श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 1411–1420

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1411–1420

पृष्ठ 1411

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गोवर्द्धनधारणकी लीला करनेपर इन्द्र और कामधेनुने आकर भगवान्‌का यज्ञाभिषेक किया । शरद् ऋतुकी रात्रियोंमें व्रजसुन्दरियोंके साथ रास- क्रीडा की ॥३२ ॥

दुष्ट शंखचूड, अरिष्ट, और केशीके वधकी लीला हुई । तदनन्तर अक्रूरजी मथुरासे वृन्दावन आये और उनके साथ भगवान् श्रीकृष्ण तथा बलरामजीने मथुराके लिये प्रस्थान किया ॥३३ ॥

उस प्रसंगपर व्रजसुन्दरियोंने जो विलाप किया था, उसका वर्णन है । राम और श्यामने मथुरामें जाकर वहाँकी सजावट देखी और कुवलयापीड़ हाथी, मुष्टिक, चाणूर एवं कंस आदिका संहार किया ॥३४ ॥

सान्दीपनि गुरुके यहाँ विद्याध्ययन करके उनके मृत पुत्रको लौटा लाये । शौनकादि ऋषियो! जिस समय भगवान् श्रीकृष्ण मथुरामें निवास कर रहे थे, उस समय उन्होंने उद्धव और बलरामजीके साथ यदुवंशियोंका सब प्रकारसे प्रिय और हित किया ॥३५ ॥

जरासन्ध कई बार बड़ी - बड़ी सेनाएँ लेकर आया और भगवान्‌ने उनका उद्धार करके पृथ्वीका भार हलका किया । कालयवनको मुचुकुन्दसे भस्म करा दिया । द्वारकापुरी बसाकर रातों - रात सबको वहाँ पहुँचा दिया ॥ ३६ ॥

स्वर्गसे कल्पवृक्ष एवं सुधर्मा सभा ले आये । भगवान्ने दल- के - दल शत्रुओंको युद्धमें पराजित करके रुक्मिणीका हरण किया ॥३७ ॥

हरस्य जृम्भणं युद्धे बाणस्य भुजकृन्तनम् ।

प्राग्ज्योतिषपतिं हत्वा कन्यानां हरणं च यत् ॥३८

चैद्यपौण्ड्रकशाल्वानां दन्तवक्त्रस्य दुर्मतेः ।

शम्बरो द्विविदः पीठो मुरः पंचजनादयः ॥ ३ ९

माहात्म्यं च वधस्तेषां वाराणस्याश्च दाहनम् ।

भारावतरणं भूमेर्निमित्तीकृत्य पाण्डवान् ॥४०

विप्रशापापदेशेन संहारः स्वकुलस्य च ।

उद्धवस्य च संवादो वासुदेवस्य चाद्भुतः ॥४१

यत्रात्मविद्या ह्यखिला प्रोक्ता धर्मविनिर्णयः ।

ततो मर्त्यपरित्याग आत्मयोगानुभावतः ॥ ४२

युगलक्षणवृत्तिश्च कलौ नॄणामुपप्लवः ।

चतुर्विधश्च प्रलय उत्पत्तिस्त्रिविधा तथा ॥४३

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पृष्ठ 1412

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देहत्यागश्च राजर्षेर्विष्णुरातस्य धीमतः ।

शाखाप्रणयनमृषेर्मार्कण्डेयस्य सत्कथा ।

महापुरुषविन्यासः सूर्यस्य जगदात्मनः ॥४४

बाणासुरके साथ युद्धके प्रसंगमें महादेवजी पर ऐसा बाण छोड़ा कि वे जँभाई लेने लगे और इधर बाणसुरकी भुजाएँ काट डालीं । प्राग्- ज्योतिषपुरके स्वामी भौमासुरको मारकर सोलह हजार कन्याएँ ग्रहण कीं ॥ ३८ ॥

शिशुपाल, पौण्ड्रक, शाल्व, दुष्ट दन्तवक्त्र, शम्बरासुर, द्विविद, पीठ, मुर, पंचजन आदि दैत्योंके बल- पौरुषका वर्णन करके यह बात बतलायी गयी कि भगवान्‌ने उन्हें कैसे - कैसे मारा । भगवान्के चक्रने काशीको जला दिया और फिर उन्होंने भारतीय युद्धमें पाण्डवोंको निमित्त बनाकर पृथ्वीका बहुत बड़ा भार उतार दिया ॥३९ -४० ॥ शौनकादि ऋषियो! ग्यारहवें स्कन्धमें इस बातका वर्णन हुआ है कि भगवान्ने ब्राह्मणोंके शापके बहाने किस प्रकार यदुवंशका संहार किया । इस स्कन्धमें भगवान् श्रीकृष्ण और उद्धवका संवाद बड़ा ही अद्भुत है ॥४१ ॥

उसमें सम्पूर्ण आत्मज्ञान और धर्म-निर्णयका निरूपण हुआ है और अन्तमें यह बात बतायी गयी है कि भगवान् श्रीकृष्णने अपने आत्मयोगके प्रभावसे किस प्रकार मर्त्यलोकका परित्याग किया ॥ ४२ ॥

बारहवें स्कन्धमें विभिन्न युगोंके लक्षण और उनमें रहनेवाले लोगोंके व्यवहारका वर्णन किया गया है तथा यह भी बतलाया गया है कि कलि- युगमें मनुष्योंकी गति विपरीत होती है । चार प्रकारके प्रलय और तीन प्रकारकी उत्पत्तिका वर्णन भी इसी स्कन्धमें है ॥४३ ॥

इसके बाद परम ज्ञानी राजर्षि परीक्षित्के शरीरत्यागकी बात कही गयी है । तदनन्तर वेदोंके शाखा- विभाजनका प्रसंग आया है । मार्कण्डेयजीकी सुन्दर कथा, भगवान्के अंग-उपांगोंका स्वरूपकथन और सबके अन्तमें विश्वात्मा भगवान् सूर्यके गणोंका वर्णन है ॥४४ ॥

इति चोक्तं द्विजश्रेष्ठा यत्पृष्टोऽहमिहास्मि वः ।

लीलावतारकर्माणि कीर्तितानीह सर्वशः ॥ ४५

पतितः स्खलितश्चार्तः क्षुत्त्वा वा विवशो ब्रुवन् ।

हरये नम इत्युच्चैर्मुच्यते सर्वपातकात् ॥४६

संकीर्त्यमानो भगवाननन्तः श्रुतानुभावो व्यसनं हि पुंसाम् । प्रविश्य चित्तं विधुनोत्यशेषं यथा तमोऽर्कोऽभ्रमिवातिवातः ॥४७ ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1413

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मृषा गिरस्ता ह्यसतीरसत्कथा न कथ्यते यद् भगवानधोक्षजः । तदेव सत्यं तदुहैव मंगलं तदेव पुण्यं भगवद्गुणोदयम् ॥४८ तदेव रम्यं रुचिरं नवं नवं तदेव शश्वन्मनसो महोत्सवम् । तदेव शोकार्णवशोषणं नृणां यदुत्तमश्लोकयशोऽनुगीयते ॥४९ शौनकादि ऋषियो! आपलोगोंने इस सत्संगके अवसरपर मुझसे जो कुछ पूछा था, उसका वर्णन मैंने कर दिया । इसमें सन्देह नहीं कि इस अवसरपर मैंने हर तरहसे भगवान्की लीला और उनके अवतार- चरित्रोंका ही कीर्तन किया है ॥४५ ॥

जो मनुष्य गिरते - पड़ते, फिसलते, दुःख भोगते अथवा छींकते समय विवशतासे भी ऊँचे स्वरसे बोल उठता है— ' हरये नमः', वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥४६ ॥

यदि देश, काल एवं वस्तुसे अपरिच्छिन्न भगवान् श्रीकृष्णके नाम, लीला, गुण आदिका संकीर्तन किया जाय अथवा उनके प्रभाव, महिमा आदिका श्रवण किया जाय तो वे स्वयं ही हृदयमें आ विराजते हैं और श्रवण तथा कीर्तन करनेवाले पुरुषके सारे दुःख मिटा देते हैं— ठीक वैसे ही जैसे सूर्य अन्धकारको और आँधी बादलोंको तितर-बितर कर देती है ॥४७ ॥

गुण -,, जिस वाणीके द्वारा घट घटवासी अविनाशी भगवान्‌के नाम लीला आदिकाउच्चारण नहीं होता, वह वाणी भावपूर्ण होनेपर भी निरर्थक है - सारहीन है, सुन्दर होनेपर भी असुन्दर है और उत्तमोत्तम विषयोंका प्रतिपादन करनेवाली होनेपर भी असत्कथा है । जो वाणी और वचन भगवान्के गुणोंसे परिपूर्ण रहते हैं, वे ही परम पावन हैं, वे ही मंगलमय हैं और वे ही परम सत्य हैं ॥४८ ॥

जिस वचनके द्वारा भगवान्‌के परम पवित्र यशका गान होता है, वही परम रमणीय, रुचिकर एवं प्रतिक्षण नया-नया जान पड़ता है । उससे अनन्त कालतक मनको परमानन्दकी अनुभूति होती रहती है । मनुष्योंका सारा शोक, चाहे वह समुद्रके समान लंबा और गहरा क्यों न हो, उस वचनके प्रभावसे सदाके लिये सूख जाता है ॥४९ ॥

न तद् वचश्चित्रपदं हरेर्यशो जगत्पवित्रं प्रगृणीत कर्हिचित् । तद् ध्वांक्षतीर्थं न तु हंससेवितं यत्राच्युतस्तत्र हि साधवोऽमलाः ॥५० स वाग्विसर्गो जनताघसंप्लवो यस्मिन्प्रतिश्लोकमबद्धवत्यपि । ******ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1414

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नामान्यनन्तस्य यशोऽङ्कितानि य- च्छृण्वन्ति गायन्ति गृणन्ति साधवः ॥५१ नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितं न शोभते ज्ञानमलं निरंजनम् । कुतः पुनः शश्वदभद्रमीश्वरे न ह्यर्पितं कर्म यदप्यनुत्तमम् ॥५२ यशःश्रियामेव परिश्रमः परो

वर्णाश्रमाचारतपःश्रुतादिषु ।

अविस्मृतिः श्रीधरपादपद्मयो- र्गुणानुवादश्रवणादिभिर्हरः ॥५३

अविस्मृतिः कृष्णपदारविन्दयोः क्षिणोत्यभद्राणि शमं तनोति च । सत्त्वस्य शुद्धिं परमात्मभक्तिं ज्ञानं च विज्ञानविरागयुक्तम् ॥५४ जिस वाणीसे – चाहे वह रस, भाव, अलंकार आदिसे युक्त ही क्यों न हो–जगत्को पवित्र करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णके यशका कभी गान नहीं होता, वह तो कौओंके लिये उच्छिष्ट फेंकनेके स्थानके समान अत्यन्त अपवित्र है । मानससरोवर- निवासी हंस अथवा ब्रह्मधाममें विहार करनेवाले भगवच्चरणारविन्दाश्रित परमहंस भक्त उसका कभी सेवन नहीं करते। निर्मल हृदयवाले साधुजन तो वहीं निवास करते हैं, जहाँ भगवान् रहते हैं ॥५० ॥

इसके विपरीत जिसमें सुन्दर रचना भी नहीं है और जो व्याकरण आदिकी दृष्टिसे दूषित शब्दोंसे युक्त भी है, परन्तु जिसके प्रत्येक श्लोकमें भगवान्के सुयशसूचक नाम जड़े हुए हैं, वह वाणी लोगोंके सारे पापोंका नाश कर देती है; क्योंकि सत्पुरुष ऐसी ही वाणीका श्रवण, गान और कीर्तन किया करते हैं ॥५१ ॥

वह निर्मल ज्ञान भी, जो मोक्षकी प्राप्तिका साक्षात् साधन है, यदि भगवान्की भक्तिसे रहित हो तो उसकी उतनी शोभा नहीं होती । फिर जो कर्म भगवान्‌को अर्पण नहीं किया गया है— वह चाहे कितना ही ऊँचा क्यों न हो- सर्वदा अमंगलरूप, दुःख देनेवाला ही है; वह तो शोभन — वरणीय हो ही कैसे सकता है? ॥५२ ॥

वर्णाश्रमके अनुकूल आचरण, तपस्या और अध्ययन आदिके लिये जो बहुत बड़ा परिश्रम किया जाता है, उसका फल है - केवल यश अथवा लक्ष्मीकी प्राप्ति । परन्तु भगवान्के गुण, लीला, नाम आदिका श्रवण, कीर्तन आदि तो उनके श्रीचरणकमलोंकी अविचल स्मृति प्रदान करता है ॥५३ ॥

भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी अविचल स्मृति सारे पाप ताप और अमंगलोंको नष्ट ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1415

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कर देती और परम शान्तिका विस्तार करती है । उसीके द्वारा अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है, भगवान्की भक्ति प्राप्त होती है एवं परवैराग्यसे युक्त भगवान्‌के स्वरूपका ज्ञान तथा अनुभव प्राप्त होता है ॥ ५४ ॥

यूयं द्विजाग्र्या बत भूरिभागा

यच्छश्वदात्मन्यखिलात्मभूतम् ।

नारायणं देवमदेवमीश- मजस्रभावा भजताविवेश्य ॥ ५५

अहं च संस्मारित आत्मतत्त्वं श्रुतं पुरा में परमर्षिवक्त्रात् । प्रायोपवेशे नृपतेः परीक्षितः सदस्यृषीणां महतां च शृण्वताम् ॥५६

एतद्वः कथितं विप्राः कथनीयोरुकर्मणः ।

माहात्म्यं वासुदेवस्य सर्वाशुभविनाशनम् ॥५७

य एवं श्रावयेन्नित्यं यामक्षणमनन्यधीः ।

श्रद्धावान् योऽनुशृणुयात् पुनात्यात्मानमेव सः ॥५८

द्वादश्यामेकादश्यां वा शृण्वन्नायुष्यवान् भवेत् ।

पठत्यनश्नन् प्रयतस्ततो भवत्यपातकी ॥५९

पुष्करे मथुरायां च द्वारवत्यां यतात्मवान् ।

उपोष्य संहितामेतां पठित्वा मुच्यते भयात् ॥६०

देवता मुनयः सिद्धाः पितरो मनवो नृपाः ।

यच्छन्ति कामान् गृणतः शृण्वतो यस्य कीर्तनात् ॥६१

शौनकादि ऋषियो! आपलोग बड़े भाग्यवान् हैं । धन्य हैं, धन्य हैं! क्योंकि आपलोग बड़े प्रेमसे निरन्तर अपने हृदयमें सर्वान्तर्यामी, सर्वात्मा, सर्व- शक्तिमान् आदिदेव सबके आराध्यदेव एवं स्वयं दूसरे आराध्यदेवसे रहित नारायण भगवान्‌को स्थापित करके भजन करते रहते हैं ॥५५ || जिस समय राजर्षि परीक्षित् अनशन करके बड़े- बड़े ऋषियोंकी भरी सभामें सबके सामने श्रीशुकदेवजी महाराजसे श्रीमद्भागवतकी कथा सुन रहे थे, उस समय वहीं बैठकर मैंने भी उन्हीं परमर्षिके मुखसे इस आत्मतत्त्वका श्रवण किया था। आपलोगोंने उसका स्मरण ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1416

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कराकर मुझपर बड़ा अनुग्रह किया । मैं इसके लिये आपलोगोंका बड़ा ऋणी हूँ ॥ ५६ ॥

शौनकादि ऋषियो! भगवान् वासुदेवकी एक-एक लीला सर्वदा श्रवण - कीर्तन करनेयोग्य है । मैंने इस प्रसंगमें उन्हींकी महिमाका वर्णन किया है; जो सारे अशुभ संस्कारोंको धो बहाती है ॥५७ ॥

जो मनुष्य एकाग्रचित्तसे एक पहर अथवा एक क्षण ही प्रतिदिन इसका कीर्तन करता है और जो श्रद्धाके साथ इसका श्रवण करता है, वह अवश्य ही शरीरसहित अपने अन्तःकरणको पवित्र बना लेता है ॥ ५८ ॥

जो पुरुष द्वादशी अथवा एकादशीके दिन इसका श्रवण करता है, वह दीर्घायु हो जाता है और जो संयमपूर्वक निराहार रहकर पाठ करता है, उसके पहलेके पाप तो नष्ट हो ही जाते हैं, पापकी प्रवृत्ति भी नष्ट हो जाती है ॥५९ ॥

जो मनुष्य इन्द्रियों और अन्तःकरणको अपने वशमें करके उपवासपूर्वक पुष्कर्, मथुरा अथवा द्वारकामें इस पुराणसंहिताका पाठ करता है, वह सारे भयोंसे मुक्त हो जाता है ॥६० ॥

जो मनुष्य इसका श्रवण या उच्चारण करता है, उसके कीर्तनसे देवता, मुनि, सिद्ध, पितर, मनु और नरपति सन्तुष्ट होते हैं और उसकी अभिलाषाएँ पूर्ण करते हैं ॥६१ ॥

ऋचो यजूंषि सामानि द्विजोऽधीत्यानुविन्दते ।

मधुकुल्या घृतकुल्याः पयःकुल्याश्च तत्फलम् ॥६२

पुराणसंहितामेतामधीत्य प्रयतो द्विजः ।

प्रोक्तं भगवता यत्तु तत्पदं परमं व्रजेत् ॥६३

विप्रोऽधीत्याप्नुयात् प्रज्ञां राजन्योदधिमेखलाम् ।

वैश्यो निधिपतित्वं च शूद्रः शुद्ध्येत पातकात् ॥६४

कलिमलसंहतिकालनोऽखिलेशो हरिरितरत्र न गीयते ह्यभीक्ष्णम् । इह तु पुनर्भगवानशेषमूर्तिः परिपठितोऽनुपदं कथाप्रसङ्गः ॥ ६५ तमहमजमनन्तमात्मतत्त्वं

जगदुदयस्थितिसंयमात्मशक्तिम् ।

द्युपतिभिरजशक्रशंकराद्यै- र्दुरवसितस्तवमच्युतं नतोऽस्मि ॥ ६६

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पृष्ठ 1417

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उपचितनवशक्तिभिः स्व आत्म- न्युपरचितस्थिरजंगमालयाय । भगवत उपलब्धिमात्रधाम्ने सुरऋषभाय नमः सनातनाय ॥६७ ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदके पाठसे ब्राह्मणको मधुकुल्या, घृतकुल्या और पयःकुल्या ( मधु, घी एवं दूधकी नदियाँ अर्थात् सब प्रकारकी सुख- समृद्धि ) की प्राप्ति होती है । वही फल श्रीमद्भागवतके पाठसे भी मिलता है ॥६२ ॥

द्विसंयमपूर्वक इस पुराणसंहिताका अध्ययन करता है, उसे उसी परमपदकी प्राप्ति होती है, जिसका वर्णन स्वयं भगवान्ने किया है ॥ ६३ ॥ इसके अध्ययनसे ब्राह्मणको

ऋतम्भरा प्रज्ञा ( तत्त्वज्ञानको प्राप्त करानेवाली बुद्धि ) की प्राप्ति होती है और क्षत्रियको समुद्रपर्यन्त भूमण्डलका राज्य प्राप्त होता है । वैश्य कुबेरका पद प्राप्त करता है और शूद्र सारे पापोंसे छुटकारा पा जाता है ॥६४ ॥

भगवान् ही सबके स्वामी हैं और समूह के समूह कलिमलोंको ध्वंस करनेवाले हैं । यों तो उनका वर्णन करनेके लिये बहुत- से पुराण हैं, परन्तु उनमें सर्वत्र और निरन्तर भगवान्‌का वर्णन नहीं मिलता । श्रीमद्भागवत महापुराणमें तो प्रत्येक कथा -प्रसंगमें पद - पदपर सर्वस्वरूप भगवान्‌का ही वर्णन हुआ है ॥६५ ॥

वे जन्म - मृत्यु आदि विकारोंसे रहित, देशकाला-दिकृत परिच्छेदोंसे मुक्त एवं स्वयं आत्मतत्त्व ही हैं । जगत्की उत्पत्ति- स्थिति-प्रलय करनेवाली शक्तियाँ भी उनकी स्वरूपभूत ही हैं, भिन्न नहीं । ब्रह्मा, शंकर, इन्द्र आदि लोकपाल भी उनकी स्तुति करना लेशमात्र भी नहीं जानते । उन्हीं एकरस सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्माको मैं नमस्कार करता हूँ ॥६६ ॥

जिन्होंने अपने स्वरूपमें ही प्रकृति आदि नौ शक्तियोंका संकल्प करके इस चराचर जगत्की सृष्टि की है और जो इसके अधिष्ठानरूपसे स्थित हैं तथा जिनका परम पद केवल अनुभूतिस्वरूप है, उन्हीं देवताओंके आराध्यदेव सनातन भगवान्‌के चरणोंमें मैं नमस्कार करता हूँ ॥६७ ॥

स्वसुखनिभृतचेतास्तद्व्युदस्तान्यभावो- ऽप्यजितरुचिरलीलाकृष्टसारस्तदीयम् । व्यतनुत कृपया यस्तत्त्वदीपं पुराणं तमखिलवृजिनघ्नं व्याससूनुं नतोऽस्मि ॥६८ श्रीशुकदेवजी महाराज अपने आत्मानन्दमें ही निमग्न थे । इस अखण्ड अद्वैत स्थितिसे उनकी भेददृष्टि सर्वथा निवृत्त हो चुकी थी । फिर भी मुरलीमनोहर श्यामसुन्दरकी मधुमयी, मंगलमयी, मनोहारिणी लीलाओंने उनकी वृत्तियोंको अपनी ओर आकर्षित कर लिया और उन्होंने जगत्के प्राणियोंपर कृपा करके भगवत्तत्त्वको प्रकाशित करनेवाले इस महापुराणका विस्तार किया । मैं उन्हीं सर्वपापहारी व्यासनन्दन भगवान् श्रीशुकदेवजीके चरणोंमें नमस्कार ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1418

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करता हूँ ॥६८ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां द्वादशस्कन्धे द्वादशस्कन्धार्थनिरूप द्वादशोऽध्यायः ॥१२ ॥

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पृष्ठ 1419

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अथ त्रयोदशोऽध्यायः विभिन्न पुराणोंकी श्लोक संख्या और श्रीमद्भागवतकी महिमा सूत उवाच यं ब्रह्मा वरुणेन्द्ररुद्रमरुतः स्तुन्वन्ति दिव्यैः स्तवै- र्वेदैः सांगपदक्रमोपनिषदै- र्गायन्ति यं सामगाः । ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो यस्यान्तं न विदुः सुरासुरगणा देवाय तस्मै नमः ॥१ पृष्ठे भ्राम्यदमन्दमन्दरगिरि- ग्रावाग्रकण्डूयना- निद्रालोः कमठाकृतेर्भगवतः श्वासानिलाः पान्तु वः । यत्संस्कारकलानुवर्तनवशाद् वेलानिभेनाम्भसां यातायातमतन्द्रितं जलनिधे- र्नाद्यापि विश्राम्यति ॥२ सूतजी कहते हैं - ब्रह्मा, वरुण, इन्द्र, रुद्र और मरुद्गण दिव्य स्तुतियोंके द्वारा जिनके गुण- गानमें संलग्न रहते हैं; साम- संगीतके मर्मज्ञ ऋषि- मुनि अंग, पद, क्रम एवं उपनिषदोंके सहित वेदोंद्वारा जिनका गान करते रहते हैं; योगीलोग ध्यानके द्वारा निश्चल एवं तल्लीन मनसे जिनका भावमय दर्शन प्राप्त करते रहते हैं; किन्तु यह सब करते रहनेपर भी देवता, दैत्य, मनुष्य –कोई भी जिनके वास्तविक स्वरूपको पूर्णतया न जान सका, उन स्वयंप्रकाश परमात्माको नमस्कार है ॥१ ॥

जिस समय भगवान्ने कच्छपरूप धारण किया था और उनकी पीठपर बड़ा भारी मन्दराचल मथानीकी तरह घूम रहा था, उस समय मन्दराचलकी चट्टानोंकी नोकसे खुजलानेके कारण भगवान्‌को तनिक सुख मिला । वे सो गये और श्वासकी गति तनिक बढ़ गयी । उस समय उस श्वासवायुसे जो समुद्रके जलको धक्का लगा था, उसका संस्कार आज भी उसमें शेष है । आज भी समुद्र उसी श्वासवायुके थपेड़ोंके फलस्वरूप ज्वार- भाटोंके रूपमें दिन- रात चढ़ता- उतरता रहता है, उसे अबतक विश्राम न मिला । भगवान्की वही ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1420

श्रीमद्भागवत महापुराण - २, पृष्ठ 1420 का मूल पृष्ठ
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परमप्रभावशाली श्वासवायु आपलोगोंकी रक्षा करे ॥२ ॥

पुराणसंख्यासम्भूतिमस्य वाच्यप्रयोजने ।

दानं दानस्य माहात्म्यं पाठादेश्च निबोधत ॥३

ब्राह्मं दशसहस्राणि पाद्मं पंचोनषष्टि च ।

श्रीवैष्णवं त्रयोविंशच्चतुर्विंशति शैवकम् ॥४

दशाष्टौ श्रीभागवतं नारदं पंचविंशतिः ।

मार्कण्डं नव वाह्नं च दशपंच चतुःशतम् ॥५

चतुर्दश भविष्यं स्यात्तथा पंचशतानि च ।

दशाष्टौ ब्रह्मवैवर्तं लिंगमेकादशैव तु ॥६

चतुर्विंशति वाराहमेकाशीतिसहस्रकम् ।

स्कान्दं शतं तथा चैकं वामनं दश कीर्तितम् ॥७

कौर्मं सप्तदशाख्यातं मात्स्यं तत्तु चतुर्दश ।

एकोनविंशत्सौपर्णं ब्रह्माण्डं द्वादशैव तु ॥ ८

एवं पुराणसन्दोहश्चतुर्लक्ष उदाहृतः ।

तत्राष्टादशसाहस्रं श्रीभागवतमिष्यते ॥ ९

इदं भगवता पूर्वं ब्रह्मणे नाभिपंकजे ।

स्थिताय भवभीताय कारुण्यात् सम्प्रकाशितम् ॥१०

आदिमध्यावसानेषु वैराग्याख्यानसंयुतम् ।

हरिलीलाकथाव्रातामृतानन्दितसत्सुरम् ॥११

सर्ववेदान्तसारं यद् ब्रह्मात्मैकत्वलक्षणम् ।

वस्त्वद्वितीयं तन्निष्ठं कैवल्यैकप्रयोजनम् ॥१२

शौनकजी! अब पुराणोंकी अलग- अलग श्लोक संख्या, उनका जोड़, श्रीमद्भागवतका प्रतिपाद्य विषय और उसका प्रयोजन भी सुनिये । इसके दानकी पद्धति तथा दान और पाठ आदिकी महिमा भी आपलोग श्रवण कीजिये || ३ || ब्रह्मपुराणमें दस हजार श्लोक, पद्मपुराणमें पचपन हजार, श्रीविष्णुपुराणमें तेईस हजार और शिवपुराणकी श्लोकसंख्या ******ebook converter DEMO Watermarks *******