ।

बभूव सम्भ्रान्तमतिः सविमानः सतक्षकः ॥२२

तं पतन्तं विमानेन सहतक्षकमम्बरात् ।

विलोक्यांगिरसः प्राह राजानं तं बृहस्पतिः ॥ २३

नैष त्वया मनुष्येन्द्र वधमर्हति सर्पराट् ।

अनेन पीतममृतमथ वा अजरामरः ॥२४

जीवितं मरणं जन्तोर्गतिः स्वेनैव कर्मणा ।

राजंस्ततोऽन्यो नान्यस्य प्रदाता सुखदुःदुःखयोः ॥२५

सर्पचौराग्निविद्युद्भ्यः क्षुत्तृड्व्याध्यादिभिर्नृप ।

पंचत्वमृच्छते जन्तुर्भुङ्क्त आरब्धकर्म तत् ॥२६

तस्मात् सत्रमिदं राजन् संस्थीयेताभिचारिकम् । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1356

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सर्पा अनागसो दग्धा जनैर्दिष्टं हि भुज्यते ॥२७ सूत उवाच

इत्युक्तः स तथेत्याह महर्षेर्मानयन् वचः ।

सर्पसत्रादुपरतः पूजयामास वाक्पतिम् ॥२८

परीक्षित्नन्दन जनमेजय बड़े ही बुद्धिमान् और वीर थे । उन्होंने ब्राह्मणोंकी बात सुनकर ऋत्विजोंसे कहा कि 'ब्राह्मणो! आपलोग इन्द्रके साथ तक्षकको क्यों नहीं अग्निमें गिरा देते? ' ॥२० ॥ जनमेजयकी बात सुनकर ब्राह्मणोंने उस यज्ञमें इन्द्रके साथ तक्षकका

अग्निकुण्डमें आवाहन किया । उन्होंने कहा – ' रे तक्षक! तू मरुद्गणके सहचर इन्द्रके साथ इस अग्निकुण्डमें शीघ्र आ पड़ ' ॥ २१ ॥ जब ब्राह्मणोंने इस प्रकार आकर्षणमन्त्रका पाठ

किया, तब तो इन्द्र अपने स्थान – स्वर्गलोकसे विचलित हो गये । विमानपर बैठे हुए इन्द्र तक्षकके साथ ही बहुत घबड़ा गये और उनका विमान भी चक्कर काटने लगा ॥ २२ ॥

अंगिरानन्दन बृहस्पतिजीने देखा कि आकाशसे देवराज इन्द्र विमान और तक्षकके साथ ही अग्निकुण्डमें गिर रहे हैं; तब उन्होंने राजा जनमेजयसे कहा– || २३ ॥ ‘ नरेन्द्र! सर्पराज तक्षकको मार डालना आपके योग्य काम नहीं है । यह अमृत पी चुका है । इसलिये यह अजर और अमर है ॥२४ ॥

राजन्! जगत्के प्राणी अपने - अपने कर्मके अनुसार ही जीवन, मरण और मरणोत्तर गति प्राप्त करते हैं । कर्मके अतिरिक्त और कोई भी किसीको सुख-दुःख नहीं दे सकता ॥२५ ॥

जनमेजय! यों तो बहुत- से लोगोंकी मृत्यु साँप, चोर, आग, बिजली आदिसे तथा भूख- प्यास, रोग आदि निमित्तोंसे होती है; परन्तु यह तो कहनेकी बात है । वास्तवमें तो सभी प्राणी अपने प्रारब्ध- कर्मका ही उपभोग करते हैं || २६ || राजन्! तुमने बहुत- से निरपराध सर्पोंको जला दिया है । इस अभिचार- यज्ञका फल केवल प्राणियोंकी हिंसा ही है । इसलिये इसे बन्द कर देना चाहिये । क्योंकि जगत्के सभी प्राणी अपने - अपने प्रारब्धकर्मका ही भोग कर रहे हैं ॥२७ ॥

सूतजी कहते हैं - शौनकादि ऋषियो! महर्षि बृहस्पतिजीकी बातका सम्मान करके जनमेजयने कहा कि ' आपकी आज्ञा शिरोधार्य है । ' उन्होंने सर्प- सत्र बंद कर दिया और देवगुरु बृहस्पतिजीकी विधिपूर्वक पूजा की ॥२८ ॥

सैषा विष्णोर्महामायाबाध्ययालक्षणा यया ।

मुह्यन्त्यस्यैवात्मभूता भूतेषु गुणवृत्तिभिः ॥ २ ९

न यत्र दम्भीत्यभया विराजिता मायाऽऽत्मवादेऽसकृदात्मवादिभिः । न यद्विवादो विविधस्तदाश्रयो मनश्च संकल्पविकल्पवृत्ति यत् ॥३० ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1357

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न यत्र सृज्यं सृजतोभयोः परं श्रेयश्च जीवस्त्रिभिरन्वितस्त्वहम् । तदेतदुत्सादितबाध्यबाधकं निषिध्य चोर्मीन् विरमेत् स्वयं मुनिः ॥३१ परं पदं वैष्णवमामनन्ति तद् यन्नेति नेतीत्यतदुत्सिसृक्षवः । विसृज्य दौरात्म्यमनन्यसौहृदा हृदोपगुह्यावसितं समाहितैः ॥३२ ऋषिगण! ( जिससे विद्वान् ब्राह्मणको भी क्रोध आया, राजाको शाप हुआ, मृत्यु हुई, फिर जनमेजयको क्रोध आया, सर्प मारे गये ) यह वही भगवान् विष्णुकी महामाया है । यह अनिर्वचनीय है, इसीसे भगवान्‌के स्वरूपभूत जीव क्रोधादि गुण- वृत्तियोंके द्वारा शरीरोंमें मोहित हो जाते हैं, एक- दूसरेको दुःख देते और भोगते हैं और अपने प्रयत्नसे इसको निवृत्त नहीं कर सकते ॥२९ ॥ ( विष्णुभगवान्‌के स्वरूपका निश्चय करके उनका भजन करनेसे ही

मायासे निवृत्ति होती है; इसलिये उनके स्वरूपका निरूपण सुनो — ) यह दम्भी है, कपटी है —इत्याकारक बुद्धिमें बार-बार जो दम्भ- कपटका स्फुरण होता है, वही माया है । जब आत्मवादी पुरुष आत्मचर्चा करने लगते हैं, तब वह परमात्माके स्वरूपमें निर्भयरूपसे प्रकाशित नहीं होती; किन्तु भयभीत होकर अपना मोह आदि कार्य न करती हुई ही किसी प्रकार रहती है । इस रूपमें उसका प्रतिपादन किया गया है । मायाके आश्रित नाना प्रकारके विवाद, मतवाद भी परमात्माके स्वरूपमें नहीं हैं; क्योंकि वे विशेषविषयक हैं और परमात्मा निर्विशेष है । केवल वाद- विवादकी तो बात ही क्या, लोक- परलोकके विषयोंके सम्बन्धमें संकल्प - विकल्प करनेवाला मन भी शान्त हो जाता है || ३० || कर्म, उसके सम्पादनकी सामग्री और उनके द्वारा साध्यकर्म- इन तीनोंसे अन्वित अहंकारात्मक जीव - यह सब जिसमें नहीं हैं, वह आत्म- स्वरूप परमात्मा न तो कभी किसीके द्वारा बाधित होता है और न तो किसीका विरोधी ही है । जो पुरुष उस परमपदके स्वरूपका विचार करता है, वह मनकी मायामयी लहरों, अहंकार आदिका बाध करके स्वयं अपने आत्मस्वरूपमें विहार करने लगता है ॥ ३१ ॥ जो मुमुक्षु एवं विचारशील पुरुष परमपदके अतिरिक्त वस्तुका परित्याग करते हुए

' नेति - नेति ' के द्वारा उसका निषेध करके ऐसी वस्तु प्राप्त करते हैं, जिसका कभी निषेध नहीं हो सकता और न तो कभी त्याग ही, वही विष्णुभगवान्‌का परमपद है; यह बात सभी महात्मा और श्रुतियाँ एक मतसे स्वीकार करती हैं । अपने चित्तको एकाग्र करनेवाले पुरुष अन्तःकरणकी अशुद्धियोंको, अनात्म- भावनाओंको सदा- सर्वदाके लिये मिटाकर अनन्य प्रेमभावसे परिपूर्ण हृदयके द्वारा उसी परमपदका आलिंगन करते हैं और उसीमें समा जाते हैं ॥ ३२ ॥ विष्णुभगवान्‌का यही वास्तविक स्वरूप है, यही उनका परमपद है । इसकी प्राप्ति

उन्हीं लोगोंको होती है, जिनके अन्तःकरणमें शरीरके प्रति अहंभाव नहीं है और न तो इसके ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1358

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सम्बन्धी गृह आदि पदार्थोंमें ममता ही । सचमुच जगत्की वस्तुओंमें मैंपन और मेरेपनका आरोप बहुत बड़ी दुर्जनता है ॥ ३३ ॥ शौनकजी! जिसे इस परमपदकी प्राप्ति अभीष्ट है, उसे

चाहिये कि वह दूसरोंकी कटु वाणी सहन कर ले और बदलेमें किसीका अपमान न करे । इस क्षणभंगुर शरीरमें अहंता- ममता करके किसी भी प्राणीसे कभी वैर न करे ॥३४ ॥ भगवान्

श्रीकृष्णका ज्ञान अनन्त है। उन्हींके चरणकमलोंके ध्यानसे मैंने इस श्रीमद्भागवत-महापुराणका अध्ययन किया है । मैं अब उन्हींको नमस्कार करके यह पुराण समाप्त करता हूँ ॥३५ ॥

त एतदधिगच्छन्ति विष्णोर्यत् परमं पदम् ।

अहं ममेति दौर्जन्यं न येषां देहगेहजम् ॥३३

अतिवादांस्तितिक्षेत नावमन्येत कंचन ।

न चेमं देहमाश्रित्य वैरं कुर्वीत केनचित् ॥३४

नमो भगवते तस्मै कृष्णायाकुण्ठमेधसे ।

यत्पादाम्बुरुहध्यानात् संहितामध्यगामिमाम् ॥ ३५

शौनक उवाच

पैलादिभिर्व्यासशिष्यैर्वेदाचार्यैर्महात्मभिः ।

वेदाश्च कतिधा व्यस्ता एतत् सौम्याभिधेहि नः ॥३६

सूत उवाच

समाहितात्मनो ब्रह्मन् ब्रह्मणः परमेष्ठिनः ।

हृद्याकाशादभून्नादो वृत्तिरोधाद् विभाव्यते ॥ ३७

यदुपासनया ब्रह्मन् योगिनो मलमात्मनः ।

द्रव्यक्रियाकारकाख्यं धूत्वा यान्त्यपुनर्भवम् ॥३८

शौनकजीने पूछा- साधुशिरोमणि सूतजी! वेदव्यासजीके शिष्य पैल आदि महर्षि बड़े महात्मा और वेदोंके आचार्य थे । उन लोगोंने कितने प्रकारसे वेदोंका विभाजन किया, यह बात आप कृपा करके हमें सुनाइये ॥३६ ॥

सूतजीने कहा- ब्रह्मन्! जिस समय परमेष्ठी ब्रह्माजी पूर्वसृष्टिका ज्ञान सम्पादन करनेके लिये एकाग्रचित्त हुए, उस समय उनके हृदयाकाशसे कण्ठ-तालु आदि स्थानोंके संघर्षसे रहित एक अत्यन्त विलक्षण अनाहत नाद प्रकट हुआ । जब जीव अपनी मनोवृत्तियोंको रोक लेता है, तब उसे भी उस अनाहत नादका अनुभव होता है ॥ ३७ ॥

शौनकजी! बड़े - बड़े योगी उसी अनाहत नादकी उपासना करते हैं और उसके प्रभावसे ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1359

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अन्तःकरणके द्रव्य ( अधिभूत ), क्रिया ( अध्यात्म) और कारक ( अधिदैव) रूप मलको नष्ट करके वह परमगतिरूप मोक्ष प्राप्त करते हैं, जिसमें जन्म- मृत्युरूप संसारचक्र नहीं है ॥३८ ॥

ततोऽभूत्त्रिवृदोङ्कारो योऽव्यक्तप्रभवः स्वराट् ।

यत्तल्लिङ्ग भगवतो ब्रह्मणः परमात्मनः ॥३९

शृणोति य इमं स्फोटं सुप्तश्रोत्रे च शून्यदृक् ।

येन वाग् व्यज्यते यस्य व्यक्तिराकाश आत्मनः ॥४०

स्वधाम्नो ब्रह्मणः साक्षाद् वाचकः परमात्मनः ।

स सर्वमन्त्रोपनिषद्वेदबीजं सनातनम् ॥४१

तस्य ह्यासंस्त्रयो वर्णा अकाराद्या भृगूद्वह धार्यन्ते यैस्त्रयो भावा गुणनामार्थवृत्तयः ॥४२

ततोऽक्षरसमाम्नायमसृजद् भगवानजः ।

अन्तःतःस्थोष्मस्वरस्पर्शह्रस्वदीर्घादिलक्षणम् ॥४३

तेनासौ चतुरो वेदांश्चतुर्भिर्वदनैर्विभुः ।

सव्याहृतिकान् सोंकारांश्चातुर्होत्रविवक्षया ॥४४

पुत्रानध्यापयत्तांस्तु ब्रह्मर्षीन् ब्रह्मकोविदान् ।

ते तु धर्मोपदेष्टारः स्वपुत्रेभ्यः समादिशन् ॥४५

' ', ' ' ' ' युक्त उसी अनाहत नादसे अ कार उ कार और म काररूप तीन मात्राओंसे ॐकार प्रकट हुआ । इस ॐकारकी शक्तिसे ही प्रकृति अव्यक्तसे व्यक्तरूपमें परिणत हो जाती है । ॐकार स्वयं भी अव्यक्त एवं अनादि है और परमात्म - स्वरूप होनेके कारण स्वयंप्रकाश भी है । जिस परम वस्तुको भगवान् ब्रह्म अथवा परमात्माके नामसे कहा जाता है, उसके स्वरूपका बोध भी ॐ कारके द्वारा ही होता है ॥ ३ ९ ॥ जब श्रवणेन्द्रियकी शक्ति लुप्त हो जाती है, तब भी इस ॐकारको - समस्त अर्थोंको प्रकाशित करनेवाले स्फोट तत्त्वको जो सुनता है और सुषुप्ति एवं समाधि अवस्थाओंमें सबके अभावको भी जानता है, वही परमात्माका विशुद्ध स्वरूप है । वही ॐकार परमात्मासे हृदयाकाशमें प्रकट होकर वेदरूपा वाणीको अभिव्यक्त करता है || ४० || ॐकार अपने आश्रय परमात्मा परब्रह्मका साक्षात् वाचक है और ॐकार ही सम्पूर्ण मन्त्र, उपनिषद् और वेदोंका सनातन बीज है ॥४१ ॥

शौनकजी! ॐकारके तीन वर्ण हैं –' अ', 'उ', और ' म' । ये ही तीनों वर्ण सत्त्व, रज, तम ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1360

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-–इन तीन गुणों; ऋक्, यजुः, साम– इन तीन नामों; भूः भुवः स्वः – इन तीन अर्थों और जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति- इन तीन वृत्तियोंके रूपमें तीन- तीनकी संख्यावाले भावोंको धारण करते हैं ॥४२ ॥ इसके बाद सर्वशक्तिमान् ब्रह्माजीने ॐकारसे ही अन्तःस्थ ( य, र, ल, व ),

ऊष्म ( श, ष, स, ह ), स्वर ( ' अ' से ' औ' तक ), स्पर्श ( ' क ' से ' म ' तक) तथा ह्रस्व और दीर्घ आदि लक्षणोंसे युक्त अक्षर- समाम्नाय अर्थात् वर्णमालाकी रचना की ॥४३ ॥ उसी

वर्णमालाद्वारा उन्होंने अपने चार मुखोंसे होता, अध्वर्यु, उद्गाता और ब्रह्मा–इन चार ऋत्विजोंके कर्म बतलानेके लिये ॐकार और व्याहृतियोंके सहित चार वेद प्रकट किये और अपने पुत्र ब्रह्मर्षि मरीचि आदिको वेदाध्ययनमें कुशल देखकर उन्हें वेदोंकी शिक्षा दी । वे सभी जब धर्मका उपदेश करनेमें निपुण हो गये, तब उन्होंने अपने पुत्रोंको उनका अध्ययन कराया ॥४४-४५ ॥

ते परम्परया प्राप्तास्तत्तच्छिष्यैर्धृतव्रतैः ।

चतुर्युगेष्वथ व्यस्ता द्वापरादौ महर्षिभिः ॥४६

क्षीणायुषः क्षीणसत्त्वान् दुर्मेधान् वीक्ष्य कालतः ।

वेदान् ब्रह्मर्षयो व्यस्यन् हृदिस्थाच्युतचोदिताः ॥४७

अस्मिन्नप्यन्तरे ब्रह्मन् भगवाँल्लोकभावनः ।

ब्रह्मेशाद्यैर्लोकपालैर्याचितो धर्मगुप्तये ॥ ४८

पराशरात् सत्यवत्यामंशांशकलया विभुः ।

अवतीर्णो महाभाग वेदं चक्रे चतुर्विधम् ॥४९

ऋगथर्वयजुःसाम्नां राशीनुद्धृत्य वर्गशः ।

चतस्रः संहिताश्चक्रे मन्त्रैर्मणिगणा इव ॥५०

तासां स चतुरः शिष्यानुपाहूय महामतिः ।

एकैकां संहितां ब्रह्मन्नेकैकस्मै ददौ विभुः ॥ ५१

पैलाय संहितामाद्यां बहृचाख्यामुवाच ह ।

वैशम्पायनसंज्ञाय निगदाख्यं यजुर्गणम् ॥५२

साम्नां जैमिनये प्राह तथा छन्दोगसंहिताम् ।

अथर्वांगिरसीं नाम स्वशिष्याय सुमन्तवे ॥५३

पैलः स्वसंहितामूचे इन्द्रप्रमितये मुनिः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******