श्रीगणेशाय नमः।
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 1361–1370
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1361–1370
पृष्ठ 1361
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
बाष्कलाय च सोऽप्याह शिष्येभ्यः संहितां स्वकाम् ॥५४
चतुर्धा व्यस्य बोध्याय याज्ञवल्क्याय भार्गव ।
पराशरायाग्निमित्रे इन्द्रप्रमितिरात्मवान् ॥५५
अध्यापयत् संहितां स्वां माण्डूकेयमृषिं कविम् ।
तस्य शिष्यो देवमित्रः सौभर्यादिभ्य ऊचिवान् ॥५६
तदनन्तर, उन्हीं लोगोंके नैष्ठिक ब्रह्मचारी शिष्य- प्रशिष्योंके द्वारा चारों युगोंमें सम्प्रदायके रूपमें वेदोंकी रक्षा होती रही । द्वापरके अन्तमें महर्षियोंने उनका विभाजन भी किया || ४६ ॥ जब ब्रह्मवेत्ता ऋषियोंने देखा कि समयके फेरसे लोगोंकी आयु, शक्ति और बुद्धि क्षीण हो गयी है, तब उन्होंने अपने हृदय देशमें विराजमान परमात्माकी प्रेरणासे वेदोंके अनेकों विभाग कर दिये ॥४७ ॥
शौनकजी! इस वैवस्वत मन्वन्तरमें भी ब्रह्मा - शंकर आदि लोकपालोंकी प्रार्थनासे अखिल विश्वके जीवनदाता भगवान्ने धर्मकी रक्षाके लिये महर्षि पराशरद्वारा सत्यवतीके गर्भसे अपने अंशांश- कलास्वरूप व्यासके रूपमें अवतार ग्रहण किया है । परम भाग्यवान् शौनकजी! उन्होंने ही वर्तमान युगमें वेदके चार विभाग किये हैं ॥ ४८-४९ ॥ जैसे मणियोंके समूहमेंसे विभिन्न जातिकी मणियाँ छाँटकर अलग- अलग कर दी जाती हैं, वैसे ही महामति भगवान् व्यासदेवने मन्त्र- समुदायमेंसे भिन्न - भिन्न प्रकरणोंके अनुसार मन्त्रोंका संग्रह करके उनसे ऋग्, यजुः, साम और अथर्व – ये चार संहिताएँ बनायीं और अपने चार शिष्योंको बुलाकर प्रत्येकको एक- एक संहिताकी शिक्षा दी ॥ ५०-५१ ॥ उन्होंने 'बहृच्' नामकी पहली ऋक्संहिता पैलको, ' निगद' नामकी दूसरी यजुः संहिता वैशम्पायनको, सामश्रुतियोंकी ‘ छन्दोग - संहिता’ जैमिनिको और अपने शिष्य सुमन्तुको ' अथर्वांगिरससंहिता ' का अध्ययन कराया ॥५२-५३ ॥ शौनकजी! पैल मुनिने अपनी संहिताके दो विभाग करके एकका अध्ययन इन्द्रप्रमितिको और दूसरेका बाष्कलको कराया । बाष्कलने भी अपनी शाखाके चार विभाग करके उन्हें अलग- अलग अपने शिष्य बोध, याज्ञवल्क्य, पराशर और अग्निमित्रको पढ़ाया । परमसंयमी इन्द्र- प्रमितिने प्रतिभाशाली माण्डूकेय ऋषिको अपनी संहिताका अध्ययन कराया । माण्डूकेयके शिष्य थे— देवमित्र । उन्होंने सौभरि आदि ऋषियोंको वेदोंका अध्ययन कराया ॥५४-५६ ॥ शाकल्यस्तत्सुतः स्वां तु पंचधा व्यस्य संहिताम् वात्स्यमुद्गलशालीयगोखल्यशिशिरेष्वधात् ॥५७
जातूकर्ण्यश्च तच्छिष्यः सनिरुक्तां स्वसंहिताम् ।
बलाकपैजवैतालविरजेभ्यो ददौ मुनिः ॥५८
पृष्ठ 1362
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
बाष्कलिः प्रतिशाखाभ्यो वालखिल्याख्यसंहिताम् ।
चक्रे बालायनिर्भज्यः कासारश्चैव तां दधुः ॥ ५ ९
बचाः संहिता ह्येता एभिर्ब्रह्मर्षिभिर्धृताः ।
श्रुत्वैतच्छन्दसां व्यासं सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥६०
वैशम्पायनशिष्या वै चरकाध्वर्यवोऽभवन् ।
यच्चेरुर्ब्रह्महत्यांहःक्षपणं स्वगुरोर्व्रतम् ॥६१
याज्ञवल्क्यश्च तच्छिष्य आहाहो भगवन् कियत् ।
चरितेनाल्पसाराणां चरिष्येऽहं सुदुश्चरम् ॥६२
इत्युक्तो गुरुरप्याह कुपितो याह्यलं त्वया ।
विप्रावमन्त्रा शिष्येण मदधीतं त्यजाश्विति ॥६३
देवरातसुतः सोऽपिच्छर्दित्वा यजुषां गणम् ।
ततो गतोऽथ मुनयो ददृशुस्तान् यजुर्गणान् ॥६४
यजूंषि तित्तिरा भूत्वा तल्लोलुपतयाऽऽददुः ।
तैत्तिरीया इति यजुःशाखा आसन् सुपेशलाः ॥६५
माण्डूकेयके पुत्रका नाम था शाकल्य । उन्होंने अपनी संहिताके पाँच विभाग करके उन्हें वात्स्य, मुद्गल, शालीय, गोखल्य और शिशिर नामक शिष्योंको पढ़ाया ॥५७ ॥ शाकल्यके
एक और शिष्य थे — जातूकर्ण्यमुनि । उन्होंने अपनी संहिताके तीन विभाग करके तत्सम्बन्धी निरुक्तके साथ अपने शिष्य बलाक, पैज, वैताल और विरजको पढ़ाया ॥५८ ॥ बाष्कलके
पुत्र बाष्कलिने सब शाखाओंसे एक ' वालखिल्य' नामकी शाखा रची । उसे बालायनि, भज्य एवं कासारने ग्रहण किया ॥ ५ ९ ॥ इन ब्रह्मर्षियोंने पूर्वोक्त सम्प्रदायके अनुसार ऋग्वेदसम्बन्धी बह्वच शाखाओंको धारण किया । जो मनुष्य यह वेदोंके विभाजनका इतिहास श्रवण करता है, वह सब पापोंसे छूट जाता है ॥ ६० ॥
शौनकजी! वैशम्पायनके कुछ शिष्योंका नाम था चरकाध्वर्यु । इन लोगोंने अपने गुरुदेवके ब्रह्महत्या - जनित पापका प्रायश्चित्त करनेके लिये एक व्रतका अनुष्ठान किया । इसीलिये इनका नाम ‘ चरकाध्वर्यु’ पड़ा ॥६१ ॥ वैशम्पायनके एक शिष्य याज्ञवल्क्यमुनि भी थे । उन्होंने अपने
गुरुदेवसे कहा– ' अहो भगवन्! ये चरकाध्वर्यु ब्राह्मण तो बहुत ही थोड़ी शक्ति रखते हैं । इनके व्रतपालनसे लाभ ही कितना है? मैं आपके प्रायश्चित्तके लिये बहुत ही कठिन तपस्या करूँगा' ॥६२ ॥ याज्ञवल्क्यमुनिकी यह बात सुनकर वैशम्पायनमुनिको क्रोध आ गया ।
उन्होंने कहा— ‘ बस- बस', चुप रहो । तुम्हारे - जैसे ब्राह्मणोंका अपमान करनेवाले शिष्यकी
पृष्ठ 1363
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
मुझे कोई आवश्यकता नहीं है । देखो, अबतक तुमने मुझसे जो कुछ अध्ययन किया है उसका शीघ्र- से - शीघ्र त्याग कर दो और यहाँसे चले जाओ ॥ ६३ ॥ याज्ञवल्क्यजी देवरातके पुत्र थे ।
उन्होंने गुरुजीकी आज्ञा पाते ही उनके पढ़ाये हुए यजुर्वेदका वमन कर दिया और वे वहाँसे चले गये । जब मुनियोंने देखा कि याज्ञवल्क्यने तो यजुर्वेदका वमन कर दिया, तब उनके चित्तमें इस बातके लिये बड़ा लालच हुआ कि हमलोग किसी प्रकार इसको ग्रहण कर लें । परन्तु ब्राह्मण होकर उगले हुए मन्त्रोंको ग्रहण करना अनुचित है, ऐसा सोचकर वे तीतर बन गये और उस संहिताको चुग लिया । इसीसे यजुर्वेदकी वह परम रमणीय शाखा ' तैत्तिरीय ' के नामसे प्रसिद्ध हुई ॥६४-६५ ॥ शौनकजी! अब याज्ञवल्क्यने सोचा कि मैं ऐसी श्रुतियाँ प्राप्त करूँ, जो मेरे गुरुजीके पास भी न हों । इसके लिये वे सूर्यभगवान्का उपस्थान करने लगे || ६६ ||
याज्ञवल्क्यस्ततो ब्रह्मन् छन्दांस्यधिगवेषयन् ।
गुरोरविद्यमानानि सूपतस्थेऽर्कमीश्वरम् ॥६६
याज्ञवल्क्य उवाच - मात्मस्वरूपेण कालस्वरूपेण ॐ नमो भगवते आदित्यायाखिलजगता चाकाश बहिरपिचतुर्विधभूतनि-कायानां ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तानामन्तर्हृदयेषु इवोपाधिनाव्यवधीयमानो भवानेक एव क्षणलवनिमेषावयवोपचितसंवत्सरगणेनापा-मादानविसर्गाभ्यामिमां लोकयात्रामनुवहति ॥ ६७ ॥
यदु ह वाव विबुधर्षभ सवितरदस्तपत्यनुसवन- भगवतःमहरहराम्नायविधिनोपतिष्ठमानानामखिलदुरित - वृजिनबीजावभर्जन समभिधीमहि तपनमण्डलम् ॥ ६८ ॥ य इह वाव स्थिरचर-निकराणां
निजनिकेतनानां मनइन्द्रियासुगणा - ननात्मनः स्वयमात्मान्तर्यामी प्रचोदयति ॥ ६ ९ ॥ -य लोकमतिकरालवदनान्धकारसंज्ञाजगर ग्रहगिलितं मृतकमिवविचेतनमवलोक्यानु - कम्पया परमकारुणिक ईक्षयैवोत्थाप्याहरह - रनुसवनं श्रेयसि स्वधर्माख्यात्मावस्थाने प्रवर्तय - त्यवनिपतिरिवासाधूनां भयमुदीरयन्नटति ॥ ७० ॥
परित आशापालैस्तत्र तत्र कमलकोशाञ्जलिभि रुपहृतार्हणः ॥ ७१ ॥ अथ ह -भगवंस्तव चरण नलिनयुगलं त्रिभुवनगुरुभिर्वन्दितमहमयातयाम यजुःकामउपसरामीति ॥ ७२ ॥
याज्ञवल्क्यजी इस प्रकार उपस्थान करते हैं - मैं ॐकारस्वरूप भगवान् सूर्यको नमस्कार करता हूँ। आप सम्पूर्ण जगत्के आत्मा और कालस्वरूप हैं । ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त जितने भी जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज -चार प्रकारके प्राणी हैं, उन सबके हृदयदेशमें और बाहर आकाशके समान व्याप्त रहकर भी आप उपाधिके धर्मोंसे असंग रहनेवाले अद्वितीय भगवान् ही हैं । आप ही क्षण, लव, निमेष आदि अवयवोंसे संघटित संवत्सरोंके द्वारा एवं जलके आकर्षण -विकर्षण - आदान-प्रदानके द्वारा समस्त लोकोंकी
पृष्ठ 1364
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
जीवनयात्रा चलाते हैं ॥६७ ॥ प्रभो! आप समस्त देवताओंमें श्रेष्ठ हैं । जो लोग प्रतिदिन तीनों
समय वेद - विधिसे आपकी उपासना करते हैं, उनके सारे पाप और दुःखोंके बीजोंको आप भस्म कर देते हैं । सूर्यदेव! आप सारी सृष्टिके मूल कारण एवं समस्त ऐश्वर्योंके स्वामी हैं । इसलिये हम आपके इस तेजोमय मण्डलका पूरी एकाग्रताके साथ ध्यान करते हैं ॥ ६८ ॥
आप सबके आत्मा और अन्तर्यामी हैं । जगत्में जितने चराचर प्राणी हैं, सब आपके ही आश्रित हैं । आप ही उनके अचेतन मन, इन्द्रिय और प्राणोंके प्रेरक हैं * ॥ ६ ९ ॥ यह लोक प्रतिदिन अन्धकाररूप अजगरके विकराल मुँहमें पड़कर अचेत और मुर्दा - सा हो जाता है । आप परम करुणास्वरूप हैं, इसलिये कृपा करके अपनी दृष्टिमात्रसे ही इसे सचेत कर देते हैं और परम कल्याणके साधन समय - समयके धर्मानुष्ठानोंमें लगाकर आत्माभिमुख करते हैं । जैसे राजा दुष्टोंको भयभीत करता हुआ अपने राज्यमें विचरण करता है, वैसे ही आप चोर-जार आदि दुष्टोंको भयभीत करते हुए विचरते रहते हैं ॥७० ॥ चारों ओर सभी दिक्पाल
स्थान- स्थानपर अपनी कमलकी कलीके समान अंजलियोंसे आपको उपहार समर्पित करते हैं ॥७१ ॥ भगवन्! आपके दोनों चरणकमल तीनों लोकोंके गुरु-सदृश महानुभावोंसे भी
वन्दित हैं। मैंने आपके युगल चरणकमलोंकी इसलिये शरण ली है कि मुझे ऐसे यजुर्वेदकी प्राप्ति हो, जो अबतक किसीको न मिला हो ॥७२ ॥
सूत उवाच
एवं स्तुतः स भगवान् वाजिरूपधरो हरिः ।
यजूंष्ययातयामानि मुनयेऽदात् प्रसादितः ॥७३
यजुर्भिरकरोच्छाखा दशपंच शतैर्विभुः ।
जगृहुर्वाजसन्यस्ताः काण्वमाध्यन्दिनादयः ॥ ७४
जैमिनेः सामगस्यासीत् सुमन्तुस्तनयो मुनिः ।
सुन्वांस्तु तत्सुतस्ताभ्यामेकैकां प्राह संहिताम् ॥७५
सुकर्मा चापि तच्छिष्यः सामवेदतरोर्महान् ।
सहस्रसंहिताभेदं चक्रे साम्नां ततो द्विजः ॥७६
हिरण्यनाभः कौसल्यः पौष्यंजिश्च सुकर्मणः ।
शिष्यौ जगृहतुश्चान्य आवन्त्यो ब्रह्मवित्तमः ॥७७
उदीच्याः सामगाः शिष्या आसन् पंचशतानि वै ।
पौष्यञ्ज्यावन्त्ययोश्चापि तांश्च प्राच्यान् प्रचक्षते ॥७८
लौगाक्षिर्मांगलिः कुल्यः कुसीदः कुक्षिरेव च ।
पृष्ठ 1365
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
पौष्यंजिशिष्या जगृहुः संहितास्ते शतं शतम् ॥७९
कृतो हिरण्यनाभस्य चतुर्विंशतिसंहिताः ।
शिष्य ऊचे स्वशिष्येभ्यः शेषा आवन्त्य आत्मवान् ॥८०
सूतजी कहते हैं - शौकनादि ऋषियो! जब याज्ञवल्क्यमुनिने भगवान् सूर्यकी इस प्रकार स्तुति की, तब वे प्रसन्न होकर उनके सामने अश्वरूपसे प्रकट हुए और उन्हें यजुर्वेदके उन मन्त्रोंका उपदेश किया, जो अबतक किसीको प्राप्त न हुए थे ॥ ७३ ॥ इसके बाद
याज्ञवल्क्यमुनिने यजुर्वेदके असंख्य मन्त्रोंसे उसकी पंद्रह शाखाओंकी रचना की । वही वाजसनेय शाखाके नामसे प्रसिद्ध हैं । उन्हें कण्व, माध्यन्दिन आदि ऋषियोंने ग्रहण किया ॥७४ ॥
यह बात मैं पहले ही कह चूका हूँ कि महर्षि श्रीकृष्ण द्वैपायनने जैमिनिमुनिको सामसंहिताका अध्ययन कराया । उनके पुत्र थे सुमन्तुमुनि और पौत्र थे सुन्वान् । जैमिनिमुनिने अपने पुत्र और पौत्रको एक-एक संहिता पढ़ायी ॥७५ ॥ जैमिनिमुनिके एक शिष्यका नाम था
सुकर्मा । वह एक महान् पुरुष था । जैसे एक वृक्षमें बहुत- सी डालियाँ होती हैं, वैसे ही सुकर्माने सामवेदकी एक हजार संहिताएँ बना दीं ॥ ७६ ॥ सुकर्माके शिष्य कोसलदेशनिवासी
हिरण्यनाभ, पौष्यंजि और ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ आवन्त्यने उन शाखाओंको ग्रहण किया ॥७७ ॥ पौष्यंजि और आवन्त्यके पाँच सौ शिष्य थे । वे उत्तर दिशाके निवासी होनेके
कारण औदीच्य सामवेदी कहलाते थे । उन्हींको प्राच्य सामवेदी भी कहते हैं । उन्होंने एक-एक संहिताका अध्ययन किया ॥७८ ॥ पौष्यंजिके और भी शिष्य थे— लौगाक्षि, मांगलि, कुल्य,
कुसीद और कुक्षि । इसमेंसे प्रत्येकने सौ-सौ संहिताओंका अध्ययन किया ॥ ७९॥
हिरण्यनाभका शिष्य था-कृत । उसने अपने शिष्योंको चौबीस संहिताएँ पढ़ायीं । शेष संहिताएँ परम संयमी आवन्त्यने अपने शिष्योंको दीं । इस प्रकार सामवेदका विस्तार हुआ ॥८० ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां द्वादशस्कन्धे वेदशाखाप्रणयनं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥६ ॥
* ६७, ६८, ६ ९ – इन तीनों वाक्योंद्वारा क्रमशः गायत्रीमन्त्रके ' तत्सवितुर्वरेण्यम्,’ ‘ भर्गो देवस्य धीमहि ’ और ‘ धियो यो नः प्रचोदयात्' – इन तीन चरणोंकी व्याख्या करते हुए भगवान् सूर्यकी स्तुति की गयी है ।
पृष्ठ 1366
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
पृष्ठ 1367
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अथ सप्तमोऽध्यायः अथर्ववेदकी शाखाएँ और पुराणोंके लक्षण सूत उवाच
अथर्ववित् सुमन्तुश्च शिष्यमध्यापयत् स्वकाम् ।
संहितां सोऽपि पथ्याय वेददर्शाय चोक्तवान् ॥ १
शौक्लायनिर्ब्रह्मबलिर्मोदोषः पिप्पलायनिः ।
वेददर्शस्य शिष्यास्ते पथ्यशिष्यानथो शृणु ॥२
कुमुदः शुनको ब्रह्मन् जाजलिश्चाप्यथर्ववित् ।
बभ्रुः शिष्योऽथांगिरसः सैन्धवायन एव च ।
अधीयेतां संहिते द्वे सावर्ण्याद्यास्तथापरे ॥३
नक्षत्रकल्पः शान्तिश्च कश्यपांगिरसादयः ।
एते आथर्वणाचार्याः शृणु पौराणिकान् मुने ॥४
त्रय्यारुणिः कश्यपश्च सावर्णिरकृतव्रणः ।
वैशम्पायन हारीतौ षड् वै पौराणिका इमे ॥५
अधीयन्त व्यासशिष्यात् संहितां मत्पितुर्मुखात् ।
एकैकामहमेतेषां शिष्यः सर्वाः समध्यगाम् ॥६
कश्यपोऽहं च सावर्णी रामशिष्योऽकृतव्रणः ।
अधीमहि व्यासशिष्याच्चतस्रो मूलसंहिताः ॥७
पुराणलक्षणं ब्रह्मन् ब्रह्मर्षिभिर्निरूपितम् ।
शृणुष्व बुद्धिमाश्रित्य वेदशास्त्रानुसारतः ॥८
सर्गोऽस्याथ विसर्गश्च वृत्ती रक्षान्तराणि च ।
वंशो वंशानुचरितं संस्था हेतुरपाश्रयः ॥ ९
दशभिर्लक्षणैर्युक्तं पुराणं तद्विदो विदुः ।
केचित् पंचविधं ब्रह्मन् महदल्पव्यवस्थया ॥ १०
सूतजी कहते हैं - शौनकादि ऋषियो! मैं कह चुका हूँ कि अथर्ववेदके ज्ञाता सुमन्तुमुनि थे । उन्होंने अपनी संहिता अपने प्रिय शिष्य कबन्धको पढ़ायी । कबन्धने उस संहिताके दो भाग करके पथ्य और वेद - दर्शको उसका अध्ययन कराया || १ || वेददर्शके चार शिष्य हुए-शौक्लायनि, ब्रह्मबलि, मोदोष और पिप्पलायनि । अब पथ्यके शिष्योंके नाम सुनो || २ ||
पृष्ठ 1368
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
शौनकजी! पथ्यके तीन शिष्य थे - कुमुद, शुनक और अथर्ववेत्ता जाजलि । अंगिरा- गोत्रोत्पन्न शुनकके दो शिष्य थे— बभ्रु और सैन्धवायन । उन लोगोंने दो संहिताओंका अध्ययन किया । अथर्ववेदके आचार्योंमें इनके अतिरिक्त सैन्धवायनादिके शिष्य सावर्ण्य आदि तथा नक्षत्रकल्प, शान्ति, कश्यप, आंगिरस आदि कई विद्वान् और भी हुए । अब मैं तुम्हें पौराणिकोंके सम्बन्धमें सुनाता हूँ ॥३-४ ॥ शौनकजी! पुराणोंके छः आचार्य प्रसिद्ध हैं - त्रय्यारुणि, कश्यप, सावर्णि, अकृतव्रण, वैशम्पायन और हारीत ॥५ ॥ इन लोगोंने मेरे पिताजीसे एक -एक पुराणसंहिता पढ़ी थी और
मेरे पिताजीने स्वयं भगवान् व्याससे उन संहिताओंका अध्ययन किया था । मैंने उन छहों आचार्योंसे सभी संहिताओंका अध्ययन किया था ॥६ ॥ उन छः संहिताओंके अतिरिक्त और
भी चार मूल संहिताएँ थीं । उन्हें भी कश्यप, सावर्णि, परशुरामजीके शिष्य अकृतव्रण और उन सबके साथ मैंने व्यासजीके शिष्य श्रीरोमहर्षणजीसे, जो मेरे पिता थे, अध्ययन किया था ॥७ ॥
शौनकजी! महर्षियोंने वेद और शास्त्रोंके अनुसार पुराणोंके लक्षण बतलाये हैं । अब तुम स्वस्थ होकर सावधानीसे उनका वर्णन सुनो ॥८ ॥ शौनकजी! पुराणोंके पारदर्शी विद्वान्
बतलाते हैं कि पुराणोंके दस लक्षण हैं - विश्वसर्ग, विसर्ग, वृत्ति, रक्षा, मन्वन्तर, वंश, वंशानुचरित, संस्था ( प्रलय), हेतु ( ऊति) और अपाश्रय । कोई -कोई आचार्य पुराणोंके पाँच ही लक्षण मानते हैं । दोनों ही बातें ठीक हैं, क्योंकि महापुराणोंमें दस लक्षण होते हैं और छोटे पुराणोंमें पाँच । विस्तार करके दस बतलाते हैं और संक्षेप करके पाँच ॥९ -१० ॥ ( अब इनके लक्षण सुनो) जब मूल प्रकृतिमें लीन गुण क्षुब्ध होते हैं, तब महत्तत्त्वकी उत्पत्ति होती है । महत्तत्त्वसे तामस, राजस और वैकारिक ( सात्त्विक )— तीन प्रकारके अहंकार बनते हैं । त्रिविध अहंकारसे ही पंचतन्मात्रा, इन्द्रिय और विषयोंकी उत्पत्ति होती है । इसी उत्पत्तिक्रमका नाम ‘ सर्ग’ है ॥११ ॥ परमेश्वरके अनुग्रहसे सृष्टिका सामर्थ्य प्राप्त करके महत्तत्त्व आदि
पूर्वकर्मोंके अनुसार अच्छी और बुरी वासनाओंकी प्रधानतासे जो यह चराचर शरीरात्मक जीवकी उपाधिकी सृष्टि करते हैं, एक बीजसे दूसरे बीजके समान, इसीको विसर्ग कहते हैं ॥१२ ॥ चर प्राणियोंकी अचर-पदार्थ ' वृत्ति' अर्थात् जीवन- निर्वाहकी सामग्री है । चर
प्राणियोंके दुग्ध आदि भी इनमेंसे मनुष्योंने कुछ तो स्वभाववश कामनाके अनुसार निश्चित कर ली है और कुछने शास्त्रके आज्ञानुसार ॥१३ ॥
अव्याकृतगुणक्षोभान्महतस्त्रिवृतोऽहमः ।
भूतमात्रेन्द्रियार्थानां सम्भवः सर्ग उच्यते ॥११
पुरुषानुगृहीतानामेतेषां वासनामयः ।
विसर्गोऽयं समाहारो बीजाद् बीजं चराचरम् ॥१२
वृत्तिर्भूतानि भूतानां चराणामचराणि च ।
पृष्ठ 1369
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
कृता स्वेन नृणां तत्र कामाच्चोदनयापि वा ॥१३
रक्षाच्युतावतारेहा विश्वस्यानु युगे युगे ।
तिर्यङ्मर्त्यर्षिदेवेषु हन्यन्ते यैस्त्रयीद्विषः ॥ १४
मन्वन्तरं मनुर्देवा मनुपुत्राः सुरेश्वरः ।
ऋषयोंऽशावतारश्च हरेः षड्विधमुच्यते ॥ १५
राज्ञां ब्रह्मप्रसूतानां वंशस्त्रैकालिकोऽन्वयः ।
वंशानुचरितं तेषां वृत्तं वंशधराश्च ये ॥१६
नैमित्तिकः प्राकृतिको नित्य आत्यन्तिको लयः ।
संस्थेति कविभिः प्रोक्ता चतुर्धास्य स्वभावतः ॥१७
हेतुर्जीवोऽस्य सर्गादेरविद्याकर्मकारकः ।
यं चानुशयिनं प्राहुरव्याकृतमुतापरे ॥१८
भगवान् युग- युगमें पशु - पक्षी, मनुष्य, ऋषि, देवता आदिके रूपमें अवतार ग्रहण करके अनेकों लीलाएँ करते हैं । इन्हीं अवतारोंमें वे वेदधर्मके विरोधियोंका संहार भी करते हैं । उनकी यह अवतार- लीला विश्वकी रक्षाके लिये ही होती है, इसीलिये उसका नाम ' रक्षा ' है ॥१४ ॥
मनु, देवता, मनुपुत्र, इन्द्र, सप्तर्षि और भगवान्के अंशावतार- इन्हीं छः बातोंकी विशेषतासे युक्त समयको ‘ मन्वन्तर' कहते हैं ॥ १५॥ ब्रह्माजीसे जितने राजाओंकी सृष्टि हुई है, उनकी
भूत, भविष्य और वर्तमानकालीन सन्तान- परम्पराको ' वंश ' कहते हैं । उन राजाओंके तथा उनके वंशधरोंके चरित्रका नाम ' वंशानुचरित' है ॥ १६ ॥ इस विश्वब्रह्माण्डका स्वभावसे ही
प्रलय हो जाता है । उसके चार भेद हैं- नैमित्तिक, प्राकृतिक, नित्य और आत्यन्तिक । तत्त्वज्ञ विद्वानोंने इन्हींको ‘ संस्था ' कहा है ॥ १७ ॥ पुराणोंके लक्षणमें ' हेतु ' नामसे जिसका व्यवहार
होता है, वह जीव ही है; क्योंकि वास्तवमें वही सर्ग- विसर्ग आदिका हेतु है और अविद्यावश अनेकों प्रकारके कर्मकलापमें उलझ गया है । जो लोग उसे चैतन्यप्रधानकी दृष्टिसे देखते हैं, वे उसे अनुशयी अर्थात् प्रकृतिमें शयन करनेवाला कहते हैं; और जो उपाधिकी दृष्टिसे कहते हैं, वे उसे अव्याकृत अर्थात् प्रकृतिरूप कहते हैं ॥१८ ॥
व्यतिरेकान्वयो यस्य जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिषु ।
मायामयेषु तद् ब्रह्म जीववृत्तिष्वपाश्रयः ॥ १ ९
पदार्थेषु यथा द्रव्यं सन्मात्रं रूपनामसु ।
बीजादिपंचतान्तासु ह्यवस्थासु युतायुतम् ॥२०
पृष्ठ 1370
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
विरमेत यदा चित्तं हित्वा वृत्तित्रयं स्वयम् ।
योगेन वा तदाऽऽत्मानं वेदेहाया निवर्तते ॥२१
एवंलक्षणलक्ष्याणि पुराणानि पुराविदः ।
मुनयोऽष्टादश प्राहुः क्षुल्लकानि महान्ति च ॥ २२
ब्राह्मं पाद्मं वैष्णवं च शैवं लैंगं सगारुडम् ।
नारदीयं भागवतमाग्नेयं स्कान्दसंज्ञितम् ॥२३
भविष्यं ब्रह्मवैवर्तं मार्कण्डेयं सवामनम् ।
वाराहं मात्स्यं कौर्मं च ब्रह्माण्डाख्यमिति त्रिषट् ॥२४
ब्रह्मन्निदं समाख्यातं शाखाप्रणयनं मुनेः ।
शिष्यशिष्यप्रशिष्याणां ब्रह्मतेजोविवर्धनम् ॥ २५
जीवकी वृत्तियोंके तीन विभाग हैं -जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति । जो इन अवस्थाओंमें इनके अभिमानी विश्व, तैजस और प्राज्ञके मायामय रूपोंमें प्रतीत होता है और इन अवस्थाओंसे परे तुरीयतत्त्वके रूपमें भी लक्षित होता है, वही ब्रह्म है; उसीको यहाँ ‘ अपाश्रय' शब्दसे कहा गया है ॥ १ ९ ॥ नामविशेष और रूपविशेषसे युक्त पदार्थोंपर विचार करें तो वे सत्तामात्र वस्तुके रूपमें सिद्ध होते हैं । उनकी विशेषताएँ लुप्त हो जाती हैं । असलमें वह सत्ता ही उन विशेषताओंके रूपमें प्रतीत भी हो रही है और उनसे पृथक् भी है । ठीक इसी न्यायसे शरीर और विश्वब्रह्माण्डकी उत्पत्तिसे लेकर मृत्यु और महाप्रलयपर्यन्त जितनी भी विशेष अवस्थाएँ हैं, उनके रूपमें परम सत्यस्वरूप ब्रह्म ही प्रतीत हो रहा है और वह उनसे सर्वथा पृथक् भी है । यही वाक्य भेदसे अधिष्ठान और साक्षीके रूपमें ब्रह्म ही पुराणोक्त आश्रयतत्त्व है ॥२० ॥ जब चित्त स्वयं आत्मविचार अथवा योगाभ्यासके द्वारा सत्त्वगुण-रजोगुण -तमोगुण सम्बन्धी व्यावहारिक वृत्तियों और जाग्रत्-स्वप्न आदि स्वाभाविक
वृत्तियोंका त्याग करके उपराम हो जाता है, तब शान्तवृत्तिमें ' तत्त्वमसि ' आदि महावाक्योंके द्वारा आत्मज्ञानका उदय होता है । उस समय आत्मवेत्ता पुरुष अविद्याजनित कर्म- वासना और कर्मप्रवृत्तिसे निवृत्त हो जाता है ॥ २१ ॥
शौनकादि ऋषियो! पुरातत्त्ववेत्ता ऐतिहासिक विद्वानोंने इन्हीं लक्षणोंके द्वारा पुराणोंकी यह पहचान बतलायी है । ऐसे लक्षणोंसे युक्त छोटे - बड़े अठारह पुराण हैं || २२ || उनके नाम ये हैं –ब्रह्मपुराण, पद्मपुराण, विष्णुपुराण, शिवपुराण, लिंगपुराण, गरुडपुराण, नारदपुराण, भागवतपुराण, अग्निपुराण, स्कन्दपुराण, भविष्यपुराण, ब्रह्मवैवर्तपुराण, मार्कण्डेयपुराण, वामनपुराण, वराहपुराण, मत्स्यपुराण, कूर्मपुराण और ब्रह्माण्डपुराण यह अठारह हैं ॥ २३-२४ ॥ शौनकजी! व्यासजीकी शिष्य- परम्पराने जिस प्रकार वेदसंहिता और पुराणसंहिताओंका अध्ययन- अध्यापन, विभाजन आदि किया वह मैंने तुम्हें सुना दिया । यह