श्रीगणेशाय नमः।
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 1421–1430
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1421–1430
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चौबीस हजार है ॥४॥ श्रीमद्भागवतमें अठारह हजार, नारदपुराणमें पचीस हजार,
मार्कण्डेयपुराणमें नौ हजार तथा अग्निपुराणमें पन्द्रह हजार चार सौ श्लोक हैं || ५ || भविष्यपुराणकी श्लोक- संख्या चौदह हजार पाँच सौ है और ब्रह्मवैवर्तपुराणकी अठारह हजार तथा लिंगपुराणमें ग्यारह हजार श्लोक हैं ॥६ ॥ वराहपुराणमें चौबीस हजार, स्कन्ध-पुराणकी श्लोक- संख्या इक्यासी हजार एक सौ है और वामनपुराणकी दस हजार ॥७ ॥
कूर्मपुराण सत्रह हजार श्लोकोंका और मत्स्यपुराण चौदह हजार श्लोकोंका है । गरुड़पुराणमें उन्नीस हजार श्लोक हैं और ब्रह्माण्डपुराणमें बारह हजार || ८ || इस प्रकार सब पुराणोंकी
श्लोकसंख्या कुल मिलाकर चार लाख होती है । उनमें श्रीमद्भागवत, जैसा कि पहले कहा जा
चुका है, अठारह हजार श्लोकोंका है ॥९ ॥
शौनकजी! पहले - पहल भगवान् विष्णुने अपने नाभिकमलपर स्थित एवं संसारसे भयभीत ब्रह्मापर परम करुणा करके इस पुराणको प्रकाशित किया था ॥१० ॥
इसके आदि, मध्य और अन्तमें वैराग्य उत्पन्न करनेवाली बहुत- सी कथाएँ हैं । इस महापुराणमें जो भगवान् श्रीहरिकी लीला- कथाएँ हैं, वे तो अमृतस्वरूप हैं ही; उनके सेवनसे सत्पुरुष और देवताओंको बड़ा ही आनन्द मिलता है ॥११ ॥
आपलोग जानते हैं कि समस्त उपनिषदोंका सार है ब्रह्म और आत्माका एकत्वरूप अद्वितीय सवस्तु । वही श्रीमद्भागवतका प्रतिपाद्य विषय है । इसके निर्माणका प्रयोजन है एकमात्र कैवल्य - मोक्ष ॥१२ ॥
प्रौष्ठपद्यां पौर्णमास्यां हेमसिंहसमन्वितम् ।
ददाति यो भागवतं स याति परमां गतिम् ॥ १३
राजन्ते तावदन्यानि पुराणानि सतां गणे ।
यावन्न दृश्यते साक्षाच्छ्रीमद्भागवतं परम् ॥१४
सर्ववेदान्तसारं हि श्रीभागवतमिष्यते ।
तद्रसामृततृप्तस्य नान्यत्र स्याद्रतिः क्वचित् ॥१५
निम्नगानां यथा गंगा देवानामच्युतो यथा ।
वैष्णवानां यथा शम्भुः पुराणानामिदं तथा ॥ १६
क्षेत्राणां चैव सर्वेषां यथा काशी ह्यनुत्तमा ।
तथा पुराणव्रातानां श्रीमद्भागवतं द्विजाः ॥१७
श्रीमद्भागवतं पुराणममलं यद्वैष्णवानां प्रियं यस्मिन् पारमहंस्यमेकममलं ज्ञानं परं गीयते । तत्र ज्ञानविरागभक्तिसहितं नैष्कर्म्यमाविष्कृतं
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तच्छृण्वन् विपठन् विचारणपरो भक्त्या विमुच्येन्नरः ॥१८ कस्मै येन विभासितोऽयमतुलो ज्ञानप्रदीपः पुरा तद्रूपेण च नारदाय मुनये कृष्णाय तद्रूपिणा । योगीन्द्राय तदात्मनाथ भगवद्- राताय कारुण्यत- स्तच्छुद्धं विमलं विशोकममृतं सत्यं परं धीमहि ॥१९ जो पुरुष भाद्रपद मासकी पूर्णिमाके दिन श्रीमद्भागवतको सोनेके सिंहासनपर रखकर उसका दान करता है, उसे परमगति प्राप्त होती है ॥१३ ॥ संतोंकी सभामें तभीतक दूसरे
पुराणोंकी शोभा होती है, जबतक सर्वश्रेष्ठ स्वयं श्रीमद्भागवतमहापुराणके दर्शन नहीं होते ॥१४ ॥ यह श्रीमद्भागवत समस्त उपनिषदोंका सार है । जो इस रस- सुधाका पान करके
छक चुका है, वह किसी और पुराण- शास्त्रमें रम नहीं सकता ॥१५ ॥ जैसे नदियोंमें गंगा,
देवताओंमें विष्णु और वैष्णवोंमें श्रीशंकरजी सर्वश्रेष्ठ हैं, वैसे ही पुराणोंमें श्रीमद्भागवत है ॥१६ ॥ शौनकादि ऋषियो! जैसे सम्पूर्ण क्षेत्रोंमें काशी सर्वश्रेष्ठ है, वैसे ही पुराणोंमें
श्रीमद्भागवतका स्थान सबसे ऊँचा है ॥१७ ॥ यह श्रीमद्भागवतपुराण सर्वथा निर्दोष है ।
भगवान्के प्यारे भक्त वैष्णव इससे बड़ा प्रेम करते हैं । इस पुराण में जीवन्मुक्त परमहंसोंके सर्वश्रेष्ठ, अद्वितीय एवं मायाके लेशसे रहित ज्ञानका गान किया गया है । इस ग्रन्थकी सबसे बड़ी विलक्षणता यह है कि इसका नैष्कर्म्य अर्थात् कर्मोंकी आत्यन्तिक निवृत्ति भी ज्ञान-वैराग्य एवं भक्तिसे युक्त है । जो इसका श्रवण, पठन और मनन करने लगता है, उसे भगवान्की भक्ति प्राप्त हो जाती है और वह मुक्त हो जाता है ॥१८ ॥
यह श्रीमद्भागवत भगवत्तत्त्वज्ञानका एक श्रेष्ठ प्रकाशक है । इसकी तुलनामें और कोई भी पुराण नहीं है । इसे पहले - पहल स्वयं भगवान् नारायणने ब्रह्माजीके लिये प्रकट किया था । फिर उन्होंने ही ब्रह्माजीके रूपसे देवर्षि नारदको उपदेश किया और नारदजीके रूपसे भगवान् श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासको । तदनन्तर उन्होंने ही व्यासरूपसे योगीन्द्र शुकदेवजीको और श्रीशुकदेवजीके रूपसे अत्यन्त करुणावश राजर्षि परीक्षित्को उपदेश किया । वे भगवान् परम शुद्ध एवं मायामलसे रहित हैं । शोक और मृत्यु उनके पासतक नहीं फटक सकते । हम सब उन्हीं परम सत्यस्वरूप परमेश्वरका ध्यान करते हैं ॥१९ ॥
नमस्तस्मै भगवते वासुदेवाय साक्षिणे ।
य इदं कृपया कस्मै व्याचचक्षे मुमुक्षवे ॥ २०
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योगीन्द्राय नमस्तस्मै शुकाय ब्रह्मरूपिणे ।
संसारसर्पदष्टं यो विष्णुरातममूमुचत् ॥ २१
भवे भवे यथा भक्तिः पादयोस्तव जायते ।
तथा कुरुष्व देवेश नाथस्त्वं नो यतः प्रभो ॥ २२
नामसंकीर्तनं यस्य सर्वपापप्रणाशनम् ।
प्रणामो दुःखशमनस्तं नमामि हरिं परम् ॥२३
हम उन सर्वसाक्षी भगवान् वासुदेवको नमस्कार करते हैं, जिन्होंने कृपा करके मोक्षाभिलाषी ब्रह्माजीको इस श्रीमद्भागवतमहापुराणका उपदेश किया ॥ २० ॥ साथ ही हम
उन योगिराज ब्रह्मस्वरूप श्रीशुकदेवजीको भी नमस्कार करते हैं, जिन्होंने श्रीमद्भागवतमहापुराण सुनाकर संसार-सर्पसे डसे हुए राजर्षि परीक्षित्को मुक्त किया ॥२१ ॥
देवताओंके आराध्यदेव सर्वेश्वर! आप ही हमारे एकमात्र स्वामी एवं सर्वस्व हैं । अब आप ऐसी कृपा कीजिये कि बार- बार जन्म ग्रहण करते रहनेपर भी आपके चरणकमलोंमें हमारी अविचल भक्ति बनी रहे ॥२२ ॥
जिन भगवान्के नामोंका संकीर्तन सारे पापोंको सर्वथा नष्ट कर देता है और जिन भगवान्के चरणोंमें आत्मसमर्पण, उनके चरणोंमें प्रणति सर्वदाके लिये सब प्रकारके दुःखोंको शान्त कर देती है, उन्हीं परम- तत्त्वस्वरूप श्रीहरिको मैं नमस्कार करता हूँ ॥२३ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे वैयासिक्यामष्टादशसाहस्र्यां पारमहंस्यां संहितायां द्वादशस्कन्धे त्रयोदशोऽध्यायः ॥१३ ॥
इति द्वादशः स्कन्धः समाप्तः सम्पूर्णोऽयं ग्रन्थः
त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये ।
तेन त्वदङ्घ्रिकमले रतिं मे यच्छ शाश्वतीम् ॥
हे गोविन्द! आपकी वस्तु आपको ही समर्पण कर रहा हूँ। इसके द्वारा आपके चरणकमलोंमें मुझे शाश्वत प्रेम प्रदान करनेकी कृपा करें।
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॥ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमाहात्म्यम् अथ प्रथमोऽध्यायः परीक्षित् और वज्रनाभका समागम, शाण्डिल्यमुनिके मुखसे भगवान्की लीलाके रहस्य और व्रजभूमिके महत्त्वका वर्णन व्यास उवाच श्रीसच्चिदानन्दघनस्वरूपिणे कृष्णाय चानन्तसुखाभिवर्षिणे । विश्वोद्भवस्थाननिरोधहेतवे नुमो वयं भक्तिरसाप्तयेऽनिशम् ॥१
नैमिषे सूतमासीनमभिवाद्य महामतिम् ।
कथामृतरसास्वादकुशला ऋषयोऽब्रुवन् ॥२
ऋषय ऊचुः
वज्रं श्रीमाथुरे देशे स्वपौत्रं हस्तिनापुरे ।
अभिषिच्य गते राज्ञि तौ कथं किं च चक्रतुः ॥३
सूत उवाच
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥४
महापथं गते राज्ञि परीक्षित् पृथिवीपतिः ।
जगाम मथुरां विप्रा वज्रनाभदिदृक्षया ॥५
महर्षि व्यास कहते हैं -जिनका स्वरूप है सच्चिदानन्दघन, जो अपने सौन्दर्य और माधुर्यादि गुणोंसे सबका मन अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं और सदा-सर्वदा अनन्त सुखकी वर्षा करते रहते हैं, जिनकी ही शक्तिसे इस विश्वकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय होते -उन भगवान् श्रीकृष्णको हम भक्तिरसका आस्वादन करनेके लिये नित्य- निरन्तर प्रणाम करते हैं ॥१ ॥
नैमिषारण्यक्षेत्रमें श्रीसूतजी स्वस्थ चित्तसे अपने आसनपर बैठे हुए थे । उस समय भगवान्की अमृतमयी लीलाकथाके रसिक, उसके रसास्वादनमें अत्यन्त कुशल शौनकादि
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ऋषियोंने सूतजीको प्रणाम करके उनसे यह प्रश्न किया ॥२ ॥
ऋषियोंने पूछा – सूतजी! धर्मराज युधिष्ठिर जब श्रीमथुरामण्डलमें अनिरुद्धनन्दन वज्रका और हस्तिनापुरमें अपने पौत्र परीक्षितका राज्याभिषेक करके हिमालयपर चले गये, तब राजा वज्र और परीक्षित्ने कैसे - कैसे कौन - कौन- सा कार्य किया ॥३ ॥
सूतजीने कहा - भगवान् नारायण, नरोत्तम नर, देवी सरस्वती और महर्षि व्यासको नमस्कार करके शुद्धचित्त होकर भगवत्तत्त्वको प्रकाशित करनेवाले इतिहासपुराणरूप ‘ जय ’ का उच्चारण करना चाहिये ॥ ४ ॥
शौनकादि ब्रह्मर्षियो! जब धर्मराज युधिष्ठिर आदि पाण्डवगण स्वर्गारोहणके लिये हिमालय चले गये, तब सम्राट् परीक्षित् एक दिन मथुरा गये । उनकी इस यात्राका उद्देश्य इतना ही था कि वहाँ चलकर वज्रनाभसे मिल- जुल आयें ॥५ ॥
पितृव्यमागतं ज्ञात्वा वज्रः प्रेमपरिप्लुतः ।
अभिगम्याभिवाद्याथ निनाय निजमन्दिरम् ॥६
परिष्वज्य स तं वीरः कृष्णैकगतमानसः ।
रोहिण्याद्या हरेः पत्नीर्ववन्दायतनागतः ॥७
ताभिः संमानितोऽत्यर्थं परीक्षित् पृथिवीपतिः ।
विश्रान्तः सुखमासीनो वज्रनाभमुवाच ह ॥८
परीक्षिदुवाच
तात त्वत्पितृभिर्नूनमस्मत्पितृपितामहाः ।
उद्धृता भूरिदुःखौघादहं च परिरक्षितः ॥९
न पारयाम्यहं तात साधु कृत्वोपकारतः ।
त्वामतः प्रार्थयाम्यंग सुखं राज्येऽनुयुज्यताम् ॥१०
कोशसैन्यादिजा चिन्ता तथारिदमनादिजा ।
मनागपि न कार्या ते सुसेव्याः किन्तु मातरः ॥११
निवेद्य मयि कर्तव्यं सर्वाधिपरिवर्जनम् ।
श्रुत्वैतत् परमप्रीतो वज्रस्तं प्रत्युवाच ह ॥१२
वज्रनाभ उवाच राजन्नुचितमेतत्ते यदस्मासु प्रभाषसे ।
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त्वत्पित्रोपकृतश्चाहं धनुर्विद्याप्रदानतः ॥ १३ जब वज्रनाभको यह समाचार मालूम हुआ कि मेरे पितातुल्य परीक्षित् मुझसे मिलनेके लिये आ रहे हैं, तब उनका हृदय प्रेमसे भर गया । उन्होंने नगरसे आगे बढ़कर उनकी अगवानी की, चरणोंमें प्रणाम किया और बड़े प्रेमसे उन्हें अपने महलमें ले आये || ६ || वीर परीक्षित् भगवान् श्रीकृष्णके परम प्रेमी भक्त थे । उनका मन नित्य- निरन्तर आनन्दघन श्रीकृष्णचन्द्रमें ही रमता रहता था । उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णके प्रपौत्र वज्रनाभका बड़े प्रेमसे आलिंगन किया । इसके बाद अन्तःपुरमें जाकर भगवान् श्रीकृष्णकी रोहिणी आदि पत्नियोंको नमस्कार किया ॥७ ॥ रोहिणी आदि श्रीकृष्ण- पत्नियोंने भी सम्राट् परीक्षित्का अत्यन्त सम्मान किया ।
वे विश्राम करके जब आरामसे बैठ गये, तब उन्होंने वज्रनाभसे यह बात कही ॥ ८ ॥
राजा परीक्षित्ने कहा - ' हे तात! तुम्हारे पिता और पितामहोंने मेरे पिता - पितामहको बड़े - बड़े संकटोंसे बचाया है । मेरी रक्षा भी उन्होंने ही की है || ९ || प्रिय वज्रनाभ! यदि मैं उनके उपकारोंका बदला चुकाना चाहूँ तो किसी प्रकार नहीं चुका सकता । इसलिये मैं तुमसे प्रार्थना करता हूँ कि तुम सुखपूर्वक अपने राजकाजमें लगे रहो ॥१० ॥
तुम्हें अपने खजानेकी, सेनाकी तथा शत्रुओंको दबाने आदिकी तनिक भी चिन्ता न करनी चाहिये । तुम्हारे लिये कोई कर्तव्य है तो केवल एक ही; वह यह कि तुम्हें अपनी इन माताओंकी खूब प्रेमसे भलीभाँति सेवा करते रहना चाहिये ॥११ ॥
यदि कभी तुम्हारे ऊपर कोई आपत्ति- विपत्ति आये अथवा किसी कारणवश तुम्हारे हृदयमें अधिक क्लेशका अनुभव हो तो मुझसे बताकर निश्चिन्त हो जाना; मैं तुम्हारी सारी चिन्ताएँ दूर कर दूँगा । ' सम्राट् परीक्षित्की यह बात सुनकर वज्रनाभको बड़ी प्रसन्नता हुई । उन्होंने राजा परीक्षित्से कहा— ॥१२ ॥
वज्रनाभने कहा —' महाराज! आप मुझसे जो कुछ कह रहे हैं, वह सर्वथा आपके अनुरूप है । आपके पिताने भी मुझे धनुर्वेदकी शिक्षा देकर मेरा महान् उपकार किया है ॥१३ ॥
तस्मान्नाल्पापि मे चिन्ता क्षात्रं दृढमुपेयुषः ।
किन्त्वेका परमा चिन्ता तत्र किंचिद् विचार्यताम् ॥१४
माथुरे त्वभिषिक्तोऽपि स्थितोऽहं निर्जने वने ।
क्व गता वै प्रजात्रत्या यत्र राज्यं प्ररोचते ॥१५
इत्युक्तो विष्णुरातस्तु नन्दादीनां पुरोहितम् ।
शाण्डिल्यमाजुहावाशु वज्रसन्देहनुत्तये ॥ १६
अथोटजं विहायाशु शाण्डिल्यः समुपागतः ।
पूजितो वज्रनाभेन निषसादासनोत्तमे ॥१७
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उपोद्घातं विष्णुरातश्चकाराशु ततस्त्वसौ ।
उवाच परमप्रीतस्तावुभौ परिसान्त्वयन् ॥१८
शाण्डिल्य उवाच
शृणुतं दत्तचित्तौ में रहस्यं व्रजभूमिजम् ।
व्रजनं व्याप्तिरित्युक्त्या व्यापनाद् व्रज उच्यते ॥१९
गुणातीतं परं ब्रह्म व्यापकं व्रज उच्यते ।
सदानन्दं परं ज्योतिर्मुक्तानां पदमव्ययम् ॥२०
तस्मिन् नन्दात्मजः कृष्णः सदानन्दांगविग्रहः ।
आत्मारामश्चाप्तकामः प्रेमाक्तैरनुभूयते ॥ २१
आत्मा तु राधिका तस्य तयैव रमणादसौ । तु आत्मारामतया प्राज्ञैः प्रोच्यते गूढवेदिभिः ॥२२ इसलिये मुझे किसी बातकी तनिक भी चिन्ता नहीं है; क्योंकि उनकी कृपासे मैं क्षत्रियोचित शूरवीरतासे भलीभाँति सम्पन्न हूँ । मुझे केवल एक बातकी बहुत बड़ी चिन्ता है, आप उसके सम्बन्धमें कुछ विचार कीजिये || १४ || यद्यपि मैं मथुरामण्डलके राज्यपर अभिषिक्त हूँ, तथापि मैं यहाँ निर्जन वनमें ही रहता हूँ। इस बातका मुझे कुछ भी पता नहीं है कि यहाँकी प्रजा कहाँ चली गयी; क्योंकि राज्यका सुख तो तभी है, जब प्रजा रहे ' ॥१५ ॥
जब वज्रनाभने परीक्षित्से यह बात कही, तब उन्होंने वज्रनाभका सन्देह मिटानेके लिये महर्षि शाण्डिल्यको बुलवाया । ये ही महर्षि शाण्डिल्य पहले नन्द आदि गोपोंके पुरोहित थे ॥१६ ॥ परीक्षित्का सन्देश पाते ही महर्षि शाण्डिल्य अपनी कुटी छोड़कर वहाँ आ पहुँचे ।
वज्रनाभने विधिपूर्वक उनका स्वागत- सत्कार किया और वे एक ऊँचे आसनपर विराजमान हुए ॥१७ ॥ राजा परीक्षितने वज्रनाभकी बात उन्हें कह सुनायी । इसके बाद महर्षि शाण्डिल्य
बड़ी प्रसन्नतासे उनको सान्त्वना देते हुए कहने लगे— ॥१८ ॥
शाण्डिल्यजीने कहा— प्रिय परीक्षित् और वज्रनाभ! मैं तुमलोगोंसे व्रजभूमिका रहस्य बतलाता हूँ। तुम दत्तचित्त होकर सुनो । 'व्रज ' शब्दका अर्थ है व्याप्ति । इस वृद्धवचनके अनुसार व्यापक होनेके कारण ही इस भूमिका नाम 'व्रज' पड़ा है ॥ १ ९ ॥ सत्त्व, रज, तम— इन तीन गुणोंसे अतीत जो परब्रह्म है, वही व्यापक है । इसलिये उसे ' व्रज' कहते हैं । वह सदानन्दस्वरूप, परम ज्योतिर्मय और अविनाशी है । जीवन्मुक्त पुरुष उसीमें स्थित रहते हैं ॥२० ॥ इस परब्रह्मस्वरूप व्रजधाममें नन्दनन्दन भगवान् श्रीकृष्णका निवास है । उनका
एक-एक अंग सच्चिदानन्दस्वरूप है । वे आत्माराम और आप्तकाम हैं । प्रेमरसमें डूबे हुए रसिकजन ही उनका अनुभव करते हैं || २१ || भगवान् श्रीकृष्णकी आत्मा हैं — राधिका; उनसे रमण करनेके कारण ही रहस्यरसके मर्मज्ञ ज्ञानी पुरुष उन्हें ‘ आत्माराम ' कहते
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हैं ॥२२ ॥ ' काम ' शब्दका अर्थ है कामना- अभिलाषा; व्रजमें भगवान् श्रीकृष्णके वांछित
पदार्थ हैं — गौएँ, ग्वालबाल, गोपियाँ और उनके साथ लीला- विहार आदि; वे सब- के - सब यहाँ नित्य प्राप्त हैं । इसीसे श्रीकृष्णको ' आप्तकाम' कहा गया है || २३ || भगवान् श्रीकृष्णकी यह रहस्य- लीला प्रकृतिसे परे है । वे जिस समय प्रकृतिके साथ खेलने लगते हैं, उस समय दूसरे लोग भी उनकी लीलाका अनुभव करते हैं || २४|| प्रकृतिके साथ होनेवाली लीलामें ही रजोगुण, सत्त्वगुण और तमोगुणके द्वारा सृष्टि, स्थिति और प्रलयकी प्रतीति होती है । इस प्रकार यह निश्चय होता है कि भगवान्की लीला दो प्रकारकी है - एक वास्तवी और दूसरी व्यावहारिकी ॥२५ ॥ वास्तवी लीला स्वसंवेद्य है— उसे स्वयं भगवान् और उनके रसिक
भक्तजन ही जानते हैं । जीवोंके सामने जो लीला होती है, वह व्यावहारिकी लीला है । वास्तवी लीलाके बिना व्यावहारिकी लीला नहीं हो सकती; परन्तु व्यावहारिकी लीलाका वास्तविक लीलाके राज्यमें कभी प्रवेश नहीं हो सकता || २६ || तुम दोनों भगवान्की जिस लीलाको देख रहे हो, यह व्यावहारिकी लीला है । यह पृथ्वी और स्वर्ग आदि लोक इसी लीलाके अन्तर्गत हैं । इसी पृथ्वीपर यह मथुरामण्डल है || २७ || यहीं वह व्रजभूमि है, जिसमें भगवान्की वह वास्तवी रहस्य- लीला गुप्तरूपसे होती रहती है । वह कभी - कभी प्रेमपूर्ण हृदयवाले रसिक भक्तोंको सब ओर दीखने लगती है ॥ २८ ॥ कभी अट्ठाईसवें द्वापरके
अन्तमें जब भगवान्की रहस्य - लीलाके अधिकारी भक्तजन यहाँ एकत्र होते हैं, जैसा कि इस समय भी कुछ काल पहले हुए थे, उस समय भगवान् अपने अन्तरंग प्रेमियोंके साथ अवतार लेते हैं । उनके अवतारका यह प्रयोजन होता है कि रहस्य - लीलाके अधिकारी भक्तजन भी अन्तरंग परिकरोंके साथ सम्मिलित होकर लीला - रसका आस्वादन कर सकें । इस प्रकार जब भगवान् अवतार ग्रहण करते हैं, उस समय भगवान् के अभिमत प्रेमी देवता और ऋषि आदि भी सब ओर अवतार लेते हैं ॥२९ -३० ॥
कामास्तु वांछितास्तस्य गावो गोपाश्च गोपिकाः ।
नित्याः सर्वे विहाराद्या आप्तकामस्ततस्त्वयम् ॥२३
रहस्यं त्विदमेतस्य प्रकृतेः परमुच्यते ।
प्रकृत्या खेलतस्तस्य लीलान्यैरनुभूयते ॥२४
सर्गस्थित्यप्यया यत्र रजःसत्त्वतमोगुणैः ।
लैवं द्विविधा तस्य वास्तवी व्यावहारिकी ॥२५
वास्तवी तत्स्वसंवेद्या जीवानां व्यावहारिकी ।
आद्यां विना द्वितीया न द्वितीया नाद्यगा क्वचित् ॥२६
युवयोर्गोचरेयं तु तल्लीला व्यावहारिकी ।
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यत्र भूरादयो लोका भुवि माथुरमण्डलम् ॥२७
अत्रैव व्रजभूमिः सा यत्र तत्त्वं सुगोपितम् ।
भासते प्रेमपूर्णानां कदाचिदपि सर्वतः ॥२८
कदाचिद् द्वापरस्यान्ते रहोलीलाधिकारिणः ।
समवेता यदात्र स्युर्यथेदानीं तदा हरिः ॥२९
स्वैः सहावतरेत् स्वेषु समावेशार्थमीप्सिताः ।
तदा देवादयोऽप्यन्येऽवतरन्ति समन्ततः ॥३०
सर्वेषां वांछितं कृत्वा हरिरन्तर्हितोऽभवत् ।
तेनात्र त्रिविधा लोकाः स्थिताः पूर्वं न संशयः ॥३१
नित्यास्तल्लिप्सवश्चैव देवाद्याश्चेति भेदतः ।
देवाद्यास्तेषु कृष्णेन द्वारकां प्रापिताः पुरा ॥ ३२
पुनर्मौशलमार्गेण स्वाधिकारेषु चापिताः ।
तल्लिप्सूंश्च सदा कृष्णः प्रेमानन्दैकरूपिणः ॥३३
विधाय स्वीयनित्येषु समावेशितवांस्तदा ।
नित्याः सर्वेऽप्ययोग्येषु दर्शनाभावतां गताः ॥ ३४
व्यावहारिकलीलास्थास्तत्र यन्नाधिकारिणः ।
पश्यन्त्यत्रागतास्तस्मान्निर्जनत्वं समन्ततः ॥३५
तस्माच्चिन्ता न ते कार्या वज्रनाभ मदाज्ञया ।
वासयात्र बहून् ग्रामान् संसिद्धिस्ते भविष्यति ॥३६
कृष्णलीलानुसारेण कृत्वा नामानि सर्वतः ।
त्वया वासयता ग्रामान् संसेव्या भूरियं परा ॥३७
अभी - अभी जो अवतार हुआ था, उसमें भगवान् अपने सभी प्रेमियोंकी अभिलाषाएँ पूर्ण करके अब अन्तर्धान हो चुके हैं । इससे यह निश्चय हुआ कि यहाँ पहले तीन प्रकारके भक्तजन उपस्थित थे; इसमें सन्देह नहीं है ॥ ३१ ॥ उन तीनोंमें प्रथम तो उनकी श्रेणी है, जो भगवान्के
नित्य ‘ अन्तरंग ' पार्षद हैं -जिनका भगवान् से कभी वियोग होता ही नहीं । दूसरे वे हैं, जो